Wednesday, March 29, 2023

29.03.2023 HINDI MURLI

29.03.2023 HINDI MURLI

मीठे बच्चे - तुम्हारी याद अनकॉमन है, जिसे तुम इन आंखों से देखते नहीं, उसे याद करते हो और उसकी याद से तुम्हारे विकर्म विनाश हो जाते हैं''

प्रश्नः- किस एक आदत का त्याग करो तो सब गुण स्वत: आते जायेंगे?

उत्तर:- आधाकल्प से देह-अभिमान में आने की आदत जो पक्की हो गई है, अब इस आदत का त्याग करो। शिवबाबा जो मोस्ट बिलवेड है, उसे याद करो। कोई भी देहधारी की याद न रहे तो सब क्वालिफिकेशन आ जायेंगी, डिफेक्ट निकल जायेंगे। आत्मा पवित्रता का सागर बन जायेगी। खुशी का पारा चढ़ा रहेगा। सब गुण स्वत: आते जायेंगे।

गीत:-  ओम् नमो शिवाए...

ओम् शान्ति। बच्चों ने अपने बेहद के बाप की महिमा सुनी और बच्चों के आगे वह बेहद का बाप सम्मुख बैठा है। हर एक बच्चे की बुद्धि में यह जरूर आना चाहिए कि हम उस शिवबाबा, जिसकी यह महिमा है, उसके सम्मुख बैठे हैं और उनसे हम 21 जन्मों के लिए सदा सुख का वर्सा ले रहे हैं। यह याद आने से ही खुशी का पारा चढ़ना चाहिए। ऐसे नहीं, जिस समय सामने सुनते हो उस समय याद रहे और फिर भूल जाओ। नहीं, भूलना नहीं चाहिए। बच्चे जानते हैं हम फिर से अपना राज्य-भाग्य ले रहे हैं। तो बुद्धि चली जाती है उस निराकार बाप की तरफ। उनको बुद्धि से जाना जाता है। दिन-रात बुद्धि में यह याद रहना चाहिए - हम बेहद के बाप से भविष्य 21 जन्मों का वर्सा ले रहे हैं। निश्चय तो पक्का होता ही है। लौकिक माँ-बाप में निश्चय बैठा फिर उनमें संशय थोड़ेही हो सकता है। परन्तु यह नई बातें हैं। बुद्धि से बाप को जाना जाता है। बच्चे जानते हैं कि हम शिवबाबा के बने हैं उनसे ही वर्सा मिलना है। हम कल्प-कल्प उस बाप से वर्सा पाते हैं। बुद्धि में याद आता है। बाबा आप द्वारा हमको फिर से राजाई मिल रही है। हम हकदार हैं। जबकि हकदार हैं तो जरूर बाप को याद करना होगा। लौकिक बाप से वर्सा लेते हैं। वह तो बहुत याद पड़ जाता है। इसमें अनकॉमन बात यह है जो बाप को याद करने से हमारे पाप भस्म होंगे इसलिए बाप को याद करना पड़ता है। लौकिक बाप की याद तो आटोमेटिकली रहती है। इन आंखों से देखते हैं। बच्चा पैदा होता और मम्मा बाबा कहता रहता। यह बाप इन आंखों से दिखाई नहीं पड़ता। बुद्धि से याद करना है। हम शिवबाबा की ब्रह्मा द्वारा सन्तान बने हैं और 21 जन्मों का वर्सा पाने के लिए श्रीमत पर पुरुषार्थ करते रहते हैं। इसमें पहले-पहले मुख्य है पवित्रता। जितना याद करेंगे बुद्धि पवित्र होती जायेगी। ऐसे नहीं समझना हम तो बच्चे हैं ही हैं। बाप को याद नहीं करेंगे तो विकर्म विनाश नहीं होंगे। बहुत बच्चे समझते हैं हम तो बच्चे हैं और बाप को याद नहीं करते। कहते हैं ना - मुख से राम-राम कहो। परन्तु इस राम का (शिवबाबा का) चित्र तो है नहीं, इसलिए मनुष्यों का बुद्धियोग चला जाता है उस राम तरफ। सद्गति दाता शिव को तो सभी भूले हुए हैं।

 

अभी तुम जानते हो शिवबाबा आया हुआ है। पहले तो जरूर रचयिता शिवबाबा आया होगा तब ही स्वर्ग की रचना रची होगी। उनके बाद फिर राम का राज्य चला। अब तुम सतयुग त्रेता में राज्य करने के लिए बाप से वर्सा ले रहे हो। यह बुद्धि में चलना चाहिए। परमपिता परमात्मा शिव आते ही एक बार हैं। राम-सीता, लक्ष्मी-नारायण आदि भी एक ही बार आते हैं। भल पुनर्जन्म लेते हैं परन्तु नाम, रूप, देश, काल सभी बदल जाता है। राम सीता भी प्रालब्ध भोगने लिए पुनर्जन्म लेते हैं। यह ज्ञान सारा बुद्धि में टपकना चाहिए तो खुशी रहेगी। कोई को भी समझाना बहुत सहज है। स्वर्ग के रचयिता बाप से तुमको इस समय वर्सा मिल सकता है। बेहद के बाप को याद तो सभी करते हैं। बाप नई सृष्टि रचता है तो सभी सुखी हो जाते हैं। इस समय तो सभी दु:खी हैं। यह ड्रामा ही सुख दु:ख का बना हुआ है। सुख में कौन राज्य करते हैं? लक्ष्मी-नारायण, फिर त्रेता में राम सीता.. तुम जानते हो इतने वर्ष इस घराने का राज्य चलता है। क्रिश्चियन समझेंगे हमारे क्राइस्ट ने राजाई रची। फिर एडवर्ड दी फर्स्ट, एडवर्ड दी सेकेण्ड राज्य करते आये। पास्ट होता जाता है ना। भारतवासियों को तो कुछ भी पता नहीं है। तुम बच्चे जानते हो सतयुग में लक्ष्मी-नारायण का राज्य था जिसको ही हेविन स्वर्ग कहा जाता है, जो बाप ही स्थापन करते हैं। पतित दुनिया में आये तब तो पावन बनाये। यह याद रहना चाहिए। हम उस बाप से बेहद का वर्सा ले रहे हैं श्रीमत पर और धारणा कर रहे हैं। यह भूलना नहीं चाहिए। बरोबर शिवबाबा कल्प पहले भी आया था, जिसका यादगार भी है। अब वह फिर से आया हुआ है। पहले आते हैं निराकार शिवबाबा, वह आकर तुमको देवी-देवता बनाते हैं। सतयुग में लक्ष्मी-नारायण प्रैक्टिकल में राज्य करेंगे। फिर भक्ति मार्ग में पुजारी बन चित्र आदि बनायेंगे। लक्ष्मी-नारायण का इस समय कोई एक्यूरेट चित्र तो नहीं है फिर प्रैक्टिकल में आयेंगे। अब शिव-बाबा तुमको प्रैक्टिकल में पढ़ा रहे हैं ब्रह्मा द्वारा। कितनी सीधी बात है। और कोई भी स्कूल में ऐसे नहीं कहेंगे तुम्हारी आत्मा पढ़ती है, टीचर की आत्मा हमको पढ़ाती है। वह सब मनुष्य, मनुष्य को पढ़ाते हैं। वास्तव में पढ़ाती आत्मा है। आत्मा ही आरगन्स द्वारा पढ़ती है। आत्मा कहती है मैं अब बैरिस्टर बन गया हूँ। नॉलेज से बैरिस्टर बनते हैं। यहाँ तो है वन्डरफुल बात। निराकार शिवबाबा निराकार आत्माओं से बात कर रहे हैं। आत्मा में संस्कार रहते हैं। मनुष्य यह भूल जाते हैं। निराकार बाप इन द्वारा समझाते हैं। उनका एक ही नाम शिव है। तुम भी कहते हो शिवबाबा, बुद्धि ऊपर चली जाती है। लौकिक बाप को याद करने से शरीर याद आ जायेगा। शिवबाबा का शरीर तो है नहीं। परमात्मा का मन्दिर ही निराकारी रूप का है। आकारी देवतायें हैं, साकारी मनुष्य हैं। वह है ही निराकार शिव, तुम्हारी आत्मा अब नॉलेजफुल बन रही है। बाप कहते हैं मैं निराकार हूँ। मेरे में सृष्टि के आदि-मध्य-अन्त का नॉलेज है। मैं तुमको पढ़ाता हूँ इस मुख द्वारा। तुम भी मेरे समान नॉलेजफुल बन जाओ। यह नॉलेज सिवाए निराकार बाप के कोई दे नहीं सकता। निराकार परमात्मा को ही नॉलेजफुल, ब्लिसफुल, पतित-पावन कहा जाता है। बाबा कहते हैं पुरानी दुनिया को बदल नई दुनिया मैं ही बनाता हूँ। जैसे मुझ निराकार में सारे झाड़ की नॉलेज है वैसे तुम आत्माओं को भी बनाता हूँ। तुम्हारी आत्मा भी ऐसी नॉलेजफुल बनती है, तुमको आप समान बनाता हूँ। इस सृष्टि के आदि-मध्य-अन्त की नॉलेज सुनने से तुम चक्रवर्ती राजा-रानी बनेंगे। मनुष्य, मनुष्य को देवता बना न सकें।

 

बाप है ज्ञान का सागर, पवित्रता का सागर। बच्चों को आप समान बनाते हैं तो सब गुण होने चाहिए। फिर तुम देवता बनेंगे तो क्वालिफिकेशन बदल जायेंगी। बाप की क्वालिफिकेशन अलग है, बाप ज्ञान का सागर है, तुमको भी बनना है। बाप पवित्रता का सागर है। हम आधाकल्प पवित्र रहते हैं। बाप कहते हैं ड्रामा अनुसार तुम पतित बनते हो फिर मैं आकर पावन बनाता हूँ 21 जन्म लिए। सिर्फ तुम श्रीमत पर चलो, एक मुझे याद करो, दूसरा न कोई। मैं तुमको स्वर्ग का मालिक बनाता हूँ। बाप को भूल और कोई की याद में रहेंगे तो डिफेक्टेड हो जायेंगे। शिवबाबा है मोस्ट बिलवेड, सबसे प्यारा बाप है। तुम्हारा नाम भी गाया हुआ है वन्दे मातरम्। तुम्हारी आत्मा पवित्र बनती है। तुम पवित्र बन भारत को स्वर्ग बनाते हो इसलिए तुम्हारा नाम बाला है शिव शक्ति पाण्डव सेना। तुम पाण्डव भी हो क्योंकि परमधाम की यात्रा पर युद्ध के मैदान में खड़े हो, माया पर जीत पाने लिए। बच्चे जानते हैं हमको बाप जैसा मास्टर ज्ञान सागर, पवित्रता का सागर बनना है। देह का अहंकार टूट जाना चाहिए। जन्म-जन्मान्तर देह धारण की है तो वह आदत पक्की हो गयी है। अब इस आदत का त्याग चाहिए। जैसे बाप निराकार है तो देह-अभिमान कहाँ से आया? तुमको भी इस पुरानी देह को छोड़ मेरे पास आना है। विनाश होता है तो कुछ कारण होगा ना। वर्थ नाट ए पेनी चीज़ का ही विनाश होता है। अब तुमको स्वर्ग चलने लायक बनाते हैं। वहाँ सदैव सुख ही सुख है। सुखधाम और शान्तिधाम, यह है दु:खधाम। अशान्त किया है रावण ने फिर शान्ति देने वाला है परमपिता परमात्मा। कोई कहते हैं मन की शान्ति चाहिए। बोलो, कैसी शान्ति चाहिए? यह तो है दु:खधाम, क्या तुमको सुखधाम चलना है? बाप को याद करो तो सुखधाम चलेंगे। अशान्त करने वाला है रावण-माया जो यहाँ हाज़िर है। मुक्ति-जीवनमुक्ति में अशान्त करने वाला रावण होता नहीं इसलिए अब चलो अपने घर वापिस। अगर सतयुग में चलना चाहते हो तो चलो। हर एक आत्मा जीवनमुक्ति जरूर चाहती है। ऐसे नहीं सब सतयुग में, जीवनमुक्ति में चलेंगे। वह तो सिर्फ तुम बच्चे ही जाते हो। बाकी जो आत्मायें ऊपर से आती हैं वह पहले जीवनमुक्ति में हैं। माया की परछाया नहीं लगती है। सतोप्रधान बन फिर सतो, रजो, तमो में आते हैं। माया के होते हुए भी आत्मा को सुख जरूर भोगना है। दु:ख नहीं हो सकता क्योंकि पवित्र है ना। फिर अपवित्र होने से दु:ख पायेंगे, ऐसे नहीं आने से ही दु:ख पाते हैं। यह सुख-दु:ख का खेल बना हुआ है।

 

बाबा के ख्यालात चलते रहते हैं - मनुष्यों को भीती देने के लिए बोर्ड लगाना चाहिए। सिर्फ चित्र देख मनुष्य मूंझते हैं। समझो शिवबाबा का चित्र रखते हैं और नीचे लिख देते हैं डीटी वर्ल्ड सावरन्टी इज़ योर गॉड फादरली बर्थ राइट। मनुष्य चित्र देख कहेंगे भगवान ऐसा थोड़ेही होता है। भगवान का रूप क्या है? फिर भी लिखा हुआ रहता है बहनों और भाइयों, आकर बेहद के बाप से 21 जन्म सदा सुख पाने का पुरुषार्थ करो। वह तो जब कोई सम्मुख आये तब समझाया जाए। निमंत्रण देते हैं। दिन-प्रतिदिन बहुत शॉर्ट बनाना होता है। पिछाड़ी में शॉर्ट होता जायेगा। मनमनाभव, बाप को याद करो और उनसे वर्सा लो। तो लिखना चाहिए बहनों-भाइयों सतयुग की राजाई 21 जन्मों के लिए बाप से आकर प्राप्त करो, इस होवनहार लड़ाई के पहले। इस लड़ाई से ही स्वर्ग के द्वार खुलते हैं। यह कोई दुनिया नहीं जानती। तुम जानते हो इस लड़ाई से ही भारत सुखधाम बनेगा। वह कोशिश करते हैं, लड़ाई न लगे। तुम जानते हो इस महाभारी महाभारत लड़ाई से ही महाविनाश होना है। सब आत्माओं को वापिस जरूर जाना है क्योंकि खेल पूरा हुआ फिर से पार्ट बजाने आयेंगे। तो युक्ति से लिखना चाहिए।

 

तुम हो रूहानी पण्डे, वह हैं जिस्मानी देहधारी पण्डे। तुम अपने को विदेही आत्मा देह से अलग समझते हो, तुम जानते हो बाप हम आत्माओं को ले जायेंगे। तो तुमको लिखना पड़े कि बेहद के बाप से आकर वर्सा लो। निराकार अक्षर जरूर लिखना है। तुम जानते हो बाबा आया हुआ है इस कर्मक्षेत्र पर। हम भी वहाँ से आते हैं। सभी आत्मायें जो एक्टर्स हैं, इम्पैरिसिबुल, इमार्टल आत्मायें हैं, कब मरती नहीं। यह अच्छी रीति निश्चय हो जाना चाहिए। हम शिवबाबा से अनेक बार वर्सा ले चुके हैं, फिर भी लेंगे। पुरुषार्थ से तुम जानते हो शिव-बाबा हमको स्वर्ग का वर्सा दे रहे हैं, तो क्यों नहीं उनसे वर्सा लेते हो? बाप और वर्से को याद करेंगे तो अन्त मती सो गति हो जायेगी। बाकी सिर्फ राम-राम कहने से मुक्ति थोड़ेही हो जायेगी। अखबार में डालते हैं फलाना स्वर्गवासी हुआ। उनसे पूछना चाहिए स्वर्ग किसको कहते हो? यह तो नर्क है, तो पुनर्जन्म भी नर्क में लेंगे। स्वर्ग है तो पुनर्जन्म भी स्वर्ग में लेंगे। अगर कोई शरीर छोड़ नर्क से स्वर्ग गया, वहाँ तो उनको बहुत वैभव मिलेंगे। फिर नर्क के वैभव खिलाने उनको स्वर्ग से नर्क में क्यों बुलाते हो? उनको नर्क का भोजन खिलायेंगे तो ऐसी बुद्धि हो जायेगी। जैसा अन्न वैसा मन हो जायेगा। स्वर्ग में तो दूध-घी की नदियां बहती हैं। तुम तो घासलेट का खाना खिलायेंगे। श्रीनाथ द्वारे में अच्छे घी का भोग लगता है क्योंकि वहाँ राधे-कृष्ण का चित्र है। तो उन्हों की याद में भोग भी अच्छे-अच्छे वैभव बनाकर लगाते हैं। ऐसा भोग और कहाँ नहीं लगता। जगत नाथ का भी मन्दिर है, वहाँ चावल का भोग लगाते हैं, वहाँ वैभव नहीं चढ़ाते। अब तो नर्क है तो दु:ख है। स्वर्ग में तो सुख था। बाप समझाते तो बहुत अच्छा हैं, परन्तु धारणा नम्बरवार होती है यह भी ड्रामा में नूंध है। ड्रामा अनुसार नौकर चाकर भी बनने हैं। थर्ड क्लास टिकेट भी कोई तो जरूर लेंगे ना। फर्स्टक्लास है सूर्यवंशी राजधानी, सेकेण्ड क्लास चन्द्र-वंशी राजधानी, थर्डक्लास है प्रजा। उनमें भी नम्बरवार हैं। अब जिसको जो टिकेट चाहिए वह लेवे। अच्छा!

 

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का यादप्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

 

धारणा के लिए मुख्य सार:-

 

1) बाप समान ज्ञान का सागर, पवित्रता का सागर बनना है। विदेही बनने का अभ्यास करना है।

 

2) बाप की याद से बुद्धि को पवित्र बनाना है। सदा इसी नशे में रहना है कि बेहद के बाप से हम 21 जन्मों का वर्सा ले रहे हैं।

 

वरदान:-   न्यारेपन के अभ्यास द्वारा पास विद आनर होने वाले ब्रह्मा बाप समान भव

जैसे ब्रह्मा बाप ने साकार जीवन में कर्मातीत होने के पहले न्यारे और प्यारे रहने के अभ्यास का प्रत्यक्ष अनुभव कराया। सेवा वा कोई कर्म छोड़ा नहीं लेकिन न्यारे होकर सेवा की। यह न्यारा पन हर कर्म में सफलता सहज अनुभव कराता है। तो सेवा का विस्तार भल कितना भी बढ़ाओ लेकिन विस्तार में जाते सार की स्थिति का अभ्यास कम न हो तब ही डबल लाइट बन कर्मातीत स्थिति को प्राप्त कर डबल ताजधारी, ब्रह्मा बाप समान पास विद आनर बनेंगे।

स्लोगन:-  स्वयं को ऐसा शक्ति स्तम्भ बनाओ जो अनेको को नई जीवन बनाने की शक्ति प्राप्त हो।

Monday, March 27, 2023

27.03.2023 HINDI MURLI

 27.03.2023 HINDI MURLI

“मीठे बच्चे - बाप समान निडर बनो, अपनी अवस्था साक्षी रख सदा हर्षित रहो, याद में रहने से ही अन्त मती सो गति होगी''

प्रश्नः-  खुशनसीब बच्चे सदा फ्रेश और हर्षित रहने के लिए कौन सी विधि अपनाते हैं?

उत्तर:-  दिन में दो बारी ज्ञान स्नान करने की। बड़े आदमी फ्रेश रहने के लिए दो बार स्नान करते हैं। तुम बच्चों को भी ज्ञान स्नान दो बारी करना चाहिए। इससे बहुत फ़ायदे हैं -1. सदा हर्षित रहेंगे, 2. खुशनसीब, तकदीरवान बन जायेंगे, 3. किसी भी प्रकार का संशय निकल जायेगा, 4. मायावी लोगों के संग से बच जायेंगे, 5. बाप और टीचर खुश होंगे, 6. गुल-गुल (फूल) बन जायेंगे। अपार खुशी में रहेंगे।

गीत:-  जाग सजनिया जाग...

ओम् शान्ति। शिवबाबा बच्चों को बैठ समझाते हैं ब्रह्मा मुख से। यह है गऊमुख। बैल मुख नंदीगण है ना। गीत भी सुना। साजन कहते हैं सजनियों को, अब सजनियां सिर्फ फीमेल तो नहीं, यह मेल्स भी सजनियां हैं। जो भी भक्ति करते हैं, भगवान को याद करते हैं तो हो गयी सजनियां। साजन तो एक है। साधू भी साधना करते हैं भगवान से मिलने लिए। तो वह भी सजनियां ठहरे। वह एक भगवान कौन? एक तो कहा जायेगा गॉड फादर को। जैसे वर राजा को आना पड़ता है वन्नी (स्त्री) को ले जाने के लिए। यह सब हैं वन्नियां। साजन को याद करती हैं तो जरूर आना पड़ेगा। एक के लिए तो नहीं, सबके लिए आना पड़ेगा और सभी सजनियां दु:खी हैं। कोई न कोई रोग, बीमारी आदि होगी जरूर। तो यह हो गया नर्क। स्वर्ग में है सुख, नर्क में है दु:ख। इस समय हम सब हैं नर्कवासी सजनियां अर्थात् सब माया रावण की कैद में हैं। बेहद का बाप बेहद की बातें ही समझायेंगे। सारी दुनिया कैद में है, इसको दु:खधाम कहा जाता है। धाम अर्थात् रहने की जगह। कलियुग में है दु:ख। सतयुग में है सुख। दैवी सम्प्रदाय, आसुरी सम्प्रदाय - यह है गीता के भगवान शिव के महावाक्य। वह खुद कहते हैं - सजनियां, अब नवयुग आया। यह पुरानी दुनिया है। साजन कहते हैं अब जागो। अब नया युग, सतयुग आता है। गीता से स्वर्ग स्थापन किया था। गीता भारत के देवी-देवता धर्म का शास्त्र है, जो देवता धर्म अब प्राय:लोप हो गया है। प्राय: अर्थात् बाकी आटे में नमक जाकर रहा है। चित्र हैं लेकिन अपने को कोई भी देवता नहीं मानते। यह भूल गये हैं कि सतयुग में देवी-देवता धर्म था, जिसको ही स्वर्ग कहा जाता है। जब लक्ष्मी-नारायण का राज्य होगा तब वह ऐसे नहीं कहेंगे कि अब स्वर्ग है। फिर तो यह भी समझें कि नर्क होना है। यह सब राज़ हम अभी जानते हैं। पांच हजार वर्ष पहले स्वर्ग था, अब नर्क है। देवी-देवता धर्म की टांग टूटी हुई है। यह बातें और कोई गीता सुनाने वाला बता न सके। सर्व शास्त्रमई शिरोमणि गीता है। गीता का भगवान ही गीता द्वारा भारत को स्वर्ग बनाते हैं। फिर आधाकल्प वहाँ गीता की दरकार नहीं। वहाँ तो प्रालब्ध है। बाबा खुद कहते हैं यह ज्ञान प्राय:लोप हो जाता है। अभी लोप है ना। हम रोज़ नई-नई बातें सुनते हैं। वह तो 18 अध्याय सुनते आये हैं। उसको नया कौन कहेंगे? पूरे 18 अध्याय लिख दिये हैं। यहाँ तो हम पढ़ते रहते हैं। योग लगाते रहते हैं। इसमें भी टाइम लगता है।

 

ज्ञान और योग दोनों भाई-बहन हैं। बाबा कहते हैं ध्यान से ज्ञान श्रेष्ठ है क्योंकि उससे ही तुम जीवनमुक्ति पा सकेंगे। ऐसा कोई कह न सके कि हमको साक्षात्कार हो तो पुरुषार्थ करें। सामने श्रीकृष्ण का चित्र देख रहे हैं ऐसे प्रिन्स-प्रिन्सेज बनेंगे, फिर जो चाहे सो बनो। प्रिन्स-प्रिन्सेज बनते हैं यह तो मानना चाहिए ना। अब नवयुग आ रहा है। जहाँ जीत, वहाँ जाकर प्रिन्सपने का जन्म लेंगे। रत्नजड़ित मुरली भी होगी - यह निशानी है। श्रीकृष्ण को भी मुरली दिखाते हैं क्योंकि शहज़ादा है ना। बाकी वहाँ ज्ञान की कोई बात नहीं। ज्ञान का सागर तो एक शिवबाबा है। वह बाबा कहते हैं बच्चे विनाश सामने खड़ा है। पिछाड़ी में मंत्र देने वाला कोई नहीं रहेगा। अन्त मती सो गति गाई हुई है ना। अन्त में मेरी याद रखेंगे तो गति मिल जायेगी। तुम आजकल करते आये हो। दो चार इत़फाक दिखाऊंगा कि कैसे अचानक मनुष्य मरते हैं। उस समय मंत्र तो याद कर नहीं सकेंगे। समझो अचानक छत गिर पड़ती है, उस समय याद कर सकेंगे? धरती हिलेगी, उस समय तो हाय-हाय करने में लग जायेंगे। बहुत समय से प्रैक्टिस होगी तो फिर उस समय अवस्था हिलेगी नहीं। साक्षी हो, हर्षितमुख बैठे रहेंगे। मनुष्य तो थोड़ा आवाज से डरके मारे भाग जायेंगे। तुम कभी भागेंगे नहीं। डरने की बात नहीं। जैसे बाबा निडर है बच्चों को भी निडर बनना है।

 

बाबा कहते - बच्चे, अब नवयुग आ रहा है। अब अपने को इन्श्योर कर दो। सारे भारत को तुम इन्श्योर करते हो। बाप से ताकत लेकर भारत को तुम इन्श्योर कर रहे हो। भारत हीरे जैसा बन जायेगा। फिर उसमें भी जितना जो लाइफ को इनश्योर करेगा। तन-मन-धन सब इनश्योर हो जाता है। बाबा कहते हैं यह ज्ञान प्रत्यक्षफल देने वाला है। जैसे सुदामे का मिसाल है झट महल देखे। तो प्रत्यक्षफल हुआ ना। प्रिन्स-प्रिन्सेज का भी साक्षात्कार करते हैं। फिर प्रिन्स-प्रिन्सेज तो सतयुग में भी हैं, त्रेता में भी हैं। यह थोड़ेही समझ सकेंगे कि हम कहाँ के प्रिन्स बनेंगे। सब सूर्यवंशी तो नहीं बन सकेंगे। यह सब है साक्षात्कार। बाकी आत्मा कोई निकलकर जाती नहीं है। यह साक्षात्कार की ड्रामा में नूंध है। सोल को बुलाते हैं तो ऐसे थोड़ेही आत्मा कोई शरीर से निकल जाती है। फिर तो वह शरीर रह न सके। यह सब साक्षात्कार हैं। बाबा भिन्न-भिन्न रूप से साक्षात्कार कराते हैं। नूंध है तब सोल आती है, यह ड्रामा का राज़ समझना है। नई बातें हैं ना। तो क्लास में भी रेगुलर आना पड़े। तुमको मालूम है - बहुत अच्छे-अच्छे आदमी दो बारी स्नान करते हैं फ्रेश रहने के लिए। यह भी ज्ञान स्नान दो बारी करने से फ्रेश होंगे। दो बारी ज्ञान स्नान करने से बहुत-बहुत फ़ायदा है। नहीं तो मुफ्त में अपनी बादशाही गंवा देंगे। बाबा रजिस्टर से भी जांच करते हैं। पूरा खुशनसीब तकदीरवान कौन हैं? अरे बेहद के बाप से अथाह धन लेने जाते हैं, स्वर्ग का मालिक बनते हैं। अगर इतना निश्चय नहीं तो ऊंच पद भी पा नहीं सकेंगे। दो बारी स्नान करने से तुम बहुत-बहुत हर्षित रहेंगे। बाबा कहते हैं मैं गाइड बन तुम बच्चों को ले चलने आया हूँ। कितना घुमाता हूँ! वो लोग एरोप्लेन से ऊपर में जाते हैं, कितनी उन्हों की महिमा होती है। वास्तव में महिमा तो तुम्हारी होनी चाहिए। तुम वैकुण्ठ में जाकर घूम फिर आते हो। मोस्ट वन्डरफुल चीज़ है! बाबा कहते हैं मैं सबसे दूर रहने वाला आया हूँ देश पराये। फिर इसमें सर्वव्यापी की तो बात ही नहीं। तुम पैगम्बर हो, पैगाम देने वाले हो ना। मैं भेज देता हूँ। यह भी ड्रामा में नूंध है। ड्रामा अनुसार हर एक को अपना पार्ट बजाने आना पड़ता है। फिर मैं भी आया हूँ, आकर पढ़ाता हूँ। यह तो गीता पाठशाला है। उन सतसंगों में तो तुम जन्म-जन्मान्तर जाते रहते हो। एक कान से सुना, दूसरे से निकला। एम आबजेक्ट कुछ नहीं। अभी तो अन्दर में खुशी की तालियां बजती रहती हैं। स्टूडेन्ट लाइफ में जो अच्छा पढ़ते हैं उनको तो खुशी रहती है ना। बच्चे के सम्बन्ध की भी खुशी होगी। टीचर को भी खुशी होगी। यह भी माँ बाप है, टीचर है तो खुशी होती है। बच्चों का फ़र्ज है पढ़ना। अब बाप सम्मुख आया हुआ है तो एक बाप से ही सुनो। तुम आधाकल्प बहुत भटके हो। अब भटकना बन्द करो, परन्तु वह भी तब होगा जब पूरा निश्चय हो।

 

मनुष्य कहते हैं कि कलियुग में इतने वर्ष पड़े हैं। तुम जब उनको बतायेंगे तो वह कहेंगे यह सब कल्पना है। जादू है। बस अबलायें वहाँ ही बैठ जायेंगी। बाबा अपनी तरफ खींचते, मायावी पुरुष फिर अपनी तरफ खींचते। बीच में लटकते रहते हैं। बाबा समझाते हैं - बच्चे, जब तक दो बारी ज्ञान स्नान नहीं किया है तब तक कुछ फ़ायदा नहीं होगा। अरे कोई समय मुरली में ऐसी प्वाइंट्स निकलती हैं जिससे ऐसा तीर लग जायेगा जो तुम्हारा संशय मिट जायेगा, और कोई भी सतसंग में जाने के लिए कभी मना नहीं करते। यहाँ के लिए मना करते हैं क्योंकि यहाँ पवित्र बनने की मुख्य बात है। स्त्री-पति दोनों को पवित्र बनना है। यहाँ तो स्त्री पति के पिछाड़ी सती बनती है कि पति-लोक में जायें। पति नर्क में है तो स्त्री भी नर्क में आ जाती है। अब तुम दोनों स्वर्ग में जाने के लिए पुरुषार्थ करो। अबलाओं पर कितने अत्याचार होते हैं! बच्चियां कहें हम शादी नहीं करेंगी, वह कहे शादी जरूर करनी है। बाबा कहते - बच्चियां, इस अन्तिम जन्म में शादी करने से मोह की जाल बढ़ती जायेगी। पति में मोह, फिर बच्चों में मोह। पियरघर, ससुरघर में मोह.. आज बच्चा जन्मा पार्टियां देंगे, कल बच्चा मर गया तो हायदोष मचा देंगे। सतयुग में तो तुम बहुत खुश रहेंगे।

 

बाबा समझाते हैं - बच्चे, घर-घर को स्वर्ग बनाओ। चित्र रख दो। जो भी आये, बोलो स्वर्ग के मालिक बनेंगे? आओ, हम समझायें। बाबा बहुत अच्छे-अच्छे स्लोगन्स बताते हैं। दो बारी स्नान करने से तुम बहुत गुल-गुल बन जायेंगे। अपार खुशी रहेगी। कहा जाता है ईश्वर की महिमा अपरमअपार है। तो तुम्हारे खुशी की महिमा भी अपरमअपार हो जायेगी। गीता की महिमा भी अपरमअपार है। तुम कहेंगे गीता से हम स्वर्ग का मालिक बन रहे हैं।

 

एक परमात्मा के सिवाए कोई ऐसे कहेंगे नहीं कि जाग सजनियां जाग, अब सतयुग आ रहा है..। मैं शमा तुम्हारी ज्योत जगाने आया हूँ। यह दादा भी अभी पुरुषार्थी है। बाबा तुम्हें नये युग के लिए नई कहानी सुनाते हैं। कितना अच्छा गीत है! यह रास्ता ही नया है। वह लोग कहते शास्त्रों से ही भगवान का रास्ता मिलेगा फिर कह देते सब ईश्वर ही ईश्वर हैं, उसकी ही महिमा है। हम तो दुनिया में आये हैं खुशी मनाने, कुछ भी खाओ-पियो-मौज करो, आत्मा पर लेप-छेप नहीं लगता। अपनी गन्दी तृष्णायें पूरी करने के लिए आत्मा निर्लेप कह देते हैं। ऐसे के संग में कभी फंसना मत। तुम हो हंस। बाबा कहते तुमको बिल्कुल प्योर बनना है। विकार में जाना तो क्रिमिनल एसाल्ट है। भल मेरी बात अभी नहीं मानो, अभी स्वच्छ नहीं बनेंगे, मददगार नहीं बनेंगे तो धर्मराज द्वारा बहुत सज़ायें खानी पड़ेंगी। याद रख लेना, भगवान ने नया संसार दिखाया है, तुम नये संसार के मालिक बनने आये हो तो अपनी दिल से पूछो - हम सौतेले हैं या मातेले? शिवबाबा है दादा, ब्रह्मा है बाबा, हम हैं पोत्रे पोत्रियां। यह ईश्वरीय कुटुम्ब है। दादा याद नहीं पड़ेगा तो वर्सा कैसे लेंगे? इसलिए दादे को जरूर याद करना है। बाप के सिवाए दादा कैसे होगा? दादा है, तुम पोत्रे हो। बीच में बाप जरूर है। पोत्रों का हक है दादे पर इसलिए कहते हैं तुम दादे से प्रापर्टी ले ही लेना। खुशी की बात है ना।

 

हम शिव भगवान की गीता से भारत की तकदीर हीरे जैसी बना रहे हैं। एक गीता ही हीरे जैसा बनाती है। बाकी सब कौड़ी तुल्य बना देते हैं। भारत की तकदीर को एकदम लकीर लग गई है। अब फिर बाप भारत की तकदीर जगाते हैं। मनुष्य गीता का छोटा लॉकेट बनाकर भी पहनते हैं। परन्तु उसके महत्व को कोई नहीं जानते। यहाँ कायदे भी बड़े कड़े हैं। पवित्र ब्राह्मण जरूर बनना पड़े। ठगी से मम्मा-बाबा नहीं कहना है। सच्चा बनेंगे तब ही नशा चढ़ेगा। हाफ कास्ट को नशा नहीं चढ़ेगा। भगवान भारत के पीछे दीवाना बना है कि हम भारत को फिर हीरे जैसा बनाऊंगा तो भारत पर आशिक हुआ है ना। भारत को फिर से ऊंच बनाते हैं। आशिक माशूक के पिछाड़ी दीवाना होता है ना। तो भारतवासियों के पीछे कितना दीवाना है! कितना दूर से भागते हैं और फिर कितना बड़ा निरहंकारी है! अच्छा!

 

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का यादप्यार और गुडमार्निग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

 

धारणा के लिए मुख्य सार:-

 

1) बेहद के बाप से अथाह ज्ञान धन लेने के लिए दो बारी ज्ञान स्नान करना है। पढ़ाई में रेगुलर जरूर बनना है।

 

2) फुल कास्ट सच्चा पवित्र ब्राह्मण बनना है। बाप का मददगार बनना है। गंदी तृष्णा रखने वालों के संग में कभी नहीं फंसना है।

 

वरदान:- तन मन और दिल की स्वच्छता द्वारा साहेब को राज़ी करने वाले सच्चे होलीहंस भव

स्वच्छता अर्थात् मन-वचन-कर्म, सम्बन्ध सबमें पवित्रता। पवित्रता की निशानी सफेद रंग दिखाते हैं। आप होलीहंस भी सफेद वस्त्रधारी, साफ दिल अर्थात् स्वच्छता स्वरूप हो। तन, मन और दिल से सदा बेदाग अर्थात् स्वच्छ हो। साफ मन वा साफ दिल पर साहेब राज़ी होता है। उनकी सर्व मुरादें अर्थात् कामनायें पूरी होती हैं। हंस की विशेषता स्वच्छता है इसलिए ब्राह्मण आत्माओं को होलीहंस कहा जाता है।

स्लोगन:-     जो इस समय सब कुछ सहन करते हैं वही शहनशाह बनते हैं।

Sunday, March 26, 2023

26.03.2023 BENGALI MURLI

 27.03.2023 BENGALI MURLI

ত্রিকালদর্শী স্থিতির শ্রেষ্ঠ আসন দ্বারা সদা বিজয়ী হও আর অন্যদের শক্তির সহযোগ দাও"

 

আজ ত্রিকালদর্শী বাপদাদা নিজের সকল মাস্টার ত্রিকালদর্শী বাচ্চাদের দেখছেন। বাপদাদা সব বাচ্চাকে ত্রিকালদর্শী হওয়ার সাধন দিব্য বুদ্ধির বরদান এবং ব্রাহ্মণ জন্মের উপহার দিয়েছেন। কারণ, দিব্য বুদ্ধির দ্বারাই বাবাকে, নিজেকে নিজে এবং তিনকালকে স্পষ্টভাবে জানতে পারো। দিব্য বুদ্ধি তথা স্মরণ দ্বারাই সর্বশক্তি ধারণ করতে পারো। সেইজন্য প্রথম বরদান দিব্য বুদ্ধি। এই বরদান বাপদাদা সব বাচ্চাকে দিয়েছেন। কিন্তু এই বরদানকে নম্বরক্রমে প্রত্যক্ষ জীবনে প্রয়োগ করে থাকো। দিব্য বুদ্ধি ত্রিকালদর্শী স্থিতির অনুভব করায়। চার সাবজেক্ট ধারণ করার আধারই দিব্য বুদ্ধি। চার সাবজেক্টই সব বাচ্চা ভালোভাবে জানে, বর্ণনও করে। এক্ষেত্রে, নতুন বাচ্চা হোক বা পুরানো, জানা আর বর্ণন করায় সবাই একেবারে দক্ষ, কিন্তু ধারণ করার ক্ষেত্রে তাদের নম্বর তৈরি হয়ে যায়। দিব্য বুদ্ধির বিশেষত্ব এটাই, দিব্য বুদ্ধির আত্মারা কোনও সঙ্কল্পকে কর্ম বা বাণীতে প্রয়োগ করার আগে প্রতিটা বোল আর প্রতিটা কর্মের তিনকাল জেনে প্র্যাকটিক্যালে আনে। সাধারণ বুদ্ধির আত্মারা অনেক চেষ্টায় বর্তমানকে স্পষ্টভাবে জানতে পারে, কিন্তু ভবিষ্যৎ আর অতীতকাল সম্বন্ধে স্পষ্ট জানতে পারে না। দিব্য বুদ্ধির আত্মার পাস্ট আর ফিউচারও এতই স্পষ্ট হয় যেমন প্রেজেন্ট স্পষ্ট। তিনকালই একসাথে স্পষ্ট অনুভব হয়। সাধারণতঃ, সবাই বলেও যা ভাববে, যা বলবে, যা করবে, অগ্রপশ্চাৎ বিবেচনা করে করো। কর্মের আগে পরিণামকে সামনে রাখো, পরিণাম হলো ভবিষ্যৎ। তো ত্রিকালদর্শী বুদ্ধি হলো নম্বর ওয়ান। ত্রিকালদর্শী বুদ্ধি কখনো অসফলতার অনুভব করবে না। কিন্তু বাচ্চারা তিন প্রকারের বুদ্ধির। যারা সদা ত্রিকালদর্শী বুদ্ধির তারা নম্বর ওয়ান। দ্বিতীয় নম্বর কখনো ত্রিকালদর্শী আর কখনো এককালদর্শী। তৃতীয় নম্বর অমনোযোগী বুদ্ধির, যারা সদা বর্তমানকে দেখে এটাই ভাবে যে, যা এখন হচ্ছে কিংবা যা তারা পাচ্ছে অথবা যেভাবে তারা চলছে তা'তেই তারা ঠিক আছে, ভবিষ্যৎ কি হবে সেটা কেন ভাববে ! কিন্তু অমনোযোগী বুদ্ধি আদি-মধ্য-অন্তকে না ভাবার কারণে সদা সফলতা প্রাপ্ত করার ক্ষেত্রে ধোঁকা খেয়ে যায়। সুতরাং তোমাদের ত্রিকালদর্শী বুদ্ধি হতে হবে।

 

ত্রিকালদর্শী স্থিতি এমন শ্রেষ্ঠ আসন যে, আসন অর্থাৎ স্থিতি দ্বারা নিজেও সদা বিজয়ী আর অন্যদেরও বিজয়ী হওয়ার শক্তি বা সহযোগ দেয়। দিব্য বুদ্ধি বিশাল বুদ্ধি। দিব্য বুদ্ধি অসীম জগতের বুদ্ধি। সুতরাং চেক করো যে নিজের বুদ্ধি কোন নম্বরের বানানো হয়েছে? বাপদাদা বাচ্চাদের রেজাল্টে যা দেখেছেন তা'তে জ্ঞান, গুণ, শক্তির ভান্ডার সব বাচ্চার কাছে সঞ্চিত আছে। কিন্তু সঞ্চিত হওয়া সত্ত্বেও তোমরা বাচ্চারা সবাই নম্বরক্রমে কেন? এমন কাউকে দেখা যায়নি যার কাছে ভান্ডারের সঞ্চয় নেই। সবার কাছে সঞ্চিত আছে, আছে না! তারপরও কেন নম্বরক্রমে? তোমাদের যে কোনো কাউকে যদি জিজ্ঞাসা করা হয়, তোমার স্বয়ং-জ্ঞান, বাবার জ্ঞান, চক্রের জ্ঞান, কর্মের গতির জ্ঞান আছে? সবার কাছে সর্বশক্তি আছে? নাকি কিছু আছে কিছু নেই? জ্ঞানের ব্যাপারে সবাই তোমরা হ্যাঁ করেছ আর শক্তিগুলোর বিষয়ে কেন হ্যাঁ করনি? আচ্ছা, সব গুণ আছে? সর্বগুণ, বুদ্ধিতে আছে? বুদ্ধিতে জ্ঞানও আছে, শক্তিও আছে তাহলে নম্বরক্রমে কেন? ভিন্নতা কেন? অবিনাশী রত্নভান্ডার বিধিপূর্বক কীভাবে কার্যে ব্যবহার করতে হয় তা' তোমরা জানো না, সময় চলে যায় তার পরে তোমরা ভাবো, এইভাবে যদি করতাম, এই বিধিতে যদি চলতাম তো সিদ্ধি প্রাপ্তি (সফলতা) হয়ে যেতো। সুতরাং সময়কে জানা আর সময় অনুসারে শক্তি কিংবা গুণ অথবা জ্ঞান কার্যে প্রয়োগ করার জন্য দিব্য বুদ্ধির বিশেষত্ব আবশ্যক। সাধারণতঃ, জ্ঞানের পয়েন্টস্ অনেক ভাবতে থাকো, শোনাতেও থাকো, কপিগুলোও সব ভরে থাকে, সবার কাছে কত ডায়েরী একত্রিত হয়েছে, অনেক স্টক হয়ে গেছে, তাই না, তাইতো বাবার জন্য যেমন গাওয়া হয়েছে যে আমি যেমন, যেরকম সেভাবে আমাকে জানে কোটির মধ্যে কতিপয় মাত্র। জানে তো সবাই কিন্তু 'যেমন, যেরকম'-এ যে আন্ডারলাইন আছে তা'তে ফারাক হয়ে যায়। আর এই ফারাক হওয়ার কারণে নম্বর তৈরি হয়। তাহলে, কারণ বুঝেছ? এক তো সময় অনুসারে বিধিতে ভিন্নতা এসে যায়, দ্বিতীয়তঃ, কোনও কর্ম বা সঙ্কল্প ত্রিকালদর্শী হয়ে করে না, সেইজন্য নম্বর হয়ে যায়। বুদ্ধিতে কোনও সঙ্কল্প উৎপত্তি হলে সেই সঙ্কল্প হলো বীজ, বাচা আর কর্মণা হলো বীজের বিস্তার, যদি সঙ্কল্প অর্থাৎ বীজকে ত্রিকালদর্শী স্থিতিতে স্থিত হয়ে চেক করো, শক্তিশালী বানাও তবে বাণী আর কর্মে সহজ সফলতা আপনা থেকেই হয়ে আছে। সঙ্কল্পকে যদি চেক না করো অর্থাৎ বীজ শক্তিশালী না হয় তাহলে বাণী আর কর্মতেও সফলতার শক্তি থাকে না। সকলের লক্ষ্য সিদ্ধিস্বরূপ হওয়ার, তাই তো না, সুতরাং সদা সিদ্ধিস্বরূপ হওয়ার বিধি যেটা তোমাদের বলেছি, সেটা চেক করো। মাঝে মাঝে তোমাদের বুদ্ধি অসতর্ক হয়ে যায়, সেইজন্য সফলতা কখনো অনুভব করো আর কখনো পরিশ্রম অনুভব করো।

 

সকল বাচ্চার প্রতি বাপদাদার ভালোবাসার নিদর্শন বাচ্চারা সবাই সহজভাবে সিদ্ধিস্বরূপ হোক। তোমাদের জড় চিত্রের দ্বারা ভক্ত আত্মারা সিদ্ধি প্রাপ্ত করতে থাকে, কারণ তোমরা চৈতন্য রূপে সিদ্ধিস্বরূপ হয়েছ তবে তো জড় চিত্র দ্বারাও অন্যান্য আত্মারা সিদ্ধিপ্রাপ্ত করতে থাকে। তোমরা ত্রিকালদর্শী স্থিতিতে স্থিত থাকলে সেই ত্রিকালদর্শী স্থিতিই সমর্থ স্থিতি। যারা এই সমর্থ স্থিতির তারা ব্যর্থকে এমন সহজভাবে সমাপ্ত করে দেয় যে স্বপ্নেও ব্যর্থ সমাপ্ত হয়ে যায়। যদি ত্রিকালদর্শী বুদ্ধি দ্বারা কর্ম না করো তবে ব্যর্থের বোঝা বারবার উঁচু নম্বরে অধিকারী হতে দেয় না। সুতরাং দিব্য বুদ্ধির বরদান সদা সবসময় কার্যে লাগাও।

 

বাপদাদা আগেও ইঙ্গিত দিয়েছেন যে তোমরা জ্ঞানী-যোগী আত্মা হয়েছ, এখন জ্ঞান আর যোগের শক্তিকে প্রয়োগ করে প্রয়োগশালী আত্মা হও। যেমন, সায়েন্সের শক্তির প্রয়োগ দেখা যায়, কিন্তু সায়েন্সের শক্তির প্রয়োগের ভুল আধার কী? প্রয়োগের মাধ্যমে সায়েন্স আজ যে সাধনই দিয়েছে, সেই সব সাধনের আধার কী? সায়েন্সের প্রয়োগের আধার কী? মনোযোগ সহকারে যদি দেখা যায় তাহলে দেখা যাবে মেজরিটিই (অধিকাংশই) লাইট। লাইট দ্বারাই প্রয়োগ করা হয়। যদি কম্পিউটারও কাজ করে তো তার আধার কী? লাইটই তো না। প্রকৃতির লাইট, সুতরাং এই এক লাইট দ্বারা অনেক রকমের প্রয়োগ প্র্যাকটিক্যালি করে দেখায়, আর তোমাদের তো অবিনাশী পরমাত্ম-লাইট, আত্মিক লাইট আর সেইসঙ্গে রয়েছে তোমাদের প্র্যাকটিক্যাল স্থিতি লাইট, তাহলে এইসবের দ্বারা কী না প্রয়োগ হতে পারে ! তোমাদের স্থিতিও লাইট আর মূল স্বরূপও লাইট বিদ্যমান। সুতরাং যখনই তোমরা কেউ কোনো প্রয়োগ করতে চাও, তখন প্রথমে নিজের মূল আধার চেক করো। যে কেউই, যখনই সায়েন্সের সাধন ইউজ করবে তখন প্রথমে চেক করবে তো না যে লাইট আছে কি নেই! ঠিক সেভাবেই যখন যোগের, শক্তির, গুণের প্রয়োগ করো তখন প্রথমে এটা চেক করো, মূল আধার আত্মিক শক্তি, পরমাত্ম-শক্তি তথা লাইট (হালকা) স্থিতি রয়েছে? যদি স্থিতি আর স্বরূপ ডবল লাইট থাকে তবে প্রয়োগের সফলতা খুব সহজেই করতে পারো, আর সবার আগে এই অভ্যাসকে শক্তিশালী বানানোর জন্য প্রথমে নিজের উপরে প্রয়োগ করে দেখ। প্রতি মাসে অথবা প্রতি ১৫ দিনের জন্য কোনো না কোনো বিশেষ গুণ কিংবা কোনো না কোনো বিশেষ শক্তির প্রয়োগ স্ব-এর প্রতি করে দেখ, কেননা, সংগঠনে বা সম্বন্ধ-সম্পর্কে পেপার তো আসেই, সেইজন্য প্রথমে নিজের উপরে প্রয়োগে চেক করো, কোনো পেপার এলে যে শক্তি বা যে গুণের প্রয়োগ করার লক্ষ্য রেখেছ, তা'তে কতটা সফলতা প্রাপ্ত হয়েছে? আর কত সময়ে সফলতা লাভ হয়েছে? সায়েন্সের প্রয়োগ দিন-দিন অল্প সময়ের মধ্যে প্রত্যক্ষ রূপ অনুভব করানোতে যেমন এগিয়ে যাচ্ছে তেমন সময়ও কম নিচ্ছে। অল্প সময় সফলতা বেশি - সায়েন্সের লোকেরও এই লক্ষ্য। এভাবেই, যে লক্ষ্যই রেখেছ তা'তে সময়কেও চেক করো আর সফলতাও চেক করো। যখন স্ব-এর ক্ষেত্রে প্রয়োগে সফল হয়ে যাবে তখন অন্য আত্মাদের জন্যও প্রয়োগ করা সহজ হয়ে যাবে এবং যখন স্ব-ক্ষেত্রে সফলতা অনুভব করবে তখন তোমার হৃদয়ে অন্যদের জন্য প্রয়োগ করার উৎসাহ-উদ্দীপনা আপনা থেকেই বেড়ে যাবে। যখন তুমি অন্য আত্মাদের সঙ্গে সম্বন্ধ-সম্পর্কে থাকবে, তখন তোমার নিজের উপরে প্রয়োগ করায় ওই আত্মাদের উপরেও তোমার প্রয়োগের প্রভাব আপনা থেকেই পড়তে থাকবে। এক্ষেত্রে, একটা দৃষ্টান্ত নিজের সামনে রাখো যে, আমাকে সহনশক্তির প্রয়োগ করতে হবে, তো যখন নিজের মধ্যে সহনশক্তি প্রয়োগ করবে তখন যে অন্য আত্মারা তোমার সহনশক্তিকে নড়ানোর নিমিত্ত হয় তারাও রক্ষা পাবে তো না, তারাও তো এর থেকে সরে যাবে। তারপর, তোমরা তোমাদের নিজেদের মধ্যে থাকছ, সেন্টার হলে তবে সেন্টারে, তোমাদের নিজেদের মধ্যে যে ছোট ছোট গ্রুপ রয়েছে প্রথমে নিজের উপরে ট্রায়াল করো তারপর নিজের ছোট সংগঠনে ট্রায়াল করো। সংগঠিতভাবে যে কোনও গুণ কিংবা শক্তির প্রয়োগের প্রোগ্রাম বানাও। তা'তে কী হবে? সংগঠনের শক্তি দ্বারা সেই গুণ বা শক্তির বায়ুমন্ডল প্রস্তুত হয়ে যাবে, ভাইব্রেশন ছড়াবে, আর বায়ুমন্ডল তথা ভাইব্রেশনের প্রভাব অনেক আত্মার উপরে পড়েই। অতএব, এমনই প্রয়োগশালী আত্মা হও। প্রথমে নিজের মধ্যে সন্তুষ্টতার অনুভব করো, তারপর অন্যদের মধ্যেও সহজ হয়ে যাবে, কারণ বিধি জানা হয়ে যাবে। যেমন, সায়েন্সের যে কোনও সাধনকে প্রথমে স্যাম্পল হিসেবে প্রয়োগ করে, তারপরে বৃহৎ রূপে প্রয়োগ করে, ঠিক সেভাবেই তোমরা প্রথমে নিজেকে স্যাম্পল হিসেবে ইউজ করো। যত এটা প্রয়োগ করার ইচ্ছা বাড়তে থাকবে, বুদ্ধি-মন এতে বিজি থাকবে, তো তুচ্ছ যে সব বিষয়ে সময় ব্যয় করো, শক্তি ব্যয় করো তা' বেঁচে যাবে। সহজেই অন্তর্মুখিতার স্থিতি নিজের দিকে আকৃষ্ট করবে, কারণ কোনও জিনিসের প্রয়োগ এবং প্রয়োগের সফলতা আপনা থেকেই অন্য সব দিক থেকে সরিয়ে দেয়। এই প্রয়োগ সবাই করতে পারো তো না, নাকি কঠিন? এই বছর প্রয়োগশালী আত্মা হও। বুঝেছ, কী করতে হবে? তাছাড়া, প্রত্যেকে নিজের প্রতি প্রয়োগে যদি ব্যাপৃত হয় তাহলে প্রয়োগশালী আত্মাদের সংগঠন কত পাওয়ারফুল হয়ে যাবে! সেই সংগঠনের কিরণ অর্থাৎ ভাইব্রেশনস্ অনেক কাজ করে দেখাবে। এতে শুধু দৃঢ়তা চাই - 'আমাকে করতেই হবে'। অন্যদের ঢিলেমি ভাবের প্রভাব পড়া উচিত নয়। তোমার দৃঢ়তার প্রভাব অন্যদের উপরে পড়বে, কারণ দৃঢ়তার শক্তি শ্রেষ্ঠ, নাকি ঢিলেমি-র শক্তি শ্রেষ্ঠ? বাপদাদার বরদান রয়েছে, যেখানে দৃঢ়তা সেখানে সফলতা আছেই। সুতরাং কী হবে তোমরা? প্রয়োগশালী, ত্রিকালদর্শী আসনধারী। আর তৃতীয়তঃ কী করবে? যেমন সময় তেমন বিধিতে সিদ্ধিস্বরূপ। সুতরাং বছরের এটা হোমওয়ার্ক। এই হোমওয়ার্ক আপনা থেকেই বাবার কাছে নিয়ে আসবে। ব্রহ্মাবাবাকে যেমনটা দেখেছ যে কোনও কর্ম করার আগে আদি-মধ্য-অন্তকে বুঝেসুঝে কর্ম করেছেন এবং করিয়েছেন। অমনোযোগী হননি যে, যা হয়েছে ঠিক আছে, চালাতে হবে, চালিয়ে নেব। না। সুতরাং ফলো ব্রহ্মাবাবা। ফলো করা তো সহজ, তাই না! কপি করতে হবে তো না, কপি করার বুদ্ধি আছে তো তোমাদের না!

 

আচ্ছা, এই গ্রুপের সবাই চান্স নেয়। এক্সট্রা লটারী প্রাপ্ত হয়েছে। হঠাৎ করেই যখন লটারী লাভ হয় তখন সেই খুশি বেশিই হয়। তাহলে, এটা লাকি গ্রুপ হলো তো না, চান্স নেওয়া লাকি গ্রুপ। অন্যেরা ভাবতে থাকে, আর তোমরা পৌঁছে গেছ। এখন ডবল বিদেশিদের টার্ন শুরু হবে। ভারতবাসী নিজেদের লটারী নিয়ে নিয়েছে। চতুর্দিকের ডবল বিদেশি বাচ্চারা রিট্রিটের যে প্রোগ্রাম বানিয়েছে সেটার জন্য তারা ভালো পরিশ্রম করেছে। বিশেষতঃ নিমিত্ত আত্মাদের কাছে নিয়ে আসার বিধি ভালো। তাছাড়াও, যত সাহস বজায় রেখে এগিয়ে যাচ্ছে, প্রতি বছর শ্রেষ্ঠ থেকে শ্রেষ্ঠ সফলতা ততই প্রাপ্তি হচ্ছে। এমন অনুভব হয় তো না! একটা সময় ছিল যখন নিমিত্ত বিশেষ আত্মাদের সাথে যোগাযোগ করাও কঠিন লাগত আর এখন কী মনে হয়? তোমরা যতটা ভেবেছিলে তার থেকে আরও বেশি আসে, তাই না! সুতরাং এটা সাহসেরই প্রত্যক্ষফল। ভারতেও যোগাযোগ বাড়ছে। আগে তোমরা নিমন্ত্রণ দেওয়ার পরিশ্রম করতে আর এখন তারা নিজেরা আসার অফার করে। ফারাক তো হয়েই গেল, তাই না! তারা বলে, আমরা আসব আর তোমরা বলো নম্বর নেই। এ' হলো 'সাহসী বাচ্চা, সহায় বাবা'-র প্রত্যক্ষ স্বরূপ! আচ্ছা!

 

চারদিকের মাস্টার ত্রিকালদর্শী আত্মাদের, যারা, সদা সময়ের মহত্ত্বকেজেনে এবং সময় অনুসারে রত্নভান্ডারকে কার্যে প্রয়োগ করে সেই দিব্য বুদ্ধিমান আত্মাদের, যারা সদা অন্তর্মুখিতার প্রয়োগশালায় প্রয়োগ করে সেই প্রয়োগশালী আত্মাদের, যারা সদা সাহস দ্বারা বাবার সহায়তা প্রত্যক্ষভাবে অনুভব করে সেই আত্মাদের বাপদাদার স্মরণ-স্নেহ আর নমস্কার।

 

দাদীদের সাথে সাক্ষাৎকার - তোমরা নিমিত্ত আত্মাদের কোন প্রয়োগশালায় থাকো? সারাদিন কোন ধরনের প্রয়োগশালা চলে? নতুন নতুন ইনভেনশন করছ, তাই না! নিরন্তর নতুন নতুন অনুভব করছ আর নতুন নতুন বিধিও টাচিং হতে থাকে, কেননা যারা নিমিত্ত তাদের নতুন নতুন বিশেষ বিষয় টাচিং হওয়ার বিশেষ বরদান রয়েছে। অল্প সময়ের মধ্যেই তোমাদের চিন্তন শুরু হয়, তাই না, টাচিং আসে, আসে তো না যে, এখন এটা হবে, এখন এটা হবে, এখন এটা হওয়া উচিত। তো নিমিত্ত আত্মাদের বিশেষ উৎসাহ-উদ্দীপনা বাড়ানোর কিংবা পরিবর্তন শক্তি বাড়ানোর প্ল্যানিং আবশ্যক। এটা করা ব্যতীত তোমরা থাকতে পারো না। এই বিষয়ে তোমাদের বুদ্ধি চলতে থাকে তো না। দেখে দেখে আশ্চর্যবৎ হও না, বরং উৎসাহ-উদ্দীপনার সাথে এগিয়ে নিয়ে যেতে তোমাদের প্ল্যানিং বুদ্ধি সম্প্রসারিত হয়। মায়া সংগঠনকে নড়ানোর নতুন নতুন প্ল্যান বানায়, তোমরা নতুন নতুন বিষয় শোনো, তাই না, আর তোমরা সবার মধ্যে উৎসাহ-উদ্দীপনা জাগাতে প্ল্যান বানিয়ে থাকো। কখনো আশ্চর্য মনে হয়? মনে হয় না তো না? মায়াও পুরানো বিধিতে থোড়াই আপন বানাবে! সেও তো নবীনত্ব আনবে, তাই না। আচ্ছা!

 

*বরদানঃ-*   শুদ্ধ মন আর দিব্য বুদ্ধির বিমান দ্বারা সেকেন্ডে সুইট হোমের যাত্রা করে মাস্টার সর্বশক্তিমান ভব

সায়েন্টিস্টরা ফাস্ট গতির যন্ত্র বের করতে সচেষ্ট হয়। তার জন্য কতো খরচ করে, কতো সময় আর এনার্জি ব্যয় করে, কিন্তু তোমাদের কাছে এত তীব্রগতির যন্ত্র আছে তা' দিয়ে তোমরা ভাবার সাথে সাথে বিনা খরচে পৌঁছে যাও, তোমাদের শুভ সঙ্কল্পের যন্ত্র প্রাপ্ত হয়েছে, দিব্য বুদ্ধি প্রাপ্ত হয়েছে। এই শুদ্ধ মন আর দিব্য বুদ্ধির বিমান দ্বারা তোমরা যখন চাও তখনই চলে যেতে পারো আর যখন চাও তখন ফিরে আসতে পারো। মাস্টার সর্বশক্তিমানকে কেউ আটকাতে পারে না।

*স্লোগানঃ-*   হৃদয় যদি প্রকৃত স্বচ্ছ হয় তাহলে হৃদয়নিধি (দিলারাম) বাবার আশীর্বাদ প্রাপ্ত হতে থাকবে।

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01-04-2026 Bengali Murli

 মিষ্টি বাচ্চারা - বাচ্চারা, বাবা যা, বাবা ঠিক যেমন, তোমরা বাচ্চারাও তাঁকে নম্বর ক্রমানুসারেই চিনেছো, যদি সকলেই তাঁকে চিনে গেলে তবে তো অত্যন...