28.03.2023 HINDI MURLI
“मीठे बच्चे - अभी यह पुरानी दुनिया बदल रही है इसलिए इससे प्रीत नहीं रखनी है, नये घर स्वर्ग को याद करना है''
प्रश्नः- सदा सुखी बनने की कौन सी विधि बाप सभी बच्चों को सुनाते हैं?
उत्तर:- सदा सुखी बनना है तो दिल से एक बाप का बन जाओ। बाप को ही याद करो। बाप कभी भी किसी बच्चे को दु:ख नहीं दे सकते। स्वर्ग में कभी किसका पति, किसका बच्चा मरता नहीं। वहाँ यह अकाले मौत का धन्धा नहीं होता है। यहाँ तो माया रावण दु:खी बनाती रहती है। बाबा है दु:ख हर्ता, सुख कर्ता।
गीत:- दु:खियों पर कुछ रहम करो माँ बाप हमारे..
ओम् शान्ति। यह वही मात-पिता फिर से सदा सुखी बनाने के लिए राजयोग सिखला रहे हैं। जैसे कोई बैरिस्टर बैठ बैरिस्टर बनने की नॉलेज देते हैं। अभी यह है बेहद के मात-पिता, स्वर्ग के रचयिता। वह बैठ बच्चों को स्वर्ग का मालिक बनाने लिए शिक्षा देते हैं। ऐसा तो कोई कालेज नहीं होगा जिसमें स्वयं भगवान बैठ पढ़ाये। यहाँ खुद भगवान बैठ पढ़ाते हैं भगवान-भगवती बनाने। सतयुग में श्री लक्ष्मी-नारायण को भगवान-भगवती कहा जाता है। नई दुनिया का मालिक किसने बनाया? वह सतयुग के मालिक थे। भारत में सतयुग आदि में देवी-देवताओं का राज्य था। अभी है कलियुग, देवताओं का राज्य ही नहीं। देवताओं से सब बदल कंगाल मनुष्य बन गये हैं। देवतायें तो बहुत धनवान सुखी थे। अभी कलियुग का अन्त होने के कारण सब मनुष्य बड़े दु:खी हैं। लड़ाई लगेगी, मनुष्य बड़ी त्राहि-त्राहि करेंगे। बहुत दर-बदर होंगे। मनुष्य बिल्कुल निधन के हैं क्योंकि स्वर्ग के सुख देने वाले माँ-बाप को जानते ही नहीं। तुम उस मात-पिता के बने हो। तुमको मात-पिता से अथाह सुख मिलते हैं। मनुष्य जो भक्ति करते हैं वह कोई भगवान को याद नहीं करते, भगवान को तो पत्थर-ठिक्कर, कुत्ते-बिल्ली में ठोक फिर अपने को भगवान समझ बैठे हैं। कह देते हैं सबमें भगवान विराजमान है। पतितों में भगवान को विराजमान समझना तो ग्लानी हुई ना। परन्तु यह भी ड्रामा में मनुष्यों को भूल करनी ही है और बाप को आकर अभुल बनाना है। मनुष्यों को पता ही नहीं पड़ता। भगवान तो एक होता है, हजारों थोड़ेही होंगे। लौकिक बाप तो बहुत हैं। वह तो जानवरों के भी होते हैं। परन्तु सबका सद्गति दाता, पतित-पावन एक है। तो वह बाप आकर बच्चों को पढ़ाते हैं भविष्य के लिए। भगवान-भगवती बनाते हैं। अब सिवाए परमपिता परमात्मा के भगवान-भगवती कौन बना सकते! जबकि वह बाप है तो माता बिगर सृष्टि कैसे रचेंगे! भारतवासी गाते हैं, तुम भी भक्ति मार्ग में चिल्लाते थे - तुम मात-पिता... तुम्हरी कृपा से सुख घनेरे मिलते हैं इसलिए हम भक्ति करते हैं। किसकी भी भक्ति करते हैं तो समझते हैं हम भगवान को याद करते हैं। संन्यासी भी साधना करते हैं परन्तु किसकी साधना करते वह नहीं जानते। रावण मत पर सब भूल गये हैं। तो फिर बाप क्या करे। इतना दु:खी कंगाल होना, यह भी ड्रामा में है।
बाप आकर बच्चों को फिर से स्वर्ग का मालिक बनाते हैं। स्वर्ग का मालिक बनाने वाला है पारलौकिक मात-पिता, नर्क का मालिक बनाने वाला है रावण। तो उस रावण पर अब जीत पानी है। अभी तुम मायाजीत जगतजीत बनते हो। तुमको कोई पुरानी दुनिया में थोड़ेही राज्य करना है। माया पर जीत पाकर फिर स्वर्ग में राज्य करना है। माया से हारने से नर्क में आ जाते हो। यह बातें और कोई पतित मनुष्य समझा नहीं सकते। न वह किसको पावन बना सकते हैं। सारी दुनिया पतित है। विष से पैदा होते हैं। देवी-देवता तो सर्वगुण सम्पन्न, 16 कला सम्पूर्ण हैं। वहाँ विष का नाम ही नहीं। भगवान को कोई भी जानते नहीं। तो उनको गुरू करने से क्या फायदा? न खुद भगवान से मिल सकते, न औरों को मिला सकते। आत्मा परमात्मा अलग रहे बहुकाल.. तो फिर मिलाने वाला भी वह परमपिता परमात्मा चाहिए। वह यह भी नहीं समझते कि नाटक अब पूरा होता है। यह ड्रामा, जो सतयुग से लेकर कलियुग तक चलता है, उनको रिपीट होना है। इस ड्रामा की नॉलेज को समझने से तुम चक्रवर्ती बनते हो। तुम जानते हो 84 जन्म हम कैसे लेते हैं। यह है लीप युग, पुरुषोत्तम युग। इसमें यह अन्तिम जन्म है। अब बाप का बनना है। बाप कहते हैं - हे बच्चे, तुम मेरा बनो। कहते भी हो हे परमपिता परमात्मा। लौकिक बाप को तो ऐसे नहीं कह सकते। तो अब पारलौकिक बाप कहते हैं मैं आया हुआ हूँ। बाकी यह काके चाचे आदि सब तुम्हारे खत्म होने हैं। यह पुरानी दुनिया बदल रही है। सामने महाभारी महाभारत लड़ाई भी खड़ी है। यह अनेक धर्म विनाश होने हैं। यह है पुरानी दुनिया, जिसमें अनेकानेक धर्म है। सतयुग में होता है एक धर्म। तो अब यह दुनिया बदलनी है इसलिए इनसे प्रीत नहीं लगानी है। लौकिक बाप नया मकान बनाते हैं तो बच्चों को दिल में नया मकान ही याद पड़ेगा ना कि मकान तैयार होगा, फिर हम नये मकान में बैठेंगे। पुराना तोड़ खलास कर देंगे। अब इस सारी दुनिया का विनाश होना है। बच्चों ने साक्षात्कार भी किया है - कैसे आग लगती है, मूसलधार बरसात पड़ती है, समुद्र आदि कैसे उछलते हैं। यह सब साक्षात्कार किये हैं।
बाबा बम्बई में जाते हैं तो समझाते हैं यह बम्बई पहले थी नहीं। एक छोटा सा गांव था, अब समुद्र को सुखाया है। हिस्ट्री रिपीट होगी तो फिर यह इतनी बाम्बे नहीं रहेगी। सतयुग में कोई बाम्बे गांव होता नहीं। यह अमेरिका आदि क्या है! एक ही बाम से सब खत्म हो जायेंगे। हिरोशिमा में जब बाम लगाया, क्या हो गया? शहर का शहर खलास हो गया। वह तो एक बाम था। अभी तो ढेर बाम बनाये हैं। कहते भी हैं बाप आये हैं नई दुनिया स्थापन करने, इनको पुराना नर्क रावण बनाते हैं। यह भारतवासी नहीं जानते। माया ने सबको गॉडरेज का ताला ऐसा लगा दिया है जो खुलता नहीं। मनुष्य कितने दु:खी हैं। भले साहूकार सुखी हैं परन्तु बीमार रोगी तो बनते हैं ना। आज बच्चा जन्मा, खुशी हुई, फिर बच्चा मरा तो दु:ख हुआ। विधवा बन रोते रहते हैं। इसको कहा जाता है दु:खधाम। भारत सुखधाम था, अब पुरानी दुनिया दु:खधाम है। फिर बाप सुखधाम बनाते हैं। बाप कहते हैं अब वर्सा लो। तो जरूर याद भी उनको करना पड़ेगा और सभी देह के सम्बन्ध दु:ख देने वाले हैं। अभी तुम समझते हो एक बाप बिगर सुख देने वाला कोई है नहीं। कहते हैं - बाबा, हम आपके वही बच्चे हैं, जिनको आपने स्वर्ग का मालिक बनाया था। अभी हम दु:खी हैं। आप तो रहमदिल हो। दु:खी हैं तब तो पुकारते हैं। सतयुग में सुखी हो जायेंगे तो वहाँ कोई भी नहीं पुकारेंगे। दु:ख में सब याद करते हैं परन्तु भगवान किसको मिलता ही नहीं। समझो भक्त हनूमान को याद करते हैं। अच्छा, हनूमान कहाँ रहता है? हनूमान के पास तुमको कहाँ जाना है। मनुष्य भक्ति करते हैं मुक्ति वा जीवनमुक्ति धाम में जाने के लिए। हनूमान वा गणेश आदि को याद करने से तुम कहाँ जायेंगे? उन्हों का ठिकाना कहाँ है? उनसे तुमको क्या मिलना है? कुछ पता नहीं।
बाप समझाते हैं सृष्टि में सुख देने वाला एक ही मैं हूँ। ऐसे नहीं भगवान ही सुख देते, भगवान ही दु:ख देते, वही बच्चे देते हैं तो सुख होता है, बच्चे छीन लेते हैं तो दु:ख होता है। तो बाप कहते हैं हम तो सदैव सुख देते हैं। तुमसे सुख माया छीनती है। सतयुग में ऐसा होता नहीं जो बच्चा मर जाए वा किसका पति मर जाए। यहाँ इस मायावी दुनिया में कभी किसका बच्चा, कभी किसका पति मरते ही रहते हैं। यह धन्धा स्वर्ग में नहीं होता है। यहाँ तो नर्क है। अब बाप कहते हैं अगर सदा सुखी बनना चाहते हो तो बाप के बनो। अभी तुम्हारी आत्मा और शरीर दोनों ही तमोप्रधान हैं, ऐसे नहीं कि आत्मा निर्लेप है। आत्मा में ही खाद पड़ती है। इस कारण अब जेवर भी आइरन एजेड बन पड़े हैं। अब फिर तुम गोल्डन एजेड बनने लिए नॉलेज ले रहे हो। बाप आकर अमर बनाए अमरपुरी में ले जाते हैं। यहाँ तो मृत्युलोक है। गीता में भी अक्षर है। अमरपुरी में आदि-मध्य-अन्त दु:ख नहीं होगा। मृत्युलोक में आदि-मध्य-अन्त दु:ख है। ऐसे दु:खधाम को भूलना पड़े। सुखधाम और शान्तिधाम को याद करना है। हम सुखधाम जा रहे हैं वाया शान्तिधाम। जहाँ के हम रहवासी हैं। यह भी स्वदर्शन चक्र हुआ ना। अपने बाप और स्वीट होम को याद करना है। कन्या बाप का घर छोड़ ससुरघर जाती है तो गाते हैं ना पियरघर से चले ससुरघर.. तो तुम्हारा यह है ब्रह्मा का पियरघर। अब तुम स्वर्ग ससुरघर जायेंगे। वहाँ सुख ही सुख है। यहाँ है दु:ख। कन्या भी घर छोड़ती है सुख के लिए। परन्तु वहाँ उनको पतित बनाए दु:खी बनाया जाता है। अभी बाप समझाते हैं मैं तुमको एकदम नयनों पर बिठाकर स्वर्ग ले जाने लिए आया हुआ हूँ। सिर्फ मुझे याद करो। वहाँ तुमको कोई दु:ख नहीं होगा। बच्चों ने देखा है श्रीकृष्ण का जन्म कैसे होता है। पहले से ही साक्षात्कार होता है। जब शरीर छोड़ना होता है तो उसी समय साक्षात्कार होता है। हम यह शरीर छोड़ जाकर प्रिन्स बनेंगे। बस आत्मा शरीर से निकल जाकर गर्भ महल में बैठ जाती है। बच्चा पैदा होते समय कोई तकलीफ नहीं होती। वहाँ गर्भ महल में तुमको सुख ही सुख रहेगा। यहाँ तो गर्भ जेल भी है और जो चोरी पाप करते वे भी गवर्मेन्ट की जेल में जाते हैं। वहाँ यह दोनों जेल नहीं होती। पाप आदि कोई करते नहीं। उसको कहा जाता है पुण्य आत्माओं की दुनिया। तो बाप स्वर्ग मे ले जाते हैं। देखते हैं इतने सभी पुरुषार्थ कर रहे हैं तो क्यों न हम भी बाप से वर्सा ले सदा सुखी बनें। कोई तो प्रायश्चित करते हैं कि यह कर्मबन्धन कैसे छूटेगा? बच्चे नहीं होते तो अच्छा था। कोई शादी कर फिर ज्ञान में आते हैं तो कहते पहले पता पड़ता तो शादी नहीं करते। ऐसे बहुत लिखते हैं। जिनकी तकदीर जब खुलनी है, तब आते हैं। सो भी पसन्दी पर है। एक सप्ताह बाप के बच्चे बनकर देखो। पसन्द आये तो बनना, नहीं तो जाकर लौकिक माँ बाप का बनना। फीस तो कुछ नहीं है। शिवबाबा का भण्डारा है। न कोई किताब आदि खरीद कराते हैं। सिर्फ मुरली भेजी जाती है। बाप का खजाना है, वह फीस क्या लेंगे! हॉ, अच्छा लगे तो गरीबों के लिए लिटरेचर छपा लेना।
भारत जैसा और कोई दानी देश नहीं। बाप भी आकर भारत में दान करते हैं। तुम बच्चे भी तन-मन-धन बाप के हवाले करते हो। महादानी बनते हो। यह बाबा महादानी बना ना। आगे तो इनडायरेक्ट दान करते थे। अब खुद डायरेक्ट आया है, रिटर्न में स्वर्ग की बादशाही देते हैं। सस्ता सौदा है ना। फिर कहते हैं अब आप समान बनाओ, विकारों को जीतो, देही-अभिमानी बनो, अपने को आत्मा समझो। गाते भी हैं नंगे आये थे, नंगे जाना है। पहले नम्बर में देवी-देवताओं की आत्मायें आई। उनके पीछे दूसरे नम्बर वाले हैं। हेड हैं देवी-देवता धर्म की आत्मायें। जो पहले आते हैं तो जाना भी पहले उनको ही है। आलराउन्ड उन्हों का पार्ट है। यह सभी बातें समझने की हैं, जिनके भाग्य में है वह तो झट समझ लेते हैं ना। भाग्य में नहीं है तो दिल नहीं लगती। बाप कहते हैं अब मुझे याद करो, मैं ही तुम्हारा बाप, गॉड फादर हूँ। कच्छ-मच्छ कोई गॉड थोड़ेही हैं। यह बातें बाप बिगर कोई समझा नहीं सकता। अच्छा!
मीठे-मीठे सिकीलधे सर्विसएबुल बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का यादप्यार और गुडमार्निग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।
धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) तन-मन-धन सब बाप हवाले कर महादानी बनना है। आप समान बनाने की सेवा भी करनी है और देही-अभिमानी होकर रहना है।
2) इस पुरानी दुनिया दु:खधाम को भूल शान्तिधाम और सुखधाम को याद करना है। कर्मबन्धन में कभी भी फंसना नहीं है।
वरदान:- आने और जाने के अभ्यास द्वारा बन्धनमुक्त बनने वाले न्यारे, निर्लिप्त भव
सारे पढ़ाई अथवा ज्ञान का सार है - आना और जाना। बुद्धि में घर जाने और राज्य में आने की खुशी है। लेकिन खुशी से वही जायेगा जिसका सदा आने और जाने का अभ्यास होगा। जब चाहो तब अशरीरी स्थिति में स्थित हो जाओ और जब चाहो तब कर्मातीत बन जाओ - यह अभ्यास बहुत पक्का चाहिए। इसके लिए कोई भी बंधन अपनी तरफ आकर्षित न करे। बंधन ही आत्मा को टाइट कर देता है और टाइट वस्त्र को उतारने में खिंचावट होती है इसलिए सदा सदा न्यारे, निर्लिप्त रहने का पाठ पक्का करो।
स्लोगन:- सुख के खाते से सम्पन्न रहो तो आपके हर कदम से सबको सुख की अनुभूति होती रहेगी।
26.03.2023 HINDI MURLI
त्रिकालदर्शी स्थिति के श्रेष्ठ आसन द्वारा सदा विजयी बनो और दूसरों को शक्ति का सहयोग दो
आज त्रिकालदर्शी बापदादा अपने सर्व मास्टर त्रिकालदर्शी बच्चों को देख रहे हैं। त्रिकालदर्शी बनने का साधन बापदादा ने हर बच्चे को दिव्य बुद्धि का वरदान वा ब्राह्मण जन्म की विशेष सौगात दी है क्योंकि दिव्य बुद्धि द्वारा ही बाप को, अपने आपको और तीनों कालों को स्पष्ट जान सकते हो। दिव्य बुद्धि तथा याद द्वारा ही सर्व शक्तियों को धारण कर सकते हो। इसलिये पहला वरदान दिव्य बुद्धि है। ये वरदान बापदादा ने सर्व बच्चों को दिया है। लेकिन इस वरदान को प्रत्यक्ष जीवन में नम्बरवार कार्य में लगाते हो। दिव्य बुद्धि त्रिकालदर्शी स्थिति का अनुभव कराती है। चारों ही सब्जेक्ट धारण करने का आधार दिव्य बुद्धि है। चारों ही सब्जेक्ट को सभी बच्चे अच्छी तरह से जानते हैं, वर्णन भी करते हैं लेकिन जानना, वर्णन करना यह सभी को आता है। चाहे नये हैं, चाहे पुराने हैं, इसमें सभी होशियार हैं लेकिन धारण करना इसमें नम्बर बन जाते हैं। दिव्य बुद्धि की विशेषतायें, दिव्य बुद्धि वाली आत्मायें कोई भी संकल्प को कर्म वा वाणी में लाने समय हर बोल और हर कर्म को तीनों काल से जान कर फिर प्रैक्टिकल में आती हैं। साधारण बुद्धि वाली आत्मायें बहुत करके वर्तमान को स्पष्ट जानती हैं लेकिन भविष्य और भूतकाल को स्पष्ट नहीं जानती। दिव्य बुद्धि वाली आत्मा को पास्ट और फ्युचर भी इतना ही स्पष्ट होता है जैसे प्रेजेन्ट स्पष्ट है। तीनों ही काल साथ-साथ स्पष्ट अनुभव होता है। वैसे सभी कहते भी हैं कि जो सोचो, जो करो, जो बोलो, आगे-पीछे को सोच-समझ करके करो। कर्म के पहले परिणाम को सामने रखो, परिणाम हुआ भविष्य। तो नम्बरवन है त्रिकालदर्शी बुद्धि। त्रिकालदर्शी बुद्धि कभी असफलता का अनुभव नहीं करेगी। लेकिन बच्चों में तीन प्रकार की बुद्धि वाले हैं। पहला नम्बर सुनाया सदा त्रिकालदर्शी बुद्धि। दूसरा नम्बर कभी त्रिकालदर्शी और कभी एक कालदर्शी। तीसरा नम्बर अलबेली बुद्धि, जो सदा वर्तमान को देखते, सदा यही सोचते कि जो अभी हो रहा है या मिल रहा है वा चल रहा है इसमें ठीक रहें, भविष्य क्या होगा इसको क्या सोचें। लेकिन अलबेली बुद्धि आदि-मध्य-अन्त को न सोचने के कारण सदा सफलता प्राप्त करने में धोखा खा लेती है। तो बनना है त्रिकालदर्शी बुद्धि।
त्रिकालदर्शी स्थिति ऐसा श्रेष्ठ आसन है जिस आसन अर्थात् स्थिति द्वारा स्वयं भी सदा विजयी और दूसरों को भी विजयी बनने की शक्ति वा सहयोग देने वाले हैं। दिव्य बुद्धि विशाल बुद्धि है। दिव्य बुद्धि बेहद की बुद्धि है। तो चेक करो कि स्वयं की बुद्धि किस नम्बर की बनाई है? बापदादा ने बच्चों की रिजल्ट में देखा कि ज्ञान, गुण, शक्तियों का ख़ज़ाना जमा सभी बच्चों के पास है लेकिन जमा होते भी नम्बरवार क्यों हैं? ऐसा कोई भी नहीं दिखाई दिया जिसके पास ख़ज़ाने जमा नहीं हों। सभी के पास जमा हैं ना! फिर नम्बरवार क्यों? अगर किसी से भी पूछेंगे - स्वयं का ज्ञान है, बाप का ज्ञान है, चक्र का ज्ञान है, कर्मों के गति का ज्ञान है? सभी के पास सर्वशक्तियाँ हैं? कि कोई हैं, कोई नहीं हैं? ज्ञान में सभी ने हाँ किया और शक्तियों में हाँ क्यों नहीं किया? अच्छा, सभी गुण हैं? सर्व गुण बुद्धि में हैं? बुद्धि में ज्ञान भी है, शक्तियाँ भी हैं फिर नम्बरवार क्यों? फ़र्क क्या होता है? ख़ज़ाने को विधिपूर्वक कार्य में लगाना नहीं आता है समय बीत जाता है फिर सोचते हैं कि ऐसे करते थे, इस विधि से चलते थे तो सिद्धि मिल जाती थी। तो समय को जानना और समय प्रमाण शक्ति वा गुण वा ज्ञान को कार्य में लगाना इसके लिये दिव्य बुद्धि की विशेषता आवश्यक है। वैसे ज्ञान की प्वाइंट्स बहुत सोचते रहते हैं, सुनाते भी रहते हैं, कॉपियों में भी भरी हुई रहती हैं, सबके पास कितनी डायरियां इकट्ठी हुई होंगी, काफी स्टॉक हो गया है ना, तो जैसे बाप के लिये गाया हुआ है कि मैं जो हूँ, जैसा हूँ वैसे मुझे जानने वाले कोटों में कोई हैं। जानते तो सभी हैं लेकिन अण्डरलाइन है - जो हूँ, जैसा हूँ, उसमें अन्तर पड़ जाता है। इसी रीति जैसा समय और जो ज्ञान की प्वाइंट या गुण या शक्ति आवश्यक है वैसा कार्य में लगाना इसमें अन्तर पड़ जाता है और इसी अन्तर के कारण नम्बर बन जाते हैं। तो कारण समझा? एक तो समय प्रमाण विधि का अन्तर पड़ जाता है, दूसरा कोई भी कर्म वा संकल्प त्रिकालदर्शी बन नहीं करते, इसलिये नम्बर बन जाते हैं। कोई भी संकल्प बुद्धि में आता है तो संकल्प है बीज, वाचा और कर्मणा बीज का विस्तार है, अगर संकल्प अर्थात् बीज को त्रिकालदर्शी स्थिति में स्थित होकर चेक करो, शक्तिशाली बनाओ तो वाणी और कर्म में स्वत: ही सहज सफलता है ही है। संकल्प को चेक नहीं करते अर्थात् बीज शक्तिशाली नहीं होता तो वाणी और कर्म में भी सिद्धि की शक्ति नहीं रहती। लक्ष्य सभी का सिद्धि स्वरूप बनने का है ना, तो सदा सिद्धि स्वरूप बनने की विधि जो सुनाई, उसको चेक करो। बीच-बीच में बुद्धि अलबेली बन जाती है इसलिये कभी सिद्धि अनुभव करते और कभी मेहनत अनुभव करते।
बापदादा का सभी बच्चों से प्यार की निशानी है कि सब बच्चे सदा सहज सिद्धि स्वरूप बन जायें। आपके जड़ चित्रों द्वारा भक्त आत्मायें सिद्धि प्राप्त करती रहती हैं, तो चैतन्य में सिद्धि स्वरूप बने हो तब तो जड़ चित्रों द्वारा भी और आत्मायें सिद्धि प्राप्त करती रहती हैं। जो त्रिकालदर्शी स्थिति में स्थित रहते हैं तो त्रिकालदर्शी स्थिति समर्थ स्थिति है। इस समर्थ स्थिति वाले व्यर्थ को ऐसा सहज समाप्त कर देते हैं जो स्वप्न मात्र भी व्यर्थ समाप्त हो जाता है। अगर त्रिकालदर्शी बुद्धि द्वारा कर्म नहीं करते हैं तो व्यर्थ का बोझ बार-बार ऊंचे नम्बर में अधिकारी बनने नहीं देता। तो दिव्य बुद्धि का वरदान सदा हर समय कार्य में लगाओ।
बापदादा ने पहले भी इशारा दिया है कि ज्ञानी-योगी आत्मायें बने हो, अब ज्ञान और योग के शक्ति को प्रयोग में लाने वाले प्रयोगशाली आत्मायें बनो। जैसे साइन्स की शक्ति का प्रयोग दिखाई देता है ना, लेकिन साइन्स की शक्ति के प्रयोग का भी मूल आधार क्या है? आज जो भी साइन्स ने प्रयोग कर साधन दिये हैं, उन सब साधनों का आधार क्या है? साइन्स के प्रयोग का आधार क्या है? मैजारिटी देखेंगे लाइट है। लाइट द्वारा ही प्रयोग होता है। अगर कम्प्युटर भी चलता है तो किसके आधार से? कम्प्युटर माइट है लेकिन आधार लाइट है ना। तो आपके साइलेन्स की शक्ति का भी आधार क्या है? लाइट है ना। जब वह प्रकृति की लाइट द्वारा एक लाइट अनेक प्रकार के प्रयोग प्रैक्टिकल में करके दिखाती है तो आपकी अविनाशी परमात्म लाइट, आत्मिक लाइट और साथ-साथ प्रैक्टिकल स्थिति लाइट, तो उससे क्या नहीं प्रयोग हो सकता! आपके पास स्थिति भी लाइट है और मूल स्वरूप भी लाइट है। जब भी कोई प्रयोग करना चाहते हो तो पहले अपने मूल आधार को चेक करो। जैसे कोई भी साइन्स के साधन को यूज़ करेंगे तो पहले चेक करेंगे ना कि लाइट है या नहीं है। ऐसे जब योग का, शक्तियों का, गुणों का प्रयोग करते हो तो पहले ये चेक करो कि मूल आधार आत्मिक शक्ति, परमात्म शक्ति वा लाइट (हल्की) स्थिति है? अगर स्थिति और स्वरूप डबल लाइट है तो प्रयोग की सफलता बहुत सहज कर सकते हो, और सबसे पहले इस अभ्यास को शक्तिशाली बनाने के लिये पहले अपने पर प्रयोग करके देखो। हर मास वा हर 15 दिन के लिये कोई न कोई विशेष गुण वा कोई न कोई विशेष शक्ति का स्व प्रति प्रयोग करके देखो क्योंकि संगठन में वा सम्बन्ध-सम्पर्क में पेपर तो आते ही हैं तो पहले अपने ऊपर प्रयोग में चेक करो कोई भी पेपर आया लेकिन जो शक्ति वा जो गुण का प्रयोग करने का लक्ष्य रखा, उसमें कहाँ तक सफलता मिली? और कितने समय में सफलता मिली? जैसे साइन्स का प्रयोग दिन-प्रतिदिन थोड़े समय में प्रत्यक्ष रूप का अनुभव कराने में आगे बढ़ रहा है तो समय भी कम करते जाते हैं। थोड़े समय में सफलता ज्यादा - यह साइन्स वालों का भी लक्ष्य है। ऐसे जो भी लक्ष्य रखा उसमें समय को भी चेक करो और सफलता को भी चेक करो। जब स्व के प्रति प्रयोग में सफल हो जायेंगे तो दूसरी आत्माओं के प्रति प्रयोग करना सहज हो जायेगा और जब स्व के प्रति सफलता अनुभव करेंगे तो आपके दिल में औरों के प्रति प्रयोग करने का उमंग-उत्साह स्वत: ही बढ़ता जायेगा। अन्य आत्माओं के सम्बन्ध-सम्पर्क में स्व के प्रयोग द्वारा उन आत्माओं को भी आपके प्रयोग का प्रभाव स्वत: ही पड़ता रहेगा। जैसे एक दृष्टान्त सामने रखो कि मुझे सहनशक्ति का प्रयोग करना है तो जब स्वयं में सहनशक्ति का प्रयोग करेंगे तो जो दूसरी आत्मायें आपकी सहनशक्ति को हिलाने के निमित्त हैं वो भी बच जायेंगी ना, उनका भी तो किनारा हो जायेगा। और जैसे छोटे-छोटे संगठन में रहते हो, सेन्टर्स हैं तो सेन्टर्स पर छोटे संगठन हैं ना तो पहले स्व के प्रति ट्रायल करो फिर अपने छोटे संगठन में ट्रायल करो। संगठन रूप में कोई भी गुण वा शक्ति के प्रयोग का प्रोग्राम बनाओ। उससे क्या होगा? संगठन की शक्ति से उसी गुण वा शक्ति का वायुमण्डल बन जायेगा, वायब्रेशन फैलेगा और वायुमण्डल वा वायब्रेशन का प्रभाव अनेक आत्माओं के ऊपर पड़ता ही है। तो ऐसे प्रयोगशाली आत्मायें बनो। पहले स्वयं में सन्तुष्टता का अनुभव करो फिर औरों में सहज हो जायेगा क्योंकि विधि आ जायेगी। जैसे साइन्स के कोई भी साधन को पहले सैम्पल के रूप में प्रयोग करते हैं फिर विशाल रूप में प्रयोग करते हैं, ऐसे आप पहले स्वयं को सैम्पल के रीति से यूज़ करो। जितना यह प्रयोग करने की रूचि बढ़ती जायेगी, बुद्धि-मन इसमें बिजी रहेगा, तो छोटी-छोटी बातों में जो समय लगाते हो, शक्तियाँ लगाते हो उनकी बचत हो जायेगी। सहज ही अन्तर्मुखता की स्थिति अपनी तरफ आकर्षित करेगी क्योंकि कोई भी चीज़ का प्रयोग और प्रयोग की सफलता स्वत: ही और सब तरफ से किनारा करा देती है। ये प्रयोग तो सभी कर सकते हो ना, कि मुश्किल है? इस वर्ष प्रयोगशाली आत्मायें बनो। समझा क्या करना है? और हर एक स्वयं के प्रति प्रयोग में लग जायेंगे तो प्रयोगशाली आत्माओं का संगठन कितना पॉवरफुल बन जायेगा! वह संगठन की किरणें अर्थात् वायब्रेशन्स बहुत कार्य करके दिखायेंगी। इसमें सिर्फ दृढ़ता चाहिये - ‘मुझे करना ही है'। दूसरों के अलबेलेपन का प्रभाव नहीं पड़ना चाहिये। आपकी दृढ़ता का प्रभाव औरों पर पड़ना चाहिये क्योंकि दृढ़ता की शक्ति श्रेष्ठ है या अलबेलेपन की शक्ति श्रेष्ठ है? बापदादा का वरदान है जहाँ दृढ़ता है वहाँ सफलता है ही। तो क्या बनेंगे? प्रयोगशाली, त्रिकालदर्शी आसनधारी। और तीसरा क्या करेंगे? जैसा समय, वैसी विधि से सिद्धि स्वरूप। तो वर्ष का ये होमवर्क है। ये होमवर्क स्वत: ही बाप के समीप लायेगा। जैसे ब्रह्मा बाप को देखा - कोई भी कर्म करने के पहले आदि-मध्य-अन्त को सोच-समझ कर्म किया और कराया। अलबेलापन नहीं कि जैसा हुआ ठीक है, चलो, चलाना ही है। नहीं। तो फॉलो ब्रह्मा बाप। फॉलो करना तो सहज है ना! कॉपी करना है ना, कॉपी करने का तो अक्ल है ना!
अच्छा, ये ग्रुप चांस लेने वाला ग्रुप है। एक्स्ट्रा लॉटरी मिली है। जो अचानक लॉटरी मिलती है तो उसकी खुशी ज्यादा ही होती है। तो ये लक्की ग्रुप हुआ ना, चांस लेने वाला लक्की ग्रुप। दूसरे सोचते रहते कब जायेंगे और आप पहुँच गये। अब डबल विदेशियों का टर्न शुरू होने वाला है। भारतवासियों ने अपनी लॉटरी ले ली। चारों ओर के डबल विदेशी बच्चों ने जो रिट्रीट का प्रोग्राम बनाया है उसमें मेहनत अच्छी की। विशेष निमित्त आत्माओं को समीप लाने की विधि अच्छी है। और जितना हिम्मत रख आगे बढ़ते रहे हैं उतनी सफलता हर वर्ष श्रेष्ठ से श्रेष्ठ मिलती रही है। ऐसे अनुभव होता है ना! कोई समय था जो निमित्त विशेष आत्माओं से सम्पर्क करना भी मुश्किल लगता था और अभी क्या लगता है? जितना सोचते हो उससे और ही ज्यादा आते हैं ना! तो ये हिम्मत का प्रत्यक्षफल है। भारत में भी सम्पर्क बढ़ता जाता है। पहले आप निमंत्रण देने की मेहनत करते थे और अभी स्वयं आने की ऑफर करते हैं। फ़र्क पड़ गया है ना! वो कहते हैं हम चलें और आप कहते हो नम्बर नहीं है। ये है ‘हिम्मते बच्चे मददे बाप' का प्रत्यक्ष स्वरूप। अच्छा!
चारों ओर के मास्टर त्रिकालदर्शी आत्माओं को, सदा समय के महत्व को जानने और समय प्रमाण ख़ज़ाने को कार्य में लगाने वाले दिव्य बुद्धिवान आत्माओं को, सदा अन्तर्मुखता की प्रयोगशाला में प्रयोग करने वाले प्रयोगशाली आत्माओं को, सदा हिम्मत द्वारा बाप के मदद का प्रत्यक्ष अनुभव करने वाली आत्माओं को बापदादा का याद-प्यार और नमस्ते।
दादियों से मुलाकात - आप निमित्त आत्मायें किस प्रयोगशाला में रहते हो? सारा दिन कौन-सी प्रयोगशाला चलती है? नई-नई इन्वेन्शन करते रहते हो ना! नये-नये अनुभव करते जाते हो और नई-नई विधि भी टचिंग होती रहती है क्योंकि जो निमित्त हैं उनको विशेष नई-नई बातें टच होने का विशेष वरदान है। थोड़ा समय भी बीतेगा तो विचार चलते हैं ना, टचिंग आती है ना कि अभी ये हो, अभी ये हो, अभी ये होना चाहिये। तो निमित्त आत्माओं को विशेष उमंग-उत्साह बढ़ाने के वा परिवर्तन शक्ति को बढ़ाने के प्लैन की ज़रूरत है। इसके बिना रह नहीं सकते हैं। बुद्धि चलती है ना। देख-देख आश्चर्यवत् नहीं होते लेकिन उमंग-उत्साह में आगे बढ़ाने के लिए प्लैनिंग बुद्धि बनते हैं। माया संगठन को हिलाने के नये-नये प्लैन बनाती है, नई-नई बातें सुनती हो ना और आप लोग सभी को हिम्मत-उमंग में लाने के प्लैन बनाते हो। कभी आश्चर्य लगता है? नहीं लगता है ना। माया भी पुरानी विधि से थोड़ेही अपना बनायेगी। वो भी तो नवीनता लायेगी ना। अच्छा!
वरदान:- शुद्ध मन और दिव्य बुद्धि के विमान द्वारा सेकण्ड में स्वीट होम की यात्रा करने वाले मा0 सर्वशक्तिवान भव
साइन्स वाले फास्ट गति के यत्र निकालने का प्रयत्न करते हैं, उसके लिए कितना खर्चा करते हैं, कितना समय और एनर्जी लगाते हैं, लेकिन आपके पास इतनी तीव्रगति का यत्र है जो बिना खर्च के सोचा और पहुंचा, आपको शुभ संकल्प का यत्र मिला है, दिव्य बुद्धि मिली है। इस शुद्ध मन और दिव्य बुद्धि के विमान द्वारा जब चाहे तब चले जाओ और जब चाहे तब लौट आओ। मास्टर सर्वशक्तिवान को कोई रोक नहीं सकता।
स्लोगन:- दिल सदा सच्ची हो तो दिलाराम बाप की आशीर्वाद मिलती रहेगी।
24-03-2023 प्रात:मुरली ओम् शान्ति" बापदादा"' मधुबन
“मीठे बच्चे - तुम रूहानी सोशल वर्कर हो, तुम्हें इस दुनिया को सुख-शान्ति और पवित्रता से सम्पन्न बनाने के लिए अपना तन-मन-धन सफल करना है''
प्रश्नः- माया पर जीत पाने के लिए तुम बच्चों के पास कौन सा हथियार है? उस हथियार को यूज़ करने की विधि क्या है?
उत्तर:- माया पर जीत पाने के लिए तुम्हारे पास “स्वदर्शन चक्र'' है। यह कोई स्थूल हथियार नहीं है, लेकिन मन से मनमनाभव हो जाओ। हम सो, सो हम के मंत्र को याद करो, तो इस विधि से माया का गला कट जायेगा। तुम मायाजीत बन चक्रवर्ती राजा बन जायेंगे।
गीत:- इस पाप की दुनिया से कहीं और ले चल...
ओम् शान्ति। तुम ब्रह्मा मुख वंशावली ब्राह्मण ही जानते हो कि यह कलियुगी पाप की दुनिया है और सतयुग जरूर पुण्य की दुनिया है। बच्चों को समझाया गया है जो मनुष्य पुण्य आत्मायें होते हैं उनको अच्छा जन्म मिलता है। पाप आत्मा को बुरा जन्म मिलता है। अब यह तो है ही पाप आत्माओं की दुनिया। यह ज्ञान तुम बच्चों की बुद्धि में है। शान्तिधाम को ही परमधाम कहा जाता है। यह है दु:खधाम। भारत सतयुग में सुखधाम था। अब हमको शान्तिधाम जाना है, फिर सुखधाम में आना है। सुखधाम में पवित्रता, सुख, शान्ति तीनों ही हैं। इस दु:खधाम में है अपवित्रता, दु:ख, अशान्ति। यह तीन चीज़ें समझ लेनी चाहिए। जब भारत में तीनों चीज़ें हैं तब सुखधाम कहा जाता है। अब तुम तन-मन-धन सब कुछ बाप पर बलि चढ़ाते हो। तन-मन-धन से तुम भारत की सेवा करते हो। तन से भी सेवा की जाती है ना। सोशल वर्कर तन की सेवा करते हैं। कोई धन की सेवा करते हैं। बाकी मन की सेवा इस दुनिया में कोई जानते नहीं। मनमनाभव का अर्थ ही बाप आकर समझाते हैं। मुझ परमपिता परमात्मा को याद करो जिससे तुमको सुख का वर्सा लेने का है। मनमनाभव यानी सबकी बुद्धि बाप के साथ लगी रहे। ऐसा दूसरा कोई मनुष्य है नहीं, जो कह सके। तो और सभी सेवा करते हैं परन्तु मन से कोई भी कर नहीं सकते। मनुष्य कहते हैं मन शान्त कैसे हो? अब मन और बुद्धि है आत्मा का आरगन्स और यह कर्मेन्द्रियां शरीर के आरगन्स हैं। तो बाप बैठ समझाते हैं स्वदर्शन चक्र को याद करो। अपने बाप और सुखधाम को याद करो, इस दु:खधाम को भूल जाओ। यह हुई मन की सेवा, जो जो करेंगे वही माया पर जीत पायेंगे। माया का सिर कट जायेगा। ऐसे नहीं, स्वदर्शन चक्र से कोई मनुष्य का सिर काटा जाता है। देवताओं के ऐसे अलंकार होते नहीं, जिससे कोई पाप हो।
मनुष्य समझते हैं श्रीकृष्ण ने स्वदर्शन चक्र से गला काटा था। यह तो पाप का काम हो गया। देवतायें ऐसा काम कर न सकें। स्वदर्शन चक्र कोई का सिर काटने के लिए नहीं है। यह है माया पर जीत पाने का। स्वदर्शन चक्र फिराने से हम देवता बनते हैं। माया पर जीत पा लेते हैं। इसी स्वदर्शन चक्र से ही तुम माया पर जीत पाते हो। यह तुम्हारा हथियार है। शंख है बजाने के लिए। नॉलेज मिली हुई है ना। सिखलाते हैं स्वदर्शन चक्र कैसे फिराओ। तो फिर तुम चक्रवर्ती राजा बन जायेंगे। अब हम शान्तिधाम जा रहे हैं फिर सुखधाम आयेंगे। यह बाप ने सिखलाया है। स्वदर्शन चक्रधारी बाप के सिवाए कोई बना न सके। अब तुम ईश्वर की वंशावली हो फिर बनेंगे विष्णु की वंशावली। स्वदर्शन चक्र का अलंकार भी विष्णु को दिया हुआ है। तुम हो पुरुषार्थी। तुम जानते हो स्वदर्शन चक्र फिराने से हम देवता बनते हैं। इसी स्वदर्शन चक्र से ही तुम मायाजीत बनते हो। यह तुम्हारा हथियार है। शंख है बजाने के लिए। नॉलेज मिली हुई है ना। सिखलाते हैं स्वदर्शन चक्र कैसे फिराओ तो फिर तुम चक्रवर्ती राजा बन जायेंगे। अब हम शान्तिधाम जा रहे हैं फिर सुखधाम में आयेंगे। यह बाप ने सिखलाया है। स्वदर्शन चक्रधारी बाप के सिवाए कोई बना न सके। अब तुम ईश्वर की वंशावली हो फिर बनेंगे विष्णु की वंशावली। स्वदर्शन चक्र फिराने से हम विष्णु कुल में जायेंगे। यह तो बहुत सहज है कोई को समझाना। शान्तिधाम को याद करो जो बाप का घर है, जहाँ से आत्मायें आती हैं। अभी तो नर्क है, अब जाना है स्वर्ग में। बाप को याद करने से सब विकर्म विनाश होंगे। परन्तु बाप से पूरा योग नहीं है तो धारणा नहीं होती फिर कोई को समझा नहीं सकते।
तुम ब्रह्मा मुख वंशावली ब्रह्माकुमार कुमारियां हो। जो पवित्र रहते हैं वही बी.के. हैं। जो पवित्र नहीं रह सकते हैं वह ब्रह्मा मुख वंशावली शिवबाबा का पोत्रा कहला नहीं सकते। क्रोध, लोभ की बात अलग है। परन्तु पवित्र रह न सकें तो उनको ब्राह्मण कहना भी रांग है। वह ब्राह्मण कुल का है नहीं, जिसमें विकार हैं या विकार में जाते हैं। तुम समझा सकते हो हम तो पवित्र रहते हैं परन्तु कोई विकारी बन खराब हो जाते तो वह ब्राह्मण कहलाने के हकदार नहीं। विकार में जाना पतितपना है। ऐसे पतित यहाँ आ नहीं सकते। परन्तु कारणें अकारणें आने देना पड़ता है। अभी देखो मकान बनाने वाले जरूर सब पतित लोग हैं ना। परन्तु ब्राह्मण लोग तो यह काम नहीं करेंगे। तो उन्हों से काम लेना पड़ता है। कोई मददगार बनते हैं तो रहने दिया जाता है। वास्तव में पतित कोई रह नहीं सकता। यह है पावन बनने की जगह, पतित आयेंगे तो जरूर। भारत पावन था, स्त्री-पुरुष दोनों पवित्र रहते थे। लक्ष्मी-नारायण स्त्री-पुरुष दोनों सम्पूर्ण निर्विकारी थे ना। हम खुद उन्हों की महिमा करते हैं। तुम हो अब संगमयुगी। संगम पर बाप आकर पतित से पावन बनाते हैं। विषय विकारों में जाने वाले को पतित कहा जाता है। संन्यासी लोग विष को छोड़ते हैं तो पतित लोग उनको माथा टेकते हैं। विकार अक्षर बड़ा खराब है। निर्विकारी अर्थात् वाइसलेस। विकारी को कहा जाता है विशश। वैश्यालय है। बाप कहते हैं मैं कल्प-कल्प संगम पर आकर पतित से पावन बनाता हूँ, लायक बनाता हूँ। पावन दुनिया का मालिक बनाते हैं। स्वर्ग का मालिक तो स्वर्ग का रचयिता ही बनायेगा ना।
बाप को समझाना पड़ता है देवतायें कितने धणके थे! अब तो सभी निधन के हैं। यह है दु:खदाई दुनिया। सब एक दो को दु:ख देते रहते हैं। नम्बरवन दु:ख है काम कटारी चलाना, जिससे आदि-मध्य-अन्त दु:ख मिलता है। इस दु:खधाम में कोई को शान्ति मिलना ही असम्भव है क्योंकि सारी दुनिया का क्वेश्चन है ना। इतने संन्यासी पवित्र रहते हैं फिर भी भारत तमोप्रधान हो गया है ना। सिर्फ वह पवित्र बनते हैं इसलिए पतित मनुष्य उनकी सेवा करते हैं। भोजन देते हैं, महल आदि बनाकर देते हैं। तो जो पवित्र बनते हैं उनका नाम बाला होता है। बाप भी इन विकारों पर जीत पहनाते हैं। हम सो पूज्य देवता थे - यह सब भूल गये हैं। निर्विकारी देवी-देवताओं की डिनायस्टी चलती है। पूछेंगे वहाँ पैदाइस कैसे होगी? सो तो जरूर वहाँ की जो रसम होगी वैसे ही होगी। पहले तुम बाप से राजयोग सीख राज्य-भाग्य का वर्सा तो लो। यह थोड़ेही पूछना होता है - बच्चे कैसे पैदा होंगे? डिनायस्टी तो चलती है। वह संन्यास है रजोप्रधान। देवताओं का संन्यास है सतोप्रधान। संन्यासी तो विकारों से जन्म ले फिर निर्विकारी बनने का पुरुषार्थ करते हैं। वह है निर्विकारी दुनिया, यह है विकारी दुनिया। विकारी मनुष्यों को यह ख्याल रहता है कि विकार बिगर दुनिया कैसे चलेगी! जैसी उन्हों की दृष्टि, वैसी ही सृष्टि भासती है।
बाप कितना अच्छा बनाते हैं। लक्ष्य तो बुद्धि में रहता है ना। भगवान हमको आप समान भगवती भगवान बनाते हैं। तो गोया मास्टर भगवान हो गये, फिर देवता बनना है। मास्टर भगवान बन बाप के घर जाना है। जैसे वह पावन हैं तुम भी याद करते-करते पावन बन जायेंगे। फिर पावन दुनिया में आयेंगे। वहाँ दु:ख का नाम नहीं होता। मनुष्य ऐसे बन पड़ते हैं जो पावन बनने के लिए गुरू करना पड़ता है। आजकल तो विकारी पतित को भी गुरू कर लेते हैं। गृहस्थी पतित गुरू क्या पावन बनायेंगे? कुछ भी समझ नहीं है। बाप को जानते ही नहीं। यह है आरफन्स की दुनिया। सतयुग है धनी की दुनिया क्योंकि देवी-देवता धर्म तो धनी ने स्थापन किया। जब धनी के बने तब धणके हों। अब तुम गॉडली स्टूडेन्ट्स हो। भगवानुवाच एक अर्जुन प्रति तो नहीं था, सजंय भी था। तो अब तुमको बाप की श्रीमत पर चलना है। बाप कहते हैं श्रेष्ठ बनो। इस ड्रामा को भी समझना है। क्रियेटर, डायरेक्टर है परमपिता परमात्मा शिव। वह ब्रह्मा, विष्णु, शंकर को भी क्रियेट करते हैं फिर उनको डायरेक्शन देते हैं फिर ब्रह्मा की माला बदल रूद्र माला फिर विष्णु की माला बनेगी। बाप कहते हैं सिर्फ मुझ बाप को याद करो और स्वर्ग को याद करो तो ऐसे लक्ष्मी-नारायण बन जायेंगे। यह है सच्ची कमाई। मनुष्यों को कर्मों अनुसार जन्म मिलता है। अब बाप ऐसे श्रेष्ठ कर्म सिखलाते हैं, यहाँ है श्रीमत पर चल श्रेष्ठ बनने की कमाई। बाकी तो सभी मिट्टी में मिल जाना है। देह-अभिमान भी छोड़ना है। हम बाप के बने हैं, जाते हैं बाप के पास। यह आत्मा कहती है - बाबा हम आपकी याद में रह विकर्मो को काट ही लेंगे। फिर आप हमको स्वर्ग में भेज दोगे ना! नर्क का विनाश, स्वर्ग की स्थापना तो होती है ना। महाभारी लड़ाई सामने है। इससे भी मुक्ति-जीवन-मुक्ति के गेट्स खुलते हैं। यहाँ तो देखो बैठे-बैठे बीमारी लग जाती है। वहाँ तो सदैव आराम ही आराम है। यह दु:खधाम है ना इसलिए पुरुषार्थ किया जाता है सुखधाम के लिए। वहाँ माया है नहीं। देह-अभिमान होता नहीं। समझते हैं हम आत्मा हैं, यह शरीर अब बूढ़ा हुआ है, दूसरा लेना है। वहाँ यह ज्ञान नहीं रहता कि हम बाबा के पास जाते हैं। यह ज्ञान तुमको इस समय है। हमको वापिस जाना है बाबा के पास फिर बाबा स्वर्ग में भेज देंगे। शरीर निर्वाह अर्थ कर्म भी करते रहो।
तुम जितना आज्ञाकारी, व़फादार रहेंगे उतना उन्नति होगी। श्रीमत से श्रेष्ठ बनना है। सपूत बच्चों का काम है बाप से पूरा वर्सा लेना। अभी लेंगे तो कल्प-कल्पान्तर लेते रहेंगे। अभी नहीं लिया तो कल्प-कल्पान्तर वर्सा ले नहीं सकेंगे। तुम बच्चों के आगे सारी दुनिया कंगाल है। सभी मिट्टी में मिल जायेंगे। देवाला मार देंगे। तुम सच्ची कमाई करते हो सचखण्ड के लिए। बाप कहते हैं तुमको मेरे घर आना है इसलिए उस घर को याद करो। घर का मालिक ही बताते हैं तुम हमारे घर के मालिक थे। अब फिर घर को याद करो। ड्रामा पूरा होता है, कितना सहज है। अच्छा!
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का यादप्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।
धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) आज्ञाकारी, व़फादार और सपूत बन बाप से पूरा वर्सा लेना है। श्रीमत पर श्रेष्ठ कर्म कर सच्ची कमाई करनी है।
2) सम्पूर्ण निर्विकारी बन सच्चा ब्राह्मण बनना है। पावन बन स्वयं को पावन दुनिया के लायक बनाना है।
वरदान:- एक बाप को अपना संसार बनाकर सदा हंसने, गाने और उड़ने वाले प्रसन्नचित भव
कहा जाता है दृष्टि से सृष्टि बदल जाती है तो आपकी रूहानी दृष्टि से सृष्टि बदल गई, अभी आपके लिए बाप ही संसार है। पहले के संसार और अभी के संस्कार में फ़र्क हो गया, पहले संसार में बुद्धि भटकती थी, अभी बाप ही संसार हो गया तो बुद्धि का भटकना बंद हो गया। बेहद की प्राप्तियां कराने वाला बाप मिल गया तो और क्या चाहिए इसलिए हंसते गाते, उड़ते सदा प्रसन्नचित रहो। माया रुलाये तो भी रोना नहीं।
स्लोगन:- दिल साफ हो तो मुराद हांसिल होती रहेगी, सर्व प्राप्तियां स्वत: आपके समाने आयेंगी
23-03-2023 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा"' मधुबन
“मीठे बच्चे - देही-अभिमानी बनो तो पुराने जगत से नाता तोड़ने और नये जगत से नाता जोड़ने की खूबी सहज आ जायेगी, एक बाप से लव जुट जायेगा''
प्रश्नः- किन बच्चों का बुद्धियोग पारलौकिक मात-पिता से सदा जुटा हुआ रह सकता है?
उत्तर:- जो जीते जी मरकर ईश्वरीय सर्विस पर तत्पर रहते हैं। गृहस्थ व्यवहार में रहते भी सभी का बुद्धियोग बाप से जुड़ाने की सेवा करते हैं, बाप से जो रोशनी मिली है वह दूसरों को देते हैं, स्वर्ग का मालिक बनाने के लिए पावन बनने की युक्ति बताते हैं - उनका बुद्धियोग स्वत: बाप से जुटा रहता है।
गीत:- कौन है पिता, कौन है माता...
ओम् शान्ति। गीत का अर्थ क्या है? कहते हैं जगत के (लौकिक) माता-पिता को, मित्र सम्बन्धियों आदि सबको छोड़ो और बुद्धियोग अपने सच्चे मात-पिता, जो सृष्टि के रचयिता हैं, उनसे लगाओ। यह जो माता, पिता, मित्र-सम्बन्धी आदि हैं, उनसे अब नाता तोड़ना है और एक से नाता जोड़ना है। उनको भी मात-पिता कहा जाता है। तुम मात-पिता हम बालक तेरे.. वह सब एक को कहते हैं, वह लौकिक माँ बाप तो सबके अलग-अलग हैं। यह सारे भारत अथवा सारी दुनिया का मात-पिता है। तो पारलौकिक मात-पिता का बनना और लौकिक मात-पिता, मित्र-सम्बन्धियों को छोड़ना - इसके लिए देही-अभिमानी बनने का ज्ञान चाहिए। जब तक देही-अभिमानी नहीं बनते हैं तब तक छूटना बड़ा मुश्किल है। इस पुराने जगत से नाता तोड़ना है और नये जगत से नाता जोड़ना है - यही खूबी है। हद के एक घर से नाता तोड़ हद के दूसरे घर से नाता जोड़ना तो बहुत सहज है। हर जन्म में तोड़ना और जोड़ना होता है। एक मात-पिता, मित्र-सम्बन्धियों को छोड़ा दूसरा लिया। एक शरीर छोड़ा तो फिर मात-पिता, मित्र-सम्बन्धी, गुरू आदि सब नये मिलते हैं। यहाँ तो है जीते जी मरने की बात। जीते जी पारलौकिक मात-पिता की गोद में आना है। इस कलियुगी जगत के मात-पिता आदि सबको भुलाना है। यह बाप तो है फिर माता भी कैसे है? यह है गुह्य बात। बाप यह शरीर धारण कर इनसे फिर अपना बच्चा बनाते हैं। परन्तु कई बच्चे यह बात घड़ी-घड़ी भूल जाते हैं। अज्ञान काल में कभी माँ-बाप को भूलते नहीं हैं। इस माँ-बाप को भूल जाते हैं क्योंकि यह है नई बात। इस मात-पिता से बुद्धियोग जोड़ना है फिर सर्विस में तत्पर रहना है। जैसे बाप को सर्विस का फुरना रहता है, ऐसे बच्चों को भी रहना चाहिए। कहते हैं भगवान को फुरना हुआ नई दुनिया रचें। तो यह कितना बड़ा फुरना है! बेहद के बाप को बेहद का फुरना रहता है - सबको पावन बनाना है। उस पावन दुनिया स्वर्ग के लिए राजयोग सिखाना है। कितने को सिखलाना है! सबका बुद्धियोग बाप के साथ जोड़ना है। यही धन्धा हम बच्चों का है। बाप कहते हैं गृहस्थ व्यवहार में रहते तुम बच्चे सर्विस करके दिखाओ।
संन्यासियों को फुरना रहता है हम कोई को काग विष्टा समान सुख से छुड़ावें, पवित्र बनायें। उन पर भी रेसपान्सिबिल्टी रहती है - किसको वैराग्य दिलाए पवित्र बनायें। वह समझते हैं घरबार छोड़ना है। यह नहीं समझते कि पतित दुनिया को छोड़ना है। यह तो जब बाप आकर पावन दुनिया का साक्षात्कार कराते हैं तब हम पतित दुनिया से नाता तोड़ते हैं। फिर भी वह अपने को जवाबदार समझ घरबार छोड़ कितने को वैराग्य दिलाकर पवित्र बनाते हैं। महिमा तो उन्हों की भी गाई जाती है। यह संन्यास धर्म नहीं होता तो भारत और ही काम चिता पर जलकर भस्म हो जाता। अब वह रजोगुणी संन्यास स्थापन करने वाला कौन और यह सतोप्रधान संन्यास स्थापन करने वाला कौन - यह बाप बैठ समझाते हैं। उनका हेड था शंकराचार्य, उनके भी कितने फालोअर्स होंगे! लाखों करोड़ों की अन्दाज में होंगे। वह पवित्र नहीं होते तो उनकी प्रजा भी वृद्धि को नहीं पाती। तो यह संन्यासियों ने भी अच्छा ही किया है। पहले नम्बर में देवतायें गिने जाते हैं, दूसरे नम्बर में संन्यासी। सारा मदार है ही पवित्रता पर। दुनिया को पवित्र से अपवित्र फिर अपवित्र से पवित्र बनना ही है। सतयुग से लेकर जो भी ड्रामा में पास्ट हुआ है, वह नूंध है। भक्ति मार्ग में साक्षात्कार आदि जो कुछ होता है सेकेण्ड बाई सेकेण्ड, वह फिर कल्प बाद होगा। ड्रामा में यह सब नूंध है। ड्रामा चक्र को समझना है। ऐसे नहीं बैठ जाना है कि ड्रामा में जो होगा। ड्रामा में एक्टर्स तो सब हैं। तो भी हर एक अपनी आजीविका के लिए पुरुषार्थ जरूर करते हैं। पुरुषार्थ बिगर रह न सकें। भल कई मनुष्य समझते भी हैं यह नाटक है, हम परमधाम से आये हैं पार्ट बजाने। परन्तु विस्तार से समझा नहीं सकते हैं। पहले किस धर्म वाले आते हैं, सृष्टि कैसे रची जाती है, जानते नहीं। सृष्टि नई रची जाती है वा पुरानी सृष्टि को बाप आकर नया बनाते हैं - यह मालूम न होने कारण उन्हों ने प्रलय दिखाकर फिर नई सृष्टि दिखा दी है। बाप आकर इन बातों की रोशनी देते हैं। फिर तुम भी औरों को रोशनी देने के रेसपान्सिबुल हो। कितनी सर्विस है! जैसे बाप ने तुमको मुक्ति-जीवनमुक्ति में आने का मार्ग बताया है, जिस मार्ग के लिए ही आधाकल्प भक्ति मार्ग में ठोकरें खाई हैं। तो बेहद के बाप को फुरना रहता है कि हम अपनी सैलवेशन आर्मी की वृद्धि कैसे करें? सभी को रास्ता कैसे बतायें?
तुम बच्चे सबको बताओ कि बाप आया हुआ है राजयोग सिखलाने, कल्प पहले मुआफिक। जिसको ही शिवाए नम: कहते हैं। जो है सभी से ऊंच ते ऊंच परमधाम में रहने वाला। हम सभी आत्मायें भी वहाँ निवास करती हैं। आत्मा को हमेशा इमार्टल कहा जाता है। वह कब जलती-मरती नहीं। हर एक आत्मा में पार्ट भरा हुआ है। अपनी आत्मा को देखो वा जो मुख्य हैं उनको देखो। झाड़ को जब देखा जाता है तो मुख्य फाउन्डेशन और टाल-टालियों को भी देखा जाता है। पत्ते तो अथाह होते हैं उनको गिनती नहीं किया जा सकता। टाल-टालियां गिनती कर सकते हैं। तो बरोबर इस झाड़ में फाउन्डेशन हम देवी देवताओं का है। अभी फाउन्डेशन ही सड़ गया है। जैसे बनेनट्री झाड़ का फाउन्डेशन सड़ गया है। फिर भी शाखायें कितनी निकली हुई हैं! शाखाओं से भी पत्ते निकलते रहते हैं। तो यह भी बेहद का कितना बड़ा झाड है! तुम बच्चे भी नम्बरवार पुरुषार्थ अनुसार जानते हो। ऐसे नहीं कि सारा दिन किसकी बुद्धि में यह चिन्तन चलता है। सभी प्वाइंट्स एक ही समय बुद्धि में फिरना मुश्किल है। फिर भी जो विचार सागर मंथन करने वाले हैं उनकी बुद्धि में तो टपकता ही होगा। झाड़ बुद्धि में है तो बीजरूप बाप भी याद रहता है। हम भी वहाँ के रहने वाले हैं फिर इस झाड़ में हम ही आलराउन्ड आते हैं, आदि से अन्त तक। जब तुम पतित जड़जड़ीभूत अवस्था में आते हो तो सारा झाड़ आ जाता है। पहले-पहले जो थे वह भी अब पुराने हैं। पिछाड़ी वाली टाल टालियां भी पुरानी हैं। जो सर्विसएबुल हैं उन्हों को ओना रहता है हम बाबा के मददगार हैं, मनुष्यों को फिर से सो देवता बनाने के लिए। यह समझाना पड़ता है। तुम सो देवता थे, सो क्षत्रिय बनें। 84 जन्मों की जन्मपत्री तुम ही बता सकते हो। तो यह बातें जब बुद्धि में टपकती रहेंगी तब किसको समझा सकेंगे। चिन्तन चलना चाहिए - हम बच्चे बाबा के साथ मददगार हैं। तो बुद्धि में आना चाहिए कि हम किसको ड्रामा का राज़ कैसे समझायें? उन्हों का योग बाप के साथ कैसे जुटायें? मनुष्य से देवता बनाने का पुरुषार्थ करायें अर्थात् बाप से बेहद का वर्सा लेने का मार्ग बतायें। जिनको बाप द्वारा मार्ग मिला होगा वही बतायेंगे। बाप ही आकर राजयोग सिखलाते हैं अथवा मुक्ति-जीवनमुक्ति के गेट्स खोलते हैं। ऐसे सारा दिन विचार सागर मंथन करना चाहिए और स्वभाव भी बहुत मीठा धारण करना है। किसके भाव-स्वभाव में जलना वा मरना नहीं है। सहन करना है। अपनी सर्विस करनी है। जितना हो सके सर्विस में टाइम देना चाहिए। अपने से पूछना है हम बाबा-बाबा कहते हैं, बाबा को तो बेहद सर्विस का ओना रहता है, मैं बाबा का बच्चा क्या कर रहा हूँ! मुझे कितनी सर्विस करनी चाहिए? टाइम तो बहुत मिलता है। तरस पड़ना चाहिए। बिचारे सभी बाप से बिछुड़े हुए हैं। धक्का खाते रहते हैं। पाप करते रहते हैं। बाप से बेमुख कर सबको मुंझाते रहते हैं।
तुम ब्राह्मणों का काम ही है सबको ज्ञान सुनाए सम्मुख लाना। तुम ब्राह्मण हो गीता के भगवान के सच्चे-सच्चे बच्चे। तुमको अथॉरिटी मिली हुई है। तुम्हारी बुद्धि में गीता का ही ज्ञान है। जो समझा नहीं सकते उनको हम ब्राह्मण नहीं कह सकते। हाफ कास्ट वा क्वार्टर कास्ट कहेंगे। नाम ब्राह्मण है, धन्धा शूद्रपने का करते हैं। बुद्धि शूद्रपने की है। अजमेर में पुष्करनी ब्राह्मण रहते हैं तो वह गीता शास्त्र आदि सुनाने वाले होते हैं। उन्हों का धन्धा ही यह है। धामा खाना उनका काम नहीं है। उनका सिर्फ काम है शास्त्र सुनाए दक्षिणा लेना। अब तुम तो हो सच्चे-सच्चे ब्राह्मण, बेहद बाप के बच्चे। प्रजापिता ब्रह्मा बेहद प्रजा का बाप है ना और शिवबाबा है सभी आत्माओं का बाप। उनका निवास स्थान है परमधाम में। वही पतितों को पावन बनाने वाला है, इसलिए सारी दुनिया उनको याद करती है, ओ गॉड कहते हैं तो निराकार ही बुद्धि में आता है। परन्तु गुरूओं की जंजीरों में फंसे हुए हैं। जिन देवताओं की पूजा करते हैं उनके आक्यूपेशन का पता नहीं है। वह भी जैसे गुड्डे गुड़ियां समझ पूजा करते हैं। आक्यूपेशन जानते नहीं इसलिए गुड़ियों की पूजा कहा जाता है। तो कितना फ़र्क रहता है! ढेर के ढेर मूंझे हुए हैं। देवताओं की सूरत और सीरत, मनुष्य की सूरत और सीरत में दिन-रात का फ़र्क है। मनुष्य गाते हैं - आप सर्वगुण सम्पन्न. .. हम नींच पापी हैं। अगर ऐसा कहते हैं तो भला उनको ऐसा बनाने वाला कौन था? अभी तो बरोबर नर्क है फिर स्वर्ग का मालिक क्या हम बन सकते हैं? यह ख्याल कभी मनुष्यों को उठता नहीं है। तुम बच्चों को कभी यह ख्याल थोड़ेही उठा होगा कि हम ऐसे कब बनेंगे? सिर्फ भक्ति करते रहे। अभी तुम जानते हो हमको सो देवता बनना है। राजधानी में ऊंच पद पाना है इसलिए पुरुषार्थ करते हैं। अन्दर आना चाहिए अगर हमारा शरीर छूट जाए तो हम किस पद को पायेंगे? तुम पूछ भी सकते हो - अगर हम मर जायें तो क्या पद पायेंगे? तो बाबा झट बता देंगे - तुम पाई पैसे का पद पायेंगे वा 8 आने का, 12 आने का वा कौड़ी का पद पायेंगे। प्रजा को कौड़ी पद कहेंगे। दिल दर्पण में अपनी शक्ल देखो - कोई बन्दरपना तो नहीं है? अशुद्ध अहंकार है नम्बरवन। काम-क्रोध को भी जीत लेवे परन्तु देह-अभिमान है पहला नम्बर दुश्मन। देही-अभिमानी बनने से ही फिर और विकार ठण्डे होंगे। देही-अभिमानी तब बनें, जब बाप के साथ लव जुटे। देह-अभिमानी का लव जुट न सके। तो देह-अभिमान छोड़ने में बड़ी मेहनत चाहिए। देही-अभिमानी बड़े हर्षित रहते हैं। देह-अभिमानी का चेहरा मुर्दों जैसा रहता है। तो पहली मुख्य बात है देही-अभिमानी बनना, तब बाप भी मदद करेगा। निर्विकारी तो बहुत रहते हैं परन्तु मैं आत्मा हूँ, बाप की याद रहे, यह घड़ी-घड़ी भूल जाता है। इसमें फेल हो जाते हैं। अशरीरी नहीं बनेंगे तो वापिस कैसे जायेंगे? सर्विस का बहुत फुरना रहना चाहिए - जिससे बहुत मनुष्यों का कल्याण हो, देह-अभिमानी कहाँ भी जायेगा तो फेल हो आयेगा। देही-अभिमानी कुछ न कुछ तीर लगाकर आयेगा। महसूस करेंगे कि फलाने ने बात तो ठीक कही थी। योग जुट जाए तो सर्विस का फुरना भी हो। उसमें पहले-पहले तो अल्फ पर समझाना है। जास्ती तीक-तीक से तंग हो जायेंगे। पहले शिवाए नम:, तीन तबका भी समझाना है। एक निराकारी दुनिया जहाँ परमपिता परमात्मा और आत्मायें रहती हैं। बाकी है स्थूल और सूक्ष्मवतन। स्वर्ग में लक्ष्मी-नारायण का राज्य था, अब नहीं है, फिर हिस्ट्री रिपीट होगी। आगे कलियुग था फिर सतयुग हुआ अब फिर कलियुग की हिस्ट्री रिपीट हो रही है। तो अब फिर सतयुग की हिस्ट्री भी रिपीट होगी ना। इसमें ही मजा है। बहुत अच्छी प्वाइंट्स हैं। अच्छा!
ब्राह्मण कुल भूषण सभी बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का यादप्यार और गुडमार्निग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।
धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) किसके भाव-स्वभाव में जलना मरना नहीं है। अपना स्वभाव बहुत-बहुत मीठा बनाना है। सहनशील बनना है।
2) बाप का खिदमतगार बनने के लिए विचार सागर मंथन करना है। बुद्धि में ज्ञान का ही चिंतन करते रहना है। देही-अभिमानी रहने की मेहनत करनी है।
वरदान:- सर्व संबंध एक बाप से जोड़कर माया को विदाई देने वाले सहजयोगी भव
जहाँ संबंध होता है वहाँ याद स्वत: सहज हो जाती है। सर्व संबंधी एक बाप को बनाना ही सहजयोगी बनना है। सहजयोगी बनने से माया को सहज विदाई मिल जाती है। जब माया विदाई ले लेती है तब बाप की बंधाईयां बहुत आगे बढ़ाती हैं। जो हर कदम में परमात्म दुआयें, ब्राह्मण परिवार की दुआयें प्राप्त करते रहते हैं वह सहज उड़ते रहते हैं।
स्लोगन:- सदा बिजी रहने वाले बिजनेसमैन बनो तो कदम-कदम में पदमों की कमाई है।
22-03-2023 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा"' मधुबन
“मीठे बच्चे - देही-अभिमानी हो रहना, यही बड़ी मंजिल है, देही-अभिमानी को ही ईश्वरीय सम्प्रदाय कहेंगे, उन्हें बाप और परमधाम के सिवाए कुछ भी सूझेगा नहीं''
प्रश्नः- किस एक बात की धारणा से भविष्य 21 जन्मों के लिए पूंजी जमा हो जाती है?
उत्तर:- श्रीमत पर अपने ऊपर तथा दूसरों पर उपकार करने से। उपकार वही कर सकता जो पूरा देही-अभिमानी बनें, जिसकी बुद्धि शुद्ध हो। देह-अभिमान में आने से अपकार हो जाता है और जमा हुई पूंजी खत्म हो जाती है। घाटा पड़ जाता है। क्रोध का भूत भी अपकार कराता है इसलिए अपना स्वभाव बहुत मीठा बनाना है।
गीत:- यह कौन आज आया....
ओम् शान्ति। जब परमात्मा बाप आकरके जीव आत्माओं से मिलते हैं तो जीव आत्मा को अपना जीवपना भूल जाता है। उनको निश्चय हो जाता है कि हम आत्मा हैं और परमपिता परमात्मा की सन्तान हैं। बाकी जो कुछ हम देखते हैं यह देह सहित देह के सर्व सम्बन्धी आदि यह तो याद रहना ही नहीं है। बाप आते ही हैं बच्चों को वापिस ले जाने के लिए। तुम चौंक उठते हो यह क्या होता है। ब्रह्मा की अंधियारी रात पूरी हो सवेरा होता है। देह सहित देह के जो भी सम्बन्ध हैं वह टूट जाते हैं। तो चौक गये हैं कि क्या हो गया है! यह पुरानी दुनिया देखने में नहीं आती। बस बाप और परमधाम ही सूझता है। यह वन्डर है ना। परन्तु बाप को पूरा न पहचानने के कारण, बुद्धियोग न लगने कारण देह-अभिमान पूरा मिटता ही नहीं है। उनको हम बन्दर सम्प्रदाय कहते हैं। जब देही-अभिमानी बनें तब ईश्वरीय सम्प्रदाय कहें। बन्दर सम्प्रदाय का नारद के रूप में दृष्टान्त हैं। वह भी भक्त था, झांझ बजाता था। उनको बाप ने दिखाया कि देखो तुम बन्दर सम्प्रदाय हो। तो देही-अभिमानी हो रहना बहुत मुश्किल है, बड़ी मंजिल है। भल पवित्र बनते हैं। ऐसे अच्छे और बुरे मनुष्य तो होते ही हैं। अब संन्यासी घरबार छोड़ते हैं, पवित्र बनते हैं। जो घरबार नहीं छोड़ने वाले हैं गृहस्थी, वह जाकर उन्हों को अपना गुरू बनाते हैं। कलियुगी दुनिया के सभी मनुष्य मात्र नास्तिक, निधनके हैं। हे भगवान, हे परमपिता परमात्मा कह पुकारते तो हैं परन्तु उनको जानते नहीं कि आखरीन भी वह कौन है। पुकारते-पुकारते वह थक पड़े हैं। कह देते हैं ईश्वर सर्वव्यापी है। बन्दगी भी करते हैं परन्तु जानते नहीं। यह तो समझने की बात है। भगवानुवाच, गीता में भी भगवानुवाच है ना - यह हैं आसुरी सम्प्रदाय। भगवान ने क्यों कहा है तुम बन्दर मिसल हो? अपनी शक्ल तो आइने में देखो। भगवान को जानते नहीं, ढूंढते रहते हैं इसलिए मनुष्य को ही भगवान मिलना चाहिए। ढूंढते हैं परन्तु मिलते नहीं। तो जब भगवान आये तब आकर अपना परिचय दे। गीता में पूरा परिचय है। कहते हैं मैं रूद्र हूँ। मुझ रूद्र ने यह ज्ञान यज्ञ रचा है। अगर कहें श्रीकृष्ण ने रचा तो कहे मैं श्रीकृष्ण तुमको राजयोग सिखाता हूँ। परन्तु श्रीकृष्ण ज्ञान यज्ञ होता ही नहीं। यह तुम बच्चे ही जानते हो बाकी तो सब मनुष्य-मात्र आइरन एजड हैं। मुख से पत्थर ही निकालते रहते हैं। झूठ बोलने वाले के लिए कहते हैं इनका मुंह काला है। जब संन्यास धर्म की स्थापना होती है, उस समय सृष्टि रजो है। तो भारत को पवित्रता में थमाने लिए यह पवित्र धर्म की स्थापना होती है। उनको रजोगुणी संन्यासी कहा जाता है। संन्यास जरूर करते हैं परन्तु रजोगुणी। वह कोई सतोप्रधान नहीं हैं। जब भारत काम चिता पर चढ़ने से जलना शुरू हो जाता है तब ड्रामा में इस संन्यास का भी पार्ट है। उनको कोई सहज राजयोग नहीं कहेंगे। वह भगवान ने नहीं सिखाया था। वे तो भगवान को ही नहीं जानते। यह बड़ी भारी भूल कर दी है, जो श्रीकृष्ण को द्वापर में ले गये हैं। बाप बैठ भूले हुए मनुष्यों को समझाते हैं। परन्तु समझाने में बड़ी रिफाइननेस चाहिए। संन्यासी लोग कहते हैं आप संन्यास धर्म की निंदा करते हो। बोलो आकर समझो। पहले बताओ तुम निंदा किसको कहते हो। परमपिता परमात्मा जो सबका बाप है, गीता का भगवान है, उसने समझाया है, श्रीकृष्ण ने नहीं। परमपिता परमात्मा ने आकर कहा है कि यह कलियुग का अन्त है। मनुष्यों की बुद्धि जड़जड़ीभूत आसुरी बन गई है। यह है ही पतित आसुरी राज्य। सतयुग में है पावन दैवी राज्य। वह समझते हैं हम ही ईश्वर हैं परन्तु वो तो हैं नहीं। ईश्वर तो सभी का एक है, जिसको सब याद करते हैं। यह समझने की बाते हैं। समझना हो तो समझो। परन्तु समझाने वाला बड़ा रिफाइन चाहिए। जिनमें क्रोध का भूत होगा वह क्या समझा सकेंगे। क्रोध का भूत, मोह का भूत, लोभ का भूत छोटे बड़े भूत तो होते ही हैं। गन्दी आदते हैं। अच्छे-अच्छे बच्चों से भी माया कुछ न कुछ करा देती है। यह है सब देह-अभिमान की शैतानी। देह-अभिमान आया तो फिर जैसा बन्दर हो जाता, फिर वह मन्दिर लायक बन न सके।
तुम जानते हो मन्दिर लायक देवी-देवतायें ही बनते हैं। उन्हों के लिए ही मन्दिर बनाया जाता है। सतयुग में तो सारी दुनिया को शिवालय कहा जाता है। सभी मन्दिर में रहते हैं। सृष्टि ही पवित्र मन्दिर बन जाती है। विश्व शिवालय बन जाता है, जिसमें यथा राजा रानी तथा प्रजा सब पवित्र रहते हैं। तो कोई को बड़ा युक्ति से समझाना होता है। चूहा काटता भी है फिर फूंक भी देता रहता है। उनमें यह अक्ल है। कोई संन्यासी आदि आये तो पहले युक्ति से उनकी महिमा करनी चाहिए। आओ संन्यासी जी आप तो बहुत अच्छे हो जो संन्यास किया है, घरबार छोड़ा है। तुमको मालूम है दो प्रकार का संन्यास है। एक है घरबार छोड़ने का संन्यास, दूसरा है घरबार न छोड़ने का संन्यास। गृहस्थ व्यवहार में रहते राजयोग सीख स्वर्ग का मालिक बनना होता है। कभी सुना है? कहेंगे यह बात तो कोई भी शास्त्र में नहीं है। गीता में श्रीकृष्ण का नाम डाल द्वापर में ठोक दिया है, तो समझेंगे कैसे? फिर चित्रों पर समझाना होता है। तुम्हारा है घरबार छोड़ने का। सभी तो नहीं छोड़ेंगे। प्रवृत्ति मार्ग है। तुमने प्रवृत्ति में रहते हुए फिर 5 विकारों का संन्यास नहीं किया है, हम कर रहे हैं। हमको मदद मिल रही है परमपिता परमात्मा की। ऐसे गृहस्थ व्यवहार में रहते 5 विकारों का संन्यास करने से हम स्वर्ग का मालिक बनेंगे। सतयुग में देवी-देवतायें पवित्र थे, अभी नहीं हैं। कलियुग के बाद फिर सतयुग आना है। बाप ही आकर सतयुग स्थापन करते हैं। प्रवृत्ति में रहते कमल फूल समान पवित्र बनाते हैं। तुम कहते हो आग कपूस इकट्ठे रह नहीं सकते हैं। परन्तु यहाँ रहते हैं। तुम्हारे पास प्राप्ति की एम आबजेक्ट तो कुछ है नहीं। बेहद का बाप जब आते हैं तब पुरानी सृष्टि का विनाश और नई सृष्टि की स्थापना हो जाती है। यह ज्ञान हमको मिलता ही है नई दुनिया के लिए। बाप कहते हैं देह सहित जो भी तुम्हारे संबंध आदि हैं, सबको भूल अपने को देही समझ मुझे याद करो। यह हमारा राजयोग है सतोप्रधान। अब तो है तमोप्रधान, फिर तमोप्रधान से सतोप्रधान सृष्टि जरूर बननी है। सतोप्रधान बनाने वाला रचयिता बाप ही ठहरा। हम उस बेहद के बाप से यह सीख रहे हैं। भगवान एक है, ब्रह्मा विष्णु शंकर को भी देवता कहा जाता है। उनसे नीचे तबके वालों को मनुष्य कहा जाता है। भगवान रहते ही हैं परमधाम में। हम आत्मायें भी वहाँ रहती हैं। ऐसे रिफाइननेस से समझाना है। परन्तु योग पूरा नहीं है तो धारणा नहीं होती है। बाबा जो समझाते हैं वह किसको याद थोड़ेही पड़ता है। भल कोई बच्चे कहे हम याद करते हैं परन्तु बाबा मानते नहीं। अगर तुम याद करते हो तो बुद्धि शुद्ध होनी चाहिए और धारणा अच्छी होनी चाहिए। धारणा है तो फिर करानी भी है। उपकार करना है। तुम जानते हो बाप आकर सब पर उपकार करते हैं। माया रावण अपकार करते हैं। बाप आकर एक ही बार इतना उपकार करता है जो 21 जन्म हमारा उपकार हो जाता है। उपकार कहो अथवा कृपा, आशीर्वाद आदि जो कहो द्वापर में फिर अकृपा शुरू हो जाती है। रावण अपकार करते हैं। श्रीमत से ही तुम कोई का भी उपकार कर सकेंगे। फिर देह-अभिमानी बना तो अपकार करना शुरू कर देंगे। उपकार करने से भविष्य 21 जन्मों के लिए पूंजी जमा होती है। अपकार करने से जो जमा हुआ होता वह भी खत्म हो जाता है। जबकि उपकार करना जानते हैं तो करना है। उपकार करना नहीं जानते हैं तो जरूर अपकार ही करेंगे, आसुरी मत पर। मनुष्य हर एक, एक दो पर अपकार ही करते हैं। काम कटारी चलाते हैं। बाप को भूला, उपकार करना भूला तो वह फिर अपकारी जरूर बनेगा। सेकेण्ड में उपकार, सेकेण्ड में फिर अपकार कर देते हैं। अच्छे-अच्छे बच्चे कितने उपकारी थे। उपकार करने की शिक्षा जानते थे। अपने ऊपर भी उपकार करते थे, तो औरों पर भी करते थे। फिर माया के चक्र में आकर भागन्ती हो गये। अपकारी बन पड़े। कितना अपकार करते हैं। मनुष्य समझते हैं कुछ तो होगा जो भागे हैं। हम फिर कैसे जायें। उल्टी सुल्टी बकवाद जाकर करते हैं। गोया जो उपकार करके खाता जमा किया सो फिर अपकार करके अपने खाते को मिट्टी में मिला दिया। ऐसे बहुत हुए हैं और होते रहेंगे। देखो जिसने उपकार किया वही फिर देह-अभिमान में आने से अपकारी बन पड़ा। मनुष्य, मनुष्य पर अपकार ही करते हैं। उपकार कोई कर न सके, जब तक श्रीमत पर न चले। अपकार कराने वाली रावण मत है। अभी-अभी श्रीमत, अभी-अभी रावण मत पर चल पड़ते हैं। क्रोध का भूत आया और अपकार कर लिया। बाप पर अपकार का कलंक लगा दिया। निंदा करा दी। बाप क्या कहेंगे, ईश्वरीय औलाद ऐसे होते हैं! वह फिर दिल से उतर जाते हैं। कोई का भूत निकल जाता है तो फिर महिमा भी करते हैं। क्रोध बहुत खराब है इसलिए बाबा हमेशा कहते हैं मीठे टेम्पर (स्वभाव) वाले बनो। क्रोधी टेम्पर अज्ञान है। बाप समझाते हैं ममत्व को बिल्कुल छोड़ना है। ममत्व टूटते-टूटते जब अन्त का समय आयेगा तब सम्पूर्ण बनेंगे। रेस है ना। बच्चे जानते हैं मम्मा बाबा पहले पहुंचते हैं। तो उनकी मत पर चल फालो करना चाहिए। धारणा करनी चाहिए। मॉ बाप के दिल पर चढ़ेंगे तो तख्त पर भी बैठेंगे। अपने से पूछना है कि हम लक्ष्मी को वरने अर्थात् मॉ बाप के तख्त पर बैठने लायक बने हैं। अगर समझते हैं हमारे में क्रोध है तो वह कभी दिल पर चढ़ न सकें। न भविष्य में महाराजा महारानी बनेंगे। कदम-कदम श्रीमत पर चलना है। अगर ट्रेटर बन पड़े तो जाकर चण्डाल बनेंगे। हूबहू कल्प पहले वाली बातें बाबा रोज़-रोज़ सुनाते रहते हैं। उनमें कहाँ भी फ़र्क नहीं पड़ सकता। कितना ज्ञान का नशा रहना चाहिए। परन्तु जो सर्विस पर होंगे उनको रहेगा जो जैसी सर्विस करते हैं, उनको फल जरूर मिलता है। नम्बरवन है नॉलेज देना। उसमें बहुतों को सुख दे चक्रवर्ती बनाना है। औरों को बनायेंगे, सर्विस की युक्तियां तो बहुत अच्छी बताई जाती है। कहाँ भी सर्विस हो सकती है। फिर करके 100 में से एक जगेगा। मेहनत का काम है।
ऐसे-ऐसे रात दिन बाबा का विचार सागर मंथन चलता है। अनेक प्रकार के विचार चलते हैं। कितने विघ्न पड़ते हैं। विश्व को पवित्र स्वर्ग बनाना है। उसके लिए अथाह ख्यालात चलते हैं। ख्यालात करते-करते रात से सुबह हो जाती है इसलिए गाया हुआ है - नींद को जीतने वाले...बाबा को कभी-कभी तो नींद ही नहीं आती। बच्चों को विश्व का मालिक बनाना है तो इतना फिकर रहता है। तुम बच्चों को भी इतना फिकर रहना चाहिए कि हम श्रीमत पर कहाँ तक चलते हैं। बापदादा संग हम बच्चों को ही कुल्हा (कंधा) देना है। सारी पुरानी दुनिया को रवाना करना है। अच्छा! मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का यादप्यार और गुडमार्निग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।
धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) कभी भी रावण की मत पर चल देह-अभिमान में आकर बाप का अपकार नहीं करना है, निंदा नहीं करानी है। श्रीमत पर अपना तथा सर्व का उपकार करना है।
2) क्रोध का भूत प्रवेश होने नहीं देना है। बहुत मीठा स्वभाव बनाना है। युक्ति से सेवा करनी है।
वरदान:- सम्पर्क में आने वाली आत्माओं को सदा सुख की अनुभूति कराने वाले मास्टर सुखदाता भव
आप सुखदाता के बच्चे मास्टर सुखदाता हो इसलिए सुख का खाता जमा करते रहो। सिर्फ यह चेक नहीं करो कि आज सारे दिन में किसी को दु:ख तो नहीं दिया? लेकिन चेक करो कि सुख कितनों को दिया? जो भी सम्पर्क में आये आप मास्टर सुखदाता द्वारा हर कदम में सुख की अनुभूति करे, इसको कहा जाता है दिव्यता वा अलौकिकता। हर समय स्मृति रहे कि इस एक जन्म में 21 जन्मों का खाता जमा करना है।
स्लोगन:- एक बाप को अपना संसार बना लो तो अविनाशी प्राप्तियाँ होती रहेंगी।
21.03.2023 HINDI MURLI
“मीठे बच्चे - भगवान आया है सभी भक्तों को भक्ति का फल मुक्ति-जीवनमुक्ति का ठिकाना देने, तुम भक्त से अभी वारिस (बच्चे) बने हो''
प्रश्नः- तुम बच्चे किस स्मृति में रहो तो दिल में खुशी के ढोल-बाजे बजते रहेंगे?
उत्तर:- सदा स्मृति रहे कि मोस्ट बील्वेड बाबा आया है हमें विश्व का मालिक, शाहों का शाह बनाने। हम अभी सूर्यवंशी राजा रानी बन रहे हैं। बाबा हमें 21 जन्मों के लिए एवर हेल्दी, वेल्दी बना रहा है। हमारे सतयुगी राज्य में सब चीजें फर्स्टक्लास होंगी। तत्व भी सतोप्रधान होंगे। आत्मा और शरीर दोनों गुल-गुल (फूल समान) होंगे। इसी स्मृति से दिल में खुशी के ढोल-बाजे बजते रहेंगे।
ओम् शान्ति। बच्चे जानते हैं कि बाप परमधाम में रहने वाला है। वह बाप खुद बच्चों को कहते हैं अब तुम भक्त नहीं हो। अभी तो तुम भगवान के बच्चे हो। भक्त, भगवान को ढूँढते रहते हैं। भक्त को भगवान नहीं कह सकते। भक्त अनेक हैं, भगवान एक है। अब भक्त मनुष्य हैं तो जरूर भगवान को भी मनुष्य रूप में आना पड़े। गाया जाता है भगवान घर बैठे आते हैं। किसके घर? मनुष्यों के घर। भगवान को जरूर मनुष्य रूप धारण करना पड़े। निराकार परमपिता परमात्मा एक है, भक्त अनेक हैं। सभी मनुष्य इस समय भक्त हैं, भगवान को याद करते हैं। समझते हैं कोई समय भगवान को आना जरूर है। वह है स्वर्ग का रचयिता तो जरूर एक ही होगा ना। अनेक तो नहीं हो सकते। भगवान आकर मनुष्य रूप में भक्तों को समझाते हैं। आधाकल्प तो मुझे याद करते हैं। ड्रामा अनुसार जरूर भक्तिमार्ग में याद करना ही है। फिर मैं भगवान मनुष्य का रूप धरकर भक्तों के पास आता हूँ। भक्त भी मनुष्य हैं तो हमको मिलना भी मनुष्यों से ही है। जरूर मनुष्य का रूप धारण करना पड़े, कोई कच्छ मच्छ का नहीं। बाप कहते हैं मैं आकर बच्चों को अपना परिचय देता हूँ। मेरा पार कोई पा न सके इसलिए मैं ही आकर अपना परिचय देता हूँ कि मैं आया हुआ हूँ। तुम बच्चे जानते हो बाप मनुष्य तन लेकर आते हैं। वह भी समझाते हैं कि मैं किस भक्त के तन में प्रवेश करता हूँ। यह (ब्रह्मा) है सबसे बड़ा भगत। एक तो भक्त नहीं है। जो भी पुराने भक्त हैं उनका हिसाब बताते हैं। वही प्राचीन देवी-देवता जो सतयुग आदि में थे, फिर वह भक्ति मार्ग में आते हैं तो भक्ति शुरू कर देते हैं। तो वह हुए सबसे पुराने भक्त। उन्हों ने ही पूरी भक्ति की है। वही आये हैं भगवान से मिलकर देवी-देवता पद को प्राप्त करने। फिर आकर सम्मुख मिलते हैं। तुम जानते हो हम भक्त थे, सारी दुनिया भक्त है। भगवान आया हुआ है भक्तों की रक्षा करने क्योंकि भगत बहुत दु:खी हैं। भक्तों को यह पता नहीं है कि शान्ति और सुख कहाँ होता है? भगवान आकर समझाते हैं मैं जब आता हूँ तो सौगात लेकर आता हूँ बच्चों के लिए। बेहद का बाप जरूर बेहद की सौगात लेकर आयेंगे। अभी तुम समझते हो हम भक्त नहीं हैं। भगवान ने आकर अपना ही वारिस बनाया है। भक्त वारिस नहीं होते। वह ऐसा नहीं समझते कि हम बच्चे हैं। बाप से हमको वर्सा लेना है। वह तो सर्वव्यापी कह देते हैं तो फिर भगवान कहाँ से आये। अब तुमको वर्सा जरूर चाहिए इसलिए मुझे याद करते हो। वर्सा भी फर्स्टक्लास चाहिए। सेकेण्ड, थर्ड क्लास नहीं। सभी भक्त भगवान को याद करते हैं कि जाकर उनसे मिले। परन्तु जानते नहीं कि कैसे उनके पास जायें। तो भगवान को आना पड़ता है। पढ़ाते भी हैं, तुम जानते हो भगवान आया हुआ है सबको भक्ति का फल देने अथवा सबको सुखी करने। भगवान को अभी ही आना होता है। वह है रूहानी पण्डा। वास्तव में मनुष्यों का सच्चा-सच्चा तीर्थ है मुक्ति और जीवनमुक्तिधाम। स्वर्ग में रहने वाले देवताओं के जड़ चित्र यहाँ हैं। उन जड़ चित्रों पास जाते हैं यात्रा करने। वह हो जाती है जिस्मानी यात्रा। देलवाड़ा मन्दिर में वा जगत अम्बा के पास यात्रा करने जाते हैं, वह है भक्ति। भगवान आकर इन यात्रा के धक्कों से छुड़ा देते हैं। भगत भगवान को मिलते हैं तो भगवान भक्ति के दु:खों से छुड़ाकर ठिकाने लगा देते हैं। बाप कहते हैं जो भी सब धर्म वाले हैं, सब मनुष्य-मात्र को अभी ठिकाने लगाने आया हूँ। असुल ठिकाना है मुक्ति जीवनमुक्तिधाम। सभी को अपने धाम वा स्वर्ग धाम में ले जाते हैं। तुम बच्चों की बुद्धि में है बाबा परमधाम से आया हुआ है। आत्मा ही चाहती है कि हम भगवान के पास जायें। याद कौन करते हैं? आत्मा याद करती है इन आरगन्स द्वारा। बाप कहते हैं अब तुमको देही-अभिमानी बनना है। तुम्हारी बुद्धि में ज्ञान टपकता रहता है। बरोबर ड्रामानुसार बाबा आया हुआ है। बच्चों को रावण के दु:ख से छुड़ाकर अपने साथ ले जायेंगे। गाइड बनकर आये हैं। तुमको रूहानी तीर्थों पर जहाँ जाना है वहाँ से फिर लौटकर नहीं आना है। यहाँ तो है अल्पकाल के लिए जिस्मानी तीर्थ। यह जड़ तीर्थ बन्द हो जाते हैं। फिर तुम सभी तीर्थों पर जाते हो। सच्चा तीर्थ एक है मुक्तिधाम, दूसरा है जीवनमुक्तिधाम। उन सभी तीर्थों पर जाने लिए भी भगत जिस्मानी तीर्थ करते रहते हैं। बरोबर जिस्मानी तीर्थ जन्म-जन्मान्तर करने बाद फिर उनसे छूटकर हम रूहानी तीर्थों पर चले जायेंगे, फिर यहाँ मृत्युलोक में आना ही नहीं है। मुक्तिधाम में जाकर बैठेंगे, आना-जाना बन्द हो जायेगा। फिर स्वर्ग में जायेंगे तो वहाँ आना-जाना होता रहेगा। स्वर्गवासी बन जायेंगे। तुम जानते हो कि बाबा हमको स्वर्गवासी बना रहे हैं। हम तैयारी करते हैं स्वर्ग में जाने की। दुनिया में तो किसको पता ही नहीं है, बिल्कुल बुद्धू हैं। शास्त्र आदि पढ़ने से भी कोई फ़ायदा नहीं। अभी की भेंट में तो ऐसे ही कहेंगे। अल्पकाल के सुख को जरा सा कहेंगे। जास्ती मिठाई और जरी (थोड़ी) मिठाई में फ़र्क तो है ना।
अभी तुम समझते हो हम तो सूर्यवंशी राजा रानी बनते हैं, वह आशा रखते हैं बहुत धनवान बनें। सम्पत्ति तो जरूर चाहिए तब तो सुख होगा। सम्पत्ति के साथ फिर हेल्थ भी चाहिए। हेल्थ, वेल्थ है तो सुख बहुत है। इस दुनिया में हेल्थ, वेल्थ दोनों मिल नहीं सकती। एक जन्म के लिए एक मनुष्य के पास यह नहीं हो सकती। वहाँ तो तुम सब 21 जन्मों के लिए हेल्दी, वेल्दी रहते हो। वहाँ तो अनादि आदि हर चीज़ की बहुत सस्ताई होगी। पैसे की तो दरकार ही नहीं होगी। पैसे बदले अशर्फियां देते होंगे और चीज़ फर्स्टक्लास होगी। तत्व भी सतोप्रधान बन जाते तो उनसे माल भी बहुत अच्छे बनते होंगे। खाने आदि में कितना मजा होगा। अभी तुम्हारे दिल में ढोल-बाजा बजना चाहिए। मोस्ट बील्वेड बाप आये हुए हैं। कहते हैं मैं तुम्हारा मोस्ट बील्वेड बाप हूँ। 63 जन्म तुमने याद किया है। जरूर बील्वेड है तब तो याद करते हैं ना। मनुष्यों को तो कुछ भी पता नहीं। बाबा हमको शाहों का शाह, स्वर्ग का मालिक, विश्व का मालिक बनाते हैं। देवी-देवतायें विश्व के मालिक हैं ना। परन्तु उन पर भी झूठे कलंक छोटेपन से ही लगा दिये हैं। कितनी झूठी बातें लगा दी हैं। माया बिल्कुल ही 100 परसेन्ट नान-सेन्स बुद्धि बना देती है। यह भी ड्रामा का खेल है। तो अब मोस्ट बील्वेड बाप कहते हैं मुझे पूरा याद करो तो तुम्हारे पूरे विकर्म विनाश हों। गुल-गुल (फूल) बनो। आत्मा गुल-गुल होगी तो शरीर भी ऐसा अच्छा मिलेगा। त्वमेव माताश्च पिता.. यह किसकी महिमा है? कुत्ते बिल्ली सबमें ईश्वर है तो क्या उनको कहेंगे मात पिता....? मनुष्यों की बुद्धि क्या बन पड़ी है! भभका कितना दिखाते हैं। इसको कहा जाता है माया का पाम्प। रावण के राज्य में मनुष्यों को नशा कितना है। जानते कुछ भी नहीं। तुम्हारे में भी जो अच्छे ज्ञान की धारणा करने वाले हैं, उन्हों को नशा चढ़ता है। ज्ञान की धारणा नहीं तो सूरत भल मनुष्य की है परन्तु सीरत बन्दर की है। तुम बच्चे अब समझते हो हम श्रीमत पर चल भारत के मनुष्य मात्र को श्रेष्ठ दैवीगुणधारी बनाते हैं अर्थात् हम भारत को श्रेष्ठ दैवी राजस्थान बनाते हैं। जिनको यह नशा होगा वही ऐसे बोलेंगे। कहाँ भी भाषण करो तो बोलो हम श्री अर्थात् श्रेष्ठ मत पर चल रहे हैं। भगवान है ज्ञान का सागर, आनन्द का सागर, हम उनकी मत पर चल रहे हैं। यादव और कौरव दोनों हैं रावण की मत पर और हम पाण्डव हैं भगवान की श्रीमत पर। जीत भी हमारी है। श्रीकृष्ण कोई स्वर्ग स्थापन नहीं करते हैं। भगवान बाप ही स्थापन करते हैं। हम भारत को श्रेष्ठ बनाते हैं और कोई भी ऐसे कह नहीं सकेगा कि हम ईश्वरीय मत पर हैं। हाँ कहेंगे ईश्वर की प्रेरणा से करते हैं। बाप तो कहते हैं मैं इस तन में आकर मत देता हूँ। इसमें प्रेरणा की तो बात ही नहीं। तो पहले-पहले निराकार की महिमा करनी चाहिए। वह मनुष्य सृष्टि का बीजरूप है, ज्ञान का सागर, सुख का सागर है। उनकी मत पर हम चलते हैं। वह हमारा बाप है। परमधाम में रहने वाला है। स्वर्ग का रचयिता है, जो जानता होगा वही महिमा करेगा। सारे सृष्टि को पावन बनाने वाला तो एक ही होना चाहिए। अनेक थोड़ेही होने चाहिए। तो सिवाए हमारे बाकी सब हैं रावण की मत पर। हम श्रीमत से भारत को फिर से दैवी राजस्थान बना रहे हैं। यह अनेक धर्म सभी विनाश होने हैं। हम जो बी.के. हैं, हम सभी ने यह प्रैक्टिकल अनुभव किया हुआ है। हम प्रजापिता ब्रह्मा के बच्चे हैं। हो तुम भी परन्तु हम प्रैक्टिकल में अब हैं। फिर भक्ति मार्ग में गाया जायेगा - परमपिता परमात्मा ने ब्रह्मा द्वारा मनुष्य सृष्टि रची। वह समझते हैं शायद फट से देवता बन गये। परन्तु नहीं, ब्रह्मा द्वारा पहले ब्राह्मण रचे फिर वर्णों में ले आना चाहिए। कहानियां सुनाने वा ड्रामा आदि से कोई फायदा नहीं। एकदम बाप की शिक्षा बतानी चाहिए। बाप हमको क्या कहते हैं? हे मीठे बच्चे, हे आत्मायें... सारी सभा में कहना चाहिए, हम श्रीमत पर चल रहे हैं - देवता बनने के लिए। वह हमको राजयोग सिखाते हैं। गीता का भगवान भी वह निराकार ही है। साकार में आते हैं, प्रजापिता ब्रह्मा के मुख से यह ब्राह्मण ब्राह्मणियां निकलते हैं। हम बी.के. हैं। परमपिता परमात्मा ने हमको ब्रह्मा मुख से रचा है। हम शिवबाबा के पोत्रे हैं। बी.के. का परिचय देना चाहिए। तुम भी सब आत्मायें शिव के पोत्रे प्रजापिता ब्रह्मा के बच्चे हो। अभी फिर से यह नई रचना हो रही है। ऐसे समझाना चाहिए। जो समझें बरोबर हम भी शिव के पोत्रे ब्रह्मा के बच्चे हैं। हम उनके बने हैं इसलिए हमारा नाम है ब्रह्माकुमार ब्रह्माकुमारियां। कल्प पहले यह ब्राह्मण से देवता, फिर क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र बने थे। अब फिर ब्राह्मण बने हैं। ऐसे-ऐसे अच्छी रीति चक्र का राज़ बुद्धि में बिठाना चाहिए। पहले तो बाप का पूरा परिचय देना चाहिए। बाप ने हमको सुनाया है, हम फिर तुमको सुनाते हैं। यह ड्रामा का चक्र कैसे फिरता है, चक्रवर्ती राजा कैसे बनना होता है - यह नॉलेज है। इसमें कोई हथियार पंवार नहीं हैं। वर्ल्ड की हिस्ट्री-जॉग्राफी को तो जरूर मनुष्य ही जानेंगे ना। मनुष्य सृष्टि का चक्र कैसे फिरता है यह जरूर जानना चाहिए। हम बाप से सुनते हैं तो चक्रवर्ती राजा बनते हैं। तुमको भी बेहद के बाप से सुख लेना है तो पुरुषार्थ करो। बेहद का बाप है ही स्वर्ग का रचयिता। उनसे बेहद का सुख मिलता है तो क्यों नहीं बेहद के बाप को याद करना चाहिए। लौकिक बाप के वर्से से राज़ी नहीं होते। हम बेहद के बाप से 21 जन्म सुख पाते हैं। बाकी तो सब है भक्ति मार्ग की सामग्री। तुम कहते हो शास्त्र आदि अनादि हैं। परन्तु यह सब होते हुए भी अब तो कलियुग आकर हुआ है। दुनिया पतित बनती जाती है। फायदा तो कुछ भी नहीं हुआ है। अभी बाप खुद आये हैं, हम उनके पोत्रे ब्रह्मा के बच्चे ब्राह्मण हैं। वास्तव में तो वह तुम्हारा भी बाप है। ऐसे-ऐसे अच्छी तरह से समझाओ तो वह भी पानी हो जाए। (पिघल जाए) अच्छा!
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का यादप्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।
धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) रूहानी यात्रा पर तत्पर रह, याद से आत्मा और शरीर दोनों को गुल-गुल (फूल समान) बनाना है। विकर्म विनाश करने हैं।
2) हम डायरेक्ट ईश्वर की मत पर भारत को श्रेष्ठ, मानव मात्र को दैवीगुणधारी बनाने की सेवा के निमित्त हैं - इस स्मृति में रहना है।
वरदान:- सूर्यमुखी पुष्प के समान ज्ञान सूर्य के प्रकाश से चमकने वाले सदा सम्मुख और समीप भव
जैसे सूर्यमुखी पुष्प सदा सूर्य की सकाश से घिरा हुआ रहता है। उसका मुख सूर्य की तरफ होता है, पंखुड़ियां सूर्य की किरणों के समान सर्किल में होती हैं। ऐसे जो बच्चे सदा ज्ञान सूर्य के समीप और सम्मुख रहते हैं, कभी दूर नहीं होते - वे सूर्यमुखी पुष्प के समान ज्ञान सूर्य के प्रकाश से स्वयं भी चमकते और दूसरों को भी चमकाते हैं।
स्लोगन:- सदा हिम्मतवान बनो और सर्व को हिम्मत दिलाओ तो परमात्म मदद मिलती रहेगी।
20.03.2023 HNDI MURLI
“मीठे बच्चे - सच्चे बाप के साथ सच्चा होकर रहो तो कदम-कदम पर पदमों की कमाई जमा होती जायेगी''
प्रश्नः- कौन सी प्राप्ति भगवान के सिवाए दूसरा कोई करा नहीं सकता है?
उत्तर:- मनुष्यों को चाहना रहती है हमें शान्ति वा सुख मिले। शान्ति मिलती है मुक्तिधाम में और सुख मिलता है जीवनमुक्ति में। तो मुक्ति और जीवनमुक्ति इन दोनों चीज़ों की प्राप्ति भगवान के सिवाए दूसरा कोई करा न सके। तुम बच्चों को अब ऐसी भटकती हुई आत्माओं पर तरस आना चाहिए। बिचारे रास्ता ढूंढ रहे हैं, भटक रहे हैं। उन्हें रास्ता दिखाना है।
गीत:- इन्साफ की डगर पर..
ओम् शान्ति। यह गीत भी बच्चों के लिए है क्योंकि सच्चाई पर सच्चे बाबा के डायरेक्शन पर बच्चे ही चलते हैं। फिर कई तो अच्छी रीति चलते हैं, कोई नहीं भी चलते हैं। जो चलेंगे वही ऊंच पद पायेंगे। नहीं चलेंगे तो वह ऊंच पद पा नहीं सकेंगे। बाप वा साजन के साथ सच्चा रहना है क्योंकि उनकी सच्ची मत मिलती है। दूसरे सब झूठी मत देते हैं। मनुष्य, मनुष्य को सब झूठी ही मत देते हैं। गाया हुआ है झूठी माया झूठी काया.. यहाँ तो झूठ ही झूठ है। सचखण्ड में झूठ होता नहीं। जिस सचखण्ड के लिए तुम पुरुषार्थ कर रहे हो। तो बच्चों को बाप से बहुत सच्चा बनना है। फिर भी बेहद का बाप है। सच्चा हो रहने से कदम-कदम पर पदमपति होते रहते हैं। झूठे तो पदमपति नहीं बनेंगे। तो बाप के साथ झूठ बोलना बड़ा खराब है। सदैव सच्चा हो रहना चाहिए, नहीं तो सचखण्ड में इतना पद पा नहीं सकेंगे। अच्छा यह तो हुई बच्चों प्रति सावधानी।
अब बच्चों को किसको समझाने की तरकीब भी सीखना है कि बेसमझ को कैसे समझायें। बेसमझ क्यों कहा जाता है? क्योंकि मनुष्यों को समझ नहीं है। कहते तो हैं कि मनुष्य सृष्टि रचने वाला परमात्मा है तो वह हुआ रचता। परन्तु रचना को फिर यह पता नहीं है कि हमारा रचता कौन है। भक्ति आदि करते हैं - शान्ति अथवा सुख के लिए। हम तुम भी ऐसे करते थे, जबकि बाप नहीं मिला था। कृष्ण का भजन करते हैं, उनको याद करते हैं, उनको मनाने की साधना करते हैं, परन्तु उनसे क्या मांगते हैं, कुछ पता नहीं रहता। हमारा रचने वाला कौन है, कुछ भी नहीं जानते। तुम बच्चे जानते हो जब तक बाप नहीं मिला था तो हम अनेक प्रकार की साधना, भक्ति आदि करते आये। करते-करते रिजल्ट क्या हुई? कुछ भी नहीं। सृष्टि को तो तमोप्रधान बनना ही है। फिर इतनी जो साधना करते हैं उससे कुछ मिलता है वा नहीं, यह विचार भी नहीं किया जाता है, अब समझते हैं, कुछ भी मिलता नहीं। हमको चाहिए क्या, यह भी कोई की बुद्धि में नहीं है। संन्यासी कहेंगे निर्वाणधाम में जाने के लिए हम साधना करते हैं। परन्तु वह तो जिसको रास्ते का पता हो, होकर आया हुआ हो तब तो रास्ता बता सके और कोई तो रास्ता बता नहीं सकते। जो आते हैं उन्हों को पुनर्जन्म तो लेना ही है। अन्त तक पुनर्जन्म तो लेते आना है। जब तक सृष्टि का विनाश हो वा सृष्टि रूपी झाड जड़ जडीभूत हो तब तक तो सबको रहना है। मनुष्य कईयों के लिए समझते हैं, फलाना ज्योति ज्योत समाया, वैकुण्ठवासी हुआ वा स्वर्ग पधारा। अब वास्तव में स्वर्ग में तो पधारा कोई नहीं है। स्वर्ग कहाँ होता है, निर्वाणधाम कहाँ होता है, वहाँ क्या होता है, वहाँ जाकर फिर आना कब होता है! कुछ भी नहीं जानते। तुम सब कुछ जानते हो नम्बरवार पुरुषार्थ अनुसार। कोई भी आये तो उनसे पूछना चाहिए तुम क्या चाहते हो? गुरू करते हो तो दिल में चाहना क्या है? वास्तव में उनकी चाहना को तुम ब्राह्मण ब्राह्मणियां जानते हो। चाहना क्या रखनी चाहिए, किस बात की चाहना रखनी है - यह भी कोई जानते नहीं। यहाँ कुछ अच्छा नहीं लगता है, तो इनसे छुटकारा पाने की साधना करते हैं। अब जाने के लिए धाम हैं दो, निर्वाणधाम वह है शान्तिधाम। वहाँ आत्माओं का निवास होता है। क्या तुम उस धाम में जाने चाहते हो? तुम बच्चों को तरस पड़ना चाहिए। बिचारे भटकते रहते हैं। रास्ते को कोई जानते ही नहीं। गाइड है ही एक। वह सभी को दु:खों से छुड़ाकर सुखधाम में ले जाने वाला या जीवनमुक्त बनाने वाला एक ही है। वह जब तक न आये तब तक कोई को भी मुक्ति-जीवनमुक्ति की प्राप्ति हो नहीं सकती। यह दोनों प्रापर्टी हैं ही एक बाप के पास। जब तक भगवान भक्तों के पास न आये तो वह चीज़ मिल नहीं सकती। स्वर्ग में सुख और शान्ति दोनों हैं। शान्ति क्यों कहा जाता? क्योंकि वहाँ लड़ाई झगड़ा आदि होता नहीं। बाकी असली शान्तिधाम तो है निर्वाणधाम। जहाँ सभी आत्मायें शान्त रहती हैं, फिर आत्मा को जब आरगन्स मिलते हैं तो बोलती है। तो वहाँ सुख शान्ति दोनों ही हैं। सुख होता है सम्पत्ति से। वहाँ (सतयुग में) तो सम्पत्ति बहुत है। यहाँ सम्पत्ति नहीं है तो मनुष्य बिचारे रोटी टुकड़ भी मुश्किल खा सकते हैं। सम्पत्ति है तो एरोप्लेन बड़े-बड़े महल आदि सब वैभव हैं। तो सम्पत्ति भी चाहिए फिर शान्ति भी चाहिए। निरोगी काया भी चाहिए। यह सब देने वाला बाप है। समझाया जाता है यह कलियुग तो है दु:खधाम। नई दुनिया है सुखधाम। वहाँ दु:ख होता नहीं। पवित्रता, सुख, शान्ति वहाँ सब है। दूसरा है मुक्तिधाम, वहाँ कोई सदैव रह नहीं सकता। पुनर्जन्म ले फिर पार्ट जरूर बजाना है। परमधाम में तब तक रहते हैं जब तक पार्ट में आयें। सच्चे स्वीट होम को याद करते हैं, नाटक में हमेशा नम्बर्स की लिमिट होती है। फलाने ड्रामा में इतने एक्टर्स हैं, यह तो अनादि बना बनाया ड्रामा है। लिमिटेड नम्बर हैं, भारत में 33 करोड़ देवताओं की लिमिट है। इस समय तो बहुत कनवर्ट हो गये हैं। तो पहले-पहले जब कोई आये तो उनसे पूछना है दिल में क्या आश है? क्या चाहते हो? दर्शन से तो कोई फायदा नहीं। गुरू के पास कोई आश लेकर जाते हैं। एक तो आश रहती है कुछ मिले। आशीर्वाद दें, हम फलाने में जीते, कोई कहते हैं हमको ऐसा रास्ता बताओ जो हम सदैव शान्ति में रहें। मन बड़ा चंचल है। बोलो शान्ति तो मिलेगी परमधाम में। एक है शान्तिधाम, दूसरा है सुखधाम, तीसरा है दु:खधाम। तुम क्या चाहते हो तो फिर हम बतायें कि यह साधना अथवा पुरुषार्थ करो। साधना वा पुरुषार्थ एक ही बात है। भक्त साधना करते हैं और जगह जाने लिए अथवा वापिस परमधाम जाने लिए। मोक्ष तो कोई पा न सकें। यह बना बनाया ड्रामा है। संन्यासी को फिर अपने संन्यास धर्म में आना ही पड़ेगा। क्रिश्चियन धर्म फिर क्राइस्ट द्वारा जरूर स्थापन होगा। सतयुग, नई दुनिया में पवित्रता सुख शान्ति सब है, उनको कहा जाता है सुखधाम, शिवालय। यह है वैश्यालय। तुम क्या चाहते हो? शान्ति चाहते हो? वह तो शान्तिधाम में मिलेगी। वह भी तब तक जब तक सुखधाम वालों का अर्थात् देवी-देवताओं का पार्ट है। फिर तो नम्बरवार सबको पार्ट में आना पड़ेगा। तुम भी पुरुषार्थ करेंगे तो वैकुण्ठ में जायेंगे। भारत वैकुण्ठ था, यह भीती देनी चाहिए। वर्सा बाप से ही मिलता है। वही आकर बच्चों को अपनी पहचान देते हैं। बाप ही नहीं तो बच्चों को पहचान कैसे होगी। ऐसे तो है नहीं जो समझें कि हम भगवान के बच्चे हैं। अगर ऐसा कहे तो हम पूछेंगे बताओ भगवान क्या रचते हैं? वह तो स्वर्ग रचते हैं। फिर तुम नर्क में क्यों धक्का खाते हो, फिर 84 जन्म बताने पड़े। भगवान ने तुमको स्वर्ग में भेजा फिर 84 जन्म लेते अब नर्क में आकर पड़े हो। अब 84 जन्म पूरे हुए। तुम यह नहीं जानते हो हम बताते हैं। तुम पहले स्वर्ग में थे फिर 84 जन्म भोगे हैं। अब फिर बाप और स्वर्ग को याद करो। कमल फूल समान पवित्र रहना होगा। संन्यासियों को भी समझाना है, तुम्हारा हठयोग है। यह है राजयोग। गृहस्थ व्यवहार में रहते कमल फूल समान रहना है। यह प्रवृत्ति मार्ग है। तुम्हारा पंथ ही अलग है, निवृत्ति मार्ग का। यह प्रवृत्ति मार्ग है जीवनमुक्ति पाने का। हमको भी बाबा ने बताया है। अब तुम बाप को याद करो तो अन्त मती सो गति हो जायेगी। विकर्मो का बोझा विनाश तब होगा जब बाप को याद करेंगे। यह दो स्थान हैं जहाँ सुख शान्ति मिल सकता है। तुमको क्या चाहिए? क्या स्वर्ग में जाने चाहते हो?
गाया जाता है तुम मात-पिता.. अगर तुमको सुख घनेरे चाहिए तो गृहस्थ व्यवहार में रहते राजयोग सीखो। पावन भी रहना है फिर दोनों में से जो रहे, बंधायमानी नहीं है। स्वर्ग का मालिक बनने वाला नहीं होगा तो लटकना थोड़ेही है, बाप और वर्से को याद करना है और पवित्र रहना है। एक संन्यासी ने लिखा है मैं साधू हूँ परन्तु रास्ते का पूरा पता नहीं पड़ता है। सुना है आपके द्वारा रास्ता मिलता है। अब क्या करूँ? हम आपका बन जायेंगे तो फालोअर्स सहित आ जायेंगे। परन्तु ऐसे कोई बन नहीं सकते हैं। वह समझते हैं फालोअर्स को हम जो कहेंगे वह मानेंगे। परन्तु ऐसे तो करेंगे नहीं। बी.के. का नाम सुनकर कहेंगे इनको जादू लगा है। हाँ कोई निकल भी आए, बाकी हम कोई संन्यासी के आश्रम को हाथ करने वाले नहीं हैं। समझो कोई समझ लेते हैं यह मार्ग अच्छा है, तो क्या हम उनका आश्रम सम्भालेंगे क्या? हाँ बच्चियां जाकर भाषण करेंगी, अगर पसन्द आयेगा तो रहेंगी। बाकी आश्रम को हम क्या करेंगे। लिखा है हम आकर कुछ शिक्षा पा सकते हैं? तो उनको लिखना पड़े तुम साधना करते हो कहाँ जाने लिए? किस एम आबजेक्ट से? किससे मिलने चाहते हो? कहाँ जाने चाहते हो? तुम तो हो हठयोगी संन्यासी, हमारा यह है राजयोग। यह सिखलाने वाला है परमपिता परमात्मा। यह कलियुग है दु:खधाम, सतयुग है सुखधाम। कलियुग में देखो अनेकानेक धर्म हैं, कितने लड़ाई झगड़े हैं। सतयुग में तो है एक धर्म। वह है सतोप्रधान दुनिया। यथा राजा रानी तथा प्रजा सतोप्रधान। यहाँ है यथा राजा रानी तथा प्रजा तमोप्रधान। यह कांटों का जंगल है, वह फूलों का बगीचा है। तो मार्ग हैं ही दो। हठयोग और राजयोग। यह राजयोग है स्वर्ग के लिए। राजाओं का राजा स्वर्ग में बनेंगे। स्वर्ग स्थापन करने वाला है परमपिता परमात्मा। वही राजयोग सिखलाते हैं। संन्यासी कहें हम संन्यास में ही रहें तो ज्ञान उठा न सकें। गृहस्थ व्यवहार में रहना पड़े। यह एक लॉ है जिसको छोड़ भागे हो उनका फिर कल्याण करना है। पहले तुम अच्छी रीति समझो फिर चैरिटी बिगन्स एट होम। तुमने स्त्री को छोड़ा है। अगर बाल ब्रह्मचारी होगा तो मात-पिता को छोड़ा होगा, उनको भी समझाना है। कायदे कानून तो पहले समझाने हैं।
पुरानी दुनिया को नया बनाना यह तो बाप का ही काम है। बाप को परमधाम से आना पड़ता है। वह है पतितों को पावन, नर्क को स्वर्ग बनाने वाला। स्वर्ग में रहते ही हैं देवी-देवता। बाकी सब निर्वाणधाम में रहते हैं। सबको सुख शान्ति देने वाला वह एक ही है। बाप आते ही हैं एक धर्म की स्थापना कर बाकी सबका विनाश करने और सब परमधाम में जाकर निवास करेंगे। यह कयामत का समय है। सब हिसाब-किताब पूरा कर वापिस जायेंगे। सभी आत्माओं को अपना-अपना पार्ट मिला हुआ है। कोई कितने जन्म, कोई कितने जन्म पार्ट बजाते हैं। सबको तमोप्रधान बनना ही है। बाकी वापिस कोई जा नहीं सकते। ना फिर मोक्ष ही होता है। बाकी हुई मुक्ति जीवनमुक्ति, हम जीवनमुक्ति के लिए पुरुषार्थ करते हैं। इसमें मुक्ति भी आ जाती है। तुम अगर मुक्ति चाहते हो तो अच्छा बाप को याद करो तो विकर्म विनाश हों। और तुम बाप के पास चले जायेंगे। यह एक ही रास्ता स्वयं बाप बतलाते हैं और स्वदर्शन चक्र भी फिराते रहेंगे। पढ़ाई पढ़ते रहेंगे तो स्वर्ग में आयेंगे। तो संन्यासियों को फिर गृहस्थ व्यवहार में जाना पड़े, हिम्मत चाहिए। एक ज्ञानेश्वर गीता है जिसमें यह लिखा हुआ है, बोला एक बच्चा देकर संन्यास करो तो कुल की वृद्धि होगी। फिर तो कोई बाल ब्रह्मचारी हो न सके। बाल ब्रह्मचारी भीष्म पितामह का तो बहुत मान है। परन्तु मनुष्य तो एक दो पर एतबार (विश्वास) भी नहीं करते हैं। समझते हैं गृहस्थ में रहते और विकार में न जाये, यह हो नहीं सकता। लेकिन उन्हें कोई भगवान सर्वशक्तिवान की मदद थोड़ेही है। न कोई में राजयोग सिखाए स्वर्ग की स्थापना करने की ताकत है। सबको दु:खों से छुटकारा दिलाकर सुख में ले जाना, यह सिवाए परमात्मा के कोई कर नहीं सकता। दोनों दरवाजों की चाबी बाप के पास है। स्वर्ग का फाटक खुलता है तो मुक्ति का भी खुलता है। मुक्ति में जाने सिवाए स्वर्ग में जा कैसे सकते। दोनों गेटस इक्ट्ठे खुलते हैं। अच्छा!
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का यादप्यार और गुडमार्निग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।
धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) मुक्ति के लिए बाप को याद कर विकर्म विनाश करने हैं और जीवनमुक्ति के लिए स्वदर्शन चक्रधारी बनना है, पढ़ाई पढ़नी है।
2) रहमदिल बनकर भटकने वालों को घर का रास्ता बताना है। मुक्ति और जीवनमुक्ति का वर्सा हर एक को बाप से दिलाना है।
वरदान:- रूहानियत में रहकर स्वमान की सीट पर बैठने वाले सदा सुखी, सर्व प्राप्ति स्वरूप भव
हर एक बच्चे में किसी न किसी गुण की विशेषता है। सभी विशेष हैं, गुणवान हैं, महान हैं, मास्टर सर्वशक्तिमान् हैं - यह रूहानी नशा सदा स्मृति में रहे - इसको ही कहते हैं स्वमान। इस स्वमान में अभिमान आ नहीं सकता। अभिमान की सीट कांटों की सीट है इसलिए उस सीट पर बैठने का प्रयत्न नहीं करो। रूहानियत में रहकर स्वमान की सीट पर बैठ जाओ तो सदा सुखी, सदा श्रेष्ठ, सदा सर्व प्राप्ति स्वरूप का अनुभव करते रहेंगे।
स्लोगन:- अपनी शुभ भावना से हर आत्मा को दुआ देने वाले और क्षमा करने वाले ही कल्याणकारी हैं।
19.03.2023 HINDI MURLI
ब्राह्मणों की नेचर विशेषता की नेचर है - इसे नेचुरल स्मृति स्वरूप बनाओ
आज बापदादा अपने सर्व विश्व की विशेष आत्माओं को देख रहे हैं। ड्रामानुसार आप आत्माओं का कितना विशेष पार्ट नूँधा हुआ है। आज बापदादा हर एक बच्चे की विशेषताओं को देख हर्षित हो रहे हैं। हर एक बच्चे को देख ‘वाह बच्चे' यह स्नेह का गीत दिल में बज रहा था। साथ-साथ यह भी देख रहे थे कि बच्चों के दिल से ये ‘वाह-वाह' का गीत सदा निकलता है? हर कर्म में, हर कदम में, हर संकल्प में ये श्रेष्ठ अनुभव होता है वा कभी-कभी होता है? साधारण जीवन से विशेष जीवन सदा स्वत: रहती है? वा स्मृति लाने से अनुभव होता है? जब जीवन है तो जीवन का अर्थ ही है सदा और स्वत: रहे। स्मृति में लाया तो अनुभव किया और स्मृति में नहीं लाया तो विशेषता के बजाय साधारण जीवन अनुभव हो - यह आप विशेष आत्माओं की विशेषता नहीं है। ब्राह्मण जन्म ही विशेष जन्म है। जिसका जन्म ही विशेष है उसका जीवन क्या होगा? विशेष होगा या साधारण? ब्राह्मण जन्म भी श्रेष्ठ, ब्राह्मण धर्म भी श्रेष्ठ और ब्राह्मण कर्म भी श्रेष्ठ क्योंकि ब्राह्मण जन्म दाता, ब्राह्मण धर्म स्थापक, सर्वश्रेष्ठ परम आत्मा और आदि आत्मा ब्रह्मा बाप है। तो जैसे रचता सर्वश्रेष्ठ तो रचना भी सर्वश्रेष्ठ अर्थात् विशेष है। ब्राह्मणों का कर्म विशेष क्यों है? क्योंकि कर्म में फ़ालो करने के लिए आप सबके सामने आदि आत्मा ब्रह्मा बाप सैम्पल है। कर्म में फ़ालो साकार ब्रह्मा बाप को करते हो इसलिये भाग्य विधाता अर्थात् कर्म द्वारा भाग्य की रेखा श्रेष्ठ बनाने वाला ब्रह्मा गाया हुआ है। भाग्य की रेखा का कलम कर्म है। तो श्रेष्ठ कर्म का सहज सिम्बल ब्रह्मा बाप है इसलिये आप सभी विशेष पुरुषार्थ का शब्द यही वर्णन करते हो कि बाप समान बनना है।
इस अव्यक्त वर्ष में सभी का लक्ष्य क्या रहा? निराकारी स्थिति में निराकार बाप समान अशरीरी स्थिति का अनुभव किया? साकार कर्म में ब्रह्मा बाप समान बनने का नम्बरवार अनुभव किया? तो विशेष जीवन का आधार विशेष जन्म, धर्म और श्रेष्ठ कर्म है। जैसे लौकिक जीवन में भी अगर किसी आत्मा का जन्म विशेष राज परिवार में हो, राजकुमार हो वा राजकुमारी हो तो यह विशेषता जन्म की होने के कारण हर समय सदा और स्वत: रहती है वा बार-बार स्मृति में लाते हैं कि मैं राजकुमारी हूँ? सहज याद होती है ना। पुरुषार्थ करते हैं क्या? चाहे कर्म अपनी रुचि के कारण कितना भी साधारण हो लेकिन अपने जन्म की विशेषता भूल जाते हैं क्या? नेचुरल और नेचर बन जाती है। तो आप ब्राह्मण आत्माओं की नेचर क्या है? विशेष है या साधारण है? अभी भी कोई-कोई बच्चे जब कोई साधारण कर्म कर लेते हैं तो बापदादा के आगे अपने को निर्दोष सिद्ध करने के लिये क्या कहते हैं? मैं चाहता नहीं था वा चाहती नहीं थी कि ये कर्म करूँ लेकिन मेरी नेचर है इसलिये हो गया। वैसे ये कहना वा सोचना यथार्थ है? मैं कौन? ब्राह्मण जीवन वाले हैं ना। तो ब्राह्मण जीवन वाली आत्मा ये सोच सकती है कि ये मेरी नेचर है? यह कहना राइट है? तो उस समय क्यों बोलते हैं? उस समय ब्राह्मण नहीं बोलता, माया बोलती है। तो जैसे ये साधारण नेचर वा मायावी नेचर नेचुरल काम कर लेती है ना, इसलिये कहते हैं चाहते नहीं थे लेकिन हो गया। तो ब्राह्मण नेचर अर्थात् विशेषता की नेचर भी नेचुरल होनी चाहिये। नेचुरल चीज़ सदा रह सकती है। तो विशेष जीवन की स्मृति नेचर के रूप में नेचुरल होनी चाहिये वा कभी भूलना, कभी याद होना? तो सदा स्मृति स्वरूप में रहो। स्मृति लाने वाले नहीं, स्मृति स्वरूप इसलिये बापदादा देख रहे थे अव्यक्त वर्ष समय प्रमाण समाप्त हुआ लेकिन बापदादा समान स्वयं को सम्पन्न बनाया? इस अव्यक्त वर्ष का विशेष लक्ष्य रखा कि अव्यक्त अर्थात् फ़रिश्ता स्वरूप बनना और बनाना है। सभी ने यही लक्ष्य रखा था ना, फिर रिजल्ट क्या निकली? अपने आपको चेक किया? ‘़फरिश्ता भव' का वरदान भी वरदाता से मिला तो वरदान और लक्ष्य - दोनों की स्मृति से कहाँ तक सफलता अनुभव की है, ये सूक्ष्म चेकिंग स्वयं की की? वा ये सोचा कि अव्यक्त वर्ष पूरा हुआ, यथाशक्ति जितना भी अनुभव किया उतना ही ड्रामानुसार ठीक रहा? वर्ष परिवर्तन के साथ-साथ स्व परिवर्तन की गति क्या रही - इस विधि से चेक किया? जैसे वर्ष समाप्त हुआ वैसे स्वयं लक्ष्य और लक्षण में सम्पन्न बनें वा ये सोचते हो कि इस वर्ष में और बन जायेंगे? समय और स्वयं की गति समान रही? वैसे तो समय से भी स्वयं की गति तीव्र होनी है क्योंकि समाप्ति के समय को लाने वाली आप विशेष आत्मायें निमित्त हो। तीव्र गति से वर्ष तो सम्पन्न हो गया। मालूम हुआ वर्ष कैसे पूरा हो गया? तो चेक करो मुझ विशेष आत्मा की परिवर्तन की गति तीव्र रही वा कभी तीव्र, कभी मध्यम रही?
फ़रिश्ता अर्थात् जिसका पुराने संस्कार और संसार से रिश्ता नहीं। तो चेक करो पुराने संसार की कोई भी आकर्षण, चाहे सम्बन्ध रूप में, चाहे अपने देह की तरफ आकर्षण वा किसी देहधारी व्यक्ति के तरफ आकर्षण, कोई वस्तु की तरफ आकर्षण कितने परसेन्ट में रही? ऐसे ही पुराने संस्कार की आकर्षण, चाहे संकल्प रूप में, वृत्ति के रूप में, वाणी के रूप में, सम्बन्ध-सम्पर्क अर्थात् कर्म के रूप में कितनी परसेन्ट रही? फ़रिश्ता अर्थात् डबल लाइट। तो निजी लाइट स्वरूप स्मृति स्वरूप में कहाँ तक रहा? साथ-साथ लाइट अर्थात् हल्कापन, स्व के परिवर्तन के पुरुषार्थ में कहाँ तक लाइट अर्थात् हल्के रहे? मन अर्थात् संकल्प शक्ति में व्यर्थ को समर्थ में परिवर्तन करने में अर्थात् व्यर्थ के बोझ को हल्का करने में कहाँ तक सफल रहे? इसी प्रकार व्यर्थ समय, व्यर्थ संग, व्यर्थ वातावरण - इस सबमें कहाँ तक परिवर्तन करने में हल्के रहे? ब्राह्मण परिवार के सम्बन्ध में, सेवा के सम्बन्ध में कहाँ तक हल्के रहे? इसको कहा जाता है फ़रिश्तापन के तीव्र गति की स्थिति। इस विधि से चेक करो और भविष्य के लिये चेन्ज अर्थात् परिवर्तन करो। अपने ब्राह्मण जन्म की विशेषता को नेचरल नेचर बनाना इसको ही सहज पुरुषार्थ कहा जाता है। सिर्फ एक विशेष आत्मा हूँ - इस स्मृति स्वरूप में स्थित हो जाओ तो बाप समान बनना अति सहज अनुभव करेंगे क्योंकि स्मृति स्वरूप सो समर्थी स्वरूप बन जाते हैं। वर्ष तो पूरा हुआ। बापदादा रिजल्ट तो देखेंगे ना। तो रिजल्ट में यथाशक्ति मैजारिटी हैं और सदा शक्तिशाली, यथाशक्ति के मैजारिटी में मैनारिटी हैं।
स्मृति दिवस भी बहुत स्नेह से मनाया। अब विशेष जैसे स्नेह से मनाया, वैसे स्नेह का सबूत बाप समान स्मृति स्वरूप बनना ही है। सुना रिजल्ट? आगे क्या करना है? यथाशक्ति या सदा शक्ति स्वरूप? तो देखेंगे इस वर्ष में मैजारिटी सदा शक्तिशाली का सबूत कहाँ तक देते हैं? टीचर्स क्या समझती हो? किस लाइन में आयेंगे? सदा शक्तिशाली! सबका टी.वी. में फोटो निकल रहा है। क्या भी हो जाये, कैसी भी परिस्थिति बन जाये लेकिन सदा शक्तिशाली। नाम नोट होते हैं ना कौन-कौन किस ग्रुप में आये? अभी टीचर्स का सम्मेलन होने वाला है ना। तब तक की रिजल्ट सभी टीचर्स की क्या होगी? जिसको करना होता है वो कब को नहीं सोचता है। दृढ़ संकल्प का अर्थ है अब। साधारण संकल्प का अर्थ है कब हो जायेगा! तो ‘कब' वाले हो या ‘अब' वाले हो? शक्ति सेना बहुत बड़ी सेना है। ‘कब' वाली हो या ‘अब' वाली हो? पाण्डव क्या समझते हो? देखो नाम सबके नोट हैं। अभी नाम नहीं सुनाते हैं आखिर वो समय भी आ जायेगा जो नाम सुनायेंगे। समझा!
सबसे ज्यादा संख्या किस ज़ोन की आई है? देखेंगे पंजाब, इन्दौर क्या कमाल दिखाते हैं? टीचर्स भी ज्यादा आती हैं, संख्या ज्यादा तो टीचर्स भी ज्यादा होती। पंजाब वाले नम्बरवन लेंगे या सेकेण्ड? इन्दौर भी नम्बरवन लेंगे? और कर्नाटक क्या करेंगे? कौन-सा नाटक दिखायेंगे? कर-नाटक, तो हीरो नाटक दिखाना, ऐसा-वैसा नहीं दिखाना। और महाराष्ट्र तो महान् ही बनेंगे ना? और यू.पी. को क्या कहते हैं? यू.पी. में नदियां हैं अर्थात् यू.पी. पतित को पावन करने वाली है। पावन बनने-बनाने में नम्बरवन। तो यू.पी. वाले भी नम्बरवन बनेंगे। इस समय तो कोई भी नम्बर टू नहीं कहेंगे। राजस्थान तो है ही लक्की, जो राजस्थान में ही चरित्र भूमि है। हेड क्वार्टर राजस्थान में हैं ना। तो जहाँ हेड क्वार्टर है वो क्या बनेगा? हेड बनेगा ना! सभी खुशी से कह रहे हैं नम्बरवन लेकिन वहाँ जाकर ऐसे नहीं कहना कि क्या करें... कर नहीं सकते... चाहते तो नहीं, लेकिन हो जाता है... ऐसी भाषा सोचना भी नहीं। अच्छा, डबल विदेशी भी सेवा में रेस अच्छी कर रहे हैं और रेस में नम्बरवन आना है ना। देश वालों को हिम्मत दिलाने में विदेश अच्छा निमित्त बना है। इस हिम्मत दिलाने के कारण एक्स्ट्रा मदद भी मिलती है। समझा! इसी को स्मृति में रख सहज बढ़ते चलो और बढ़ाते चलो। अच्छा!
चारों ओर की सर्व विशेष आत्माओं को, सदा साकार ब्रह्मा बाप के श्रेष्ठ कर्मों को फ़ालो करने वाले कर्मयोगी आत्माओं को, सदा विशेषता को नेचुरल और नेचर बनाने वाली कोटों में कोई आत्माओं को, सदा दृढ़ संकल्प द्वारा विशेष जन्म, धर्म और कर्म के स्मृति स्वरूप आत्माओं को बापदादा का विशेषता सम्पन्न याद-प्यार और नमस्ते।
दादियों से मुलाकात - आप ब्राह्मण जितने सम्पन्न बनते जायेंगे उतना भविष्य में प्रकृति भी प्रगति को प्राप्त करेगी क्योंकि प्रकृति समय प्रति समय अपना सिग्नल दिखा रही है। तो जितनी प्रकृति की हलचल उतनी अचल स्थिति प्रकृति को परिवर्तन करेगी। कितनी आत्मायें समय प्रति समय दु:ख की लहर में आती है। तो ऐसे दु:खी आत्माओं का सहारा तो बाप और आप ही हो। तो रहम पड़ता है ना। जब समाचार सुनते हो तो क्या दिल में आता है? नथिंग न्यू, अपनी अचल स्थिति के लिये तो ठीक है लेकिन प्रकृति की हलचल से जब आत्मायें चिल्लाती हैं तो किसको चिल्लाती हैं? तो जब मर्सी, रहम मांगते हैं तो आप लोगों को उनके रहम की पुकार पहुँचती तो है ना! ये छोटी-छोटी आपदायें और तड़फाती हैं। ब्राह्मण सम्पन्न हो जाओ तो दु:ख की दुनिया सम्पन्न हो जाये। तो रहम पड़ता है या नहीं? रहम पड़ता है तो फिर क्या करते हो? फिर भी ईश्वरीय परिवार के हैं ना। तो परिवार का कोई भी दु:ख, सुख में परिवर्तन करने का संकल्प तो आता है ना। कोई परिवार में बीमार भी हो तो क्या संकल्प होता है? जल्दी ठीक हो जाये। तो चिल्लाते-चिल्लाते मरना और एकधक से परिवर्तन होना, फ़र्क तो है ना। महाविनाश और रिहर्सल का विनाश, फ़र्क है। महाविनाश अर्थात् महान् परिवर्तन। उसके निमित्त आप हो। सम्पन्न बनेंगे तो समाप्ति होगी। तो जो परेशान हैं वो तो समझते हैं कि प्रत्यक्षता का पर्दा खुल जाये, लेकिन स्टेज पर आने वाले हीरो एक्टर सम्पन्न तैयार होने चाहिये ना, तब तो पर्दा खुलेगा कि आधे में खुल जायेगा? परिवर्तन की शुभ भावना को तीव्र करना अर्थात् अपने को तीव्र गति से सम्पन्न बनाना। आप भी कभी कैसे, कभी कैसे होते हो तो प्रकृति भी कभी बहुत तीव्र गति से कार्य करती, कभी ठण्डी हो जाती। तो अभी क्या करना है? रहम की भावना इमर्ज करो, चाहे स्व प्रति, चाहे सर्व आत्माओं के प्रति। होती है ना! लहर फैलाओ। रहम की भावना से विघ्न भी सहज खत्म हो जायेंगे। जहाँ रहम होगा, वहाँ तेरा-मेरा की हलचल नहीं होगी। पूज्य स्वरूप, मर्सीफुल का धारण करो। ठीक है ना। अभी ये लहर फैलाओ। हर संकल्प में मर्सीफुल। संकल्प में होंगे तो वाणी और कर्म स्वत: ही हो जायेंगे। सब चिल्लाते भी क्या हैं? मर्सी-मर्सी। अच्छा!
अव्यक्त बापदादा की पर्सनल मुलाकात - माया की छाया से बचने का साधन है - बापदादा की छत्रछाया
सदा अपने को बापदादा की छत्रछाया के नीचे रहने वाली सदा सेफ आत्मायें अनुभव करते हो? सदा छत्रछाया है या कभी बाहर निकल जाते हो? या है बाप की छत्रछाया या है माया की छाया। तो माया की छाया से बचने का साधन है छत्रछाया। तो छत्रछाया में रहने वाले कितने खुश रहेंगे क्योंकि बेफिक्र बादशाह हो गये ना। फिक्र है तो खुशी गुम होती है। कभी भी देखो खुशी गुम होती है तो कारण क्या होता है? कोई न कोई चिन्ता, फिक्र, बोझ खुशी को गुम कर देता है। और खुशी गुम हुई, कमजोर हुए तो माया की छाया का प्रभाव पड़ ही जाता है। कमजोरी माया का आह्वान करती है। जैसे शारीरिक कमजोरी बीमारियों का आह्वान करती है तो आत्मिक कमजोरी माया का आह्वान करती है। फिर उस छाया से निकलने में कितनी मेहनत करनी पड़ती है। अगर माया की छाया स्वप्न में भी पड़ गई तो स्वप्न भी परेशान करेगा। फिर ब्राह्मण से क्षत्रिय बन जाते हैं तो युद्ध करनी पड़ती है। क्षत्रिय जीवन मेहनत की है और ब्राह्मण जीवन खुशी की है। तो क्या पसन्द है? कभी-कभी युद्ध करनी पड़ती है? युद्ध करना अच्छा लगता है? छोटे से भी व्यर्थ संकल्प की छाया कितनी मेह-नत कराती है इसलिए सदा बाप के याद की छत्रछाया में रहो। याद ही छत्रछाया है। तो सदाकाल के लिए छत्रछाया में रहना आता है? कभी-कभी के लिये नहीं, सदा। अविनाशी बाप है ना। तो वर्सा भी सदा का लेना है। सदा खुश रहने वाले। छत्रछाया अर्थात् खुश रहना। बेफिक्र होंगे ना। सब फिक्र बाप को दे दिया कि एक-दो सम्भाल कर रखा है? क्या करें..., कैसे करें..., ये शब्द फिक्र के हैं। बेफिक्र के बोल सदा विजय के होते हैं। ‘क्या', ‘कैसे' के नहीं होते। तो सदा ये याद रखो कि हम सभी बाप की छत्रछाया में रहने वाले हैं। चक्कर लगाने वाले नहीं। संकल्प में भी चक्कर में आये तो चक्कर में आने वाले चकनाचूर हो जायेंगे। आप तो अमर हो ना। अमर हो गये - ये स्मृति सदा ही स्वयं भी बेफिक्र और दूसरों को भी बेफिक्र बनाती रहेगी। सदा खुशी में ये गीत गाते रहेंगे पाना था वो पा लिया। बच्चा बनना माना पाना। बच्चा बने अर्थात् पा लिया। अच्छा!
वरदान:- सर्व रूहानी खजानों से सम्पन्न बन सदा सन्तुष्ट रहने वाले आलराउण्ड सेवाधारी भव
आलराउण्ड सेवाधारी अर्थात् मास्टर सुख दाता, मास्टर शान्ति दाता, मास्टर ज्ञान दाता। दाता सदा सम्पन्न मूर्त होते हैं। जैसा स्वयं होंगे वैसा औरों को बनायेंगे। रूहानी सेवाधारी अर्थात् एवररेडी और आलराउन्ड। आलराउन्डर वही बन सकते जो सम्पन्न हैं, सम्पन्न ही सन्तुष्ट होंगे और सबको सन्तुष्ट करेंगे। किसी भी प्रकार की अप्राप्ति असन्तुष्टता पैदा करती है। सन्तुष्ट रहने और सन्तुष्ट करने की विधि है सम्पन्न और दाता बनना।
स्लोगन:- शुभ भावना, शुभ कामना की गोल्डन गिफ्ट साथ हो तो किसी भी आत्मा का परिवर्तन कर सकते हो।
सूचनाः- आज मास का तीसरा रविवार है, सभी राजयोगी तपस्वी भाई बहिनें सायं 6.30 से 7.30 बजे तक, विशेष योग अभ्यास के समय अनुभव करें कि ज्ञान सूर्य सर्वशक्तिवान परमात्मा की किरणें मुझ पर पड़ रही हैं और मुझसे सारे संसार में जा रही हैं, जिससे संसार से अज्ञान-अंधकार दूर होता जा रहा है।
18.03.2023 HINDI MURLI
मीठे बच्चे - मोस्ट बिलवेड बाप का यथार्थ परिचय देने की युक्तियां निकालनी हैं, एक्यूरेट शब्दों में अल्फ का परिचय दो तो सर्वव्यापी की बात खत्म हो जायेगी''
प्रश्नः- अविनाशी ज्ञान रत्न चुगने वाले बच्चों का फ़र्ज क्या है?
उत्तर:- ज्ञान की हर बात पर अच्छी रीति विचार सागर मंथन कर एक बाप की सबको सही पहचान देना। पुण्य आत्मा बनाने वाले के साथ-साथ पापात्मा किसने बनाया - यह समझ देना, तुम बच्चों का फ़र्ज है। सबको रावण के बेर चुगने से बचाए ज्ञान रत्न चुगाने हैं। सर्विस की भिन्न-भिन्न युक्तियां निकालनी हैं। सर्विस में बिजी रहने से ही अपार खुशी रहेगी।
गीत:- प्रीतम आन मिलो....
ओम् शान्ति। बाप परमपिता को हमेशा रचयिता कहा जाता है। मनुष्य कह देते यह पशु पक्षी आदि सारी रचना वह रचते हैं। परन्तु समझाना चाहिए पहले-पहले मनुष्य की बात तो समझो। परमपिता जो रचता है वह मनुष्य सृष्टि कैसे रचते हैं। मनुष्य ही उनको बाप कह बुलाते हैं क्योंकि दु:खी हैं। सभी उस एक रचयिता को याद करते हैं। तो पहले-पहले यह समझाना है कि मनुष्य सृष्टि का रचयिता कौन है। वह रचयिता ही सबका बाप ठहरा। पहले-पहले बाप का परिचय देना है। आत्मा को न अपना, न बाप का परिचय है। अगर अहम् आत्मा का परिचय हो तो समझें कि हम किसकी सन्तान हैं! हम परमपिता परमात्मा की सन्तान हैं। वह बाप रचयिता है तो जरूर पहले-पहले मनुष्य सृष्टि रचते होंगे, वह नई दुनिया अथवा स्वर्ग होगी। बाप जरूर स्वर्ग ही रचेंगे। बाप दु:ख के लिए रचना रचें, यह हो नहीं सकता। जबकि हम उस बाप के बच्चे हैं, जो बाप स्वर्ग रचता है तो हम भी वहाँ होने चाहिए या परमधाम में होने चाहिए। परन्तु हमको यहाँ पार्ट बजाने आना पड़ता है। यह है विचार सागर मंथन करने की युक्तियां। जितना समय मिले तो यही विचार सागर मंथन करना है। साधू सन्त आदि कोई भी यथार्थ रीति बाप को जानते नहीं हैं। रचयिता जरूर स्वर्ग ही रचेंगे तो फिर सब आत्मायें निर्वाणधाम में होनी चाहिए। वह निर्वाण-धाम है हम सब आत्माओं का घर, जहाँ बाप भी रहते हैं। तुम बच्चों को बेहद के बाप से बुद्धियोग जोड़ने लिए मेहनत करनी पड़ती है। योग न होने के कारण ही फिर मनुष्य से पाप होते हैं या धारणा नहीं हो सकती है। बाप को याद नहीं करते। भगवान तो एक ही है। वह है मोस्ट बिलवेड स्वर्ग का रचयिता। वहाँ बहुत सुख है। यहाँ दु:ख होने के कारण ही भगवान को याद करते हैं। बाप बच्चों को सुख के लिए ही जन्म देते हैं। सतयुग त्रेता को कहा ही जाता है सुखधाम। अभी है कलियुग। इनके बाद फिर सतयुग आना है। तो जरूर बाप को भी आना चाहिए। ऐसे-ऐसे विचार सागर मंथन कर फिर कोई को बैठ समझाना चाहिए। यहाँ तुमको बाप का परिचय मिलता है बाप द्वारा। मनुष्य उस मोस्ट बिलवेड बाप को जानते नहीं। बाप को जानते ही नहीं तो अपने को उसके बच्चे भी समझते नहीं। हमने बाप को जाना है तो उनको याद करते हैं। वह बेहद का बाप है सभी आत्माओं का। वह निराकार इस साकार प्रजापिता द्वारा रचना रचते हैं। प्रजापिता ब्रह्मा है, ब्राह्मण ब्राह्मणियां भी हैं। जरूर प्रजापिता ब्रह्मा का बाप परमपिता ही होगा, जिसको क्रियेटर कहा जाता है। कोई भी आते हैं तो पहले-पहले बाप का परिचय देना है। जब अल्फ याद पड़े तब फिर आगे समझ सकें। अल्फ बिगर कुछ भी समझ नहीं सकेंगे। वह भी समझाना ऐसे है जो मनुष्य समझें इन्हों की समझानी तो बड़ी एक्यूरेट दिखाई पड़ती है। ऐसे और तो कोई नहीं समझायेंगे कि वह बेहद का बाप स्वर्ग का रचयिता है। जरूर नर्क का भी रचयिता कोई होगा। पावन बनाने वाला एक बाप है तो जरूर पतित बनाने वाला भी कोई एक होगा। यह अच्छी रीति समझाना है। बाप कौन है जिसको हम याद करते हैं। रावण को तो याद नहीं करेंगे। मनुष्य तो न पावन बनाने वाले राम परमात्मा को जानते, न पतित बनाने वाले रावण को जानते, बिल्कुल ही अन्जान हैं। फार्म भराने समय भी पहले बाप का परिचय देना है। तुम्हारी आत्मा का बाप कौन है, यह प्रश्न और कोई पूछ न सके। आत्मा तो हर एक मनुष्य में है। जीव आत्मा, पाप आत्मा, पुण्य आत्मा कहा जाता है ना। पुण्य आत्मा तो बाप ही बनाते हैं फिर इनको पाप आत्मा कौन बनाते हैं? यह जरूर समझाना पड़े। बाप जो स्वर्ग का रचयिता है, जिसके हम सभी बच्चे हैं उनको तुम जानते हो? वह तो जरूर पावन दुनिया ही रचते होंगे? अभी है पतित दुनिया, इसलिए मनुष्य गाते भी हैं हे पतित-पावन आओ। इतने सब पतित मनुष्यों को पावन कौन बनाये? सर्वव्यापी है फिर तो यह बात नहीं उठती कि परमपिता परमात्मा आओ। सर्वव्यापी है फिर तो उसको याद करने की भी दरकार नहीं। अभी हम आपको बहुत अच्छी राय देते हैं। ब्रह्मा की राय तो मशहूर है ना। हम ब्रह्मा मुख वंशावली ब्राह्मण ब्राह्मणियां हैं। ब्रह्मा को भी राय देने वाला जरूर ऊंच होगा। ब्रह्मा वल्द परमपिता परमात्मा शिव। वह है आत्माओं का पिता। वह है प्रजापिता। तुम बच्चे सर्विस के लिए ऐसे-ऐसे विचार सागर मंथन करेंगे तो तुमको बहुत खुशी रहेगी। कोई आये तो उनको ज्ञान रत्न देने हैं। बाप आकर अविनाशी ज्ञान रत्न चुगाते हैं, जिससे हम विश्व के मालिक बनते हैं। फिर रावण आकर बेर चुगाते हैं। शिव का चित्र, देवताओं के चित्र सब पत्थर के ही हैं। पत्थर को पूजते-पूजते पत्थरबुद्धि बन जाते हैं। शिव का भी पत्थर का चित्र है। जरूर कोई समय शिवबाबा चैतन्य में आकर पढ़ाते होंगे। प्रजापिता ब्रह्मा भी होगा। ब्रह्माकुमारी सरस्वती भी होगी। अब प्रैक्टिकल में है। इनके लिए गायन है सबकी मनोकामना पूरी करने वाली। अविनाशी ज्ञान रत्न दान करने वाली गॉडेज आफ नॉलेज। उन्होंने फिर सरस्वती को बैन्जो दे दिया है। यह सब बातें बुद्धि में आनी चाहिए, जिसको भाषण करना है तो विचार सागर मंथन करना होता है। पहले भाषण लिख रिफाइन करना चाहिए। बड़े-बड़े स्पीकर्स जो होते हैं वह बहुत खबरदारी से बोलते हैं। बिल्कुल एक्यूरेट सुनाते हैं। जरा भी हिचका तो आबरू (इज्जत) चली जायेगी। पहले से ही पूरी प्रैक्टिस करते हैं। यहाँ भी इतना बुद्धि में रहना चाहिए जो किसको बाप का परिचय दे सको। सर्विस करनी है। विकारी गुरूओं की जंजीरों में बहुत फॅसे हुए हैं। वह कोई की सद्गति तो कर नहीं सकते। पतित-पावन निराकार भगवान को ही कहा जाता है। सर्वव्यापी के ज्ञान से तो कोई की सद्गति हुई नहीं है। पतित-पावन है एक शिवबाबा उनको रूद्र भी कहा जाता है। रूद्र यज्ञ भी मशहूर है। इतना बड़ा यज्ञ और कोई रच न सके। रूद्र ज्ञान यज्ञ कितने वर्ष चलता है? ज्ञान सुनाते ही रहते हैं। यज्ञ जब रचते हैं तो उसमें शास्त्र भी रखते हैं। रामायण, भागवत आदि की कथा सुनाते हैं, उसको रूद्र यज्ञ कहते हैं। वास्तव में रूद्र यज्ञ यह है। यह यज्ञ तो बहुत समय चलता है। उन्हों का तो करके मास भर यज्ञ चलेगा। यह तो देखो कितना समय चलता है। इसमें जो भी सब पुरानी चीजें हैं वह खत्म होनी हैं। यह सारी पुरानी दुनिया इसमें भस्म होनी है। कितना बड़ा यज्ञ है, ख्याल तो करो। जब सबके शरीर स्वाहा हो तब सभी आत्मायें वापिस परमधाम जायें। जब तक बाप न आये तो पतित से पावन कैसे बनें, माया की जंजीरों से लिबरेट कौन करे? कोई तो होना चाहिए नाइसलिए खुद मालिक ही आते हैं। ऐसे नहीं सर्वव्यापी हो बैठकर ज्ञान देते हैं, वह तो आते हैं। हम उनकी सन्तान पोत्रे हैं। वास्तव में हो तुम भी। अब वह बाप आया हुआ है, अपना परिचय दे रहे हैं। स्वर्ग की स्थापना हो रही है। हम हैं राजयोग ऋषि, वह हैं हठयोग ऋषि। इस पर शायद एक कहानी भी सुनाते हैं कि फलाने ऋषि का वजन भारी है या राजऋषि का वज़न भारी है। वह हैं सब भक्ति मार्ग की बातें और यह है ज्ञान मार्ग। भक्ति और ज्ञान के तराजू की कुछ कथा है। एक तरफ हैं सब भक्ति के शास्त्र, दूसरे तरफ है एक ज्ञान की गीता। तो भारी एक गीता हो जाती है। गीता है राजऋषियों की, हठयोगियों के तो बहुत शास्त्र हैं। एक तरफ वह सब डालो दूसरे तरफ गीता डालो। वास्तव में वह भी कोई हमारी है नहीं। हमारी तो है ही ज्ञान की बात। गीता का भगवान आता ही है सद्गति करने के लिए। तो बच्चों की बुद्धि में यह सब रहना चाहिए। फिर कोई समझे न समझे, अपना फ़र्ज है हर एक को समझाना। मौत के समय सभी की आंखे खुलेंगी। इस ज्ञान यज्ञ से ही यह विनाश ज्वाला निकली है। अब तुम पाण्डवों का पति है परमपिता परमात्मा। पतितों को पावन बनाने वाला है ही एक परमात्मा न कि श्रीकृष्ण। वह तो प्रिन्स है। उनको कोई गॉड फादर नहीं कहेंगे। फादर तब कहा जाता है जब बच्चे पैदा करते हैं। श्रीकृष्ण तो खुद ही बच्चा है तो उसको फादर कैसे कहा जाए। लॉ नहीं कहता। श्रीकृष्ण के साथ फिर जोड़ी चाहिए। उनके बच्चे चाहिए तब फादर कहा जाए। वह तो फिर गृहस्थी हो गया। यहाँ तो निराकार बाप बैठ ज्ञान देते हैं। वह कभी गृहस्थ में आते नहीं, सदा पवित्र हैं। श्रीकृष्ण तो माता के गर्भ से जन्म लेते हैं तो उनको पतित-पावन कैसे कहेंगे। अभी तुम बच्चे जानते हो परमपिता परमात्मा को प्रजापिता ब्रह्मा के तन में ही आना है। प्रजापिता तो जरूर यहाँ ही होना चाहिए ना, इसलिए उनका नाम ब्रह्मा रख कहते हैं मैं इस साधारण तन में प्रवेश करता हूँ। यह 84 जन्म भोग अभी अन्तिम जन्म में है और वानप्रस्थ अवस्था में पूरा अनुभवी रथ है। अर्जुन के लिए भी कहते हैं ना बहुत गुरू किये थे। शास्त्र आदि पढ़े थे तो समझाना भी ऐसे चाहिए। प्रजापिता ब्रह्मा का नाम कभी सुना है? ब्रह्मा है तो जरूर पहले ब्राह्मण चाहिए। वर्ण भी मुख्य हैं। चक्र में भी वर्ण दिखाते हैं। ब्राह्मण कुल है सबसे छोटा। उन्हों के ज्ञान लेने का समय भी थोड़ा है। कितने थोड़े ब्राह्मण हैं। फिर उनसे जास्ती देवतायें, उनसे जास्ती क्षत्रिय, उनसे जास्ती वैश्य, शूद्र। तो तुम ब्राह्मण कितने थोड़े हो। इन थोड़ों में भी वह बहुत थोड़े हैं, जिनको सदैव खुशी का पारा चढ़ा रहता है। बाप ने समझाया है खुशी का पारा चढ़ेगा अमृतवेले। दिन को और रात को वायुमण्डल बहुत गन्दा रहता है, उस समय याद मुश्किल रहती है। अमृतवेले का समय गाया हुआ है। उसी समय सभी आत्मायें थक कर शरीर से डिटैच होकर सो जाती हैं। वह है शुभ महूर्त। यूं तो बाप की याद चलते फिरते दिल में रहनी चाहिए। बाकी हठ से एक जगह बैठ याद करेंगे तो ठहरेगी नहीं। ऋषि मुनि भक्त लोग भी अमृतवेले उठ कीर्तन आदि करते हैं क्योंकि उस समय शुद्ध वायुमण्डल रहता है। तो कोई भी आये उनको समझाना है कि हम पढ़ रहे हैं। इसमें कोई अन्धश्रधा की तो बात ही नहीं। निराकार बाप टीचर के रूप से हमको सहज राजयोग सिखा रहे हैं। तो मनुष्य आश्चर्य खायेंगे कि इन्हों को निराकार कैसे पढ़ाते हैं। भगवानुवाच भी बरोबर है तो जरूर शरीर में आकर राजयोग सिखाया होगा। कोई शरीर का लोन लिया होगा तो पहले युक्ति से बाप का परिचय देना चाहिए। सर्वव्यापी कहने से वर्सा क्या मिलेगा। जब तक भगवान के महावाक्य कानों पर न पड़े तब तक कोई समझ न सके। भगवान है निराकार, ब्रह्मा है साकार प्रजापिता, तुम हो ब्रह्माकुमार कुमारियां। निराकार परमात्मा ब्रह्मा तन से पढ़ाते हैं। हमारा एम आबजेक्ट है मनुष्य से देवता बनना। बाप का परिचय देंगे तो बाप की याद रहेगी। कोई-कोई लिखते हैं भगवान निराकार है, तो उनको समझाना चाहिए। कोई फिर लिखते हैं कि हम जानते ही नहीं, अरे तुम बाप को नहीं जानते हो? परमपिता परमात्मा कहते हो तो जरूर कोई तो होगा ना! बच्चे तो जानते हैं हम परमपिता परमात्मा से भविष्य जन्म-जन्मान्तर के लिए आजीविका प्राप्त करते हैं। इसमें जो विघ्न डालते हैं उन पर कितना पाप चढ़ता होगा। सो भी समझकर विघ्न डालते हैं! बेसमझ पर तो कोई दोष नहीं। वह तो सारी दुनिया बेसमझ है। अच्छा!
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का यादप्यार... इसके एक-एक अक्षर का अर्थ तुम बच्चे जानते हो। पहले-पहले मात-पिता फिर बापदादा। मात-पिता उनको कहा जाता जो स्वर्ग का मालिक बनाते हैं। फिर यह हो गये बापदादा। फिर कहते जगदम्बा, यह बड़ी गुह्य बातें हैं। सबसे गुह्य पहेली यह है, जिसको समझने से मनुष्य को बहुत फ़ायदा हो जाए। फिर कहते हैं सिकीलधे, यह है दूसरी पहेली। फिर कहते हैं ब्राह्मण कुल भूषण, स्वदर्शन चक्रधारी - यह भी नई पहेली है। एक-एक बात में पहेली है। अच्छा!
स्वदर्शन चक्रधारी नूरे रत्नों प्रति यादप्यार और गुडमार्निग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।
धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) अमृतवेले के शुभ महूर्त में बाप को बहुत प्यार से याद कर खुशी का पारा चढ़ाना है। चलते-फिरते भी याद का अभ्यास करना है।
2) पाप कर्मों से बचने वा ज्ञान की अच्छी धारणा करने के लिए एक बाप से बुद्धियोग जोड़ने की मेहनत करनी है।
वरदान:- बिन्दू रूप में स्थित रह सारयुक्त, योगयुक्त, युक्तियुक्त स्वरूप का अनुभव करने वाले सदा समर्थ भव
क्वेश्चन मार्क के टेढ़े रास्ते पर जाने के बजाए हर बात में बिन्दी लगाओ। बिन्दू रूप में स्थित हो जाओ तो सारयुक्त, योग-युक्त, युक्तियुक्त स्वरूप का अनुभव करेंगे। स्मृति, बोल और कर्म सब समर्थ हो जायेंगे। बिना बिन्दू बने विस्तार में गये तो क्यों, क्या के व्यर्थ बोल और कर्म में समय और शक्तियां व्यर्थ गवां देंगे क्योंकि जंगल से निकलना पड़ेगा इसलिए बिन्दू रूप में स्थित रह सर्व कर्मेन्द्रियों को आर्डर प्रमाण चलाओ।
स्लोगन:- “बाबा'' शब्द की डायमण्ड चाबी साथ रहे तो सर्व खजानों की अनुभूति होती रहेगी।
17.03.2023 HINDI MURLI
“मीठे बच्चे - बाप समान रहमदिल बन हर एक को जीयदान देना है, ऐसा प्रबन्ध करना है जो बहुत मनुष्यों का सौभाग्य बने''
प्रश्नः- इस समय दुनिया में हर एक मनुष्य गरीब है इसलिए उन्हें कौन सी सहुलियत तुम्हें देनी है?
उत्तर:- तुम्हारे पास जो भी अविनाशी ज्ञान रत्नों रूपी रोटी लेने के लिए आते हैं उनकी झोली बहुत प्यार से तुम्हें भरनी है, सभी को सुख देना है। हर एक को प्यार से चलाना है, कोई भी रूठ न जाये। तुम्हारे पास बहुत मनुष्य आते हैं अपना जीयदान लेने इसलिए भण्डारे खोलते जाओ। उन्हें खुशनसीब बनाने के लिए तुम्हारा दरवाजा सदा खुला रहना चाहिए। अगर जीयदान देने के बजाए लात मारते तो यह बहुत बड़ा पाप है।
गीत:- बचपन के दिन भुला न देना...
ओम् शान्ति। बच्चों ने गीत सुना। बेहद का बाप परमात्मा शिव ब्रह्मा तन से बैठ समझाते हैं कि बच्चे तुम मात-पिता के बने हो, यह बचपन भुला नहीं देना। वह लौकिक बचपन तो कभी भुलाया नहीं जाता है। घर में मॉ बाप के साथ बच्चे रहते हैं। माता-पिता को जानते बड़े होते जाते हैं। मॉ बाप के आक्यूपेशन आदि का उनको मालूम होता जाता है। अब यहाँ तुम बने हो निराकार बाप के बच्चे। बाप है भण्डारी, अविनाशी ज्ञान रत्नों का दान देते रहते हैं। तुम अविनाशी ज्ञान रत्नों से अपनी झोली भरते हो, भविष्य 21 जन्मों के लिए। अगर मात-पिता को भूल गये तो झोली फिर खाली हो जायेगी। तुम बच्चे यहाँ अपना जीवन ऊंच बना रहे हो। बड़ा भारी वर्सा ले रहे हो। यहाँ तुम बाप के पास आते हो बहुत मालामाल बनने। गरीब से साहूकार बनने, गरीब तो सब हैं। गरीब आते हैं, अपनी आजीविका बनाने अथवा 21 जन्मों के लिए अपना अधिकार अर्थात् वर्सा लेने लिए। तो उन्हों को अविनाशी ज्ञान खजाना लेने लिए तुम बच्चों को हर प्रकार की सहूलियत देनी है क्योंकि यह खजाना और कहाँ से तो मिल नहीं सकता। सभी को सुख देना है। हर एक को प्यार से चलाना है, जो कोई रूठ न जाये और अविनाशी ज्ञान रत्नों रूपी रोटी लेने आते हैं तो उन्हों की झोली भरनी है। लात नहीं लगानी है। बाप के पास बच्चे आते ही हैं भण्डारा भरपूर करने। गरीबों को दान मिलता है तो कितने खुश होते हैं। कोई मनहूस होते हैं वह तो गरीबों को लात मार देते। जो धर्मात्मा, रहमदिल होते हैं, वह बुलाकर भी कुछ न कुछ दे देते हैं। तुम बच्चे जानते हो इस समय दुनिया में सब गरीब हैं। भल स्थूल धन है परन्तु वह भी सब कंगाल बन जाने वाले हैं। पैसा सबका मिट्टी में मिल जाना है। उस धन का नशा होने कारण यह ज्ञान रत्नों का खजाना लेना उन्हों के लिए बड़ा कठिन है। बाप तो है ही गरीब-निवाज़, जो भी बच्चे बनते हैं फिर सगे वा लगे आते हैं - बाप से अपना ऊंच जीवन बनाने, 21 जन्मों के लिए गरीब से साहूकार बनने। सतयुग में तो बहुत साहूकार रहते हैं। भल नम्बरवार गरीब भी होते हैं परन्तु ऐसे गरीब नहीं होते जो झोपड़ियों में रहना पड़े। यहाँ तो कितना गन्द में रहते हैं। वहाँ ऐसी बात नहीं।
तो जहाँ तुम्हारे सेन्टर्स हैं, ब्रह्माकुमार कुमारियां हैं। उन्हों के पास बहुत मनुष्य आते हैं - अपना जीयदान लेने लिए। तुम बच्चे भण्डारे खोलते जाओ, जीयदान देने लिए। यह कितना पुण्य होता है। अगर भण्डारा खोलकर फिर बन्द कर दे तो बताओ इतने सबका हाल क्या होगा! दु:खी होंगे। हम जानते हैं बिचारे बहुत दु:खी कंगाल हैं। यहाँ आकर खुशनसीब बनते हैं। उनके लिए सदैव दरवाजा खुला रहना चाहिए। भविष्य 21 जन्मों का वर्सा मिलता है। सदा सुखी बनते हैं तो कितना दान देना चाहिए। शिवबाबा जो तुमको अविनाशी ज्ञान रत्न देते हैं वह फिर औरों को देना है। राजधानी स्थापन हो रही है ना। लक्ष्मी-नारायण का राज्य था, अब नहीं है फिर हिस्ट्री रिपीट होगी। तो बाप राजयोग सिखलाते हैं। तुमको फिर औरों को सिखाना है। ऐसा प्रबन्ध करना चाहिए - जहाँ बहुत मनुष्य आकर अपना सौभाग्य बनायें। सबको जीयदान देना है। अगर जीयदान देने से लात मारेंगे तो बहुत पाप चढ़ जायेगा। बहुत-बहुत प्यार से समझाना है। माया ऐसी है जो एकदम बेहोश कर देती है। ट्रेटर बनते हैं तो पहले से भी बदतर हो जाते हैं। हर एक सेना में ट्रेटर बनते हैं। कितनी जासूसी करते हैं। अपनी तो लड़ाई है ही माया के साथ। जो बच्चे बनकर फिर माया तरफ चले जाते हैं तो ट्रेटर बन जाते हैं। बहुतों को दु:खी करते हैं। कितनी अबलायें, कन्यायें बिचारी कैद हो जाती हैं। अपना ज्ञान है जबरदस्त। मॉ बाप का वर्सा विष पीना पिलाना बन्द हो जाता है। यह बहुत बुरा धन्धा है, इसलिए बीती सो बीती। आधाकल्प तो सब पतित बनते आये हैं, अब बाप कहते हैं बच्चे इनसे तुम्हारी बहुत बुरी गति हुई है। अब इस धन्धे को बन्द करो, यह पतित दुनिया है इसे कोई 16 कला सम्पूर्ण, सम्पूर्ण निर्विकारी दुनिया तो नहीं कहेंगे। सम्पूर्ण निर्विकारी थे सूर्यवंशी। राम सीता को भी चन्द्रवंशी, क्षत्रिय कहेंगे। मनुष्य तो उन्हों को भी भगवान समझ लेते हैं। तुम बच्चे जानते हो सूर्यवंशी और चन्द्रवंशी में रात दिन का फ़र्क है। वह 16 कला सम्पूर्ण नई दुनिया के मालिक वह 14 कला सम्पूर्ण, दो कला कम हो जाती हैं। दुनिया कुछ पुरानी हो जाती है। सूर्यवंशी का नाम बाला है। बच्चे कहते भी हैं बाबा हम तो सूर्यवंशी बनेंगे। दो कला कम भी क्यों हो। स्कूल में अगर कोई नापास होते हैं तो माँ बाप का भी नाम बदनाम करते हैं। पास होते हैं तो खुश होते हैं। नापास होते तो दिल घबराती है। कोई-कोई तो डूब मरते हैं। जो फुल पास होते हैं वह सूर्यवंशी लक्ष्मी-नारायण के घराने में जाते हैं। कल्प पहले भी ऐसे हुआ था। बरोबर इस समय बाप आकर पहले ब्राह्मण कुल स्थापन कर उनको बैठ पढ़ाते हैं, जो फिर सूर्यवंशी, चन्द्रवंशी बनते हैं, इसमें पढ़ना और पढ़ाना है। नहीं तो पढ़े हुए के आगे फिर भरी ढोयेंगे। यहाँ तुम्हारे सामने एम आबजेक्ट है। यहाँ अन्धश्रधा हो नहीं सकती। समझाया जाता है हम पाठशाला में पढ़ते हैं मनुष्य से देवता बनने। साक्षात्कार भी किया है तब तो कहते हैं हम लक्ष्मी-नारायण बनेंगे। सो ऐसे थोड़ेही बनेंगे। सिवाए बाप के कोई बना न सके। वह गीता सुनाने वाले भी कोई ऐसे नहीं कहेंगे कि हम राजाओं का राजा बनाते हैं। मनमनाभव, मेरे बच्चे बनो। वह तो प्रजापिता ब्रह्मा और जगदम्बा ही कह सकते हैं। अपने को कोई प्रजापिता ब्रह्मा भी कह न सके। कितना भी झूठा वेश बनावे परन्तु यह बातें समझा न सके। यह तो शिवबाबा ही समझाते हैं। मनुष्य थोड़ेही कहेंगे मनमनाभव, वो चक्र का राज़ थोड़ेही समझायेंगे कि कल्प कितने वर्ष का होता है। चक्र कैसे फिरता है। कोई नहीं जानते। तुम बच्चों को बहुत नॉलेज मिलती है। मोटी बुद्धि इतना पढ़ नहीं सकेंगे। इम्तहान है बहुत कड़ा। आई.सी.एस. इम्तहान में भी बहुत थोड़े साहस रखते हैं। गवर्मेन्ट भी समझती है इम्तहान कड़ा रखें तो कम पास होंगे। यहाँ भी लिमिट है। 8 नम्बर वन में जाते हैं फिर 108 हैं। इस समय करोड़ों भारतवासी होंगे। उनमें भी जो देवी-देवता धर्म के होंगे वह निकलेंगे। 33 करोड़ देवतायें गाये जाते हैं। उनमें 8 नम्बरवन सूर्यवंशी बनते हैं। प्रिन्स प्रिन्सेज भी बहुत होंगे ना। इम्तहान बहुत बड़ा भारी है। 8 विजय माला के दाने बनते हैं। इसमें भी एक तो है मम्मा कुमारी और यह फिर है बूढ़ा। मम्मा जवान है। अच्छा पढ़कर पद पाती है। यह भी बूढ़े पन में पढ़कर इम्तहान तो पास करते हैं ना। बाप से वर्सा लेने में मेहनत की बात है। तुम बच्चों को भगवान पढ़ाते हैं, यह तो बड़े ही भाग्य की बात है, जो भगवान का बनकर फिर उनकी सर्विस में लग जाएं। सिन्ध में तुम सब आये फिर उनसे कितने तो टूट गये। बाकी जो तीखे निकले उनकी तो कमाल है। कितने को आप समान बना रहे हैं। तो आफरीन देनी पड़े ना। भट्ठी से 300 निकले नम्बरवार। अब तो हजारों में हो गये हैं। नये-नये सेन्टर्स खुलते जाते हैं। कितने मनुष्य आकर अपनी जीवन हीरे जैसी बनाते हैं। बनकर फिर औरों को बनाना चाहिए। मुरझाये हुए को सुरजीत करना है। बड़े प्यार से एक-एक को हाथ करना होता है। कहाँ बिचारे के पैर खिसक न जायें। जितना जास्ती सेन्टर्स होंगे उतना जास्ती आकर जीयदान पायेंगे। पावन हीरे जैसा जीवन बनायेंगे। अभी तो पतित कौड़ी जैसा है। तो बाप कहते हैं पुरुषार्थ कर सूर्यवंशी में आ जाओ। बाप को याद करो। ऐसे नहीं कहते कि ब्रह्मा-विष्णु-शंकर को याद करो। बहुत मनुष्य पूछते हैं शंकर का क्या पार्ट है? प्रेरणा से कैसे विनाश कराते हैं? बोलो, यह तो गाया हुआ है, चित्र भी हैं। इस पर समझाया जाता है वास्तव में तुम्हारा कोई इन बातों से कनेक्शन है नहीं। पहले तो समझो हमको बाप से वर्सा लेना है। मनमनाभव हो जाओ। शंकर क्या करता, फलाना क्या करता, इसमें जाने की दरकार क्या है। तुम सिर्फ दो अक्षर पकड़ लो बाप और वर्से को याद करो तो राजधानी मिल जायेगी। बाकी शंकर को गले में सांप क्यों दिया है, योग में ऐसे क्यों बैठता.... इन बातों से कुछ कनेक्शन नहीं। मुख्य बात है ही बाप को याद करना। बाकी ऐसे-ऐसे तो ढेर प्रश्न उठायेंगे, इससे तुम्हारा क्या फ़ायदा। तुम सब बातें भूल जाओ।
बाप कहते हैं मुझे याद करो तो विकर्म विनाश होंगे। हम बाप का सन्देश देते हैं। याद नहीं करेंगे तो विकर्माजीत नहीं बनेंगे, फिर ज्ञान की धारणा कैसे होगी। उल्टे सुल्टे प्रश्न कोई पूछे तो बोलो पहले नॉलेज तो समझो। अपने को आत्मा समझ बाप को याद करो। बाकी सब बातें छोड़ दो। आगे चल समझते जायेंगे। वर्सा लेने की हिम्मत दिखाओ। हम बाप का सन्देश देते हैं फिर करो न करो तुम्हारी मर्जी। बाप के पास पवित्र बन जायेंगे तो फिर नई पावन दुनिया में ऊंच पद दिलायेंगे। स्वदर्शन चक्र फिराओ। 84 जन्मों के चक्र को याद करो बस। जितना जो याद करेंगे वही विजय माला में पिरोये जायेंगे और कुछ जप तप आदि नहीं करना है, इन सबसे छुड़ा देते हैं। द्वापर से लेकर तो हद का वर्सा लेते आये। अभी बेहद के बाप से बेहद का वर्सा लेना है। अभी तुम जो वर्सा लेते हो वह 21 जन्मों के लिए अविनाशी बन जाता है। वहाँ तुमको कोई यह पता नहीं पड़ता है कि हमने यह वर्सा कैसे पाया है वा यह अविनाशी वर्सा है। यह तुम अभी जानते हो कि हम 21 जन्म राज्य-भाग्य करेंगे। वहाँ तो सुख की ही मौज है। मनुष्य समझेंगे वर्सा हर एक को बाप से ही लेना है। परन्तु वहाँ है तुम्हारे अभी के पुरुषार्थ की प्रालब्ध, जो 21 जन्म चलती है। ऐसे नहीं कि उसी समय कोई अच्छे कर्म करते हो। यहाँ तो ऐसे अच्छे कर्म सीखते हो, जन्म बाई जन्म फिर तुम राजाई में आयेंगे। बाप फरमान करते हैं एक तो पवित्र बनो और मुझे याद करो। परन्तु माया भुला देती है। सृष्टि का चक्र कैसे फिरता है वह याद करने से हम चक्रवर्ती राजा रानी बनते हैं। कितनी सहज बात है। कन्याओं के लिए तो सबसे सहज है। अधर कुमारियों को फिर सीढ़ी उतरने में मेहनत लगती है। जहाँ तहाँ से कुमारियां जास्ती निकलती हैं। इस समय शादी करना तो पूरी बरबादी है। यहाँ शिव साजन के साथ सगाई करने से पूरी आबादी हो जायेगी, स्वर्ग में। तुम अभी गॉड फादरली सर्विस पर हो, इससे उजूरा क्या मिलेगा? तुम विश्व का मालिक बनेंगे। यह है सच्ची कमाई। तुम ब्राह्मण हाथ भरतू कर जायेंगे। यह तुम्हारी सच्ची कमाई है। बाकी सबकी है झूठी कमाई, तो हाथ खाली ही जायेंगे। अच्छा!
मीठे-मीठे सिकीलधे .. देखो सिकीलधे अक्षर का अर्थ कितना अच्छा है। ऐसे और कोई कह न सके। बहुत सिक-सिक से मिलते हैं। आत्मा परमात्मा अलग रहे बहुकाल.. तुम 5 हजार वर्ष बाद फिर आकर मिले हो, इनको कहते हैं बेहद के सिकीलधे बच्चे। बरोबर अब कल्प के संगम पर बाप से आकर मिले हो। फिर भिन्न नाम रूप में मिलेंगे। जिन्होंने कल्प पहले यह पढ़ा था उन्हों को ही बाबा पढ़ायेंगे फिर कल्प-कल्प पढ़ते रहेंगे। अच्छा!
मीठे-मीठे सिकीलधे स्वदर्शन चक्रधारी बच्चों प्रति बापदादा का यादप्यार और गुडमार्निग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।
धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) मुरझाये हुए को सुरजीत बनाना है। प्यार से एक-एक को सम्भालना है। किसी भी कारण से किसी के पैर खिसकने न पायें - यह ध्यान रखना है।
2) पावन दुनिया में ऊंच पद के लिए दूसरे सब प्रश्नों को छोड़ बाप और वर्से को याद करना है। स्वदर्शन चक्र फिराना है। बहुतों को जीयदान देने की सेवा करनी है।
वरदान:- बिन्दू की मात्रा के महत्व को जान बीती को बिन्दी लगाने वाले सहजयोगी भव
सबसे सरल मात्रा बिन्दी है। बापदादा सिर्फ बिन्दी का हिसाब बताते हैं। स्वयं भी बिन्दु रूप बनो, याद भी बिन्दु को करो और ड्रामा के हर दृश्य को जानने करने के बाद बिन्दु की मात्रा लगा दो। इस बिन्दु की मात्रा के महत्व को जान बीती को बिन्दी लगा दो, बिन्दू बन जाओ तो सहजयोगी बन जायेंगे। वैसे भी अब बिन्दी बन घर जाना है। घर में सब बिन्दू रूप में रहते जहाँ संकल्प, कर्म, संस्कार सब मर्ज हैं।
स्लोगन:- कर्मयोगी बन कर्म करते भी उपराम स्थिति में रहना अर्थात् उड़ता पंछी बनना।
16.03.2023 HINDI MURLI
मीठे बच्चे - बाबा आया है तुम बच्चों की महफिल में, अभी तुम ज्ञान अमृत की महफिल मना रहे हो, तुम्हारी मुसाफिरी अब पूरी हुई, वापस घर जाना है''
प्रश्नः- अनेक प्रकार के तूफानों में याद को सहज बनाने की विधि क्या है?
उत्तर:- शरीर निर्वाह करते 5-10 मिनट भी बुद्धि को शिवबाबा में लगाने की कोशिश करो, इस शरीर को भुलाते जाओ। मैं अशरीरी आत्मा हूँ, पार्ट बजाने के लिए इस शरीर में आई हूँ। अब फिर अशरीरी बन घर जाना है। ऐसे-ऐसे अपने साथ बातें करो। एक सत बाप के साथ बुद्धि का संग हो, दूसरे संग से अपनी सम्भाल करो तो याद सहज हो जायेगी।
गीत:- आ गये दिल में तू.....
ओम् शान्ति। बच्चों ने गीत सुना और अर्थ भी बच्चों ने दिल में समझा होगा। फिर भी बाप समझाते हैं क्योंकि अभी बाप इस महफिल में आये हुए हैं। महफिल तुम्हारी भी है, सारी दुनिया की भी है। भगवान कहते हैं मैं आता हूँ भक्तों की महफिल में, तो सब भक्त ठहरे। उनमें भी फिर खास उन भक्तों की महफिल में आता हूँ, जो भक्त मुझ परमपिता परमात्मा से वर्सा लेने आये हुए हैं। जिन आत्माओं की बुद्धि में अब परमपिता परमात्मा की याद है, उन्हों की महफिल में हाज़िर हूँ। महफिल में कुछ खिलाया, पिलाया जाता है। बाप कहते हैं तुम बच्चों को ज्ञान अमृत की महफिल करा रहा हूँ। जो आकर बाप के बने हैं, वह समझते हैं बाबा आया हुआ है - हमारी इस महफिल में। फिर नम्बरवार सबको वापिस ले जायेंगे। खास तुम बच्चों की महफिल है, आम सबकी है। जहाँ बाप होगा वहाँ हम बच्चे भी होंगे। बाप कहते हैं हम भी अशरीरी हैं, तुम भी जब अशरीरी थे तो मेरे पास थे। याद दिलाते हैं 5 हजार वर्ष हुए। लांग-लांग एगो कहते हैं ना। 5 हजार वर्ष से बड़ी मुसाफिरी होती नहीं। भारतवासी बच्चे यह भूले हुए हैं कि शिव भगवान कब आये थे, उनकी जयन्ती मनाते रहते हैं। कहते हैं आये थे जरूर, लांग-लांग एगो... परन्तु कब आये थे, यह कोई को पता नहीं। कोई कहेंगे लाखों वर्ष हुए, कोई क्या कहेंगे। एक्यूरेट तो कोई को पता नहीं है। यह तो बाप ही बता सकते हैं। कहते हैं बच्चे 5 हजार वर्ष पहले भी हम तुम बच्चों के पास इस महफिल में आया था। दुनिया में शिव जयन्ती तो मनाते हैं। उसी दिन उनसे जाकर पूछो कि बताओ इनको कितने वर्ष हुए? गांधी की जयन्ती मनायेंगे तो झट बता देंगे कि इतने वर्ष हुए... शिव का कोई बता नहीं सकते। परन्तु तुम बच्चे जानते हो शिव को तो बहुत समय हुआ जबकि आया था। वह तो कुछ भी जानते नहीं। कहते हैं जन्म मरण रहित है, नाम रूप से न्यारा है। अरे नाम रूप से न्यारा है तो फिर जयन्ती किसकी मनाते हो? तो नाम रूप से न्यारा हो नहीं सकता। जरूर भारत में ही आया था तब तो जयन्ती मनाते हो ना। फिर नाम रूप से न्यारा कैसे कहते हो? याद करते हो परन्तु वह कब आया था? जरूर भक्ति का समय जब पूरा होगा तब भगवान को घर बैठे आना पड़े। भगवान किस रूप में आते हैं, यह कोई भी नहीं जानते। बड़ा चतुराई से कोई से पूछना है और फिर समझाना है। भगवान तो है निराकार। तुम उनकी पूजा करते हो, कहते हो हे परमात्मा, हे भगवान, उनको कोई देवता नहीं कहेंगे। देवतायें हैं ब्रह्मा विष्णु शंकर तो इन चित्रों पर भी समझाना पड़े। तुम शिव के मन्दिर में जायेंगे तो उनसे पूछेंगे यह कब आये थे, कैसे आये? निराकारी दुनिया से तो सब आते हैं। परमपिता परमात्मा को पतित-पावन कहते हैं तो क्या किया? पतित को पावन कैसे बनाया? जरूर साकार में आकर मुख से समझाया होगा। कोई शिक्षा दी होगी। ऐसे ही तो कोई कह न सके। जरूर मनुष्य तन में ही आयेंगे। भगवान आते हैं नई रचना रचने। तो जरूर कोई के तन में आया होगा। गाया हुआ है ब्रह्मा मुख से मनुष्य सृष्टि रची गई। ब्राह्मण सृष्टि नाम नहीं लिखा हुआ है। ब्रह्मा मुख कंवल से मनुष्य रचे जाते हैं तो जरूर ब्रह्मा के बच्चे ब्राह्मण ही होंगे। प्रजापिता ब्रह्मा ने तो जरूर ब्राह्मण ब्राह्मणियां रचे होंगे। सिर्फ मेल रचें तो वृद्धि कैसे हो? सिर्फ फीमेल्स रचें तो भी वृद्धि कैसे होगी? इसलिए दोनों ही हैं ब्रह्माकुमार और कुमारियां। नहीं तो ब्राह्मण सम्प्रदाय कैसे बनें। परमपिता परमात्मा रचता बेशक है, ब्रह्मा द्वारा मनुष्य सृष्टि रची जाती है तो जरूर ब्रह्मा तन में आना पड़ता होगा। यह बातें जो अच्छी रीति समझकर और धारण करेंगे वही फिर समझा सकेंगे। जो पूरे राजयोगी होंगे बाप को और राजाई को याद करते होंगे, जिसके लिए ही बाबा कहते हैं बच्चे स्वदर्शन चक्रधारी बनो। सब तो पूरा याद करते नहीं हैं। बाबा के पास आते हैं, कहते हैं ज्ञान तो सहज है, चक्र को भी समझा है। 84 जन्मों का राज़ भी ठीक समझा है। 84 जन्म तो जरूर लेने हैं और जो पहले नम्बर वाले हैं वही 84 जन्म लेंगे, यह तो सब ठीक है। परन्तु याद में रहना, यह बड़ा मुश्किल है। योग में अनेक प्रकार के तूफान आते हैं, उनको कैसे वश करें? उसका उपाय क्या है? कौन सा टाइम है जिसमें अच्छी रीति याद कर सकें? तो बाबा ने समझाया यूँ तो चलते-फिरते, उठते-बैठते याद करो। अभी तुम यहाँ बैठे हो, हम तुमसे पूछते हैं स्त्री को याद करते हो? अब नाम स्त्री का सुना और झट बुद्धि भागी स्त्री के तरफ। बुद्धि का काम हो गया ना। वैसे ही तुम भल कोई भी काम शरीर निर्वाह अर्थ करो परन्तु शिवबाबा के पास बुद्धि लगाने की कोशिश करो। 5 मिनट 10 मिनट भी याद करो। हाँ यह माया भी विघ्न जरूर डालेगी। तूफान बड़ी जोर से आयेंगे डगमगाने के लिए। परन्तु फिर भी तुम अपना पुरुषार्थ करते चलो। इस शरीर को भुलाना अथवा बाप की याद में रहना, बात एक ही है। अपने को आत्मा अशरीरी समझना पड़े। मैं असुल अशरीरी था। पार्ट बजाने के लिए यह शरीर लिया है फिर अशरीरी बन घर जाता हूँ। बुद्धि में सिर्फ बाप और बाप का घर याद हो, बाप का घर वही है जहाँ अब जाना है। फिर यह बुद्धि में है कि बाप की प्रापर्टी है सतयुग। तो एक बाप की याद से वह भी याद आयेगी। भक्ति मार्ग अथवा ज्ञान मार्ग में बुद्धि तो और तरफ जाती है। कन्या की सगाई हो जाती है तो फिर एक दो की याद रहती है। भक्ति में कोई बैठेंगे तो भी माया विघ्न डालती है। बुद्धि धन्धे आदि तरफ चली जायेगी। माया की दुश्मनी है ना। भक्त देवताओं को याद करेंगे तो भी बुद्धि और तरफ भाग जायेगी। माया बुद्धि को ठिकाने लगने नहीं देती है। आफिस में जाते हो तो भी उसी कार्य में बुद्धि रहती है। इम्तहान पास किया है तब यह काम करना होता है। उसमें बुद्धि लग जाती है। अव्यक्त चीज़ में बुद्धि लगाने में माया हैरान करती है। भक्तों को भी बड़ी मुश्किल से साक्षात्कार होता है। जब बहुत तीव्र भक्ति करते हैं तब बाप खुश होते हैं। अभी तो भक्ति की बात ही नहीं। अभी तो है नॉलेज। वास्तव में भक्ति भी करनी चाहिए एक की। अव्यभिचारी भक्ति हो तो साक्षात्कार भी हो। आजकल तो व्यभिचारी बन गई है। सबको याद करते रहते हैं, तो बाबा साक्षात्कार भी नहीं कराते हैं। एक में पूरा निश्चय हो तो बाबा साक्षात्कार भी कराये। तो बाप समझाते हैं मुझ एक को याद करो। मुख से कुछ भी कहना नहीं है। तुम स्त्री को याद करते हो तो कुछ मुख से कहना पड़ता है क्या? ख्याल आया और बुद्धि भाग जाती है। यह बेहद का बाप तो सदा सुख देने वाला है। तो अब तुम्हारी सगाई कराते हैं, उस परमपिता परमात्मा से। तो उसको याद करने का प्रयत्न करो। माया तो तूफान लायेगी। सारी दुनिया दुश्मन बनेंगी, परन्तु बाप को नहीं भूलना। जितना बाप को याद करेंगे उतना विकर्म विनाश होंगे। ऐसे तो बहुत मनुष्य होते हैं जो सारा दिन भगवान का नाम भी नहीं लेते। बहुत खराब संग होता है इसलिए गाया जाता है संग तारे कुसंग बोरे..... सत परमपिता परमात्मा का संग ही पतित से पावन बनायेगा। अभी तो सारी दुनिया पतित है, उनको संग चाहिए पतित-पावन का। तो जरूर उनको यहाँ साकार में आना पड़े ना। सत है ही एक। सत की महफिल में तुम बैठे हो। जानते हो हम आत्माओं का संग अब परमपिता परमात्मा के साथ है। बाप कहते हैं मेरी याद से ही तुम्हारे विकर्म विनाश होंगे। अच्छा संग होगा तो मुरली सुनेंगे, बुद्धियोग एक बाप के साथ लगा रहेगा। तो ऐसा संग तारेगा अर्थात् पावन बनायेगा। पावन बनने बिगर उनके पास कोई जा नहीं सकते। बाप खुद ही सिखलाते हैं मेरे साथ कैसे योग लगाओ। पढ़ाने लिए खुद आकर सम्मुख होते हैं। बुद्धि का योग और संग तोड़ एक संग जोड़ना है तब विकर्म विनाश होंगे और कोई उपाय है नहीं। पावन दुनिया है स्वर्ग, वहाँ के सुख अपार हैं। ऐसे नहीं वहाँ भी दु:ख है, दैत्य हैं। वहाँ तो दु:ख का नाम निशान नहीं रहता, सो भी 21 जन्मों के लिए। बाप तो यहाँ आकर पढ़ाते हैं। भगवानुवाच हम तुमको राजाओं का राजा बनाने सहज राजयोग सिखाता हूँ। मनुष्यों की बुद्धि में तो श्रीकृष्ण का ही चित्र आ जाता है। तुम्हारी बुद्धि में है कि हमको पढ़ाने वाला शिवबाबा है, जो ही ज्ञान का सागर है। वही तुम बच्चों को नॉलेज दे रहे हैं। यह है स्वदर्शन चक्रधारी, त्रिकालदर्शी बनना। त्रिकालदर्शी माना तीनों कालों को जानना। सृष्टि के आदि मध्य अन्त को और तीनों लोकों को जानना। मूलवतन, सूक्ष्मवतन, स्थूलवतन को भी तुम जानते हो। तुम्हारे में भी नम्बरवार पुरुषार्थ अनुसार जानते हैं। बाकी इसमें तकलीफ कोई नहीं है। शरीर निर्वाह भी करना है। ऐसे नहीं कहा जाता कि कन्या को भी शरीर निर्वाह अर्थ माथा मारना है। कन्या को पति के पास रहना है। शरीर निर्वाह पति को करना है। कन्या को भी अपने पैरों पर खड़ा रहना है। एक कहानी है ना - एक कन्या ने बाप को कहा मैं अपना नसीब खाती हूँ। तो तुम कन्यायें भी अपना पुरुषार्थ कर रही हो। जितना पढ़ेंगे, श्रीमत पर चलेंगे तो 21 जन्म राज्य करेंगे। कन्याओं का काम है पढ़ना और ससुरघर जाना। तुमको भी विष्णुपुरी स्वर्ग में भेजा जाता है। जितना पढ़ेंगे उतना ऊंच पद पायेंगे। वह तो ऐसे ही करके कहानी सुनाते हैं। सच्ची-सच्ची बात यहाँ की है। बाप खुद बैठ उनका रहस्य सुनाते हैं। तुम सब कन्यायें हो। अधर कन्या भी अपना जीवन बना रही हैं। बाप ऐसे कर्म सिखलाते हैं जो कभी दु:खी वा विधवा नहीं होना पड़ेगा। परन्तु विरला ही कोई ऊंची तकदीर बनाते हैं। कोई तो बनाते-बनाते फिर आश्चर्यवत भागन्ती हो ऐसे बाप को भी फारकती दे देते हैं। डायओर्स भी दे देते हैं क्योंकि शिवबाबा बाप भी है तो पतियों का पति भी है। ऐसे बाप को बच्चे फारकती दे देते हैं। तकदीर को लकीर लगा देते हैं। सजनी है तो भी डायओर्स देने से कौड़ी तुल्य बन पड़ेगी। यह भी गाया हुआ है - आश्चर्यवत डायओर्स देवन्ती, फारकती देवन्ती.. जिस बाप से 21जन्म का राज्य भाग्य मिलता है, उनको भी फारकती दे देते। कोई तो आकर बाप का बनेंगे। कोई-कोई फिर महामूर्ख भी बनेंगे जो फारकती भी देंगे, डायओर्स भी देंगे। चलन से ही मालूम पड़ जाता है। विकार में जाते रहते फिर छिप-छिप कर बैठ जाते फिर लिख भेजते कि बाबा भूल हो गई, क्षमा करो। अब सौगुणा दण्ड तो चढ़ गया वह कैसे कैन्सिल हो सकता। सच बताने से आधा माफ भी हो जाए..... इसलिए बाबा कहते हैं छिपकर कभी विकार में नहीं जाना। न फैमिलियरटी में ही आना है। क्रोध भी बहुत भारी भूत है, बहुतों को दु:ख देते हैं। बाप को 5 विकारों का दान दे फिर वापिस ले तो पद भी भ्रष्ट हो जायेगा। अच्छा!
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का यादप्यार और गुडमार्निग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।
धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) अपनी ऊंच तकदीर बनाने के लिए विकर्म विनाश करने का पुरुषार्थ करना है। पढ़ाई पर पूरा ध्यान देना है।
2) कुसंग से अपनी सम्भाल करनी है। पतित-पावन बाप के संग से स्वयं को पावन बनाना है।
वरदान:- स्वदर्शन चक्रधारी बन हर कर्म चरित्र के रूप में करने वाले मायाजीत, सफलतामूर्त भव
जैसे बाप के हर कर्म चरित्र के रूप में गाये जाते हैं ऐसे आपके भी हर कर्म चरित्र के समान हों। जो बाप के समान स्वदर्शन चक्रधारी बने हैं उनसे कभी भी साधारण कर्म नहीं हो सकते। स्वदर्शन चक्रधारी की निशानी ही है सफलता स्वरूप। जो भी कार्य करेंगे उसमें सफलता समाई हुई होगी। स्वदर्शन चक्रधारी मायाजीत होने के कारण सफलता मूर्त होंगे और जो सफलतामूर्त हैं वह हर कदम में पदमापदम पति हैं।
स्लोगन:- खुशी के समर्थ संकल्पों की रचना करो तो तन-मन से सदा खुश रहेंगे।
15.03.2023 HINDI MURLI
“मीठे बच्चे - सर्विस में कभी सुस्त नहीं बनना है, विचार सागर मंथन कर बाबा जो सुनाते हैं, उसे एक्ट में लाना है''
प्रश्नः- बाप किन बच्चों पर सदा ही राज़ी रहते हैं?
उत्तर:- जो अपनी सर्विस आपेही करते हैं। बाप को फालो करते हैं, सपूत हैं। बाप के बताये हुए रास्ते पर चलते रहते हैं। ऐसे बच्चों पर बाप राज़ी रहता है। बाबा कहते बच्चे कभी भी अपने ऊपर अकृपा नहीं करो। अपने को सावधान करने के लिए अपनी एम आबजेक्ट का चित्र पाकेट में रखो और बार-बार देखते रहो तो बहुत खुशी रहेगी। राजाई के नशे में रह सकेंगे।
गीत:- ओम् नमो शिवाए...
ओम् शान्ति। जिसकी महिमा तुम बच्चे सुन रहे हो वह तुम्हारे सम्मुख बैठ तुमको राजयोग सिखा रहे हैं। जो कोई कुछ करके जाते हैं तो उनके पीछे उनकी महिमा गाई जाती है। जैसे शंकराचार्य अपने संन्यास धर्म को स्थापन करके गये हैं तो उनकी महिमा यहाँ ही अब जरूर होगी। संन्यासियों की डिनायस्टी नहीं कहेंगे। अन्य धर्मों में तो डिनायस्टी राजाओं की चलती है। संन्यासियों में राजाओं की डिनायस्टी नहीं चलती। जैसे क्रिश्चियन की राजाई चलती है। धर्म भी है, राजाई भी है। वैसे यह (देवताओं का) धर्म भी है और राजाई भी है, जिसके चित्र भी बने हुए हैं। नीचे राजयोग की तपस्या कर रहे हैं और ऊपर में राजाई का चित्र है। राजाई में तुम्हारा यहाँ का ही चित्र दिया जाता है। भविष्य का चित्र उसी नाम रूप वाला तो हाथ आ न सके। तुम जानते हो हम अभी राजयोग सीख रहे हैं। फिर ताज सहित राजाई करेंगे। वह नाम रूप आदि सब बदल जायेंगे। यह चित्र भी बच्चों को अपने पास रखना चाहिए। जो बच्चे समझते हैं हम भविष्य राजाई पद पायेंगे। हर एक जो भी ब्राह्मण कुल भूषण हैं और जिनको निश्चय है। निश्चय तो सभी को होता ही है। कहते हैं हम श्री नारायण को वरेंगे तो राजयोग का चित्र और ऊपर में राजाई का चित्र और उनके ऊपर शिवबाबा का चित्र हो। इस पर कान्ट्रास्ट दिखाया जाए - वह शंकराचार्य, यह है भगवान शिवाचार्य। यह ज्ञान का सागर है। शंकराचार्य ज्ञान सुनाने वाला ज्ञानवान है। वह किसलिए ज्ञान सुनाते हैं? हठयोगी कर्म संन्यासी बनाने। उनका चित्र ही अलग है। उनका आसन अलग होता है तो उनका भी चित्र बनाना चाहिए। हठयोगी आसन, गेरू कफनी, माथा मुड़ा हुआ.... ऐसे चित्र दिखाने चाहिए। तो कान्ट्रास्ट सिद्ध हो। उन्हों का पुनर्जन्म यहाँ ही होता है। इन बातों पर विचार सागर मंथन कर तुम बहुत काम वा सर्विस कर सकते हो। परन्तु विरला कोई ऐसा पुरुषार्थ करते हैं। माया सर्विस में बहुत सुस्त बनाती है, बहुत धोखा देती है। तो संन्यास धर्म का भी चित्र बनाए लिख देना चाहिए - शंकराचार्य द्वारा स्थापन किया हुआ हठयोग, कर्म संन्यास कब शुरू हुआ, कब पूरा होने वाला है। तुम कोई भी धर्म की तिथि, संवत सहित आयु निकाल सकते हो। सबका मठ पंथ अथवा धर्म पूरा एक ही समय होता है। तो ऐसी-ऐसी बातों पर विचार सागर मंथन कर फिर एक्ट में आना चाहिए। कान्ट्रास्ट दिखाना है। वह शंकराचार्य की स्थापना, यह भगवान शिवाचार्य की स्थापना। यह राजयोग आधाकल्प चलता है। शिवबाबा आते ही तब हैं जबकि हठयोग का विनाश हो और राजयोग की स्थापना होनी है। तो ऐसे युक्ति से चित्र बनाने चाहिए। वह हठयोग द्वापर से कलियुग अन्त तक चलता है। राजयोग की 21 जन्म राजधानी चलती है। फिर लिखना है - वह है हठयोग, उसमें घरबार छोड़ना पड़ता है, इसमें सारी पुरानी सृष्टि का संन्यास करना पड़ता है। अपने तो हर एक चित्र में लिखत है। और कोई के भी चित्र ऐसी लिखत से नहीं होते हैं। तुम तिथि-तारीख सभी जान सकते हो। तो घर में भी अपना राजयोग और राजाई का चित्र देख नशा चढ़ेगा। तुमको देवताओं के चित्र को हाथ जोड़ने की दरकार नहीं है। तुम तो स्वयं वह बनते हो। तो सामने चित्र देख खुशी का पारा चढ़ेगा और दिल दर्पण में अपना मुंह भी देखेंगे, हम ऐसे श्री नारायण को व श्री लक्ष्मी को वरने के लायक हैं? नहीं होंगे तो शर्म आयेगी। जो योग में रह विकर्म विनाश करते हैं, वही इतना ऊंच पद पा सकते हैं। यह है भविष्य के लिए पढ़ाई और सब पढ़ाईयां होती हैं इस दुनिया, इस जन्म के लिए। तुम्हारी भविष्य के लिए पढ़ाई है। यह बुद्धि में रहना चाहिए। मनुष्य जिनकी भक्ति करते हैं तो उनका चित्र पाकेट में रखते हैं। जैसे बाबा श्री नारायण का चित्र रखता था। परन्तु यह ज्ञान नहीं था कि हम ऐसे बनेंगे। अब तो जानते हैं हम यह बनेंगे। बाबा कहते हैं तुम नर से नारायण बन सकते हो। तो यह चित्र पाकेट में पड़ा हो। मित्र सम्बन्धियों आदि को चित्र पर समझाने से वह बहुत खुश होंगे। उन पर भी रहम करना है। फिर कोई समझे या न समझे। अपना काम है हर एक को समझाना। हमको भगवान राजयोग सिखाते हैं, सिवाए उनके और कोई राजयोग से लक्ष्मी-नारायण बना नहीं सकता। तो चित्र देखने से खुशी का पारा चढ़ेगा।
मनुष्य नौकरी पर जाते हैं तो रास्ते में कहाँ मन्दिर देखते हैं तो हाथ जोड़ते हैं। वह है भक्ति। तुमको तो ज्ञान है, हम यह हैं। हम जगदम्बा के बच्चे हैं। जगदम्बा नर से नारायण बनाने का कर्तव्य करती है। तुम भी करते हो ना। तुम भी मास्टर जगदम्बा हो ना। तुम्हारा यादगार मन्दिर भी है। तुम चैतन्य यहाँ बैठे हो। समझानी ऐसी क्लीयर हो जो मनुष्य समझें। देलवाड़ा मन्दिर भी कितना अच्छा यादगार बना हुआ है, नीचे तपस्या के चित्र ऊपर में वैकुण्ठ बनाया है। कैसा अच्छा मन्दिर बना हुआ है। तो यह चित्र बनाकर अपने दफ्तर में भी रख सकते हो, जिससे यह स्मृति आयेगी। मनमनाभव और स्वदर्शन चक्र की भी स्मृति आयेगी। शिवबाबा हमको यह पढ़ाते हैं फिर हम यह राजा रानी बनेंगे। आपेही चित्र बनाए अपने को सावधान करते रहो। हम पुजारी से सो पूज्य बनते हैं 21 जन्मों के लिए, तो चित्र से अपनी भी सर्विस होगी, दूसरे को भी समझाने की सर्विस होगी। ऐसे बच्चों पर बाप भी राज़ी रहेगा। बच्चे फालो नहीं करेंगे, सपूत नहीं बनेंगे तो बाप नाराज़ होगा। कहेंगे बच्चे अपने ऊपर अकृपा करते हैं। बाप के बताये हुए रास्ते पर नहीं चलने से पद भ्रष्ट हो जायेगा। तो ऐसे-ऐसे चित्रों से भी तुमको बहुत अच्छी मदद मिलेगी। तुम बहुत अच्छी रीति किसको समझा सकेंगे। वह है हठयोग, यह है राजयोग। वह गुरू लोग तो यह राजयोग सिखला न सके। हम बेहद के संन्यासी हैं। संन्यास का अर्थ ही है 5 विकारों का संन्यास। वह पवित्र बनते हैं, जंगल में जाकर। हम गृहस्थ व्यवहार में रहते कमल फूल समान पवित्र रहते हैं इसलिए यह अलंकार विष्णु को दिखाते हैं। हम ऐसे बनते हैं, समझाने में बड़ी अच्छी चतुराई चाहिए, बाप भी चतुर है ना। तुम्हें फिर दैवीगुण भी धारण करने है। बहुत स्वीट टेम्पर (मिजाज़) होना चाहिए। बाप के टेम्पर को देखो कितना प्यारा है। भल उनको कालों का काल भी कहते हैं, परन्तु वह कड़ा थोड़ेही है। वह तो समझाते हैं मैं आकर सबको ले जाता हूँ, इसमें डरने की तो कोई बात ही नहीं। तुम बच्चों को गुल-गुल (फूल) बनना है श्रीमत पर। तुम सब आत्माओं को भी पुराना शरीर छुड़ाए वापिस ले जाऊंगा। ड्रामा अनुसार तुमको जाना ही है। तुमको अब ऐसे कर्म सिखलाता हूँ, जो कर्म कूटना न पड़े फिर तुम सबको ले जाता हूँ। यह भी बतायेंगे - कैसे जाते हैं, कौन रहते हैं। आगे जब नजदीक होंगे तो सब बतायेंगे। जब तक जीते हैं नई-नई युक्तियां समझाते रहेंगे। बाप के डायरेक्शन पर अमल होता है तो बाप को खुशी होती है। सबको सर्विस में मदद मिलेगी। खुशी का पारा चढ़ेगा। बाबा युक्तियां तो बहुत बताते हैं। बड़े चित्र भी बनाए सेन्टर पर तुम रख सकते हो तो मनुष्य कान्ट्रास्ट देखें। अच्छा!
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का यादप्यार और गुडमार्निग। रूहानी बच्चों को रूहानी बाप की नमस्ते।
रात्रि क्लास - 28-3-68
बाप ने समझाया है ऐसी प्रैक्टिस करो, यहाँ सब कुछ देखते हुए, पार्ट बजाते हुए बुद्धि बाप की तरफ लगी रहे। जानते हैं यह पुरानी दुनिया खत्म हो जानी है। इस दुनिया को छोड़ हमको अपने घर जाना है। यह ख्याल और कोई की बुद्धि में नहीं होगा। और कोई भी यह समझते नहीं। वह तो समझते हैं यह दुनिया अभी बहुत चलनी है। तुम बच्चे जानते हो हम अभी अपनी नई दुनिया में जा रहे हैं। राजयोग सीख रहे हैं। थोड़े ही समय में हम सतयुगी नई दुनिया में अथवा अमरपुरी में जायेंगे। अभी तुम बदल रहे हो। आसुरी मनुष्य से बदल दैवी मनुष्य बन रहे हो। बाप मनुष्य से देवता बना रहे हैं। देवताओं में दैवीगुण होते हैं। वह भी हैं मनुष्य, परन्तु उनमें दैवीगुण हैं। यहाँ के मनुष्यों में आसुरी गुण हैं। तुम जानते हो यह आसुरी रावणराज्य फिर नहीं रहेगा। अभी हम दैवीगुण धारण कर रहे हैं। अपने जन्म-जन्मान्तर के पाप भी योग-बल से भस्म कर रहे हैं। करते हो वा नहीं वह तो हरेक अपनी गति को जानते। हरेक को अपने को दुर्गति से सद्गति में लाना है अर्थात् सतयुग में जाने लिये पुरुषार्थ करना है। सतयुग में है विश्व की बादशाही। एक ही राज्य होता है। यह लक्ष्मी-नारायण विश्व के महाराजन हैं ना। दुनिया को इन बातों का पता नहीं है। वन-वन से इन्हों की राजाई शुरू होती है। तुम जानते हो हम यह बन रहे हैं। बाप अपने से भी बच्चों को ऊंच ले जाते हैं इसलिये बाबा नमस्ते करते हैं। ज्ञान सूर्य, ज्ञान चन्द्रमा, ज्ञान लक्की सितारे। तुम लक्की हो। समझते हो बाबा बिल्कुल ठीक अर्थ सहित नमस्ते करते हैं। बाप आकर बहुत सुख घनेरे देते हैं। यह ज्ञान भी बड़ा वन्डरफुल है। तुम्हारी राजाई भी वन्डरफुल है। तुम्हारी आत्मा भी वन्डरफुल है। रचयिता और रचना के आदि मध्य अन्त का सारा नॉलेज तुम्हारी बुद्धि में है। तुमको आप समान बनाने लिये कितनी मेहनत करनी पड़ती है। हरेक की तकदीर है तो कल्प पहले वाली, फिर भी बाप पुरुषार्थ कराते रहते हैं। यह नहीं बता सकते कि आठ रत्न कौन बनेंगे। बताने का पार्ट ही नहीं है। आगे चल तुम अपने पार्ट को भी जान जायेंगे। जो जैसा पुरुषार्थ करेगा ऐसा भाग्य बनायेंगे। बाप है रास्ता बताने वाला। जितना जो उस पर चलेंगे। इनको तो सूक्ष्मवतन में देखते ही है, प्रजापिता ब्रह्मा यहाँ साथ में बैठा है। ब्रह्मा से विष्णु बनना सेकण्ड का काम है। विष्णु सो ब्रह्मा बनने में 5,000 वर्ष लगते हैं। बुद्धि से लगता है बात तो बरोबर ठीक है। भल त्रिमूर्ति बनाते हैं - ब्रह्मा-विष्णु-शंकर। परन्तु यह कोई नहीं समझते होंगे। अभी तुम समझते हो। तुम कितने पदमापदम भाग्यशाली बच्चे हो। देवताओं के पांव में पदम दिखाते हैं ना। पदमपति नाम भी बाला है। पद्मपति बनते भी गरीब साधारण ही हैं। करोड़पति तो कोई आते ही नहीं। 5-7 लाख वाले को साधारण कहेंगे। इस समय 20-40 हजार तो कुछ है नहीं। पदमपति कोई है सो भी एक जन्म के लिये। करके थोड़ा ज्ञान लेंगे। समझ कर स्वाहा तो नहीं करेंगे ना। सभी कुछ स्वाहा करने वाले थे जो पहले आये। फट से सभी का पैसा काम में लग गया। गरीबों का तो लग ही जाता है। साहूकारों को कहा जाता है अभी सर्विस करो। ईश्वरीय सर्विस करनी है तो सेन्टर खोलो, मेहनत भी करो। दैवीगुण भी धारण करो। बाप भी गरीब निवाज़ कहलाते हैं। भारत इस समय सभी से गरीब है। भारत की ही सभी से जास्ती आदमसुमारी है क्योंकि शुरू में आये हैं ना। जो गोल्डन एज में थे वही आयरन एज में आये हैं। एकदम गरीब बन पड़े हैं। खर्चा करते करते सभी खत्म कर दिया है। बाप समझाते हैं अभी तुम फिर से देवता बन रहे हो। निराकार गाड तो एक ही है। बलिहारी एक की है, दूसरों को समझाने की तुम कितनी मेहनत करते हो। कितने चित्र बनाते हो। आगे चलकर अच्छी रीत समझते जायेंगे। ड्रामा की टिक टिक तो चलती रहती है। इस ड्रामा की टिक टिक को तुम जानते हो। सारी दुनिया की एक्ट हूबहू एक्युरेट कल्प कल्प रिपीट होती रहती है। सेकण्ड बाई सेकण्ड चलती रहती है। बाप यह सभी बातें समझाते फिर भी कहते हैं मन्मनाभव। बाप को याद करो। कोई पानी वा आग से पार हो जाते हैं उससे फायदा क्या। इससे कोई आयु थोड़ेही बड़ी हो जाती है। अच्छा!
मीठे-मीठे सिकीलधे रूहानी बच्चों को बाप दादा का याद प्यार गुडनाईट।
धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) अपना मिजाज (टैम्पर) बहुत स्वीट बनाना है। श्रीमत पर बाप समान प्यारा बन स्वयं को गुलगुल (फूल) बनाना है।
2) अपने ऊपर आपेही कृपा करनी है। अपने को सावधान करने के लिए एम-आबजेक्ट को सामने रखना है। मित्र-सम्बन्धियों पर भी रहम करना है।
वरदान:- तीर्थ स्थान की स्मृति द्वारा सर्व पापों से मुक्त होने वाले पुण्य आत्मा भव
मधुबन महान तीर्थ है। भक्ति मार्ग में मानते हैं कि तीर्थ स्थान पर जाने से पाप खत्म हो जाते हैं लेकिन इसका प्रैक्टिकल अनुभव तुम बच्चे अभी करते हो कि इस महान तीर्थ स्थान पर आने से पुण्य आत्मा बन जाते हैं। यह तीर्थ स्थान की स्मृति अनेक समस्याओं से पार कर देती है। यह स्मृति भी एक ताबीज़ का काम करती है। कोई भी बात हो यहाँ के वातावरण को याद करने से सुख-शान्ति के झूले में झूलने लगेंगे। तो इस धरनी पर आना भी बहुत बड़ा भाग्य है।
स्लोगन:- रमता योगी बनना है तो नॉलेज और अनुभव की डबल अथॉरिटी वाले बनो।
14.03.2023 HINDI MURLI
“मीठे बच्चे - शिवबाबा अलौकिक मुसाफिर है जो तुम्हें खूबसूरत (सुन्दर) बनाता है, तुम इस मुसाफिर को याद करते-करते फर्स्ट-क्लास बन जाते हो''
प्रश्नः- हर एक गॉडली स्टूडेन्ट्स को संगमयुग पर कौन सा पुरुषार्थ करने की श्रेष्ठ मत मिलती है?
उत्तर:- गॉडली स्टूडेन्टस को श्रीमत मिलती है कि इस समय पावन बन राजाई पद पाने का पुरुषार्थ करो। हरेक अपना फिक्र करो और दूसरों को कहो कि बेहद के बाप का वर्सा लेने के लिए इस अन्तिम जन्म में पवित्रता की राखी बांधो, इस मृत्युलोक में वृद्धि करना बन्द करो। बाप का बनकर स्वर्ग के लायक बनो। बाप की मत पर इस समय वाइसलेस बनने से तुम 21 जन्म के लिए वाइसलेस बन जायेंगे।
गीत:- ओ दूर के मुसाफिर... Audio Player
ओम् शान्ति। यह रिकॉर्ड तो सब सुन रहे हैं दूर के मुसाफिर हमको भी साथ ले चल। तुम जानते हो हमारा मात-पिता वह है दूर का रहने वाला। यह मात-पिता नजदीक के रहने वाले हैं। सब मनुष्य उस दूर के मुसाफिर को याद करते हैं। दूर का मुसाफिर परिस्तान स्थापन करते हैं, जिसको स्वर्ग, हेविन कहा जाता है। वाइसलेस वर्ल्ड कहा जाता है। वहाँ दु:ख है ही नहीं। हे दूर के मुसाफिर - यह कौन पुकारते हैं? अगर सबमें परमात्मा है तो वह तो नहीं पुकारेंगे कि हे परमात्मा आओ। यह जरूर है कि सब दूर के मुसाफिर हैं, सबको मुसाफिरी करनी है वहाँ से यहाँ आने की। वास्तव में सब मनुष्यों की आत्मायें वहाँ परमधाम में रहने वाली हैं। यहाँ आई हैं पार्ट बजाने। लम्बी-चौड़ी मुसाफिरी है। परन्तु आत्मा पहुँचती है सेकेण्ड में। एरोप्लेन आदि भी इतना जल्दी नहीं जा सकता। आत्मा तो सेकेण्ड में सूक्ष्मवतन, मूलवतन उड़ जाती है। आत्मा एक शरीर छोड़ दूसरे शरीर में जाती है वा जो ऊपर से नई आत्मायें आती हैं, टाइम एक ही लगता है। नई आत्मायें आती तो रहती हैं ना। वृद्धि को पाती रहती हैं। आत्मा जितनी तीखी दौड़ी कोई लगा न सके।
तुम जानते हो बाप को भी मुसाफिरी करनी पड़ती है। वह एक ही बार आकर बच्चों को साथ ले जाते हैं। भक्त भी जानते हैं भगवान आकर हमको अपने पास ले जायेगा। यहाँ आकर मिलेगा, तो भी वापिस ले जाने लिए। गाते भी हैं - हमको पतित से पावन बनाने आओ। हमको भी साथ ले चलो। तुम जानते हो जो-जो अच्छी रीति बाप को याद करेंगे वही नजदीक आयेंगे। वन्डर है ना। वही तुम्हारा बाप भी है, टीचर भी है, सतगुरू भी है। नहीं तो बाप को अलग, टीचर को अलग याद किया जाता है। सारी आयु बाप भी याद रहता है, टीचर भी याद रहता है। आजकल छोटेपन से ही गुरू करा लेते तो मात-पिता, टीचर और फिर गुरू को याद करेंगे। फिर जब अपनी रचना रचते हैं तो अपनी स्त्री और बच्चों को भी याद करने लग पड़ते हैं। फिर मात-पिता आदि की याद कम होने लगती है। अब तुमको याद है, उस एक मुसाफिर की। आत्मा प्योर है, अगर वह नया शरीर ले तो वह बहुत फर्स्टक्लास मिलेगा। परमात्मा कहते हैं हमको तो नया शरीर मिलता नहीं। मैं आता हूँ तुमको खूबसूरत बनाने के लिए। वैकुण्ठ में तो सब चीज़ें होती ही खूबसूरत हैं। मकान भी हीरे-जवाहरों से सजे हुए रहते हैं। यह मुसाफिर कितना अलौकिक है! परन्तु तुम घड़ी-घड़ी उनको भूल जाते हो क्योंकि तुम्हारी है माया के साथ लड़ाई। माया तुमको याद करने नहीं देती है। बाप कहते हैं तुम मुझे क्यों नहीं याद करते हो? कहते हैं बाबा क्या करें परवश अर्थात् माया के वश हो जाते हैं। आपको भूल जाते हैं फिर वह खुशी नहीं रहती है। राजा के पास जन्म लेते हैं तो बच्चे बड़े खुश होते हैं। परन्तु द्वापर की राजाई में भी सुख-दु:ख तो होता ही है। कोई ने गुस्सा किया तो दु:ख हुआ। ऐसे नहीं राजाई में गुस्सा नहीं करते। प्रिन्स प्रिन्सेज को भी कभी गुस्से में उल्टा-सुल्टा कह देंगे। बच्चा लायक नहीं होगा तो फिर तख्त पर बैठ नहीं सकेगा। बड़ा बच्चा अगर लायक नहीं होता है तो फिर छोटे को बिठा देते हैं। यहाँ बाप कहते हैं श्रीमत पर चलते रहो। मैं तुम बच्चों को 21 जन्मों के लिए भारत का राजा बनाता हूँ। यह भारत दैवी राजस्थान था अर्थात् देवी-देवताओं का राज्य था। यह सिर्फ तुम ही जानते हो जो ईश्वरीय सन्तान बने हो ब्रह्मा द्वारा।
तुम बच्चे बाप की पूरी बायोग्राफी को जानते हो। बाकी कोई भी मनुष्य उनकी बायोग्राफी को नहीं जानते। हम गॉड फादर क्यों कहते हैं, यह भी नहीं जानते। पुकारते किसलिए हैं? हमको अपना वर्सा दो। परन्तु वह कैसे मिलता है, यह तो कोई जानते नहीं। वर्सा तो बाप से ही मिलेगा। बाप है मुसाफिर। यह जो सब हसीन (सुन्दर) थे, उनको माया ने काला कौड़ी तुल्य बना दिया है। मुसाफिर और हसीना की भी एक कहानी है। यह मुसाफिर कितनों को हसीन बनाते हैं और कितना ऊंच बनाते हैं! बाप हमको स्वर्ग का मालिक बनाते हैं। हम बाप के बने हैं, वह हमको भगवान-भगवती बनाते हैं। कहते हैं तुम्हारी आत्मा छी-छी बनी है इसलिए शरीर भी ऐसे मिलते हैं। अब मुझे याद करने से आत्मा को पवित्र बनायेंगे तो शरीर भी नया मिलेगा। तुम सूर्यवंशी, चन्द्रवंशी महाराजा-महारानी थे, अब माया ने गंदा बना दिया है। मेरे को भी भुला दिया है। यह भी खेल है। अब तुम जानते हो हर एक मुसाफिर को परिस्तान अथवा स्वर्ग का मालिक बना रहे हैं। तो उनकी मत पर चलना है। ऐसे नहीं बापदादा को कोई बच्चों की मत पर चलना है। नहीं, बच्चों को श्रीमत पर चलना है। बाप को अपनी मत नहीं देनी है। ब्रह्मा की मत मशहूर है। वह हुआ जगत पिता तो जरूर जगत माता भी ऐसे ही होगी। जगदम्बा की मत से सबकी मनोकामनायें स्वर्ग की पूरी होती हैं। ऐसे नहीं इस जगदम्बा को भी किसी मनुष्य की मत पर चलना है। नहीं। मनुष्य तो जगदम्बा, जगतपिता की मत को जानते नहीं। कहते हैं ब्रह्मा भी उतर आये तो भी तुम सुधर न सको। जगदम्बा के लिए क्यों नहीं कहते? मनुष्यों को बिल्कुल पता नहीं कि यह क्यों पूजे जाते और यह कौन हैं? यह अभी तुम जानते हो। देखो, मम्मा सब तरफ जाती है मत देने के लिए। एक दिन गवर्मेन्ट भी इस मात-पिता को जान जायेगी। परन्तु पिछाड़ी में फिर टू-लेट हो जायेंगे। इस समय राजा-रानी का राज्य तो है नहीं। दुनिया यह नहीं जानती कि यह सब ड्रामा रिपीट हो रहा है। आगे हम थोड़ेही जानते थे कि हम एक्टर हैं। करके कहते हैं आत्मा नंगी आती है फिर चोला धारण कर पार्ट बजाती है। परन्तु ड्रामा के आदि-मध्य-अन्त को कोई नहीं जानते कि कौन नम्बरवन पूज्य सो पुजारी बनते हैं। कुछ भी नहीं जानते।
अभी तुम जानते हो यह मुसाफिर परमधाम का बड़ा अनोखा है, इनकी महिमा अपरमअपार है। यह तो है ही पतित दुनिया, जो पतित से पावन बनेंगे वही नई दुनिया के मालिक बनेंगे। सारी दुनिया तो स्वर्ग में नहीं चलेगी। राजयोग कोई सारी दुनिया नहीं सीखेगी। सारी दुनिया पावन होनी है इसलिए सफाई चाहिए। फिर तुमको पावन दुनिया में आकर राज्य करना है इसलिए सारी दुनिया की सफाई हो जाती है। सतयुग में कितनी सफाई थी! सोने-चांदी के महल होते हैं। अथाह सोना होता है। एक कहानी भी सुनाते हैं - सूक्ष्मवतन में सोना बहुत देखा, कहा - थोड़ा ले जाऊं परन्तु यहाँ थोड़ेही ले आ सकेंगे। अभी तुम दिव्य दृष्टि से वैकुण्ठ देखते हो जो अब स्थापन हो रहा है। जिसका रचयिता बाप है। मालिक है ना। मालिक धनी को कहा जाता है। जब कोई निधनके होते हैं तो कहा जाता है इनका कोई धनी धोनी नहीं है। धनी बिगर लड़ते-झगड़ते हैं।
अब तुम बच्चे जानते हो हम परमधाम से आये हैं, हम परदेशी हैं। यहाँ सिर्फ पार्ट बजाने आये हैं। बाप को जरूर आना पड़ता है। अब हम पतित से पावन बन ऊंच पद पाने का पुरुषार्थ कर रहे हैं। बाप हमको पढ़ा रहे हैं। हम गॉड फादरली स्टूडेन्ट्स हैं। यह भी सुन रहे हैं। जैसे यह पावन बन राजाई पद पाने का पुरुषार्थ करते हैं वैसे ही तुम सब करते हो। सब पुकारते हो - हे दूर के मुसाफिर आकरके हमको दु:ख से छुड़ाओ, सुखधाम में ले चलो। पावन दुनिया है सतयुग। वह है वाइसलेस वर्ल्ड, वही वर्ल्ड फिर विशश वर्ल्ड बन गया है। वाइसलेस वर्ल्ड में वाइसलेस रहते हैं। यहाँ सब विकारी हैं नाम ही है दु:खधाम, नर्क। बाप आकर पुरानी दुनिया को नया बनाते हैं, फिर से तुम बच्चों को राज्य भाग्य देना - यही तो बाप का काम है। उनको कहा जाता है दूर का मुसाफिर। आत्मा उनको याद करती है हे परमपिता परमात्मा। जानते हैं हम भी वहाँ परमधाम में परमपिता के पास रहने वाले थे। यह बाप ने समझाया है हम 84 जन्म भोग अब पतित बने हैं। पुकारते रहते हैं दूर के मुसाफिर आओ। हम तो तमोप्रधान पतित बन गये हैं, आप आ करके हमको सतोप्रधान बनाओ। तमोप्रधान से सतोप्रधान बनते हैं, फिर सतोप्रधान से तमोप्रधान बनेंगे। वह दूर का मुसाफिर आकर इनके द्वारा तुमको पढ़ाते हैं - मनुष्य को देवता बनाने के लिए। तो पुरुषार्थ करना चाहिए ना। बाप आकर प्रवृत्ति मार्ग बनाते हैं और कहते हैं यह एक अन्तिम जन्म पवित्र बनो तो पवित्र दुनिया के मालिक बनेंगे। इस पवित्रता पर ही झगड़ा चलता है। अबलाओं पर अत्याचार होते हैं। तुम बच्चों को तो अब श्रीमत पर चलना है। अब सभी की है विनाश काले विपरीत बुद्धि। बाप को जानते ही नहीं, उनसे विपरीत हैं। कह देते परमात्मा तो सर्वव्यापी है। सर्वव्यापी कहने से तो कोई प्रीत रही नहीं।
अब तुम बच्चे कहते हो हम सभी से प्रीत हटाए एक बाप से जोड़ते हैं तो जरूर उनसे वर्सा पायेंगे। बाप कहते हैं भल गृहस्थ व्यवहार में रहो परन्तु अगर परिस्तान की परी बनना है तो वाइसलेस बनो। नहीं तो वहाँ कैसे जन्म मिलेगा? यह तो है विशश वर्ल्ड, नर्क। वाइसलेस वर्ल्ड को स्वर्ग कहा जाता है। सृष्टि तो वही है सिर्फ नई से पुरानी, पुरानी से नई होती है। अब बाप आये हैं पतित दुनिया को पावन बनाने तो जरूर उनकी मत पर चलना पड़े। श्रीमत गाई हुई है। भगवान कहते हैं - बच्चे, मैं तुमको ऐसे भगवती-भगवान बनाता हूँ। वास्तव में तुम देवी-देवताओं को भगवती-भगवान नहीं कह सकते, इन सूक्ष्मवतन वासी ब्रह्मा-विष्णु-शंकर को भी देवता कहा जाता है, भगवान नहीं। सबसे ऊंच है मूलवतन, सेकेण्ड नम्बर में सूक्ष्मवतन। यह स्थूल वतन तो थर्ड नम्बर में है। यहाँ के रहने वालों को भगवान कैसे कहेंगे? विशश वर्ल्ड को वाइसलेस वर्ल्ड बनाने वाला एक ही है। अब जितना जो पुरुषार्थ करेंगे उतना ऊंच पद पायेंगे। बच्चे जानते हैं कि मात-पिता, जगदम्बा, जगतपिता जाकर पहले-पहले महाराजा-महारानी बनते हैं। अभी तो वह भी पढ़ रहे हैं। पढ़ाने वाला शिवबाबा है। याद भी उनको करते हैं। तुम अब उनसे वर्सा लेते हो। बाप कहते हैं यह अन्तिम जन्म मेरी मत पर वाइसलेस होकर रहेंगे तो 21 जन्म तुम वाइसलेस बनेंगे। पुरुषार्थ करने का यह संगमयुग है। बाप कहते हैं मैं आया हूँ तो तुम इस जन्म में मेरी मत पर चल वाइसलेस बनो। हर एक को अपने आपका फिकर करना है और जो भी आये उनको कहना है बेहद के बाप से वर्सा लेना है तो पवित्रता की राखी बांधो। अब मृत्युलोक में वृद्धि नहीं करनी है। यहाँ तो आदि-मध्य-अन्त दु:ख है। आसुरी सम्प्रदाय हैं। सतयुग में तो देवी-देवता राज्य करते थे। अब नर्कवासी उन्हों की पूजा करते हैं। उन्हों को यह पता नहीं कि हम ही पवित्र पूज्य थे। अब हमको फिर पुजारी से पूज्य बनना है। क्या तुम चाहते हो कि हम बच्चे पैदा करें तो वह भी नर्कवासी बनें? नर्क में थोड़ेही बच्चे पैदा करना है। उससे तो क्यों न स्वर्ग में जाकर प्रिन्स को जन्म देवें। बाप का बनने से तुम लायक बनेंगे। आजकल तो बच्चे भी दु:ख देते हैं। बच्चा जन्मा तो खुश, मरा तो दु:ख। सतयुग में गर्भ में भी महल, तो बाहर आने से भी महलों में रहते हैं। अब बाप तुमको नर्कवासी से स्वर्गवासी बनाते हैं।
हम गॉडली स्टूडेन्ट्स हैं। बाप के बच्चे भी हैं, टीचर रूप से स्टूडेन्ट्स भी हैं। गुरू रूप में फालोअर्स भी पूरे हैं। अहम् आत्मा फालोअर्स हैं बाप के। बाप कहते हैं मुझे याद करो। याद से तुम पवित्र बन जाते हो। नहीं तो सजा खानी पड़ती है। बाकी धन्धाधोरी तो करना है, नहीं तो बाल-बच्चे कैसे सम्भालेंगे। अच्छा!
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का यादप्यार और गुडमार्निग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।
धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) सभी तरफ से बुद्धि की प्रीत हटाकर एक बाप से जोड़नी है। पवित्र बन परिस्तान की परी बनना है।
जैसे सूर्य अपनी किरणों द्वारा विश्व को रोशन करता है ऐसे आप सभी भी मास्टर ज्ञान सूर्य हो तो अपने सर्व शक्तियों की किरणें विश्व को देते रहो। यह ब्राह्मण जन्म मिला ही है विश्व कल्याण के लिए तो सदा इसी कर्तव्य में बिजी रहो। जो बिजी रहते हैं वो स्वयं भी निर्विघ्न रहते और सर्व के प्रति भी विघ्न-विनाशक बनते। उनके पास कोई भी विघ्न आ नहीं सकता।
स्लोगन:- जिम्मेवारी सम्भालते हुए सब कुछ बाप को अर्पण कर डबल लाइट रहना ही फरिश्ता बनना है।
13.03.2023 HINDI MURLI
“मीठे बच्चे - याद में रहते-रहते यह कलियुगी रात पूरी हो जायेगी, तुम बाप के पास चले जायेंगे फिर आयेंगे दिन में, यह भी वन्डरफुल यात्रा है''
प्रश्नः- तुम बच्चों को स्वर्ग में जाने की इच्छा क्यों है?
उत्तर:- क्योंकि तुम जानते हो जब हम स्वर्ग में जायें तब बाकी सब आत्माओं का कल्याण हो, सब अपने शान्तिधाम घर में जा सकें। तुम्हें कोई स्वर्ग में जाने का लोभ नहीं है। लेकिन तुम स्वर्ग की स्थापना कर रहे हो, इतनी मेहनत करते हो तो जरूर उस स्वर्ग के मालिक भी बनेंगे। बाकी तुम्हें कोई दूसरी इच्छा नहीं है। मनुष्यों को तो इच्छा रहती है - हमें भगवान का साक्षात्कार हो लेकिन वह तो तुम्हें स्वयं पढ़ा रहे हैं।
गीत:- रात के राही....
ओम् शान्ति। रात के राही का अर्थ तो बच्चे नम्बरवार पुरुषार्थ अनुसार जानते होंगे। अगर बच्चों का स्वदर्शन चक्र फिरता रहता है, स्मृति में रहते हैं तो वह समझ सकेंगे कि बरोबर हम दिन अर्थात् स्वर्ग के कितना नजदीक पहुंचे हैं। बच्चों को समझाया है - यह बेहद का दिन और रात है। ब्रह्मा की बेहद की रात कहा जाता है। शास्त्रों में कितना अच्छा नाम लिखा हुआ है। ऐसे नहीं कहा जायेगा कि लक्ष्मी-नारायण की भी रात होगी। नहीं। ब्रह्मा का दिन, ब्रह्मा की रात कहा जाता है। लक्ष्मी-नारायण तो वहाँ राज्य करते थे। फिर जरूर सृष्टि चक्र को फिरना है। लक्ष्मी-नारायण का राज्य फिर सतयुग में आना है। सतयुग के बाद त्रेता, द्वापर, कलियुग जरूर आना है। तो जरूर सतयुग में फिर वही राजा होना चाहिए। यह ज्ञान सिर्फ शिवबाबा ही ब्रह्मा द्वारा तुम बच्चों को देते हैं, इसलिए तुमको ही यह सृष्टि चक्र का ज्ञान है। देवताओं को नहीं है। तुम ब्राह्मणों की बुद्धि में यह चक्र फिरता है इसलिए नाम रखा है ब्रह्मा और ब्रह्माकुमार कुमारियों की रात। अभी तुम चल रहे हो दिन तरफ। सतयुग को दिन, कलियुग को रात कहा जाता है। तुम बच्चे जानते हो हमारी यह यात्रा कलियुग के अन्त और सतयुग आदि के संगम पर ही होती है। तुम बैठे कलियुग में हो तुम्हारी बुद्धि वहाँ है। आत्मा को समझना है हमको यह शरीर छोड़कर बाप के पास जाना है। शरीर तो अन्त में छोड़ेंगे जब मंजिल पूरी होगी अर्थात् बाप योग सिखाना बन्द करेंगे। पढ़ाई का अन्त होगा तब तक बाप सिखाते, पढ़ाते रहते हैं। बच्चे बाप की याद में रहते हैं। ऐसे याद में रहते-रहते रात पूरी हो जायेगी और तुम बाप के पास चले जायेंगे। फिर तुम आयेंगे दिन में। यह है तुम्हारी वन्डरफुल यात्रा। बाप दिन स्थापन करते हैं तुम ब्रह्माकुमार कुमारियों के लिए। अब दिन अर्थात् सतयुग आ रहा है। अभी तुम कलियुग रात में बैठे हो। निरन्तर बाप को याद करते रहो।
बाप ने समझाया है सभी को मरना है जरूर। मनुष्य पूछते हैं कब मरना है? कब विनाश होगा? अब दिव्य दृष्टि से विनाश का साक्षात्कार किया हुआ है। फिर इन आंखों से देखना जरूर है और स्थापना, जिसका साक्षात्कार करते हैं वह भी इन आंखों से देखना है। मुख्य जिस ब्रह्मा का दिन और रात गाया हुआ है उनको ही स्थापना और विनाश का साक्षात्कार हुआ है। तो जो दिव्य दृष्टि से देखा है वह प्रैक्टिकल जरूर होगा। भक्ति मार्ग में जो कुछ साक्षात्कार होता है वह दिव्य दृष्टि से देखते हैं। तुम भी दिव्य दृष्टि से देखते हो। तुमको किसी चीज़ की इच्छा नहीं रहती है। संन्यासी लोगों को इच्छा रहती है - परमपिता परमात्मा को देखने की। यहाँ तुम बच्चों को तो परमपिता परमात्मा खुद बैठ पढ़ाते हैं। तुमको इच्छा है स्वर्ग में जाने की। बच्चे जानते हैं कि हम स्वर्ग में जायेंगे तो सभी का कल्याण हो जायेगा। अभी तुम बच्चे जानते हो बेहद का बाप जो मनुष्य सृष्टि का रचयिता, बीजरूप है वो झाड के आदि, मध्य, अन्त को जानते हैं। हम उस बाप को और उनके वर्से को जानते हैं। जैसे वह झाड होते हैं, जानते हैं यह आंब का झाड है। बीज बोने से पहले दो चार पत्ते निकलते हैं फिर झाड बड़ा होता जाता है तो वह है जड़ बीज। यह बाप है मनुष्य सृष्टि का चैतन्य बीजरूप, उसे ही नॉलेजफुल कहा जाता है।
बच्चे जानते हैं यह पाठशाला है, जिसमें यह विद्या (पढ़ाई) मिल रही है और तुम योग भी सीख रहे हो। इस विद्या से तुम भविष्य प्रिन्स-प्रिन्सेज बनते हो। आत्मा पवित्र जरूर चाहिए। अभी तो सब अपवित्र हैं। परन्तु कोई को पतित कहो तो मानेंगे नहीं। कहते हैं कृष्णपुरी में भी एक दो को दु:ख देने वाले कंस, जरासन्धी आदि थे। एक दो को सुख देने वाले को पावन कहा जाता है। स्वर्ग में कोई दु:ख देता नहीं। वहाँ तो शेर बकरी इकट्ठे जल पीते हैं। किसको दु:ख नहीं देते। परन्तु यह बातें कोई समझते थोड़ेही हैं। जो शास्त्र पढ़े हैं वही बातें बुद्धि में आ जाती हैं। देवताओं के पुजारी अपने को खुद ही चमाट मारते हैं। हिन्दुओं ने आपेही अपने को चमाट मारी है। अपने देवताओं की बैठ निंदा की है। क्राइस्ट, बुद्ध आदि की कितनी महिमा करते हैं। देवताओं की बैठ निंदा करते हैं। यह धर्म की ग्लानी हुई ना। गीता में भी कहते हैं यदा यदाहि धर्मस्य.....नाम भी भारत का है। भारत ही भ्रष्ट और श्रेष्ठ बनता है। श्रेष्ठ थे लक्ष्मी-नारायण। भ्रष्ट मनुष्य, श्रेष्ठ को माथा टेकते हैं। संन्यासी भी पवित्र रहते हैं, परन्तु भगवान को जानते नहीं। अपने को ही भगवान कह देते हैं। बाकी दूसरे जो भी गुरू आदि हैं पतित हैं, विकार में भी जाते हैं। पतित कहा जाता है विकारी को। वह पावन को नमस्कार करते हैं। संन्यासियों को गुरू करते हैं तो भी इसलिए कि हमको आप समान पावन बनायें। आजकल संन्यासी तो कोई मुश्किल बनते हैं, फिर गृहस्थी को गुरू करने से क्या प्राप्ति होगी? जबकि वे खुद ही पतित हैं। परन्तु नई आत्मायें आती हैं तो उन्हों की कुछ महिमा निकलती है। किसको पुत्र मिला, किसको धन मिला तो खुश हो जाते हैं। फिर एक दो को देख सब गुरू करते रहेंगे। वास्तव में गुरू किया जाता है सद्गति के लिए। वह जरूर 5 विकारों का संन्यास किया हुआ पवित्र चाहिए। बाकी गृहस्थी गुरू करने से क्या फायदा? बड़े-बड़े गृहस्थी गुरू हैं जिनके हजारों फालोअर्स हैं। कोई एक ने गुरू किया तो वह गद्दी चली आती है। शिष्य लोग उनके पांव धोकर पीते हैं, इसको अन्धश्रधा कहा जाता है। मनुष्य भल गाते हैं कि हे भगवान अंधों की लाठी तू.. परन्तु इसका अर्थ भी नहीं समझते। अन्धा (बुद्धिहीन) बनाती है माया रावण। सब पत्थरबुद्धि बन जाते हैं इसलिए बाप कहते हैं यह जो भी शास्त्र आदि हैं इन सबका सार मैं आकर सुनाता हूँ। नारद का मिसाल देते हैं, उनको कहा तुम अपनी शक्ल तो देखो - लक्ष्मी को वरने लायक हो? लक्ष्मी तो स्वर्ग में होगी। अभी तुम जानते हो हमें पुरुषार्थ कर भविष्य लक्ष्मी को वा नारायण को वरना है। तो यह भी यहाँ की बात है। शक्ल मनुष्य की है, सीरत बन्दर की है। बाप कहते हैं अपनी शक्ल तो देखो। मनुष्य तुमको कहेंगे तुम स्वर्ग का मालिक बनने का भी लोभ रखते हो ना। उनको समझाना है अरे हम तो सारी सृष्टि को स्वर्ग बनाते हैं। इतनी मेहनत करते हैं तो जरूर मालिक भी हमको बनना पड़ेगा ना। कोई तो राज्य करेंगे ना।
बाबा ने समझाया है नम्बरवन है काम महाशत्रु, जो मनुष्य को आदि, मध्य, अन्त दु:ख देता है। यह आधाकल्प का कड़ा दुश्मन है। भल ड्रामा में सुख और दु:ख है परन्तु दु:ख में ले जाने वाला भी तो है। वह है रावण। आधाकल्प रावणराज्य चलता है। यह बातें तुम बच्चे ही जानते हो। तुम्हारे में भी नम्बरवार हैं। अब देखो कहते हैं कैलाश पर्वत पर शंकर पार्वती रहते हैं। प्रेजीडेंट आदि भी अमरनाथ, कैलाश पर्वत पर जाते हैं। परन्तु इतना भी समझते नहीं कि वहाँ शंकर पार्वती कहाँ से आये? क्या पार्वती दुर्गति में थी जो उनको बैठ कथा सुनाई? सूक्ष्मवतन में तो दुर्गति का प्रश्न ही नहीं। कितना दूर-दूर जाकर मनुष्य धक्के खाते हैं। यह है भक्ति मार्ग। दु:ख तो मनुष्यों को पाना ही है। प्राप्ति है अल्पकाल की। वह कौन सी प्राप्ति है? तीर्थों पर जितना समय रहते हैं उतना समय पवित्र रहते हैं। कोई तो शराब बिगर रह नहीं सकते, तो छिपाकर भी शराब की बोतल ले जाते हैं। फिर वह कोई तीर्थ थोड़ेही हुआ। वहाँ भी कितना गंद लगा पड़ा है, बात मत पूछो। विकारी मनुष्यों को विकार भी वहाँ मिलता है। मनुष्यों को ज्ञान नहीं है तो समझते हैं भक्ति अच्छी है, उनसे ही भगवान मिलेगा। आधा-कल्प भक्ति के धक्के खाने पड़ते हैं। आधाकल्प के बाद जब भक्ति पूरी होती है तो फिर भगवान आते हैं। बाबा को तरस पड़ता है। ऐसे नहीं कि भक्ति से भगवान को पाते हैं। ऐसा होता तो फिर भगवान को पुकारते क्यों? याद क्यों करते? भगवान कब मिलता है, यह समझते नहीं हैं। भक्ति से श्रीकृष्ण का साक्षात्कार हुआ तो बस, समझते उनको भगवान मिल गया। वैकुण्ठवासी हुआ। श्रीकृष्ण का दर्शन हुआ बस चला गया श्रीकृष्णपुरी। परन्तु जाता कोई नहीं। तो भक्ति मार्ग में अन्धश्रधा बहुत है। तुम बच्चे अभी समझ गये हो। बाप साधारण तन में आते हैं तब तो गाली खाते हैं। नहीं तो भला किस तन में आये? श्रीकृष्ण के तन में तो गाली खा न सके। परन्तु श्रीकृष्ण पतित दुनिया में पावन बनाने आये, यह हो नहीं सकता। श्रीकृष्ण को पतित-पावन कहते भी नहीं हैं। मनुष्य यह भी समझते नहीं कि पतित-पावन कौन है, कैसे आते हैं इसलिए कोई को भी विश्वास नहीं बैठता है। शास्त्रों में तो है नहीं कि कैसे ब्रह्मा तन में आते हैं। कहते भी हैं ब्रह्मा मुख द्वारा सूर्यवंशी, चन्द्रवंशी धर्म की स्थापना होती है। फिर भूल जाते हैं कि कब होती, कैसे होती? प्रजापिता ब्रह्मा तो जरूर यहाँ कल्प के संगम पर होना चाहिए तब तो ब्राह्मणों की नई सृष्टि रची जाए। मनुष्य बहुत मूंझे हुए हैं, उनको रास्ता बताना है। बाप कितनी भारी सर्विस आकर करते हैं। तुम समझते हो हम 5 विकारों से एकदम बन्दर से भी बदतर होते गये हैं। हम सो देवता थे फिर एकदम क्या बन गये! ऐसों को फिर बाप कितना ऊंच आकर बनाते हैं। तो बाप को कितना लव करना चाहिए। यह बाप सुनाते हैं या दादा सुनाते हैं? यह भी कितने बच्चों को पता नहीं लगता। बाप कहते हैं विचार करो मैं सदैव रथ पर हाजिर रह सकता हूँ? यह तो हो नहीं सकता। मैं तो आता ही हूँ सर्विस पर।
बाबा के पास समाचार आया था - कोई ने पूछा क्या मनुष्य किसको सुख दे सकते हैं? यह मनुष्य के हाथ में है? तो एक ने कहा कि नहीं, ईश्वर ही है जो मनुष्य को सुख दे सकता है। मनुष्य के हाथ में कुछ भी नहीं है। तो कोई बच्चे ने फिर समझाया है कि मनुष्य ही सुख देता है, मनुष्य ही सब कुछ करता है। ईश्वर के हाथ में कुछ नहीं हैं। अरे, तुम थोड़ेही कुछ देते हो। ईश्वर के हाथ में ही तो है ना। समझाना चाहिए - श्रीमत पर चलना है। परमपिता की श्रीमत बिगर कोई सुख दे न सके। अपनी बड़ाई नहीं करनी चाहिए। हम श्रीमत पर सारे सृष्टि को स्वर्ग बनाते हैं। तो देखो कितनी भारी भूल बच्चों की होती है। वह कहते ईश्वर के हाथ में है। बी.के. कहते कि मनुष्य के हाथ में है। वास्तव में है तो बाप के ही हाथ में। श्रीमत बिगर कुछ कर नहीं सकते। मनुष्य बिल्कुल बर्थ नाट ए पेनी बन जाते हैं। बाप कहते हैं रावण मनुष्य को पत्थरबुद्धि बना देते हैं। मैं आकर तुमको पारस बुद्धि बनाता हूँ। महिमा सारी बाप की करनी है। हम श्रीमत पर चल रहे हैं। ईश्वर बिगर मनुष्य को कोई श्रेष्ठ बना नहीं सकता। अच्छा!
ब्रह्मा मुख वंशावली ब्राह्मण कुल भूषण स्वदर्शन चक्रधारी मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का यादप्यार और गुडमार्निग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।
धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) बाप जो इतनी सर्विस करते हैं, हमें इतना ऊंच देवता बनाते हैं, ऐसे बाप से दिल का सच्चा लव रखना है। देवताओं समान सबको सुख देना है।
2) एक बाप की सदा महिमा करनी है। अपनी बड़ाई नहीं दिखानी है।
वरदान:- सेवा का पार्ट बजाते पार्ट से न्यारे और बाप के प्यारे रहने वाले सहज योगी भव
कई बच्चे कहते हैं योग कभी लगता है कभी नहीं लगता, इसका कारण है - न्यारे पन की कमी। न्यारे न होने के कारण प्यार का अनुभव नहीं होता और जहाँ प्यार नहीं वहाँ याद नहीं। जितना ज्यादा प्यार उतनी सहज याद इसलिए संबंध के आधार पर पार्ट नहीं बजाओ, सेवा के संबंध से पार्ट बजाओ तो न्यारे रहेंगे। कमल पुष्प समान पुरानी दुनिया के वातावरण से न्यारे और बाप के प्यारे बनो तो सहजयोगी बन जायेंगे।
स्लोगन:- ज्ञानी वह है जो कारण शब्द को मर्ज कर हर बात का निवारण कर दे।
ब्राह्मण जन्म का आदि वरदान - स्नेह की शक्ति
۰ स्नेह की शक्ति बाप समान बना देती है।
۰ स्नेह सदा हर समय परमात्म साथ का अनुभव कराता है।
۰ स्नेह सदा अपने ऊपर बाप की दुआओं का हाथ छत्रछाया समान अनुभव कराता है।
۰ स्नेह असम्भव को सम्भव इतना सहज कर देता जैसे कार्य हुआ ही पड़ा है।
۰ स्नेह निष्पल (हर समय) निश्चिन्त अनुभव कराता है।
۰ स्नेह हर कर्म में निश्चित विजयी स्थिति का अनुभव कराता है। ऐसे स्नेह की शक्ति अनुभव करते हो ना?
बापदादा जानते हैं कि अनेक जन्म अनेक प्रकार की मेहनत कर थकी हुई आत्मायें हैं। भिन्न-भिन्न बन्धनों में बन्धी हुई आत्मायें होने के कारण मेहनत करती रही हैं इसलिये बापदादा मेहनत से मुक्त होने के लिये सहज विधि ‘स्नेह की शक्ति' सभी बच्चों को वरदान में देते हैं। अपने ब्राह्मण जीवन के आदि समय को याद करो। तो जन्मते ही सभी को स्नेह की शक्ति ने ही नया जीवन दिया। स्नेह की अनुभूति के लिये मेहनत की? मेहनत करनी पड़ी? सहज अनुभव किया ना। तो यह आदि जन्म की अनुभूति ही वरदान है। प्यार-प्यार में ही खो गये। सदा इस स्नेह के वरदान को स्मृति में रखो। मेहनत के समय इस वरदान द्वारा मेहनत को परिवर्तन कर सकते हो। बापदादा को बच्चों का मेहनत अनुभव करना अच्छा नहीं लगता। स्नेह के शक्ति की विस्मृति मेहनत अनुभव कराती है।
۰ कितनी भी बड़ी कैसी भी परिस्थिति हो प्यार से, स्नेह से परिस्थिति रूपी पहाड़ भी परिवर्तन हो पानी समान हल्का बन सकता है। पत्थर को पानी बना सकते हो। कैसा भी माया का विकराल रूप वा रॉयल रूप सामना करे तो सेकेण्ड में स्नेह के सागर में समा जाओ तो सामना करने की माया की शक्ति समाप्त हो जायेगी। आपके समाने की शक्ति छू-मंत्र नहीं लेकिन शिव-मंत्र बन जायेगी। सबके पास शिव-मंत्र की शक्ति है ना कि खो जाती है? शिव स्नेह में समा जाओ, सिर्फ डुबकी मारकर नहीं निकल आओ। थोड़ा समय स्मृति में रहते हो - मीठा बाबा, प्यारा बाबा, डुबकी लगाकर फिर निकल आते हो तो माया की नज़र पड़ जाती है। समा जाओ, तो माया की नज़र से दूर हो जायेंगे। और कुछ भी नहीं आए तो स्नेह की शक्ति जन्म का वरदान है। उस वरदान में खो जाओ। खो जाना नहीं आता है? स्नेह तो सहज है ना! सबको अनुभव है ना! कोई है जिसको ब्राह्मण जीवन में रूहानी स्नेह का अनुभव नहीं हो? है कोई?
۰ स्नेह ही सहज योग है, स्नेह में समाना ही सम्पूर्ण ज्ञान है।
۰ आज के दिन का महत्व भी स्नेह है।
अमृतवेले से विशेष किस लहर में लहरा रहे हो? बापदादा के स्नेह में ही लहरा रहे हो। सर्व आत्माओं के अन्दर एक बाप के सिवाय और कुछ याद रहा? सहज याद रही ना? कि मेहनत करनी पड़ी? तो सहज कैसे बनी? स्नेह के कारण। तो क्या सिर्फ आज का दिन स्नेह का है? संगमयुग है ही परमात्म स्नेह का युग। तो युग के महत्व को जान स्नेह की अनुभूतियों को अनुभव करो। स्नेह का सागर स्नेह के हीरे-मोतियों की थालियाँ भरकर दे रहे हैं। तो अपने को सदा भरपूर करो। थोड़े से अनुभव में खुश नहीं हो जाओ। सम्पन्न बनो। भविष्य में तो स्थूल हीरे-मोतियों से सजेंगे। ये परमात्म प्यार के हीरे-मोती अनमोल हैं, तो इससे सदा सजे सजाये रहो।
चारों ओर के बच्चों की याद, स्नेह के गीत बापदादा सदा भी सुनते रहते हैं लेकिन आज विशेष स्नेह स्वरूप बच्चों को स्नेह के रिटर्न में सदा स्नेही भव, सदा स्नेह के वरदान द्वारा सहज उड़ती कला का विशेष फिर से वरदान दे रहे हैं। सदा जैसे छोटे बच्चे होते हैं, कोई भी मुश्किल बात आयेगी वा कोई भी परिस्थिति आयेगी तो मात-पिता की गोदी में समा जायेंगे, ऐसे सेकेण्ड में स्नेह की गोदी में समा जाओ तो मेहनत से बच जायेंगे। सेकेण्ड में उड़ती कला द्वारा बापदादा के पास पहुँच जाओ तो कैसे भी स्वरूप में आई हुई माया दूर से भी आपको छू नहीं सकेगी क्योंकि परमात्म छत्रछाया के अन्दर तो क्या लेकिन दूर से भी माया की छाया आ नहीं सकती। तो बच्चा बनना अर्थात् माया से बचना। बच्चा बनना तो अच्छा है ना। बच्चा बनने का अर्थ ही है स्नेह में समा जाना। अच्छा!
चारों ओर के दिलाराम के दिल में समाये हुए बच्चों को, सदा मेहनत को मोहब्बत में परिवर्तन करने वाली शक्तिशाली आत्माओं को, सदा परमात्म स्नेह के संगमयुग को महान् अनुभव करने वाली श्रेष्ठ आत्माओं को, सदा स्नेह की शक्ति से बाप के साथ और दुआओं के हाथ को अनुभव कर औरों को भी कराने वाली विशेष आत्माओं को, सदा स्नेह के सागर में समाये हुए समान बच्चों को स्नेह के सागर बापदादा का याद-प्यार और नमस्ते।
दादियों से मुलाकात - आज के दिन क्या-क्या याद आया? विशेष विल पॉवर के हाथ याद आये? विल पॉवर सब कार्य सहज करा देती है। ब्रह्मा बाप ज्यादा याद आया या बाप-दादा दोनों याद रहे? फिर भी ब्रह्मा बाप की याद के चरित्र सभी को विशेष याद आते रहे। ब्रह्मा बाप ब्रह्मा बना ही तब जब बाप-दादा कम्बाइण्ड हुए। परमात्म प्रवेशता के साथ ही ब्रह्मा का कर्तव्य शुरू हुआ। इस अव्यक्त स्वरूप के अव्यक्त रूप के चरित्र भी न्यारे और प्यारे हैं। 25 वर्ष की सेवा की हिस्ट्री आदि से याद करो, कितनी तीव्र गति की हिस्ट्री है। अव्यक्त होना अर्थात् तीव्र गति से सर्व कार्य होना। समय का परिवर्तन भी फास्ट और सेवा की वृद्धि की गति भी फास्ट। फास्ट हुई है ना! इसलिये अव्यक्त होने से समय को भी तीव्र गति मिली है तो सेवा को भी तीव्र गति मिली है। अव्यक्त पार्ट में आने वाली आत्माओं को भी पुरुषार्थ में तीव्र गति का भाग्य सहज मिला हुआ है। अव्यक्त पार्ट में आई हुई आत्माओं को लास्ट सो फास्ट, फास्ट सो फर्स्ट का वरदान प्राप्त है। (सभा से)
वरदान को कार्य में लगाओ, सिर्फ स्मृति तक नहीं। समय प्रमाण वरदान को स्वरूप में लाओ। वरदान को स्वरूप में लाने से स्वत: ही फास्ट गति का अनुभव करेंगे। अव्यक्त पालना सहज ही शक्तिशाली बनाने वाली है इसलिये जितना आगे बढ़ना चाहो, बढ़ सकते हो। बापदादा और निमित्त आत्माओं की आप सबके ऊपर विशेष सदा आगे उड़ने की दुआएं हैं। ऐसे है ना? दादियों की भी दुआएं हैं। सिर्फ फायदा ले लो। मिलता बहुत है, यूज़ कम करते हो। सिर्फ बुद्धि में किनारे रखते नहीं रहो, खाओ, खर्च करो। आता है यूज़ करना, खर्च करना आता है कि सम्भाल कर रखते हो? बहुत अच्छा, बहुत अच्छा ये सम्भाल कर रखना है। अच्छाई को स्वयं प्रति और दूसरों के प्रति कार्य में लगाओ। यहाँ खर्चना अर्थात् बढ़ाना है। जैसे आजकल का फैशन है ना, जो अमूल्य चीज़ होती है वह कहाँ रखते हैं? (लॉकर में) यूज़ नहीं करते, लॉकर में रखते हुए खुश होते हैं। तो कई बार ऐसे करते हैं पॉइन्ट बड़ी अच्छी है, विधि बड़ी अच्छी है, सिर्फ बुद्धि के लॉकर में देखकर खुश हो जाते हैं। तो आप सभी लॉकर में रखते हो या यूज़ करते हो? अच्छा!
पाण्डव सेना का क्या हाल है? (अच्छा है) सिर्फ अच्छा-अच्छा कहने वाले तो नहीं ना। ऐसी सेना तैयार हो जो सेकेण्ड में जो ऑर्डर मिले कर ले। ऐसे तैयार है? शक्ति सेना तैयार है? शक्तियों की सेवा अपनी है, पाण्डवों की सेवा अपनी है। पाण्डवों के सहयोग के बिना भी शक्तियां नहीं चल सकती, शक्तियों के सहयोग के बिना भी पाण्डव नहीं चल सकते।
(दादी जी ने मैक्सिको की कॉन्फ्रेन्स का समाचार बापदादा को सुनाया)
अच्छा है साइन्स वाले तो काम में लगे ही हैं। प्रयोग करने में साइन्स वाले होशियार होते हैं ना। तो एक भी अच्छी तरह से योगी और प्रयोगी बन गया तो बड़े से बड़े माइक का काम करेगा।
(लॉस एंजिलिस में भूकम्प आया है) ये समय के तीव्र गति की निशानियां समय प्रति समय प्रकृति दिखा रही है। अच्छा!
अव्यक्त बापदादा की पर्सनल मुलाकात - फल की इच्छा छोड़ रहमदिल बन शुभ भावना का बीज डालते चलो
बापदादा द्वारा सर्व बच्चों को इस संगमयुग पर विशेष कौन-सा ख़ज़ाना मिला हुआ है? ख़ज़ाने तो बहुत हैं लेकिन विशेष ख़ज़ाना खुशी का ख़ज़ाना है। तो खुशी का ख़ज़ाना कितना श्रेष्ठ मिला है। तो यह सदा साथ रहता है या कभी किनारे भी हो जाता है? जब अनगिनत मिलता है तो हर समय ख़ज़ाने को कार्य में लगाना चाहिए ना। लोग किनारे इसीलिए रखते हैं कि आइवेल में काम में आयेगा। लेकिन आपके पास तो अथाह है। इस जन्म की तो बात छोड़ो लेकिन अनेक जन्म यह खुशी का ख़ज़ाना साथ रहेगा। अनगिनत है तो यूज़ करो ना। बापदादा ने पहले भी सुनाया है कि प्राण चले जायें लेकिन खुशी नहीं जाये इसलिये खुशी को कभी भी किनारे नहीं रखो और ही महादानी बनो क्योंकि वर्तमान समय और कुछ भी मिल सकता है लेकिन सच्ची खुशी नहीं मिल सकती। अल्पकाल की खुशी प्राप्त करने के लिये लोग कितना समय वा धन खर्च करते हैं फिर भी सच्ची खुशी नहीं मिलती। तो ऐसे आवश्यकता के समय आप आत्माओं को महादानी बनना है। कैसी भी अशान्त आत्मा, दु:खी आत्मा हो अगर उसको खुशी की अनुभूति करा दो तो कितनी दिल से दुआयें देगी। आप दाता के बच्चे हो तो फराखदिली से बांटो, बांटना तो आता है ना? तो क्यों नहीं बांटते हो? समय को देख रहे हो? दिल से रहम आना चाहिये। जो अशान्ति-दु:ख में भटक रहे हैं वो आपका परिवार है ना। परिवार को सहयोग दिया जाता है ना। तो वर्तमान समय महादानी बनने के लिये विशेष रहमदिल के गुण को इमर्ज करो। आपके जड़ चित्र वरदान दे रहे हैं। तो आप भी चैतन्य में रहम दिल बन बांटते जाओ क्योंकि परवश आत्मायें हैं। कभी भी ये नहीं सोचो कि ये तो सुनने वाले नहीं हैं, ये तो चलने वाले नहीं हैं। नहीं, आप रहम-दिल बनो, देते जाओ। गाया हुआ है कि भावना का फल मिलता है। तो चाहे आत्माओं में ज्ञान के प्रति, योग के प्रति शुभ भावना नहीं भी हो लेकिन आपकी शुभ भावना उनको फल दे देती है। ऐसे नहीं सोचो कि इतना कुछ सेवा की लेकिन फल तो मिला ही नहीं। लेकिन फल एक जैसे नहीं होते। कोई सीज़न का फल होता है, कोई सदा का फल होता है। तो सीज़न का फल सीज़न पर ही फल देगा ना। तो आपने शुभ भावना का बीज डाला, अगर सीज़न का फल होगा तो सीज़न में निकलेगा ही। वैसे भी देखो जो खेती का काम करते हैं, तो जो सीज़न पर चीज़ निकलने वाली होती है तो ये नहीं सोचते हैं कि 6 मास के बाद ये निकलेगा इसलिये बीज डालो ही नहीं। तो आप भी बीज डालते चलो। समय पर सर्व आत्माओं को जगना ही है। आपकी रहम भावना, शुभ भावना फल अवश्य देगी। अगर कोई आपोजीशन भी करता है तो भी आपको अपने रहम की भावना छोड़नी नहीं है और ही सोचो कि ये आपोजीशन या इन्सल्ट, गालियां ये खाद का काम करेंगी। तो खाद पड़ने से अच्छा फल निकलेगा। जितनी गालियां देंगे, उतना आपके गुण गायेंगे इसलिये हर आत्मा को दाता बन देते जाओ। अच्छा माने तो दें, नहीं। ये तो लेवता हो गये? लेने की इच्छा नहीं रखो कि वो अच्छा बोले, अच्छा माने तो दें। नहीं। इसको कहा जाता है दाता के बच्चे मास्टर दाता। चाहे वृत्ति द्वारा, चाहे वायब्रेशन्स द्वारा, चाहे वाणी द्वारा देते जाओ। इतने भरपूर हो ना? सब ख़ज़ाने हैं?
डबल विदेशियों को देख बापदादा डबल खुश होते हैं क्यों? डबल पुरुषार्थ करते हैं। एक तो अपना रीति-रस्म परिवर्तन करने का भी पुरुषार्थ करते हैं। बापदादा देखते हैं कि उमंग-उत्साह मैजारिटी में अच्छा है। अगर कभी उमंग-उत्साह बीच-बीच में नीचे-ऊपर होता है तो आज विधि सुनाई कि समा जाओ, स्नेह की गोदी में छिप जाओ, फिर माया आयेगी ही नहीं। ये तो सहज है ना। बीज रूप होने में मेहनत है, इसमें मेहनत नहीं है। और कुछ भी नहीं आये लेकिन स्नेह में समाना तो आता है कि ये मुश्किल है? (नहीं) तो ये करो। अभी मुश्किल शब्द नहीं बोलना। नीचे आते हो तो छोटी-सी चीज़ बड़ी लगती है, ऊपर चले जाओ तो बड़ी चीज़ भी छोटी लगेगी। फ़रिश्ते हो या साधारण मानव हो? (फ़रिश्ता) फ़रिश्ता कहाँ रहता है? ऊपर रहता है या नीचे? (ऊपर) तो नीचे क्यों ठहरते हो, अच्छा लगता है? कभी-कभी दिल होती है नीचे आने की? नहीं, फिर क्यों आते हो? बाप का साथ छोड़ते हो तब नीचे आते हो।
तो डबल विदेशियों को डबल पुरुषार्थ का प्रत्यक्ष फल डबल चांस है। इसका फायदा लो। इस वर्ष में क्या करेंगे? डबल सर्विस। महादानी-वरदानी बनेंगे या खुद बाप के आगे कहेंगे शक्ति दे दो औरों को भी शक्तियां दो। अच्छा है, हिम्मत रखने में नम्बर ले लिया। अभी फास्ट पुरुषार्थ कर आगे उड़ते चलो।
वरदान:- खुशी के खजाने से सम्पन्न बन सदा खुश रहने और खुशी का दान देने वाले महादानी भव
संगमयुग पर बापदादा ने सबसे बड़ा खजाना खुशी का दिया है। रोज़ अमृतवेले खुशी की एक प्वाइंट सोचो और सारा दिन उसी खुशी में रहो। ऐसे खुशी में रहते दूसरों को भी खुशी का दान देते रहो, यही सबसे बड़े ते बड़ा महादान है क्योंकि दुनिया में अनेक साधन होते हुए भी अन्दर की सच्ची अविनाशी खुशी नहीं है, आपके पास खुशियों का भण्डार है तो दान देते रहो, यही सबसे बड़ी सौगात है।
स्लोगन:- महान आत्माओं का परम कर्तव्य है - उपकार, दया और क्षमा।
10.03.2023 HiNDI MURLI
“मीठे लाडले बच्चे - तुम्हारी है रूहानी याद की यात्रा, तुम्हें शरीर को कोई तकलीफ नहीं देनी है, चलते-फिरते, उठते-बैठते बुद्धि से बाप को याद करो''
प्रश्नः- सदा खुशी किन बच्चों को रहती है? स्थाई खुशी न रहने का कारण क्या है?
उत्तर:- जो पुरानी दुनिया, पुराने शरीर से ममत्व तोड़ बाप और वर्से को याद करते हैं उन्हें ही स्थाई खुशी रहती है। जिनकी याद की यात्रा में माया के तूफान आते, अवस्था ठण्डी हो जाती उनकी खुशी स्थाई नहीं रहती। 2- जब तक भविष्य राजाई इन आंखों से नहीं देखते हैं, तब तक खुशी कायम नहीं रह सकती।
गीत:- हमें उन राहों पर चलना है...
ओम् शान्ति। यह बाप कहते हैं बच्चों प्रति, यह तो समझने की बात है। इतने बच्चे सिवाए प्रजापिता ब्रह्मा के और किसके होते नहीं। श्रीकृष्ण को कभी प्रजापिता नहीं कहा जाता। नाम गाया हुआ है ना प्रजापिता ब्रह्मा, जो होकर गये हैं वह इस समय प्रेजन्ट है। तो प्रजापिता ब्रह्मा की सन्तान ब्रह्माकुमार कुमारियां ढेर हैं। यह है प्रजापिता ब्रह्मा की औलाद। तो जरूर प्रजापिता ब्रह्मा का भी कोई बाप होगा ना। बच्चे जानते हैं हमारा दादा परमपिता परमात्मा शिव है। वह अब नई दुनिया रच रहे हैं अर्थात् पुरानी दुनिया को नई बना रहे हैं। इस पुरानी दुनिया में यह तन भी पुराने हैं। नई दुनिया में सतोप्रधान नये तन होते हैं। वह कैसे होते हैं, देखो, इन लक्ष्मी-नारायण को। यह है नई दुनिया के नये तन। इन्हों की महिमा भारतवासी जानते हैं। यह स्वर्ग नई दुनिया, नये विश्व के मालिक हैं। नई दुनिया जो थी वह अब पुरानी है। 84 जन्म लेने पड़ते हैं ना। इनका भी पूरा हिसाब है। कौन पूरे 84 जन्म लेते हैं? सब तो नहीं लेते। 84 जन्म सिर्फ वही लेते हैं जिनका आदि से अन्त तक पार्ट है। जो पहले इस सृष्टि पर थे। हर एक बात लाडले बच्चों को धारण करनी है। यहाँ कोई मनुष्य, मनुष्य को नहीं समझाते यह तो निराकार परमपिता परमात्मा मनुष्य तन में बैठ समझाते हैं। बलिहारी उनकी है। वह नहीं समझाते तो हम कुछ भी नहीं जानते। हम तो बिल्कुल तुच्छ बुद्धि थे। अभी रचयिता और रचना के आदि मध्य अन्त को जाना है। हू इज हू...इस बेहद ड्रामा में सबसे मुख्य पार्टधारी कौन-कौन हैं। यह अविनाशी बना बनाया ड्रामा है। गाते भी हैं बनी बनाई बन रही.. गायन भक्ति मार्ग में करते हैं। परन्तु यह अभी समझाया जाता है कि यह ड्रामा का खेल कैसे बना हुआ है।
बाप बैठ समझाते हैं लाडले बच्चे यह तो तुम जान गये हो कि तुमको यात्रा पर चलना है। मनुष्य यात्रा पर बहुत कष्ट सहन करके जाते हैं। अभी तो एरोप्लेन ट्रेन आदि बहुत सहज निकली हैं। आगे तो मनुष्य पैदल यात्रा पर जाते थे। चलते-चलते तूफान लगते थे। मनुष्य बेहाल हो जाते थे। फिर कोई वापिस लौट आते थे। तो आधाकल्प, द्वापर से लेकर जिस्मानी यात्रा चलती है। भक्ति मार्ग में मनुष्य यात्रा पर क्यों जाते हैं? भगवान को ढूढँने। भगवान कहीं बैठा तो नहीं है। भगवान के जड़ चित्र पूजे जाते हैं। जो होकर जाते हैं उनके जड़ चित्र बनाते हैं। चैतन्य में तो भगवान मिल न सके। शिवलिंग आदि यह सब जड़ चित्र हैं। जड़ चित्रों को देखने के लिए यात्रा करते हैं। यह एक भक्ति मार्ग की रसम है। जानते हैं परन्तु कोई की भी बायोग्राफी को नहीं जानते कि यह कौन हैं, कब आये थे? शिव जयन्ती मनाई जाती है, परन्तु उनको भी जानते नहीं। आजकल तो इस उत्सव को भी उड़ा दिया है क्योंकि इनका नाम रूप आदि प्राय:लोप होना ही है। अभी तुम जानते हो ऊंचे ते ऊंच ज्ञान का सागर, सुख का सागर है। सागर से अभी हमको ज्ञान मिल रहा है। वही बेहद का बाप अभी प्रैक्टिकल में है। अमरनाथ भी शिवबाबा है ना। दिखाते हैं बर्फ का लिंग बन जाता है। मनुष्यों को ठगने के लिए गपोड़े तो बहुत लगाये हैं। तो उस जिस्मानी यात्रा पर तकलीफ बहुत होती है। यह है रूहानी यात्रा, इसमें शरीर की कोई तकलीफ नहीं है। तुम बच्चे समझते हो हम बेहद के बाप के बच्चे हैं। भक्ति मार्ग में जन्म-जन्मान्तर याद करते आये हैं। अब स्मृति आई है। बाप कहते हैं तुम 63 जन्म ढूढँते-ढूँढते उतरते गये। पहले एकदम कड़ी नौधा भक्ति करते हैं। फिर भी दुनिया को तमोप्रधान तो जरूर होना है। झाड वृद्धि को पाता है जरूर। एक भी मनुष्य वापिस मेरे पास आ नहीं सकते। नाटक में सबको अपना पार्ट बजाना है। सतो रजो तमो में आना है। नम्बरवन का ही मिसाल लो। नम्बर-वन लक्ष्मी-नारायण सतोप्रधान थे, अब तमोप्रधान हैं। जिसमें ही फिर शिवबाबा ने प्रवेश किया है क्योंकि इनको ही फिर नम्बरवन बनना है। फिर पलस में मॉ को रखते हैं। माताओं को लिफ्ट देनी होती है। पहले लक्ष्मी फिर नारायण, माताओं का नाम ऊंचा किया जाता है। माता सदैव पतिव्रता होती है। पुरुष कभी पत्नीव्रता नहीं होते हैं। वन्दे मातरम् कहा जाता है। इस समय तुम बाप के बने हो। तो तुम हो जाते हो ब्रह्माकुमार कुमारी। माता गुरू बिगर कभी किसका उद्धार होता नहीं। गुरू तो बहुत ढेर के ढेर हैं। फिर भी कलियुग घोर अन्धियारा हो गया है। कितने गुरू गोसाई हैं। कहाँ-कहाँ हरिद्वार आदि में उन्हों के मन्दिर बने हुए हैं। नहीं तो वास्तव में मन्दिर उनको कहा जाता है जिसमें देवतायें होते हैं। संन्यासी लोगों का कभी मन्दिर नहीं होता है। मन्दिरों में तो देवतायें ही रहते हैं क्योंकि उन्हों की आत्मा और शरीर दोनों पवित्र हैं। इन महात्माओं की भल आत्मा पवित्र है, परन्तु शरीर पवित्र मिल नहीं सकता क्योंकि तत्व भी तमोप्रधान हैं। अभी तुम देवता बन रहे हो। बनाने वाला है परमपिता परमात्मा। यह है सतोप्रधान संन्यास। वह है रजोप्रधान संन्यास। यह बाप के सिवाए कोई सिखला न सके। तो बाबा ने समझाया है कि वह है जिस्मानी यात्रा, यह है रूहानी यात्रा। इसमें कर्मेन्द्रियों का कोई काम नहीं, कुछ भी तकलीफ की बात नहीं है। बहुत सहज है। वह जिस्मानी यात्रा अनेक प्रकार की है। यह रूहानी यात्रा एक ही है। यह है राजाई के लिए यात्रा। यह लक्ष्मी-नारायण का चित्र सामने खड़ा है, दुनिया थोड़ेही जानती है कि इन्हों ने यह राजयोग की यात्रा कर यह पद पाया है। तुम बच्चे जानते हो इन्हों ने यह प्रालब्ध कैसे पाई। कोई ऊपर से नई आत्मायें तो नहीं आई, जिनको भगवान ने राजाई दे दी। नहीं। इन्हों को पुराने से नया बनाया हुआ है जिसको रिज्युवनेट वा काया कल्पतरू कहा जाता है। तो बाप बैठ समझाते हैं इन्होंने रूहानी यात्रा की थी। राजयोग बल की यात्रा से यह बने। बाप राजयोग और ज्ञान सिखाने आते हैं तो अब तुम्हारी यात्रा चल रही है। तुम बैठे हुए अथवा चलते फिरते उठते बैठते यात्रा पर हो। तुम सिर्फ बुद्धि से बाप को याद करते हो। याद से ही दौड़ी पहनते हो और तुम्हारे विकर्म विनाश होते हैं। जितना जल्दी विकर्म विनाश होंगे उतना जल्दी बाप के गले का हार बनेंगे। तुम अब वह 4 धाम आदि नहीं करते हो। वह सब भक्तिमार्ग के जिस्मानी तीर्थों पर जाए वहाँ से फिर लौट आकर घर में विकर्मी बनते हैं। जितना समय यात्रा पर रहते हैं, उतना समय निर्विकारी रहते हैं। आजकल तो हरिद्वार में जाकर देखो पण्डे लोग बड़े गन्दे रहते हैं। लोग यात्रा पर जाते हैं तो पवित्र रहते हैं और वहाँ के रहवासी पण्डे लोग अपवित्र रहते हैं। तुम्हारी यात्रा कितनी स्वच्छ है। कुछ भी धक्का आदि नहीं खाना है। बाबा कहते हैं लाडले बच्चे उठते बैठते चलते फिरते सिर्फ मुझे याद करो। यह आत्माओं से बात कर रहे हैं। आत्मा इन आरगन्स द्वारा सुनती है। आत्मा मुख से बोलती है, आंखों से देखती है। आत्मायें इन आंखों से दिखाई नहीं पड़ती, न परमात्मा दिखाई पड़ता। दोनों को दिव्य दृष्टि बिगर देखा नहीं जा सकता है। समझा जाता है तब कहते हैं हमारे में आत्मा है। हमारी आत्मा दु:खी है। हमारी आत्मा एक शरीर छोड़ दूसरा जाकर लेती है। आत्मा बोलती है ना। परमात्मा भी आत्मा से बात करते हैं - हे लाडले बच्चे, आत्मायें अब तुमको मेरे पास आना है। मैं तुमको यात्रा सिखलाता हूँ। तुम पवित्र बनने सिवाए मेरे पास आ नहीं सकते हो। आत्मा पवित्र है। पहले-पहले आत्मा सतोप्रधान है फिर सतो रजो तमो गुणी होती है। शरीर भी सतो रजो तमो होता है। सतोप्रधान को गोरा, तमोप्रधान को सांवरा कहा जाता है। कितनी समझ की बात है। तुम जानते हो आत्मा और परमात्मा अलग रहे बहुकाल....अब आकर फिर मिले हैं। मनुष्य, मनुष्य के साथ मिलेंगे। आत्मा, आत्माओं के साथ मिलेगी। परमात्मा भी वहाँ मिलेंगे। आत्मा और परमात्मा दोनों का साक्षात्कार दिव्य दृष्टि से होता है क्योंकि वह अति सूक्ष्म है, स्टार है। अब कोई भी साइन्स घमण्डी नहीं जो कह सके आत्मा की प्रवेशता कैसे होती है। इन बातों का उनको बिल्कुल पता नहीं है। मोस्ट बील्वेड बाप है। भक्ति मार्ग में आधाकल्प भक्त भगवान को याद करते हैं। ऐसे नहीं कि सब भगवान हैं। सब भगवान हों तो भक्त आराधना, वन्दना, साधना क्यों करते, किसलिए करते? सभी मुक्ति जीवनमुक्ति चाहते हैं क्योंकि यहाँ दु:खी हैं, चाहते हैं शान्ति हो। परन्तु बिचारों को यह पता नहीं है कि शान्तिधाम किसको कहा जाता है, मुक्ति कहाँ होती है। यह भी नहीं जानते। कहने मात्र सिर्फ कह देते हैं कि पार निर्वाण गया। जानते कोई भी नहीं हैं।
अब तुम बच्चे यात्रा पर हो। बाप कहते हैं बच्चे सम्भल-सम्भल कर चलना है। तूफान तो बहुत आयेंगे। तुम याद करने की कोशिश करेंगे, माया बुद्धियोग तोड़ देगी। फिर वह अवस्था ठण्डी हो जाती है। खुशी का पारा हट जाता है। नहीं तो खुशी का पारा स्थाई रहना चाहिए। इन आंखों से वह राजाई देखते हैं तो खुशी कायम रहती है। यहाँ तुम बुद्धियोग से जानते हो कि राजाई मिलती है। राजाई के लिए हम पढ़ रहे हैं। इन आंखों से नहीं देखते हो इसलिए माया घड़ी-घड़ी भुला देती है। बाबा कहते हैं गृहस्थ व्यवहार में रहते हुए कमल फूल समान रहो। पुरानी दुनिया, पुराने शरीर सबसे ममत्व तोड़ते जाओ। एक बाप को याद करो। पहले तुमको बाप के पास जाना है फिर नई दुनिया में आना है। बाप और वर्से को याद करो फिर जब हम यहाँ आयेंगे तो वह होगी प्रालब्ध। उसको याद नहीं करेंगे। अभी हम पुरुषार्थ करते हैं भविष्य प्रालब्ध पाने के लिए। यहाँ मनुष्य पुरुषार्थ करते हैं यहाँ की आजीविका के लिए। हम भविष्य की आजीविका के लिए पुरुषार्थ करते हैं। गृहस्थ व्यवहार में रहते फिर यह कोर्स भी उठाना है। नॉलेज को धारण करना है, फिर तुमको पुरुषार्थ नहीं करना होगा। वहाँ तुम पुरुषार्थ नहीं करते प्रालब्ध भोगते हो। तुम जानते हो हम भविष्य बनाते हैं वहाँ प्रालब्ध भोगेंगे। वहाँ याद नहीं रहती कि हम प्रालब्ध भोगते हैं। फिर तो पुरुषार्थ भी याद पड़े। पुरुषार्थ और प्रालब्ध दोनों ही भूल जाते हैं। प्रालब्ध भोगते रहते हैं, पास्ट का पता नहीं रहता। अभी तुम पास्ट, प्रेजन्ट, फ्युचर को जानते हो और कोई मनुष्य नहीं जो पास्ट, प्रेजन्ट फ्युचर को जानते हो। इसको कहा जाता है त्रिकालदर्शी।
बाबा ने रूहानी यात्रा और जिस्मानी यात्रा का कान्ट्रास्ट भी अच्छी रीति समझाया है। जिस्मानी यात्रा जन्म-जन्मान्तर करते आये, यह रूहानी यात्रा है एक जन्म की। स्वर्ग में जायेंगे फिर लौटकर इस मृत्युलोक में आना नहीं है। अच्छा!
मीठे-मीठे सिकीलधे स्वदर्शन चक्रधारी बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का यादप्यार और गुडमार्निग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।
धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) सतोप्रधान संन्यास से आत्मा और शरीर दोनों को पवित्र बनाना है। पुरानी दुनिया और पुराने शरीर से ममत्व तोड़ देना है।
2) त्रिकालदर्शी बन पास्ट, प्रेजन्ट, फ्युचर को बुद्धि में रख पुरुषार्थ करना है। नॉलेज को धारण कर स्थाई खुशी में रहना है।
वरदान:- पुराने हिसाब-किताब को समाप्त कर सम्पूर्णता का समारोह मनाने वाले बन्धनमुक्त भव
इस पराये देश में जब सभी बंधन-युक्त आत्मा बन जाते हैं तब बाप आकर स्वरूप और स्वदेश की स्मृति दिलाकर बन्धन-मुक्त बनाए स्वदेश में ले जाते हैं और स्वराज्य अधिकारी बनाते हैं। तो अपने स्वदेश में चलने के लिए सब हिसाब-किताब के समाप्ति का समाप्ति समारोह मनाओ। जब अभी यह समारोह मनायेंगे तब अन्त में सम्पूर्णता समारोह मना सकेंगे। बहुतकाल के बन्धनमुक्त ही बहुतकाल के जीवनमुक्त पद को प्राप्त करते हैं।
स्लोगन:- अपने उमंग-उत्साह के सहयोग और मीठे बोल से कमजोर को शक्तिशाली बना देना ही शुभचिंतक बनना है
09.03.2023 HINDI MURLI
“मीठे बच्चे - तुम्हें बाप के आक्यूपेशन और गुणों सहित उसे याद करना है, याद से ही तुम विकर्माजीत बनेंगे, विकारों की मैल भस्म होगी''
प्रश्नः- ज्ञान की धारणा किन बच्चों को बहुत सहज हो सकती है?
उत्तर:- जिनमें कोई भी पुराने उल्टे सुल्टे संस्कार नहीं हैं, जिनकी बुद्धि याद से शुद्ध होती जाती है, उन्हें ज्ञान की बहुत अच्छी धारणा होती है। 2- पवित्र बुद्धि में ही अविनाशी ज्ञान रत्न ठहरेंगे। 3- भोजन बहुत शुद्ध हो - बाप को स्वीकार कराकर फिर खाने से भी ज्ञान की धारणा अच्छी होती है। ज्ञान को धारण करते-करते तुम मुरलीधर बन जाते हो।
गीत:- तुम्हारे बुलाने को जी चाहता है...
ओम् शान्ति। आत्मा परमात्मा को बुलाती है सिर्फ आत्मा कहें तो कहेंगे आत्मा तो वाणी से परे है इसलिए कहते हैं जीवात्मा, परमात्मा को बुलाती है। भक्तों की बुद्धि परमात्मा के बारे में कहाँ-कहाँ जाती है। कुछ भी मनुष्य समझते नहीं क्योंकि वह समझते हैं परमात्मा सर्व-व्यापी है तो बुद्धि कहाँ जायें। सर्वव्यापी समझने के कारण कहेंगे सब भगवान के रूप हैं। बुलाते हैं परन्तु बुद्धि में लक्ष्य नहीं है। परमपिता परमात्मा तरफ बुद्धि जाती नहीं है। किसी भी जीव आत्मा की बुद्धि में यह नहीं आता कि हम उस ज्योतिलिंगम् को याद क्यों करते हैं? वह हमको क्या देते हैं, जो हम उनको याद करते हैं? जो बहुत अच्छा देकर जाते हैं, उनको याद किया जाता है। उनकी याद जिन्दगी भर रहती है। कोई ने पाई पैसा दिया वह तो लेन-देन चलती ही है। परन्तु समझो कोई गरीब है, उनको कोई मकान बनाकर देवे या उनकी कन्या को शादी कराने में कोई मदद करता है तो सारी आयु उनकी याद रहेगी। उनके नाम रूप की याद रहेगी। फलाने ने हमको मकान बनाकर दिया। यहाँ भी तुम बच्चे समझते हो बाप हमको विश्व का मालिक बनाते हैं। मनुष्यों को तो न आत्मा का, न परमात्मा का ज्ञान है। आत्मा है सूक्ष्म ते सूक्ष्म, जिसका पता नहीं पड़ता। कब अन्दर प्रवेश करती है फिर निकल जाती है, बहुत महीन बातें हैं। उनका साक्षात्कार भी दिव्य दृष्टि से ही देख सकते हैं। वह ब्रह्म कहते हैं तो ब्रह्म का भी साक्षात्कार हो पड़ेगा। अखण्ड लाइट ही लाइट देखने में आयेगी। ब्रह्म तत्व तो जरूर बड़ी रोशनी देखने में आयेगी। परन्तु परमात्मा कोई वह चीज़ तो नहीं है ना, जो मनुष्य समझ बैठे हैं। तुम बच्चों की भी बुद्धि में आगे लिंग रूप रहता था। अभी तो बुद्धि में है कि वह स्टार है। आत्मा का वही रूप है, दूसरी कोई चीज़ हो नहीं सकती। परमात्मा भी वही बिन्दी रूप है। अब लक्ष्मी-नारायण की इतनी महिमा है, उनमें क्या ब्युटी है? आत्मा और शरीर दोनों सतोप्रधान पवित्र हैं। हर्षितमुख हैं, गोरे हैं। आत्मा तो बहुत सूक्ष्म चीज़ है ना। समझाया जाता है आत्मा मैली हो जाती है तो लाइट कम होती है। यह लाइट कम और जास्ती की भी बहुत महीन बात है। हम दीपक का मिसाल देते हैं, परन्तु आत्मा उनसे भी छोटा सा स्टार है। साक्षात्कार होता है देखा और गया। अब तुम बाप का सिमरण करते हो। बाप ने अपना रूप बताया है। तुम जानते हो शिवबाबा को याद करने से विकर्म विनाश होते हैं। भल और मनुष्य शिव को याद करते हैं परन्तु इस ज्ञान से याद नहीं करते। वह जानते ही नहीं। न जानने कारण विकर्म विनाश हो नहीं सकते। यह जानते ही नहीं कि हम योग लगाने से विकर्माजीत बनेंगे। अच्छा फिर क्या होगा? यह भी नहीं जानते। तुमको बाप समझाते हैं योग से तुम विकर्माजीत बनेंगे। 5विकारों की मैल भस्म होगी। समझानी मिलने के बाद उस खुशी से याद करेंगे। वह यह नहीं जानते कि बाप को याद करने से विकर्म विनाश होंगे। अभी बाप नॉलेज देते हैं। बाकी मनुष्य तो हैं अन्धश्रधा में, जिससे भक्ति मार्ग में अल्पकाल सुख मिलता है।
अब उनको यहां बुलाते हैं, तुम जानते हो बुलाने की तो दरकार ही नहीं। जबकि परमात्मा को जानते ही नहीं तो फिर बुलाते कैसे? जिसको याद किया जाता है, उनके महत्व को, आक्यूपेशन को, गुणों को जानना चाहिए। परमात्मा की पहचान कोई के पास भी है नहीं इसलिए जन्म जन्मान्तर क्या-क्या करते आये हैं, कुछ भी समझ नहीं। अब बाप बैठ समझाते हैं। गीत में भी कहते हैं बाबा आप आकर ज्ञान सुनाओ तो हम सुनकर फिर औरों को सुनायेंगे। जैसे शास्त्रों में आटे में नमक है वैसे इन भक्ति मार्ग के गीतों में भी थोड़ा बहुत है। यह गीत बाप की महिमा में है बाप को बुलाते हैं कि आप आकर हमको सुनाओ तो हम फिर औरों को सुनायेंगे। आकर हमको राजयोग सिखलाओ फिर हम मुरलीधर बनेंगे। मुरलीधर को ही ज्ञानी तू आत्मा कहा जाता है। तुम बच्चे जानते हो बाप तो है निराकार। फिर वह आये कैसे? अभी तो समझा है कि आत्मा परमधाम से आती है। पहले-पहले गर्भ में जाना पड़ता है। जीव की आत्मायें सब बाप को याद करती हैं, परन्तु उनके आक्यूपेशन का कुछ भी पता नहीं है। ऐसे ही सिर्फ बुलाते रहते हैं। वह आता ही नहीं। बाप कहते हैं मैं अपने पूरे टाइम पर आता हूँ जबकि संगमयुग शुरू होता है। संगमयुग कब आता है? जब रात पूरी हो दिन होना होता है। संगमयुग आया और बाप भी साथ आया। संगमयुग पर ही बाप बैठ पढ़ाते हैं। यह सब बातें तुम ब्राह्मण बच्चे ही जानते हो। बाप बैठ समझाते हैं मैं निराकार आऊं कैसे। यह तो कभी कोई ने ख्याल नहीं किया है। अगर कलियुग के अन्त में आया होगा तो फिर से आयेगा ना। कलियुग अन्त और सतयुग आदि के संगम पर आते हैं। जरूर कुछ कार्य करने के लिए आते हैं। जरूर सृष्टि को पावन करने आयेंगे, तब कहते हैं कि अब आदि सनातन देवी-देवता धर्म स्थापन करने आते हैं। कैसे आते हैं, यह भी कोई नहीं जानते हैं। बाप को आकर प्रजा रचनी है वा राजयोग सिखाना है तो किसको सिखायेंगे? सतयुग आदि में तो है देवता वर्ण। इसके पहले है ब्राह्मण वर्ण। तो जरूर ब्रह्मा तन में आकर ब्राह्मण वर्ण रचना पड़े। ब्रह्मा को कहा ही जाता है प्रजापिता। अब वह ब्रह्मा आये कहाँ से। क्या सूक्ष्मवतन से उतर आये? जैसे दिखाते हैं विष्णु अवतरण, ऊपर से गरूड पर सवार हो आते हैं। अब विष्णु को तो यहाँ आना नहीं है। विष्णु के दो रूप लक्ष्मी-नारायण जो हैं उन्होंने भी यहाँ इस पढ़ाई से यह पद पाया है। विष्णु के दो रूप लक्ष्मी-नारायण ही पालना करते हैं। परन्तु ऐसे कोई गरूड पर उतरते नहीं हैं और फिर वहाँ लक्ष्मी-नारायण की आत्मा कोई इक्ट्ठी नहीं आती है। पहले नारायण की आत्मा आयेगी फिर लक्ष्मी की आयेगी। स्वयंवर करेंगे तब विष्णु युगल रूप कहलायेंगे। राधे कृष्ण बरोबर विष्णु के दो रूप हैं। छोटापन भी दिखाना पड़े ना। यह बातें और कोई नहीं जानते हैं। बाप बैठ समझाते हैं जब यह पहला नम्बर 84 जन्म पूरे करते हैं तो हमको इनमें ही आकर फिर इनको पहला नम्बर बनाना पड़े। 84जन्म भोग जरूर वृद्ध अवस्था को पाया होगा तो उनका नाम रखा है ब्रह्मा। इनमें प्रवेश किया है।
अब तुम बच्चे समझते हो मनुष्य सृष्टि कैसे और कब रचते हैं। इस बात का और कोई मनुष्य को ज्ञान हो न सके। मनुष्य जब कोई अच्छी नई चीज़ की इन्वेन्शन निकालते हैं तो गवर्मेन्ट के पास जाते हैं फिर वह उसको वृद्धि में लाने में मदद करती है। यह भी ज्ञान ऐसे है। पहले-पहले बाप आया इसमें प्रवेश हुआ, इनमें बैठ ज्ञान दिया। पहले थोड़ा-थोड़ा था अब वृद्धि को पाता जाता है। कितनी गुह्य ते गुह्य बातें तुम सुन रहे हो। पहले हल्का ज्ञान था अब गहरा मिलता जाता है। परन्तु आत्मा में पुराने उल्टे सुल्टे भक्ति के संस्कार जो हैं वह जब निकलें तब ज्ञान की धारणा हो। योग हो तब विकर्म विनाश होते जायें और बुद्धि शुद्ध होती जाये। पहले थोड़ा भी ज्ञान सुनने से कितना नशा चढ़ा और भागे। फिर कितने टूट भी पड़े। माया भी हैरान कर देती है। अब ब्रह्मा के बच्चे वह हो गये ब्रह्माकुमार और कुमारियां। यह पूरी रीति समझाना है। नहीं तो मनुष्य डरते हैं। अब बाप को तो जरूर ब्रह्मा का शरीर लेना पड़े। सो भी बड़ा चाहिए। छोटे बच्चे में प्रवेश करेंगे क्या? कहते हैं बहुत जन्मों के अन्त के जन्म के अन्त में आता हूँ। इसने बहुत शास्त्र पढ़े हैं, गुरू किये हैं। तो अनुभवी होगा ना। बाप कहते हैं मैं वानप्रस्थ अवस्था में आता हूँ। शास्त्र आदि पढ़े हैं तब तो समझा सकते हैं। अब तुम बच्चे जानते हो कैसे बाबा आता है और आकर मनुष्य से देवता बनाते हैं अर्थात् पुरानी दुनिया को नया बनाते हैं। तुम को अभी नया बना रहे हैं। इस पुराने तन में राजयोग सीख फिर सतयुगी नया शरीर जाकर लेंगे। फिर देवी-देवता कहलायेंगे। वहाँ माया होती नहीं। यह तुम समझा सकते हो कि हम ब्रह्माकुमार कुमारियां हैं। ब्रह्मा को प्रजापिता कहा जाता है। यह तो सब मानेंगे कि भगवान ने आदम-बीबी (ब्रह्मा सरस्वती) द्वारा रचना रची है। गीता में कहते हैं मैं राजाओं का राजा बनाता हूँ। शूद्र से ब्राह्मण बनाकर ज्ञान अमृत पिलाए असुर से देवता बनाते हैं। भल यह लिखा हुआ है परन्तु पहले शूद्र वर्ण से ब्राह्मण वर्ण में लाते हैं तो तुम समझा सकते हो हम ब्रह्माकुमार कुमारी हैं। ब्रह्मा है प्रजापिता। वास्तव में ब्रह्मा की सन्तान तुम भी हो, ब्राह्मणों की शुरूआत संगम पर ही होती है। ब्रह्मा द्वारा हम ब्राह्मण पढ़ते हैं। रूद्र ज्ञान यज्ञ की सम्भाल करते हैं। हम अपने विकारों की आहुति देते हैं। यज्ञ में सब कुछ स्वाहा किया जाता है ना। तो हम रूद्र ज्ञान यज्ञ में और कोई किचड़ा नहीं डालते, अपने पापों को स्वाहा करते हैं। कोई आग आदि तो जलाई नहीं जाती। न कोई आवाज आदि ही करते हैं। वह तो कितना आवाज करते हैं - स्वाहा, स्वाहा.... हम तो योग में रहते हैं, कोई आवाज नहीं। चुप। योग अग्नि से पाप भस्म हो जाते हैं। इस रूद्र ज्ञान यज्ञ में योग अग्नि से हम अपने 5विकारों को स्वाहा करते हैं तो पाप भस्म हो जाते हैं। ब्रह्मा की बेटी सरस्वती भी गाई हुई है जिसको जगदम्बा कहते हैं, उनसे सब कामनायें पूरी होती हैं। वह अम्बा फिर लक्ष्मी बनती है।
बच्चों को प्वाइंटस तो बहुत समझाई जाती हैं, धारणा भी हो ना। धारणा तब हो जब योग में रहें फिर विकर्म भी विनाश हो, बुद्धि पवित्र नहीं होगी तो अविनाशी ज्ञान रत्न ठहरेंगे नहीं। बच्चों को समझाया है कि पहले भोग लगाकर फिर खाया जाता है क्योंकि उनका ही सब दिया हुआ है। तो फिर पहले उनको याद कर भोग लगाते हैं, आह्वान किया जाता है। फिर जैसेकि साथ में मिलकर खाते हैं। बाबा तो है सम्पूर्ण पवित्र। हम हैं जैसे भीलनियां। हम याद करते हैं तो क्या बाबा हमारे साथ बैठ खा सकता है। हम अपने को सम्पूर्ण पवित्र तो कह नहीं सकते। तो हम भीलनियों के साथ वह खायेंगे? फिर वासना ले लेते हैं। वासना लेना कोई खाना तो नहीं हुआ ना। खुशबू ले लेते हैं। हाँ कोई 75 परसेन्ट धारणा करने वाले अच्छे बच्चे भोजन बनाकर बाबा को खिलायें तो वासना लायक भी हो क्योंकि बाबा है बिल्कुल शुद्ध। वह हम पतित के साथ खाये यह लॉ नहीं कहता। वह वासना ले सकता होगा? बाबा कहते हैं मैं वासना भी क्यों लूँ, मैं तो निष्कामी हूँ। वासना लेने की भी मेरे पास कामना नहीं है। मैं 100 परसेन्ट निष्कामी हूँ। भोग ऊपर जाता है, बहुरूपी बैठ देवताओं को खिलाते हैं। देवतायें चाहते हैं हम ब्रह्मा भोजन खायें तो बाबा मम्मा और फिर ऊपर से देवताओं की आत्मा आती है, वह बैठ खाती है। फिर भी रूचि से तब खायेगी जब पकाने वाले योगी हों। देवतायें भी ब्रह्मा भोजन की महिमा करते हैं। बाप तो कहते हैं मैं आया हुआ हूँ तुम्हारी सर्विस करने। हम तो तुम्हारा पूरा निष्कामी सर्वेन्ट हूँ। तुम भल 36 प्रकार के तो क्या 108 प्रकार का भोग लगाओ, भक्तों ने ही भोग लगाया और भक्तों ने ही बांट कर खाया। भगवान निष्कामी है तो भी आफर करना चाहिए। बड़े राजायें आदि कभी हाथ में नहीं लेते हैं। उनमें भी किसम-किसम के होते हैं। कोई ले भी लेते हैं। बाबा का राजाओं आदि से कनेक्शन रहा है ना। तो हम बाबा को भोग लगाते हैं, कामना है कि हम बाबा से विश्व का मालिक बनने राजाई लेवें। वह तो है ही दाता। यह सारी सूक्ष्म बातें हैं। भोग कहाँ ले नहीं जाते हैं। यहाँ ही बैठ वैकुण्ठ का साक्षात्कार करते हैं। यहाँ से जैसेकि गुम हैं। अच्छा!
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का यादप्यार और गुडमार्निग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।
धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) बाप भल निष्कामी है लेकिन भोजन का भोग जरूर लगाना है। बहुत शुद्धि से भोजन बनाकर बाबा के साथ बैठकर खाना है।
2) इस रूद्र यज्ञ में योगबल से अपने पाप स्वाहा करने हैं। आवाज में नहीं आना है, चुप रहना है। बुद्धि को योगबल से पवित्र बनाना है।
वरदान:- न्यारे और प्यारे पन की विशेषता द्वारा बाप के प्रिय बनने वाले निरन्तर योगी भव
मैं बाप का कितना प्यारा हूँ - इसका हिसाब न्यारेपन से लगा सकते हो। अगर थोड़ा न्यारे हैं, बाकी फंस जाते हैं तो प्यारे भी इतने होंगे। जो सदा बाप के प्यारे हैं उसकी निशानी है स्वत: याद। प्यारी चीज़ स्वत: और निरन्तर याद रहती है। तो यह कल्प-कल्प की प्रिय चीज़ है। ऐसी प्रिय वस्तु भूल कैसे सकते! भूलते तब हो जब बाप से भी अधिक कोई व्यक्ति या वस्तु को प्रिय समझने लगते हो। अगर सदा बाप को प्रिय समझो तो निरन्तर योगी बन जायेंगे।
स्लोगन:- जो अपने नाम-मान और शान का त्याग कर बेहद सेवा में रहते हैं वही परोपकारी हैं।
08.03.2023 HINDI MURLI
“मीठे बच्चे - सबको सुख देने वाला भोला व्यापारी एक बाप है, वही तुम्हारी सब पुरानी चीजें लेकर नई देते हैं, उनकी ही पूजा होती है''
प्रश्नः- तुम्हारी गॉडली मिशनरी का कर्तव्य क्या है? तुम्हें कौन सी सेवा करनी है?
उत्तर:- तुम्हारा कर्तव्य है - सभी मनुष्यमात्र का कल्याण करना। सबको तमोप्रधान से सतोप्रधान बनाने के लिए बाप का सन्देश देना। तुम सबको बोलो कि स्वर्ग स्थापन कर्ता बाप को याद करो तो तुम्हारा कल्याण होगा। तुम्हें सबको लक्ष्य देना है। जो देवताओं को मानने वाले, तुम्हारे कुल के होंगे वह इन सब बातों को समझेंगे। तुम्हारी हैं रूहानी बातें।
गीत:- भोलेनाथ से निराला...
ओम् शान्ति। भोलानाथ शिवबाबा बैठ समझाते हैं। भोलानाथ सिर्फ एक शिवबाबा है। गौरीनाथ जो कहते हैं, गौरी कोई एक पार्वती नहीं होती। गौरीनाथ या बबुलनाथ अर्थात् बबुल जैसे कांटों को फूल और जो सांवरे बन पड़े हैं उनको गोरा बनाने वाले हैं। महिमा सारी है ही एक की। यह है मनुष्य सृष्टि रूपी झाड़ वा ड्रामा। जब ड्रामा कहा जाता है तो उनमें जो मुख्य एक्टर्स हैं वह जरूर याद आते हैं। मुख्य जरूर हीरो हीरोइन की जोड़ी होती है। यहाँ भी मुख्य कोई जरूर चाहिए। मात-पिता नामीग्रामी हैं। सूक्ष्मवतन में कहते हैं शंकर पार्वती हैं। ब्रह्मा का किसको पूरा मालूम नहीं है। ब्रह्मा सरस्वती कह देते हैं, परन्तु वह कोई जोड़ी है नहीं। वास्तव में शंकर पार्वती की भी जोड़ी है नहीं। विष्णु को भी दुनिया नहीं जानती। उनको जो अलंकार दिखाते हैं वह भी उनके नहीं हैं। यहाँ लक्ष्मी-नारायण की जोड़ी कहेंगे। अब सभी से भोलानाथ उनको कहा जाता है जो बहुत सुख देने वाला है। भोलानाथ व्यापारी भी है। हमसे पुरानी चीज़ लेकर नई देता है। पहले-पहले बुद्धि में आना चाहिए - सभी से ऊंच ते ऊंच कौन? सबसे अधिक सुख देने वाला कौन? जो बहुतों को सुख देते हैं उनकी पूजा भी होती है। तो यह सब विचार सागर मंथन करने की बातें हैं। विचार सागर मंथन का नाम बहुत बाला है। तो विचार किया जाता है मनुष्यों में ऊंच ते ऊंच हैं लक्ष्मी-नारायण, अच्छा उन्होंने क्या सुख दिया है, जो मनुष्य उनका नाम लेते हैं या उनकी पूजा करते हैं? वास्तव में उन्होंने सुख तो कोई भी नहीं दिया है। हाँ वे सुखधाम के मालिक थे, परन्तु उन्हों को ऐसा बनाया किसने? इनके पहले वह कहाँ थे? अगर बाबा उन्हों को ऐसा नहीं बनाता तो वे कहाँ होते! यह सब तो बच्चों को मालूम है। आत्मा तो कभी विनाश होती नहीं। उन्हों को ऐसा काम किसने सिखलाया जो इतना ऊंच बनें? जरूर कोई शिक्षा मिली है! दुनिया नहीं जानती वह पास्ट में कौन थे। तुम अब जानते हो लक्ष्मी-नारायण 84 जन्म भोग अन्त में ब्रह्मा सरस्वती बनते हैं। तो क्या लक्ष्मी-नारायण की महिमा गाई जाए या उन्हों को जो पुरूषार्थ कराने वाला है अथवा प्रालब्ध देने वाला है उनकी महिमा की जाए? कितनी गुह्य बातें हैं। समझाना है कि लक्ष्मी-नारायण क्या करके गये? उनकी भी सारी राजधानी चली है। परन्तु गायन सिर्फ एक का ही चला आता है। शंकराचार्य ने आकर संन्यासियों की रचना रची, फिर उन्हों की पालना भी की। फिर जब तमोप्रधान अवस्था को पाते हैं तो उन्हें सतोप्रधान कौन बनाये? माया ने सबको तमोप्रधान बनाया है। लक्ष्मी-नारायण जो सतोप्रधान थे फिर चक्र लगाकर तमोप्रधान में आते हैं। हर एक का ऐसे होता है। भल कितने भी बड़े मर्तबे वाला हो - सतो, रजो, तमो से हर एक को पास करना है। इस समय सब पतित हैं। तो तमोप्रधान दुनिया को फिर से सतोप्रधान कौन बनाये? पहले-पहले सतोप्रधान सुख में आते हैं फिर दु:ख में जाते हैं। यह राज़ अब तुम बच्चों को समझाया जाता है। 84 जन्म लेना होता है तो जरूर सतोप्रधान से तमोप्रधान बनना ही होगा। हर चीज़ सतो रजो तमो जरूर होती ही है। प्रिसेप्टर्स का भी ऐसे होता है। वह भी अब तमोप्रधान हैं। तो फिर भी अब सबसे ऊंच ते ऊंच कौन है, जो कभी भी तमोप्रधान नहीं बनता? अगर वह भी तमोप्रधान बन जाए तो फिर उनको सतोप्रधान कौन बनाये? फिर बलिहारी उनकी हो जाए। ऐसे-ऐसे विचार सागर मंथन करने से दिल में जो प्वाइंट जंचती है, अच्छी लगती है तो सुनाई जाती है। भोलानाथ परमपिता परमात्मा ही सबका सद्गति दाता, सतोप्रधान बनाने वाला है। सब दुर्गति से निकल गति सद्गति को पाते हैं। नम्बरवार जो भी पहले-पहले आयेंगे वह सतोप्रधान, सतो, रजो से होकर फिर तमोप्रधान बनेंगे जरूर। पहले-पहले जब आत्मा नीचे आती है तो उनको सुख भोगना है। दु:ख भोग न सके। मनुष्य पहचान नहीं सकते कि यह नया सोल है इसलिए इतना सुख है, मान है। अब सबकी तमोप्रधान अवस्था है। तत्व, खानियां आदि सब तमोप्रधान हैं। नई चीज़ें थी, अब पुरानी हो गई हैं। वहाँ का अनाज फल फूल आदि कैसे अच्छे होते हैं, वह भी बच्चों को साक्षात्कार कराया हुआ है। सूक्ष्मवतन में बच्चियां जाती हैं, कहती हैं बाबा ने शूबीरस पिलाया। जरूर ऊंच बाप, चीज़ भी ऊंची देते होंगे। बच्चों को यह बुद्धि में रहना चाहिए - ऊंच ते ऊंच एक भगवान ही है। याद भी सब उनको करते हैं। गॉड फादर कहते हैं, गॉड रहते ही हैं ऊपर में। आत्मा गॉड फादर को याद करती है क्योंकि आत्मा को दु:ख है तो भोलानाथ बाप आकर फिर सुख देते हैं। तो उनको क्यों नहीं याद करेंगे? आत्मा कहेगी हम शरीर के साथ जब दु:खी होता हूँ तो बाप को बहुत याद करता हूँ। रावण दुश्मन दु:ख देते हैं तो बाप को याद करते हैं। दु:ख में हम सभी आत्मायें परमात्मा को सिमरण करती हैं। फिर जब हम आत्मा स्वर्ग में रहती हैं तो बाप को याद नहीं करती। यह आत्मा कहती है, बाप को ही पुकारेगी ना। मनुष्य तो उनका आक्यूपेशन, बॉयोग्राफी कुछ नहीं जानते। न ड्रामा का राज़ जानते हैं कि कैसे आत्मा चक्र में आती है। तुम बच्चे अब जानते हो - माया रावण दु:ख देने वाली है। यह रावण राज्य शुरू हुआ है द्वापर से। यह भी समझाना है क्योंकि यह किसको पता नहीं है कि सबसे पुराना दुश्मन रावण है। उनकी ही मत पर यह पार्टीशन आदि हुआ है।
अभी तुम बच्चे समझते हो हम श्रीमत से भारत को स्वर्ग बनाते हैं। वही सद्गति दाता सबका है। वह जब आये तब ही ब्रह्मा, विष्णु, शंकर से कार्य कराये। ऊंच ते ऊंच वह एक ही है, उनकी बायोग्राफी को कोई नहीं जानते। यह खेल ही ऐसा बना हुआ है। तो बाबा समझाते हैं सबसे बड़ा दुश्मन रावण है। उस पर जीत पानी है। समझाते भी उनको हैं जिन्होंने कल्प पहले समझा था। वही आकर शूद्र से ब्राह्मण बनते हैं। अब विचार करो सतयुग से त्रेता अन्त तक कितनी सम्प्रदाय वृद्धि को पाती रहेगी। तो इतने सबको ज्ञान देने की सर्विस करनी है। इतने सबमें ज्ञान का बीज़ भरना है। ज्ञान का विनाश तो नहीं होता। लड़ाई वालों का भी उद्धार करना है। हमारे दैवी सम्प्रदाय वाले जहाँ होंगे वह निकल आयेंगे। उन लड़ाई करने वालों को कहा जाता है जो युद्ध के मैदान में मरेंगे वह स्वर्ग में जायेंगे परन्तु उनके कहने से स्वर्ग में जा नहीं सकते, जब तक तुम लक्ष्य न दो। लक्ष्य सिर्फ ब्राह्मण ही दे सकते हैं, मरना तो है ही। मुसलमान अल्लाह को याद करेंगे, सिक्ख लोग गुरू नानक को याद करेंगे, परन्तु स्वर्ग में थोड़ेही जा सकते हैं। स्वर्ग में जाना होता है संगम पर। तो इन लड़ाई आदि वालों को भी सिवाए तुम ब्राह्मणों के यह मंत्र कोई दे न सके। स्वर्ग का मालिक बनाने वाला सबसे ऊंच है वह बाप। यह तो ठीक है भगवानुवाच कि युद्ध में मरने से स्वर्ग में जायेंगे। परन्तु कौन सी युद्ध? युद्ध हैं दो। एक है रूहानी, दूसरी है जिस्मानी। उन गोली चलाने वालों को भी तुम ज्ञान दे सकते हो। गीता में भी है मनमनाभव। अपने बाप और स्वर्ग को याद करो तो स्वर्ग में जायेंगे। जब संगमयुग हो तब ही तुम स्वर्ग में जा सकते। वह हैं जिस्मानी बातें, यह हैं सब रूहानी बातें। हमारी है माया पर जीत पाने की युद्ध। मरने समय मनुष्य को मंत्र दिया जाता है। यह जाते ही हैं मरने के लिए तो बाप का सन्देश देना है। एक दिन गवर्मेन्ट भी तुमको कहेगी कि यह नॉलेज सबको दो। तुम हो गॉडली मिशनरी। तुम्हारा काम है बहुतों का कल्याण करना, बोलो, भगवान को याद करो। अब स्वर्ग स्थापन हो रहा है तो सुनकर बहुत खुश होंगे। जो इस कुल के होंगे वही मानेंगे। देवताओं को मानने वाले ही इन बातों को समझेंगे तो सबका कल्याण करना है। बिगर बाप को याद करने स्वर्ग में जा नहीं सकते। स्वर्ग स्थापन कर्ता बाप को जब याद करेंगे तब ही कल्याण होगा। बाबा ने समझाया है लड़ाई वाले वह संस्कार ले जाते हैं तो फिर लड़ाई में ही आ जाते हैं। आत्मा संस्कार ले जाती है ना। स्वर्ग में तो जा न सकें। जो भारत की सेवा करते हैं उनको फल तो मिलना चाहिए ना। तो उन्हों की भी सर्विस करनी है, बड़ो-बड़ों को समझाना है। तुम्हारा प्रभाव निकलेगा। तुमको कहेंगे यहाँ आकर भाषण करो। जैसे मेजर ने बाबा को मंगाया। जहाँ-तहाँ समझाने के लिए घुसना पड़ता है। बड़े को समझाने से फिर छोटे बहुत आते हैं। परन्तु गुरू को तुम पहले समझाओ तो चेले लोग उनका माथा ही खराब कर देंगे फिर उनको निकाल दूसरे को गद्दी दे देंगे क्योंकि यह बिल्कुल नई बातें हैं ना। सारी दुनिया में एक भी मनुष्य गीता को पूरा समझते नहीं। कहते हैं बरोबर रूद्र ज्ञान यज्ञ से विनाश ज्वाला प्रज्वलित हुई थी फिर क्या हुआ, यह नहीं जानते। मनुष्य कुछ भी नहीं जानते। इस समय सब तमोप्रधान हैं। क्रिश्चियन भी यह मानते हैं कि क्राइस्ट यहाँ बेगर रूप में है। फिर बेगर से अमीर कौन बनाये? सबका सद्गति दाता तो एक ही परमात्मा है तो तुम बच्चे अगर अच्छी रीति बैठ समझाओ तो बहुतों का कल्याण कर सकते हो। बाप स्वर्ग का रचयिता ही पतित-पावन है, तो उनकी श्रीमत पर चलना पड़े। जो लायक होंगे वही निकलेंगे। जिनको स्वदर्शन चक्र का वा मनमनाभव का अर्थ बुद्धि में है उनको ही ब्राह्मण कहेंगे। ब्राह्मण बनने बिगर देवता नहीं बन सकते। प्रजा तो बहुत बननी है। त्रेता अन्त तक जो आने वाले हैं उनको यह मंत्र मिलना है। तीर उनको ही लगेगा जो हमारे कुल का होगा। तुम्हारे तीर में अब जौहर भरता जाता है। फिर पिछाड़ी में बहुत तीखे बाण लगेंगे। संन्यासियों को भी बाण लगे हैं ना। फिर समझा है बरोबर यह भगवान ही बाण मारते हैं। तुम्हारे ज्ञान बाण अब जौहरदार रिफाइन बनते जाते हैं। मुख्य बाण एक ही है मनमनाभव। यथार्थ रीति समझाया है कि यही संगमयुग है जहाँ से स्वर्ग जा सकेंगे। महाभारत लड़ाई भी सामने खड़ी है। वह भी युद्ध का मैदान है, यह भी युद्ध का मैदान है। माया पर जीत पाने में मेहनत लगती है। साधारण प्रजा भी बहुत बननी है। जो इस कुल में आने वाला नहीं होगा उनको याद ही नहीं पड़ेगा। सर्विस के लिए विचार सागर मंथन करते रहेंगे तो तुमको ज्ञान की प्वाइंटस आयेंगी। उस युद्ध में भी विचार सागर मंथन चलेगा - ऐसे करेंगे तो जीत पायेंगे। बुद्धि तो चलती है ना। प्रैक्टिस भी करते हैं। जब तीखे हो जाते हैं तो मैदान पर लड़ने जाते हैं। तुम्हारे पास बहुत ढेर आयेंगे। भगवान के दर पर भक्तों की भीड़ होनी है, मच्छरों मुआफिक आयेंगे। प्राइम मिनिस्टर वा किंग क्वीन के आगे इतनी भीड़ नहीं होती जितनी भगवान के पास भक्तों की भीड़ होगी। फिर उस भावना से आयेंगे। कोई खराब विचार नहीं रहेगा। यह तो निराकार बाप है ना। तो समझ में आता है भगवान के आगे भक्तों की भीड़ होनी चाहिए, आना भी सबको यहाँ पड़ेगा। यहाँ अपना जड़ यादगार एकदम एक्यूरेट है। शिवबाबा का भी चित्र है, जगतपिता, जगत अम्बा भी है। यह अभी का तुम्हारा ग्रुप है - शक्ति सेना का। अच्छा!
मीठे मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का यादप्यार और गुडमार्निग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।
धारणा के लिए मुख्य सार:-
होली पर सभी बड़े छोटे के भान को भूल आपस में एक समान समझ मस्ती में खेलते हैं, दुश्मनी के संस्कार भूल मंगल मिलन मनाते हैं। यह रस्म भी अभी की है। आप बच्चे जब होली अर्थात् पवित्रता की स्टेज पर ठहरते हो, बाप के संग के रंग में रंगे हुए होते हो तब ईश्वरीय मस्ती में देह का भान वा भिन्न-भिन्न सम्बन्ध का भान, छोटे बड़े का भान विस्मृत हो एक ही आत्म स्वरुप का भान रहता है। यही होलीहंस स्थिति है। इसी का यादगार हर वर्ष होली उत्सव के रूप में मनाते हैं।
स्लोगन:- जिनके जीवन में शीतलता है वे दूसरों के जलते हुए चित पर विजय प्राप्त कर सकते हैं।
07.03.2023 HINDI MURLI
“मीठे बच्चे - विजयी रत्न बनने के लिए जीते जी मरकर देही-अभिमानी बन बाप के गले का हार बनने का पुरुषार्थ करो''
प्रश्नः- स्वदर्शन चक्र का राज़ स्पष्ट होते हुए भी बच्चों में धारणा नम्बरवार होती है - क्यों?
उत्तर:- क्योंकि यह ड्रामा बहुत कायदे अनुसार बना हुआ है। ब्राह्मण ही 84 जन्मों को समझकर याद कर सकते हैं लेकिन माया ब्राह्मणों को ही याद में विघ्न डालती है, घड़ी-घड़ी योग तोड़ देती है। अगर एक समान धारणा हो जाए, सब सहज पास हो जाएं तो लाखों की माला बन जाये इसलिए राजधानी स्थापन होने के कारण नम्बरवार धारणा होती है।
गीत:- मरना तेरी गली में...
ओम् शान्ति। बच्चों ने गीत सुना। यह है मरजीवापने का जन्म। मनुष्य जब शरीर छोड़ते हैं तो दुनिया मिट जाती है, आत्मा अलग हो जाती है तो न मामा, न चाचा कुछ भी नहीं रहते। कहा जाता है - यह मर गया अर्थात् आत्मा जाकर परमात्मा से मिली। वास्तव में कोई जाते नहीं हैं। परन्तु मनुष्य समझते हैं आत्मा वापिस गई या ज्योति ज्योत में समाई। अब बाप बैठ समझाते हैं - यह तो बच्चे जानते हैं आत्मा को पुनर्जन्म लेना ही होता है। पुनर्जन्म को ही जन्म-मरण कहा जाता है। पिछाड़ी में जो आत्मायें आती हैं, हो सकता है एक जन्म लेना पड़े। बस, वह छोड़ फिर वापस चली जायेगी। पुनर्जन्म लेने का भी बड़ा भारी हिसाब-किताब है। करोड़ों मनुष्य हैं एक-एक का विस्तार तो नहीं बता सकेंगे। अब तुम बच्चे कहते हो - हे बाबा, हमारी देह के जो भी सम्बन्ध हैं वे सब त्याग अब हम तुम्हारे गले का हार बनने आये हैं अर्थात् जीते जी आपका होने आये हैं। पुरुषार्थ तो शरीर के साथ करना पड़ेगा। अकेली आत्मा तो पुरुषार्थ कर न सके। बाप बैठ समझाते हैं - जब रूद्र यज्ञ रचते हैं तो वहाँ शिव का चित्र बड़ा मिट्टी का बनाते हैं और अनेक सालिग्राम के चित्र मिट्टी के बनाते हैं। अब वह कौन से सालिग्राम हैं जो बनाकर और फिर उनकी पूजा करते हैं? शिव को तो समझेंगे कि यह परमपिता परमात्मा है। शिव को मुख्य रखते हैं। आत्मायें तो ढेर हैं। तो वे भी सालिग्राम बहुत बनाते हैं। 10 हजार अथवा 1 लाख भी सालिग्राम बनाते हैं। रोज़ बनाया और तोड़ा फिर बनाया। बड़ी मेहनत लगती है। अब वह न पुजारी, न यज्ञ रचवाने वाले ही जानते हैं कि यह कौन है। क्या इतनी सब आत्मायें पूज्यनीय लायक हैं? नहीं। अच्छा, समझो भारतवासियों के 33 करोड़ सालिग्राम बनायें, वह भी हो नहीं सकता क्योंकि सभी तो बाप को मदद देते नहीं। यह बड़ी गुह्य बातें हैं समझने की। चार पांच लाख रूपया खर्च करते हैं रूद्र यज्ञ रचने में। अच्छा, अब शिव तो परमपिता परमात्मा ठीक है बाकी सालिग्राम इतने सब कौन से बच्चे हैं, जो पूजे जाते हैं? इस समय तुम बच्चे ही बाप को जानते हो और मददगार बनते हो। प्रजा भी तो मदद करती है ना। शिवबाबा को जो याद करते हैं, वह स्वर्ग में तो आ जायेंगे। भल ज्ञान किसको न भी दें तो भी स्वर्ग में आ जायेंगे। वह तो कितने ढेर होंगे! परन्तु मुख्य 108 हैं। मम्मा भी देखो कितनी जबरदस्त रत्न है! कितनी पूजी जाती है! अब तुम बच्चों को देही-अभिमानी जरूर बनना है। जन्म-जन्मान्तर तुम देह-अभिमानी रहे हो। कोई भी मनुष्य ऐसे नहीं कहेगा कि मैं आत्मा परमपिता परमात्मा की सन्तान हूँ। सन्तान हैं तो उनकी पूरी बायोग्राफी मालूम होनी चाहिए। पारलौकिक बाप की बायोग्राफी बड़ी जबरदस्त है। तो बच्चे कहते हैं अब जीते जी मरकर बाबा हम आपके गले का हार जरूर बनेंगे। आत्माओं की भी बड़ी-बड़ी माला है। वैसे ही फिर मनुष्य सृष्टि की बड़े ते बड़ी माला है। प्रजापिता ब्रह्मा है मुख्य। इनको आदम, आदि देव, महावीर भी कहते हैं। अब यह बड़ी गुह्य बातें हैं।
तुम समझते हो हम सब आत्मायें एक निराकार बाप की सन्तान हैं और यह मनुष्य सृष्टि का सारा सिजरा है जिसको जिनॉलॉजिकल ट्री कहा जाता है। जैसे सरनेम होता है ना - अग्रवाल, फिर उनके बच्चे पोत्रे अग्रवाल ही होंगे। सिजरा बनाते हैं ना। एक से फिर बढ़ते-बढ़ते बड़ा झाड़ हो जाता है। जो भी आत्मायें हैं वह शिवबाबा के गले का हार हैं। वह तो अविनाशी है। प्रजापिता ब्रह्मा भी तो है। नई दुनिया कैसे रची जाती है, क्या प्रलय हो जाती है? नहीं। दुनिया तो कायम है सिर्फ जब पुरानी होती है तो बाप आकर उनको नया बनाते हैं। अभी तुम समझते हो हम नये ते नये थे। हमारी आत्मा पवित्र नई थी। प्योर सोना थी, उनसे फिर हम आत्माओं को जेवर (शरीर) भी सोना मिला, उसको काया कल्पतरू कहते हैं। यहाँ तो मनुष्यों की एवरेज आयु 40-45 वर्ष रहती है। कोई-कोई की करके 100 वर्ष होती है। वहाँ तो तुम्हारी आयु एवरेज 125 वर्ष से कम होती नहीं। तुम्हारी आयु कल्प वृक्ष समान बनाते हैं। कभी अकाले मृत्यु नहीं होगी। तुम आत्मायें शिवबाबा के बच्चे हो, ब्रह्मा द्वारा जरूर ब्राह्मण पैदा होंगे, उनसे फिर प्रजा रची जाती है। पहले-पहले तुम ब्राह्मण बनते हो ब्रह्मा मुख वंशावली। शिवबाबा तो एक है फिर माता कहाँ? यह बड़ा गुह्य राज़ है। मैं इन द्वारा आकर तुम बच्चों को एडाप्ट करता हूँ। तो तुम पुरानी दुनिया से जीते जी मरते हो। वह जो एडाप्ट करते हैं वह धन देने के लिए करते हैं। बाप एडाप्ट करते हैं स्वर्ग का वर्सा देने के लिए, लायक बनाते हैं। साथ में ले जायेंगे इसलिए इस पुरानी दुनिया से जीते जी मरना है। गृहस्थ व्यवहार में रहते पवित्र बन बाप का बनना है। हम वहाँ के रहने वाले हैं फिर सतयुग में सुख का पार्ट बजाया। यह बातें बाप समझाते हैं। शास्त्रों में तो हैं नहीं। अब बाप बैठ तुम आत्माओं को पवित्र बनाते हैं। आत्मा की मैल निकालते हैं। तुमको ज्ञान का तीसरा नेत्र मिलता है। उन्हों ने फिर तीजरी की कथा बैठ बनाई है। वास्तव में बात यहाँ की है। तुमको ब्रह्माण्ड से लेकर सारे सृष्टि के आदि-मध्य-अन्त का सारा समाचार मिल जाता है। बाप एक ही बार आकर समझाते हैं। संन्यासी तो पुनर्जन्म लेते रहते हैं। यह तो आया और बच्चों को पढ़ाया। बस। यह तो नई बात हो जाती है। शास्त्रों में यह बातें हैं नहीं। यह बहुत बड़े ते बड़ा कॉलेज है। कायदा है एक हफ्ता तो अच्छी रीति समझना पड़े। भट्ठी में बैठना पड़े। गीता का पाठ अथवा भागवत का पाठ भी एक हफ्ता रखते हैं ना, तो सात रोज़ भट्ठी में बैठना पड़े। विकारी तो सभी हैं, भले संन्यासी घरबार छोड़ निर्विकारी बनते हैं फिर भी जन्म विकार से लेकर फिर निर्विकारी बनने लिए संन्यास करते हैं। कई पुनर्जन्म को भी मानते हैं क्योंकि मिसाल देखते हैं। कोई बहुत वेद-शास्त्र पढ़ते-पढ़ते शरीर छोड़ते हैं तो उन संस्कारों अनुसार फिर जन्म लेते हैं, तो छोटेपन में ही शास्त्र अध्ययन हो जाते हैं। जन्म ले अपने को अपवित्र समझ फिर पवित्र बनने के लिए संन्यास करते हैं। तुम तो एक ही बार पवित्र बन देवता बनते हो। तुमको फिर संन्यास नहीं करना पड़ेगा। तो उनका संन्यास अधूरा हुआ ना। यह बातें खुद भी समझा नहीं सकते हैं। बाबा बैठ समझाते हैं। वह है उत्तम ते उत्तम बाप, जिसके तुम बच्चे बने हो। यह स्कूल भी है, रोजाना नई-नई बातें निकलती हैं। कहते हैं आज गुह्य ते गुह्य सुनाता हूँ। नहीं सुनेंगे तो धारणा कैसे होगी? अब बाप बैठ समझाते हैं तुम मेरे बने हो तो शरीर का भान छोड़ो, मैं गाइड बन आया हूँ वापिस ले जाने।
तुम हो पाण्डव सम्प्रदाय। वह जिस्मानी पण्डे हैं, तुम रूहानी पण्डे हो। वह जिस्मानी यात्रा पर ले जाते हैं। तुम्हारी है रूहानी यात्रा। उन्होंने तो पाण्डवों को हथियार दे, युद्ध के मैदान में दिखाया है। अभी तुम बच्चों में भी ताकत चाहिए। बहुत होते जायेंगे तो फिर ताकत भी बढ़ती जायेगी। तो बाप बैठ समझाते हैं कि मैंने तुमको गोद में लिया है इस ब्रह्मा द्वारा इसलिए इनको मात-पिता कहा जाता है। यह तो सब कहते हैं तुम मात-पिता हम बालक तेरे। अच्छा, उनको तो गॉड फादर कहा जाता है। गॉड मदर तो नहीं कहा जाता। तो मदर कैसे कहते? मनुष्य फिर जगदम्बा को मदर समझ लेते हैं। परन्तु नहीं, उनके भी मात-पिता हैं, उनकी माता भला कौन सी है? यह बड़ी गुह्य बातें हैं। गायन तो है परन्तु सिद्ध कर कौन समझाये? तुम जानते हो यह मात-पिता है। पहले है माता। बरोबर तुमको इस ब्रह्मा माता के पास पहले आना पड़े। इनमें प्रवेश कर तुमको एडाप्ट करता हूँ, इसलिए यह मात-पिता ठहरे। यह बातें कोई शास्त्र में नहीं हैं। यह बाप बैठ समझाते हैं - कैसे तुम मुख वंशावली बनते हो। मैं ब्रह्मा मुख से तुमको रचता हूँ। कोई राजा है, कहेंगे मुख से तुमको कहता हूँ तुम मेरे हो। यह आत्मा कहती है। परन्तु उनको फिर भी मात-पिता नहीं कहेंगे। यह बड़ी वन्डरफुल बात है। तुम जानते हो हम शिवबाबा के बने हैं तो यह देह का भान छोड़ना पड़े। अपने को आत्मा अशरीरी समझना मेहनत का काम है। इसको कहा ही जाता है राजयोग और ज्ञान। दोनों अक्षर आते हैं। मनुष्य जब मरते हैं तो उनको कहते हैं राम-राम कहो या गुरू लोग अपना नाम दे देते हैं। गुरू मर जाता तो फिर उनके बच्चे को गुरू कर देते हैं। यहाँ तो बाप जायेंगे तो सभी को जाना है। यह मृत्युलोक का अन्तिम जन्म है। बाबा हमको अमरलोक में ले जाते हैं, वाया मुक्ति-धाम जाना है।
यह भी समझाया जाता है जब विनाश होता है तो यह कलियुग का पुर नीचे चला जाता है। सतयुग ऊपर आ जाता है। बाकी कोई समुद्र के अन्दर नहीं चले जाते हैं। यहाँ तुम बच्चे सागर के पास आते हो रिफ्रेश होने। यहाँ तुम सम्मुख ज्ञान डांस देखते हो, दिखाते हैं गोप-गोपियों ने कृष्ण को डांस कराई, यह बात इस समय की है। चात्रक बच्चों के सामने बाप की मुरली चलती है। बच्चों को भी सीखना पड़े। फिर जो जितना सीखे। समझाना है बेहद के बाप से स्वर्ग का वर्सा लो। हे भगवान कहते हो, वह तो है रचयिता। जरूर स्वर्ग ही रचेंगे। यह एक ही बाप है जो स्वर्ग रचते हैं वो फिर आधाकल्प चलता है। बाबा तुम्हें कितने राज़ समझाते हैं। बच्चों को मेहनत कर धारणा करनी है। स्वदर्शन चक्र का राज़ भी बाबा ने कितना साफ बताया है। 84 जन्मों के चक्र को ब्राह्मण ही याद कर सकते हैं। यह है बुद्धि का योग लगाकर चक्र को याद करना। परन्तु माया घड़ी-घड़ी योग तोड़ देती है, विघ्न डालती है। सहज हो तो फिर सब पास कर लें। लाखों की माला बन जाये। यह तो ड्रामा ही कायदे अनुसार है। मुख्य हैं 8, उनमें फ़र्क नहीं पड़ सकता। त्रेता के अन्त में जितने प्रिन्स-प्रिन्सेज हैं सभी मिलकर जरूर यहाँ ही पढ़ते होंगे। प्रजा भी पढ़ती होगी। यहाँ ही किंगडम स्थापन होती है। बाप ही किंगडम स्थापन करते हैं और कोई प्रीसेप्टर किंगडम नहीं स्थापन करते। यही बड़ा वन्डरफुल राज़ है। सतयुग में लक्ष्मी-नारायण का राज्य कहाँ से आया? कलियुग में तो राजाई है नहीं। अनेक धर्म हैं। भारतवासी कंगाल हैं। कलियुग की रात पूरी हो, दिन शुरू हुआ और बादशाही चली। यह क्या हुआ! अल्लाह अवलदीन का खेल दिखाते हैं ना। तो कारून के खजाने निकल आते हैं। तुम सेकेण्ड में दिव्य दृष्टि से वैकुण्ठ देख आते हो। अच्छा!
मात-पिता, बापदादा, बच्चे सारी फैमली इक्ट्ठी बैठी है। मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का यादप्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।
धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) बाप समान सभी को रिफ्रेश करने की सेवा करनी है। चात्रक बन ज्ञान डांस करनी और करानी है।
2) इस शरीर का भान छोड़ पुरानी दुनिया से जीते जी मरना है। अशरीरी रहने का अभ्यास करना है। स्वयं को स्वर्ग के वर्से का लायक भी बनाना है।
वरदान:- होली के अर्थ स्वरूप में स्थित हो सच्ची होली मनाने वाले हाइएस्ट होलीएस्ट भव
“हो ली'' अर्थात् जो कुछ हुआ वह हो गया, हो लिया। जो सीन हुई हो ली अर्थात् बीत गई, बीती को बीती करने के लिए सदा ड्रामा की ढाल को यूज़ करो। होली का रंग पक्का तभी लगता है जब हर वक्त याद रहता कि हो ली, जो बीता हो गया। वह कभी ड्रामा की कोई भी सीन देखते क्यों, क्या, कैसे.. इन प्रश्नों में उलझते नहीं। सदा ज्ञान मंथन कर अपनी होलीएस्ट और हाइएस्ट स्टेज बना लेते हैं।
स्लोगन:- सबसे बड़े धनवान वह हैं जिनके पास पवित्रता का सर्वश्रेष्ठ खजाना है।
06.03.2023 HINDI MURLI
“मीठे बच्चे - बाप तुम्हें नई दुनिया के लिए नया ज्ञान देते हैं, जिससे सूर्यवंशी घराना स्थापन होता है, उस घराने के तुम अभी मालिक बन रहे हो''
प्रश्नः- किस बात का निश्चय पक्का हो तो वर्से के अधिकारी सहज बन सकते हैं?
उत्तर:- पहले-पहले यह निश्चय हो जाए कि बेहद का वही बाबा स्वर्ग बनाने आया है, धन्धाधोरी करते यह याद रहे कि हम उस बाबा के बच्चे हैं, हम स्वर्ग के मालिक बनेंगे तो अपार खुशी रहेगी और सहज ही वर्से के अधिकारी बन जायेंगे। पक्के निश्चय वाले को अपार खुशी का पारा चढ़ा रहता है। अगर खुशी नहीं होती तो समझना चाहिए कि मुझे पाई-पैसे का भी निश्चय नहीं है।
गीत:- जिस दिन से मिले तुम हम .....
ओम् शान्ति। यह महिमा किसकी हुई? परमपिता परमात्मा की। उनको कहा ही जाता है परमधाम में रहने वाला परमप्रिय परमपिता परमात्मा। तुम हो अनुभवी बच्चे, जिनको परमपिता परमात्मा ने अपना बनाया है और तुम बच्चों ने फिर परमपिता परमात्मा को अपना बनाया है। परम अर्थात् परे ते परे। अब आत्मा को बुद्धि में आता है कि हम आत्मा वास्तव में परमधाम में परमपिता परमात्मा के पास रहने वाली हैं। दुनिया में और किसको यह नॉलेज नहीं है। वह तो अपने को ही परमात्मा का रूप समझ लेते हैं तो कोई नॉलेज ही नहीं रही। वह परमपिता परमात्मा जब आकर मिलते हैं तो नई बातें सुनाते हैं नई दुनिया के लिए। नई दुनिया में है नया दिन, नई रातें। पुरानी दुनिया में है पुराने दिन, पुरानी रातें और बहुत दु:ख हैं अनेक प्रकार के। मैजॉरटी दु:खी हैं। रात को काम कटारी चलाते, दिन में भी पाप करते रहते। नई दुनिया में सदैव सुख ही सुख रहता है। यह तो जरूर बुद्धि में रहेगा। नई दुनिया में सूर्यवंशी लक्ष्मी-नारायण की राजधानी है। ऐसे नहीं कहा जाता कि प्रिन्स-प्रिन्सेज़ की राजधानी है। राजा रानी की ही राजधानी कहा जाता है। बरोबर सतयुग में श्री लक्ष्मी-नारायण का घराना है। स्वर्ग होने कारण बहुत सुख है। उस सुख के लिए तुम पुरुषार्थ करते हो, वह है पावन राजधानी। बाप तुमको उस नई दुनिया का मालिक बनाते हैं। उसी समय विश्व में और कोई घराना वा धर्म नहीं होता है। जब कोई को समझाते हो तो फिर लिखाओ कि हाँ, यह यथार्थ बात है। घड़ी-घड़ी रिवाइज कराने से निश्चय होगा - नई पावन दुनिया में बरोबर यथा राजा रानी तथा प्रजा पावन ही होते हैं। सदा सुखी रहते हैं। अब तो सदा दु:खी हैं। संगम पर भेंट की जाती है - कलियुग अन्त में क्या है और सतयुग आदि में क्या होगा, आज क्या है, कल क्या होगा? अब बेहद की रात पूरी होती है। फिर कल दिन में राज्य करेंगे। आज पतित दुनिया है, कल पावन दुनिया होगी। साधू-सन्त आदि सब गाते हैं पतित-पावन सीताराम....। जब देखो ऐसा गाते हैं तो उनसे पूछना चाहिए आप पतित-पावन किसको समझ याद करते हो? पतित कौन हैं? पावन करने वाला कौन है? पतित दुनिया और पावन दुनिया कैसे है? जरूर पतितों को पावन बनाने वाला आयेगा तो पावन बनाकर पावन दुनिया में ही ले जायेगा। कलियुग अन्त को पतित दुनिया, सतयुग आदि को पावन दुनिया कहा जाता है। उसको ही सब याद करते हैं। पावन दुनिया है ही स्वर्ग। तो जरूर स्वर्ग स्थापन करने वाला निराकार परमपिता परमात्मा ही है। पावन दुनिया, स्वर्ग का रचयिता है ही परमपिता परमात्मा। नर्क के रचयिता (रावण) की महिमा नहीं होती है। उसको जलाते रहते हैं। मनुष्य जानते नहीं हैं, नाम रख दिया है रावण। इन जैसा मनुष्य कोई हो न सके। मनुष्य तो पुनर्जन्म लेते हैं। नाम रूप बदलते जाते हैं। रावण का नाम रूप कभी बदलता नहीं है। यह 10 शीश ही चलते आते हैं। दिन-प्रतिदिन फुट आधा लम्बा ही बनाते जाते क्योंकि रावण अब बड़ा होता जाता है। तमोप्रधान हो गया है और उनको जलाते ही आते हैं। अभी तुम समझते हो पतित कौन बनाता है? इन 5 विकारों को ही रावण कहा जाता है। यही दु:ख देते हैं, पतित बनाते हैं। तो इन विकारों को छोड़ना चाहिए ना। साधू-सन्त आदि बहुत करके यह विकार ही दान में लेते हैं। कहते हैं - अच्छा, झूठ बोलना हमको दे दो। अक्सर करके काम विकार के लिए कहते कि मास में एक दो बार जाओ। परन्तु यहाँ तो पांचों विकारों की बात है। सिर्फ एक चोर को पकड़ेंगे तो फिर दूसरे चोर चोरी करने लग पड़ेंगे। तो यह कोई को भी समझाना बहुत सहज है। पतित आत्मा, महान आत्मा कहा जाता है। पतित परमात्मा, महान परमात्मा नहीं कहेंगे। तो पावन कौन बनायेगा? जरूर भगवान के लिए ही इशारा करेंगे। ऊपर नज़र जायेगी। भला वह कब आयेंगे? उनका नाम क्या है? भारत में शिवजयन्ती तो प्रसिद्ध है। उनका नाम ही शिव है और कोई नाम नहीं देते। बुद्धि में लिंगाकार ही आयेगा। सोमनाथ कहेंगे तो भी बुद्धि में लिंग आयेगा।
अभी तुम्हारी आत्मा जानती है परमात्मा भी हमारे जैसा ही स्टॉर है। यह जो सितारे हैं उनको नक्षत्र देवता भी कहते हैं। नक्षत्र भगवान नहीं। तुम नक्षत्र सितारे हो। तुमको भगवान नहीं कहेंगे, तो परमात्मा है बिन्दू। परन्तु पूजा कैसे करें? तो भक्ति मार्ग वालों ने लिंग रूप बना दिया है। इतनी बड़ी चीज़ है नहीं। आत्मा तो छोटी-बड़ी होती नहीं। तो उनको बड़ा बनाना भी रांग हो जाता है। कोई मनुष्य को परमात्मा का यथार्थ ज्ञान है नहीं। यह बड़ी महीन बातें हैं। कहते हैं एकदम बिन्दी है, उनको याद कैसे करें? अरे, आत्मा को अपने बाप को याद करना तो बहुत सहज है। सिर्फ बाप की महिमा न्यारी है। आत्मा तो एक जैसी ही है। आत्मा में ही अच्छे वा बुरे, ऊंच-नींच के संस्कार हैं। आत्मा में ही नॉलेज है। आत्मा कितनी छोटी है! मनुष्य गरीब अथवा साहूकार बनते हैं, वह भी आत्मा के संस्कार अनुसार। अभी तुम बच्चों की बुद्धि में यह सारा ज्ञान है। मनुष्य परमात्मा को नहीं जानते, इस कारण आत्मा का भी ज्ञान नहीं है। उल्टा ईश्वर को सर्वव्यापी समझ लिया है। आत्मा ही यह सारा धारण करती है। आत्मा ही एक शरीर छोड़ दूसरा लेती है संस्कारों अनुसार। यह आत्मा बात करती है। मनुष्य अपने को मनुष्य समझ बात करते हैं। यहाँ अपने को आत्मा समझने की प्रैक्टिस करनी पड़ती है। हम आत्माओं को परमपिता परमात्मा पढ़ाते हैं। मनुष्य तो कह देते आत्मा निर्लेप है। अगर निर्लेप है तो फिर संस्कार किसमें भरते हैं। बहुत मूंझे हुए हैं। नई दुनिया के लिए नया ज्ञान बाप को ही देना है। पुरानी दुनिया में रहने वाले मनुष्य दे नहीं सकते। तो बाप को जानना चाहिए ना। भक्तों को भगवान से वर्सा लेना है। भक्ति भी चली आती है। ठिक्कर भित्तर में परमात्मा को ढूंढते रहते हैं। समझते हैं सब परमात्मा के रूप हैं। वास्तव में हैं सब भाई-भाई। लक्ष्मी-नारायण से लेकर जो भी मनुष्य मात्र हैं सब भाई-भाई हैं अथवा भाई-बहिन हैं क्योंकि प्रजापिता ब्रह्मा की औलाद हैं। अगर शिव की औलाद कहें तो वह निराकार आत्मायें हैं। ब्रह्मा के बच्चे बहन-भाई जिस्मानी हो जाते। परन्तु फिर गृहस्थ व्यवहार में आने से भाई-बहन का भान भूल जाते हैं। अगर वह ज्ञान रहे तो फिर विकार में भी न जायें। अभी फिर बाप समझाते हैं तुम विकार में न जाओ। तुम एक बाप के बच्चे भाई-बहन हो। अभी ब्रह्मा सामने बैठे हैं। तुम उनके बच्चे बी.के. हो। यह युक्ति है गृहस्थ व्यवहार में रहते पवित्र बनने की। जनक का भी मिसाल है ना। पहले सिर्फ एक-एक बात का निश्चय हो जाए कि बाप आया हुआ है स्वर्ग बनाने। बस यह तीर लग जाए तो झट बाप का बन जाएं।
बाप कहते हैं तुम हमारा बन जाओ तो हम तुमको स्वर्ग का मालिक बनायेंगे। निश्चय है कि यह वही बेहद का बाप है। हम वर्सा जरूर लेंगे। मनमनाभव, मध्याजीभव, कितनी सहज बात है! धन्धाधोरी करते बुद्धि में यह स्मृति रहे कि हम बाबा के बच्चे हैं। हम स्वर्ग के मालिक बनेंगे तो यह खुशी रहेगी। यह 84 जन्मों का चक्र है। 84 जन्म सिर्फ सूर्यवंशी देवी-देवताओं का ही है। तुम जानते हो हम स्वदर्शन चक्रधारी हैं। सिर्फ चक्र कहने से जन्म सिद्ध नहीं होते इसलिए कहना है कि हम 84 जन्मों को जानने वाले स्वदर्शन चक्रधारी हैं। तो बाप भी याद आयेगा, पांच युग भी याद आयेंगे। अब फिर जाता हूँ स्वर्ग में। हमारे 84 जन्म पूरे हुए। बुद्धि में चक्र फिरता रहे और शरीर निर्वाह अर्थ काम भी करता रहे। बाबा ने कहा है स्वदर्शन चक्र का ज्ञान मेरे भक्तों को देना। उनको समझाने से झट यह निश्चय होगा बरोबर हम 84 जन्म लेते हैं। 84 जन्म न लेने वाला होगा तो उनको धारणा ही नहीं होगी। 84 जन्मों का अर्थ ही है पहले-पहले हम सूर्यवंशी में आयेंगे। थोड़ा भी कोई सुनकर जायेगा तो स्वर्ग में जरूर आयेगा। परन्तु 84 जन्म नहीं लेंगे, देरी से भी आ सकते हैं। उनके फिर 84 जन्म थोड़ेही होंगे। यह ज्ञान की कितनी महीन बातें हैं! कितना हिसाब-किताब है! फिर भी बाप कहते हैं अच्छा, अगर इतना गुह्य राज़ नहीं समझते हो तो भला बाप का बन वर्सा तो लो। हम शिवबाबा के बच्चे हैं। वह स्वर्ग का रचयिता है। यह नशा रहना चाहिए। परन्तु माया ठहरने नहीं देती है। कोई तो कहते हैं बाप और वर्से को याद करना - यह कोई बड़ी बात नहीं। माया हमको क्या करेगी! हम तो जरूर वर्सा पायेंगे। कितनी सहज बात है! कोई को तीर लग जाए तो बाप और वर्से को याद करते बहुत खुशी में रहे। जब तक खुशी नहीं आती तो बाबा कहेंगे पाई-पैसे के निश्चय वाले हैं। पक्के निश्चय वाले को खुशी का पारा बहुत चढ़ा रहता है। कोई राजा के पास सन्तान नहीं होती है तो कहते हैं किले के अन्दर जो पहले-पहले आयेगा उनको गोद में लेंगे फिर क्यू लग जाती है। मैच में भी क्यू लगती है। दूध की बोतलों पर भी क्यू लगती है। पहला नम्बर जाने के लिए सवेरे उठकर जाए खड़े रहते हैं। नहीं तो समझते हैं फिर ठहरना पड़ेगा। तो यहाँ भी बाबा के गले का हार बनने के लिए क्यू है। सारा मदार पुरुषार्थ पर है। बाप को याद करना, यह बुद्धि की दौड़ है। बाकी काम आदि भल करते रहो। आत्मा की दिल यार दे, हथ कार डे.... आशिक माशूक एक जगह बैठ थोड़ेही जाते हैं। काम-काज आदि सब कुछ करते बुद्धि उनके तरफ रहती है। तो यहाँ भी बुद्धि एक के साथ चाहिए, जो हमको स्वर्ग का मालिक बनाता है। जो टाइम मिलता है उसमें पुरुषार्थ करो। गृहस्थ व्यवहार में भी रहना है। यह कोई कर्म संन्यास नहीं है। शरीर निर्वाह तो करना ही है।
बाप अब ब्रह्मा तन में आकर कहते हैं मैं तुम्हारा बाप हूँ, हम तुमको स्वर्ग का मालिक बनाता हूँ। तुम हमको अपना नहीं बनायेंगे? मेरे बने हो तो अब मेरे साथ योग लगाओ और मेरे बनकर फिर तुम पवित्र नहीं रहेंगे, नाम बदनाम करेंगे तो बहुत सज़ा खायेंगे। सतगुरू के निंदक स्वर्ग के द्वार जा नहीं सकेंगे। अच्छा। बापदादा, मात-पिता, जिससे स्वर्ग के सदा सुख का वर्सा लेते हो, स्वदर्शन चक्रधारी बन राज्य-भाग्य लेते हो, ऐसे बापदादा का सिकीलधे बच्चों को यादप्यार और गुडमार्निग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।
धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) बाप के गले का हार बनने के लिए बुद्धि की दौड़ लगानी है। याद की यात्रा में रेस करनी है।
2) शरीर निर्वाह अर्थ कर्म करते स्वदर्शन चक्र फिराना है। कभी भी सतगुरू का निंदक नहीं बनना है। नाम बदनाम करने वाला कर्म नहीं करना है।
वरदान:- अपने बचे हुए तन-मन-धन को ईश्वरीय कार्य में लगाकर जमा करने वाले सदा सहयोगी भव
यादगार में जो गोवर्धन पर्वत को उठाने में हर एक की अंगुली दिखाई है - यह आपके सहयोग की निशानी है। चित्र में बाप का साथ भी दिखाते हैं तो सेवा भी दिखाते हैं। अभी आप बच्चे बापदादा के सहयोगी बने हो तब यादगार बना है। भक्ति में तो तन-मन-धन जो कुछ लगाया उसमें 99 परसेन्ट गंवा दिया। बाकी जो 1 परसेन्ट बचा है उसे अब सच्ची दिल से ईश्वरीय कार्य में लगाओ तो फिर से पदमगुणा जमा हो जायेगा।
स्लोगन:- जो निर्मान बनते हैं उन्हें स्वत: सर्व का मान प्राप्त होता है।
HINDI MURLI 05.03.2023
एक ‘प्वाइन्ट' शब्द को तीन रूपों से स्मृति वा स्वरूप में लाना - यही सेफ्टी का साधन है
विश्व कल्याणकारी बापदादा अपने सर्व मास्टर विश्व कल्याणकारी बच्चों को देख रहे हैं। हर एक बच्चे का इस ब्राह्मण जीवन का लक्ष्य अति श्रेष्ठ है। हर एक नम्बरवन पुरूषार्थ करने का लक्ष्य रखते हुए आगे उड़ते जा रहे हैं। लक्ष्य सभी का नम्बरवन का है लेकिन लक्षण नम्बरवार हैं। तो लक्ष्य और लक्षण दोनों में अन्तर क्यों है? ज्ञान दाता बाप भी एक है, योग की विधि भी एक है, दिव्य गुण धारण करने का सहज प्रत्यक्ष प्रमाण साकार ब्रह्मा बाप भी एक है, सेवा के साधन और सेवा की विधि सिखाने वाला भी एक है। मुख्य बात है - पढ़ाई और पालना - दोनों ही देने वाला एक और एक नम्बर है, फिर भी प्रत्यक्ष जीवन में लक्षण नम्बरवार क्यों? ये तो सभी स्वयं को अच्छी तरह से जानते ही हो कि लक्षण धारण करने में मैं किस नम्बर में हूँ? नम्बरवार होने का विशेष आधार है एक ही शब्द ‘प्वॉइन्ट'। प्वॉइन्ट स्वरूप को अनुभव करना। दूसरा, कोई भी संकल्प, बोल वा कर्म व्यर्थ है उसको पॉइन्ट लगाना अर्थात् बिन्दी लगाना। तीसरा, ज्ञान की वा धारणा की अनेक पॉइन्ट्स को मनन कर स्व प्रति वा सेवा प्रति समय पर कार्य में लगाना। तो शब्द एक ही पॉइन्ट है लेकिन तीनों स्वरूप की पॉइन्ट को समय पर स्मृति में, स्वरूप में लाना - इसमें अन्तर पड़ जाता है। स्मृति सबको रहती है लेकिन स्मृति को स्वरूप में लाना, इसमें नम्बरवार हो जाते हैं। कई बार बापदादा सभी बच्चों को देखते हैं कि स्मृति में बहुत होशियार होते हैं। ऐसा होना चाहिये - वह सोचते भी रहते हैं; यह राइट है, यह राँग है यह ज्ञान भी इमर्ज होता है। ज्ञान अर्थात् नॉलेज और नॉलेज इज़ लाइट, नॉलेज इज माइट कहा जाता है तो जहाँ लाइट भी है, माइट भी है वहाँ ये होना चाहिये, नहीं होता। क्या सोचते हैं कि बापदादा यह कहते तो हैं, बनना तो है, ज्ञान तो यह है, लेकिन उस समय मेरे में क्या है, वह चाहिये-चाहिये में ही रह जाता है। इसका अर्थ है कि ज्ञान को लाइट और माइट के रूप से समय प्रमाण कार्य में नहीं लगा सकते। इसको कहा जाता है स्मृति में है लेकिन स्वरूप में लाने की शक्ति कम है। जब लाइट अर्थात् रोशनी है कि ये राँग है, ये राइट है; ये अन्धकार है, ये प्रकाश है; ये व्यर्थ है, ये समर्थ है, तो अन्धकार समझते भी अन्धकार में रहना, इसको ज्ञानी वा समझदार कहेंगे? ज्ञानी नहीं तो क्या हुए? भक्त वा अधूरे ज्ञानी? राँग समझते भी राँग कर्मों के वा संकल्पों के वा स्वभाव-संस्कार के वशीभूत हो जाएं तो इसको क्या कहा जायेगा? उसका क्या टाइटल होना चाहिये? बापदादा समय की गति को देख सभी बच्चों को बार-बार अटेन्शन दिलाते हैं।
‘अटेन्शन' शब्द को भी डबल अन्डरलाइन करा रहे हैं कि ये प्रकृति की तमोगुणी शक्ति और माया की सूक्ष्म रॉयल समझदारी की शक्ति अपना कार्य तीव्र गति से कर रही है और करती रहेगी। प्रकृति के विकराल रूप को जानना सहज है लेकिन भिन्न-भिन्न विकराल हलचल में अचल रहना इसमें और अटेन्शन चाहिये। माया के अति सूक्ष्म स्वरूप को जानने में भी धोखा खा लेते हैं। माया ऐसा रॉयल रूप रखती है जो राँग को राइट अनुभव कराती है। है बिल्कुल राँग लेकिन बुद्धि को ऐसा परिवर्तित कर देती है जो रीयल समझ को, महसूसता की शक्ति को गायब कर देती है। जैसे कोई जादू मंत्र करते हैं ना तो परवश हो जाते हैं, ऐसी महसूसता शक्ति गायब करने की रॉयल माया रीयल को समझने नहीं देती है। होगा बिल्कुल राँग लेकिन माया की छाया के वशीभूत होने के कारण राँग को राइट समझते और सिद्ध करने में माया के सुप्रीम कोर्ट का वकील बन जाते हैं। तो वकील क्या करते हैं? झूठ को सच सिद्ध करने में होशियार होते हैं। सच को सच सिद्ध करने में भी होते हैं लेकिन झूठ को सच सिद्ध करने में होशियार होते हैं, दोनों में होशियार होते हैं, इसीलिये बापदादा ‘अटेन्शन' को डबल अन्डरलाइन करा रहे हैं। महसूसता शक्ति को परिवर्तित करने की सूक्ष्म स्वरूप की माया की छाया से सदा अपने को सेफ रखो क्योंकि विशेष माया का स्वरूप विशेष इस स्वरूप में अपना कार्य कर रहा है। समझा? अभी क्या करेंगे? केयरफुल रहना। अगर कोई भी विशेष आत्मायें इशारा देती हैं तो अच्छी तरह से माया की इस छाया से निकल बाप की छत्रछाया में अपने को, विशेष मन-बुद्धि को इस छत्रछाया के सहारे में लाओ क्योंकि मन में निगेटिव भाव और भावना पैदा करने का विशेष माया का प्रभाव चल रहा है और बुद्धि में यथार्थ महसूसता को समाप्त करने का विशेष माया का कार्य चल रहा है। जैसे कोई सीज़न होती है ना तो सीज़न से बचने के लिये उसी प्रमाण विशेष अटेन्शन रखा जाता है। जैसे बारिश आयेगी तो छाते, रैन कोट आदि का अटेन्शन रखेंगे, सर्दी आयेगी तो गरम कपड़े रखेंगे, अटेन्शन देंगे ना। तो मन और बुद्धि के ऊपर प्रभाव नहीं पड़े इसके लिये पहले ही सेफ्टी के साधन विशेष अपनाओ। वो विशेष साधन है बहुत सहज, पहले भी सुनाया है - एक ही ‘पॉइन्ट' शब्द। सहज है ना। लम्बा-चौड़ा तो नहीं सुनाया ना। कहते रहते हैं हाँ, मैं आत्मा बिन्दू हूँ, ज्योति रूप हूँ, लेकिन उसमें टिकते नहीं हैं। लगाना चाहते हैं पॉइन्ट लेकिन लग जाता है क्वेश्चन मार्क और आश्चर्य की निशानी। पॉइन्ट लगाना सहज या आश्चर्य की निशानी वा क्वेश्चन मार्क की निशानी? क्या सहज है? बिन्दी लगाना सहज है ना। फिर क्वेश्चन और आश्चर्य में क्यों चले जाते हैं? इस विधि को अपनाओ। सीज़न है - झूठ, सच सिद्ध होने का और झूठ, सत्य से भी स्पष्ट और आकर्षण वाला होगा। जैसे आजकल का फैशन है ना झूठी चीज़ कितनी आकर्षण वाली होती है, उसके आगे सच्चे की वैल्यु कम हो जाती है। रीयल सिल्वर देखो और व्हाइट सिल्वर देखो, क्या सुन्दर लगता है? रीयल सिल्वर काला हो जायेगा और व्हाइट सिल्वर सदा चमकता रहेगा। तो आकर्षण व्हाइट करेगा या रीयल करेगा? तो सीज़न को पहचानो, माया के स्वरूप को पहचानो, प्रकृति के तमोगुण के भिन्न-भिन्न रंगत को पहचानो। एक है जानना, दूसरा है पहचानना। जानते ज्यादा हो, पहचानने में कभी गलती कर देते हो, कभी राइट कर देते हो। अभी क्या करेंगे? सेफ रहेंगे ना। फिर ये नहीं कहना कि हमने तो समझा नहीं, ऐसा भी होता है क्या? यह क्या-क्या नहीं चलेगा। अभी तो फिर भी बाप थोड़ा-थोड़ा रहम करता, थोड़ा-थोड़ा कदम उठाता है। लेकिन फिर ‘क्या' और ‘क्यों' कोई नहीं सुनेगा। ऐसा नहीं, वैसा... ये वकालत नहीं चलेगी। जज बनो, माया का वकील नहीं बनो। मज़ा बहुत आता है जब वकालत करते हैं। अनुभवी तो सब हो ना, अनुभव होता है ना। सुन-सुनकर साक्षी हो हर्षित होते रहते हैं। अच्छी तरह से समझा? पाण्डवों ने, शक्तियों ने समझा, टीचर्स ने समझा? सभी हाँ-हाँ तो कर रहे हैं। फ़ोटो निकल रहा है हाँ का।
तीसरी सीज़न है विशेष कमजोरी के स्वभाव-संस्कार, सम्बन्ध-सम्पर्क में आना, इसका विस्तार भी बहुत बड़ा है। वो आज नहीं सुनायेंगे। कई बच्चे कहते हैं क्या करें, पहले तो था ही नहीं, अभी पता नहीं क्या हो गया है। ये संस्कार मेरे में था ही नहीं, अभी आ गया है, इसका कारण और इसकी विधि का विस्तार फिर कभी सुनायेंगे। अच्छा!
चारों ओर के बापदादा के महावाक्य सुनने और धारण करने वाले चात्रक बच्चों को, सर्व सब्जेक्ट को स्मृति के साथ स्वरूप में लाने वाले समीप आत्माओं को, सदा ज्ञान के हर बात को लाइट और माइट के स्वरूप से कार्य में लगाने वाले श्रेष्ठ आत्माओं को, सदा लक्ष्य और लक्षण समान करने वाले बाप के ज्ञानी तू आत्मा बच्चों को, सदा बाप की छत्रछाया में रहने वाले, माया की छाया से सेफ रहने वाले, जानना और पहचानना, दोनों की विशेषता को जीवन में लाने वाले ऐसे विशेष आत्माओं को बापदादा का याद-प्यार और नमस्ते।
दादियों से मुलाकात - शक्ति सेना तीव्र गति से चल रही है ना। सेना को बापदादा के साथ-साथ आप निमित्त आत्मायें भी चलाने के निमित्त हो। बाप तो सदा साथ है और सदा ही रहेंगे। फिर भी बापदादा की श्रेष्ठ भुजायें तो हैं ना। बाप शक्ति देते हैं, बाप माइट रूप में है लेकिन निमित्त समझाने के लिये माइक तो आप निमित्त हो। कितनी मज़े की बातें सुनते हो। खेल लगता है ना। खेल है ना। खेल-खेल में विजयी बन सभी को मायाजीत विजयी बनाना ही है, ये तो गैरन्टी है ही। लेकिन बीच-बीच में ये खेल देखने पड़ते हैं। तो थकते तो नहीं हो ना? हंसते, खेलते, पार करते और कराते चलते। कोई भी ऐसी बात सुनते तो दिल से क्या निकलता? वाह ड्रामा वाह। हाय ड्रामा हाय नहीं निकलता। वाह ड्रामा। वाह-वाह करते हुए सभी को वाह-वाह बनना ही है। ये सब पार करना ही है। अच्छा!
अव्यक्त बापदादा की पर्सनल मुलाकात - विजय हमारा जन्म-सिद्ध अधिकार है इस निश्चय और नशे से निर्विघ्न स्थिति का अनुभव करो
जैसे ऊंचे से ऊंचा बाप है ऐसे हम आत्मायें भी ऊंचे से ऊंची श्रेष्ठ आत्मायें हैं - यह अनुभव करते हुए चलते हो? क्योंकि दुनिया वालों के लिये तो सबसे श्रेष्ठ, ऊंचे से ऊंचे हैं बाप के बाद देवतायें। लेकिन देवताओं से ऊंचे आप ब्राह्मण आत्मायें हो, फ़रिश्ते हो ये दुनिया वाले नहीं जानते। देवता पद को इस ब्राह्मण जीवन से ऊंचा नहीं कहेंगे। ऊंचा अभी का ब्राह्मण जीवन है। देवताओं से भी ऊंचे क्यों हो, उसको तो अच्छी तरह से जानते हो ना। देवता रूप में बाप का ज्ञान इमर्ज नहीं होगा। परमात्म मिलन का अनुभव इस ब्राह्मण जीवन में करते हो, देवताई जीवन में नहीं। ब्राह्मण ही देवता बनते हैं लेकिन इस समय देवताई जीवन से भी ऊंच हो, तो इतना नशा सदा रहे, कभी-कभी नहीं क्योंकि बाप अविनाशी है और अविनाशी बाप जो ज्ञान देते हैं वह भी अविनाशी है, जो स्मृति दिलाते हैं वह भी अविनाशी है, कभी-कभी नहीं। तो यह चेक करो कि सदा यह नशा रहता है वा कभी-कभी रहता है? मज़ा तो तब आयेगा जब सदा रहेगा। कभी रहा, कभी नहीं रहा तो कभी मज़े में होंगे, कभी मूँझे हुए रहेंगे। तो अभी-अभी मज़ा, अभी-अभी मूँझ नहीं, सदा रहे। जैसे यह श्वांस सदा ही चलता है ना। यदि एक सेकेण्ड भी श्वांस रुक जाये या कभी-कभी चले तो उसे जीवन कहेंगे? तो इस ब्राह्मण जीवन में निरन्तर मजे में हो? अगर मज़ा नहीं होगा तो मूँझेंगे ज़रूर। तो मातायें सदा मज़े में रहती हो? शक्तियां हो ना, साधारण तो नहीं हो या घर में जाती हो तो साधारण मातायें बन जाती हो? नहीं, सदा यह याद रहे कि हम शक्तियां है। हद के नहीं हैं, बेहद के विश्व कल्याणकारी हैं। शक्तियां अर्थात् असुरों के ऊपर विजय प्राप्त करने वाली। शक्तियों को कहते ही हैं असुर संहारनी अर्थात् आसुरी संस्कार को संहार करने वाली। तो सभी शक्तियां ऐसी बहादुर हो? और पाण्डव अर्थात् विजयी। पाण्डव कभी यह नहीं कह सकते कि चाहते नहीं हैं लेकिन हार हो जाती है क्योंकि आधा कल्प हार खाई, अभी विजय प्राप्त करने का समय है तो विजय के समय पर भी यदि हार खायेंगे तो विजयी कब बनेंगे? इसलिये इस समय सदा विजयी। विजय जन्म-सिद्ध अधिकार है। अधिकार को कोई छोड़ते नहीं, लड़ाई-झगड़ा करके भी लेते हैं और यहाँ तो सहज मिलता है। विजय अपना जन्म-सिद्ध अधिकार है। अधिकार का नशा वा खुशी रहती है ना? हद के अधिकार का भी कितना नशा रहता है! प्राइम मिनिस्टर को भूल जायेगा क्या कि मैं प्राइम मिनिस्टर हूँ? सोयेगा, खायेगा तो भूलेगा क्या कि मैं प्राइम मिनिस्टर हूँ? तो हद का अधिकार और बेहद का अधिकार कितना भी कोई भुलाये भूल नहीं सकता। माया का काम है भुलाना और आपका काम है विजयी बनना क्योंकि समझ है ना कि विजय और हार क्या है? हार के भी अनुभवी हैं और विजय के भी अनुभवी हैं। तो हार खाने से क्या हुआ और विजय प्राप्त करने से क्या हुआ - दोनों के अन्तर को जानते हो इसलिये सदा विजयी हैं और सदा रहेंगे क्योंकि अविनाशी बाप और अविनाशी प्राप्ति के अधिकारी हम आत्मायें हैं, यह सदा इमर्ज रूप में रहे। ऐसे नहीं हैं तो! बने तो हैं! जानते तो हैं! ऐसे नहीं। प्रैक्टिकल में हैं। जो जानते हैं वही निश्चय कर चलते हैं। तो हर कर्म में विजय का निश्चय और नशा हो। नशे का आधार है ही निश्चय। निश्चय कम तो नशा कम, इसीलिये कहते हैं निश्चयबुद्धि विजयी। तो फाउण्डेशन क्या हुआ? निश्चय। निश्चय में कभी-कभी वाले नहीं बनना। नहीं तो अन्त में रिजल्ट के समय भी प्राप्ति कभी-कभी की होगी फिर पश्चाताप् करना पड़ेगा। अभी प्राप्ति है, फिर पश्चाताप् होगा। तो प्राप्ति के समय प्राप्ति करो, पश्चाताप् के समय प्राप्ति नहीं कर सकेंगे। कर लेंगे, हो जायेगा! नहीं, करना ही है यह निश्चय हो। कर लेंगे... दिलासे पर नहीं चलो। कर तो रहे हैं ना... और क्या होगा... हो ही जायेंगे... नहीं, अभी होना है। गे-गे नहीं, हैं। जब दूसरों को चैलेन्ज करते हो कि श्वांस पर कोई भरोसा नहीं, औरों को ज्ञान देते हो ना तो पहले स्वयं को ज्ञान दो। कभी करने वाले हैं या अब करने वाले हैं? तो सदा विजय के अधिकारी आत्मायें हो। विजय जन्म-सिद्ध अधिकार है इस स्मृति से उड़ते चलो। कुछ भी हो जाये, ये स्मृति में लाओ कि मैं सदा विजयी हूँ। क्या भी हो जाये, निश्चय अटल है, कोई टाल नहीं सकता। अच्छा, अब सभी ऐसी कमाल करके दिखाओ जो हर स्थान विजयी अर्थात् निर्विघ्न हो। कोई भी विघ्न न आये। विघ्न आयेंगे लेकिन हार नहीं होनी चाहिये। तो जहाँ विजय है, विघ्न हट जायेगा तो निर्विघ्न बन जायेंगे। सदा निर्विघ्न ये कमाल करके दिखाओ। कोई भी गीता पाठशाला हो, उप सेवाकेन्द्र हो, केन्द्र हो लेकिन स्वयं निर्विघ्न बनो और औरों को भी निर्विघ्न बनाओ। ऐसी कमाल दिखाओ। करना ही है। करेंगे, देखेंगे! नहीं। गे गे कहेंगे माना निश्चय में परसेन्टेज है। सब ये खुशखबरी सुने कि सभी छोटे-बड़े सेन्टर्स निर्विघ्न हैं। किसी प्रकार का विघ्न आ ही नहीं सकता। दूसरे के विघ्न को भी मिटायेंगे, विजयी बनेंगे। ऐसा समाचार आये। कहाँ से भी, कोई विघ्न का समाचार न आये। ऐसे नहीं कहना कि हम तो ठीक हैं, ये करते हैं, हम क्या करें। तीन मास विजयी रह करके दिखाओ। तीन मास में ही पता पड़ जायेगा। सभी हाँ करते हो तो ये कमाल करके दिखाओ। अच्छा।
वरदान:- एक बाप के लव में लवलीन रह सर्व बातों से सेफ रहने वाले मायाप्रूफ भव
जो बच्चे एक बाप के लव में लवलीन रहते हैं वे सहज ही चारों ओर के वायब्रेशन से, वायुमण्डल से दूर रहते हैं क्योंकि लीन रहना अर्थात् बाप समान शक्तिशाली सर्व बातों से सेफ रहना। लीन रहना अर्थात् समाया हुआ रहना, जो समाये हुए हैं वही मायाप्रूफ हैं। यही है सहज पुरुषार्थ, लेकिन सहज पुरुषार्थ के नाम पर अलबेले नहीं बनना। अलबेले पुरुषार्थी का मन अन्दर से खाता है और बाहर से वह अपनी महिमा के गीत गाता है।
स्लोगन:- पूर्वज पन की पोजीशन पर स्थित रहो तो माया और प्रकृति के बन्धनों से मुक्त हो जायेंगे।
04.03.2023 HINDI MURLI
“मीठे बच्चे - तुम रूहानी यात्रा पर हो तुम्हें देह का भान और पुरानी दुनिया को भूल वापस घर चलना है, एक बाप की याद में रहना है''
प्रश्नः- साक्षी हो कौन सी बात हर एक को अपने आप से पूछनी है?
उत्तर:- जैसे बाप साक्षी हो हर एक बच्चे की अवस्था देखते हैं कि इनकी अवस्था कैसी है? बाप को पाकर अतीन्द्रिय सुख का अनुभव करते हैं या नहीं? ऐसे अपने से पूछना है कि हम अपने आपको कितना सौभाग्यशाली समझते हैं? कितनी खुशी रहती है? बाप से पूरा वर्सा लिया है? वारिस बनाये हैं? योगबल से पापों को भस्म कर पुण्य आत्मा बने हैं?
गीत:- रात के राही थक मत जाना.....
ओम् शान्ति। यह बच्चों को समझाया हुआ है जैसे आत्मा शान्त स्वरूप है वैसे परमपिता परमात्मा भी शान्त स्वरूप हैं। ओम् का अर्थ भी समझाया हुआ है कि ओम् अर्थात् अहम् आत्मा, मम माया। संन्यासी लोग कहते हैं अहम् ब्रह्मस्मि। वह ब्रह्म को ईश्वर समझते हैं। रचना को माया कह देते हैं। अहम् ब्रह्मस्मि का यह अर्थ करते हैं। परन्तु है सब रांग। मनुष्य जो कुछ करते हैं सब मनुष्यों की सुनी-सुनाई पर। जिसने जो कुछ समझाया, जो रसम चलाई, उस पर चल पड़ते हैं। उसका नाम हो जाता है। यह भी ड्रामा में नूंध है। अब बाप कहते हैं हे राही ...., कहाँ के राही? परमधाम के राही। यह हो गई रूहानी यात्रा रूहों के लिए। आत्माओं के वापिस जाने लिए यात्रा है। गाइड तो जरूर चाहिए। विलायत से आते हैं तो उनको भी गाइड मिलता है, मुख्य-मुख्य सब स्थान दिखाने लिए। परमपिता परमात्मा को भी गाइड कहा जाता है, पण्डों को भी गाइड कहा जाता है। तो बाप कहते हैं - बच्चे, अब मैं आया हूँ तुम बच्चों को वापिस ले जाने। कितनी फर्स्ट-क्लास यात्रा है। जिसके लिए भक्त लोग आधाकल्प से भक्ति करते आये हैं। कहते हैं - आओ, हमको अपने परमधाम में ले चलो। वह जिस्मानी यात्रायें हैं अनेक प्रकार की। कितने जिस्मानी पण्डे हैं! रूहानी पण्डा एक ही है। उन्होंने फिर पाण्डव सेना, शक्ति सेना दिखाई है। लड़ाई की तो कोई बात नहीं है। बाप बैठ समझाते हैं - हे मीठे बच्चे। पहले तो यह निश्चय होना चाहिए कि बरोबर वह बाप है। तुम्हारा बुद्धियोग बाप के पास जाना चाहिए। बाबा आया हुआ है हमको वापिस ले जाने लिए। यहाँ यह है दु:खधाम, पतित दुनिया नर्क। हेल नाम तो है ना। गाते भी हैं लेफ्ट फार हेविनली अबोड.. जरूर कोई नई चीज़ है। मनुष्य जानते नहीं सिर्फ कह देते हैं। रसम-रिवाज़ जो चली आई है सो कह देते हैं, फलाना ज्योति ज्योत समाया अर्थात् आत्मा परमात्मा बन गई। यह नहीं जानते कि ड्रामा है। आत्मा इमार्टल है। उस अविनाशी आत्मा में 84 जन्मों का पार्ट भरा हुआ है। परम आत्मा में भी पार्ट भरा हुआ है। इसको कहा जाता है ड्रामा की कुदरत। परमात्मा से भी तुम पार्टधारियों का तो और ही जास्ती पार्ट है। वह तो है क्रियेटर, डायरेक्टर। तुम जो देवी-देवता बनते हो उनका सबसे जास्ती पार्ट है। आदि से अन्त तक तुम्हारा पार्ट है। सतयुग त्रेता में तो बाप का पार्ट है नहीं। वहाँ बाबा को कुछ भी करना नहीं पड़ता। इस समय मैं बहुत सर्विस करता हूँ। तुम बच्चों को भी और भक्तों को भी राज़ी करना पड़ता है। भक्तों को साक्षात्कार होता है तो वह समझते हैं बस हमने ईश्वर को पाया। भक्तों का नाम कितना है! वह है भक्त माला और यह है रूद्र माला। ज्ञान माला में भक्ति नहीं है। वह तो ज्ञान सागर से ज्ञान धारण कर भक्तों का भी उद्धार करते हैं। उन्हों की ही फिर रूद्र माला बनती है।
अब तुम बच्चे समझते हो हम रूहानी यात्रा पर हैं। गृहस्थ व्यवहार में रहते याद बढ़ानी है। वह है बहुत स्वीट चीज़। बाप रचता भी है, बच्चों को क्रियेट करते हैं। ब्रह्मा मुख वंशावली बनाया है। सब कहते हैं हम शिवबाबा के बच्चे हैं फिर डायरेक्शन मुख्य देते हैं कि मनमनाभव। मैं आया हुआ हूँ तुमको पढ़ाने। हूबहू 5 हजार वर्ष पहले मैंने यह राजयोग सिखाया था। मैं निराकार आत्माओं से बात करता हूँ। तुम अपने आरगन्स का आधार लेते हो। मैं इनके आरगन्स का आधार लेता हूँ। अब तुमको वापिस जाना है इसलिए पुरानी दुनिया को भूलना है, इसको ही संन्यास कहा जाता है। पहले-पहले तो निश्चय करना है - मैं आत्मा हूँ, देह नहीं। इस देह का भान भूल जाना है। पुरानी दुनिया को छोड़ना है। अब मैं वापस लेने आया हूँ तो मेरी श्रीमत पर चलो। देह सहित देह के सभी सम्बन्ध आदि भूल जाओ। एक बाप को याद करना है। मेहनत बिगर कोई बादशाही थोड़ेही मिलेगी। विश्व का मालिक बनना है। जो नॉलेज मेरे में है वह अब तुम्हारे में भी आ गई। तुमको संक्षेप में और डिटेल में भी समझाया जाता है। बीज से इतना सारा झाड़ निकलता है। फिर झाड़ की डिटेल में जायेंगे तो बहुत विस्तार है। बाप कहते हैं अब इस पुराने झाड़ को भूलो। अब सिर्फ मुझे याद करते रहो। भगवानुवाच - मैं तुमको राजयोग और रचना की नॉलेज देता हूँ। यह रचना कैसे रचता हूँ, कैसे वृद्धि को पाती है। यह है ड्रामा को समझना। सो तो मनुष्य ही जानेंगे। भगवान पढ़ायेंगे भी मनुष्यों को। मुख्य है गीता। गीता का नाम है। गीता में है भगवानुवाच। ऐसे नहीं व्यास भगवानुवाच... कहते हैं श्रीकृष्ण भगवान ने गीता सुनाई, व्यास ने लिखी। वह तो पीछे लिखी गई है ना। इस समय लिखें वह तो विनाश हो जायेगी। तुम यह सभी करके दो चार हजार बनायेंगे। वह गीतायें तो लाखों करोड़ों की अन्दाज में हैं। फिर भी यही पुराने शास्त्र निकलते हैं जिससे फिर कॉपी करते हैं, जो उस गीता में अक्षर बाई अक्षर है वही निकलेगा। ड्रामा में वही नूंध है। जिस समय शास्त्र लिखें हैं उसी समय लिखेंगे भी जरूर। लक्ष्मी-नारायण भी वही बन रहे हैं। वही उनके महल आदि बनेंगे।
इस समय बाबा ने इस कल्प वृक्ष का और ड्रामा का ज्ञान दिया है। कहते हैं तुम अब मिले हो, कल्प-कल्प मिलते रहेंगे। भगवानुवाच भी लिखा हुआ है। मैं तुमको राजयोग सिखाता हूँ। भगवान नई सृष्टि रचते हैं जरूर उनको राजा बनायेंगे। द्वापर का तो नहीं बनायेंगे ना। कहते हैं कल्प-कल्प मैं संगम पर ही आता हूँ। गाइड तो अन्त तक साथ होगा। वह गुरू लोग तो मर जाते हैं फिर उन्हों की गद्दी चलती है। बाप कहते हैं मुझे तो तुम सबको वापिस ले जाना है। मैं अपने पूरे समय पर आता हूँ। यह बातें और कोई समझा नहीं सकते हैं। मनमनाभव का अक्षर गीता में भी आदि और अन्त में है। यही कहते हैं कि मुझे याद करो। मैं तुमको विश्व का मालिक इन लक्ष्मी-नारायण जैसा बनाऊंगा। राजाओं का राजा बनाऊंगा। उसी सूर्यवंशी चन्द्रवंशी घराने में तुम पुनर्जन्म लेंगे। अभी तुम कलियुग में हो, कलियुग से तुमको सतयुग में ले जा रहा हूँ।
मैं कल्प-कल्प आकर स्थापना करता हूँ। इस समय ही आऊंगा। हम भी ड्रामा के वश हैं। साक्षी हो हर एक की अवस्था को देखते हैं कि इनकी अवस्था कैसी है? बेहद के बाप को पाकर अतीन्द्रिय सुख को पाते हैं कि नहीं? हर एक अपनी दिल से पूछे - हम अपने को कितना सौभाग्यशाली समझते हैं? बाप के बच्चे बने हैं तो बाप से पूरा वर्सा लिया है? ऐसे भी नहीं बाबा सबको लक्ष्मी-नारायण बनायेंगे। यह पढ़ाई है, जितना जो पुरुषार्थ करे। स्कूल में पढ़ा जाता है तो एम आबजेक्ट रहती है ना। तुम जानते हो हमें 5 हजार वर्ष पहले मुआफिक हूबहू बाप आकर राजयोग सिखला रहे हैं। भगवानुवाच - मैं तुमको पतित मनुष्य से पावन देवता बनाता हूँ। गॉड पढ़ाते हैं तो जरूर गॉड-गॉडेज बनायेंगे ना। जैसे बैरिस्टर, बैरिस्टर बनाते हैं। भक्ति मार्ग में भगवती-भगवान कहते हैं परन्तु हैं देवी-देवतायें। आदि सनातन देवी-देवता धर्म कहा जाता है।
तुम जानते हो कैसे बाप आकर हमको पढ़ाते हैं। मुख्य एम आबजेक्ट भी बुद्धि में है। चक्र तो बुद्धि में फिराना ही है। गृहस्थ व्यवहार में रहते पवित्र रहना है। पवित्र नहीं बनेंगे तो पवित्र दुनिया के मालिक कैसे बनेंगे? यह ड्रामा का राज़ और कोई समझ नहीं सकते। यह चित्र आदि भी बाप ने बनवाये हैं। बाबा थोड़ेही आर्टिस्ट था। यह चीज़ और कोई बनवा नहीं सकता है। यह मैप्स हैं। यह झाड है, बीज ऊपर है। कल्प वृक्ष के नीचे जगदम्बा बैठी है, जो सभी के सुख की कामना पूरी करती है। सतयुग में दु:ख का नाम नहीं होता। तुम कहेंगे हम नई दुनिया के मालिक बन रहे हैं। मनुष्य से देवता किये करत न लागी वार.. सिक्ख लोग उनकी महिमा करते हैं। देवी-देवता ही स्वर्ग के मालिक थे। वह अब और धर्मो में कनवर्ट हो गये हैं फिर निकलते आयेंगे। हम भी आगे हिन्दू धर्म लिखते थे। अभी हम कहते हैं ब्राह्मण धर्म के हैं। भले हम ब्राह्मण धर्म लिखते हैं परन्तु वह फिर भी हिन्दू समझ लेते हैं क्योंकि उनके पास ब्राह्मण धर्म का कालम कोई है ही नहीं। हम देवी-देवता कहेंगे तो भी बदली कर हिन्दू लिख देंगे क्योंकि ब्राह्मण अथवा देवी-देवता धर्म का नाम ही गुम है। अभी तुम बच्चे जानते हो हम सो देवी-देवता बनने के लिए पुरुषार्थ कर रहे हैं। वहाँ यथा राजा-रानी तथा प्रजा सभी की इन लक्ष्मी-नारायण जैसी ड्रेस रहती है। पीताम्बर - यह है सतयुगी सूर्यवंशी की ड्रेस। त्रेता में रामराज्य में फिर दूसरी ड्रेस होती है। रसम-रिवाज अलग होती है। श्रीकृष्ण को हमेशा पीताम्बरधारी कहते हैं।
तो अब यह निश्चय करना है कि बाप हमको स्वर्ग का वर्सा देते हैं। यह मृत्युलोक खत्म होना है। जब तुम निरन्तर बाप को याद करते रहेंगे तब सम्पूर्ण निर्विकारी बनेंगे। उसी योगबल से पाप कटते जायेंगे, पुण्य आत्मा हो जायेंगे। तुम बाप के पास सरेन्डर होते हो, पुण्य करते हो। फिर याद से आत्मा पवित्र बनती जाती है। कोई को भी समझाना है बहुत सहज। भगवानुवाच कब सुना है? स्वर्ग की स्थापना करने वाला वही फादर है। बाप और वर्से को याद करना है। महाराजा बनने चाहते हो तो बताओ तुमने कितनी प्रजा बनाई है? ऐसे बहुत लिखते हैं कि फलाने ने हमको दृष्टि दी, तीर लग गया। प्रजा बनाने और वारिस बनाने की मेहनत करनी पड़े। प्रजा तो बहुत सहज बन जाती है फिर गद्दी पर कौन बैठेंगे? वह भी मेहनत कर बनाना है। मायाजीत, जगतजीत बनना है। माया से हारे हार है। बाप से शक्ति लेनी है। यह मेहनत तुम बच्चों को करनी है। कोई भी बात में मूंझते हो तो पूछते रहो। बाप पढ़ाते हैं तो इसमें कोई संशय नहीं आना चाहिए ना। अनेक प्रकार के संकल्पों के तूफान तो आयेंगे। बुद्धियोग तोड़ने की कोशिश करेंगे। तूफान लगेंगे, माया खूब हैरान करेगी। फिर कहेंगे यह तो माथा ही खराब हो पड़ा है। जो बीमारी आदि कभी हुई नहीं सो अब होती रहती है। विघ्न बहुत आयेंगे, इसमें कमजोर नहीं बनना है। अच्छा!
बापदादा मीठी-मीठी मम्मा का सिकीलधे बच्चों प्रति यादप्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।
धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) बाप ने जो फर्स्टक्लास यात्रा सिखलाई है, उस रूहानी यात्रा पर रहना है। श्रीमत पर देह सहित सब कुछ भूलना है।
2) कभी भी माया के तूफानों में कमजोर वा संशय बुद्धि नहीं बनना है। किसी भी बात में मूंझना नहीं है।
वरदान:- सदा भरपूरता की अनुभूति द्वारा टेढ़े रास्ते को सीधा बनाने वाले शक्ति अवतार भव
सदा शक्ति के, गुणों के, ज्ञान के, खुशी के खजाने से भरपूर रहो तो भरपूता के नशे से टेढ़ा रास्ता भी सीधा हो जायेगा। अगर खाली होंगे तो खड्डा बन जायेगा और खड्डे में गिरने से मोच आयेगी। जो कमजोर और खाली होते हैं उन्हें संकल्पों की मोच आती है। शक्ति अवतार अर्थात् टेढ़े को सीधा करने का कान्ट्रैक्ट लेने वाले। ऐसा कान्ट्रैक्ट लेने वाले कभी यह नहीं कह सकते कि रास्ता टेढा है। अगर कोई गिरते हैं तो अटेन्शन की कमी है या बुद्धि भरपूर नहीं है।
स्लोगन:- रूहाब को धारण करने वाले ही रूहानी गुलाब हैं।
03.03.2023 HINDI MURLI
“मीठे बच्चे - जब स्वच्छ पौधों पर 5 विकारों की मैल चढ़ती है तब भ्रष्टाचार बढ़ता है, अब तुम्हें श्रेष्ठाचारी बनना और बनाना है''
प्रश्नः- श्रेष्ठ बनने के लिए श्री श्री शिवबाबा की श्रेष्ठ मत कौन सी मिलती है?
उत्तर:- श्रेष्ठ बनने के लिए बाप की श्रीमत मिलती है - बच्चे, कम से कम 8 घण्टे मेरी सर्विस पर रहो, 8 घण्टा भल उस गवर्मेन्ट की सर्विस करो लेकिन 8 घण्टा मुझे याद करो वा स्वदर्शन चक्र फिराओ। साथ-साथ शंख ध्वनि करो सबको कहो कि गृहस्थ व्यवहार में रहते कमल फूल समान रहकर बाप से वर्सा लो।
गीत:- किसने यह सब खेल रचाया...
ओम् शान्ति। मीठे-मीठे बच्चों ने गीत सुना। बच्चे पहले बहुत ही सतयुग के सुख भोगते थे, बहुत मस्त थे। खुशियाँ ही खुशियाँ थी। सिर्फ भारत ही था और कोई खण्ड नहीं था। भारतवासी यथा राजा रानी तथा प्रजा सब बहुत मजे में थे, खुशी में थे। कभी कोई भ्रष्टाचार नहीं होता था। सतयुग में देवी-देवता श्रेष्ठाचारी थे, जिन्हों की कितनी महिमा गाई जाती है! महिमा यथा राजा रानी तथा प्रजा सबकी होती है। फिर माया आकर चटकती है। यह भी ड्रामा बना बनाया है, जिसको अच्छी रीति समझना है। बाप के सिवाए कोई समझा न सके। बाप ही भारत और विश्व को सदा सुखी, शान्तमय बनाए, सब कुछ करके फिर खुद छिप जाते हैं। यह किसकी महिमा है? परमपिता परमात्मा की। भारत में जब स्वर्ग था तो देवी-देवताओं का राज्य था, सतोप्रधान था, दु:ख का नाम निशान नहीं था। फिर आधाकल्प बाद रावण-राज्य हुआ। सतयुग के देवताओं के लिए गाया जाता है - सम्पूर्ण निर्विकारी, मर्यादा पुरुषोत्तम। वहाँ तो कभी भ्रष्टाचार हो नहीं सकता। वहाँ तो श्रेष्ठाचारी थे। पौधे जो स्वच्छ थे उन पर 5 विकारों की मैल चढ़ने से भ्रष्टाचार होते-होते अब पूरा भ्रष्टाचार हो गया है। राजा-रानी तथा प्रजा, जो श्रेष्ठाचारी थे, वह सब अभी भ्रष्टाचारी बन पड़े हैं। गाते भी हैं - मुझ निर्गुण हारे में कोई गुण नाहीं। आप ही रहम करो, ओ गॉड फादर, रहम माँगते हैं। देवी-देवताओं के आगे जाकर कहते हैं हमको ऐसा बनाओ। ड्रामा को तो जानते नहीं कि वह फिर ऐसा कब बनेंगे? तो तुम श्रेष्ठाचारी थे, भ्रष्टाचार का नाम नहीं था। इस समय सभी मनुष्य भ्रष्ट बन पड़े हैं। यथा राजा रानी तथा प्रजा, अब भ्रष्टाचारी से श्रेष्ठाचारी कैसे बन सकते हैं - यह कोई नहीं जानते हैं। यह है ही पतित दुनिया। भ्रष्टाचार होना ही है। अब बाप कहते हैं जो कुछ समझो वह फिर औरों को समझाओ।
बाप की महिमा गाते हैं अपने आप सब कुछ करके अपने आप छिपाया। निराकार भगवान को आना जरूर पड़ता है। शिव जयन्ती मनाते हैं। कैसे आते हैं - अभी तुम बच्चे जानते हो। शिव है पतित-पावन, उनको आना ही तब है जब सारी सृष्टि पतित बन जाती है। उसको आकर पावन बनाना है। दो चार को तो पावन नहीं बनायेंगे ना। यथा राजा रानी तथा प्रजा पावन थे फिर अब यथा राजा रानी तथा प्रजा पतित हैं। अभी तो राजा रानी हैं नहीं। जानते हैं राज़े लोग थे, अब उन्हों की राजाई है नहीं। ब्रिटिश गवर्मेन्ट थी तो साहूकार लोग, जमींदार आदि धन देते थे। कोई ने 20-30 हजार दिया तो टाइटिल मिल जाता था। बाबा अनुभवी है ना। शिवबाबा ने भी अनुभवी रथ लिया है। ऐसा-वैसा रथ थोड़ेही लेगा। बड़े-बड़े राजायें होते हैं तो वह घोड़े बहुत फर्स्टक्लास रखते हैं। जानवरों में भी कोई-कोई बहुत अच्छे होते हैं। जैसे ऊंट कोई बहुत अच्छे होते हैं। बैठो तो जैसे एरोप्लेन चलता है। कोई तो ऐसा होता है जो बहुत डन्डे लगाने पड़ते हैं। तो बरोबर यह भारत पांच हजार वर्ष पहले स्वर्ग था। यह तो मशहूर है। क्रिश्चियन लोग भी कहते हैं क्राइस्ट से तीन हजार वर्ष पहले स्वर्ग था। तो बरोबर कल्प पांच हजार वर्ष का हो गया। खुद ही कल्प की आयु बतलाते हैं फिर सतयुग को लाखों वर्ष कहते हैं। ऐसी-ऐसी प्वाइन्ट्स बाबा समझाते हैं, जो धारण कर दूसरों को समझानी हैं, परन्तु समझाते नहीं।
अभी तुम बच्चे जानते हो बरोबर हम श्रेष्ठाचारी थे। यथा राजा रानी तथा प्रजा श्रेष्ठ थे। शेर बकरी इकट्ठे जल पीते थे। वहाँ कंस, जरासन्धी, हिरण्याकश्यप आदि कुछ भी नहीं थे। हिरण्याकश्यप आदि को सतयुग में और श्रीकृष्ण को फिर द्वापर में ले गये हैं। रावण को त्रेता में ले जाते हैं। सब असुरों के अलग-अलग नाम दे देते हैं। कुम्भकरण आदि भी सब असुरों के नाम हैं। अभी है आसुरी सम्प्रदाय अर्थात् आसुरी मत पर चलने वाले। अभी बाप आकरके श्रीमत देते हैं जिससे तुम ब्राह्मण से देवता बनते हो। परमपिता परमात्मा ब्रह्मा के मुख कमल से ब्राह्मण, देवता और क्षत्रिय धर्म की स्थापना करते हैं। दूसरा कोई धर्म वहाँ होता नहीं। सतयुग त्रेता में तो दूसरा कोई धर्म स्थापन हुआ नहीं है। दोनों युग की एज तो एक जैसी 1250 वर्ष है। सतयुग में दैवी राज्य, त्रेता में क्षत्रिय राज्य... सूर्यवंशी और चन्द्रवंशी। यह सूर्यवंशी और चन्द्रवंशी राजधानी किसने स्थापन की? क्या ऐसे कहेंगे कि चन्द्रवंशी राजधानी राम ने स्थापन की? सूर्यवंशी राजधानी लक्ष्मी-नारायण ने स्थापन की? नहीं, दोनों ही स्थापन करने वाला परमपिता परमात्मा है। स्वर्ग का रचयिता है बाप। सतयुग-त्रेता की राजाई रची है। गाया भी जाता है परमपिता परमात्मा ने ब्रह्मा मुख से ब्राह्मण, देवता और क्षत्रिय धर्म रचा। बाप कहते हैं यह जो तुमको ज्ञान सुनाता हूँ यह फिर प्राय:लोप हो जायेगा। इस्लामी, बौद्धी आदि जो धर्म स्थापन करके गये हैं उनका नाम, रूप, देश, काल आदि तो नहीं भूलेंगे। उनको तो सब जानते हैं ना। यह देवता धर्म मैं कैसे स्थापन करता हूँ - यह ज्ञान सब भूल जायेंगे। द्वापर में फिर कितने धर्म स्थापन हो जाते हैं। एक ही इस्लामी बौद्धी धर्म में यह सैकड़ों हो गये हैं। आपस में कितना लड़ते हैं! अभी तुम जानते हो बाबा कैसे सब कुछ करके अपने आपको छिपा लेता है। स्वर्ग में जो देवी-देवतायें थे उनको फिर माया आकर चटकी। पूरे बेगुण बन गये हैं। गाते भी हैं - मुझ निर्गुण हारे में कोई गुण नाहीं, तब तो गुणवान देवताओं की पूजा करते हैं। बड़े-बड़े राजाओं के पास अन्दर महलों में मन्दिर रहते हैं। पूजा करते हैं। ऐसा कोई राजा नहीं होगा जिसके पास मन्दिर न हो।
अब बच्चे जानते हैं शिवबाबा की श्रीमत पर चलना है। कदम-कदम पर श्रीमत लेनी है तब ही सो देवी-देवता बनेंगे। परन्तु श्रीमत पर भी चलते नहीं। बाबा कहते हैं कोई भी बात में कुछ मूँझो तो चिट्ठी लिखकर पूछो। बाप को याद करो। माया ऐसी है जो स्वर्ग स्थापन करने वाले परमपिता परमात्मा को याद करने नहीं देती। बाबा जानते हैं तूफान बहुत आयेंगे। परन्तु चिट्ठी लिख पूछना चाहिए - इस हालत में क्या करें? बच्चे की शादी है - इस हालत में क्या करें? कोई मरा है - क्या करें? मत लेनी चाहिए। श्रेष्ठ बनना है तो श्रीमत पर चलना है। श्रीकृष्ण की मत तो हो न सके। श्रीकृष्ण पतित दुनिया में कैसे आ सकता है! श्रीकृष्ण की आत्मा खुद अन्तिम जन्म में राजयोग सीख रही है। सिर्फ श्रीकृष्ण की आत्मा है क्या? जो भी देवी-देवता घराने वाले हैं वह ब्राह्मण बने हैं। कदम-कदम श्रीमत पर चलना है। बाप कहते हैं जितना हो सके बाप को याद करते रहो। तुम्हारे पापों का बोझा बहुत है। भल कोई गवर्मेन्ट सर्विस में हैं। आठ घण्टे गवर्मेन्ट की नौकरी है, बाकी जो समय है उसमें याद करो। कम से कम आठ घण्टा तुम मेरी सर्विस करो, बाप को याद करो, स्वदर्शन चक्र फिराओ, शंख-ध्वनि करो। कौन सी? सबको कहो - गृहस्थ व्यवहार में रहते कमल फूल समान रह करके बाप से वर्सा लो। बाप स्वर्ग रचते हैं तो स्वर्ग का वर्सा मिलना चाहिए। भारत ही स्वर्ग का मालिक बनता है। अभी तो नर्क का मालिक है। नर्क में दु:खी होते हैं तब बाप को याद करते हैं परन्तु जानते नहीं कि बाप क्या देगा। बाप के लिए कहते हैं सर्वव्यापी है, भित्तर-ठिक्कर में है। बाप कहते हैं - तुमने कितनी भूल की है। परन्तु यह भी ड्रामा में नूँध है। अब उनसे बाहर निकलो। यह भक्ति आदि करते-करते तुम तंग हो गये हो। अभी भक्ति भी व्यभिचारी हो गई है। मौत आकर सामने खड़ा है तो श्रीमत पर चलना चाहिए। परन्तु बच्चे ऐसे बाप को भूल जाते हैं। माया रावण का राज्य कैसे चलता है - यह भी कोई जानते नहीं। रावण का बुत जलाते हैं। यह पीछे रिवाज निकला है। रावण को जलाते हैं परन्तु हर वर्ष रावण बड़ा होता जाता है। आगे 10 फुट का बनाते थे, फिर 15 फुट का बनाया, फिर 50 फुट... एकदम छत जितना लम्बा बनाते हैं। बुद्ध का भी बहुत बड़ा चित्र बनाते हैं। इतने बड़े मनुष्य तो होते नहीं। जास्ती में जास्ती मनुष्य 6 फुट होंगे। लक्ष्मी-नारायण भी इतने ही होंगे। ऐसे नहीं, वहाँ आयु बड़ी होती तो बड़े बन जाते हैं। नहीं, मनुष्य, मनुष्य ही हैं। जैसे अभी देखते हैं, भिन्न-भिन्न वैराइटी है। कोई काले, कोई कैसे। भारत में सुन्दर भी थे, अभी श्याम बने हैं। सुन्दर बनाने वाला है बाबा। वह है हसीन मुसाफिर, वह तुमसे बात कर रहे हैं। उनको भूलना नहीं चाहिए। इनको (साकार को) भल भूल भी जाओ। हमेशा समझो बाबा हम सजनियों को खूबसूरत परीज़ादा बनाते हैं। कहते हैं ना एक तलाव है, जहाँ डुबकी लगाने से मनुष्य परी बन जाते हैं। अभी तुम समझते हो ज्ञान सागर द्वारा ज्ञान की परी बन जाते हैं। अभी तो नर्क की परी हो ना। भल कितना भी कोई फैशन करे, पाउडर आदि लगावे फिर भी है तो नर्क में ना। कोई से भी पूछो यह स्वर्ग है वा नर्क है? कहते हैं साहूकारों के लिए स्वर्ग है। स्वर्ग-नर्क को भी जानते नहीं। तो श्रीमत का ख्याल रखना चाहिए। श्रीमत को भी जानते नहीं, जिसने इतना श्रेष्ठ बनाया उनका नाम-रूप गुम कर दिया है। गाते हैं - तुम मात-पिता हम बालक तेरे...। अब माता किसको कहा जाता है - यह तुम जानते हो। जरूर जिसमें बाप प्रवेश कर रचना रचते हैं, उनको माता कहेंगे। यहाँ तुम समझते हो हम प्रजापिता ब्रह्मा की मुख वंशावली हैं। शिवबाबा के पोत्रे-पोत्रियाँ हैं। तो बाप के भी नाम हैं। बीच में बाप दलाल जरूर चाहिए, जो तुम पोत्रे पोत्रियाँ कहलाओ, दादे से वर्सा लो। तो यह दलाल है, इनसे वर्सा नहीं मिल सकता। इनको भी वर्सा शिवबाबा से लेना है। शिवबाबा की मत पर चलना है। तुम्हें ब्रह्मा के द्वारा शिवबाबा से वर्सा मिलता है, परन्तु बाबा कहते हैं तुम इनको भी भूल जाओ। शिवबाबा से तुमको मत लेनी है। शिव जयन्ती मनाते हैं परन्तु बिल्कुल जानते नहीं। स्वर्ग बनाने वाले बाप का यादगार गुम कर दिया है। नर्क बनाने वालों के यादगार रख दिये हैं। दिन-प्रतिदिन भ्रष्टाचार होता जाता है। कोई को अगर क्रोध आता है तो समझना चाहिए हमारे में यह भूत है फिर हम श्रेष्ठाचारी कैसे कहला सकते। तुम्हें श्रेष्ठाचारी बनने का पुरुषार्थ जरूर करना है। अच्छा!
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का यादप्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।
धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) बाप की याद और ज्ञान सागर के ज्ञान से सुन्दर ज्ञान परी बनना है। कदम-कदम पर शिवबाबा की मत जरूर लेनी है।
2) श्रेष्ठाचारी बनने के लिए अन्दर से भूतों को निकाल देना है। कोई भी भ्रष्ट बनाने वाला काम नहीं करना है।
वरदान:- समस्याओं रूपी पहाड़ को उड़ती कला द्वारा सेकण्ड में पार करने वाले सहज पुरुषार्थी भव
हिमालय पर्वत जितनी बड़ी समस्या को भी पार करने के लिए उड़ती कला की विधि को अपनाओ। सदा अपने सामने सर्व प्राप्तियों को इमर्ज रखो, और उड़ती कला में उड़ते रहो तो समस्या रूपी पहाड़ को सेकण्ड में पार कर लेंगे। सिर्फ वर्तमान और भविष्य प्रालब्ध के अनुभवी बनो। जैसे स्थूल नेत्रों द्वारा स्थूल वस्तु स्पष्ट दिखाई देती है ऐसे बुद्धि के अनुभव के नेत्र द्वारा प्रालब्ध स्पष्ट दिखाई दे, हर कदम में पदमों की कमाई जमा करते रहो।
स्लोगन:- जो सबका आदर करते हैं वही आदर्श मूर्त बनते हैं।
02.03.2023 HINDI MURLI
“मीठे बच्चे - बाप के बने हो तो फर्स्ट नम्बर लेने का पुरुषार्थ करो, मम्मा-बाबा को फालो करने से, पढ़ाई पर ध्यान देने से नम्बर फर्स्ट आ जायेंगे''
प्रश्नः- मनमत पर किये हुए कर्मों की रिजल्ट और श्रीमत पर किये हुए कर्मों की रिजल्ट में अन्तर क्या है?
उत्तर:- जो अपनी मत पर कर्म करते हैं, उन्हें आगे चलकर कर्म कूटने पड़ते, दु:खी होते रहते हैं। मनमत अर्थात् माया की मत से कोई देवाला मार देते, कोई बीमार पड़ जाते, कोई की अकाले मृत्यु हो जाती.. यह सब है कर्म कूटना। श्रीमत पर तुम बच्चे ऐसे श्रेष्ठ कर्म करते हो जो आधाकल्प कोई भी कर्म कूटना नहीं पड़ेगा।
गीत:- तुम्हें पाके हमने जहान पा लिया है.....
ओम् शान्ति। बच्चों ने गीत की दो लाइन सुनी। जबकि हमने बेहद के बाप को पा लिया है तो बेहद के बाप से सारे विश्व की बादशाही हम ले रहे हैं। यह तो बिल्कुल साधारण बुद्धि से भी समझ सकते हैं कि भारत में जब देवी-देवताओं का राज्य था तो और कोई धर्म नहीं था। लक्ष्मी-नारायण का ही घराना था। जैसे एडवर्ड दी फर्स्ट, सेकेण्ड राजाई चलती है ना। वह है युनाइटेड किंगडम में। भारत में जब लक्ष्मी-नारायण का राज्य था तो सारे विश्व पर ही उन्हों का राज्य था। यह मनुष्य भूल गये हैं। अब तुम बच्चों ने बाप को पा लिया तो गोया विश्व की राजाई पा ली। बाप खुद कहते हैं - बच्चे, तुम भूल गये हो। इस भारत में जब देवी-देवताओं का राज्य था, सतयुग था तो तुम सारे विश्व के मालिक थे। पार्टीशन आदि कुछ भी नहीं था। लक्ष्मी-नारायण डबल सिरताज थे। बड़े-बड़े राजे लोग भी पूजा करने के लिए अपने महलों में मन्दिर बनाते हैं - लक्ष्मी-नारायण का वा राम सीता का। थे वे भी भारत के राज़े और वह भी भारत के राज़े। परन्तु वे सतयुग त्रेता के थे, वे द्वापर कलियुग के थे। सतयुग त्रेता में लक्ष्मी-नारायण, राम-सीता का राज्य था फिर बाद में होते हैं विकारी राजायें। विकारी राजायें भी कैसे बनते हैं? यह बातें शिवबाबा इन द्वारा बैठ समझाते हैं। गाया भी जाता है पूज्य पुजारी। सतोप्रधान से तमोप्रधान जरूर बनना है। कहते हैं - हे बच्चे, तुम पहले सतयुग में सतोगुणी महाराजा महारानी थे और सम्पूर्ण पवित्र थे। यह तुम बच्चों को याद रहता है। बरोबर हम सो पूज्य थे, अब नहीं हैं, फिर पुरुषार्थ से हम वह पद पा रहे हैं। माया ने पुजारी बना दिया है। यह शिक्षा जो मिलती है वह धारण करनी है। कॉलेज में जो शिक्षा मिलती है वह भी स्टूडेन्ट्स की बुद्धि में रहती है ना। बच्चों की बुद्धि में रहता है हम भारतवासी सो देवता थे, कल्प पहले भी बाप ने आकर राजयोग सिखाया था। मुख्य है ही गीता की बात। जब कोई मिले तो बोलो गीता कब सुनी वा पढ़ी है? उसमें लिखा हुआ है भगवानुवाच। तो कैसे सुनाते हैं? कब सुना है भगवान पढ़ाते हैं? एक गीता में ही भगवानुवाच है। तुम बच्चे जानते हो भगवान ने राजयोग सिखाया था और कहा था मैं तुमको राजाओं का राजा बनाऊंगा। उन्होंने फिर श्रीकृष्ण का नाम दे दिया है। अब श्रीकृष्ण तो सतयुग का प्रिन्स था। श्रीकृष्ण ने यह पद पाया है अपने बाप से। कृष्ण कोई अकेला नहीं था। लक्ष्मी-नारायण की राजधानी थी जो अब फिर से स्थापन हो रही है। तो तुम बच्चों की बुद्धि में यह आना चाहिए। पांच हजार वर्ष पहले भी भगवान ने ऐसे पढ़ाया था। भगवान नॉलेजफुल, ब्लिसफुल है। श्रीकृष्ण को नॉलेजफुल, ब्लिसफुल आदि यह टाइटिल नहीं देंगे। बाप सारी सृष्टि पर तत्वों सहित सब पर ब्लिस करते हैं। सो तो सिवाए परमपिता परमात्मा के और कोई कर न सके। ब्लिस अर्थात् मेहर। यहाँ तो देखो तत्व आदि सब तमोप्रधान हैं। बरसात पड़ती है तो नुकसान कर देती। तूफान लगते रहते हैं। यह सब बेकायदे हुआ ना। सतयुग में कोई भी बेकायदे बात होती नहीं जो नुकसान आदि हो। खेती टाइम पर तैयार होगी। टाइम पर पानी मिलेगा। वहाँ कोई उपद्रव होते नहीं। यह माया के उपद्रव हैं जो दु:खी करते हैं। माया का भी अर्थ मनुष्य नहीं जानते। अब तुम समझते हो बाप को कहा ही जाता है परमपिता परमात्मा यानी परम आत्मा। बोलना भी ऐसे चाहिए एक्यूरेट।
बाप कहते हैं मैं तुमको ऐसे कर्म सिखलाता हूँ जो तुमको कभी कर्म कूटने नहीं पड़ेंगे। मनमत पर चलने से हर एक मनुष्य कर्म कूटते हैं ना। बुखार, खांसी हुई यह भी कर्मभोग है। देवाला मारा, यह भी कर्मों को कूटना हुआ। तुमको बाप श्रेष्ठ कर्म सिखलाते हैं। जो भी जितना सीखेंगे उतना ऊंच पद स्वर्ग में पायेंगे। जैसे नाटक में कोई तो स्पेशल रिजर्व सीट लेते हैं। फिर नम्बरवार सेकेण्ड क्लास, थर्ड क्लास होती हैं। अच्छे-अच्छे आदमी नजदीक में सीट लेते हैं। तो पढ़ाई में भी नम्बरवार होते हैं। बाप कहते हैं मैं तुमको मालिक बनाने आया हूँ, जितना जो पढ़ेगा, पढ़ाई बहुत सिम्पुल है। पढ़ाने वाला है निराकार। उनका नाम व्यास वा श्रीकृष्ण आदि नहीं है। उन सबके तो चित्र हैं। ब्रह्मा का भी चित्र है, श्रीकृष्ण का भी चित्र है। सूक्ष्म वा स्थूल चित्र हैं तो उनको भगवान नहीं कह सकते। भगवान एक ही है जिसको शिव कहते हैं। भल मन्दिर कितने भी हैं परन्तु नाम असुल एक ही है, वह कब बदल नहीं सकता। वह है निराकार परमपिता परमात्मा। यह किसने कहा? निराकार आत्मा कहती है कि परमपिता परम आत्मा परमधाम में रहते हैं। हम आत्मा उनकी सन्तान हैं। हम भी वहाँ से आये हैं पार्ट बजाने। अब एक-एक एक्टर की बायोग्राफी तो नहीं बतायेंगे। मुख्य की ही बताई जाती है। यहाँ भी बड़े-बड़े आदमियों की बायोग्राफी बताते हैं ना। अब सारी बेहद सृष्टि में ऊंच ते ऊंच मनुष्य कौन है? ड्रामा में ऊंच ते ऊंच पार्ट किसका है? यह भी समझना चाहिए। हम एक्टर्स को बाप बैठ समझाते हैं। क्रियेटर, डायरेक्टर बाप ही है। शिवबाबा डायरेक्शन देते हैं ब्रह्मा को कि तुमको देवी-देवता धर्म की स्थापना करनी है। स्थापना कर फिर तुमको जाकर पालना करनी है। हम नहीं करेंगे। तुमको सिखलाते हैं, डायरेक्शन देते हैं ना। करनकरावनहार है ना। खुद करते भी हैं। नॉलेज सुनाते हैं और तुम से कराते भी हैं ना। श्रीमत मिलती है यह करो। ड्रामा अनुसार ब्रह्मा यह स्थापना कर फिर राज्य करेंगे। ब्राह्मण, ब्राह्मणियां भी राज्य करेंगे।
तो बाप समझाते हैं मैं निराकार एक हूँ और सब साकारी हैं। अब वह निराकार परमपिता परमात्मा आत्माओं को मत देते हैं। आत्मा इन कानों से सुनती है, मुख से बोलती है। तो सबसे मुख्य हुआ परमपिता परमात्मा फिर ब्रह्मा विष्णु शंकर सूक्ष्मवतन वासी फिर संगमयुग पर है जगदम्बा सरस्वती और जगतपिता ब्रह्मा। यह बड़े ते बड़े हुए ना। इन द्वारा रचना होती है। तुम सब मिलकर भारत को स्वर्ग बनाते हो, बाप की मदद से तुम मनुष्य को देवता बनाते हो। सतयुग में होते हैं दैवी सम्प्रदाय। बाप कहते हैं हम तुमको ऐसे कर्म सिखलाते हैं जो कभी दु:खी नहीं होंगे। अब सारा मदार है तुम्हारे पुरुषार्थ पर। चाहे बाप का बन फर्स्टक्लास टिकेट लो, सूर्यवंशी बनो, चाहे चन्द्रवंशी बनो। यह तो जानते हो तुम्हारे मम्मा बाबा सबसे जास्ती पुरुषार्थ करते हैं। सर्विस करते हैं। वह तो महारानी महाराजा बनेंगे। तुम उन्हों की गद्दी पकड़ेंगे ना या नापास हो जायेंगे! जगत अम्बा का कितना नाम है! सरस्वती है ब्रह्मा की बेटी। तो दोनों का मन्दिर अलग-अलग कर दिया है। ब्रह्मा का भी अजमेर में बड़ा मन्दिर है। वह है जगत पिता, वह जगत माता। जगत को रचने वाले।
मुख्य धर्म हैं चार फिर तो बहुत छोटे-छोटे मठ आदि निकलते रहते हैं। आपस में लड़ते-झगड़ते रहते हैं क्योंकि पार्टीशन है बहुत। जहाँ तहाँ झगड़ा लगा पड़ा है। सतयुग में तो ऐसे नहीं होता। तो बाप समझाते हैं - मीठे लाडले बच्चे, इस ड्रामा को समझना है। यह तो जानते हैं हम आत्मा परमधाम से आती हैं, गर्भ में चोला धारण कर हम पार्ट बजाते हैं। अभी पार्ट पूरा हुआ है फिर यह शरीर छोड़ अशरीरी होकर जाना है। बाप आया हुआ है, शिव जयन्ती भी है। जरूर शिवबाबा ने आकर अवतार लिया है। उनकी जयन्ती कब, कैसे हुई, शिवबाबा कैसे, किसमें आये, क्या आकरके किया - यह कोई नहीं जानते। जरूर भारत को स्वर्ग बनाया होगा। बाप न आये तो बच्चों को कौन सिखलाये! और सबकी मत है - कलियुगी, आसुरी मत। उनसे श्रेष्ठ बन नहीं सकते। अब मैं तुमको सुमत देता हूँ। और कोई की भी मत पर न चलो। मैं श्रेष्ठ ते श्रेष्ठ हूँ, जरूर ऊंचा बनाऊंगा। तो वह श्रीमत पकड़नी चाहिए और कोई की मत ली तो धोखा खायेंगे। कदम-कदम पर श्रीमत लेंगे तो इन लक्ष्मी-नारायण जैसा बनेंगे। उनकी महिमा ही है - त्वमेव माताश्च पिता त्वमेव। मैं बाप, टीचर, सतगुरू के रूप में तुमको मत देता हूँ, जिससे तुम ऐसे लक्ष्मी-नारायण समान बनते हो। यह ज्ञान तुमको है तब समझा सकते हो। नम्बरवार तो होते ही हैं। तुम जानते हो मम्मा बड़ा रिफ्रेश करती थी। बाबा भी रिफ्रेश करते हैं। तो तुम बच्चों को भी फालो करना है। बाबा हम आपसे सुनकर औरों को सुनायेंगे। है बहुत सहज। बोलो - भगवानुवाच लिखा हुआ है। भगवान तो है निराकार। तुम जानते हो ड्रामा में यह वेद-शास्त्र आदि सब पहले से ही बने हुए हैं। शास्त्रों में जो कुछ है, जैसे बने हुए हैं फिर भी वही बनेंगे। कितनी गुह्य बातें हैं। गुह्य ते गुह्य बातें सुनाते रहेंगे। जो बच्चे समझकर फिर समझा सकें। व्यास तो लिखने वाला मनुष्य होगा ना। भगवान किसको कहा जाता है! वह तो सभी का बाप है। श्रीकृष्ण नहीं। श्रीकृष्ण की हिस्ट्री-जॉग्राफी को भी तुम बच्चे जानते हो। भगवान तो सृष्टि का रचता ठहरा। राजयोग भगवान ने सिखलाया, न कि श्रीकृष्ण ने। तुमको यह नशा रहना चाहिए कि हम यह राजयोग सीख भविष्य प्रिन्स प्रिन्सेज बनेंगे। बैरिस्टरी पढ़ते हैं तो नशा रहता है। इम्तिहान पास कर जाकर कुर्सी पर बैठ बैरिस्टर बनेंगे। तुम जानते हो मरना तो सभी को है। अभी बाप कहते हैं मरने से पहले पुरुषार्थ करो। इस समय सिर्फ तुम्हारी प्रीत है मेरे साथ। कौरवों की विपरीत बुद्धि थी और पाण्डवों की प्रीत बुद्धि थी। तो प्रीत बुद्धि वालों की स्थापना और विपरीत बुद्धि वालों का विनाश हुआ। यह है पढ़ाई। पहले तो निश्चय चाहिए कि बाप हमको राजाओं का राजा बनाने पढ़ाते हैं। पांच-पांच हजार वर्ष के बाद तुमको पढ़ाने आता हूँ। ड्रामा में कोई भी चेन्ज नहीं हो सकती।
तुम जानते हो कि सत्य बोलने वाला एक ही बाप है। बाकी जो सभी मनुष्य मात्र ईश्वर के लिए रास्ता बताते हैं और उनकी रचना के लिए जो बोलते हैं सो तो सभी झूठ है। मनुष्य समझते भी हैं परन्तु अभी तक प्रभाव निकलने का समय नहीं है तो देरी लगेगी। ट्रेन तो अपने टाइम पर पहुंचेगी ना। 8 के बदले 2 बजे तो नहीं पहुंचेगी। हम यह पुरुषार्थ करते-करते समझते हैं - अभी जल्दी स्वर्ग में चले जायें। परन्तु बाबा स्टेशन मास्टर कहते हैं कि फ्लैग डाउन वा सिंगनल नहीं है, अजुन देरी है। राजाई स्थापन हो जाए तब तो चलेंगे ना। बहुत बच्चे कहते हैं - बाबा, यहाँ रहकर हम तंग हो गये हैं। बाबा कहते हैं यह तो तुम्हारा नम्बरवन जन्म है, इसमें तुम्हें कभी तंग नहीं होना है। वन्दे मातरम् गाया हुआ है। तुमको योगबल से सारे विश्व को पावन बनाना है। अच्छा!
मीठे-मीठे सिकीलधे रूहानी बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का यादप्यार और गुडमार्निग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।
धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) इस विनाश काल में एक बाप से सच्ची प्रीत रखनी है। सदा इसी नशे में रहना है कि हम राजयोग सीख भविष्य प्रिन्स प्रिन्सेज बनेंगे।
2) योगबल से सारे विश्व को पावन बनाने की सेवा करनी है। इस नम्बरवन जन्म से कभी भी तंग नहीं होना है।
वरदान:- स्नेह और भावना के बंधन में भगवान को भी बांधने वाले गायन योग्य भव
भक्ति मार्ग में गायन हैं कि गोपियों ने भगवान को भी बंधन में बांध दिया। यह है स्नेह और भावना का बंधन, जो चरित्र रूप में गाया जाता है। आप बच्चे इस समय बेहद के कल्प वृक्ष में स्नेह और भावना की रस्सी से बाप को भी बांध देते हो, इसका ही गायन भक्ति मार्ग में चलता है। बाप फिर इसके रिटर्न में स्नेह और भावना की दोनों रस्सियों को दिलतख्त का आसन दे झूला बनाए बच्चों को दे देते हैं, इसी झूले में सदा झूलते रहो।
स्लोगन:- स्वयं को हर परिस्थिति में मोल्ड करने वाले ही सच्चे गोल्ड हैं।
01-03-2023 HINDI MURLI
“मीठे बच्चे - बेहद ड्रामा
के आदि-मध्य-अन्त को समझना है, जो पास्ट हुआ वही
अब फिर प्रजेन्ट होना है, अभी संगमयुग
प्रजेन्ट है फिर सतयुग आना है''
प्रश्नः- श्रीमत पर अपने आपको परफेक्ट बनाने की विधि कौन
सी है?
उत्तर:- अपने आपको परफेक्ट बनाने के लिए विचार सागर मंथन
करो। अपने आपसे बातें करो। बाबा आप कितने मीठे हो, हम भी आप जैसा मीठा बनेंगे। हम भी आपके समान मास्टर ज्ञान
सागर बन सबको ज्ञान देंगे। किसी को भी नाराज़ नहीं करेंगे। शान्ति हमारा स्वधर्म
है, हम सदा शान्त रहेंगे।
अशरीरी बनने का अभ्यास करेंगे। ऐसी-ऐसी स्वयं से बातें कर स्वयं को परफेक्ट बनाना
है।
गीत:- माता ओ माता, जीवन की दाता...
ओम् शान्ति। शिव
भगवानुवाच। सिर्फ भगवानुवाच कहने से मनुष्य कुछ नहीं समझ सकेंगे। नाम जरूर लेना
पड़ता है। गीता सुनाने वाले जो भी हैं वह कहते हैं कृष्ण भगवानुवाच। वह पास्ट में
हो गये हैं। समझते हैं श्रीकृष्ण आया था और गीता सुनाई थी वा राजयोग सिखाया था। अब
जो पास्ट हो गया वह फिर प्रेजन्ट जरूर होना है। जो प्रेजन्ट है वह फिर पास्ट होना
है। जो पास्ट हो जायेगा उसको कहेंगे बीत गई। तो अब शिवबाबा आया है जरूर होकर गया
है। शिव भगवानुवाच, जो ऊंच ते ऊंच है,
वह सबका बाप है, जिसको सर्वशक्तिमान कहा जाता है, वह बैठ समझाते हैं। तुम उनके बच्चे शिव शक्तियां हो। शिव
शक्ति की महिमा गीत में सुनी ना। शिव शक्ति जगत अम्बा होकर गई है, जिसका यह यादगार है। होकर गये हैं फिर आने हैं
जरूर। जैसे सतयुग पास्ट हुआ, अब कलियुग है फिर
सतयुग आने वाला है। अभी है पुरानी दुनिया और नई दुनिया का संगम। जरूर नई दुनिया
होकर गई है, अब पुरानी दुनिया है। जो
सतयुग पास्ट हुआ है फिर भविष्य में आना है। यह समझ की बात है। ज्ञान है ही समझ। वह
है भक्ति, यह है ज्ञान। सृष्टि का
चक्र कैसे फिरता है वह समझना है। उनको समझने बिगर मनुष्य कुछ भी समझ नहीं सकते।
ड्रामा के आदि मध्य अन्त को समझना है। उस हद के ड्रामा के आदि मध्य अन्त को तो
जानते हैं। यह है बेहद का ड्रामा, इसको मनुष्य समझ
नहीं सकते। बाप जो बेहद का मालिक है, वही खुद आकर समझाते हैं। शिव भगवानुवाच है न कि श्रीकृष्ण भगवानुवाच। कृष्ण को
भी श्री कहते हैं क्योंकि उनको श्रेष्ठ बनाने वाला बाप है। भारतवासी बिचारे यह
नहीं जानते हैं कि कृष्ण ही नारायण बनते हैं। हम अभी कहते हैं बिचारे बेसमझ हैं।
सब गरीब दु:खी पतित हैं। हम भी थे परन्तु अभी हम पावन बन रहे हैं। पतित-पावन बाप
अब हमको मिला हुआ है। कृष्ण को पतित-पावन नहीं कहा जाता है। नई पावन दुनिया बनाने
वाला रचयिता बाप ही है, जिसको परमपिता
परमात्मा सर्वशक्तिमान कहा जाता है। वो ही पतित दुनिया को पावन बनाने वाला है,
पतित सृष्टि को पावन बनाने वाला है। पतित सारी
सृष्टि है, रावण पतित बनाते हैं।
पतित-पावन एक ही ईश्वर है। मनुष्य पतित से पावन बना नहीं सकते, कोई भी हालत में। सारी दुनिया का सवाल है ना।
समझो करके संन्यासी एक दो करोड़ पावन हों फिर भी 5-6 सौ करोड़ पतित हैं तो जरूर इसको पतित दुनिया कहेंगे ना।
वास्तव में शिव भगवानुवाच पतित दुनिया में एक भी पावन हो नहीं सकता। बाप कहते हैं
तुम बच्चों को पावन बनाने लिए सारी सृष्टि को पावन बनाता हूँ। पतित-पावन का अर्थ
ही है विश्व को पावन बनाने वाला। शिवबाबा खुद कहते हैं मैं पतित से पावन बना रहा
हूँ। तुमको ही पावन दुनिया का मालिक बनना है। नई दुनिया में है आदि सनातन
देवी-देवता धर्म। यह भी कोई नहीं जानते। शिवबाबा को भी कोई नहीं जानते। पूछो तुम
जो निराकार परमपिता परमात्मा शिव की जयन्ती मनाते हो, वह कब आया? निराकार आया कैसे?
जरूर निराकार तो शरीर में ही आयेगा तब तो कर्म
कर सके। आत्मा शरीर बिगर कर्म थोड़ेही कर सकेगी। परमात्मा आकर जरूर ऊंच बनाने का
ही कर्म करेंगे। सारी विश्व को पावन बनाना यह एक ही के हाथ में है। मनुष्य तो
दु:खी ही दु:खी हैं। भक्त भगवान को बुलाते हैं तो जरूर भगवान एक होना चाहिए। भक्त
अनेक हैं। शिव भगवानुवाच, मैं शिव भगवान
तुम बच्चों को राजयोग और सृष्टि चक्र का ज्ञान समझाता हूँ अर्थात् अब तुम्हारी
आत्मा को सृष्टि चक्र का ज्ञान है। जैसे मुझ बाप को सृष्टि के चक्र का ज्ञान है,
मैं आया हूँ तुमको सिखलाने। सृष्टि चक्र फिरना
तो जरूर है। पतित से पावन बनना है। कोई तो निमित्त बनते हैं ना। 5 विकारों रूपी जेल से लिबरेट करने मैं आता हूँ।
मैं शिव हूँ, जो अभी इस तन में बैठा
हूँ। तुम कहेंगे मैं आत्मा इस शरीर में बैठा हूँ। मेरे शरीर का नाम फलाना है।
शिवबाबा कहते हैं मेरा निराकारी शरीर तो है नहीं। मुझ परमपिता का नाम शिव ही है।
मैं परमपिता परम आत्मा स्टार मिसल हूँ। मेरा शिव नाम एक ही है। तुम ही सालिग्राम
हो, परन्तु तुम्हारा नाम 84 जन्मों में बदलता रहता है। मेरा तो एक ही नाम
है। मैं पुनर्जन्म नहीं लेता हूँ। गीता में जिसका नाम डाल दिया है वह तो पूरे 84 जन्म लेते हैं। ऐसे नहीं कि श्रीकृष्ण ने गीता
सुनाई। यह बड़ी समझने की बात है। मनुष्य के हाथ में कुछ नहीं है, जो कुछ करते हैं सो परमपिता परमात्मा करते हैं।
मनुष्य को शान्ति सुख देना - यह बाप का काम है। हमेशा महिमा एक बाप की ही करनी है
और कोई की महिमा है नहीं। लक्ष्मी-नारायण की भी महिमा है नहीं। परन्तु राज्य करके
गये हैं तो समझते हैं यह स्वर्ग के मालिक थे। वन्डर तो देखो वह जड़ चित्र और यहाँ
चैतन्य बैठे हैं। शिव भगवानुवाच तुम राजाओं का राजा पूज्य बनते हो फिर पुजारी
बनेंगे। पूज्य लक्ष्मी-नारायण ही फिर आपेही पुजारी बनेंगे। तो जो पास्ट हो गये हैं
उनका फिर मन्दिर बनाकर पूजन करते हैं। यह सिद्ध कर बताना है, ऐसे नहीं कि ईश्वर आपेही पूज्य आपेही पुजारी
बनता है। नहीं। मनुष्य यह भी नहीं जानते कि मैं परमात्मा कहाँ निवास करता हूँ।
मेरे जो बच्चे सालिग्राम हैं वह भी यह नहीं जानते कि हम कहाँ के रहने वाले हैं।
आत्माओं और परमात्मा का घर एक ही है स्वीट होम। सिर्फ स्वीट फादर होम नहीं कहेंगे।
अभी तुम जानते हो निर्वाणधाम हमारा भी घर है। वहाँ हमारा फादर है। सिर्फ घर को याद
करेंगे तो ब्रह्म के साथ योग हो गया, उनसे विकर्म विनाश हो नहीं सकते। भल ब्रह्म योगी, तत्व योगी हैं परन्तु उनके विकर्म विनाश नहीं हो सकते। हाँ
भावना से करके अल्पकाल के लिए सुख मिलता है। जितना याद करेंगे उतना शान्ति मिलेगी।
तो बाप कहते हैं उनका योग रांग है। तुमको याद करना है एक बाप को। बाप कहते हैं
मुझे याद करने से तुम्हारे विकर्म विनाश होंगे। श्रीकृष्ण ऐसे कह नहीं सकते,
वह तो वैकुण्ठ का मालिक है। वह थोड़ेही कहेगा
अशरीरी बन शिवबाबा को याद करो या मुझे याद करो। सारा मदार गीता को करेक्ट कराने पर
है। गीता खण्डन होने कारण भगवान की हस्ती गुम हो गई है। कह देते हैं ईश्वर का कोई
नाम रूप है नहीं। अब नाम रूप काल तो आत्मा का भी है। आत्मा का नाम आत्मा है,
वह भी परमपिता परम आत्मा है। परम अर्थात्
सुप्रीम, ऊंच ते ऊंच। वह जन्म मरण
रहित है, अवतार लेते हैं। ड्रामा
में जिसका पार्ट है उनमें ही प्रवेश करते हैं और उसका नाम ब्रह्मा रखते हैं।
ब्रह्मा नाम कभी बदल नहीं सकता है। ब्रह्मा द्वारा ही स्थापना करते हैं। तो वह
श्रीकृष्ण के तन में थोड़ेही आयेंगे। अगर वह दूसरे में आये तो भी उनका नाम ब्रह्मा
रखना पड़े। मनुष्य कहते हैं दूसरे कोई में क्यों नहीं आता। अरे वह भी किसके तन में
आये? वह आते ही हैं ज्ञान देने
के लिए। दिन-प्रतिदिन मनुष्य समझते जायेंगे। तुम्हारी वृद्धि होती जायेगी। अवस्था
बड़ी अच्छी चाहिए। जैसे ड्रामा के एक्टर्स को मालूम होता है हम घर से स्टेज पर
पार्ट बजाने आये हैं। वैसे हम आत्मा यह शरीर रूपी चोला लेकर पार्ट बजाती है फिर
वापिस जाना है, शरीर छोड़ना
पड़ता है। तुम्हें तो खुशी होनी चाहिए, डरना नहीं चाहिए। तुम बहुत कमाई कर रहे हो। शरीर छोड़ने वाले खुद भी समझ सकते
हैं हमने कितनी कमाई की है। तुम समझते हो जो शरीर छोड़कर गये हैं उनमें से किसका
मर्तबा बड़ा कहें, फलाने बहुत
सर्विस करते थे, जाकर दूसरा शरीर
लिया। इनएडवांस गये हैं। उनका इतना ही पार्ट था। फिर भी कुछ न कुछ ज्ञान लेने लिए
आ जायें, हो सकता है। वारिस तो बन
गये ना। किसके साथ हिसाब-किताब चुक्तू करना होगा, वह खलास करने गये। आत्मा में तो ज्ञान के संस्कार हैं ना।
संस्कार आत्मा में ही रहते हैं। वह गुम नहीं हो सकते। कहाँ अच्छी जगह सर्विस करते
होंगे। नॉलेज के संस्कार ले गये तो कुछ न कुछ जाकर सर्विस करेंगे। ऐसे तो नहीं सब
जाते रहेंगे। नहीं। हाँ इतना जरूर है योग में रहने से आयु बढ़ती है। मैनर्स भी
बड़े अच्छे चाहिए। कहते हैं बाबा आप कितने मीठे हो। मैं भी आप जैसा मीठा बनूंगा।
हम भी ज्ञान सागर बनेंगे। बाप कहते हैं अपने को देखते रहो मैं मास्टर ज्ञान सागर
बना हूँ? मात-पिता समान औरों को
ज्ञान देता हूँ? हमारे से कोई
नाराज़ तो नहीं होता है? शान्ति को धारण
किया है? शान्ति हमारा स्वधर्म है
ना। अपने को अशरीरी आत्मा समझना है, देखना है मेरे में कोई विकार तो नहीं हैं? अगर कोई विकार होगा तो नापास हो जायेंगे। ऐसे-ऐसे अपने से
बातें करनी पड़ती हैं। यह है विचार सागर मंथन कर अपने को परफेक्ट बनाना, श्रीमत से। बाकी सब आसुरी मत से अन-परफेक्ट
बनते जाते हैं। हम भी कितने अन-परफेक्ट थे। कोई गुण नहीं था। गाते हैं ना मैं
निर्गुण हारे में कोई गुण नाही। अक्षर कितने अच्छे हैं। महिमा सारी परमपिता
परमात्मा की ही है। गुरूनानक भी उनकी महिमा करते थे। तो मनुष्यों को भी समझाना है।
यह भी बच्चे जानते हैं -
कल्प पहले जिनका सैपलिंग लगा है वही आयेंगे और धारणा करेंगे। नहीं तो जैसे
वायरे-मुआफिक (मूंझा हुआ) आया और गया। यहाँ तो तुम जानते हो हमको नॉलेजफुल फादर ने
जो नॉलेज दी है, वह कोई में भी
नहीं है। हम गुप्तवेष में हैं। फिर हम भविष्य में स्वर्ग के मालिक बनेंगे। कर्म तो
सब कर रहे हैं। परन्तु मनुष्यों के कर्म सब विकर्म होते हैं क्योंकि रावण की मत पर
करते हैं। हम श्रीमत पर कर्म करते हैं, श्रीमत देने वाला है बाबा।
बाबा ने समझाया है तुम हो
सैलवेशन आर्मी। सैलवेशन आर्मी उनको कहा जाता है जो किसके डूबे हुए बेड़े को (नांव
को) पार लगाते हैं। दु:खी को सुखी बनाते हैं। अभी तुम श्रीमत पर सबका बेड़ा पार कर
रहे हो। बलिहारी तो शिवबाबा की है ना। हम तो मूर्ख थे। बाप की मत मिलने से फिर
औरों को भी मत देते हैं। बाप सम्मुख आकर श्रीमत देते हैं। रावण तो कोई चीज़ नहीं जो
आये। माया विकारों में घसीट लेती है। यहाँ तो बाप मत देते हैं। जैसे स्कूल में
टीचर पढ़ाते हैं। रावण तो कोई चीज़ नहीं जो उल्टा पढ़ाये। बाप तो है ज्ञान का
सागर। रावण को सागर या नॉलेजफुल नहीं कहेंगे। तुम अब श्रीमत पर चल रहे हो। तुम
ब्राह्मण बन यज्ञ की सेवा करते हो। तुमको राजयोग और ज्ञान सिखलाना है। वह जब यज्ञ
रचते हैं तो शास्त्र भी रखते हैं ना। रूद्र यज्ञ रचते हैं परन्तु रूद्र है कहाँ।
यहाँ तो रूद्र शिवबाबा प्रैक्टिकल में है। प्रेजन्ट में रूद्र ज्ञान यज्ञ रचा हुआ
है। जो पास्ट था वह अब प्रेजन्ट है। मनुष्य पास्ट को ही याद करते रहते हैं तो तुम
अब प्रैक्टिकल वर्सा ले रहे हो। पास्ट सो अब प्रेजन्ट है फिर पास्ट हो जायेगा। ऐसे
होता ही रहता है। कलियुग भी पास्ट हो फिर सतयुग आना चाहिए। अब संगमयुग प्रेजन्ट
है। पास्ट जो हुआ उसका यादगार है, जिसका जड़ यादगार
है वह अब प्रेजन्ट चैतन्य में है। जो ऊंच पद पाते हैं, माला भी उन्हों की बनी है। रूद्र माला है ना। यह सभी हैं
जड़ चित्र। जरूर कुछ करके गये हैं तब तो रूद्र माला कहते हैं ना। तुम चैतन्य में
शिवबाबा की माला नम्बरवार बन रहे हो। जितना योग लगायेंगे उतना नजदीक जाकर रूद्र के
गले का हार बनेंगे। अभी हम संगम पर है। ऐसे-ऐसे अपने से बातें करनी चाहिए। तुमको
तो ज्ञान है। तुम्हारे अन्दर यह चलता रहता है हम असुल शिवबाबा के बच्चे हैं। हम
विश्व के मालिक बनेंगे, फिर चक्र में
आयेंगे। इसको स्वदर्शन चक्र कहा जाता है। कई मनुष्य कहते हैं तुम औरों की निंदा
क्यों करते हो। बोलो, भगवानुवाच लिखा
हुआ है बाकी हम किसी की निंदा नहीं करते हैं। अच्छा!
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों
प्रति मात-पिता बापदादा का यादप्यार और गुडमार्निग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों
को नमस्ते।
धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) श्रीमत पर हर
कर्म श्रेष्ठ करना है। सबके डूबे हुए बेड़े को श्रीमत पर पार लगाना है। दु:खियों
को सुख देना है।
2) अन्दर स्वदर्शन
चक्र फिराते रूद्र माला में नजदीक आने के लिए याद में रहना है। ज्ञान का मंथन करना
है, अपने आपसे बातें जरूर
करनी है।
वरदान:- ब्राह्मण जीवन में सदा आनंद वा मनोरंजन का अनुभव
करने वाले खुशनसीब भव
खुशनसीब बच्चे सदा खुशी
के झूले में झूलते ब्राह्मण जीवन में आनंद वा मनोरंजन का अनुभव करते हैं। यह खुशी
का झूला सदा एकरस तब रहेगा जब याद और सेवा की दोनों रस्सियां टाइट हों। एक भी
रस्सी ढीली होगी तो झूला हिलेगा और झूलने वाला गिरेगा इसलिए दोनों रस्सियां मजबूत
हो तो मनोरंजन का अनुभव करते रहेंगे। सर्वशक्तिमान का साथ हो और खुशियों का झूला
हो तो इस जैसी खुशनसीबी और क्या होगी।
स्लोगन:- सबके प्रति दया भाव और कृपा दृष्टि रखने वाले
ही महान आत्मा हैं।
इस मास की सभी मुरलियाँ
(ईश्वरीय महावाक्य) निराकार परमात्मा शिव ने ब्रह्मा मुखकमल से अपने ब्रह्मावत्सों
अर्थात् ब्रह्माकुमार एवं ब्रह्माकुमारियों के सम्मुख 18-1-1969 से पहले उच्चारण की थी। यह केवल
ब्रह्माकुमारीज़ की अधिकृत टीचर बहनों द्वारा नियमित बीके विद्यार्थियों को सुनाने
के लिए हैं।
No comments:
Post a Comment