31.01.2023 HINDI MURLI
“मीठे बच्चे - तुम हो मोस्ट लकी बच्चे क्योंकि तुम्हारे सम्मुख स्वयं बाप है, वह तुम्हें सुना रहे हैं''
प्रश्नः-भक्ति मार्ग का कौन सा संस्कार अभी तुम बच्चों में नहीं हो सकता? क्यों?
उत्तर:-भक्ति मार्ग में जिस भी देवी या देवता के पास जायेंगे उससे कुछ न कुछ मांगते ही रहेंगे। किसी से धन मांगेंगे, किसी से पुत्र मांगेगे। यह मांगने के संस्कार अभी तुम बच्चों में नहीं हो सकते क्योंकि बाप ने संगम पर तुम्हें कामधेनु बनाया है। तुम बाप समान सबकी मनोकामनायें पूर्ण करने वाले हो। तुम स्वयं के प्रति कोई आशा नहीं रख सकते। तुम जानते हो फल देने वाला एक ही दाता बाप है, जिसे याद करने से सब प्राप्तियां हो जाती हैं इसलिए मांगने के संस्कार समाप्त हो जाते हैं।
गीत:-ओम् नमो शिवाए...
ओम् शान्ति। भगवानुवाच। अब अच्छी रीति समझकर फिर समझाने के लिए एक गीता शास्त्र ही है। शास्त्र तो बनाया है मनुष्यों ने। परन्तु राजयोग मनुष्य नहीं सिखाते। बाप कहते हैं मैंने ही 5 हजार वर्ष पहले भी तुम भारतवासी सिकीलधे बच्चों को राजयोग सिखाया था। सिकीलधे का अर्थ तो समझाया है कि तुम ही पूरे 84 जन्म लेकर फिर आए मिले हो। 5 हजार वर्ष पहले भी तुम मिले थे और तुम आकर ब्रह्मा मुख वंशावली अर्थात् ब्राह्मण ब्राह्मणी बने थे। बाप डायरेक्ट बोलते हैं। वह गीता पाठी आदि यह बातें नहीं करेंगे। बाप डायरेक्ट समझाकर गये थे फिर भक्ति मार्ग से शास्त्र बनाते हैं। अब ड्रामा पूरा होता है। फिर बाप आया है कहते हैं बच्चों को, कौन से बच्चे? कहते हैं खास तुम और आम सारी दुनिया। तुम अभी सम्मुख हो। तुमको बैठ बाबा ने अपना परिचय दिया है। यह राजयोग तुमको और कोई सिखला न सके। बाप ने ही पहले योग सिखलाया था, अब सिखला रहे हैं जिससे तुम फिर राजाओं का राजा बनेंगे और कोई स्वर्ग का मालिक बना न सके। मैं तुम्हारा बाप आया हूँ फिर से तुमको राजयोग सिखलाने। अच्छा अब बाबा तुमको झाड़ पर समझाते हैं। यह समझानी भी बहुत जरूरी है। इनको कल्प-वृक्ष कहा जाता है। बाप कहते हैं यह मनुष्य सृष्टि रूपी झाड़ कल्प वृक्ष है। वह गीता सुनाने वाले कहेंगे भगवान ने यह कहा था और तुम कहेंगे भगवान कह रहा है। यह है मनुष्य सृष्टि का झाड़। इसमें कोई फल फ्रूट आम आदि नहीं हैं। उस फल फ्रूट का झाड़ जो होता है उनका बीज नीचे, झाड़ ऊपर में होता है। इनका बीच ऊपर और झाड़ नीचे हैं। कहते भी हैं ईश्वर ने हमको पैदा किया है अर्थात् बाप ने बच्चे दिये हैं। बाप ने धन दिया है। बाबा आप हमारे सब दु:ख दूर करो। बाबा, बाबा कहते रहते हैं। लक्ष्मी-नारायण के आगे जाते हैं, उनसे भी मांगते हैं, महालक्ष्मी हमको धन दो। यह सब मांगने के संस्कार हैं। जगत अम्बा से कोई पुत्र मांगेंगे तो कोई कहेंगे हमारी बीमारी दूर करो। लक्ष्मी के आगे ऐसी आशायें नहीं रखेंगे, उनसे सिर्फ धन मांगते हैं। यह तो तुम जानते हो - जगत अम्बा सो लक्ष्मी, सो फिर 84 जन्मों का चक्र लगाकर फिर जगत अम्बा बनती है। झाड़ में देखो जगत अम्बा बैठी है। यही फिर महारानी बनेंगी जरूर, तुम बच्चे भी राजधानी में आयेंगे। तुम कल्प वृक्ष के नीचे बैठे हो। संगम पर फाउन्डेशन लगा रहे हो। कामधेनु के तुम बच्चे ही सबकी मनोकामना पूर्ण करने वाले हो। तुम भारत माता शक्ति सेना हो, इसमें पाण्डव भी हैं।
बच्चों को समझाया गया है कि याद एक बाप को ही करना है। देने वाला एक बाप है। भल तुम किसकी भी भक्ति करो, किसको भी याद करो परन्तु फल देने वाला फिर भी एक ही दाता है। वही सब कुछ देता है। भक्ति मार्ग में तुम श्रीनारायण की, श्रीकृष्ण की पूजा करते हो, कृष्ण को झुलाते भी हो, प्यार करते हो। उनसे तुम क्या मांगेंगे। तुम चाहते हो हम उनकी राजधानी में जायें अथवा हमको श्रीकृष्ण जैसा बच्चा मिले। गाते हैं भजो राधे गोविन्द चलो वृन्दावन। जहाँ राज्य भाग्य करते थे वैकुण्ठ में। उस समय कोई भी अप्राप्ति नहीं होती। श्रीकृष्ण के राज्य को याद तो बहुत करते हैं। भारत में जब श्रीकृष्ण का राज्य था तो और कोई राज्य नहीं था। अब बाप आये हैं कहते हैं चलो कृष्णपुरी में, चलकर श्रीकृष्ण की पत्नि बनो या राधे का पति बनो। बात एक ही है। वहाँ विष नहीं मिलेगा। वह है ही सम्पूर्ण निर्विकारी दुनिया। अभी तुम स्टूडेन्ट हो, पढ़ रहे हो नर से नारायण, बेगर से प्रिन्स बनने के लिए। यहाँ भल कोई करोड़-पति हैं, 50 करोड़ हैं लेकिन तुम्हारी भेंट में वह गरीब हैं क्योंकि यह सब उनका धन मिट्टी में मिल जाना है। कुछ भी साथ नहीं चलेगा। हाथ खाली जायेंगे। तुम तो हाथ भरतू करके जाते हो 21 जन्मों के लिए। अभी तुम राजयोग सीख रहे हो। फिर सतयुग में आकर राज्य करेंगे। तुम पुनर्जन्म लेते वर्णो में आते रहते हो। सतयुग में हैं 16 कला, त्रेता में हैं 14 कला। फिर भक्ति मार्ग शुरू होता है फिर इब्राहम, बुद्ध आते हैं। क्राइस्ट के 3 हजार वर्ष पहले देवी-देवताओं का राज्य था। अब सारा झाड़ जड़जड़ीभूत अवस्था को पाया हुआ है। अभी तुम कल्पवृक्ष के नीचे संगम पर बैठे हो, इसको कहा जाता है कल्प का संगम अथवा कलियुग और सतयुग का संगम। सतयुग के बाद त्रेता, फिर त्रेता के बाद द्वापर और कलियुग का संगम। कलियुग के बाद फिर सतयुग जरूर आयेगा। बीच में संगम जरूर चाहिए। कल्प के संगमयुगे बाप आते हैं। उन्होंने कल्प अक्षर बदल सिर्फ युगे-युगे लिख दिया है। बाप कहते हैं मैं निराकार परमपिता परमात्मा ज्ञान का सागर हूँ। भारत में ही शिव जयन्ती गाई जाती है। श्रीकृष्ण तो ज्ञान दे न सके। तुम कहते हो हम स्वर्ग में श्रीकृष्ण के साथ मिलेंगे। बाप कहते हैं भक्ति में श्रीकृष्ण का साक्षात्कार मैं तुमको कराता हूँ। कृष्ण जयन्ती पर बहुत प्रेम से उनको झूला झुलाते हैं, पूजा करते हैं। उनको जैसे सच-सच श्रीकृष्ण दिखाई पड़ता है। साक्षात्कार होगा, कृष्ण का चित्र होगा तो उनको भी उठाकर भाकी पहनेंगे। भक्ति मार्ग में मैं ही मदद करता हूँ। दाता मैं हूँ। लक्ष्मी की पूजा करते हैं, अब वह तो है ही पत्थर की मूर्ति। वह क्या देगी? देना फिर भी मुझे ही पड़ता है। साक्षात्कार भी मैं ही कराता हूँ। यह भी ड्रामा में नूँध है। जैसे कहते हैं परमपिता परमात्मा के हुक्म से पत्ता-पत्ता हिलता है क्योंकि वह समझते हैं पत्ते-पत्ते में परमात्मा है। क्या परमात्मा बैठ पत्ते को हुक्म करेगा क्या! यह तो ड्रामा बना हुआ है। अभी तुम जैसी एक्ट कर रहे हो, वह कल्प के बाद भी तुम ऐसे ही करेंगे। जो कुछ शूटिंग में शूट हुआ वही चलेगा। उसमें कुछ फ़र्क नहीं पड़ सकता। ड्रामा को भी अच्छी रीति समझना है। बाप समझाते हैं बेहद का सुख कल्प-कल्प भारत को ही मिलता है। परन्तु जो ब्राह्मण बनते हैं वही वर्णों में आते हैं। 84 जन्म लेते हैं। फिर औरों के जन्म नम्बरवार कम होते जायेंगे। कितने छोटे-छोटे मठ पंथ हैं। भल उन्हों की महिमा है - क्योंकि पवित्र हैं। स्वर्ग का रचयिता तो है बाप, और कोई मनुष्य थोड़ेही स्वर्ग रचेगा। फिर राजयोग भी कोई सिखलावे?
अभी तुम श्रीकृष्णपुरी में जाने के लिए राजयोग सीख रहे हो। पुरुषार्थ हमेशा ऊंचा करना चाहिए। तुम कहते हो श्रीकृष्ण जैसा बच्चा मिले, श्रीकृष्ण जैसा पति मिले। श्रीकृष्ण ही श्रीनारायण बनता है फिर श्रीकृष्ण जैसा क्यों कहते! तुमको तो कहना चाहिए नारायण जैसा पति मिले। नारद ने भी कहा हम लक्ष्मी को वरें। राधे के लिए नहीं कहा। बाप समझाते हैं तुमको कृष्णपुरी चलना है तो खूब पुरुषार्थ करो, वह है श्रीकृष्ण का दैवी कुल। कंस का है आसुरी कुल। तुम अभी हो संगम पर। शूद्र सम्प्रदाय तो ब्राह्मण ब्राह्मणी कहला न सकें। जो ब्राह्मण न कहलायें वह शूद्र वर्ण के हैं। भारत की ही बात है। भारत ही स्वर्ग बनता फिर भारत ही नर्क बन जाता है। लक्ष्मी-नारायण को भी 84 जन्म ले रजो तमो में आना ही है। जबकि वह भी चक्र में आते हैं तो बुद्ध आदि वापिस निर्वाणधाम में कैसे जा सकते। कोई तो कह देते कृष्ण सर्वव्यापी है, जिधर देखो कृष्ण ही कृष्ण है। राम के भक्त कहेंगे राम सर्वव्यापी है। वह कृष्ण को नहीं मानेंगे। बाबा के पास एक राधापंथी आया था कहता था राधे ही राधे... राधे हाज़िराहज़ूर है। तेरे में मेरे में राधे ही राधे है। गणेश का पुजारी कहेगा तेरे में मेरे में गणेश ही गणेश है। क्रिश्चियन फिर कहते क्राइस्ट गॉड का सन (बच्चा) है। अरे क्राइस्ट सन था तो तुम किसके सन (बच्चे) हो? अनेक मत मतान्तर हैं। रास्ता कोई को भी मिलता नहीं। सिर्फ माथा टेकते, भटकते रहते हैं। मुक्ति और जीवनमुक्ति भगवान ही देंगे ना! उनसे हम क्या मांगें! कोई को पता ही नहीं। बाप को न जानने कारण निधनके बन गये हैं। फिर धनी आकर धणका बनाते हैं। मनुष्य कितने धक्के खाते हैं, समझते हैं भक्ति से भगवान मिलेगा। बाप कहते हैं मैं आता ही हूँ अपने समय पर। भल कोई कितना भी पुकारे परन्तु मैं आता हूँ संगम पर। एक ही बार भारत को स्वर्ग बनाए सबको शान्ति में भेज देता हूँ। फिर नम्बरवार अपने-अपने समय पर आते हैं। जो देवी-देवता थे वह भी सब आत्मायें बैठी हुई हैं। फिर से अपना राज्य भाग्य ले रहे हैं। अभी तो देवी-देवता धर्म ही नहीं है। सब अपने को हिन्दू कहलाने लग पड़े हैं। ड्रामा अनुसार फिर भी ऐसा होगा। जो कुछ हो चुका है वह फिर रिपीट होगा। फिर ऐसे हम चक्र में आयेंगे, इतने जन्म लेंगे। हिसाब निकालो। हर एक धर्म वाले पीछे कितने जन्म लेंगे? झाड़ पर समझाना बहुत सहज है। आपेही मनुष्यों को टच होगा कि कोई की प्रेरणा से यह विनाश ज्वाला की तैयारी हो रही है। यूरोपवासी यादव बाम्ब्स बनाते हैं। वह भी कहते हैं हमको कोई प्रेरणा देने वाला है। हम जानते हैं कि इससे हम अपने ही कुल का विनाश करते हैं। न चाहते हुए भी यह मौत का सामान बनाते हैं। धीरे-धीरे प्रभाव पड़ेगा। धीरे धीरे झाड़ बढ़ता है ना। कोई कांटे से कली, कोई फूल बनते हैं। कोई कोई फूलों को भी तूफान लगता है तो मुरझा जाते हैं। बाबा ने कल्प-कल्प कहा था आश्चर्यवत सुनन्ती, कथन्ती... अब फिर बाबा खुद कह रहे हैं, हमारे पास आवन्ती, ब्रह्माकुमार कुमारी बनन्ती, कथन्ती फिर भी अहो मम माया अच्छे-अच्छे बच्चों को खावन्ती (खा गई) आगे चलकर देखना कैसे अच्छे-अच्छे बच्चे भी खत्म हो जाते हैं।
जो पास्ट हो गया सो फिर अब प्रेजन्ट में बाप समझाते हैं। फिर भक्ति मार्ग में शास्त्र बनायेंगे। यह ड्रामा ऐसा बना हुआ है। अब बाप आकर ब्रह्मा द्वारा सभी वेदों शास्त्रों का सार समझा रहे हैं। जो धर्म स्थापन करते हैं उनके नाम पर ही शास्त्र बनाते हैं। उसको धर्म शास्त्र कहा जाता है। देवी-देवता धर्म का शास्त्र एक ही गीता है। हरेक धर्म का एक शास्त्र होना चाहिए। श्रीमत भगवद गीता ठीक है। भगवानुवाच है। भगवान ने आदि सनातन देवी-देवता धर्म की स्थापना की। यह है सबसे प्राचीन धर्म। हरेक धर्म का अपना-अपना शास्त्र है और पढ़ते रहते हैं। अभी तुम देवता बनते हो लेकिन तुमको शास्त्र पढ़ने की दरकार नहीं, वहाँ शास्त्र होता ही नहीं। यह सब खत्म हो जायेंगे फिर गीता कहाँ से आई? द्वापर में बैठ मनुष्यों ने बनाई, जो गीता अभी है फिर भी वही गीता खोजकर निकालेंगे। जैसे कल्प पहले बनाई है वैसे फिर यह शास्त्र बनेंगे। भक्ति मार्ग की सामग्री बनती ही जायेगी।
बाप समझाते हैं सिकीलधे बच्चे मुझ बाप की श्रीमत पर चल श्रेष्ठ बनो। तुम अभी संगमयुग पर राजयोग सीख रहे हो, जबकि कलियुग को सतयुग बनाना है। उन्होंने कल्प की आयु लम्बी बताए सभी को घोर अन्धियारे में डाल दिया है। मनुष्य तो मूंझे हुए हैं, ड्रामा अनुसार तुम बच्चों को ही बेहद के बाप से वर्सा लेना है। बाबा ने बहुत युक्तियां बताई हैं सिर्फ बाबा को याद करो, चार्ट रखो। भोजन बनाने समय भी याद करो। भोजन बनाने समय पति, बच्चा याद पड़ता है तो शिवबाबा क्यों नही पड़ सकता! यह तुम्हारा काम है। बाबा बुद्धि की सीढ़ी देते हैं फिर चढ़ो न चढ़ो, यह है तुम्हारा काम। जितना याद करेंगे उतनी सीढ़ी चढ़ते जायेंगे। नहीं तो इतना सुख नहीं मिलेगा। अच्छा!
मीठे-मीठे सिकीलधे अर्थात् 5 हजार वर्ष के बाद फिर आए मिले हुए बच्चों को नम्बरवार पुरुषार्थ अनुसार मात-पिता बापदादा का यादप्यार और गुडमार्निंग। मीठे-मीठे रूहानी बाप का रूहानी बच्चों को नमस्ते।
धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) कृष्णपुरी में चलने के लिए पुरुषार्थ बहुत अच्छा करना है। शूद्र पन के सस्कारों को परिवर्तन कर पक्का ब्राह्मण बनना है।
2) बुद्धिबल से याद की सीढ़ी पर चढ़ना है। सीढ़ी चढ़ने से ही अपार सुख का अनुभव होगा।
वरदान:- अटेन्शन और चेकिंग की विधि द्वारा व्यर्थ के खाते को समाप्त करने वाले मा. सर्वशक्तिमान् भव
ब्राह्मण जीवन में व्यर्थ संकल्प, व्यर्थ बोल, व्यर्थ कर्म बहुत समय व्यर्थ गंवा देते हैं। जितनी कमाई करने चाहो उतनी नहीं कर सकते। व्यर्थ का खाता समर्थ बनने नहीं देता इसलिए सदा इस स्मृति में रहो कि मैं मास्टर सर्वशक्तिमान हूँ। शक्ति है तो जो चाहे वो कर सकते हैं। सिर्फ बार-बार अटेन्शन दो। जैसे क्लास के समय वा अमृतवेले की याद के समय अटेन्शन देते हो, ऐसे बीच-बीच में भी अटेन्शन और चेकिंग की विधि अपना लो तो व्यर्थ का खाता समाप्त हो जायेगा।
स्लोगन:- राजऋषि बनना है तो ब्राह्मण आत्माओं की दुआओं से अपनी स्थिति को निर्विघ्न बनाओ।
30-01-2023 HINDI MURLI
“मीठे बच्चे - तुम ईश्वरीय सन्तान हो, तुम्हारा यह अमूल्य जीवन है, तुम्हारा ईश्वरीय कुल बहुत ही श्रेष्ठ है। स्वयं भगवान ने तुम्हें एडाप्ट किया है, इसी नशे में रहो''
प्रश्नः- शरीर का भान टूट जाए - उसके लिए किस अभ्यास की आवश्यकता है?
उत्तर:- चलते फिरते अभ्यास करो कि इस शरीर में हम थोड़े टाइम के लिए निमित्त मात्र हैं। जैसे बाप थोड़े समय के लिए शरीर में आये हैं ऐसे हम आत्मा ने भी श्रीमत पर भारत को स्वर्ग बनाने के लिए यह शरीर धारण किया है। बाप और वर्सा याद रहे तो शरीर का भान टूट जायेगा, इसको ही कहा जाता है सेकण्ड में जीवनमुक्ति। 2- अमृतवेले उठ बाप से मीठी-मीठी बातें करो तो शरीर का भान खत्म होता जायेगा।
गीत:- ओम् नमो शिवाए...
ओम् शान्ति। भगवान होता ही है एक जो बाप भी है, बच्चों को समझाया गया है - आत्मा का रूप कोई इतना बड़ा लिंग नहीं है। आत्मा तो बहुत छोटी स्टार मिसल भ्रकुटी के बीच में है। कोई इतना बड़ा ज्योर्तिलिंगम् नहीं है, जैसे मन्दिरों में रखा हुआ है। नहीं। जैसे आत्मा वैसे परमात्मा बाप है। आत्मा का रूप मनुष्य जैसा नहीं है। आत्मा तो मनुष्य तन का आधार लेने वाली है। आत्मा ही सब कुछ करती है। संस्कार सब आत्मा में हैं। आत्मा स्टार है। आत्मा ही अच्छे वा बुरे संस्कारों अनुसार जन्म लेती है। तो इन बातों को अच्छी रीति समझना है। मन्दिरों में लिंग रखा हुआ है इसलिए समझाने के लिए हम भी शिवलिंग दिखाते हैं। इसका नाम शिव है, बिगर नाम के कोई चीज़ होती नहीं। कुछ न कुछ आकार है। बाप है परमधाम में रहने वाला। परमात्मा बाप कहते हैं जैसे आत्मा शरीर में आती है वैसे मुझे भी आना पड़ता है, नर्क को स्वर्ग बनाने। बाप की महिमा सबसे न्यारी है। अभी तुम बच्चे जानते हो, तुम आत्मायें आई हो यहाँ पार्ट बजाने। यह बेहद का अनादि अविनाशी ड्रामा है, इनका कभी विनाश नहीं होता। यह फिरता ही रहता है। बाप रचता भी एक है, रचना भी एक है। यह बेहद सृष्टि का चक्र है। 4 युग हैं। दूसरा है कल्प का संगमयुग, जिसमें ही बाप आकर पतित दुनिया को पावन बनाते हैं। यह चक्र फिरता रहता है। तुम बच्चों को अब स्मृति आई है कि हम सब आत्मायें परमधाम में रहने वाली हैं। इस कर्मक्षेत्र पर पार्ट बजाने आई हैं। इस बेहद के ड्रामा को रिपीट होना है। बाप है बेहद का मालिक। उस बाप की अपरमअपार महिमा है। ऐसी महिमा और कोई की नहीं है। वह मनुष्य सृष्टि का बीज-रूप है। सबका फादर है। बाप कहते हैं मैं पराई रावण की दुनिया में आता हूँ। एक तरफ है आसुरी गुणों वाली सम्प्रदाय। दूसरी तरफ है दैवीगुणों वाली सम्प्रदाय, इनको कंसपुरी भी कहते हैं। कंस असुर को कहा जाता है। श्रीकृष्ण को देवता कहा जाता है। अब बाप आये हैं देवता बनाने और सबको वापिस ले जाने, और कोई की ताकत नहीं। बाप ही बैठ बच्चों को शिक्षा दे दैवी गुण धारण कराते हैं। यह बाप की ही फ़र्जअदाई है। बाप कहते हैं जब सभी तमोप्रधान हो जाते हैं, मुझे भूल जाते हैं, न सिर्फ भूल जाते हैं परन्तु मुझे पत्थर ठिक्कर में ठोक देते हैं, इतनी ग्लानी कर देते हैं तब तो मैं आता हूँ। मेरे जैसी ग्लानी किसकी नहीं करते, तब तो मैं आकर तुम्हारा लिबरेटर बनता हूँ। सबको मच्छरों सदृश्य ले जाऊंगा। और कोई ऐसे कह न सके कि मनमनाभव, मुझ अपने परमपिता परमात्मा को याद करो तो तुम्हारे विकर्म विनाश होंगे। श्रीकृष्ण तो कह न सके। परमात्मा की महिमा तो बच्चे जानते हैं। वह ज्ञान का सागर, सुख का सागर है। फिर सेकण्ड नम्बर में है ब्रह्मा, विष्णु, शंकर। ब्रह्मा द्वारा स्थापना कौन करेगा? क्या श्रीकृष्ण? परमपिता परमात्मा शिव बैठ समझाते हैं कि पहले-पहले हमको चाहिए ब्राह्मण। तो ब्रह्मा द्वारा ब्राह्मण मुख वंशावली रचता हूँ। वह हैं कुख वंशावली। तुम अब संगम में ब्रह्मा की सन्तान हो। बाप आकर शूद्र से ब्राह्मण बनाते हैं। अभी तुम हो ईश्वरीय कुल के। ईश्वर हुआ निराकार, ब्रह्मा हुआ साकार। बाप पहले-पहले ब्राह्मण फिर देवता बनाते हैं। देवता के बाद क्षत्रिय...यह चक्र फिरता रहता है। फिर इनसे और धर्म निकले हैं। मूल है भारत, यह भारत अविनाशी खण्ड है, जहाँ बाप आकर स्वर्ग बनाते हैं। वह बाप भी है, टीचर भी है, तुम्हारा सतगुरू भी है। उनको फिर सर्वव्यापी कैसे कह सकते। वह तो तुम्हारा बाप है। इस दुनिया में सिवाए तुम ब्राह्मणों के कोई त्रिकालदर्शी हो नहीं सकता। तुम बच्चे समझते हो परमपिता परमात्मा के साथ हम परमधाम के रहने वाले हैं। फिर नम्बरवार कर्मक्षेत्र पर आते हैं। फिर पिछाड़ी में हम ही जाते हैं। 84 जन्म पूरे लेने हैं।
बाप समझाते हैं - तुमने कितने जन्म लिए और कैसे वर्णो में आये। यह चक्र चलता रहता है। अभी तुम हो ईश्वरीय सम्प्रदाय, यह तुम्हारा अमूल्य जीवन है जबकि तुम ईश्वरीय सन्तान बने हो। ब्रह्मा द्वारा बाप आकर एडाप्ट करते हैं। बाप है स्वर्ग का रचयिता तो खुद ही आकर स्वर्ग का मालिक भी बनाते हैं। अब सारे विश्व में शान्ति स्थापन करना - यह बाप का ही काम है। बाप कहते हैं मेरा पार्ट है, मैं तुमको फिर से राजयोग सिखलाता हूँ, जिससे तुम एवरहेल्दी बनेंगे। जैसे देवता बने थे, फिर अब रिपीट होता है। यह सैपलिंग लग रहा है। बाप बागवान है, इन द्वारा कलम लगा रहे हैं। बाप सम्मुख बैठ समझाते हैं - मेरे सिकीलधे बच्चे, बहुत समय से बिछुड़े हुए बच्चे, याद है ना - मैंने तुमको स्वर्ग में भेजा था। फिर तुम 84 का चक्र लगाकर अब आकर मिले हो। अब अपने को आत्मा समझ मुझ बाप को याद करो। तुमको वापिस जरूर ले जाना है। तुम चाहो न चाहो ले जरूर जाना है। पहले आदि सनातन दैवी राज्य चला फिर आसुरी राज्य चला। दैवी राज्य के बाद पवित्रता तो चली गई फिर सिंगल ताज हो गया, अब तो प्रजा का प्रजा पर राज्य है फिर दैवी राज्य की स्थापना हो रही है। आसुरी राज्य के विनाश के लिए इस रूद्र यज्ञ से यह विनाश ज्वाला प्रज्वलित हुई है। तुम पतित सृष्टि पर थोड़ेही राज्य करेंगे। अभी है संगम। सतयुग में तो ऐसे नहीं कहेंगे। अभी तुम बच्चे पुरुषार्थ कर रहे हो। कराने वाला कौन है? श्रीमत देने वाला समर्थ, श्रेष्ठ ते श्रेष्ठ है ही एक बाप। वही ब्रह्मा द्वारा स्थापना करा रहे हैं। बाप कहते हैं मैं भारत का मोस्ट ओबीडियन्ट सर्वेन्ट हूँ। भारत को स्वर्ग बनाता हूँ। वहाँ यथा राजा रानी तथा प्रजा सब सुखी रहते हैं। नैचुरल ब्युटी रहती है। लक्ष्मी-नारायण को देखो कितने सुन्दर हैं। हेविनली गॉड फादर है हेविन स्थापन करने वाला। सारी दुनिया में गीता के लिए कहते हैं श्रीकृष्ण भगवानुवाच। परन्तु श्रीकृष्ण तो कह न सके मनमनाभव, मामेकम् याद करो तो विकर्म भस्म हों। और कोई उपाय भी नहीं है। गंगा तो पतित-पावनी है नहीं। वह थोड़ेही कहेगी कि मामेकम् याद करो। यह तो एक बाप ही बैठ समझाते हैं। बाप आत्माओं से बात करते हैं। बाप ही सबका सद्गति दाता है। उनके मन्दिर भी हैं। द्वापर से सब यादगार बनना शुरू होते हैं। सोमनाथ का मन्दिर है, परन्तु वह क्या करके गये हैं - यह कोई नहीं जानते। वह शिव शंकर को मिला देते हैं। अब कहाँ शिव परमधाम के निवासी और कहाँ शंकर सूक्ष्मवतन के वासी। कुछ भी समझते नहीं। बाप कहते हैं कितने भी वेद शास्त्र आदि कोई पढ़े, जप तप करे परन्तु मेरे से मिल नहीं सकते। भल मैं भावना का भाड़ा सबको देता हूँ, परन्तु वह तो अखण्ड ज्योति ब्रह्म को ही परमात्मा समझ लेते हैं। ब्रह्म का साक्षात्कार हो परन्तु उससे कुछ भी हांसिल नहीं होगा। कोई को हनूमान का, कोई को गणेश का साक्षात्कार कराता हूँ, वह तो मैं अल्पकाल के लिए मनोकामना पूर्ण करता हूँ। अल्पकाल लिए खुशी तो रहती है। परन्तु फिर भी सबको तमोप्रधान तो बनना है। चाहे सारा दिन गंगा में जाकर बैठ जाएं तो भी तमोप्रधान तो सबको बनना ही है।
बाप कहते हैं बच्चे पवित्र बनो तो पवित्र दुनिया का 21 जन्म के लिए मालिक बनेंगे। और कोई सतसंग नहीं जहाँ इतनी प्राप्ति हो। बाप ही आकर राजयोग सिखलाते हैं तो कितना श्रीमत पर चलना चाहिए। पढ़ाई पर ध्यान देना चाहिए। बाप श्रेष्ठ ते श्रेष्ठ मत देते हैं। श्रीमत से भारत को स्वर्ग बनाना है। तुम्हें ड्रामा के राज़ को अच्छी तरह से समझना है और पुरुषार्थ करना है। पुरुषार्थ कर ऐसा लायक बनना है। तुम बच्चों को नशा होना चाहिए कि हम बाप के साथ स्वर्ग की स्थापना करने आये हैं। हम वहाँ के रहवासी हैं। इस शरीर में हम निमित्त मात्र हैं थोड़े टाइम के लिए। बाबा भी थोड़े टाइम के लिए आये हैं, इस शरीर का भान टूट जाना चाहिए। अपने बाप और वर्से को याद करो, इसको ही सेकण्ड में जीवनमुक्ति कहा जाता है। बाप कहते हैं मैं आया हूँ सबको वापिस ले जाने। अब तुम अपने को आत्मा समझ सवेरे उठकर बाबा को याद करो। उनसे बातें करो। तुम जानते हो हमारे 84 जन्म पूरे हुए। अब हम ईश्वरीय सन्तान बने हैं। फिर दैवी सन्तान, फिर क्षत्रिय सन्तान बनेंगे। बाबा हमको विश्व का मालिक बनाते हैं। बाबा की बैठ महिमा करो। बाबा आपने तो कमाल की है। कल्प-कल्प आकर हमको पढ़ाते हो। बाबा आपका ज्ञान बड़ा वन्डरफुल है। स्वर्ग कितना वन्डरफुल है। वह हैं जिस्मानी वन्डर्स, यह है रूहानी बाप का स्थापन किया हुआ वन्डर। बाप आये हैं श्रीकृष्णपुरी स्थापन करने। इन लक्ष्मी-नारायण ने यह प्रालब्ध कहाँ से पाई? बाप द्वारा। जगत अम्बा और जगत पिता के साथ बच्चे भी होंगे। वह हैं ब्राह्मण, जगत अम्बा तो ब्राह्मणी थी। वह है कामधेनु। सबकी मनोकामनायें पूर्ण कर देती है। यह जगत अम्बा ही फिर स्वर्ग की महारानी बनती है। कितना वन्डरफुल राज़ है। यह बाप अपनी अवस्था को जमाने के लिए भिन्न-भिन्न युक्तियां बताते रहते हैं। रात को जागो। बाबा को याद करो तो अन्त मती सो गति हो जायेगी। अगर पूरा पुरुषार्थ होगा तो याद ठहरेगी। पास विद आनर हो जाना है। 8 को ही स्कालरशिप मिलती है। सब कहते हैं - हम लक्ष्मी-नारायण को वरें, तो पास होकर दिखाना है। अपने को देखना है कि मेरे में कोई बन्दरपना तो नहीं है? उसको निकालते जाओ। देखो, सारे दिन में किसको दु:ख तो नहीं दिया? बाप है सबको सुख देने वाला। बच्चों को भी ऐसा बनना है। वाचा, कर्मणा से कोई को भी दु:ख नहीं देना है। सच्चा-सच्चा रास्ता बताना है। वह है हद के बाप का वर्सा। यह है बेहद के बाप का वर्सा, सो तो जिसको मिलता होगा वही बतायेंगे। जो अपने धर्म के होंगे उन्हों को झट टच होगा।
बाप कहते हैं फिर से दैवी धर्म स्थापन करने मैं ब्रह्मा के तन में आता हूँ। तुम बच्चों की बुद्धि में है कि अभी हम ब्राह्मण हैं फिर देवता बनना है। पहले सूक्ष्मवतन में जाकर फिर शान्तिधाम में जायेंगे। वहाँ से फिर नई दुनिया में, गर्भ महल में आयेंगे। यहाँ गर्भजेल में आते हैं। इनको कहते हैं झूठी माया, झूठी काया... बाप कहते हैं कितनी धर्म ग्लानी की है, शिव जयन्ती मनाते हैं परन्तु शिव कब आया, किसमें प्रवेश किया, यह कोई को पता नहीं है। जरूर कोई शरीर में आकर नर्क को स्वर्ग बनाया होगा ना। बाप बच्चों को बहुत अच्छी रीति समझाते हैं और राय देते हैं अपना चार्ट बनाओ। सारे दिन में कितना समय बाप को याद किया! सवेरे उठकर बाप को, वर्से को याद करो। हम बेहद के बाप के साथ आये हैं। गुप्तवेष में भारत को स्वर्ग बनाने। अब हमको वापिस जाना है। जाने से पहले अपनी राजधानी जरूर स्थापन करनी है। अब तुम हो संगम पर। बाकी सारी दुनिया है कलियुग में। तुम संगमयुगी ब्राह्मण हो। बाप बच्चों के लिए सौगात ले आते हैं - मुक्ति और जीवनमुक्ति की। सतयुग में भारत जीवनमुक्त था, बाकी सब आत्मायें मुक्तिधाम में थी। बाप हथेली पर बहिश्त ले आते हैं तो जरूर उसके लिए लायक भी खुद ही बनायेंगे। अच्छा!
मीठे मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात पिता बापदादा का यादप्यार और गुडमार्निग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।
धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) सदा इस नशे में रहना है कि हम बाप के साथ स्वर्ग की स्थापना के निमित्त हैं। बाप हमें विश्व का मालिक बनाते हैं।
2) बाप समान सुख देने वाला बनना है। कभी किसी को दु:खी नहीं करना है। सबको सच्चा रास्ता बताना है। अपनी उन्नति के लिए अपना चार्ट रखना है।
वरदान:- निमित्त और नम्रचित की विशेषता द्वारा सेवा में फास्ट और फर्स्ट नम्बर लेने वाले सफलतामूर्त भव
सेवा में आगे बढ़ते हुए यदि निमित्त और नम्रचित की विशेषता स्मृति में रहती है तो सफलता स्वरूप बन जायेंगे। जैसे सेवाओं की भाग-दौड़ में होशियार हो ऐसे इन दो विशेषताओं में भी होशियार बनो, इससे सेवा में फास्ट और फर्स्ट हो जायेंगे। ब्राह्मण जीवन की मर्यादाओं की लकीर के अन्दर रहकर, स्वयं को रूहानी सेवाधारी समझकर सेवा करो तो सफलतामूर्त बन जायेंगे। मेहनत नहीं करनी पड़ेगी।
स्लोगन:- जो बुद्धि द्वारा सदा ज्ञान रत्नों को धारण करते हैं वही सच्चे होलीहंस हैं। 29.01.2023 HINDI MURLI
रिवाइज: 02-12-93 मधुबन
नम्बरवन बनने के लिए गुण मूर्त बन गुणों का दान करने वाले महादानी बनो
आज बेहद के मात-पिता चारों ओर के विशेष बच्चों को देख रहे थे। क्या विशेषता देखी? कौन से बच्चे अखुट ज्ञानी, अटल स्वराज्य अधिकारी, अखण्ड निर्विघ्न, अखण्ड योगी, अखण्ड महादानी हैं ऐसे विशेष आत्मायें कोटों में कोई बने हुए हैं। ज्ञानी, योगी, महादानी सभी बने हैं लेकिन अखण्ड कोई-कोई बने हैं। जो अखुट, अटल और अखण्ड हैं वही विजय माला के विजयी मणके हैं। बापदादा ने संगमयुग पर सभी बच्चों को ‘अटल-अखण्ड भव' का वरदान दिया है लेकिन वरदान को जीवन में सदा धारण करने में नम्बरवार बन गये हैं। नम्बरवन बनने के लिये सबसे सहज विधि है अखण्ड महादानी बनो। अखण्ड महादानी अर्थात् निरन्तर सहज सेवाधारी क्योंकि सहज ही निरन्तर हो सकता है। तो अखण्ड सेवाधारी अर्थात् अखण्ड महादानी। दाता के बच्चे हो, सर्व खज़ानों से सम्पन्न श्रेष्ठ आत्मायें हो। सम्पन्न की निशानी है अखण्ड महादानी। एक सेकेण्ड भी दान देने के बिना रह नहीं सकते। द्वापर से दानी आत्मायें अनेक भक्त भी बने हैं लेकिन कितने भी बड़े दानी हों, अखुट ख़ज़ाने के दानी नहीं बने हैं। विनाशी ख़ज़ाने वा वस्तु के दानी बनते हैं। आप श्रेष्ठ आत्मायें अब संगम पर अखुट और अखण्ड महादानी बनते हो। अपने आपसे पूछो कि अखण्ड महादानी हो? वा समय प्रमाण दानी हो? वा चांस प्रमाण दानी हो?
अखण्ड महादानी सदा तीन प्रकार से दान करने में बिज़ी रहते हैं। पहला मनसा द्वारा शक्तियां देने का दान, दूसरा वाणी द्वारा ज्ञान का दान, तीसरा कर्म द्वारा गुणों का दान। इन तीनों प्रकार के दान देने वाले सहज महादानी बन सकते हैं। रिजल्ट में देखा वाणी द्वारा ज्ञान दान मैजारिटी करते रहते हो। मनसा द्वारा शक्तियों का दान यथा शक्ति करते हो और कर्म द्वारा गुण दान ये बहुत कम करने वाले हैं और वर्तमान समय चाहे अज्ञानी आत्मायें हैं, चाहे ब्राह्मण आत्मायें हैं दोनों को आवश्यकता गुणदान की है। वर्तमान समय विशेष स्वयं में वा ब्राह्मण परिवार में इस विधि को तीव्र बनाओ।
ये दिव्य गुण सबसे श्रेष्ठ प्रभु प्रसाद है। इस प्रसाद को खूब बांटो। जैसे जब कोई से भी मिलते हो तो एक-दो में भी स्नेह की निशानी स्थूल टोली खिलाते हो ना, ऐसे एक-दो में ये गुणों की टोली खिलाओ। इस विधि से जो संगमयुग का लक्ष्य है - “फरिश्ता सो देवता'' यह सहज सर्व में प्रत्यक्ष दिखाई देगा। यह प्रैक्टिस निरन्तर स्मृति में रखो कि मैं दाता का बच्चा अखण्ड महादानी आत्मा हूँ। कोई भी आत्मा चाहे अज्ञानी हो, चाहे ब्राह्मण हो लेकिन देना है। ब्राह्मण आत्माओं को ज्ञान तो पहले ही है लेकिन दो प्रकार से दाता बन सकते हो।
1- जिस आत्मा को, जिस शक्ति की आवश्यकता है उस आत्मा को मन्सा द्वारा अर्थात् शुद्ध वृत्ति, वायब्रेशन्स द्वारा शक्तियों का दान अर्थात् सहयोग दो।
2- कर्म द्वारा सदा स्वयं जीवन में गुण मूर्त बन, प्रत्यक्ष सैम्पल बन औरों को सहज गुण धारण करने का सहयोग दो। इसको कहा जाता है गुण दान। दान का अर्थ है सहयोग देना। आजकल ब्राह्मण आत्मायें भी सुनने के बजाय प्रत्यक्ष प्रमाण देखना चाहती हैं। किसी को भी शक्ति धारण करने की वा गुण धारण करने की शिक्षा देना चाहते हो तो कोई दिल में सोचते, कोई कहते कि ऐसे धारणा मूर्त कौन बने हैं? तो देखना चाहते हैं लेकिन सुनना नहीं चाहते। ऐसे एक-दो में कहते हो ना - कौन बना है, सबको देख लिया...। जब कोई बात आती है तो कहते हैं कोई नहीं बना है, सब चलता है। लेकिन यह अलबेलेपन के बोल हैं, यथार्थ नहीं हैं। यथार्थ क्या है? फालो ब्रह्मा बाप। जैसे ब्रह्मा बाप ने स्वयं, सदा अपने को निमित्त एग्जाम्पल बनाया, सदा यह लक्ष्य लक्षण में लाया - जो ओटे सो अर्जुन अर्थात् जो स्वयं को निमित्त प्रत्यक्ष प्रमाण बनाता है वही अर्जुन अर्थात् अव्वल नम्बर का बनता है। अगर फालो फादर करना है तो दूसरे को देख बनने में नम्बरवन नहीं बन सकेंगे। नम्बरवार बन जायेंगे।
नम्बरवन आत्मा की निशानी है हर श्रेष्ठ कार्य में मुझे निमित्त बन औरों को सिम्पल करने के लिये सैम्पल बनना है। दूसरे को देखना, चाहे बड़ों को, चाहे छोटों को, चाहे समान वालों को लेकिन दूसरों को देख बनना कि पहले यह-यह बनें तो मैं बनूँ, तो नम्बरवन तो वह हो गया ना जो बनेगा। तो स्वयं स्वत: ही नम्बरवार में आ जाते हैं। तो अखण्ड महा-दानी आत्मा सदा अपने को हर सेकेण्ड तीनों ही महादान में से कोई न कोई दान करने में बिज़ी रखता है। जैसा समय वैसी सेवा में सदा लगा हुआ रहता है। उनको व्यर्थ देखने, सुनने वा करने की फुर्सत ही नहीं। तो महादानी बने हो? अभी अण्डरलाइन करो अखण्ड बने हैं। अगर बीच-बीच में दातापन में खण्डन पड़ता है तो खण्डित को सम्पूर्ण नहीं कहा जाता। वर्तमान समय आपस में विशेष कर्म द्वारा गुणदाता बनने की आवश्यकता है। हर एक संकल्प करो कि मुझे सदा गुण मूर्त बन सबको गुण मूर्त बनाने का विशेष कर्तव्य करना ही है। तो स्वयं की और सर्व की कमजोरियां समाप्त करने की इस विधि में हर एक अपने को निमित्त अव्वल नम्बर समझ आगे बढ़ते चलो। ज्ञान तो बहुत है, अभी गुणों को इमर्ज करो, सर्वगुण सम्पन्न बनने और बनाने का एग्जाम्पल बनो। अच्छा!
सर्व अखण्ड योगी तू आत्मायें, सर्व सदा गुण मूर्त आत्माओं को, सर्व हर संकल्प हर सेकेण्ड महादानी वा महासहयोगी विशेष आत्माओं को, सदा स्वयं को श्रेष्ठता में सैम्पल बन सर्व आत्माओं को सिम्पल सहज प्रेरणा देने वाले, सदा स्वयं को निमित्त नम्बरवन समझ प्रत्यक्ष प्रमाण देने वाले बाप समान आत्माओं को बापदादा का याद-प्यार और नमस्ते।
दादी जानकी से मुलाकात- (आस्ट्रेलिया, सिंगापुर आदि के चक्कर का समाचार सुनाया और सबकी याद दी) सबकी याद पहुँच गई। चारों ओर के बच्चे सदा बाप के सामने हैं इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है जब भी याद करते तो समीप और साथ का अनुभव करते हैं। बाबा कहा दिल से और दिलाराम हाज़िर। इसीलिये ही कहते हैं हज़ूर हाज़िर है, हाज़िरा हज़ूर है। जहाँ भी हैं, जो भी हैं लेकिन हर स्थान पर हरेक के पास हाज़िर हो जाते हैं इसीलिये हाज़िरा हज़ूर हो गया। इस स्नेह की विधि को लोग नहीं जान सकते। यह ब्राह्मण आत्मायें ही जानती हैं। अनुभवी इस अनुभव को जानते हैं। आप विशेष आत्मायें तो हैं ही कम्बाइण्ड ना। अलग हो ही नहीं सकते। लोग कहते हैं जिधर देखते हैं उधर तू ही तू है और आप कहते हो जो करते हैं, जहाँ जाते हैं बाप साथ ही है अर्थात् तू ही तू है। जैसे कर्तव्य साथ है तो हर कर्तव्य कराने वाला भी सदा साथ है इसलिये गाया हुआ है करनक-रावनहार। तो कम्बाइण्ड हो गया ना - करनहार और करावनहार। तो आप सबकी स्थिति क्या है? कम्बाइण्ड है ना। करनकरावनहार, करनहार के साथ है ही, करावनहार अलग नहीं है। इसको ही कम्बाइण्ड स्थिति कहा जाता है। सभी अपना-अपना अच्छा पार्ट बजा रहे हो। अनेक आत्माओं के आगे सैम्पल हो, सिम्पल करने के। ऐसे लगता है ना। मुश्किल को सहज बनाना यही फालो फादर है। ऐसे है ना। अच्छा पार्ट बजाया ना। जहाँ भी हैं, विशेष पार्टधारी विशेष पार्ट बजाने के सिवाए रह नहीं सकते। यह ड्रामा की नूँध है। अच्छा। चक्कर लगाना बहुत अच्छा है। चक्कर लगाया फिर स्वीट होम में आ गये। सेवा का चक्कर अनेक आत्माओं के प्रति विशेष उमंग-उत्साह का चक्कर है। सब ठीक है ना? अच्छा ही अच्छा है। ड्रामा की भावी खींचती ज़रूर है। आप रहना चाहो लेकिन ड्रामा में नहीं है तो क्या करेंगे। सोचते भी जाना पड़ेगा क्योंकि सेवा की भावी है तो सेवा की भावी अपना कार्य कराती है। आना और जाना यही तो विधि है। अच्छा। संगठन अच्छा है।
अव्यक्त बापदादा की पर्सनल मुलाकात
1) परमात्म प्यार का अनुभव करने के लिए दु:ख की लहर से न्यारे बनो
बापदादा ने संगम पर अनेक ख़ज़ाने दिये हैं उन सभी खज़ानों में से श्रेष्ठ से श्रेष्ठ ख़ज़ाना है सदा खुशी का ख़ज़ाना। तो यह खुशी का ख़ज़ाना सदा साथ रहता है? कैसी भी परिस्थिति आ जाये लेकिन खुशी नहीं जा सकती। जब परिस्थिति कोई दु:ख की लहर वाली आती है तो भी खुश रहते हो कि थोड़ी-थोड़ी लहर आ जाती है? क्योंकि संगम पर हो ना। तो एक तरफ है दु:खधाम, दूसरे तरफ है सुखधाम। तो दु:ख के लहर की कई बातें सामने आयेंगी लेकिन अपने अन्दर वो दु:ख की लहर दु:खी नहीं करे। जैसे गर्मी के मौसम में गर्मी तो होगी ना लेकिन स्वयं को बचाना वो अपने ऊपर है। तो दु:ख की बातें सुनने में आयेंगी लेकिन दिल में प्रभाव नहीं पड़े। इसलिये कहा जाता है न्यारा और प्रभु का प्यारा। तो दु:ख की लहर से न्यारा तब प्रभु का प्यारा बनेंगे। जितना न्यारा उतना प्यारा। अपने आपको देखो कि कितने न्यारे बने हैं? जितना न्यारा बनते जाते हो उतना ही सहज परमात्म प्यार का अनुभव करते हो। तो हर रोज़ चेक करो कि कितने न्यारे रहे, कितने प्यारे रहे। क्योंकि ये प्यार परमात्म प्यार है जो और कोई भी युग में प्राप्त हो नहीं सकता। जितना प्राप्त करना है उतना अभी करना है। अभी नहीं तो कभी भी नहीं हो सकता। और कितना थोड़ा सा समय यह परमात्म प्यार की प्राप्ति का है। तो थोड़े समय में बहुत अनुभव करना है। तो कर रहे हो? दुनिया वाले खुशी के लिये कितना समय, सम्पत्ति खर्च करते हैं और आपको सहज अविनाशी खुशी का ख़ज़ाना मिल गया। कुछ खर्चा किया क्या? खुशी के आगे खर्च करने की वस्तु है ही क्या जो देंगे। तो यही खुशी के गीत गाते रहो कि जो पाना था वो पा लिया। पा लिया ना? तो जब कोई चीज़ मिल जाती है तो खुशी में नाचते रहते हैं। दूसरों को भी यह खुशी बांटते जाओ। जितना बांटते जाते हो उतना बढ़ती जाती है क्योंकि बांटना माना बढ़ना। तो जो भी सम्बन्ध में आये वह अनुभव करे कि इनको कोई श्रेष्ठ प्राप्ति हुई है, जिसकी खुशी है क्योंकि दुनिया में तो हर समय का दु:ख है और आपके पास हर समय की खुशी है। तो दु:खी को खुशी देना, यह सबसे बड़े से बड़ा पुण्य है। तो सभी निर्विघ्न बन आगे उड़ रहे हो या छोटे-छोटे विघ्न रोकते हैं? विघ्नों का काम है आना और आपका काम है विजय प्राप्त करना। जब विघ्न अपना कार्य अच्छी तरह से कर रहे हैं तो आप मास्टर सर्वशक्तिमान् अपने विजय के कार्य में सदा सफल रहो। सदा यह याद रखो कि हम विघ्न-विनाशक आत्मायें हैं। विघ्न-विनाशक का जो यादगार है उसका प्रैक्टिकल में अनुभव कर रहे हो ना। अच्छा।
2) अचल स्थिति बनाने के लिए मास्टर सर्वशक्तिमान् का टाइटल स्मृति में रखो
स्वयं को सदा सर्व खज़ानों से भरपूर अर्थात् सम्पन्न आत्मा अनुभव करते हो? क्योंकि जो सम्पन्न होता है तो सम्पन्नता की निशानी है कि वो अचल होगा, हलचल में नहीं आयेगा। जितना खाली होता है उतनी हलचल होती है। तो किसी भी प्रकार की हलचल, चाहे संकल्प द्वारा, चाहे वाणी द्वारा, चाहे सम्बन्ध-सम्पर्क द्वारा, किसी भी प्रकार की हलचल अगर होती है तो सिद्ध है कि ख़ज़ाने से सम्पन्न नहीं हैं। संकल्प में भी, स्वप्न में भी अचल। क्योंकि जितना-जितना मास्टर सर्वशक्तिमान् स्वरूप की स्मृति इमर्ज होगी उतना ये हलचल मर्ज होती जायेगी। तो मास्टर सर्वशक्तिमान् की स्मृति प्रत्यक्ष रूप में इमर्ज हो। जैसे शरीर का आक्यूपेशन इमर्ज रहता है, मर्ज नहीं होता, ऐसे यह ब्राह्मण जीवन का आक्यूपेशन इमर्ज रूप में रहे। तो यह चेक करो इमर्ज रहता है या मर्ज रहता है? इमर्ज रहता है तो उसकी निशानी है हर कर्म में वह नशा होगा और दूसरों को भी अनुभव होगा कि यह शक्तिशाली आत्मा है। तो कहा जाता है हलचल से परे अचल। अचलघर आपका यादगार है। तो अपना आक्यूपेशन सदा याद रखो कि हम मास्टर सर्व-शक्तिमान् हैं क्योंकि आजकल सर्व आत्मायें अति कमजोर हैं तो कमजोर आत्माओं को शक्ति चाहिये। शक्ति कौन देगा? जो स्वयं मास्टर सर्वशक्तिमान् होगा। किसी भी आत्मा से मिलेंगे तो वो क्या अपनी बातें सुनायेंगे? कमजोरी की बातें सुनाते हैं ना? जो करना चाहते हैं वो कर नहीं सकते तो इसका प्रमाण है कि कमजोर हैं और आप जो संकल्प करते हो वो कर्म में ला सकते हो। तो मास्टर सर्वशक्तिमान् की निशानी है कि संकल्प और कर्म दोनों समान होगा। ऐसे नहीं कि संकल्प बहुत श्रेष्ठ हो और कर्म करने में वो श्रेष्ठ संकल्प नहीं कर सको, इसको मास्टर सर्वशक्तिमान् नहीं कहेंगे। तो चेक करो कि जो श्रेष्ठ संकल्प होते हैं वो कर्म तक आते हैं या नहीं आ सकते? मास्टर सर्वशक्तिमान् की निशानी है कि जो शक्ति जिस समय आवश्यक हो उस समय वो शक्ति कार्य में आये। तो ऐसे है या आह्वान करते हो, थोड़ा देरी से आती है? जब कोई बात पूरी हो जाती है, पीछे स्मृति में आये कि ऐसा नहीं, ऐसा करते, तो इसको कहा जाता है समय पर काम में नहीं आई। जैसे स्थूल कर्मेन्द्रियां ऑर्डर पर चल सकती हैं ना, हाथ को जब चाहो, जहाँ चाहो वहाँ चला सकते हो, ऐसे यह सूक्ष्म शक्तियां इतने कन्ट्रोल में हों जिस समय जो शक्ति चाहो काम में लगा सको। तो ऐसी कन्ट्रोलिंग पॉवर है? ऐसे तो नहीं सोचते कि चाहते तो नहीं थे लेकिन हो गया। तो सदा अपनी कन्ट्रोलिंग पॉवर को चेक करते हुए शक्तिशाली बनते चलो। सब उड़ती कला वाले हो कि कोई चढ़ती कला वाला, कोई उड़ती कला वाला? वा कभी उड़ती, कभी चढ़ती, कभी चलती कला हो जाती है? बदली होता है वा एकरस आगे बढ़ते रहते हो? कोई विघ्न आता है तो कितने समय में विजयी बनते हो? टाइम लगता है? क्योंकि नॉलेजफुल हो ना। तो विघ्नों की भी नॉलेज है। नॉलेज की शक्ति से विघ्न वार नहीं करेंगे लेकिन हार खा लेंगे। इसी को ही मास्टर सर्वशक्तिमान् कहा जाता है। तो अमृतवेले से इस आक्यूपेशन को इमर्ज करो और फिर सारा दिन चेक करो। अच्छा।
वरदान:- सहनशक्ति का कवच पहन, सम्पूर्ण स्टेज को वरने वाले विघ्न जीत भव
अपनी सम्पूर्ण स्टेज को वरने अर्थात् प्राप्त करने के लिए अलबेलेपन के नाज़ नखरों को छोड़ सहनशक्ति में मजबूत बनो। सहनशक्ति ही सर्व विघ्नों से बचने का कवच है। जो यह कवच नहीं पहनते वह नाजुक बन जाते हैं। फिर बाप की बातें बाप को ही सुनाते हैं, कभी बहुत उमंग-उत्साह में रहते, कभी दिलशिकस्त हो जाते। अब इस उतरने चढ़ने की सीढ़ी को छोड़ सदा उमंग-उत्साह में रहो तो सम्पूर्ण स्टेज समीप आ जायेगी।
स्लोगन:- याद और सेवा की शक्ति से अनेक आत्माओं पर रहम करना ही रहमदिल बनना है।
28.01.2023 HINDI MURLI
“मीठे बच्चे - एक मनमनाभव के महामंत्र से तुम समझदार बनते हो, यही मंत्र सब पापों से मुक्त करने वाला है''
प्रश्नः- सारे ज्ञान का सार क्या है, मनमनाभव रहने वालों की निशानी क्या होगी?
उत्तर:- सारे ज्ञान का सार है कि अब हमको वापिस घर जाना है। यह छी-छी दुनिया है, इसको छोड़ हमें अपने घर चलना है। अगर यह याद रहे तो भी मनमनाभव हुआ। मनमनाभव रहने वाले बच्चे सदा ज्ञान का विचार सागर मंथन करते रहेंगे। वह बाबा से मीठी-मीठी रूहरिहान करेंगे।
प्रश्नः- किस आदत के वशीभूत आत्मा बाप की याद में नहीं रह सकती?
उत्तर:- अगर गन्दे चित्र देखने की, गन्दे समाचार पढ़ने की आदत पड़ी तो बाप की याद रह नहीं सकती। सिनेमा है दोज़क का द्वार, जो वृत्तियों को खराब कर देता है।
ओम् शान्ति। रूहानी बाप बैठ रूहानी बच्चों को समझाते हैं। समझाना उनको होता है, जिसमें कुछ कम समझ है। तुम अभी बहुत समझदार बन चुके हो जो समझते हो कि यह हमारा बेहद का बाप भी है, बेहद की शिक्षा भी देते हैं। सृष्टि के आदि-मध्य-अन्त का राज़ भी समझाते हैं। स्टूडेण्ट की बुद्धि में नॉलेज होनी चाहिए ना और फिर बाप साथ में भी जरूर ले जायेगा क्योंकि बाप जानते हैं कि यह पुरानी छी-छी दुनिया है। इस पुरानी दुनिया से मैं बच्चों को घर ले जाने लिए आया हूँ। बाबा समझाते हैं यहाँ बैठे बैठे बच्चों के अन्दर में जरूर आता होगा कि ओहो! यह हमारा बेहद का बाप भी है, फिर शिक्षा भी बहुत ऊंची देते हैं। सारी रचना के आदि मध्य अन्त का राज़ भी समझाया है। यह सब याद करना भी मनमनाभव है। यह भी तुम्हारे चार्ट में आ सकता है। यह तो बहुत सहज है। और भल कुछ भी न करो, परन्तु उठते बैठते, चलते फिरते बुद्धि में यह याद रहे। वण्डरफुल चीज़ को याद करना होता है। तुम समझते हो बाबा को याद करने से, पढ़ाई पढ़ने से हम फिर से विश्व का मालिक बनते हैं। यह बुद्धि में चलता रहना चाहिए। भल कहाँ भी बस-ट्रेन आदि में बैठे हो परन्तु बुद्धि में याद हो। पहले-पहले तो बच्चों को बाप चाहिए। तुम जानते हो हम आत्माओं का रूहानी बेहद का बाप है। सहज याद दिलाने लिए बाबा युक्ति बताते हैं। मामेकम् याद करो तो आधा-कल्प के जो तुम्हारे विकर्म हैं, वह सब योग अग्नि से भस्म हो जायें। जन्म-जन्मान्तर बहुत ही यज्ञ जप तप आदि किये हैं। भक्ति मार्ग वालों को पता नहीं है कि यह सब क्यों करते हैं। इनसे क्या प्राप्ति होगी। मन्दिरों में जाते हैं इतनी भक्ति करते हैं, समझते हैं यह सब परम्परा से चला आया है। शास्त्रों के लिए भी कहेंगे कि यह परम्परा से चले आये हैं। परन्तु मनुष्यों को पता ही नहीं है कि स्वर्ग में तो शास्त्र होते नहीं। वह समझते हैं सृष्टि के शुरू से ही यह सब चला आता है। न किसको यह कह सकते कि बेहद का बाप कौन है। यहाँ हद का बाप वा हद का टीचर तो नहीं है। हद के टीचर से तो तुम सब पढ़े हुए हो। जो पढ़कर ही नौकरी आदि करते हैं, कमाई करते हैं। तुम बच्चे जानते हो यह जो हमारा बेहद का बाप है, उनका कोई भी बाप है नहीं और यह बेहद का टीचर भी है। इनका कोई टीचर नहीं। इन देवताओं को किसने पढ़ाया, यह तो जरूर याद आना चाहिए ना! यह भी मनमनाभव है। यह पढ़ाई तो कहाँ से पढ़े नहीं हैं। बाप स्वयं ही नॉलेजफुल है। इनको किसने पढ़ाया है क्या? मनुष्य सृष्टि का वह बीजरूप है और चैतन्य है, ज्ञान का सागर है। चैतन्य होने कारण मनुष्य सृष्टि रूपी झाड़ का आदि से अन्त तक राज़ सुनाते हैं। अन्त में आकर आदि का ज्ञान सुनाते हैं और कहते हैं हे बच्चों जिस तन में मैं विराजमान हूँ, इन द्वारा मैं आदि से लेकर इस समय तक सब कुछ सुनाता हूँ। अन्त के लिए तो पीछे समझायेंगे। तुम आगे चलकर समझ जायेंगे कि अब अन्त है क्योंकि उस समय तुम कर्मातीत अवस्था को पहुँच जायेंगे और आसार भी देखेंगे कि इस पुरानी छी-छी दुनिया का विनाश तो होना ही है। यह कोई नई बात नहीं है। अनेक बार देखा है और देखते ही रहेंगे। कल्प पहले राज्य लिया था फिर गँवाया अब फिर ले रहे हैं। बाबा हमको पढ़ाते हैं। तुम समझते हो हम ही विश्व के मालिक थे, फिर 84 जन्म लिये, फिर बाबा विश्व का मालिक बनाने के लिए वही ज्ञान दे रहे हैं। तुम अन्दर में समझते हो बाबा टीचर भी है। अच्छा अगर बाप याद नहीं पड़ता तो टीचर को याद करो। टीचर कब भूलेगा क्या? टीचर से तो पढ़ते रहते हो। हाँ माया ग़फलत कराती है वह तुमको पता नहीं पड़ता है। माया आंखों में एकदम धूल डाल देती है। जो हमको भगवान पढ़ाते हैं, यह एकदम भूल जाते हैं। बाप हर बात की समझानी देते हैं। यह है बेहद की समझानी। वह है हद की। यह बेहद की नॉलेज बाबा कल्प-कल्प तुम बच्चों को देते हैं। अच्छा जास्ती पढ़ नहीं सकते हो तो भला बाबा के रूप से याद करो। उनका तो कोई बाप है नहीं, वह सबका बाप है। परन्तु उनके बच्चे सब हैं। कोई बता सकेगा कि शिवबाबा किसका बच्चा है? वह है बेहद का बाप। बच्चे समझते हैं हम बेहद के बाप के बने हैं। यह हमारी पढ़ाई भी वन्डरफुल है और हम ब्राह्मण ही पढ़ते हैं। देवता वा क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र यह पढ़ाई नहीं पढ़ सकते। बाप की यह नॉलेज ही बिल्कुल न्यारी है। तुम्हारे सिवाए कोई समझ न सके। तुम बच्चों को खुशी का पारा चढ़ता है कि हम तमोप्रधान से सतोप्रधान बनें। अब ऊंच पद पाने लिए खूब पुरुषार्थ करना है। ऐसे नहीं स्वर्ग में तो सब जायेंगे। अगर ज्ञान और योग की धारणा नहीं होगी तो ऊंच पद नहीं मिलेगा।
बाबा कहते हैं 16 कला सम्पूर्ण बनने में याद की बहुत मेहनत है। देखना है किसको दु:ख तो नहीं देते हैं? हम सुखदाता के बच्चे हैं। सबको सुख देना है। मन्सा, वाचा, कर्मणा किसको दु:ख नहीं देना है। इस समय तुम जो पढ़ते हो, गुलगुल बनते हो। यह कमाई ही तुम्हारे साथ चलने वाली है, इसमें कोई किताब आदि पढ़ने की जरूरत ही नहीं। उस पढ़ाई में कितने किताब आदि पढ़ने पड़ते हैं। यह बाबा की नॉलेज सबसे न्यारी है और बड़ी सहज भी है। परन्तु है सब गुप्त। तुम्हारे सिवाए कोई समझ न सके कि यह क्या पढ़ते हैं। वन्डरफुल पढ़ाई है। बाप कहते हैं कभी अबसेन्ट नहीं होना। पढ़ाई कभी नहीं छोड़ना। बाबा के पास सबका रजिस्टर आता है। उनसे ही बाबा समझ जाता है यह 10 मास अबसेन्ट रहा, यह 6 मास रहा। कोई तो चलते-चलते पढ़ाई भी छोड़ देते हैं। यह बहुत वन्डरफुल चीज़ है। ऐसी वन्डरफुल चीज़ और कोई होती ही नहीं। कल्प-कल्प तुम बच्चों को ऐसा बाप आकर मिलता है। तुम बच्चे जानते हो यह साकार बाबा तो पुनर्जन्म में आता है। यह 84 का चक्र खाते हैं ततत्वम्, यह खेल है ना। खेल कभी भूला नहीं जाता है। खेल सदैव याद रहता है।
बाबा समझाते हैं एक तो यह दुनिया दोज़क है और इसमें भी खास यह बाइसकोप (सिनेमा) दोज़क है। वहाँ जाने से वृत्तियां बहुत खराब हो जाती हैं। अखबार में भी कोई अच्छे-अच्छे चित्र देखते हैं तो उसमें भी बुद्धि जाती है - यह खूबसूरत है, इनको प्राइज़ मिलनी चाहिए, ख्यालात चलती हैं। ऐसा देखे ही क्यों! बुद्धि से समझते हैं यह सारी दुनिया ही खत्म हो जाने वाली है। तुम सिर्फ मुझे ही याद करो। ऐसी-ऐसी चीजें न देखो, न ख्याल करो। यह तो पुरानी दुनिया के छी-छी (गन्दे) शरीर हैं, इनके तरफ क्या देखना है। एक बाप को ही देखना है। बाबा कहते हैं मीठे-मीठे बच्चे मंजिल बहुत ऊंची है। माया कोई कम नहीं है। माया का देखो कितना भभका है। उस तरफ है साइन्स और यहाँ है तुम्हारी साइलेन्स। वो लोग चाहते हैं मुक्ति को पायें। यहाँ तुम्हारी एम आबजेक्ट है जीवनमुक्ति को पाने की। जीवन-मुक्ति पाने का कोई रास्ता बता न सके। संन्यासी आदि कोई भी यह नॉलेज दे न सके। वो किसको समझा नहीं सकते कि गृहस्थ व्यवहार में रहकर पवित्र बनना है। यह एक ही बाप समझाते हैं। भक्ति मार्ग में टाइम वेस्ट ही होता आया है। कितनी भूलें होती हैं। भूल करते-करते भोले ही बन गये हैं। यह लास्ट जन्म 100 परसेन्ट भूलों का ही है। जरा भी बुद्धि काम नहीं करती। अब बाबा तुमको समझाते हैं, तब तुम समझते हो। अभी तुम सब समझ गये हो तो औरों को भी समझाते हो। खुशी का पारा भी तुम्हें चढ़ता है। वन्डर है ना - इस बाप को कोई बाप नहीं, कोई शिक्षक नहीं। तब सीखा कहाँ से! मनुष्य वन्डर खायेंगे। बहुत समझते हैं इनका जरूर कोई गुरू होगा। अगर यह भी गुरू से सीखा हुआ हो फिर गुरू के और भी शिष्य होने चाहिए। सिर्फ यह एक शिष्य थोड़ेही होगा। गुरू के तो बहुत शिष्य होते हैं। आगाखां के देखो कितने शिष्य हैं। उन्हों को गुरू के लिए देखो कितना रिगार्ड रहता है। उनको हीरों में वज़न करते हैं। तुम किसमें वज़न करेंगे? यह तो सबसे सुप्रीम है। इनका वज़न कितना होगा? तुम क्या करेंगे! वज़न करें तो कितना होगा? कोई चीज़ पड़ सकती है? शिवबाबा तो बिन्दी है ना। आजकल वज़न बहुत करते हैं। कोई सोने में, कोई चांदी में, प्लैटिनम में भी करते हैं। वह सोने से भी महंगा होता है। अब बाप समझाते हैं वह जिस्मानी गुरू तो तुम्हें सद्गति देते नहीं। सद्गति में ले जाने वाला तो एक ही बाप है, उनको किसमें वज़न करेंगे? मनुष्य तो सिर्फ भगवान-भगवान ही कहते रहते हैं। लेकिन यह नहीं जानते कि वह बाप है, टीचर भी है। बैठे कितना साधारण हैं। बच्चों का मुखड़ा देखने के लिए थोड़ा सा ऊपर बैठते हैं। मददगार बच्चों के बिगर हम स्थापना कैसे कर सकते हैं। जो जास्ती मदद करते हैं उनको जरूर बाबा लव करेंगे। लौकिक में भी एक बच्चा 2000 कमाता, दूसरा 1000 कमाता होगा। तो बाप का लव किस पर रहेगा? परन्तु आजकल तो बच्चे पूछते ही बाप को कहाँ हैं? बेहद का बाप भी देखते हैं फलाने-फलाने बच्चे बहुत अच्छे मददगार हैं। बच्चों को देख-देख बाबा हर्षित होते हैं। आत्मा खुश होती है। कल्प-कल्प मैं आता हूँ और बच्चों को देख बहुत खुश होता हूँ। जानता हूँ कल्प-कल्प यह हमारे मददगार बनते हैं। यह बाबा का प्यार कल्प-कल्प का बन जाता है। कहाँ भी बैठे हो बुद्धि में यह सोचो बाबा हमारा बाप भी है, टीचर भी है, गुरू भी है। स्वयं ही सब कुछ है। तब तो सब उनको ही याद करते हैं। सतयुग में कोई याद नहीं करेंगे क्योंकि 21 जन्मों के लिए बाप बेड़ा पार कर देते हैं। ऐसे-ऐसे सिमरण कर बच्चों को हर्षित होना चाहिए। खुशी होनी चाहिए कि हम ऐसे बाप की सर्विस करें। बाप का सबको परिचय दें। यह बेहद का बाप है। बाप ही स्वर्ग की स्थापना करते हैं। बाप ही हम सबको साथ भी ले जाते हैं। ऐसी-ऐसी समझानी से सर्वव्यापी कह नहीं सकेंगे। बाप ने कहा है विनाश काले विपरीत बुद्धि विनशन्ति। वह सब खत्म हो जायेंगे, बाकी तुम विजय पायेंगे। तुम राजधानी स्थापन कर रहे हो। आत्माओं का बाप आत्माओं को बैठ समझाते हैं। तो ऐसी-ऐसी वन्डरफुल बातें सबको सुनानी चाहिए। अच्छा!
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का यादप्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।
धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) सुखदाता के हम बच्चे हैं, हमें सबको सुख देना है। मन्सा-वाचा-कर्मणा किसी को भी दु:ख नहीं देना है।
2) पढ़ाई और पढ़ाने वाला दोनों ही वन्डरफुल हैं। ऐसी वन्डरफुल पढ़ाई को कभी भी मिस नहीं करना है। अबसेन्ट नहीं होना है।
वरदान:- सदा हर दिन स्व उत्साह में रहने और सर्व को उत्साह दिलाने वाले रूहानी सेवाधारी भव
बापदादा सभी रूहानी सेवाधारी बच्चों को स्नेह की यह सौगात देते हैं कि “बच्चे हर रोज़ स्व उत्साह में रहो और सर्व को उत्साह दिलाने का उत्सव मनाओ।'' इससे संस्कार मिलाने की, संस्कार मिटाने की जो मेहनत करनी पड़ती है वह छूट जायेगी। यह उत्सव सदा मनाओ तो सारी समस्यायें खत्म हो जायेंगी। फिर समय भी नहीं देना पड़ेगा, शक्तियां भी नहीं लगानी पड़ेगी। खुशी में नाचने, उड़ने वाले फरिश्ते बन जायेंगे।
स्लोगन:- ड्रामा के राज़ को समझ नथिंगन्यु का पाठ पक्का करने वाले ही बेफिक्र बादशाह हैं।
27.01.2023 HINDI MURLI
“मीठे बच्चे - पारसबुद्धि बनने के लिए बाप जो समझाते हैं उसे अच्छी तरह से समझना है, स्वयं में धारणा कर दूसरों को कराना है''
प्रश्नः- कौन सा एक राज़ बहुत ही गुह्य, गोपनीय और समझने का है?
उत्तर:- निराकार बाप सभी का मात-पिता कैसे बनते हैं, वह सृष्टि की रचना किस विधि से करते हैं, यह बहुत ही गुह्य और गोपनीय राज़ है। निराकार बाप माता बिगर सृष्टि तो रच नहीं सकते। कैसे वह शरीर धारण कर, उसमें प्रवेश कर उनके मुख से बच्चे एडाप्ट करते हैं, यह ब्रह्मा पिता भी है तो माता भी है - यह बात बहुत ही समझकर सिमरण करने वा स्मृति में रखने की है।
गीत:- तुम्हीं हो माता....
ओम् शान्ति। जिसको मात-पिता कहते हो तो जरूर फरमान पिता ही करेंगे। यह तो माता पिता कम्बाइण्ड है। यह बात मनुष्यों के लिए समझना बड़ा डिफीकल्ट है और यही मुख्य बात है समझने की। निराकार परमपिता परमात्मा जिसको पिता कहा जाता है उनको माता भी कहते, यह वण्डरफुल बात है। परमपिता परमात्मा मनुष्य सृष्टि रचेगा, तो माता जरूर चाहिए। यह बात बड़ी गुह्य है और कोई की बुद्धि में कभी आ न सके। अब वह है सभी का बाप, माता भी जरूर चाहिए। वह पिता तो है निराकार, फिर माँ किसको रखें? शादी तो नहीं की होगी। यह हैं अति गुह्य गोपनीय समझने की बातें। नये-नये तो समझ न सकें। पुराने भी मुश्किल समझकर और उस स्मृति में रहते हैं। बच्चे ही मॉ बाप की स्मृति में रहेंगे ना। भारत में लक्ष्मी-नारायण को भी कह देते हैं तुम मात-पिता...तो राधे-कृष्ण के आगे भी जाकर कहते - तुम मात-पिता... अब वह तो हैं प्रिन्स प्रिन्सेज। उन्हों को मात-पिता कोई बेसमझ भी न कहे। मनुष्यों की तो कहने की टेव (आदत) पड़ गई है। परन्तु यह बात ही न्यारी है। लक्ष्मी-नारायण को तो उनके बच्चे ही कहेंगे तुम मात-पिता.... मनुष्य समझते हैं जिसके पास बहुत धन है, महल-माड़ियॉ हैं वह स्वर्ग में हैं। उन्हों के बच्चे कहेंगे हमारे माँ बाप के पास बहुत सुख है। जरूर आगे जन्म में कुछ अच्छे कर्म किये हैं। अच्छा यह जो गाया जाता है तुम मात पिता... परमपिता परमात्मा रचयिता तो एक है, जिसके हम बच्चे हैं वह भी निराकार है। हम आत्मायें भी निराकार हैं। परन्तु निराकार फिर सृष्टि कैसे रचते हैं। माता बिगर तो सृष्टि रची नहीं जा सकती। वण्डर है सृष्टि रचने का। एक तो परमात्मा रचयिता है नई दुनिया का। पुरानी दुनिया में आकर नई दुनिया रचते हैं। परन्तु कैसे रचते हैं। यह बड़ी गुह्य बात है - जो निराकार को हम मात-पिता कहते हैं। बाप खुद समझाते हैं मैं बच्चों को एडाप्ट करता हूँ। पेट से बच्चे निकलने की बात ही नहीं। इतने ढेर बच्चे पेट से कैसे निकलेंगे। तो कहते हैं मैं इस शरीर को धारण कर इनके मुख द्वारा बच्चे एडाप्ट करता हूँ। यह ब्रह्मा पिता भी है, मनुष्य सृष्टि रचने वाला और माता भी है। जिसके मुख से बच्चे एडाप्ट करता हूँ। इस रीति बच्चों को एडाप्ट करना - यह सिर्फ बाप का काम है। संन्यासी तो कर न सकें। उन्हों के हैं जिज्ञासु, फालोअर्स, शिष्य। यहाँ तो हुई रचना की बात। तो बाबा इनमें प्रवेश करते, यह है मुख वंशावली जो कहते हैं तुम मात-पिता... तो माता यह सिद्ध हुई। वह बाप इसमें प्रवेश हो रचते हैं। यह बूढ़ा प्रजापिता भी ठहरा फिर माता भी बूढ़ी ठहरी। बूढ़ी ही चाहिए ना। अब बच्चों को मात-पिता को याद करना पड़े। इनकी तो प्रापर्टी है नहीं। तुम बनते हो वारिस, इसलिए इनको बापदादा कहते हैं। तुमको प्रजापिता ब्रह्मा से प्रापर्टी नहीं लेनी है। यह दादा (ब्रह्मा) भी उनसे लेते हैं। इनको दादा भी तो माता भी कहा जाता है। नहीं तो मात-पिता कैसे सिद्ध हो। मात-पिता बिगर बच्चे कैसे हों - यह बड़ी गुह्य समझने और सिमरण करने की बात है। बाबा आप पिता हो, इस माता द्वारा हमने जन्म लिया है। बरोबर वर्सा भी याद आता है। याद उस बाप को करना है। ज्ञान से तुम समझ भी सकते हो कि कैसे बाप पतित दुनिया में आते हैं। कहते हैं जिसमें प्रवेश करता हूँ, यह हमारा बच्चा भी है, तुम्हारा बाप भी है और फिर माता भी है। तुम हो गये बच्चे। तो बाप को याद करने से वर्सा मिलता है। माता को याद करने से वर्सा नहीं मिलेगा। निरन्तर उस बाप को याद करना है। बाकी इस शरीर को भूलना है। यह ज्ञान की बातें समझने की हैं।
बाप पुरानी दुनिया में आकर नई दुनिया रचते हैं। पुरानी को खलास कर देते हैं। नहीं तो कौन खलास करे। गाया भी हुआ है शंकर द्वारा पुरानी दुनिया का विनाश - यह ड्रामा में नूँध है इसलिए गायन में भी आता है। तुम बच्चे जानते हो हमारे लिए नई राजधानी बन रही है। विनाश की फुल तैयारियाँ हैं। तुम इतने ढेर हो, सब राजाई पद पा रहे हो। ऐसे नहीं अन्धश्रद्धा से मान लिया है। कोई ने कहा राम की सीता चुराई गई। सत। कोई भी बात न समझो तो समझने की कोशिश करो। नहीं तो बेसमझ के बेसमझ ही रह जायेंगे। भक्तिमार्ग में तो अल्पकाल का सुख मिलता है। उसका फल उस ही जन्म में वा दूसरे जन्म में अल्पकाल के लिए मिल जाता है। तीर्थ यात्रा पर जाते हैं, कुछ समय तो पवित्र रहते हैं, पाप नहीं करते। दान पुण्य भी करते हैं, इसको काग विष्टा के समान सुख कहा जाता है। यह तुम बच्चे ही समझ सकते हो क्योंकि तुम बन्दर से बदल मन्दिर लायक बने हो। सतयुग में तुम पारसबुद्धि थे क्योंकि पारसनाथ, पारसनाथिनी का राज्य था। सोने के महल थे। अब तो पत्थर ही पत्थर हैं। पारसबुद्धि से पत्थरबुद्धि कौन बनाते हैं? 5 विकार रूपी रावण। जब सब पत्थरबुद्धि बन पड़ते हैं तब ही फिर पारसबुद्धि बनाने वाला बाप आते हैं। कितना सहज समझकर समझाते हैं। बीज और झाड़। बाकी डिटेल तो समझाते रहते हैं, समझाते रहेंगे। नटशेल में कहते हैं बाप को याद करो, जिससे वर्सा मिलता है। माता को याद करने की जरूरत नहीं। बाप कहते हैं बच्चे मुझे याद करो तो जरूर बच्चों ने माता से जन्म लिया होगा? जन्म लिया, बाप से वर्सा लेने के लिए। तो इस माता को भी छोड़ो, सब देहधारियों को छोड़ो क्योंकि अब वर्सा बाप से लेना है। अब बच्चे समझ गये हैं कि हम आत्मा रूहानी बाप के बच्चे हैं और फिर जिस्मानी मात-पिता के भी बच्चे बने हैं। वह बेहद का बाप नई सृष्टि रचते हैं। भारत स्वर्ग था ना। यह लक्ष्मी-नारायण स्वर्ग के मालिक थे, अब नहीं हैं। बेहद का बाप समझाते हैं - तुम हर जन्म में हद का वर्सा लेते आये हो। नर्क में तो है ही हद का वर्सा। स्वर्ग में हद का वर्सा नहीं कहेंगे। वह है बेहद का वर्सा क्योंकि बेहद के अर्थात् सारे सृष्टि के मालिक हैं और कोई धर्म नहीं है। हद का वर्सा शुरू होता है द्वापर से। सतयुग में है बेहद का। तुम प्रालब्ध भोगते हो। वहाँ तुमको बेहद की बादशाही है। यथा राजा रानी तथा प्रजा। प्रजा भी कहेगी हम सारे सृष्टि के मालिक हैं। अभी तो प्रजा ऐसे नहीं कहेगी कि हम सारे सृष्टि के मालिक हैं। अभी तो हदें लगी पड़ी हैं। वह कहते हैं हमारे पानी के अन्दर नहीं आ सकते, यह टुकड़ा हमारा है। वहाँ प्रजा भी कहेगी हम विश्व के मालिक हैं। हमारे महाराजा महारानी लक्ष्मी-नारायण भी विश्व के मालिक। यह अभी हम समझते हैं कि वहाँ एक ही राज्य रहता है। वह है बेहद की बादशाही। भारत क्या था, किसकी बुद्धि में भी नहीं है। तुम बच्चों को अब शिक्षा मिलती है कि बेहद के बाप से वर्सा लो। हम कहते हैं तो जरूर हम ले रहे हैं। बेहद का बाप है ही स्वर्ग का रचयिता। गाया भी जाता है 21 पीढ़ी राज्य-भाग्य। पीढ़ी क्यों कहते हैं? क्योंकि वहाँ बूढ़े होकर मरेंगे। वहाँ अकाले मृत्यु नहीं होगा। मातायें कभी विधवा नहीं बनेंगी। रोना पीटना नहीं होगा। यहाँ तो कितना रोते पीटते हैं। वहाँ बच्चों को भी रोने की दरकार नहीं। यहाँ तो बच्चों को रुलाते रहते हैं कि मुख बड़ा हो। वहाँ ऐसी बात नहीं। यह तो सब बच्चे समझते हैं कि हम अभी बेहद के बाप से कल्प पहले मिसल वर्सा ले रहे हैं। 84 जन्म पूरे हुए, अब जाना है। निरन्तर बाप और वर्से को याद करने से विकर्म विनाश होंगे। मन्मनाभव का अर्थ कितना सहज है। गीता भल झूठी है, परन्तु उसमें कुछ न कुछ तो सच है ना। मुझ अपने बाप को याद करो, श्रीकृष्ण तो ऐसे नहीं कहेंगे कि मुझे याद करो, तुमको मेरे पास आना है। परमात्मा अभी सर्व आत्माओं को कहते हैं कि तुम सभी आत्माओं को मच्छरों सदृश्य आना है। तो जरूर आत्मा, परमात्मा बाप को ही फालो करेगी। श्रीकृष्ण ऐसे नहीं कहेंगे कि मुझ आत्मा को याद करो। उनका नाम ही कृष्ण है। आत्मा कोई भी नहीं कह सकती, आत्मायें सभी भाई-भाई हैं। यह तो बाप कहते हैं मैं निराकार हूँ, मुझ परम आत्मा का नाम है शिव। तो श्रीकृष्ण कैसे कहेंगे, उनको तो शरीर है। शिवबाबा को तो अपना शरीर है नहीं। शिवबाबा कहते हैं बच्चे तुम्हें भी पहले अपना शरीर नहीं था। तुम आत्मा निराकार थी, फिर शरीर लिया है। अब तुमको ड्रामा के आदि मध्य अन्त की स्मृति आई है। बाप सृष्टि कैसे, कब और क्यों रचते हैं? सृष्टि तो है ना। गायन भी है ब्रह्मा द्वारा नई सृष्टि की रचना की। तो जरूर पुरानी सृष्टि से ही नई सृष्टि की रचना करते होंगे। कहते भी हैं मनुष्य से देवता बनाया। बाप कहते हैं मैं तुमको इस पढ़ाई से मनुष्य से देवता बनाता हूँ। पूज्य देवता थे, फिर पुजारी बन गये हो। मनुष्य तो समझते नहीं कि 84 जन्म कैसे लेते हैं। क्या सभी 84 जन्म लेंगे? सृष्टि वृद्धि को प्राप्त करती रहती है। तो सभी कैसे 84 जन्म लेंगे! जरूर जो पीछे आयेंगे उनके जन्म कम होंगे। 25-50 वर्ष के अन्दर 84 जन्म कैसे लेंगे? यह है स्वदर्शन चक्र। उन्होंने फिर स्वदर्शन चक्र को एक हथियार का रूप बना दिया है। अब तुम आत्माओं को यह स्मृति आई है कि हमने 84 जन्म ऐसे-ऐसे भोगे। अभी चक्र पूरा होता है, फिर से ड्रामा को रिपीट करना है। पहले-पहले आदि सनातन देवी-देवता धर्म जरूर चाहिए, जो प्राय:लोप हो गया है।
मनुष्य कहते हैं हे गॉड फादर रहम करो। तो बाप कहते हैं - अच्छा तुमको दु:ख से लिब्रेट कर सुखी बनाता हूँ। बाप का काम ही है सबको सुखी बनाना, इसलिए मैं कल्प-कल्प आता हूँ, आकर भारत को हीरे जैसा बनाता हूँ। बहुत सुखी बनाता हूँ। बाकी सबको मुक्तिधाम भेज देता हूँ। भक्त चाहते भी हैं भगवान से मिलने क्योंकि सुख के लिए तो संन्यासियों ने कह दिया है कि यह काग विष्टा समान सुख है और दूसरा फिर कहते इस ड्रामा के खेल में फिर आयें ही नहीं। मोक्ष को पा लें। अब मोक्ष तो मिलना नहीं है। यह है बना बनाया ड्रामा। सारे सृष्टि की हिस्ट्री-जॉग्राफी को तुम बच्चे अभी जानते हो कि यह कैसे चक्र लगाती है। जिसको ही स्वदर्शन चक्र कहा जाता है। यह जो दिखाते हैं स्वदर्शन चक्र से सभी के सिर काटे। कंस बध का नाटक दिखाते हैं। ऐसे कुछ भी है नहीं। यहाँ हिंसा की बिल्कुल बात ही नहीं। यह तो पढ़ाई है। पढ़ना है, बाप से वर्सा लेना है। बाप से वर्सा लेने के लिए किसको कतल करते हैं क्या? वह होता है हद का वर्सा, यह है बेहद के बाप से बेहद का वर्सा लेना। गीता में लड़ाई आदि की कितनी बातें लिख दी हैं। वह तो कुछ भी हैं नहीं। पाण्डवों की लड़ाई वास्तव में कोई के साथ है नहीं। यह तो योगबल से बेहद के बाप से तुम बच्चे वर्सा ले रहे हो, नई दुनिया के लिए। इसमें लड़ाई की कोई बात नहीं। अच्छा!
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का यादप्यार और गुडमार्निग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।
धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) बाप से 21 पीढ़ी का वर्सा लेने के लिए निरन्तर बाप और वर्से को याद करने का पुरुषार्थ करना है। किसी भी देहधारी को याद नहीं करना है।
2) बुद्धि में स्वदर्शन चक्र फिराते रहना है। हम पूज्य थे, फिर पुजारी बनें, 84 जन्मों का चक्र पूरा किया, फिर से ड्रामा रिपीट होना है, हमें पुजारी से पूज्य बनना है - यह स्मृति ही स्वदर्शन चक्र है।
वरदान:- समानता द्वारा समीपता की सीट ले फर्स्ट डिवीजन में आने वाले विजयी रत्न भव
समय की समीपता के साथ-साथ अब स्वयं को बाप के समान बनाओ। संकल्प, बोल, कर्म, संस्कार और सेवा सबमें बाप जैसे समान बनना अर्थात् समीप आना। हर संकल्प में बाप के साथ का, सहयोग का, स्नेह का अनुभव करो। सदा बाप के साथ और हाथ में हाथ की अनुभूति करो तो फर्स्ट डिवीजन में आ जायेंगे। निरन्तर याद और सम्पूर्ण स्नेह एक बाप से हो तो विजय माला के विजयी रत्न बन जायेंगे। अभी भी चांस है, टूलेट का बोर्ड नहीं लगा है।
स्लोगन:- सुखदाता बन अनेक आत्माओं को दु:ख अशान्ति से मुक्त करने की सेवा करना ही सुखदेव बनना है।
26 “मीठे बच्चे - अमृतवेले के शान्त, शुद्ध वायुमण्डल में तुम देह सहित सब कुछ भूल मुझे याद करो, उस समय याद बहुत अच्छी रहेगी''
प्रश्नः-बाप की ताकत प्राप्त करने के लिए तुम बच्चे सबसे अच्छा कर्म कौन सा करते हो?
उत्तर:- सबसे अच्छा कर्म है बाप पर अपना सब कुछ (तन-मन-धन सहित) अर्पण करना। जब तुम सब कुछ अर्पित करते हो तो बाप तुम्हें रिटर्न में इतनी ताकत देता, जिससे तुम सारे विश्व पर सुख-शान्ति का अटल अखण्ड राज्य कर सको।
प्रश्नः-बाप ने कौन सी सेवा बच्चों को सिखलाई है जो कोई मनुष्य नहीं सिखला सकता?
उत्तर:-रूहानी सेवा। तुम आत्माओं को विकारों की बीमारी से छुड़ाने के लिए ज्ञान का इंजेक्शन लगाते हो। तुम हो रूहानी सोशल वर्कर। मनुष्य जिस्मानी सेवा करते लेकिन ज्ञान इंजेक्शन देकर आत्मा को जागती-ज्योत नहीं बना सकते। यह सेवा बाप ही बच्चों को सिखलाते हैं।
ओम् शान्ति। भगवानुवाच - यह तो समझाया गया है कि मनुष्य को भगवान कभी भी नहीं कहा जा सकता। यह है मनुष्य सृष्टि और ब्रह्मा विष्णु शंकर हैं सूक्ष्मवतन में। शिवबाबा है आत्माओं का अविनाशी बाप। विनाशी शरीर का बाप तो विनाशी है। यह तो सब जानते हैं। पूछा जाता है कि तुम्हारे इस विनाशी शरीर का बाप कौन है? आत्मा का बाप कौन है? आत्मा जानती है - वह परमधाम में रहते हैं। अभी तुम बच्चों को देह-अभिमानी किसने बनाया? देह को रचने वाले ने। अब देही-अभिमानी कौन बनाता है? जो आत्माओं का अविनाशी बाप है। अविनाशी माना जिसका आदि-मध्य-अन्त नहीं है। अगर आत्मा का और परम आत्मा का आदि मध्य अन्त कहें तो फिर रचना का भी सवाल उठ जाए। उनको कहा जाता है अविनाशी आत्मा, अविनाशी परमात्मा। आत्मा का नाम आत्मा है। बरोबर आत्मा अपने को जानती है कि हम आत्मा हैं। मेरी आत्मा को दु:खी मत करो। मैं पापात्मा हूँ - यह आत्मा कहती है। स्वर्ग में कभी भी यह अक्षर आत्मायें नहीं कहेंगी। इस समय ही आत्मा पतित है, जो फिर पावन बनती है। पतित आत्मा ही पावन आत्मा की महिमा करती है। जो भी मनुष्यात्माएं हैं उनको पुनर्जन्म तो जरूर लेना ही है। यह सब बातें हैं नई। बाप फरमान करते हैं - उठते बैठते मुझे याद करो। आगे तुम पुजारी थे। शिवाए नम: कहते थे। अब बाप कहते हैं तुम पुजारियों ने नम: तो बहुत बारी किया। अब तुमको मालिक, पूज्य बनाता हूँ। पूज्य को कभी नम: नहीं करना पड़ता। पुजारी नम: अथवा नमस्ते कहते हैं। नमस्ते का अर्थ ही है नम: करना। कांध थोड़ा नीचे जरूर करेंगे। अब तुम बच्चों को नम: कहने की दरकार नहीं। न लक्ष्मी-नारायण नम:, न विष्णु देवताए नम:, न शंकर देवताए नम:। यह अक्षर ही पुजारीपन का है। अब तो तुमको सारी सृष्टि का मालिक बनना है। बाप को ही याद करना है। कहते भी हैं वह सर्व समर्थ है। कालों का काल, अकालमूर्त है। सृष्टि का रचयिता है। ज्योर्तिबिन्दु स्वरूप है। आगे उनकी बहुत महिमा करते थे, फिर कह देते थे सर्वव्यापी, कुत्ते बिल्ली में भी है तो सभी महिमा खत्म हो जाती। इस समय के सब मनुष्य ही पाप आत्मायें हैं तो फिर जानवरों की क्या महिमा होगी। मनुष्य की ही सारी बात है। आत्मा कहती है मैं आत्मा हूँ, यह मेरा शरीर है। जैसे आत्मा बिन्दु है वैसे परमपिता परमात्मा भी बिन्दु है। वह भी कहते मैं पतितों को पावन बनाने साधारण तन में आता हूँ। आकर बच्चों का ओबीडियेन्ट सर्वेन्ट बन सर्विस करता हूँ। मैं रूहानी सोशल वर्कर हूँ। तुम बच्चों को भी रूहानी सेवा करना सिखलाता हूँ। और सब जिस्मानी हद की सेवा करना सिखलाते हैं। तुम्हारी है रूहानी सेवा, तब कहा जाता है ज्ञान अंजन सतगुरू दिया... सच्चा सतगुरू वह एक ही है। वही अथॉरिटी है। सभी आत्माओं को आकर इन्जेक्शन लगाते हैं। आत्माओं में ही विकारों की बीमारी है। यह ज्ञान का इन्जेक्शन और कोई के पास होता नहीं। पतित आत्मा बनी है न कि शरीर, जिसको इन्जेक्शन लगायें। पाँच विकारों की कड़ी बीमारी है। इसके लिए इन्जेक्शन ज्ञान सागर बाप के सिवाए कोई के पास भी है नहीं। बाप आकर आत्माओं से बात करते हैं कि हे आत्मायें तुम जागती ज्योति थी, फिर माया ने परछाया डाला। डालते-डालते तुमको धुन्धकारी बुद्धि बना दिया है। बाकी कोई युद्धिष्ठिर व धृतराष्ट्र की बात नहीं है। यह रावण की बात है।
बाप कहते हैं - मैं आता ही हूँ साधारण रीति। मेरे को विरला ही कोई जान सकते हैं। शिव जयन्ती अलग है, कृष्ण जयन्ती अलग है। परमपिता परमात्मा शिव को श्रीकृष्ण से मिला नहीं सकते। वह निराकार, वह साकार। बाप कहते हैं मैं हूँ निराकार, मेरी महिमा भी गाते हैं - हे पतित-पावन आकर इस भारत को फिर से सतयुगी दैवी राजस्थान बनाओ। कोई समय दैवी राजस्थान था। अभी नहीं है। फिर कौन स्थापन करेगा? परमपिता परमात्मा ही ब्रह्मा द्वारा नई दुनिया स्थापन करते हैं। अभी है पतित प्रजा का प्रजा पर राज्य, इनका नाम ही है कब्रिस्तान। माया ने खत्म कर दिया है। अब तुमको देह सहित देह के सब सम्बन्धियों को भूल मुझ बाप को याद करना है। शरीर निर्वाह अर्थ कर्म भी भल करो। जो कुछ समय मिले तो मुझे याद करने का पुरुषार्थ करो। यह एक ही तुमको युक्ति बताते हैं। सबसे जास्ती मेरी याद तुमको अमृतवेले रहेगी क्योंकि वह शान्त, शुद्ध समय होता है। उस समय न चोर चोरी करते, न कोई पाप करते, न कोई विकार में जाते। सोने के टाइम सब शुरू करते हैं। उसको कहा जाता है घोर तमोप्रधान रात। अब बाप कहते हैं - बच्चे पास्ट इज़ पास्ट। भक्तिमार्ग का खेल पूरा हुआ, अब तुमको समझाया जाता है यह तुम्हारा अन्तिम जन्म है। यह प्रश्न उठ नहीं सकता कि सृष्टि की वृद्धि कैसे होगी। वृद्धि तो होती ही रहती है। जो आत्मायें ऊपर हैं, उनको नीचे आना ही है। जब सभी आ जायेंगे तब विनाश शुरू होगा। फिर नम्बरवार सबको जाना ही है। गाइड सबसे आगे होता है ना।
बाप को कहा जाता है लिबरेटर, पतित-पावन। पावन दुनिया है ही स्वर्ग। उनको बाप के सिवाए कोई बना न सके। अब तुम बाप की श्रीमत पर भारत की तन मन धन से सेवा करते हो। गाँधी जी चाहते थे, परन्तु कर न सके। ड्रामा की भावी ऐसी थी। जो पास्ट हुआ। पतित राजाओं का राज्य खत्म होना था तो उनका नाम-निशान खत्म हो गया। उन्हों की प्रापर्टी का भी नाम निशान नहीं है। खुद भी समझते थे लक्ष्मी-नारायण ही स्वर्ग के मालिक थे। परन्तु यह कोई नहीं जानते कि उन्हों को ऐसा किसने बनाया? जरूर स्वर्ग के रचयिता बाप से वर्सा मिला होगा और कोई इतना भारी वर्सा दे न सके। यह बातें कोई शास्त्रों में नहीं हैं। गीता में हैं परन्तु नाम बदल दिया है। कौरव और पाण्डव दोनों को राजाई दिखाते हैं। परन्तु यहाँ दोनों को राजाई नहीं है। अब बाप फिर स्थापना करते हैं। तुम बच्चों को खुशी का पारा चढ़ना चाहिए। अब नाटक पूरा होता है। हम अब जा रहे हैं। हम स्वीट होम में रहने वाले हैं। वो लोग कहते हैं फलाना पार निर्वाण गया वा ज्योति ज्योति में समाया अथवा मोक्ष को पाया। भारतवासियों को स्वर्ग मीठा लगता है, वह कहते हैं स्वर्ग पधारा। बाप समझाते हैं मोक्ष तो कोई पाता नहीं। सभी का सद्गति दाता बाप ही है, वह जरूर सबको सुख ही देगा। एक निर्वाणधाम में बैठे और एक दु:ख भोगे, यह बाप सहन कर नहीं सकते। बाप है पतित-पावन। एक है मुक्ति-धाम पावन, दूसरा है जीवन मुक्तिधाम पावन। फिर द्वापर के बाद सभी पतित बन जाते हैं। पाँच तत्व आदि सब तमोप्रधान बन जाते हैं फिर बाप आकर पावन बनाते हैं फिर वहाँ पवित्र तत्वों से तुम्हारा शरीर गोरा बनता है। नेचुरल ब्युटी रहती है। उनमें कशिश रहती है। श्रीकृष्ण में कितनी कशिश है। नाम ही है स्वर्ग तो फिर क्या? परमात्मा की महिमा बहुत करते हैं, अकालमूर्त.... फिर उनको ठिक्कर भित्तर में ठोक दिया है। बाप को कोई भी जानते नहीं, जब बाप आये तब आकर समझाये। लौकिक बाप भी जब बच्चे रचे तब तो बाप की बॉयोग्राफी का उनको पता पड़े। बाप के बिगर बच्चों को बाप की बॉयोग्राफी का पता कैसे पड़े। अब बाप कहते हैं लक्ष्मी-नारायण को वरना है तो मेहनत करनी पड़े। जबरदस्त मंजिल है, बहुत भारी आमदनी है। सतयुग में पवित्र प्रवृति मार्ग था। पवित्र राजस्थान था सो अब अपवित्र हो गया है। सब विकारी बन गये हैं। यह है ही आसुरी दुनिया। बहुत करप्शन लगी हुई है। राजाई में तो ताकत चाहिए। ईश्वरीय ताकत तो है नहीं। प्रजा का प्रजा पर राज्य है, जो दान पुण्य अच्छे कर्म करते हैं उनको राजाई घर में जन्म मिलता है। वह कर्म की ताकत रहती है। अभी तुम तो बहुत ऊंचे कर्म करते हो। तुम अपना सब कुछ (तन-मन-धन) शिवबाबा को अर्पण करते हो, तो शिवबाबा को भी बच्चों के सामने सब कुछ अर्पण करना पड़े। तुम उनसे ताकत धारण कर सुख शान्ति का अखण्ड अटल राज्य करते हो। प्रजा में तो कुछ भी ताकत नहीं है। ऐसे नहीं कहेंगे कि धन दान किया तब एम.एल.ए. आदि बने। धन दान करने से धनवान घर में जन्म मिलता है। अभी तो राजाई कोई है नहीं। अब बाबा तुमको कितनी ताकत देते हैं। तुम कहते हो हम नारायण को वरेंगे। हम मनुष्य से देवता बन रहे हैं। यह हैं सब नई-नई बातें। नारद की बात अभी की है। रामायण आदि भी अभी के हैं। सतयुग त्रेता में कोई शास्त्र होता नहीं। सभी शास्त्रों का अभी से तैलुक है। झाड़ को देखेंगे मठ पंथ सब बाद में आते हैं। मुख्य है ब्राह्मण वर्ण, देवता वर्ण, क्षत्रिय वर्ण... ब्राह्मणों की चोटी मशहूर है। यह ब्राह्मण वर्ण सबसे ऊंचा है जिसका फिर शास्त्रों में वर्णन नहीं है। विराट रूप में भी ब्राह्मणों को उड़ा दिया है। ड्रामा में ऐसी नूँध है। दुनिया के लोग यह नहीं समझते कि भक्ति से नीचे उतरते हैं। कह देते हैं भक्ति से भगवान मिलता है। बहुत पुकारते हैं, दु:ख में सिमरण करते हैं। सो तो तुम अनुभवी हो। वहाँ दु:ख की बात नहीं, यहाँ सबमें क्रोध है, एक दो को गाली देते रहते हैं।
अभी तुम शिवाए नम: नहीं कहेंगे। शिव तो तुम्हारा बाप है ना। बाप को सर्वव्यापी कहने से ब्रदरहुड उड़ जाता है। भारत में कहते तो बहुत अच्छा हैं - हिन्दू चीनी भाई-भाई, चीनी मुस्लिम भाई-भाई। भाई-भाई तो हैं ना। एक बाप के बच्चे हैं। इस समय तुम जानते हो हम एक बाप के बच्चे हैं। यह ब्राह्मणों का सिजरा फिर से स्थापन हो रहा है। इस ब्राह्मण धर्म से देवी-देवता धर्म निकलता है। देवी-देवता धर्म से क्षत्रिय धर्म। क्षत्रिय से फिर इस्लामी धर्म निकलेगा... सिजरा है ना। फिर बौद्धी, क्रिश्चियन निकलेंगे। ऐसे वृद्धि होते-होते इतना बड़ा झाड हो गया है। यह है बेहद का सिजरा, वह होता है हद का। यह डीटेल की बातें जिसको धारण नहीं हो सकती, उनके लिए बाप सहज युक्ति बताते हैं कि बाप और वर्से को याद करो, तो स्वर्ग में जरूर आयेंगे। बाकी ऊंच पद प्राप्त करना है तो उसके लिए पुरुषार्थ करना है। यह तो तुम बच्चे जानते हो शिवबाबा भी तुमको समझाते हैं, यह बाबा भी समझाते हैं। वही हमारी तुम्हारी बुद्धि में है। भल हम शास्त्र आदि पढ़े हुए हैं परन्तु जानते हैं इन सबसे कोई भगवान नहीं मिलता। बाप समझाते हैं मीठे-मीठे बच्चे शिवबाबा को और वर्से को याद करते रहो। बाबा आप बहुत मीठे हो, कमाल है आपकी, ऐसे-ऐसे महिमा करनी चाहिए बाबा की। तुम बच्चों को ईश्वरीय लाटरी मिली है। अब मेहनत करनी है ज्ञान और योग की। इसमें जबरदस्त प्राइज़ मिलती है तो पुरुषार्थ करना चाहिए। अच्छा!
मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का यादप्यार और गुडमार्निग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।
धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) अब नाटक पूरा हो रहा है, हम अपने स्वीट होम में जा रहे हैं, इस स्मृति से खुशी का पारा सदा चढ़ा रहे।
2) पास्ट सो पास्ट कर इस अन्तिम जन्म में बाप को पवित्रता की मदद करनी है। तन-मन-धन से भारत को स्वर्ग बनाने की सेवा में लगना है।
वरदान:- सर्व पुराने खातों को संकल्प और संस्कार रूप से भी समाप्त करने वाले अन्तर्मुखी भव
बापदादा बच्चों के सभी चौपड़े अब साफ देखने चाहते हैं। थोड़ा भी पुराना खाता अर्थात् बाह्यमुखता का खाता संकल्प वा संस्कार रूप में भी रह न जाए। सदा सर्व बन्धनमुक्त और योगयुक्त - इसी को ही अन्तर्मुखी कहा जाता है इसलिए सेवा खूब करो लेकिन बाह्यमुखी से अन्तर्मुखी बनकर करो। अन्तर्मुखता की सूरत द्वारा बाप का नाम बाला करो, आत्मायें बाप का बन जाएं - ऐसा प्रसन्नचित बनाओ।
स्लोगन:- अपने परिवर्तन द्वारा संकल्प, बोल, सम्बन्ध, सम्पर्क में सफलता प्राप्त करना ही सफलतामूर्त बनना है।
25.01.2023 HINDI MURLI
“मीठे बच्चे - बाप को याद करने की खूब मेहनत करो, क्योंकि तुम्हें सच्चा सोना बनना है''
प्रश्नः- अच्छे पुरुषार्थियों की निशानी क्या होगी?
उत्तर:- जो अच्छे पुरुषार्थी होंगे वह कदम-कदम श्रीमत पर चलेंगे। सदा श्रीमत पर चलने वाले ही ऊंच पद पाते हैं। बाबा बच्चों को सदा श्रीमत पर चलने के लिए क्यों कहता? क्योंकि वही एक सच्चा-सच्चा माशूक है। बाकी सब उनके आशिक हैं।
ओम् शान्ति। ओम् शान्ति का अर्थ तो नये वा पुराने बच्चों ने समझा है। तुम बच्चे जान गये हो कि हम सभी आत्मायें परमात्मा की सन्तान हैं। परमात्मा है ऊंचे ते ऊंच और बहुत प्यारे ते प्यारा माशूक सभी का। बच्चों को ज्ञान और भक्ति का राज़ तो समझाया है। ज्ञान माना दिन, सतयुग-त्रेता, भक्ति माना रात, द्वापर और कलियुग। भारत की ही बात है। और धर्मों से तुम्हारा जास्ती कनेक्शन नहीं है, 84 जन्म भी तुम ही भोगते हो। पहले-पहले भी तुम भारतवासी आये हो। 84 जन्मों का चक्र तुम भारतवासियों के लिए है। ऐसे कोई नहीं कहेंगे - इस्लामी, बौद्धी आदि 84 जन्म लेते हैं। नहीं, भारतवासी ही लेते हैं। भारत ही अविनाशी खण्ड है, यह कब विनाश नहीं होता और सभी खण्डों का विनाश हो जाता है। भारत ही सबसे ऊंच ते ऊंच है। अविनाशी है। भारत खण्ड ही स्वर्ग बनता है और कोई खण्ड स्वर्ग नहीं बनता। बच्चों को समझाया गया है - नई दुनिया सतयुग में भारत ही होता है। भारत ही स्वर्ग कहलाता है। वही फिर 84 जन्म लेते हैं। आखरीन नर्कवासी बनते हैं, फिर वही भारतवासी स्वर्गवासी बनेंगे। इस समय सभी नर्कवासी हैं। फिर और सब खण्ड विनाश होंगे, बाकी भारत ही रहेगा। भारत खण्ड की महिमा अपरमअपार है। वैसे परमपिता परमात्मा की महिमा और गीता की महिमा भी अपरमअपार है, परन्तु सच्ची गीता की। अभी बाप तुमको राजयोग सिखलाते हैं। यह गीता का पुरुषोत्तम संगमयुग है। भारत ही फिर पुरुषोत्तम बनने का है। अभी वह आदि सनातन देवी देवता धर्म नहीं है। राज्य भी नहीं है। तो वो युग भी नहीं है। बाबा ने समझाया है - यह भूल भी ड्रामा में है। गीता पर फिर श्रीकृष्ण का नाम रखेंगे। जब भक्तिमार्ग शुरू होगा तो पहले-पहले गीता ही होगी। अभी यह गीता आदि सब शास्त्र खत्म हो जाने हैं। बाकी सिर्फ देवी देवता धर्म ही रहेगा। ऐसे नहीं कि उनके साथ गीता भागवत आदि भी रहेंगे। नहीं। प्रालब्ध मिल गई, सद्गति हो गई तो फिर कोई शास्त्र आदि की दरकार ही नहीं। सतयुग में कोई भी गुरू शास्त्र आदि नहीं होते। इस समय तो अनेक गुरू हैं भक्ति सिखलाने वाले। सद्गति देने वाला तो एक ही रूहानी बाप है, जिसकी अपरमअपार महिमा है। उसे ही वर्ल्ड आलमाइटी अथॉरिटी कहा जाता है। भारतवासी बहुत करके यह भूल करते हैं जो कहते हैं वह अन्तर्यामी है। सबके अन्दर को जानता है। बाप कहते हैं बच्चे मैं कोई के अन्दर को नहीं जानता हूँ। मेरा तो काम ही है पतितों को पावन बनाना। बाकी मैं अन्तर्यामी नहीं हूँ। यह भक्तिमार्ग की उल्टी महिमा है। मुझे बुलाते ही हैं पतित दुनिया में। और मैं एक ही बार आता हूँ, जबकि पुरानी दुनिया को नया बनाना है। मनुष्यों को यह पता ही नहीं कि यह जो दुनिया है वह नई से पुरानी, पुरानी से नई कब बनती है। हर चीज़ सतो, रजो, तमो में जरूर आती है। मनुष्य भी एक जैसे होते हैं। बालक पहले सतोप्रधान है फिर युवा, वृद्ध होते हैं अर्थात् रजो, तमो में आते हैं। बूढ़ा शरीर होता है वह छोड़ जाकर बच्चा बनते हैं। दुनिया भी नई सो पुरानी होती है। बच्चे जानते हैं नई दुनिया में भारत कितना ऊंच था। भारत की महिमा अपरमअपार है। इतना धनवान, सुखी, पवित्र और कोई खण्ड है नहीं। अब सतोप्रधान दुनिया स्थापन हो रही है। त्रिमूर्ति में भी ब्रह्मा, विष्णु, शंकर दिखाया है। उनका अर्थ कोई समझते नहीं हैं। वास्तव में कहना चाहिए त्रिमूर्ति शिव न कि ब्रह्मा। ब्रह्मा विष्णु शंकर को क्रियेट किसने किया.... ऊंचे ते ऊंच शिवबाबा है। कहते हैं ब्रह्मा देवताए नम:, विष्णु देवताए नम:, शंकर देवताए नम:, शिव परमात्माए नम:। तो वह ऊंच हुआ ना। वह है रचयिता। गाते भी हैं परमपिता परमात्मा ब्रह्मा द्वारा ब्राह्मणों की स्थापना करते हैं फिर परमात्मा बाप द्वारा वर्सा भी मिलता है। फिर खुद बैठ ब्राह्मणों को पढ़ाते हैं क्योंकि वह बाप भी है, सुप्रीम टीचर भी है। वर्ल्ड की हिस्ट्री-जॉग्राफी कैसे चक्र लगाती है, वह बैठ समझाते हैं। वही नॉलेजफुल है। बाकी ऐसे नहीं कि वह जानीजाननहार है। यह भी भूल है। भक्तिमार्ग में कोई बायोग्राफी, आक्यूपेशन को नहीं जानते। तो यह जैसे गुड़ियों की पूजा हो जाती है। कलकत्ते में गुड़ियों की पूजा कितनी होती है, फिर उनकी पूजा कर खिला-पिलाकर समुद्र में डुबो देते हैं। शिवबाबा मोस्ट बिलवेड है। बाप कहते हैं मेरा भी मिट्टी का लिंग बनाकर पूजा आदि कर फिर तोड़फोड़ देते हैं। सवेरे बनाते हैं, शाम को तोड़ देते हैं। यह सब है भक्तिमार्ग, अन्धश्रद्धा की पूजा। मनुष्य गाते भी हैं आपेही पूज्य आपेही पुजारी। बाप कहते हैं मैं तो सदैव पूज्य हूँ। मैं तो आकर सिर्फ पतितों को पावन बनाता हूँ। 21 जन्मों के लिए राज्य भाग्य देता हूँ। भक्ति में है अल्पकाल का सुख, जिसको संन्यासी काग विष्टा समान सुख कहते हैं। संन्यासी घरबार छोड़ देते हैं। वह है हद का संन्यास, हठयोगी हैं ना। भगवान को तो जानते ही नहीं। ब्रह्म को याद करते हैं। ब्रह्म तो भगवान नहीं। भगवान तो एक ही निराकार शिव है, जो सर्व आत्माओं का बाप है। ब्रह्म है हम आत्माओं के रहने का स्थान। वह ब्रह्माण्ड, स्वीट होम है। वहाँ से हम आत्मायें यहाँ पार्ट बजाने आती हैं। आत्मा कहती है हम एक शरीर छोड़ दूसरा शरीर लेता हूँ, 84 जन्म भी भारतवासियों के हैं। जिन्हों ने बहुत भक्ति की है, वही फिर ज्ञान भी जास्ती उठायेंगे। बाप कहते हैं बच्चे गृहस्थ व्यवहार में भल रहो, परन्तु श्रीमत पर चलो। तुम सब आत्मायें आशिक हो, एक परमात्मा माशूक के। द्वापर से लेकर तुम याद करते आये हो। दु:ख में आत्मा बाप को याद करती है। यह है ही दु:खधाम। आत्मायें असली शान्ति-धाम की निवासी हैं। पीछे आई सुखधाम में। फिर हमने 84 जन्म लिए। “हम सो, सो हम'' का अर्थ भी समझाया है। वह कह देते आत्मा सो परमात्मा, परमात्मा सो आत्मा। अब बाप समझाते हैं आत्मा सो परमात्मा कैसे हो सकता। परमात्मा तो एक है। उनके सब बच्चे हैं। साधू सन्त आदि भी हम सो का अर्थ रॉग करते हैं। अब बाप ने समझाया है “हम सो'' का अर्थ ही है - हम आत्मा सतयुग में सो देवी-देवता थी, फिर हम सो क्षत्रिय, हम सो वैश्य, हम सो शूद्र बनी। अब फिर हम सो ब्राह्मण बने हैं, हम सो देवता बनने के लिए। यह है यथार्थ अर्थ। वह है बिल्कुल रॉग। बाप कहते हैं मनुष्य रावण की मत पर चल कितने झूठे हो गये हैं इसलिए कहावत है - झूठी माया, झूठी काया...सतयुग में ऐसे नहीं कहेंगे। वह है सचखण्ड। वहाँ झूठ का नाम-निशान नहीं। यहाँ फिर सच का नाम नहीं है। फिर भी आटे में नमक कहा जाता है। सतयुग में हैं दैवीगुण वाले मनुष्य। उन्हों का है देवता धर्म। पीछे और-और धर्म हुए हैं। तो द्वेत हुआ। द्वापर से आसुरी रावणराज्य शुरू हो जाता है। सतयुग में रावण राज्य भी नहीं तो 5 विकार भी नहीं हो सकते। वह है सम्पूर्ण निर्विकारी। राम सीता को 14 कला सम्पूर्ण कहा जाता है। राम को बाण क्यों दिया है? यह भी कोई नही जानते। हिंसा की तो बात नहीं। तुम हो गाडली स्टूडेण्ट, तो फादर भी हुआ। स्टूडेण्ट हैं तो वह टीचर हुआ। फिर तुम बच्चों को सद्गति दे स्वर्ग में ले जाते हैं तो सतगुरू हुआ। बाप, टीचर, गुरू तीनों ही हो गया। उनके तुम बच्चे बने हो तो तुमको कितनी खुशी होनी चाहिए। तुम बच्चे जानते हो अभी है रावण राज्य। रावण भारत का सबसे बड़ा दुश्मन है। यह नॉलेज भी तुम बच्चों को नॉलेजफुल बाप से मिली है। वह बाप ही ज्ञान का सागर, आनन्द का सागर है। ज्ञान सागर से तुम बादल भरकर फिर जाए वर्षा करते हो। ज्ञान गंगायें तुम हो, तुम्हारी ही महिमा है। बाकी पानी की गंगा में स्नान करने से पावन तो कोई बनता ही नहीं। मैले गन्दे पानी में स्नान करने से भी समझते हैं हम पावन बन जायेंगे। चश्में (झरने) के पानी को भी बहुत महत्व देते हैं। यह सब है भक्ति मार्ग। सतयुग त्रेता में भक्ति होती नहीं। वह है सम्पूर्ण निर्विकारी दुनिया।
बाप कहते हैं बच्चे मैं तुमको अभी पावन बनाने आया हूँ। यह एक जन्म मुझे याद करो और पावन बनो तो तुम सतोप्रधान बन जायेंगे। मैं ही पतित-पावन हूँ। जितना हो सके याद की यात्रा को बढ़ाओ। मुख से शिवबाबा, शिवबाबा कहना नहीं है। जैसे आशिक माशुक को याद करते हैं। एक बार देखा बस, बुद्धि में उनकी याद रहेगी। भक्ति में जो जिसको याद करते, जिसकी पूजा करते हैं उनका साक्षात्कार हो जाता है। परन्तु वह सब है अल्पकाल के लिए। भक्ति से नीचे ही उतरते आये हैं। अब तो मौत सामने खड़ा है। हाय-हाय के बाद ही जयजयकार होनी है। भारत में ही रक्त की नदियॉ बहनी हैं। अब सब तमोप्रधान बन गये हैं फिर सबको सतोप्रधान बनना है। परन्तु बनेंगे वही जो कल्प पहले देवता बने होंगे। वही आकर बाप से पूरा-पूरा वर्सा लेंगे। अगर भक्ति कम की होगी तो ज्ञान भी पूरा नहीं उठायेंगे। फिर प्रजा में नम्बरवार पद पायेंगे। अच्छे पुरुषार्थी कदम-कदम श्रीमत पर चल अच्छा पद पायेंगे। मैनर्स भी अच्छे चाहिए। दैवी गुण भी धारण करने हैं। वह फिर 21 जन्म चलेंगे। अब हैं सबके आसुरी गुण क्योंकि पतित दुनिया है ना। तुम बच्चों को वर्ल्ड की हिस्ट्री-जॉग्राफी भी समझाई गई है। इस समय बाप कहते हैं बच्चे याद की बहुत मेहनत करो तो तुम सच्चा सोना बन जायेंगे। सतयुग है गोल्डन एज, सच्चा सोना। फिर त्रेता में चाँदी की अलाए पड़ती है तो कलायें कम होती जाती हैं। अब तो कोई कला नहीं है। जब ऐसी हालत हो जाती है तब बाप आते हैं। यह भी ड्रामा में नूँध है। तुम एक्टर्स हो ना। तुम जानते हो हम यहाँ पार्ट बजाने आये हैं। पार्टधारी अगर ड्रामा के आदि-मध्य-अन्त को न जाने तो उनको बेसमझ कहा जाता है। बेहद का बाप कहते हैं सभी कितना बेसमझ बन गये हैं। अब मैं तुमको समझदार हीरे जैसा बनाता हूँ। फिर रावण आकर कौड़ी जैसा बनाते हैं, अब इस पुरानी दुनिया का विनाश होना है। सबको मच्छरों सदृश्य ले जाता हूँ। तुम्हारी एम आब्जेक्ट सामने खड़ी है। ऐसा बनना है तब तुम स्वर्गवासी बनेगे। तुम बी.के. यह पुरुषार्थ कर रहे हो। परन्तु मनुष्यों की बुद्धि तमोप्रधान होने कारण यह भी समझते नहीं कि इतने सब बी.के. हैं तो जरूर प्रजापिता ब्रह्मा भी होगा। ब्राह्मण हैं चोटी। ब्राह्मण फिर देवता, चित्रों में ब्राह्मणों को, शिव को गुम कर दिया है। ब्राह्मण अब भारत को स्वर्ग बना रहे हैं। अच्छा।
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का नम्बरवार पुरुषार्थ अनुसार यादप्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।
धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) ज्ञान सागर से बादल भर ज्ञान वर्षा करनी है। जितना हो सके याद की यात्रा को भी बढ़ाना है। याद से ही सच्चा सोना बनना है।
2) श्रीमत पर चल अच्छे मैनर्स और दैवीगुण धारण करने हैं। सचखण्ड में चलने के लिए बहुत-बहुत सच्चा बनना है।
वरदान:- विशेषता देखने का चश्मा पहन सम्बन्ध-सम्पर्क में आने वाले विश्व परिवर्तक भव
एक दो के साथ सम्बन्ध वा सम्पर्क में आते हर एक की विशेषता को देखो। विशेषता देखने की ही दृष्टि धारण करो। जैसे आजकल का फैशन और मजबूरी चश्मे की है। तो विशेषता देखने वाला चश्मा पहनो। दूसरा कुछ दिखाई ही न दे। जैसे लाल चश्मा पहन लो तो हरा भी लाल दिखाई देता है। तो विशेषता के चश्में द्वारा कीचड़ को न देख कमल को देखने से विश्व परिवर्तन के विशेष कार्य के निमित्त बन जायेंगे।
स्लोगन:- परचिंतन और परदर्शन की धूल से सदा दूर रहो तो बेदाग अमूल्य हीरा बन जायेंगे।
24.01.2023 HINDI MURLI
“मीठे बच्चे
- बाप को याद करने की खूब मेहनत करो, क्योंकि तुम्हें सच्चा सोना बनना है''
प्रश्नः- अच्छे पुरुषार्थियों की निशानी क्या होगी?
उत्तर:- जो अच्छे पुरुषार्थी होंगे वह कदम-कदम श्रीमत पर चलेंगे। सदा श्रीमत पर चलने वाले ही ऊंच पद पाते हैं। बाबा बच्चों को सदा श्रीमत पर चलने के लिए क्यों कहता? क्योंकि वही एक सच्चा-सच्चा माशूक है। बाकी सब उनके आशिक हैं।
ओम् शान्ति। ओम् शान्ति का अर्थ तो नये वा पुराने बच्चों ने समझा है। तुम बच्चे जान गये हो कि हम सभी आत्मायें परमात्मा की सन्तान हैं। परमात्मा है ऊंचे ते ऊंच और बहुत प्यारे ते प्यारा माशूक सभी का। बच्चों को ज्ञान और भक्ति का राज़ तो समझाया है। ज्ञान माना दिन, सतयुग-त्रेता, भक्ति माना रात, द्वापर और कलियुग। भारत की ही बात है। और धर्मों से तुम्हारा जास्ती कनेक्शन नहीं है, 84 जन्म भी तुम ही भोगते हो। पहले-पहले भी तुम भारतवासी आये हो। 84 जन्मों का चक्र तुम भारतवासियों के लिए है। ऐसे कोई नहीं कहेंगे - इस्लामी, बौद्धी आदि 84 जन्म लेते हैं। नहीं, भारतवासी ही लेते हैं। भारत ही अविनाशी खण्ड है, यह कब विनाश नहीं होता और सभी खण्डों का विनाश हो जाता है। भारत ही सबसे ऊंच ते ऊंच है। अविनाशी है। भारत खण्ड ही स्वर्ग बनता है और कोई खण्ड स्वर्ग नहीं बनता। बच्चों को समझाया गया है - नई दुनिया सतयुग में भारत ही होता है। भारत ही स्वर्ग कहलाता है। वही फिर 84 जन्म लेते हैं। आखरीन नर्कवासी बनते हैं, फिर वही भारतवासी स्वर्गवासी बनेंगे। इस समय सभी नर्कवासी हैं। फिर और सब खण्ड विनाश होंगे, बाकी भारत ही रहेगा। भारत खण्ड की महिमा अपरमअपार है। वैसे परमपिता परमात्मा की महिमा और गीता की महिमा भी अपरमअपार है, परन्तु सच्ची गीता की। अभी बाप तुमको राजयोग सिखलाते हैं। यह गीता का पुरुषोत्तम संगमयुग है। भारत ही फिर पुरुषोत्तम बनने का है। अभी वह आदि सनातन देवी देवता धर्म नहीं है। राज्य भी नहीं है। तो वो युग भी नहीं है। बाबा ने समझाया है - यह भूल भी ड्रामा में है। गीता पर फिर श्रीकृष्ण का नाम रखेंगे। जब भक्तिमार्ग शुरू होगा तो पहले-पहले गीता ही होगी। अभी यह गीता आदि सब शास्त्र खत्म हो जाने हैं। बाकी सिर्फ देवी देवता धर्म ही रहेगा। ऐसे नहीं कि उनके साथ गीता भागवत आदि भी रहेंगे। नहीं। प्रालब्ध मिल गई, सद्गति हो गई तो फिर कोई शास्त्र आदि की दरकार ही नहीं। सतयुग में कोई भी गुरू शास्त्र आदि नहीं होते। इस समय तो अनेक गुरू हैं भक्ति सिखलाने वाले। सद्गति देने वाला तो एक ही रूहानी बाप है, जिसकी अपरमअपार महिमा है। उसे ही वर्ल्ड आलमाइटी अथॉरिटी कहा जाता है। भारतवासी बहुत करके यह भूल करते हैं जो कहते हैं वह अन्तर्यामी है। सबके अन्दर को जानता है। बाप कहते हैं बच्चे मैं कोई के अन्दर को नहीं जानता हूँ। मेरा तो काम ही है पतितों को पावन बनाना। बाकी मैं अन्तर्यामी नहीं हूँ। यह भक्तिमार्ग की उल्टी महिमा है। मुझे बुलाते ही हैं पतित दुनिया में। और मैं एक ही बार आता हूँ, जबकि पुरानी दुनिया को नया बनाना है। मनुष्यों को यह पता ही नहीं कि यह जो दुनिया है वह नई से पुरानी, पुरानी से नई कब बनती है। हर चीज़ सतो, रजो, तमो में जरूर आती है। मनुष्य भी एक जैसे होते हैं। बालक पहले सतोप्रधान है फिर युवा, वृद्ध होते हैं अर्थात् रजो, तमो में आते हैं। बूढ़ा शरीर होता है वह छोड़ जाकर बच्चा बनते हैं। दुनिया भी नई सो पुरानी होती है। बच्चे जानते हैं नई दुनिया में भारत कितना ऊंच था। भारत की महिमा अपरमअपार है। इतना धनवान, सुखी, पवित्र और कोई खण्ड है नहीं। अब सतोप्रधान दुनिया स्थापन हो रही है। त्रिमूर्ति में भी ब्रह्मा, विष्णु, शंकर दिखाया है। उनका अर्थ कोई समझते नहीं हैं। वास्तव में कहना चाहिए त्रिमूर्ति शिव न कि ब्रह्मा। ब्रह्मा विष्णु शंकर को क्रियेट किसने किया.... ऊंचे ते ऊंच शिवबाबा है। कहते हैं ब्रह्मा देवताए नम:, विष्णु देवताए नम:, शंकर देवताए नम:, शिव परमात्माए नम:। तो वह ऊंच हुआ ना। वह है रचयिता। गाते भी हैं परमपिता परमात्मा ब्रह्मा द्वारा ब्राह्मणों की स्थापना करते हैं फिर परमात्मा बाप द्वारा वर्सा भी मिलता है। फिर खुद बैठ ब्राह्मणों को पढ़ाते हैं क्योंकि वह बाप भी है, सुप्रीम टीचर भी है। वर्ल्ड की हिस्ट्री-जॉग्राफी कैसे चक्र लगाती है, वह बैठ समझाते हैं। वही नॉलेजफुल है। बाकी ऐसे नहीं कि वह जानीजाननहार है। यह भी भूल है। भक्तिमार्ग में कोई बायोग्राफी, आक्यूपेशन को नहीं जानते। तो यह जैसे गुड़ियों की पूजा हो जाती है। कलकत्ते में गुड़ियों की पूजा कितनी होती है, फिर उनकी पूजा कर खिला-पिलाकर समुद्र में डुबो देते हैं। शिवबाबा मोस्ट बिलवेड है। बाप कहते हैं मेरा भी मिट्टी का लिंग बनाकर पूजा आदि कर फिर तोड़फोड़ देते हैं। सवेरे बनाते हैं, शाम को तोड़ देते हैं। यह सब है भक्तिमार्ग, अन्धश्रद्धा की पूजा। मनुष्य गाते भी हैं आपेही पूज्य आपेही पुजारी। बाप कहते हैं मैं तो सदैव पूज्य हूँ। मैं तो आकर सिर्फ पतितों को पावन बनाता हूँ। 21 जन्मों के लिए राज्य भाग्य देता हूँ। भक्ति में है अल्पकाल का सुख, जिसको संन्यासी काग विष्टा समान सुख कहते हैं। संन्यासी घरबार छोड़ देते हैं। वह है हद का संन्यास, हठयोगी हैं ना। भगवान को तो जानते ही नहीं। ब्रह्म को याद करते हैं। ब्रह्म तो भगवान नहीं। भगवान तो एक ही निराकार शिव है, जो सर्व आत्माओं का बाप है। ब्रह्म है हम आत्माओं के रहने का स्थान। वह ब्रह्माण्ड, स्वीट होम है। वहाँ से हम आत्मायें यहाँ पार्ट बजाने आती हैं। आत्मा कहती है हम एक शरीर छोड़ दूसरा शरीर लेता हूँ, 84 जन्म भी भारतवासियों के हैं। जिन्हों ने बहुत भक्ति की है, वही फिर ज्ञान भी जास्ती उठायेंगे। बाप कहते हैं बच्चे गृहस्थ व्यवहार में भल रहो, परन्तु श्रीमत पर चलो। तुम सब आत्मायें आशिक हो, एक परमात्मा माशूक के। द्वापर से लेकर तुम याद करते आये हो। दु:ख में आत्मा बाप को याद करती है। यह है ही दु:खधाम। आत्मायें असली शान्ति-धाम की निवासी हैं। पीछे आई सुखधाम में। फिर हमने 84 जन्म लिए। “हम सो, सो हम'' का अर्थ भी समझाया है। वह कह देते आत्मा सो परमात्मा, परमात्मा सो आत्मा। अब बाप समझाते हैं आत्मा सो परमात्मा कैसे हो सकता। परमात्मा तो एक है। उनके सब बच्चे हैं। साधू सन्त आदि भी हम सो का अर्थ रॉग करते हैं। अब बाप ने समझाया है “हम सो'' का अर्थ ही है - हम आत्मा सतयुग में सो देवी-देवता थी, फिर हम सो क्षत्रिय, हम सो वैश्य, हम सो शूद्र बनी। अब फिर हम सो ब्राह्मण बने हैं, हम सो देवता बनने के लिए। यह है यथार्थ अर्थ। वह है बिल्कुल रॉग। बाप कहते हैं मनुष्य रावण की मत पर चल कितने झूठे हो गये हैं इसलिए कहावत है - झूठी माया, झूठी काया...सतयुग में ऐसे नहीं कहेंगे। वह है सचखण्ड। वहाँ झूठ का नाम-निशान नहीं। यहाँ फिर सच का नाम नहीं है। फिर भी आटे में नमक कहा जाता है। सतयुग में हैं दैवीगुण वाले मनुष्य। उन्हों का है देवता धर्म। पीछे और-और धर्म हुए हैं। तो द्वेत हुआ। द्वापर से आसुरी रावणराज्य शुरू हो जाता है। सतयुग में रावण राज्य भी नहीं तो 5 विकार भी नहीं हो सकते। वह है सम्पूर्ण निर्विकारी। राम सीता को 14 कला सम्पूर्ण कहा जाता है। राम को बाण क्यों दिया है? यह भी कोई नही जानते। हिंसा की तो बात नहीं। तुम हो गाडली स्टूडेण्ट, तो फादर भी हुआ। स्टूडेण्ट हैं तो वह टीचर हुआ। फिर तुम बच्चों को सद्गति दे स्वर्ग में ले जाते हैं तो सतगुरू हुआ। बाप, टीचर, गुरू तीनों ही हो गया। उनके तुम बच्चे बने हो तो तुमको कितनी खुशी होनी चाहिए। तुम बच्चे जानते हो अभी है रावण राज्य। रावण भारत का सबसे बड़ा दुश्मन है। यह नॉलेज भी तुम बच्चों को नॉलेजफुल बाप से मिली है। वह बाप ही ज्ञान का सागर, आनन्द का सागर है। ज्ञान सागर से तुम बादल भरकर फिर जाए वर्षा करते हो। ज्ञान गंगायें तुम हो, तुम्हारी ही महिमा है। बाकी पानी की गंगा में स्नान करने से पावन तो कोई बनता ही नहीं। मैले गन्दे पानी में स्नान करने से भी समझते हैं हम पावन बन जायेंगे। चश्में (झरने) के पानी को भी बहुत महत्व देते हैं। यह सब है भक्ति मार्ग। सतयुग त्रेता में भक्ति होती नहीं। वह है सम्पूर्ण निर्विकारी दुनिया।
बाप कहते हैं
बच्चे मैं तुमको अभी पावन बनाने आया हूँ। यह एक जन्म मुझे याद करो और पावन बनो तो तुम
सतोप्रधान बन जायेंगे। मैं ही पतित-पावन हूँ। जितना हो सके याद की यात्रा को बढ़ाओ।
मुख से शिवबाबा, शिवबाबा कहना नहीं है। जैसे आशिक माशुक को याद करते हैं। एक बार देखा
बस, बुद्धि में उनकी याद रहेगी। भक्ति में जो जिसको याद करते, जिसकी पूजा करते हैं
उनका साक्षात्कार हो जाता है। परन्तु वह सब है अल्पकाल के लिए। भक्ति से नीचे ही उतरते
आये हैं। अब तो मौत सामने खड़ा है। हाय-हाय के बाद ही जयजयकार होनी है। भारत में ही
रक्त की नदियॉ बहनी हैं। अब सब तमोप्रधान बन गये हैं फिर सबको सतोप्रधान बनना है। परन्तु
बनेंगे वही जो कल्प पहले देवता बने होंगे। वही आकर बाप से पूरा-पूरा वर्सा लेंगे। अगर
भक्ति कम की होगी तो ज्ञान भी पूरा नहीं उठायेंगे। फिर प्रजा में नम्बरवार पद पायेंगे।
अच्छे पुरुषार्थी कदम-कदम श्रीमत पर चल अच्छा पद पायेंगे। मैनर्स भी अच्छे चाहिए। दैवी
गुण भी धारण करने हैं। वह फिर 21 जन्म चलेंगे। अब हैं सबके आसुरी गुण क्योंकि पतित
दुनिया है ना। तुम बच्चों को वर्ल्ड की हिस्ट्री-जॉग्राफी भी समझाई गई है। इस समय बाप
कहते हैं बच्चे याद की बहुत मेहनत करो तो तुम सच्चा सोना बन जायेंगे। सतयुग है गोल्डन
एज, सच्चा सोना। फिर त्रेता में चाँदी की अलाए पड़ती है तो कलायें कम होती जाती हैं।
अब तो कोई कला नहीं है। जब ऐसी हालत हो जाती है तब बाप आते हैं। यह भी ड्रामा में नूँध
है। तुम एक्टर्स हो ना। तुम जानते हो हम यहाँ पार्ट बजाने आये हैं। पार्टधारी अगर ड्रामा
के आदि-मध्य-अन्त को न जाने तो उनको बेसमझ कहा जाता है। बेहद का बाप कहते हैं सभी कितना
बेसमझ बन गये हैं। अब मैं तुमको समझदार हीरे जैसा बनाता हूँ। फिर रावण आकर कौड़ी जैसा
बनाते हैं, अब इस पुरानी दुनिया का विनाश होना है। सबको मच्छरों सदृश्य ले जाता हूँ।
तुम्हारी एम आब्जेक्ट सामने खड़ी है। ऐसा बनना है तब तुम स्वर्गवासी बनेगे। तुम बी.के.
यह पुरुषार्थ कर रहे हो। परन्तु मनुष्यों की बुद्धि तमोप्रधान होने कारण यह भी समझते
नहीं कि इतने सब बी.के. हैं तो जरूर प्रजापिता ब्रह्मा भी होगा। ब्राह्मण हैं चोटी।
ब्राह्मण फिर देवता, चित्रों में ब्राह्मणों को, शिव को गुम कर दिया है। ब्राह्मण अब
भारत को स्वर्ग बना रहे हैं। अच्छा।
मीठे-मीठे सिकीलधे
बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का नम्बरवार पुरुषार्थ अनुसार यादप्यार और गुडमार्निंग।
रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।
धारणा के लिए
मुख्य सार:-
1) ज्ञान सागर
से बादल भर ज्ञान वर्षा करनी है। जितना हो सके याद की यात्रा को भी बढ़ाना है। याद
से ही सच्चा सोना बनना है।
2) श्रीमत पर
चल अच्छे मैनर्स और दैवीगुण धारण करने हैं। सचखण्ड में चलने के लिए बहुत-बहुत सच्चा
बनना है।
वरदान:- विशेषता
देखने का चश्मा पहन सम्बन्ध-सम्पर्क में आने वाले विश्व परिवर्तक भव
एक दो के साथ
सम्बन्ध वा सम्पर्क में आते हर एक की विशेषता को देखो। विशेषता देखने की ही दृष्टि
धारण करो। जैसे आजकल का फैशन और मजबूरी चश्मे की है। तो विशेषता देखने वाला चश्मा पहनो।
दूसरा कुछ दिखाई ही न दे। जैसे लाल चश्मा पहन लो तो हरा भी लाल दिखाई देता है। तो विशेषता
के चश्में द्वारा कीचड़ को न देख कमल को देखने से विश्व परिवर्तन के विशेष कार्य के
निमित्त बन जायेंगे।
स्लोगन:- परचिंतन और परदर्शन की धूल से सदा दूर रहो तो बेदाग अमूल्य हीरा बन जायेंगे। 23.01.2023 HINDI MURLI
“मीठे बच्चे - पवि-त्रता बिना भारत स्वर्ग बन नहीं सकता, तुम्हें श्रीमत है घर गृहस्थ में रहते पवित्र बनो, दोनों तरफ तोड़ निभाओ''
प्रश्नः- दूसरे सतसंगों वा आश्रमों से यहाँ की कौन सी रसम बिल्कुल न्यारी है?
उत्तर:- उन आश्रमों में मनुष्य जाकर रहते हैं समझते हैं - संग अच्छा है, घर आदि का हंगामा नहीं है। एम-आब्जेक्ट कुछ नहीं। परन्तु यहाँ तो तुम मरजीवा बनते हो। तुम्हें घरबार नहीं छुड़ाया जाता। घर में रह तुम्हें ज्ञान अमृत पीना है, रूहानी सेवा करनी है। यह रसम उन सतसंगों में नहीं है।
ओम् शान्ति। बाप बैठ बच्चों को समझाते हैं क्योंकि बच्चे जानते हैं कि यहाँ बाप ही समझाते हैं इसलिए घड़ी-घड़ी शिव भगवानुवाच कहना भी अच्छा नहीं लगता। वह गीता सुनाने वाले कहेंगे - कृष्ण भगवानुवाच। वह तो होकर गये हैं। कहते हैं श्रीकृष्ण ने गीता सुनाई थी, राजयोग सिखाया था। यहाँ तो तुम बच्चे समझते हो शिवबाबा हमको राजयोग सिखला रहे हैं और कोई सतसंग नहीं जहाँ राजयोग सिखाते हो। बाप कहते हैं मैं तुमको राजाओं का राजा बनाता हूँ। वह तो सिर्फ कहेंगे कृष्ण भगवानुवाच मनमनाभव। कब कहा था? तो कहते हैं 5 हजार वर्ष पहले वा कोई कहते क्राइस्ट से 3 हजार वर्ष पहले। 2 हजार वर्ष नहीं कहते क्योंकि एक हजार वर्ष जो बीच में हैं उसमें इस्लामी, बौद्धी आये। तो क्राइस्ट से 3 हजार वर्ष पहले सतयुग सिद्ध हो जाता है। हम कहते हैं - आज से 5 हजार वर्ष पहले गीता सुनाने वाला भगवान आया था और आकर देवी-देवता धर्म स्थापन किया था। अब 5 हजार वर्ष बाद फिर से उनको आना पड़े। यह है 5 हजार वर्ष का चक्र। बच्चे जानते हैं कि यह बाप इस द्वारा समझा रहे हैं। दुनिया में तो अनेक प्रकार के सतसंग हैं जहाँ मनुष्य जाते हैं। कोई आश्रमों में जाकर रहते भी हैं तो उसको ऐसे नहीं कहेंगे कि मात-पिता पास जाए जन्म लिया वा उनसे कोई वर्सा मिलता है, नहीं। सिर्फ वह संग अच्छा समझते हैं। वहाँ घर आदि का कोई भी हंगामा नहीं होता। बाकी एम-आब्जेक्ट तो कुछ भी नहीं है। यहाँ तो तुम कहते हो हम मात-पिता के पास आये हैं। यह है तुम्हारा मरजीवा जन्म। वह लोग बच्चे को एडाप्ट करते हैं, तो वह जाकर उनका घर बसाता है। यहाँ वह रसम नहीं है कि पियरघर, ससुरघर को छोड़ यहाँ आकर बैठें। यह हो नहीं सकता। यहाँ तो गृहस्थ में रहते कमल फूल समान रहना है। कुमारी है वा कोई भी है उनको कहा जाता है घर में रह रोज़ ज्ञान अमृत पीने आओ। नॉलेज समझकर फिर औरों को समझाओ। दोनों तरफ तोड़ निभाओ। गृहस्थ व्यवहार में भी रहना है। अन्त तक दोनों तरफ निभाना है। अन्त में यहाँ रहें या वहाँ रहें, मौत तो सभी का आना है। कहते हैं - राम गयो, रावण गयो..... तो ऐसे नहीं कि सभी को यहाँ आकर रहना है। यह तो निकलते तब हैं जब विष के लिए उन्हों को सताया जाता है। कन्याओं को भी रहना घर में है। मित्र सम्बन्धियों की सर्विस करनी है। सोशल वर्कर तो बहुत हैं। गवर्मेन्ट इतने सबको तो अपने पास रख नहीं सकती। वह अपने गृहस्थ व्यवहार में रहते हैं। फिर कोई न कोई सेवा भी करते हैं। यहाँ तुमको रूहानी सेवा करनी है। गृहस्थ व्यवहार में भी रहना है। हाँ, जब विकार के लिए बहुत तंग करते हैं तो आकर ईश्वरीय शरण लेते हैं। यहाँ विष के कारण बच्चियां मार बहुत खाती हैं और कहाँ भी यह बात नहीं है। यहाँ तो पवित्र रहना पड़ता है। गवर्मेन्ट भी पवित्रता चाहती है। परन्तु गृहस्थ व्यवहार में रहते पवित्र बनाने की ताकत ईश्वर में ही रहती है। समय ऐसा है जो गवर्मेन्ट भी चाहती है कि बच्चे जास्ती पैदा न हो क्योंकि गरीबी बहुत है। तो चाहते हैं भारत में पवित्रता हो, बच्चे कम हों।
बाप कहते हैं - बच्चे पवित्र बनो तो पवित्र दुनिया के मालिक बनेंगे। यह बात उन्हों की बुद्धि में नहीं है। भारत पवित्र था, अभी अपवित्र है। सभी आत्मायें खुद भी चाहती हैं कि पवित्र बनें। यहाँ दु:ख बहुत है। तुम बच्चे जानते हो कि पवित्रता बिगर भारत स्वर्ग हो नहीं सकता। नर्क में है ही दु:ख। अब नर्क तो और कोई चीज़ नहीं। जैसे गरुड़ पुराण में दिखाते हैं वैतरणी नदी है, जिसमें मनुष्य गोते खाते हैं। ऐसे तो कोई नदी है नहीं जहाँ सजायें खाते हो। सजायें तो गर्भ जेल में मिलती हैं। सतयुग में तो गर्भजेल होता नहीं, जहाँ सजायें मिलें। गर्भ महल होता है। इस समय सारी दुनिया जीती जागती नर्क है। जहाँ मनुष्य दु:खी, रोगी हैं। एक दो को दु:ख देते रहते हैं। स्वर्ग में यह कुछ होता नहीं। अब बाप समझाते हैं मैं तुम्हारा बेहद का बाप हूँ। मैं रचयिता हूँ, तो जरूर स्वर्ग नई दुनिया रचूँगा। स्वर्ग के लिए आदि सनातन देवी-देवता धर्म रचूँगा। कहते हैं - तुम मात-पिता.. कल्प-कल्प यह राजयोग सिखाया था। ब्रह्मा द्वारा बैठ सभी वेद शास्त्रों के आदि-मध्य-अन्त का राज़ समझाते हैं। बिल्कुल अनपढ़ को बैठ पढ़ाते हैं। तुम कहते थे ना - हे भगवान आओ। पतित तो वहाँ जा न सकें। तो पावन बनाने लिए उनको जरूर यहाँ आना पड़े। तुम बच्चों को याद दिलाते हैं कि कल्प पहले भी तुमको राजयोग सिखाया था। पूछा जाता है कि आगे कभी यह नॉलेज ली है? तो कहते हैं - हाँ, 5 हजार वर्ष पहले हमने यह ज्ञान लिया था। यह बातें हैं नई। नया युग, नया धर्म फिर से स्थापन होता है। सिवाए ईश्वर के यह दैवी धर्म कोई स्थापन कर नहीं सकता। ब्रह्मा विष्णु शंकर भी नहीं कर सकते क्योंकि वह देवतायें स्वयं रचना हैं। स्वर्ग का रचयिता, मात-पिता चाहिए। तुमको सुख घनेरे भी यहाँ चाहिए। बाप कहते हैं रचता मैं भी हूँ। तुमको भी ब्रह्मा मुख द्वारा मैंने रचा है। मैं मनुष्य सृष्टि का बीजरूप हूँ। भल कोई कितना भी बड़ा साधू-सन्त आदि हो परन्तु किसके भी मुख से ऐसे नहीं निकलेगा। यह हैं गीता के अक्षर। परन्तु जिसने कहा है वही कह सकता है। दूसरा कोई कह न सके। सिर्फ फ़र्क यह है कि निराकार के बदले श्रीकृष्ण को भगवान कह देते हैं। बाप कहते हैं मैं मनुष्य सृष्टि का बीजरूप, परमधाम में रहने वाला निराकार परमात्मा हूँ। तुम भी समझ सकते हो। साकार मनुष्य तो अपने को बीजरूप कह न सकें। ब्रह्मा, विष्णु, शंकर भी नहीं कह सकते। यह तो जानते हैं कि सबको रचने वाला शिवबाबा है। मैं दैवी धर्म की स्थापना कर रहा हूँ। ऐसे कहने की भी कोई में ताकत नहीं। भल अपने को श्रीकृष्ण कहलायें, ब्रह्मा कहलायें, शंकर कहलायें.. बहुत अपने को अवतार भी कहलाते हैं। परन्तु है सब झूठ। यहाँ आकर जब सुनेंगे तो समझेंगे बरोबर बाप तो एक है, अवतार भी एक है। वह कहते हैं मैं तुमको साथ ले जाऊंगा। ऐसे कहने की भी कोई में ताकत नहीं। 5 हजार वर्ष पहले भी गीता के भगवान शिवबाबा ने कहा था, जिसने ही आदि सनातन धर्म की स्थापना की थी, वही अब कर रहे हैं। गाया हुआ भी है मच्छरों सदृश्य आत्मायें गई। तो बाप गाइड बन सभी को आए लिबरेट करते हैं। अब कलियुग का अन्त है, उसके बाद सतयुग आना है तो जरूर आकर पवित्र बनाए पवित्र दुनिया में ले जायेगा। गीता में कुछ न कुछ अक्षर हैं। समझते हैं इस धर्म के लिए शास्त्र तो चाहिए ना। तो गीता शास्त्र बैठ बनाया है। सर्वशास्त्रमई शिरोमणी नम्बरवन माता, परन्तु नाम बदल दिया है। बाप जो इस समय एक्ट करते हैं वह थोड़ेही द्वापर में लिखेंगे। गीता फिर भी वही निकलेगी। ड्रामा में यही गीता नूँधी हुई है। जैसे बाप फिर से मनुष्य को देवता बनाते हैं वैसे शास्त्र भी बाद में कोई फिर से बैठ लिखेंगे। सतयुग में कोई शास्त्र नहीं होगा। बाप सारे चक्र का राज़ बैठ समझाते हैं। तुम समझते हो हमने यह 84 जन्मों का चक्र पूरा किया। आदि सनातन देवी-देवता धर्म वाले ही मैक्सीमम 84 जन्म लेते हैं। बाकी मनुष्यों की तो बाद में वृद्धि होती है। वह थोड़ेही इतने जन्म लेंगे? बाप इस ब्रह्मा मुख से बैठ समझाते हैं। यह जो दादा है, जिसका हमने तन लोन लिया है वह भी अपने जन्मों को नहीं जानते थे। यह है व्यक्त - प्रजापिता ब्रह्मा। वह है अव्यक्त। हैं तो दोनों एक। तुम भी इस ज्ञान से सूक्ष्मवतनवासी फरिश्ते बन रहे हो। सूक्ष्मवतनवासियों को फरिश्ता कहते हैं क्योंकि हड्डी मास नहीं है। ब्रह्मा विष्णु शंकर को भी हड्डी मास नहीं है, फिर उन्हों के चित्र कैसे बनाते हैं। शिव का भी चित्र बनाते हैं। है तो वह स्टॉर। उनका भी रूप बनाते हैं। ब्रह्मा विष्णु शंकर तो सूक्ष्म हैं। जैसे मनुष्यों का बनाते हैं वैसे शंकर का तो बना न सकें क्योंकि उनका हड्डी मास का शरीर तो है नहीं। हम तो समझाने लिए ऐसे स्थूल बनाते हैं। परन्तु तुम भी देखते हो कि वह सूक्ष्म है। अच्छा-
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का यादप्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।
रात्रि क्लास - 13-7-68
मनुष्य दो चीज़ को जरूर चाहते हैं। एक है शान्ति, दूसरा सुख। विश्व में शान्ति वा अपने लिये शान्ति। विश्व पर सुख वा अपने लिये सुख की चाह रहती है मनुष्यों को। तो पूछना होता है कि अभी अशान्ति है तो जरूर कब शान्ति हुई होगी! परन्तु वह कब कैसे होती है, अशान्ति क्यों हुई, यह कोई को पता ही नहीं है क्योंकि घोर अंधियारे में हैं। तुम शान्ति और सुख के लिये सबको बहुत अच्छा रास्ता बताते हो। तो सुनकर उन्हें खुशी होती है, लेकिन जब सुनते हैं पावन भी बनना है तो ठण्डे पड़ जाते हैं। यह विकार है सभी का दुश्मन और फिर सभी का प्यारा है। इसको छोड़ने में हृदय विदीरण होता है। नाम भी है विष। फिर भी छोड़ते नहीं हैं। तुम कितना माथा मारते हो फिर भी हार खा लेते हैं। सारी पवित्रता की ही बात है। इनमें बहुत फेल होते हैं। कोई कन्या को देखा तो आकर्षण होती है। क्रोध वा लोभ वा मोह की आकर्षण नहीं होती है। काम महाशत्रु है। इन पर जीत पाना महावीर का काम है। देह-अभिमान के बाद पहले काम ही आता है। इन पर जीत पानी है। जो पवित्र हैं उनके आगे अपवित्र कामी मनुष्य नमन करते हैं। कहते हैं हम विकारी, आप निर्विकारी। ऐसे नहीं कहते हम क्रोधी लोभी.....। सारी बात विकार की है। शादी करते ही हैं विकार के लिये, यह फुरना रहता है माँ बाप को। बड़े हों तो पैसा भी देंगे, विकार में भी जायेंगे। विकार में न जाये तो झगड़ा मच जाये। तुम बच्चों को समझाना होता है यह (देवतायें) सम्पूर्ण निर्विकारी थे। तुम्हारे पास एमआब्जेक्ट सामने है। नर से नारायण राजाओं का भी राजा बनना है। चित्र सामने है। इसको सतसंग नहीं कहा जाता। यह पाठशाला है। सच्चा सतसंग सच्चे बाप के साथ तब हो जब सम्मुख राजयोग सिखावे। सत का संग चाहिए। वही गीता का ज्ञान देते हैं अर्थात राजयोग सिखलाते हैं। बाप कोई गीता सुनाते नहीं। मनुष्य समझते हैं नाम है गीता पाठशाला तो जाकर गीता सुने। इतनी कशिश होती है। यह सच्ची गीता पाठशाला है जहाँ एक सेकण्ड में सद्गति, हेल्थ, वेल्थ और हैपीनेस मिलती है। तो पूछे सच्ची गीता पाठशाला क्यों लिखते हो? सिर्फ गीता पाठशाला लिखना कामन हो जाता है। सच्ची अक्षर पढ़ने से खैंच हो सकती है, शायद झूठी भी है। तो “सच्ची'' अक्षर जरूर लिखना पड़े। पावन दुनिया सतयुग को पतित दुनिया कलियुग को कहा जाता है। सतयुग में यह पावन थे। कैसे बने सो सिखलाते हैं। बाप ब्रह्मा द्वारा पढ़ाते हैं। नहीं तो पढ़ायेंगे कैसे। यह यात्रा समझेंगे वही जिन्होंने कल्प पहले समझा है। भक्ति मार्ग के दुबन में फँसे हुए हैं। भक्ति का भभका बहुत है। यह तो कुछ भी नहीं है। सिर्फ स्मृति में रखो- अभी वापस जाना है। पवित्र बनकर जाना है। इसके लिये याद में रहना है। बाप जो स्वर्ग का मालिक बनाते हैं उनको याद नहीं कर सकते! मुख्य बात यह है। सभी कहते हैं इसमें ही मेहनत है। बच्चे भाषण तो अच्छा करते हैं परन्तु योग में रहकर समझायें तो असर भी अच्छा होगा। याद में तुमको ताकत मिलती है। सतोप्रधान बनने से सतोप्रधान विश्व के मालिक बनेंगे। याद को नेष्ठा कहेंगे क्या! हम आधा घण्टा नेष्ठा में बैठे, यह रांग है। बाप सिर्फ कहते हैं याद में रहो। सामने बैठ सिखलाने की दरकार नहीं। बेहद बाप को बहुत लव से याद करना है क्योंकि बहुत खजाना देते हैं। याद से खुशी का पारा चढ़ना चाहिए। अतीन्द्रिय सुख फील होगा। बाप कहते हैं तुम्हारी यह लाईफ बहुत वैल्युबुल है, इनको तन्दुरुस्त रखना है। जितना जीयेंगे उतना खजाना लेंगे। खजाना पूरा तब मिलेगा जबकि हम सतोप्रधान बन जायेंगे। मुरली में भी बल होगा। तलवार में जौहर होता है ना। तुम्हारे में भी याद का जौहर पड़े तब तलवार तीखी हो। ज्ञान में इतना जौहर नहीं है इसलिये किसको असर नहीं होता है। फिर उनके कल्याण लिये बाबा को आना है। जब तुम याद में जौहर भरेंगे तो फिर विद्वान आचार्य आदि को अच्छा तीर लगेगा इसलिए बाबा कहते हैं चार्ट रखो। कई कहते हैं बाबा को बहुत याद करते हैं परन्तु मुख नहीं खुलता। तुम याद में रहो तो विकर्म विनाश होंगे। अच्छा! बच्चों को गुडनाईट।
धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) घर में रहते भी रूहानी सेवा करनी है। पवित्र बनना और बनाना है।
2) इस जीते जागते नर्क में रहते हुए भी बेहद के बाप से स्वर्ग का वर्सा लेना है। किसी को भी दु:ख नहीं देना है।
वरदान:- अपनी सर्व विशेषताओं को कार्य में लगाकर उनका विस्तार करने वाले सिद्धि स्वरूप भव
जितना-जितना अपनी विशेषताओं को मन्सा सेवा वा वाणी और कर्म की सेवा में लगायेंगे तो वही विशेषता विस्तार को पाती जायेगी। सेवा में लगाना अर्थात् एक बीज से अनेक फल प्रगट करना। इस श्रेष्ठ जीवन में जो जन्म सिद्ध अधिकार के रूप में विशेषतायें मिली हैं उनको सिर्फ बीज रूप में नहीं रखो, सेवा की धरनी में डालो तो फल स्वरूप अर्थात् सिद्धि स्वरूप का अनुभव करेंगे।
स्लोगन:- विस्तार को न देख सार को देखो और स्वयं में समा लो - यही तीव्र पुरुषार्थ है।
22.02.2023 HINDI MURLI
सहज सिद्धि प्राप्त करने के लिए ज्ञान स्वरूप प्रयोगी आत्मा बनो
आज ज्ञान दाता वरदाता अपने ज्ञानी तू आत्मा, योगी तू आत्मा बच्चों को देख रहे हैं। हर एक बच्चा ज्ञान स्वरूप और योगयुक्त कहाँ तक बना है? ज्ञान सुनने और सुनाने के निमित्त बने हैं वा ज्ञान स्वरूप बने हैं? समय प्रमाण योग लगाने वाले बने हैं वा सदा योगी जीवन अर्थात् हर कर्म में योगयुक्त, युक्तियुक्त, स्वत: वा सदा के योगी बने हैं? किसी भी ब्राह्मण आत्मा से कोई भी पूछेंगे कि ज्ञानी और योगी हैं तो क्या कहेंगे? सभी ज्ञानी और योगी हैं ना? ज्ञान स्वरूप बनना अर्थात् हर संकल्प, बोल और कर्म समर्थ होगा। व्यर्थ समाप्त होगा क्योंकि जहाँ समर्थ है वहाँ व्यर्थ हो नहीं सकता। जैसे प्रकाश और अन्धियारा साथ-साथ नहीं होता। तो ‘ज्ञान' प्रकाश है, ‘व्यर्थ' अन्धकार है। वर्तमान समय व्यर्थ को समाप्त करने का अटेन्शन रखना है। सबसे मुख्य बात संकल्प रूपी बीज को समर्थ बनाना है। अगर संकल्प रूपी बीज समर्थ है तो वाणी, कर्म, सम्बन्ध सहज ही समर्थ हो ही जाता है। तो ज्ञान स्वरूप अर्थात् हर समय, हर संकल्प, हर सेकेण्ड समर्थ।
योगी तू आत्मा सभी बने हो लेकिन हर संकल्प स्वत: योगयुक्त, युक्तियुक्त हो, इसमें नम्बरवार हैं। क्यों नम्बर बने? जब विधाता भी एक है, विधि भी एक है फिर नम्बर क्यों? बापदादा ने देखा योगी तो बने हैं लेकिन प्रयोगी कम बनते हैं। योग करने और कराने दोनों में सभी होशियार हैं। ऐसा कोई है जो कहे कि योग कराना नहीं आता? जैसे योग करने-कराने में योग्य हो, ऐसे ही प्रयोग करने में योग्य बनना और बनाना - इसको कहा जाता है योगी जीवन अर्थात् योगयुक्त जीवन। अभी प्रयोगी जीवन की आवश्यकता है। जो योग की परिभाषा जानते हो, वर्णन करते हो वो सभी विशेषतायें प्रयोग में आती हैं? सबसे पहले अपने आपमें यह चेक करो कि अपने संस्कार परिवर्तन में कहाँ तक प्रयोगी बने हो? क्योंकि आप सबके श्रेष्ठ संस्कार ही श्रेष्ठ संसार के रचना की नींव हैं। अगर नींव मज़बूत है तो अन्य सभी बातें स्वत: मज़बूत हुई ही पड़ी हैं। तो यह देखो कि संस्कार समय पर कहाँ धोखा तो नहीं देते हैं? श्रेष्ठ संस्कार को परिवर्तन करने वाले कैसे भी व्यक्ति हो, वस्तु हो, परिस्थिति हो, योग के प्रयोग करने वाली आत्मा को श्रेष्ठ से साधारणता में हिला नहीं सकते। ऐसे नहीं कि बात ही ऐसी थी, व्यक्ति ही ऐसा था, वायुमण्डल ऐसा था इसलिये श्रेष्ठ संस्कार को परिवर्तन कर साधारण वा व्यर्थ बना दिया, तो क्या इसको प्रयोगी आत्मा कहेंगे? अगर समय पर योग की शक्तियों का प्रयोग नहीं हुआ तो इसको क्या कहा जायेगा? तो पहले इस फाउण्डेशन को देखो कि कहाँ तक समय पर प्रयोगी बने हैं? अगर स्व के संस्कार परिवर्तक नहीं बने हैं तो नये संसार परिवर्तक कैसे बनेंगे?
प्रयोगी आत्मा की पहली निशानी है संस्कार के ऊपर सदा प्रयोग में विजयी। दूसरी निशानी प्रकृति द्वारा आने वाली परिस्थितियों पर योग के प्रयोग द्वारा विजयी। समय प्रति समय प्रकृति की हलचल भी योगी आत्मा को अपने तरफ आकर्षित करती है। ऐसे समय पर योग की विधि प्रयोग में आती है? कभी योगी पुरुष को वा पुरुषोत्तम आत्मा को प्रकृति प्रभावित तो नहीं करती? क्योंकि ब्राह्मण आत्मायें पुरुषोत्तम आत्मायें हो। प्रकृति पुरुषोत्तम आत्माओं की दासी है। मालिक, दासी के प्रभाव में आ जाये इसको क्या कहेंगे? आजकल पुरुषोत्तम आत्माओं को प्रकृति साधनों और सैलवेशन के रूप में प्रभावित करती है। साधन वा सैलवेशन के आधार पर योगी जीवन है। साधन वा सैलवेशन कम तो योगयुक्त भी कम - इसको कहा जाता है प्रभावित होना। योगी वा प्रयोगी आत्मा की साधना के आगे साधन स्वत: ही स्वयं आते हैं। साधन साधना का आधार नहीं हो लेकिन साधना साधनों को स्वत: आधार बनायेगी, इसको कहा जाता है प्रयोगी आत्मा। तो चेक करो - संस्कार परिवर्तन विजयी और प्रकृति के प्रभाव के विजयी कहाँ तक बने हैं? तीसरी निशानी है - विकारों पर विजयी। योगी वा प्रयोगी आत्मा के आगे ये पांच विकार, जो दूसरों के लिये जहरीले सांप है लेकिन आप योगी-प्रयोगी आत्माओं के लिये ये सांप गले की माला बन जाते हैं। आप ब्राह्मणों के और ब्रह्मा बाप के अशरीरी तपस्वी शंकर स्वरूप का यादगार अभी भी भक्त लोग पूजते और गाते रहते हैं। दूसरा याद-गार - ये सांप आपके अधीन ऐसे बन जाते जो आपके खुशी में नाचने की स्टेज बन जाते हैं। जब विजयी बन जाते हैं तो क्या अनुभव करते हैं? क्या स्थिति होती है? खुशी में नाचते रहते हैं ना। तो यह स्थिति स्टेज के रूप में दिखाई है। स्थिति को भी स्टेज कहा जाता है। ऐसे विकारों पर विजय हो - इसको कहा जाता है प्रयोगी। तो यह चेक करो कहाँ तक प्रयोगी बने हैं? अगर योग का समय पर प्रयोग नहीं, योग की विधि से समय पर सिद्धि नहीं तो यथार्थ विधि कहेंगे? समय अपनी तीव्र गति समय प्रति समय दिखा रहा है। अनेकता, अधर्म, तमोप्रधानता हर क्षेत्र में तीव्र गति से बढ़ता जा रहा है। ऐसे समय पर आपके योग के विधि की वृद्धि वा विधि के सिद्धि में वृद्धि तीव्र गति से होना आवश्यक है। नम्बर आगे बढ़ने का आधार है प्रयोगी बनने की सहज विधि। तो बापदादा ने क्या देखा समय पर प्रयोग करने में तीव्र गति के बजाय साधारण गति है। अभी इसको बढ़ाओ। तो क्या होगा सिद्धि स्वरूप अनुभव करते जायेंगे। आपके जड़ चित्रों द्वारा सिद्धि प्राप्त करने का अनुभव करते रहते हैं। चैतन्य में सिद्धि स्वरूप बने हो तब यह यादगार चला आ रहा है। रिद्धि-सिद्धि वाले नहीं, विधि से सिद्धि। तो समझा क्या करना है? है सब कुछ लेकिन समय पर प्रयोग करना और प्रयोग सफल होना इसको कहा जाता है ज्ञान स्वरूप आत्मा। ऐसे ज्ञान स्वरूप आत्मायें अति समीप और अति प्रिय हैं। अच्छा!
सदा योग की विधि द्वारा श्रेष्ठ सिद्धि को अनुभव करने वाले, सदा साधारण संस्कार को श्रेष्ठ संस्कार में परिवर्तन करने वाले, संस्कार परिवर्तक आत्माओं को, सदा प्रकृति जीत, विकारों पर जीत प्राप्त करने वाले विजयी आत्माओं को, सदा प्रयोग के गति को तीव्र अनुभव करने वाले ज्ञान स्वरूप, योगयुक्त योगी आत्माओं को बापदादा का याद-प्यार और नमस्ते।
(24 नवम्बर को दो कुमारियों के समर्पण समारोह के बाद रात्रि 10 बजे दादी आलराउन्डर ने अपना पुराना चोला छोड़ बापदादा की गोद ली, 25 तारीख दोपहर में उनका अन्तिम संस्कार किया गया, सायंकाल मुरली के पश्चात दादियों से मुलाकात करते समय बापदादा ने जो महावाक्य उच्चारे वह इस प्रकार हैं)
खेल में भिन्न-भिन्न खेल देखते रहते हो। साक्षी हो खेल देखने में मज़ा आता है ना। चाहे कोई उत्सव हो, चाहे कोई शरीर छोड़े दोनों ही क्या लगता है? खेल में खेल लगता है। और लगता भी ऐसे ही है ना जैसे खेल होता है और समय प्रमाण समाप्त हो जाता है। ऐसे ही जो हुआ सहज समाप्त हुआ तो खेल ही लगता है। हर आत्मा का अपना-अपना पार्ट है। सर्व आत्माओं की शुभ भावना, अनेक आत्माओं की शुभ भावना प्राप्त होऩा यह भी हर आत्मा के भाग्य की सिद्धि है। तो जो भी हुआ, क्या देखा? खेल देखा या मृत्यु देखा? एक तरफ वहीं अलौकिक स्वयंवर देखा और दूसरे तरफ चोला बदलने का खेल देखा। लेकिन दोनों क्या लगे? खेल में खेल। फ़र्क पड़ता है क्या? स्थिति में फ़र्क पड़ता है? अलौकिक स्वयंवर देखने में और चोला बदलते हुए देखने में फ़र्क पड़ा? थोड़ी लहर बदली हुई कि नहीं? साक्षी होकर खेल देखो तो वो अपने विधि का और वो अपने विधि का। सहज नष्टोमोहा होऩा यह बहुतकाल के योग के विधि की सिद्धि है। तो नष्टोमोहा, सहज मृत्यु का खेल देखा। इस खेल का क्या रहस्य देखा? देह के स्मृति से भी उपराम। चाहे व्याधि द्वारा, चाहे विधि द्वारा और कोई भी आकर्षण अन्त समय आकर्षित नहीं करे। इसको कहा जाता है सहज चोला बदली करना। तो क्या करना है? नष्टो-मोहा, सेन्टर भी याद नहीं आये। (टीचर्स को देखते हुए) ऐसे नहीं कोई जिज्ञासू याद आ जाये, कोई सेन्टर की वस्तु याद आ जाये, कुछ किनारे किया हुआ याद आ जाये...। सबसे न्यारे और बाप के प्यारे। पहले से ही किनारे छुटे हुए हों। कोई किनारे को सहारा नहीं बनाना है। सिवाए मंज़िल के और कोई लगाव नहीं हो। अच्छा!
निर्मलशान्ता दादी से मुलाकात:- संगठन अच्छा लगता है? संगठन की विशेष शोभा हो। सबकी नज़र कितने प्यार से आप सबके तरफ जाती है! जब तक जितनी सेवा है उतनी सेवा शरीर द्वारा होनी ही है। कैसे भी करके शरीर चलता ही रहेगा। शरीर को चलाने का ढंग आ गया है ना। अच्छा चल रहा है क्योंकि बाप की और सबकी दुआयें हैं। खुश रहना है और खुशी बांटनी है और क्या काम है। सब देख-देख कितने खुश होते हैं तो खुशी बांट रहे हैं ना। खा भी रहे हैं, बांट भी रहे हैं। आप सब एक-एक दर्शनीय मूर्त हो। सबकी नज़र निमित्त आत्माओं तरफ जाती है तो दर्शनीय मूर्त हो गये ना। अच्छा!
अव्यक्त बापदादा की पर्सनल मुलाकात
1) ब्राह्मण जीवन का आधार - याद और सेवा:- ड्रामा अनुसार ब्राह्मण जीवन में सभी को सेवा का चांस मिला हुआ है ना क्योंकि ब्राह्मण जीवन का आधार ही है याद और सेवा। अगर याद और सेवा कमजोर है तो जैसे शरीर का आधार कमजोर हो जाता है तो शरीर दवाइयों के धक्के से चलता है ना। तो ब्राह्मण जीवन में अगर याद और सेवा का आधार मज़बूत नहीं, कमजोर है, तो वह ब्राह्मण जीवन भी कभी तेज़ चलेगा, कभी ढीला चलेगा, धक्के से चलेगा। कोई सहयोग मिले, कोई साथ मिले, कोई सरकमस्टांस मिले तो चलेंगे, नहीं तो ढीले हो जायेंगे इसलिए याद और सेवा का विशेष आधार सदा शक्तिशाली चाहिए। दोनों ही शक्तिशाली हों। सेवा बहुत है, याद कमजोर है या याद बहुत अच्छी है, सेवा कमजोर है तो भी तीव्रगति नहीं हो सकती। याद और सेवा दोनों में तीव्रगति चाहिए। शक्तिशाली चाहिए। तो दोनों ही शक्तिशाली हैं या फ़र्क पड़ जाता है? कभी सेवा ज्यादा हो जाती, कभी याद ज्यादा हो जाती? दोनों साथ-साथ हों। याद और नि:स्वार्थ सेवा। स्वार्थ की सेवा नहीं, नि:स्वार्थ सेवा है तो माया जीत बनना बहुत सहज है। हर कर्म में, कर्म की समाप्ति के पहले सदा विजय दिखाई देगी, इतना अटल निश्चय का अनुभव होगा कि विजय तो हुई पड़ी है। अगर ब्राह्मण आत्माओं की विजय नहीं होगी तो किसकी होगी? क्षत्रियों की होगी क्या? ब्राह्मणों की विजय है ना। क्वेश्चन मार्क नहीं होगा। कर तो रहे हैं, चल तो रहे हैं, देख लेंगे, हो जायेगा, होना तो चाहिए... तो ये शब्द नहीं आयेंगे। पता नहीं क्या होगा, होगा या नहीं होगा... यह निश्चय के बोल हैं? निश्चयबुद्धि विजयी यह गायन है ना? तो जब प्रैक्टिकल हुआ है तब तो गायन है। निश्चयबुद्धि की निशानी है विजय निश्चित। जैसे किसी भी प्रकार की किसको शक्ति होती है चाहे धन की हो, बुद्धि की हो, सम्बन्ध-सम्पर्क की हो तो उसको निश्चय रहता है यह क्या बड़ी बात है, यह तो कोई बात ही नहीं है। आपके पास तो सब शक्तियां हैं। धन की शक्ति है कि धन की शक्ति करोड़पतियों के पास है? सबसे बड़ा धन है अविनाशी धन, जो सदा साथ है। तो धन की शक्ति भी है, बुद्धि की शक्ति भी है, पोज़ीशन की शक्ति भी है। जो भी शक्तियां गाई हुई हैं सब शक्तियां आप में हैं। हैं या कभी प्राय: लोप हो जाती हैं? इन्हें इमर्ज रूप में अनुभव करो। ऐसे नहीं हाँ, हूँ तो सर्वशक्तिमान् का बच्चा लेकिन अनुभव नहीं होता। तो सभी भरपूर हो कि थोड़ा-थोड़ा खाली हो? समय पर विधि द्वारा सिद्धि प्राप्त हो। ऐसे नहीं समय पर हो नहीं और वैसे नशा हो कि बहुत शक्तियां हैं। कभी अपनी शक्तियों को भूलना नहीं, यूज़ करते जाओ। अगर स्व प्रति कार्य में लगाना आता है तो दूसरे के कार्य में भी लगा सकते हैं। पाण्डवों में शक्ति आ गई या कभी क्रोध आता है? थोड़ा-थोड़ा क्रोध आता है? कोई क्रोध करे तो क्रोध आता है, कोई इन्सल्ट करे तो क्रोध आता है? यह तो ऐसे ही हुआ जैसे दुश्मन आता है तो हार होती है। माताओं को थोड़ा-थोड़ा मोह आता है? पाण्डवों को अपने हर कल्प के विजयपन की सदा खुशी इमर्ज होनी चाहिये। कभी भी कोई पाण्डवों को याद करेंगे तो पाण्डव शब्द से विजय सामने आयेगी ना। पाण्डव अर्थात् विजयी। पाण्डवों की कहानी का रहस्य ही क्या है? विजय है ना। तो हर कल्प के विजयी। इमर्ज रूप में नशा रहे। मर्ज नहीं। अच्छा!
2) सर्व द्वारा मान प्राप्त करने के लिए निर्मान बनो:- सभी अपने को सदा कोटों में कोई और कोई में भी कोई श्रेष्ठ आत्मा अनुभव करते हो? कि कोटों में कोई जो गाया हुआ है वो और कोई है? या आप ही हो? तो कितना एक-एक आत्मा का महत्व है अर्थात् हर आत्मा महान् है। तो जो जितना महान् होता है, महानता की निशानी जितना महान् उतना निर्मान क्योंकि सदा भरपूर आत्मा है। जैसे वृक्ष के लिये कहते हैं ना जितना भरपूर होगा उतना झुका हुआ होगा और निर्मानता ही सेवा करती है। जैसे वृक्ष का झुकना सेवा करता है, अगर झुका हुआ नहीं होगा तो सेवा नहीं करेगा। तो एक तरफ महानता है और दूसरे तरफ निर्मानता है। और जो निर्मान रहता है वह सर्व द्वारा मान पाता है। स्वयं निर्मान बनेंगे तो दूसरे मान देंगे। जो अभिमान में रहता है उसको कोई मान नहीं देते। उससे दूर भागेंगे। तो महान् और निर्मान है या नहीं है उसकी निशानी है कि निर्मान सबको सुख देगा। जहाँ भी जायेगा, जो भी करेगा वह सुखदायी होगा। इससे चेक करो कि कितने महान् हैं? जो भी सम्बन्ध-सम्पर्क में आये सुख की अनुभूति करे। ऐसे है या कभी दु:ख भी मिल जाता है? निर्मानता कम तो सुख भी सदा नहीं दे सकेंगे। तो सदा सुख देते, सुख लेते या कभी दु:ख देते, दु:ख लेते? चलो देते नहीं लेकिन ले भी लेते हो? थोड़ा फ़ील होता है तो ले लिया ना। अगर कोई भी बात किसी की फ़ील हो जाती है तो इसको कहेंगे दु:ख लेना। लेकिन कोई दे और आप नहीं लो, यह तो आपके ऊपर है ना। जिसके पास होगा ही दु:ख वो क्या देगा? दु:ख ही देगा ना। लेकिन अपना काम है सुख लेना और सुख देना। ऐसे नहीं कि कोई दु:ख दे रहा है तो कहेंगे मैं क्या करूँ? मैंने नहीं दिया लेकिन उसने दिया। अपने को चेक करना है क्या लेना है, क्या नहीं लेना है। लेने में भी होशियारी चाहिये ना इसलिये ब्राह्मण आत्माओं का गायन है सुख के सागर के बच्चे, सुख स्वरूप सुखदेवा हैं। तो सुख स्वरूप सुखदेवा आत्मायें हो। दु:ख की दुनिया छोड़ दी, किनारा कर लिया या अभी तक एक पांव दु:खधाम में है, एक पांव संगम पर है? ऐसे तो नहीं कि थोड़ा-थोड़ा वहाँ बुद्धि रह गई है? पांव नहीं है लेकिन थोड़ी अंगुली रह गई है? जब दु:खधाम को छोड़ चले तो न दु:ख लेना है न दु:ख देना है। अच्छा!
वरदान:- उड़ती कला द्वारा बाप समान आलराउन्ड पार्ट बजाने वाले चक्रवर्ती भव
जैसे बाप आलराउन्ड पार्टधारी है, सखा भी बन सकते तो बाप भी बन सकते। ऐसे उड़ती कला वाले जिस समय जिस सेवा की आवश्यकता होगी उसमें सम्पन्न पार्ट बजा सकेंगे। इसको ही कहा जाता है आलराउन्ड उड़ता पंछी। वे ऐसे निर्बन्धन होंगे जो जहाँ भी सेवा होगी वहाँ पहुंच जायेंगे। हर प्रकार की सेवा में सफलतामूर्त बनेंगे। उन्हें ही कहा जाता है चक्रवर्ती, आलराउन्ड पार्टधारी।
स्लोगन:- एक दो की विशेषताओं को स्मृति में रख फेथफुल बनो तो संगठन एकमत हो जायेगा।
21.01.2023 HINDI MURLI
“मीठे बच्चे - बाप की दुआयें लेनी हैं तो हर कदम श्रीमत पर चलो, चाल-चलन अच्छी रखो''
प्रश्नः- शिवबाबा की दिल पर कौन चढ़ सकता है?
उत्तर:- जिनकी गैरन्टी ब्रह्मा बाबा लेता कि यह बच्चा सर्विसएबुल है, यह सबको सुख देता है। मन्सा, वाचा, कर्मणा किसी को दु:ख नहीं देता। ऐसे जब यह (ब्रह्मा बाबा) बोले, तब शिवबाबा की दिल पर चढ़ सकते हैं।
प्रश्नः- इस समय तुम रूहानी सर्वेन्ट बाबा के साथ कौन सी सेवा करते हो?
उत्तर:- सारे विश्व की तो क्या लेकिन 5 तत्वों को भी पावन बनाने की सेवा तुम रूहानी सर्वेन्ट करते हो इसलिए तुम हो सच्चे-सच्चे सोशल वर्कर।
गीत:- ले लो दुआयें माँ बाप की...
ओम् शान्ति। बच्चों ने गीत सुना। ऐसे तो लौकिक माँ-बाप की दुआयें अनेक लेते हैं। बच्चे पांव पड़ते हैं माँ-बाप आशीर्वाद करते हैं। यह ढिंढोरा लौकिक माँ-बाप के लिए नहीं पिटाया जाता है। ढिंढोरा अर्थात् जिसको बहुत सुनें। यह तो बेहद बाप के लिए ही गाया जाता है तुम मात-पिता हम बालक तेरे... तुम्हारी कृपा वा दुआ से सुख घनेरे। भारत में ही यह महिमा गाई जाती है। जरूर भारत में ही यह हुआ है तब तो गाया जाता है। एकदम बेहद में चला जाना चाहिए। बुद्धि कहती है स्वर्ग का रचयिता बाप एक ही है। स्वर्ग में तो सभी सुख हैं। वहाँ दु:ख का नाम-निशान हो नहीं सकता इसलिए ही गाते हैं कि दु:ख में सिमरण सब करें सुख में करे न कोई। आधाकल्प दु:ख है तो सभी सिमरण करते हैं। सतयुग में अथाह सुख हैं, तो वहाँ सिमरण नहीं करते हैं। मनुष्य पत्थरबुद्धि होने कारण कुछ भी समझते नहीं हैं। कलियुग में तो अथाह दु:ख हैं। कितनी मारामारी है। कितने भी पढ़े लिखे विद्धान हैं, परन्तु इन गीतों का अर्थ बिल्कुल नहीं जानते हैं। गाते हैं तुम मात पिता... परन्तु समझते नहीं हैं कि कौन से माता पिता की महिमा है। यह तो बहुतों की बात है ना। ईश्वर की सन्तान तो सभी हैं, परन्तु इस समय तो सभी दु:खी हैं। सुख घनेरे तो किसको नहीं हैं। कृपा से तो सुख मिलना चाहिए। अकृपा से दु:ख होता है। बाप तो कृपालु गाया हुआ है। साधू सन्तों को भी कृपालु कहते हैं।
अब तुम बच्चे जानते हो भक्ति मार्ग में गाते हैं तुम मात पिता... यह बिल्कुल यथार्थ है, परन्तु कोई बुद्धिवान होगा तो पूछेगा कि परमात्मा को तो गॉड फादर कहा जाता है, उनको फिर मदर कैसे कहते हैं? तो उनकी बुद्धि जगत अम्बा के तरफ जायेगी। जब जगत अम्बा की तरफ बुद्धि जाती है तो फिर जगत पिता के तरफ भी बुद्धि जानी चाहिए। अब ब्रह्मा सरस्वती यह कोई भगवान तो नहीं हैं। यह महिमा उनकी हो नहीं सकती। उनके आगे भी माता-पिता कहना राँग है। मनुष्य गाते तो परमपिता परमात्मा के लिए हैं, परन्तु जानते नहीं हैं कि वह मात-पिता कैसे बनते हैं। अब तुम बच्चों को कहा जाता है ले लो, ले लो दुआयें माँ बाप की... अर्थात् श्रीमत पर चलो। अपनी चाल-चलन अच्छी हो तो अपने पर आपेही दुआयें हो जायेंगी। अगर चलन अच्छी नहीं होगी, किसको दु:ख देते रहेंगे, मात-पिता को याद नहीं करेंगे अथवा दूसरों को याद नहीं करायेंगे तो दुआयें मिल नहीं सकती। फिर इतना सुख भी नहीं पा सकेंगे। बाप की दिल पर चढ़ नहीं सकेंगे। इस बाप की (ब्रह्मा की) दिल पर चढ़े तो गोया शिवबाबा की दिल पर चढ़े। यह गायन है ही उस मात-पिता का। बुद्धि उस बेहद के मात-पिता के तरफ चली जानी चाहिए। ब्रह्मा की तरफ भी कोई की बुद्धि नहीं जाती है। भल जगत अम्बा की तरफ कोई की जाती है। उनका भी मेला लगता है, परन्तु आक्यूपेशन को कोई जानते ही नहीं। तुम जानते हो हमारी सच्ची-सच्ची माता कायदे अनुसार यह ब्रह्मा है। यह भी समझना है। याद भी ऐसे करेंगे। यह माता भी है तो ब्रह्मा बाबा भी है। लिखते हैं शिवबाबा केयरआफ ब्रह्मा। तो माता भी हो जाती है तो पिता भी हो जाता। अब बच्चों को इस पिता की दिल पर चढ़ना है क्योंकि इनमें ही शिवबाबा प्रवेश होते हैं। यह जब गैरन्टी देते हैं कि हाँ बाबा यह बच्चा बहुत अच्छा सर्विसएबुल है, सभी को सुख देने वाला है। मन्सा-वाचा-कर्मणा किसको दु:ख नहीं देता है तब ही शिवबाबा की दिल पर चढ़ सकता है। मन्सा-वाचा-कर्मणा से जो करो, जो बोलो उससे सबको सुख मिले। दु:ख किसको नहीं देना है। दु:ख देने का विचार पहले मन्सा में आता है फिर कर्मणा में आने से पाप बनता है। मन्सा तूफान तो जरूर आयेंगे परन्तु कर्मणा में कभी नहीं आओ। अगर कोई रन्ज (नाराज) होता है तो बाप से आकर पूछो - बाबा इस बात से हमारे से यह नाराज रहते हैं, तो बाबा समझायेंगे। कोई भी बात पहले मन्सा में आती है। वाचा भी कर्मणा ही हो गया। अगर बच्चों को माँ-बाप की आशीर्वाद लेनी है तो श्रीमत पर चलना है। यह बड़ी गुह्य बात है जो एक को ही माता पिता कहते हैं। यह ब्रह्मा बाप भी है तो बड़ी माँ भी है। अब यह बाबा किसको माँ कहे? यह माता (ब्रह्मा) अब किसको माँ कहे? इस माँ की तो माँ कोई हो नहीं सकती। जैसे शिवबाबा का कोई बाप नहीं, ऐसे इन्हें अपनी कोई माँ नहीं।
मुख्य बात बच्चों को यह समझाते हैं कि अगर मन्सा, वाचा, कर्मणा किसको दु:ख देंगे तो दु:ख पायेंगे और पद भ्रष्ट हो पड़ेंगे। सच्चे साहेब के आगे सच्चा रहना है, इनसे भी सच्चा रहना है। यह दादा ही सर्टीफिकेट देंगे कि बाबा यह बच्चा बड़ा सपूत है। बाबा महिमा तो करते हैं। जो सर्विसएबुल बच्चे हैं तन-मन-धन से सर्विस करते हैं, कभी भी किसको दु:ख नहीं देते हैं, वही बापदादा और माँ की दिल पर चढ़ते हैं। इनकी दिल पर चढ़े माना उनके तख्त पर चढ़े। हमेशा सपूत बच्चों को यह विचार रहता है कि हम गद्दी नशीन कैसे बनें। यही तात लगी रहती है। गद्दी तो नम्बरवार 8 हैं। फिर 108 फिर 16108 भी हैं, परन्तु अभी हम ऊंच पद पायें। ऐसे तो शोभता नहीं जो दो कला कम हों तब गद्दी पर बैठें। सपूत बच्चे बहुत पुरुषार्थ करेंगे कि हमने अगर अभी लाडले बाबा से सूर्यवंशी का पूरा-पूरा वर्सा नहीं लिया तो कल्प-कल्प नहीं लेंगे। अभी अगर विजय माला में नहीं पिरोये तो कल्प-कल्प नहीं पिरोयेंगे। यह कल्प-कल्प की रेस है। अभी अगर घाटा पड़ा तो कल्प-कल्प पड़ता ही रहेगा। पक्का व्यापारी वह जो श्रीमत पर माँ बाप को पूरा फालो करे, कभी किसको दु:ख न दे। उसमें भी नम्बरवन दु:ख है काम कटारी चलाना।
बाप कहते हैं अच्छा श्रीकृष्ण भगवानुवाच समझो, तो वह भी नम्बरवन है। उनकी बात भी माननी चाहिए तब तो स्वर्ग के मालिक बनेंगे। समझते हैं श्रीकृष्ण भगवान ने श्रीमत से शिक्षा दी है। अच्छा उनकी मत पर चलो। उसने भी कहा है कि काम महाशत्रु है, भला उनको जीतो। इन विकारों को जीतेंगे तब ही कृष्णपुरी में आ सकेंगे। अब श्रीकृष्ण की तो बात नहीं। श्रीकृष्ण तो बच्चा था, वह कैसे मत देंगे। जब बड़ा होकर गद्दी पर बैठेगा तब वह मत देगा। मत देने के लायक बनेंगे तब तो राज्य चलायेंगे ना। अब शिवबाबा तो कहते हैं मुझे निराकारी दुनिया में याद करो। श्रीकृष्ण फिर कहेंगे कि मुझे स्वर्ग में याद करो। वह भी कहते हैं काम महाशत्रु है, इन पर जीत पहनो। वहाँ विष नहीं मिलेगा, तो विष को छोड़ पवित्र बनो। यह तो श्रीकृष्ण का बाप बैठ समझाते हैं। अच्छा समझो मनुष्यों ने मेरा नाम निकाल बच्चे का नाम डाल दिया है, वह भी तो सर्वगुण सम्पन्न है। वह भी कहते हैं, गीता में लिखा हुआ है कि काम महाशत्रु है। उनको भी मानते थोड़ेही हैं। उन पर भी चलते थोड़ेही हैं। समझते हैं श्रीकृष्ण खुद आये तब हम उनकी मत पर चलेंगे तब तक तो गोता ही खाते रहेंगे। संन्यासी आदि कह नहीं सकते कि मैं तुमको राजयोग सिखलाने आया हूँ। यह तो बाप ही समझाते हैं और संगम की ही बात है। श्रीकृष्ण है सतयुग में। उनको भी ऐसा लायक बनाने वाला कोई तो होगा ना। तो शिवबाबा खुद कहते हैं श्रीकृष्ण और उनके सारे घराने को अब मैं स्वर्ग में जाने लायक बना रहा हूँ। बाबा कितनी मेहनत करते हैं कि बच्चे स्वर्ग में चल ऊंच पद पायें। नहीं तो पढ़े लिखे के आगे जाकर भरी उठायेंगे। बाप से तो पूरा वर्सा लेना है। अपने से पूछो हम इतने सपूत हैं? सपूत भी नम्बरवार होते हैं। उत्तम, मध्यम, कनिष्ट। उत्तम तो कभी छिपे नहीं रहते। उनकी दिल में रहम आयेगा हम भारत की सेवा करें। सोशल वर्कर्स भी नम्बरवार होते हैं - उत्तम, मध्यम, कनिष्ट। कई तो बहुत लूटते हैं, माल बेचकर खा जाते हैं। फिर उनको सपूत सोशल वर्कर कैसे कहेंगे? सोशल वर्कर्स तो अपने को बहुत कहलाते हैं क्योंकि सोसायटी की सेवा करते हैं। सच्ची सेवा तो बाप ही करते हैं।
तुम कहते हो कि हम भी बाबा के साथ रूहानी सर्वेन्ट हैं। सारी सृष्टि तो क्या तत्वों को भी पवित्र करते हैं। संन्यासी तो यह नहीं जानते कि तत्व भी इस समय तमोप्रधान हैं, इनको भी सतोप्रधान बनाना है। सतोप्रधान तत्वों से तुम्हारा शरीर भी सतोप्रधान बन जायेगा। बाबा समझाते तो बहुत हैं परन्तु बच्चे फिर भी भूल जाते हैं। याद उनको रहेगा जो औरों को सुनाते रहेंगे। दान नहीं करेंगे तो धारणा भी नहीं होगी। जो अच्छी सर्विस करते हैं, उनका बापदादा भी नाम बाला करते हैं। यह तो बच्चे भी जानते हैं कि सर्विस में कौन-कौन तीखे हैं। जो सर्विस पर हैं वह दिल पर चढ़ते हैं। सदैव फालो माँ-बाप को करना है। उनके ही तख्तनशीन बनना है। जो सर्विस पर होंगे वह दूसरों को सुख देंगे। अपना मुँह दर्पण में देखो कि बाबा का सपूत बच्चा बना हूँ? खुद भी लिख सकते हैं कि हमारी सर्विस का यह चार्ट है। मैं यह-यह सर्विस कर रहा हूँ, आप जज करो। तो बाप को भी मालूम पड़े। खुद भी जज कर सकता है कि मैं उत्तम हूँ, मध्यम हूँ या कनिष्ट हूँ? बच्चे भी जानते हैं कौन महारथी हैं, कौन घोड़ेसवार हैं। कोई भी छिपा नहीं रह सकता है। बाप को पोतामेल भेजे तो बाबा सावधान भी करे। बिगर पोतामेल भी सावधानी तो मिलती रहती है। अब जितना वर्सा लेना हो पूरा-पूरा ले लो। फिर बापदादा से भी सर्टीफिकेट मिलेगा। यह बड़ी माँ बैठी है, इनसे सर्टीफिकेट मिल सकता है। इस वन्डर-फुल मम्मी को कोई मम्मी नहीं। जैसे उस बाप को कोई बाप नहीं। फिर मम्मा फीमेल्स में नम्बरवन है। ड्रामा में जगत अम्बा गाई हुई है। सर्विस भी बहुत की है। जैसे बाबा जाते हैं, मम्मा भी जाती थी। छोटे-छोटे गांवों में सर्विस करती थी। सबमें तीखी गई। बाबा के साथ तो बड़ा बाबा है, इसलिए बच्चों को इनकी सम्भाल रखनी पड़ती है। सतयुग में प्रजा बहुत सुखी रहती है। अपने महल, गायें, बैल आदि सब कुछ होते हैं।
अच्छा - बच्चे, खुश रहो आबाद रहो, न बिसरो न याद रहो क्योंकि याद तो शिवबाबा को करना है। अपने शरीर को भी भूल जाना है तो औरों को कैसे याद करें। अच्छा!
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का यादप्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।
धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) कोई को भी नाराज नहीं करना है। मन्सा-वाचा-कर्मणा सबको सुख दे बाप की और परिवार की दुआयें लेनी हैं।
2) सपूत बच्चा बन भारत की रूहानी सेवा करनी है। रहमदिल बन रूहानी सोशल वर्कर बनना है। तन-मन-धन से सेवा करनी है। सच्चे साहेब के साथ सच्चा रहना है।
वरदान:- बोल पर डबल अन्डरलाइन कर हर बोल को अनमोल बनाने वाले मा. सतगुरू भव
आप बच्चों के बोल ऐसे हों जो सुनने वाले चात्रक हों कि यह कुछ बोलें और हम सुनें - इसको कहा जाता है अनमोल महावाक्य। महावाक्य ज्यादा नहीं होते। जब चाहे तब बोलता रहे - इसको महावाक्य नहीं कहेंगे। आप सतगुरू के बच्चे मास्टर सतगुरू हो इसलिए आपका एक-एक बोल महावाक्य हो। जिस समय जिस स्थान पर जो बोल आवश्यक है, युक्तियुक्त है, स्वयं और दूसरी आत्माओं के लाभदायक है, वही बोल बोलो। बोल पर डबल अन्डरलाइन करो।
स्लोगन:- शुभचिंतक मणी बन, अपनी किरणों से विश्व को रोशन करते चलो।
20.01.2023 HINDI MURLI
“मीठे बच्चे - तुम पीस स्थापन करने के निमित्त हो, इसलिए बहुत-बहुत पीस में रहना है, बुद्धि में रहे कि हम बाप के एडाप्टेड बच्चे आपस में भाई-बहन हैं''
प्रश्नः- पूरा सरेण्डर किसे कहेंगे, उनकी निशानी क्या होगी?
उत्तर:- पूरा सरेण्डर वह, जिनकी बुद्धि में रहता कि हम ईश्वरीय माँ-बाप से पलते हैं। बाबा यह सब कुछ आपका है, आप हमारी पालना करते हो। भल कोई नौकरी आदि करते हैं लेकिन बुद्धि से समझते हैं यह सब बाबा के लिए है। बाप को मदद करते रहते, उससे इतने बड़े यज्ञ की कारोबार चलती, सबकी पालना होती... ऐसे बच्चे भी अर्पण बुद्धि हुए। साथ-साथ पद ऊंचा पाने के लिए पढ़ना और पढ़ाना भी है। शरीर निर्वाह अर्थ कर्म करते हुए बेहद के मात-पिता को श्वाँसों श्वाँस याद करना है।
गीत:- ओम् नमो शिवाए...
ओम् शान्ति। यह गीत तो है गायन। वास्तव में महिमा सारी है ही ऊंचे ते ऊंचे परमात्मा की, जिसको बच्चे जानते हैं और बच्चों द्वारा सारी दुनिया भी जानती है कि मात-पिता हमारा वही है। अब तुम मात-पिता के साथ कुटुम्ब में बैठे हो। श्रीकृष्ण को तो मात-पिता कह नहीं सकते। भल उनके साथ राधे भी हो तो भी उनको माता पिता नहीं कहेंगे क्योंकि वह तो प्रिन्स-प्रिन्सेज हैं। शास्त्रों में यह भूल है। अब यह बेहद का बाप तुमको सभी शास्त्रों का सार बताते हैं। भल इस समय सिर्फ तुम बच्चे सम्मुख बैठे हो। कोई बच्चे भल दूर हैंपरन्तु वह भी सुन रहे हैं। वे जानते हैं कि मात-पिता हमको सृष्टि के आदि-मध्य-अन्त का राज़ समझा रहे हैं और सदा सुखी बनाने का रास्ता वा युक्ति बता रहे हैं। यह हू ब हू जैसा घर है। थोड़े बच्चे यहाँ हैं, बहुत तो बाहर हैं। यह है ब्रह्मा मुख वंशावली, नई रचना है। वह हो गई पुरानी रचना। बच्चे जानते हैं कि बाबा हमको सदा सुखी बनाने आये हैं। लौकिक माँ-बाप भी बच्चे को बड़ा कर स्कूल में ले जाते हैं। यहाँ बेहद का बाप हमको पढ़ा भी रहे हैं, हमारी पालना भी कर रहे हैं। तुम बच्चों को अब एक के बिगर दूसरा कोई रहा ही नहीं है। माँ-बाप भी समझते हैं - यह हमारे बच्चे हैं। लौकिक कुटुम्ब होगा तो 10-15 बच्चे होंगे, 2-3 शादी की होगी। यहाँ तो यह सब बाबा के बच्चे बैठे हैं। जितने भी बच्चे पैदा करने हैं सो अभी ही ब्रह्मा मुख कमल द्वारा करने हैं। पीछे तो बच्चे पैदा करने ही नहीं हैं। सभी को वापिस जाना है। यह एक ही एडाप्टेड माता निमित्त है। यह बड़ी वण्डरफुल बात है। यह तो जरूर है गरीब का बच्चा समझेगा कि हमारा बाप गरीब है। साहूकार का बच्चा समझेगा कि हमारा बाप साहूकार है। वह तो अनेक माँ-बाप हैं। यह तो सारे जगत का एक ही माता-पिता है। तुम सभी जानते हो कि हम उनके मुख से एडाप्ट हुए हैं। यह हमारा पारलौकिक माँ-बाप है। यह आते ही पुरानी सृष्टि में हैं, जब मनुष्य बहुत-बहुत दु:खी होते हैं। बच्चे जानते हैं कि हमने इस पारलौकिक मात-पिता की गोद ली है। हम सब आपस में भाई-बहन हैं। दूसरा कोई हमारा सम्बन्ध नहीं है। तो भाई बहन को आपस में बहुत मीठा, रॉयल, पीसफुल, नॉलेज-फुल, ब्लिसफुल बनना चाहिए। जबकि तुम पीस स्थापन कर रहे हो तो तुमको भी बहुत पीस में रहना चाहिए। बच्चों को यह तो बुद्धि में होना चाहिए कि हम पारलौकिक बाप के एडाप्टेड बच्चे हैं। परमधाम से बाप आये हैं। वह है डाडा (ग्रैण्ड फादर) यह दादा (बड़ा भाई) है, जो पूरा सरेण्डर हैं वो समझेंगे हम ईश्वरीय माँ-बाप से पलते हैं। बाबा यह सब कुछ आपका है। आप हमारी पालना करते हो। जो बच्चे अर्पण होते हैं उनसे सभी की पालना हो जाती है। भल कोई नौकरी करते हैं तो भी समझते हैं यह सब कुछ बाबा के लिए है। तो बाप को भी मदद करते रहते हैं। नहीं तो यज्ञ की कारोबार कैसे चले। राजा रानी को भी मात-पिता कहते हैं। परन्तु वह फिर भी जिस्मानी मात-पिता हुए। राज-माता भी कहते हैं तो राज-पिता भी कहते हैं। यह फिर हैं बेहद के। बच्चे जानते हैं कि हम मात-पिता के साथ बैठे हैं। यह भी बच्चे जानते हैं कि हम जितना पढ़ेंगे और पढ़ायेंगे उतना ऊंच पद पायेंगे। साथ-साथ शरीर निर्वाह अर्थ कर्म भी करना है। यह दादा भी बुजुर्ग है। शिवबाबा को कभी बूढ़ा वा जवान नहीं कहेंगे। वह है ही निराकार। यह भी तुम जानते हो कि हम आत्माओं को निराकार बाप ने एडाप्ट किया है। और फिर साकार में है यह ब्रह्मा। अहम् आत्मा कहती हैं हमने बाप को अपना बनाया है। फिर नीचे आओ तो कहेंगे हम भाई बहनों ने ब्रह्मा को अपना बनाया है। शिवबाबा कहते हैं - तुम ब्रह्मा द्वारा हमारे ब्रह्मा मुख वंशावली बने हो। ब्रह्मा भी कहते हैं तुम हमारे बच्चे बने हो। तुम ब्राह्मणों की बुद्धि में श्वाँसों श्वाँस यही चलेगा कि यह हमारा बाप है, वह हमारा दादा है। बाप से जास्ती दादे को याद करते हैं। वह मनुष्य तो बाप से झगड़ा आदि करके भी दादे से प्रापर्टी लेते हैं। तुमको भी कोशिश करके बाप से भी जास्ती दादे से वर्सा लेना है। बाबा जब पूछते हैं तो सभी कहते हैं हम नारायण को वरेंगे। कोई-कोई नये आते थे, पवित्र नहीं रह सकते तो वह हाथ नहीं उठा सकते। कह देते माया बड़ी प्रबल है। वह तो कह भी नहीं सकते कि हम श्री नारायण को वा लक्ष्मी को वरेंगे। देखो, जब बाबा सम्मुख सुनाते हैं तो कितना खुशी का पारा चढ़ता है। बुद्धि को रिफ्रेश किया जाता है तो नशा चढ़ता है। फिर किसी-किसी को वह नशा स्थाई रहता है, किसी-किसी में कम हो जाता है। बेहद के बाप को याद करना है, 84 जन्मों को याद करना है और चक्रवर्ती राजाई को भी याद करना है। जो मानने वाले नहीं होंगे उनको याद नहीं रहेगी। बापदादा समझ जाते हैं कि बाबा-बाबा कहते तो हैं परन्तु सच-सच याद करते नहीं हैं और न लक्ष्मी-नारायण को वरने लायक हैं। चलन ही ऐसी है। अन्तर्यामी बाप हर एक की बुद्धि को समझते हैं। यहाँ शास्त्रों की तो कोई बात ही नहीं। बाप ने आकर राजयोग सिखाया है, जिसका नाम गीता रखा है। बाकी तो छोटे मोटे धर्मों वाले सब अपना-अपना शास्त्र बना लेते हैं फिर वह पढ़ते रहते हैं। बाबा शास्त्र नहीं पढ़े हैं। कहते हैं बच्चे - मैं तुमको स्वर्ग की राह बताने आया हूँ। तुम जैसे अशरीरी आये थे, वैसे ही तुमको जाना है। देह सहित सब इन दु:खों के कर्मबन्धन को छोड़ देना है क्योंकि देह भी दु:ख देती है। बीमारी होगी तो क्लास में आ नहीं सकेंगे। तो यह भी देह का बन्धन हो गया, इसमें बुद्धि बड़ी सालिम चाहिए। पहले तो निश्चय चाहिए कि बरोबर बाबा स्वर्ग रचता है। अभी तो है नर्क। जब कोई मरता है तो कहते हैं स्वर्ग गया, तो जरूर नर्क में था ना। परन्तु यह तुम अभी समझते हो क्योंकि तुम्हारी बुद्धि में स्वर्ग है। बाबा रोज़ नये-नये तरीके से समझाते हैं। तो तुम्हारी बुद्धि में अच्छी रीति बैठे। हमारा बेहद का मात-पिता है। तो पहले बुद्धि एकदम ऊपर चली जायेगी। फिर कहेंगे इस समय बाबा आबू में है। जैसे यात्रा पर जाते हैं तो बद्रीनाथ का मन्दिर ऊपर रहता है। पण्डे ले जाते हैं, बद्रीनाथ खुद तो ले चलने लिए नहीं आता है। मनुष्य पण्डा बनते हैं। यहाँ शिवबाबा खुद आते हैं परमधाम से। कहते हैं हे आत्मायें तुमको यह शरीर छोड़ शिवपुरी चलना है। जहाँ जाना है वह निशाना जरूर याद रहेगा। वह बद्रीनाथ चैतन्य में आकर बच्चों को साथ ले जाये, ऐसे तो हो नहीं सकता। वह तो यहाँ का रहवासी है। यह परमपिता परमात्मा कहते हैं मैं परमधाम का रहवासी हूँ। तुमको लेने लिए आया हूँ। श्रीकृष्ण तो ऐसे कह न सके। रुद्र शिवबाबा कहते हैं, यह रुद्र यज्ञ रचा हुआ है। गीता में भी रुद्र की बात लिखी हुई है। वह रूहानी बाप कहते हैं मुझे याद करो। बाप ऐसी युक्ति से यात्रा सिखाते हैं, जो जब विनाश हो तो तुम आत्मा शरीर छोड़ सीधा बाप के पास चले जायेंगे। फिर तो शुद्ध आत्मा को शुद्ध शरीर चाहिए, सो तब होगा जब नई सृष्टि हो। अभी तो सभी आत्मायें मच्छरों सदृश्य वापस जायेंगी, बाबा के साथ, इसलिए उनको खिवैया भी कहा जाता है। इस विषय सागर से उस पार ले जाते हैं। श्रीकृष्ण को खिवैया नहीं कह सकते। बाप ही इस दु:ख के संसार से सुख के संसार में ले जाते हैं। यही भारत विष्णुपुरी, लक्ष्मी-नारायण का राज्य था। अब रावणपुरी है। रावण का चित्र भी दिखाना चाहिए। चित्रों से बहुत काम लेना है। जैसे हमारी आत्मा है वैसे बाबा की आत्मा है। सिर्फ हम पहले अज्ञानी थे, वह ज्ञान का सागर है। अज्ञानी उसको कहा जाता है जो रचता और रचना को नहीं जानते हैं। रचता द्वारा जो रचता और रचना को जानते हैं उनको ज्ञानी कहा जाता है। यह ज्ञान तुमको यहाँ मिलता है। सतयुग में नहीं मिलता। वो लोग कहते हैं परमात्मा विश्व का मालिक है। मनुष्य उस मालिक को याद करते हैं, परन्तु वास्तव में विश्व का अथवा सृष्टि का मालिक तो लक्ष्मी-नारायण बनते हैं। निराकार शिवबाबा तो विश्व का मालिक बनता नहीं। तो उन्हों से पूछना पड़े कि वह मालिक निराकार है या साकार? निराकार तो साकार सृष्टि का मालिक हो न सके। वह है ब्रह्माण्ड का मालिक। वही आकर पतित दुनिया को पावन बनाते हैं। खुद पावन दुनिया का मालिक नहीं बनते। उनका मालिक तो लक्ष्मी-नारायण बनते हैं और बनाने वाला है बाप। यह बड़ी गुह्य बातें हैं समझने की। हम आत्मा भी जब ब्रह्म तत्व में रहती हैं तो ब्रह्माण्ड के मालिक हैं। जैसे राजा रानी कहेंगे हम भारत के मालिक हैं तो प्रजा भी कहेगी हम मालिक हैं। वहाँ रहते तो हैं ना। वैसे बाप ब्रह्माण्ड का मालिक है, हम भी मालिक ही ठहरे। फिर बाबा आकर नई मनुष्य सृष्टि रचते हैं। कहते हैं मुझे इस पर राज्य नहीं करना है, मैं मनुष्य नहीं बनता हूँ। मैं तो यह शरीर भी लोन लेता हूँ। तुमको सृष्टि का मालिक बनाने राजयोग सिखाता हूँ। तुम जितना पुरुषार्थ करेंगे उतना पद ऊंचा पायेंगे, इसमें कमी मत करो। टीचर तो सभी को पढ़ाते हैं। अगर इम्तहान में बहुत पास होते हैं तो टीचर का भी शो होता है। फिर उनको गवर्मेन्ट से लिफ्ट मिलती है। यह भी ऐसे है। जितना अच्छा पढ़ेंगे उतना अच्छा पद मिलेगा। माँ-बाप भी खुश होंगे। इम्तहान में पास होते हैं तो मिठाई बाँटते हैं। यहाँ तो तुम रोज़ मिठाई बाँटते हो। फिर जब इम्तहान में पास हो जाते हो तो सोने के फूलों की वर्षा होती है। तुम्हारे ऊपर कोई आकाश से फूल नही गिरेंगे परन्तु तुम एकदम सोने के महलों के मालिक बन जाते हो। यह तो कोई की महिमा करने के लिए सोने के फूल बनाकर उन पर डालते हैं। जैसे दरभंगा का राजा बहुत साहूकार था, उनका बच्चा विलायत गया तो पार्टी दी, बहुत पैसा खर्च किया। उसने सोने के फूल बनाकर वर्षा की थी। उस पर बहुत खर्चा हो गया। बहुत नाम हुआ था। कहते थे देखो भारतवासी कैसे पैसे उड़ाते हैं। तुम तो खुद ही सोने के महलों में जाकर बैठेंगे तो तुमको कितना नशा रहना चाहिए। बाप कहते हैं सिर्फ मेरे को और चक्र को याद करो तो तुम्हारा बेड़ा पार हो जायेगा। कितना सहज है।
तुम बच्चे हो चैतन्य परवाने, बाबा है चैतन्य शमा। तुम कहते हो अभी हमारा राज्य स्थापन होना है। अब सच्चा बाबा आया हुआ है भक्ति का फल देने। बाबा ने खुद बतलाया है मैं कैसे आकर नये ब्राह्मणों की सृष्टि रचता हूँ। मुझे जरूर आना पड़े। तुम बच्चे जानते हो हम ब्रह्माकुमार और कुमारियाँ हैं। शिवबाबा के पोत्रे हैं। यह फैमिली है वण्डरफुल। कैसे देवी-देवता धर्म का कलम लग रहा है। झाड़ में क्लीयर है। नीचे तुम बैठे हो। तुम बच्चे कितने सौभाग्यशाली हो। मोस्ट बिलवेड बाप बैठ समझाते हैं कि मैं आया हूँ तुम बच्चों को रावण की जंजीरों से छुड़ाने। रावण ने तुमको रोगी बना दिया है। अब बाप कहते हैं मुझे याद करो अर्थात् शिवबाबा को याद करो इससे तुम्हारी ज्योति जगेगी, फिर तुम उड़ने लायक बन जायेंगे। माया ने सबके पंख तोड़ डाले हैं। अच्छा!
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का यादप्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का यादप्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।
धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) बुद्धि को सालिम बनाने के लिए देह में रहते, देह के बन्धन से न्यारा रहना है। अशरीरी बनने का अभ्यास करना है। बीमारी आदि के समय भी बाप की याद में रहना है।
2) पारलौकिक मात-पिता के बच्चे बने हैं, इसलिए बहुत-बहुत मीठा, रॉयल, पीसफुल, नॉलेजफुल और ब्लिसफुल रहना है। पीस में रह पीस स्थापन करनी है।
वरदान:- रूहानियत के साथ रमणीकता में आने वाले मर्यादा पुरूषोत्तम भव
कई बच्चे हंसी-मजाक बहुत करते हैं और उसे ही रमणीकता समझते हैं। वैसे रमणीकता का गुण अच्छा माना जाता है लेकिन व्यक्ति, समय, संगठन, स्थान, वायुमण्डल के प्रमाण रमणीकता अच्छी लगती है। यदि इन सब बातों में से एक बात भी ठीक नहीं तो रमणीकता भी व्यर्थ की लाइन में गिनी जायेगी और सर्टीफिकेट मिलेगा कि यह हंसाते बहुत अच्छा हैं लेकिन बोलते बहुत हैं, इसलिए हंसीमजाक अच्छा वह है जिसमें रूहानियत हो और उस आत्मा का फ़ायदा हो, सीमा के अन्दर बोल हों, तब कहेंगे मर्यादा पुरुषोत्तम।
स्लोगन:- सदा स्वस्थ रहना है तो आत्मिक शक्ति को बढ़ाओ।
19.01.2023 HINDI MURLI
“मीठे बच्चे, साकार शरीर को याद करना भी भूत अभिमानी बनना है, क्योंकि शरीर 5 भूतों का है, तुम्हें तो देही-अभिमानी बन एक विदेही बाप को याद करना है''
प्रश्नः- सबसे सर्वोत्तम कार्य कौन सा है जो बाप ही करते हैं?
उत्तर:- सारी तमोप्रधान सृष्टि को सतोप्रधान सदा सुखी बना देना, यह है सबसे सर्वोत्तम कार्य, जो बाप ही करते हैं। इस ऊंचे कार्य के कारण उनके यादगार भी बहुत ऊंचे-ऊंचे बनाये हैं।
प्रश्नः- किन दो शब्दों में सारे ड्रामा का राज़ आ जाता है?
उत्तर:- पूज्य और पुजारी, जब तुम पूज्य हो तब पुरुषोत्तम हो, फिर मध्यम, कनिष्ट बनते। माया पूज्य से पुजारी बना देती है।
गीत:- महफिल में जल उठी शमा...
ओम् शान्ति। भगवान बैठ बच्चों को समझाते हैं कि मनुष्य को भगवान नहीं कहा जा सकता। ब्रह्मा, विष्णु, शंकर का भी चित्र है उनको भगवान नहीं कह सकते। परमपिता परमात्मा का निवास उनसे भी ऊंच है। उनको ही प्रभू, ईश्वर, भगवान आदि कहते हैं। मनुष्य जब पुकारते हैं तो उन्हों को कोई भी आकार वा साकार मूर्ति दिखाई नहीं पड़ती, इसलिए किस भी मनुष्य आकार को भगवान कह देते हैं। संन्यासियों को भी देखते हैं तो कहते हैं भगवान, परन्तु भगवान खुद समझाते हैं कि मनुष्य को भगवान नहीं कहा जा सकता। निराकार भगवान को तो बहुत याद करते हैं। जिन्होंने गुरू नहीं किया है, छोटे बच्चे हैं उनको भी सिखाया जाता है परमात्मा को याद करो, परन्तु किस परमात्मा को याद करो - यह नहीं बताया जाता। कोई भी चित्र बुद्वि में नहीं रहता। दु:ख के समय कह देते हैं हे प्रभु। कोई गुरू वा देवता आदि का चित्र उनके सामने नहीं आता है। भल बहुत गुरू किये हों तो भी जब हे भगवान कहते हैं तो कभी उनको गुरू याद नहीं आयेगा। अगर गुरू को याद कर और ही भगवान कहें तो वह मनुष्य तो जन्म-मरण में आने वाला हो गया। तो यह गोया 5 तत्वों के बने हुए शरीर को याद करते हैं, जिसको 5 भूत कहा जाता है। आत्मा को भूत नहीं कहा जाता। तो वह जैसे भूत पूजा हो गई। बुद्धियोग शरीर तरफ चला गया। अगर किसी मनुष्य को भगवान समझते तो ऐसे नहीं कि उनमें जो आत्मा है उसको याद करते हैं। नहीं। आत्मा तो दोनों में है। याद करने वाले में भी है तो जिसको याद करते हैं उनमें भी है। परमात्मा को तो सर्वव्यापी कह देते। परन्तु परमात्मा को पाप आत्मा नहीं कहा जा सकता। वास्तव में परमात्मा नाम जब निकलता है तो बुद्धि निराकार तरफ चली जाती है। निराकार बाप को निराकार आत्मा याद करती है। उसको देही-अभिमानी कहेंगे। साकार शरीर को जो याद करते हैं वह जैसे भूत अभिमानी हैं। भूत, भूत को याद करते हैं क्योंकि अपने को आत्मा समझने बदले 5 भूतों का शरीर समझते हैं। नाम भी शरीर पर पड़ता है। अपने को भी 5 तत्वों का भूत समझते हैं और उनको भी शरीर से याद करते हैं। देही-अभिमानी तो हैं नहीं। अपने को निराकार आत्मा समझें तो निराकार परमात्मा को याद करें। सभी आत्माओं का सम्बन्ध पहले-पहले परमात्मा से है। आत्मा दु:ख में परमात्मा को ही याद करती है, उनके साथ सम्बन्ध है। वह आत्माओं को सभी दु:खों से छुड़ाते हैं। उनको शमा भी कहते हैं। कोई बत्ती आदि की तो बात नहीं। वह तो परमपिता परम आत्मा है। शमा कहने से मनुष्य फिर ज्योति समझ लेते हैं। यह तो बाप ने खुद समझाया है मैं परम आत्मा हूँ, जिसका नाम शिव है। शिव को रूद्र भी कहते हैं। उस निराकार के ही अनेक नाम हैं और कोई के इतने नाम नहीं। ब्रह्मा, विष्णु, शंकर का एक ही नाम है। जो भी देहधारी हैं उन्हों का एक ही नाम है। एक ईश्वर को ही अनेक नाम दिये जाते हैं। उनकी महिमा अपरमअपार है। मनुष्य का एक नाम फिक्स है। अब तुम मरजीवा बने हो तो तुम्हारे पर दूसरा नाम रखा गया है, जिससे पुराना सब भूल जाये। तुम परमपिता परमात्मा के आगे जीते जी मरते हो। तो यह है मरजीवा जन्म। तो जरूर मात पिता पास जन्म लिया जाता है। यह गुह्य बातें बाप बैठ तुमको समझाते हैं। दुनिया तो शिव को जानती नहीं। ब्रह्मा, विष्णु, शंकर को जानती है। ब्रह्मा का दिन, ब्रह्मा की रात भी कहते हैं। यह भी सिर्फ सुना है। ब्रह्मा द्वारा स्थापना... परन्तु कैसे, यह नहीं जानते। अब क्रियेटर तो जरूर नया धर्म, नई दुनिया रचेगा। ब्रह्मा द्वारा ब्राह्मण कुल ही रचेगा। तुम ब्राह्मण ब्रह्मा को नहीं परमपिता परमात्मा को याद करते हो क्योंकि ब्रह्मा द्वारा तुम उनके बने हो। बाहर वाले देह-अभिमानी ब्राह्मण ऐसे अपने को ब्रह्मा के बच्चे शिव के पोत्रे नहीं कहेंगे। शिवबाबा जिसकी जयन्ती भी मनाते हैं, परन्तु उनको न जानने कारण उनका कदर नहीं है। उनके मन्दिर में जाते हैं, समझते हैं यह ब्रह्मा, विष्णु शंकर वा लक्ष्मी-नारायण तो नहीं हैं। वह जरूर निराकार परमात्मा है। और सभी एक्टर्स का अपना-अपना पार्ट है, पुनर्जन्म लेते हैं, तो भी अपना नाम धरते हैं। यह परमपिता परमात्मा एक ही है, जिसका व्यक्त नाम रूप नहीं है, परन्तु मूढ़मति मनुष्य समझते नहीं हैं। परमात्मा का यादगार है तो जरूर वह आया होगा, स्वर्ग रचा होगा। नहीं तो स्वर्ग कौन रचेगा। अब फिर आकर यह रूद्र ज्ञान यज्ञ रचा है। इसको यज्ञ कहा जाता है क्योंकि इसमें स्वाहा होना होता है। यज्ञ तो बहुत मनुष्य रचते हैं। वह तो सब हैं भक्ति मार्ग के स्थूल यज्ञ। यह परमपिता परमात्मा स्वयं आकर यज्ञ रचते हैं। बच्चों को पढ़ाते हैं। यज्ञ जब रचते हैं तो उसमें भी ब्राह्मण लोग शास्त्र कथायें आदि सुनाते हैं। यह बाप तो नॉलेजफुल है। कहते हैं यह गीता भागवत आदि शास्त्र सभी भक्ति मार्ग के हैं। यह मैटेरियल यज्ञ भी भक्ति मार्ग के हैं। यह है ही भक्ति मार्ग का समय। जब कलियुग का अन्त आये तब भक्ति का भी अन्त आये, तब ही भगवान आकर मिले क्योंकि वही भक्ति का फल देने वाला है। उनको ज्ञान सूर्य कहा जाता है। ज्ञान चन्द्रमा, ज्ञान सूर्य और ज्ञान लकी सितारे। अच्छा ज्ञान सूर्य तो है बाप। फिर माता चाहिए ज्ञान चन्द्रमा। तो जिस तन में प्रवेश किया है वह हो गई ज्ञान चन्द्रमा माता और बाकी सब हैं बच्चे लकी सितारे। इस हिसाब से जगदम्बा भी लकी स्टार हो गई क्योंकि बच्चे ठहरे ना। स्टार्स में कोई सबमें तीखा भी होता है। वैसे यहाँ भी नम्बर-वार हैं। वह हैं स्थूल आकाश के सूर्य चाँद और सितारे और यह है ज्ञान की बात। जैसे वह पानी की नदियां और यह है ज्ञान की नदियां, जो ज्ञान सागर से निकली हैं।
अब शिवजयन्ती मनाते हैं, जरूर वह सारे सृष्टि का बाप आते हैं। आकर जरूर स्वर्ग रचते होंगे। बाप आते ही हैं आदि सनातन देवी-देवता धर्म की स्थापना करने, जो प्राय: लोप हो गया है। गवर्मेन्ट भी कोई धर्म को नहीं मानती है। कहते हैं हमारा कोई धर्म नहीं। यह ठीक कहते हैं। बाप भी कहते हैं भारत का आदि सनातन देवी-देवता धर्म प्राय: लोप है। धर्म में ताकत रहती है। भारतवासी अपने दैवी धर्म में थे तो बहुत सुखी थे। वर्ल्ड आलमाइटी अथॉरिटी राज्य था। पुरुषोत्तम राज्य करते थे। श्री लक्ष्मी-नारायण को ही पुरुषोत्तम कहा जाता है। नम्बरवार ऊंच नीच तो होते हैं। सर्वोत्तम पुरुष, उत्तम पुरुष, मध्यम, कनिष्ट पुरुष तो होते ही हैं। पहले-पहले सभी से सर्वोत्तम पुरुष जो बनते हैं वही फिर मध्यम, कनिष्ट बनते हैं। तो लक्ष्मी-नारायण हैं पुरुषोत्तम। सभी पुरुषों में उत्तम। फिर नीचे उतरते हैं तो देवता से क्षत्रिय, क्षत्रिय से फिर वैश्य, शूद्र कनिष्ट बनते हैं। सीता राम को भी पुरुषोत्तम नहीं कहेंगे। सभी राजाओं के राजा, सर्वोत्तम सतोप्रधान पुरुषोत्तम हैं लक्ष्मी-नारायण। यह सब बातें तुम्हारी बुद्वि में बैठी हैं। कैसे यह सृष्टि का चक्र चलता है। पहले-पहले उत्तम फिर मध्यम, कनिष्ट बनते हैं। इस समय तो सारी दुनिया तमोप्रधान है, यह बाप समझाते हैं। जिसकी अब जयन्ती मनायेंगे, तुम बता सकते हो कि आज से 5 हजार वर्ष पहले परमपिता परमात्मा शिव पधारे थे। नहीं तो शिव जयन्ती क्यों मनाते! परमपिता परमात्मा जरूर बच्चों के लिए सौगात ले आयेंगे और जरूर सर्वोत्तम कार्य करेंगे। सारी तमोप्रधान सृष्टि को सतोप्रधान सदा सुखी बनाते हैं। जितना ऊंच है उतना ऊंच यादगार भी था जिस मन्दिर को लूटकर ले गये। मनुष्य चढ़ाई करते ही हैं धन के लिए। फारेन से भी आये धन के लिए, उस समय भी धन बहुत था। परन्तु माया रावण ने भारत को कौड़ी तुल्य बना दिया है। बाप आकर हीरे तुल्य बनाते हैं। ऐसे शिवबाबा को कोई भी नहीं जानते हैं। कह देते सर्वव्यापी है, यह कहना भी भूल है। नईया पार करने वाला सतगुरू एक है। डुबोने वाले अनेक हैं। सभी विषय सागर में डूबे हुए हैं तब तो कहते हैं इस असार संसार, विषय सागर से उस पार ले चलो, जहाँ क्षीरसागर है। गाया भी जाता है कि विष्णु क्षीरसागर में रहते थे। स्वर्ग को क्षीरसागर कहा जाता है। जहाँ लक्ष्मी-नारायण राज्य करते हैं। बाकी ऐसे नहीं विष्णु वहाँ क्षीरसागर में विश्राम करते हैं। वो लोग तो बड़ा तलाब बनाकर उसके बीच में विष्णु को रखते हैं। विष्णु भी लम्बा चौड़ा बनाते हैं। इतने बड़े तो लक्ष्मी-नारायण होते नहीं। बहुत-बहुत 6 फुट होंगे। पाण्डवों के भी बड़े-बड़े बुत बनाते हैं। रावण का कितना बड़ा बुत बनाते हैं। बड़ा नाम है तो बड़ा चित्र बनाते हैं। बाबा का नाम भल बड़ा है परन्तु उनका चित्र छोटा है। यह तो समझाने लिए इतना बड़ा रूप दे दिया है। बाप कहते हैं मेरा इतना बड़ा रूप नहीं है। जैसे आत्मा छोटी है वैसे ही मैं परमात्मा भी स्टार मिसल हूँ। उसको सुप्रीम सोल कहा जाता है, वह है सबसे ऊंच। उसी में सारा ज्ञान भरा हुआ है, उनकी महिमा गाई हुई है कि वह मनुष्य सृष्टि का बीजरूप है, ज्ञान का सागर है, चैतन्य आत्मा है। परन्तु सुनावे तब जब आरगन्स लेवे। जैसे बच्चा भी छोटे आरगन्स से बात नहीं कर सकता है, बड़ा होता है तो शास्त्र आदि देखने से अगले संस्कारों की स्मृति आ जाती है। तो बाप बैठ बच्चों को समझाते हैं मैं फिर से 5 हजार वर्ष बाद तुमको वही राजयोग सिखाने आया हूँ। श्रीकृष्ण ने कोई राजयोग नहीं सिखाया है। उन्होंने तो प्रालब्ध भोगी है। 8 जन्म सूर्यवंशी, 12 जन्म चन्द्रवंशी फिर 63 जन्म वैश्य, शूद्र वंशी बनें। अभी सबका यह अन्तिम जन्म है। यह श्रीकृष्ण की आत्मा भी सुनती है। तुम भी सुनते हो। यह है संगमयुगी ब्राह्मणों का वर्ण। फिर तुम ब्राह्मण से जाकर देवता बनेंगे। ब्राह्मण धर्म, सूर्यवंशी देवता धर्म और चन्द्रवंशी क्षत्रिय धर्म तीनों का स्थापक एक ही परमपिता परमात्मा है। तो तीनों का शास्त्र भी एक होना चाहिए। अलग-अलग कोई शास्त्र हैं नहीं। ब्रह्मा इतना बड़ा सभी का बाप है, प्रजापिता। उनका भी कोई शास्त्र है नहीं। एक गीता में ही भगवानुवाच है। ब्रह्मा भगवानुवाच नहीं है। यह है शिव भगवानुवाच ब्रह्मा द्वारा, जिससे शूद्रों को कनवर्ट कर ब्राह्मण बनाया जाता है। ब्राह्मण ही देवता और जो नापास होते हैं, वह क्षत्रिय बन जाते हैं। दो कला कम हो जाती हैं। कितना अच्छी रीति समझाते हैं। ऊंच ते ऊंच है परमपिता परमात्मा फिर ब्रह्मा, विष्णु, शंकर उनको भी पुरुषोत्तम नहीं कहेंगे। जो पुरुषोत्तम बनते हैं, वही फिर कनिष्ट भी बनते हैं। मनुष्यों में सर्वोत्तम हैं लक्ष्मी-नारायण, जिसके मन्दिर भी हैं। परन्तु उनकी महिमा को कोई जानते नहीं हैं। सिर्फ पूजा करते रहते हैं। अब तुम पुजारी से पूज्य बन रहे हो। माया फिर पुजारी बना देती है। ड्रामा ऐसा बना हुआ है। जब नाटक पूरा होता है तभी मुझे आना पड़ता है। फिर वृद्धि होना भी आटोमेटिकली बन्द हो जाता है। फिर तुम बच्चों को आकर अपना-अपना पार्ट रिपीट करना है। यह परमपिता परमात्मा खुद बैठ समझाते हैं, जिसकी जयन्ती भक्तिमार्ग में मनाते हैं। यह तो मनाते ही रहेंगे। स्वर्ग में तो कोई की भी जयन्ती नहीं मनाते हैं। श्रीकृष्ण, राम आदि की भी जयन्ती नहीं मनायेंगे। वह तो खुद प्रैक्टिकल में होंगे। यह तो होकर गये हैं, तब मनाते हैं। वहाँ वर्ष-वर्ष श्रीकृष्ण का बर्थ डे नहीं मनायेंगे। वहाँ तो सदैव खुशियां हैं ही, बर्थ डे क्या मनायेंगे। बच्चे का नाम तो मात-पिता ही रखते होंगे। गुरू तो वहाँ होता नहीं। वास्तव में इन बातों का ज्ञान और योग से कोई कनेक्शन नहीं है। बाकी वहाँ की रसम क्या है, सो पूछना होता है, या तो बाबा कह देंगे वहाँ के कायदे जो होंगे वह चल पड़ेंगे, तुमको पूछने की क्या दरकार है। पहले मेहनत कर अपना पद तो प्राप्त कर लो। लायक तो बनो, फिर पूछना। ड्रामा में कोई न कोई कायदा होगा। अच्छा।
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का यादप्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।
धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) अपने को निराकार आत्मा समझ निराकार बाप को याद करना है। किसी भी देहधारी को नहीं। मरजीवा बन पुरानी बातों को बुद्धि से भूल जाना है।
2) बाप के रचे हुए इस रूद्र यज्ञ में सम्पूर्ण स्वाहा होना है। शूद्रों को ब्राह्मण धर्म में कनवर्ट करने की सेवा करनी है।
वरदान:- दिनचर्या की सेटिंग और बाप के साथ द्वारा हर कार्य एक्यूरेट करने वाले विश्व कल्याणकारी भव
दुनिया में जो बड़े आदमी होते हैं उनकी दिनचर्या सेट होती है। कोई भी कार्य एक्यूरेट तब होता है जब दिनचर्या की सेटिंग हो। सेटिंग से समय, एनर्जी सब बच जाते हैं, एक व्यक्ति 10 कार्य कर सकता है। तो आप विश्व कल्याणकारी जिम्मेवार आत्मायें, हर कार्य में सफलता प्राप्त करने के लिए दिनचर्या को सेट करो और बाप के साथ सदा कम्बाइन्ड होकर रहो। हजार भुजाओं वाला बाप आपके साथ है तो एक कार्य के बजाए हजार कार्य एक्यूरेट कर सकते हो।
स्लोगन:- सर्व आत्माओं प्रति शुद्ध संकल्प करना ही वरदानी मूर्त बनना है।
18.01.2023 HINDI MURLI
पिताश्री जी के पुण्य स्मृति दिवस पर सुनाने के लिए बापदादा के मधुर महावाक्य
“ मीठे बच्चे - ईमानदार बन , सच्चाई से अपनी जाँच करो कि हम कहाँ तक परफेक्ट बने हैं ? परफेक्ट बनने के लिए देह - अभिमान की खामी निकालते जाओ ''
प्रश्नः- भविष्य के लिए बच्चों ने बाप से कौन सा सौदा किया है? उस सौदे से संगम पर कौन सा फायदा है?
उत्तर:- देह सहित, जो भी कुछ कखपन है, वह सब कुछ बाप को अर्पण करके बाबा को कहते हो कि बाबा हम आपसे फिर वहाँ (भविष्य में) सब कुछ लेंगे, यह है सबसे अच्छा सौदा। इससे तुम्हारा बाबा की तिजोरी में सब कुछ सेफ हो जाता है और अपार खुशी रहती है कि अभी यहाँ हम थोड़ा समय है, फिर अपनी राजधानी में होंगे। तुमको कोई पूछे तो बोलो वाह! हम तो बेहद के बाप से बेहद सुख का वर्सा ले रहे हैं। अभी हम एवर हेल्दी, एवर वेल्दी बनते हैं।
ओम् शान्ति। रूहानी बाप रूहानी बच्चों को समझाते हैं मीठे बच्चे, जब यहाँ आकर बैठते हो तो आत्म-अभिमानी हो बाप की याद में बैठो। यह अटेन्शन तुम्हारे लिए फार-एवर है। जब तक जीते हो, बाप को याद करते रहो। याद नहीं करेंगे तो जन्म-जन्मान्तर के पाप भी नहीं कटेंगे। रचयिता और रचना के आदि मध्य अन्त का सारा स्वदर्शन चक्र तुम्हारी बुद्धि में फिरना चाहिए। तुम लाइट हाउस हो ना। एक ऑख में है शान्तिधाम, दूसरी ऑख में है सुखधाम। उठते-बैठते, चलते फिरते अपने को लाइट हाउस समझो। अपने को लाइट हाउस समझने से अपना भी कल्याण करते हो और दूसरों का भी कल्याण करते हो। बाबा भिन्न-भिन्न युक्तियाँ बतलाते हैं। जब कोई रास्ते में मिले तो उनको बताना है यह दु:खधाम है - शान्तिधाम, सुखधाम चलने चाहते हो! इशारा देना है। लाइट हाउस भी इशारा देते हैं ना, रास्ता दिखाते हैं। तुमको भी सुखधाम शान्तिधाम का रास्ता बताना है। दिन-रात यही धुन होनी चाहिए। योग की ताकत से तुम किसको थोड़ा भी समझायेंगे तो उनको झट तीर लग जायेगा। जिसको तीर लगता है तो एकदम घायल हो जाते हैं। पहले घायल होते हैं फिर बाबा के बनते हैं। बाप को प्यार से तुम बच्चे याद करते हो तो बाप को भी कशिश होती है। कई तो बिल्कुल याद ही नहीं करते हैं तो बाप को तरस पड़ता है। फिर भी कहते हैं मीठे बच्चे, उन्नति को पाते रहो। पुरुषार्थ कर आगे नम्बर में जाओ। पतित-पावन सद्गति दाता एक ही बाप है, उस एक बाप को ही याद करना है। सिर्फ बाप को नहीं साथ-साथ स्वीट होम को भी याद करना है। सिर्फ स्वीट होम भी नहीं, मिलकियत भी चाहिए इसलिए स्वर्गधाम को भी याद करना है।
बाप आये हैं मीठे-मीठे बच्चों को परफेक्ट बनाने। तो इमानदार बन, सच्चाई से अपनी जाँच करनी है कि हम कहाँ तक परफेक्ट बने हैं? परफेक्ट बनने की युक्ति भी बाप बताते रहते हैं। मुख्य खामी है ही देह-अभिमान की। देह-अभिमान ही अवस्था को आगे बढ़ने नहीं देता है इसलिए देह को भी भूलना है। बाप का बच्चों में कितना लव रहता है। बाप बच्चों को देख हर्षित होते हैं। तो बच्चों को भी इतनी खुशी में रहना चाहिए। बाप को याद कर अन्दर गदगद होना चाहिए। दिन-प्रतिदिन खुशी का पारा चढ़ा रहना चाहिए। पारा चढ़ेगा याद की यात्रा से। वह आहिस्ते-आहिस्ते चढ़ेगा। हार जीत होते-होते फिर नम्बरवार पुरुषार्थ अनुसार कल्प पहले मिसल अपना-अपना पद पा लेंगे। बापदादा बच्चों की अवस्था को साक्षी हो देखते रहते हैं और समझानी भी देते रहते हैं। बापदादा दोनों का बच्चों पर बहुत लव है क्योंकि कल्प-कल्प लवली सर्विस करते हैं और बहुत प्यार से करते हैं। परन्तु बच्चे अगर श्रीमत पर नहीं चलते तो बाप कर ही क्या सकते हैं। बाप को तरस तो बहुत पड़ता है। माया हरा देती है, बाप फिर खड़ा कर देते हैं। सबसे मीठे ते मीठा वह एक बाप है। कितना मीठा कितना प्यारा शिव भोला भगवान है! शिव भोला तो एक का ही नाम है।
मीठे बच्चे, अभी तुम बहुत-बहुत वैल्युबुल हीरा बनते हो। वैल्युबुल हीरे जवाहर जो होते हैं उनको सेफ्टी के लिए हमेशा बैंक में रखते हैं। तुम ब्राह्मण बच्चे भी वैल्युबुल हो, जो शिवबाबा की बैंक में सेफ्टी से बैठे हो। अभी तुम बाबा की सेफ में रह अमर बनते हो। तुम काल पर भी विजय पहन रहे हो। शिवबाबा के बने तो सेफ हो गये। बाकी ऊंच पद पाने लिए पुरुषार्थ करना है। दुनिया में मनुष्यों के पास कितना भी धन-दौलत है परन्तु वह सब खत्म हो जाना है। कुछ भी नहीं रहेगा। तुम बच्चों के पास तो अभी कुछ भी नहीं है। यह देह भी नहीं है। यह भी बाप को दे दो। तो जिनके पास कुछ नहीं है उनके पास जैसेकि सब कुछ है। तुमने बेहद के बाप से सौदा किया ही है भविष्य नई दुनिया के लिए। कहते हो बाबा देह सहित यह जो कुछ कखपन है, सभी कुछ आपको देते हैं और आप से फिर वहाँ सब कुछ लेंगे। तो तुम जैसे सेफ हो गये। सभी कुछ बाबा की तिजोरी में सेफ हो गया। तुम बच्चों के अन्दर में कितनी खुशी होनी चाहिए, बाकी थोड़ा समय है फिर हम अपनी राजधानी में होंगे। तुमको कोई पूछे तो बोलो वाह! हम तो बेहद के बाप से बेहद सुख का वर्सा ले रहे हैं। एवर हेल्दी, वेल्दी बनते हैं। हमारी सभी मनोकामनाएं पूरी हो रही हैं। यह बाप कितना लवली प्युअर है। वह आत्माओं को भी आप समान प्युअर बनाते हैं। तुम जितना बाप को याद करेंगे उतना अथाह लवली बनेंगे, देवतायें कितने लवली हैं। जो अभी तक भी उनके जड़-चित्रों को पूजते रहते हैं। तो अभी तुम बच्चों को इतना लवली बनना है। कोई भी देहधारी, कोई भी चीज़ पिछाड़ी को याद न आये। बाबा आप से तो हमें सब कुछ मिल गया है।
मीठे बच्चों को अपने साथ प्रतिज्ञा करनी चाहिए हमारे से कोई ऐसे विकर्म न हो जिससे दिल अन्दर खाती रहे इसलिए जितना हो सके अपने को सुधारना है, ऊंच मर्तबा पाने का पुरुषार्थ करना है। नम्बरवार तो हैं ही। जवाहरात में भी नम्बरवार होते हैं ना। कोई में बहुत डिफेक्ट होते हैं, कोई बिल्कुल प्युअर होते हैं। बाप भी जौहरी है ना। तो बाप को एक-एक रत्न को देखना होता है। यह कौन-सा रत्न है, इनमें कौन सा डिफेक्ट है। अच्छे-अच्छे प्युअर रत्नों को बाप भी बहुत प्यार से देखेंगे। अच्छे-अच्छे प्युअर रत्नों को सोने की डिब्बी में रखना होता है। बच्चे भी खुद समझते हैं कि मैं किस प्रकार का रत्न हूँ। मेरे में कौन सा डिफेक्ट है।
अब तुम कहेंगे वाह सतगुरू वाह! जिसने हमको यह रास्ता बताया है। वाह तकदीर वाह! वाह ड्रामा वाह! तुम्हारे दिल से निकलता - शुक्रिया बाबा आपका जो हमारे दो मुट्ठी चावल लेकर हमें सेफ्टी से भविष्य में सौगुणा रिटर्न देते हो। परन्तु इसमें भी बच्चों की बड़ी विशाल बुद्धि चाहिए। बच्चों को अथाह ज्ञान धन का खजाना मिलता रहता तो अपार खुशी होनी चाहिए ना। जितना हृदय शुद्ध होगा तो औरों को भी शुद्ध बनायेंगे। योग की स्थिति से ही हृदय शुद्ध बनता है। तुम बच्चों को योगी बनने बनाने का शौक होना चाहिए। अगर देह में मोह है, देह-अभिमान रहता है तो समझो हमारी अवस्था बहुत कच्ची है। देही-अभिमानी बच्चे ही सच्चा डायमण्ड बनते हैं इसलिए जितना हो सके देही-अभिमानी बनने का अभ्यास करो। बाप को याद करो। बाबा अक्षर सबसे बहुत मीठा है। बाप बड़े प्यार से बच्चों को पलकों पर बिठाकर साथ ले जायेंगे। ऐसे बाप की याद के नशे में चकनाचूर होना चाहिए। बाप को याद करते-करते खुशी में ठण्डे ठार हो जाना चाहिए। जैसे बाप अपकारियों पर उपकार करते हैं - तुम भी फालो फादर करो। सुखदाई बनो।
तुम बच्चे अभी ड्रामा के राज़ को भी जानते हो - बाप तुम्हें निराकारी, आकारी और साकारी दुनिया का सब समाचार सुनाते हैं। आत्मा कहती है अभी हम पुरुषार्थ कर रहे हैं, नई दुनिया में जाने के लिए। हम स्वर्ग में चलने लायक जरूर बनेंगे। अपना और दूसरों का कल्याण करेंगे। अच्छा - बाप मीठे बच्चों को समझाते हैं, बाप दु:ख हर्ता सुख कर्ता है तो बच्चों को भी सबको सुख देना है। बाप का राइट हैण्ड बनना है। ऐसे बच्चे ही बाप को प्रिय लगते हैं। शुभ कार्य में राइट हाथ को ही लगाते हैं। तो बाप कहते हर बात में राइटियस बनो, एक बाप को याद करो तो फिर अन्त मति सो गति हो जायेगी। इस पुरानी दुनिया से ममत्व मिटा दो। यह तो कब्रिस्तान है। धन्धाधोरी बच्चों आदि के चिन्तन में मरे तो मुफ्त अपनी बरबादी कर देंगे। शिवबाबा को याद करने से तुम बहुत आबाद होंगे। देह-अभिमान में आने से बरबादी हो जाती है। देही-अभिमानी बनने से आबादी होती है। धन की भी बहुत लालच नहीं रखनी चाहिए। उसी फिकरात में शिवबाबा को भी भूल जाते हैं। बाबा देखते हैं सब कुछ बाप को अर्पण कर फिर हमारी श्रीमत पर कहाँ तक चलते हैं। शुरू-शुरू में बाप ने भी ट्रस्टी हो दिखाया ना। सब कुछ ईश्वर अर्पण कर खुद ट्रस्टी बन गया। बस ईश्वर के काम में ही लगाना है। विघ्नों से कभी डरना नहीं चाहिए। जहाँ तक हो सके सर्विस में अपना सब कुछ सफल करना है। ईश्वर अर्पण कर ट्रस्टी बन रहना है। अच्छा!
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात पिता बापदादा का यादप्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।
अव्यक्त - महावाक्य - 1977
सभी आवाज़ से परे अपने शान्त स्वरूप स्थिति में स्थित रहने का अनुभव बहुत समय कर सकते हो? आवाज़ में आने का अनुभव ज्यादा कर सकते हो वा आवाज़ से परे रहने का अनुभव ज्यादा समय कर सकते हो? जितना लास्ट स्टेज़ अथवा कर्मातीत स्टेज समीप आती जायेगी उतना आवाज़ से परे शान्त स्वरूप की स्थिति अधिक प्रिय लगेगी, इस स्थिति में सदा अतीन्द्रिय सुख की अनुभूति हो। इसी अतीन्द्रिय सुखमय स्थिति द्वारा अनेक आत्माओं का सहज ही आह्वान कर सकेंगे। यह पॉवरफुल स्थिति विश्व-कल्याणकारी स्थिति कही जाती है। जैसे आजकल साईन्स के साधनों द्वारा सब चीज़ें समीप अनुभव होती जाती हैं, दूर की आवाज़ टेल़ीफोन के साधन द्वारा समीप सुनने में आती है, टी.वी. (दूर-दर्शन) द्वारा दूर का दृश्य समीप दिखाई देता है। ऐसे ही साईलेन्स की स्टेज द्वारा कितना भी दूर रहती हुई आत्मा को सन्देश पहुंचा सकते हो! वो ऐसे अनुभव करेंगे जैसे साकार में सन्मुख किसी ने सन्देश दिया है। दूर बैठे हुए भी आप श्रेष्ठ आत्माओं के दर्शन और प्रभु के चरित्रों के दृश्य ऐसे अनुभव करेंगे जैसे कि सम्मुख देख रहे हैं। संकल्प के द्वारा दिखाई देगा अर्थात् आवाज़ से परे संकल्प की सिद्धि का पार्ट बजायेंगे। लेकिन इस सिद्धि की विधि - ज्यादा-से-ज्यादा अपने शान्त स्वरूप में स्थित होना है इसलिए कहा जाता है साइलेन्स इज़ गोल्ड, इसे ही गोल्डन एजड स्टेज कहा जाता है। इस स्टेज पर स्थित रहने से ‘कम खर्च बाला नशीन' बनेंगे। समय रूपी खज़ाना, एनर्जी का खज़ाना और स्थूल खज़ाना सबमें ‘कम खर्च बाला नशीन' हो जायेंगे, इसके लिए एक शब्द याद रखो, वह कौन-सा है? बैलेन्स। हर कर्म में, हर संकल्प और बोल, सम्बन्ध वा सम्पर्क में बैलेन्स हो। तो बोल, कर्म, संकल्प, सम्बन्ध वा सम्पर्क साधारण के बजाए अलौकिक दिखाई देगा अर्थात् चमत्कारी दिखाई देगा। हर एक के मुख से, मन से यही आवाज़ निकलेगा कि यह तो चमत्कार है। समय के प्रमाण स्वयं के पुरुषार्थ की स्पीड और विश्व सेवा की स्पीड तीव्र-गति की चाहिए तब विश्व-कल्याणकारी बन सकेंगे।
विश्व की अधिकतर आत्मायें बाप की और आप इष्ट देवताओं की प्रत्यक्षता का आह्वान ज्यादा कर रही हैं और इष्ट देव उनका आह्वान कम कर रहे हैं। इसका कारण क्या है? अपने हद के स्वभाव, संस्कारों की प्रवृत्ति में बहुत समय लगा देते हैं। जैसे अज्ञानी आत्माओं को ज्ञान सुनने की फुर्सत नहीं, वैसे बहुत से ब्राह्मणों को भी इस पावरफुल स्टेज पर स्थित होने की फुर्सत नहीं मिलती, इसलिए अभी ज्वाला रूप बनने की आवश्यकता है।
बापदादा हर एक की प्रवृत्ति को देख मुस्कराते रहते हैं कि कैसे टू मच बिजी हो गये हैं। बहुत बिजी रहते हो ना! वास्तविक स्टेज में सदा फ्री रहेंगे। सिद्धि भी होगी और फ्री भी रहेंगे।
जब साइन्स के साधन धरती पर बैठे हुए स्पेस में गये हुए यंत्र को कन्ट्रोल कर सकते हैं, जैसे चाहें, जहाँ चाहें वहाँ मोड़ सकते हैं, तो साइलेन्स के शक्ति स्वरूप, इस साकार सृष्टि में श्रेष्ठ संकल्प के आधार से जो सेवा चाहे, जिस आत्मा की सेवा करना चाहे वो नहीं कर सकते! लेकिन पहले अपनी-अपनी प्रवृत्ति से परे अर्थात् उपराम रहो।
जो सभी खज़ाने सुनाये वह स्वयं के प्रति नहीं, विश्व-कल्याण के प्रति यूज़ करो। समझा, अब क्या करना है? आवाज़ द्वारा सर्विस, स्थूल साधनों द्वारा सर्विस और आवाज़ से परे सूक्ष्म साधन संकल्प की श्रेष्ठता, संकल्प शक्ति द्वारा सर्विस का बैलेन्स प्रत्यक्ष रूप में दिखाओ तब विनाश का नगाड़ा बजेगा। समझा। प्लैन्स तो बहुत बना रहे हो, बापदादा भी प्लैन बता रहे हैं। बैलेन्स ठीक न होने के कारण मेहनत ज्यादा करनी पड़ती है। विशेष कार्य के बाद विशेष रेस्ट भी लेते हो ना। फ़ाईनल प्लैन में अथकपन का अनुभव करेंगे। अच्छा। ऐसे सर्व शक्तियों को विश्व-कल्याण के प्रति कार्य में लगाने वाले, संकल्प की सिद्धि स्वरूप, स्वयं की प्रवृत्ति से स्वतंत्र, सदा शान्त और शक्ति स्वरूप स्थिति में स्थित रहने वाले सर्व श्रेष्ठ आत्माओं को बापदादा का यादप्यार और नमस्ते।
वरदान:- साइलेन्स की शक्ति द्वारा नई सृष्टि की स्थापना के निमित्त बनने वाले मास्टर शान्ति देवा भव
साइलेन्स की शक्ति जमा करने के लिए इस शरीर से परे अशरीरी हो जाओ। यह साइलेन्स की शक्ति बहुत महान शक्ति है, इससे नई सृष्टि की स्थापना होती है। तो जो आवाज से परे साइलेन्स रूप में स्थित होंगे वही स्थापना का कार्य कर सकेंगे इसलिए शान्ति देवा अर्थात् शान्त स्वरूप बन अशान्त आत्माओं को शान्ति की किरणें दो। विशेष शान्ति की शक्ति को बढ़ाओ। यही सबसे बड़े से बड़ा महादान है, यही सबसे प्रिय और शक्तिशाली वस्तु है।
स्लोगन:- हर आत्मा वा प्रकृति के प्रति शुभ भावना रखना ही विश्व कल्याणकारी बनना है।
प्रश्नः-कई बच्चे हैं भाग्यशाली लेकिन बन जाते हैं दुर्भाग्यशाली कैसे?उत्तर:-वह बच्चे भाग्यशाली हैं - जिन्हें कोई भी कर्मबन्धन नहीं है अर्थात् कर्म बन्धनमुक्त हैं। परन्तु फिर भी यदि पढ़ाई में अटेन्शन नहीं देते, बुद्धि इधर उधर भटकती रहती है, एक बाप जिससे इतना भारी वर्सा मिलता, उसे याद नहीं करते हैं तो भाग्यशाली होते भी दुर्भाग्यशाली ही कहेंगे।
प्रश्नः-श्रीमत में कौन-कौन से रस भरे हुए हैं?
उत्तर:-श्रीमत ही है - जिसमें मात-पिता, टीचर, गुरू सबकी मत इकट्ठी है। श्रीमत जैसे सैक्रीन है, जिसमें यह सब रस भरे हुए हैं।
गीत:-तकदीर जगाकर आई हूँ....
ओम् शान्ति। शिव भगवानुवाच, मनुष्य जब गीता सुनाते हैं तो श्रीकृष्ण का नाम लेकर सुनाते हैं। यहाँ तो जो सुनाते हैं कहते हैं शिव भगवानुवाच। खुद भी कह सकते हैं शिव भगवानुवाच, क्योंकि शिवबाबा स्वयं ही बोलते हैं। दोनों इक्ट्ठे भी बोल सकते हैं। बच्चे तो दोनों के हैं। बच्चे और बच्चियां दोनों बैठे हुए हैं। तो कहते हैं बच्चे समझते हो कि कौन पढ़ाते हैं? कहेंगे बापदादा पढ़ाते हैं। बाप बड़े को, दादा छोटे को अर्थात् भाई को कहा जाता है। तो बापदादा इक्ट्ठा कहा जाता है। अब बच्चे भी जानते हैं कि हम स्टूडेन्ट हैं, स्कूल में स्टूडेन्ट बैठे ही हैं तकदीर बनाने के लिए कि हम पढ़कर फलाना इम्तहान पास करेंगे। वह जिस्मानी इम्तहान तो बहुत होते हैं। यहाँ तुम बच्चों की दिल में है कि हमको बेहद का बाप परमपिता परमात्मा पढ़ाते हैं। बाप इस (ब्रह्मा) को नहीं कहते हो। निराकार बाप समझाते हैं, तुम जानते हो हम बाप से राजयोग सीख राजाओं का राजा बनते हैं। राजायें भी होते हैं और फिर राजाओं के राजायें भी होते हैं। जो राजाओं के राजायें हैं, उन्हों को राजायें भी पूजते हैं। यह रिवाज भारत खण्ड में ही है। पतित राजायें पावन राजाओं को पूजते हैं। बाप ने समझाया है महाराजा बड़ी प्रापर्टी वाले को कहा जाता है। राजे लोग छोटे होते हैं। आजकल तो कोई-कोई राजाओं की महाराजाओं से भी जास्ती प्रापर्टी होती है। कोई-कोई साहूकारों को राजाओं से भी जास्ती प्रापर्टी होती है। वहाँ ऐसे अनलाफुल नहीं होता। वहाँ तो सब कुछ कायदे अनुसार होगा। बड़े महाराजा पास बड़ी प्रापर्टी होगी। तो तुम बच्चे जानते हो हमको बेहद का बाप बैठ पढ़ाते हैं। परमात्मा बिगर राजाओं का राजा, स्वर्ग का मालिक कोई बना नहीं सकता। स्वर्ग का रचयिता है ही निराकार बाप। उनका नाम भी गाते हैं हेविनली गॉड फादर। बाप साफ समझाते हैं मैं तुम बच्चों को फिर से स्वराज्य देकर राजाओं का राजा बनाता हूँ। अब तुम जानते हो हम तकदीर बनाकर आये हैं, बेहद के बाप से राजाओं का राजा बनने। कितनी खुशी की बात है। बड़ा भारी इम्तहान है। बाबा कहते हैं श्रीमत पर चलो, इसमें मात-पिता, टीचर, गुरू आदि सबकी मत इकट्ठी है। सबकी सैक्रीन बनी हुई है। सभी का रस एक में भरा हुआ है। सबका साजन एक है। पतित से पावन बनाने वाला वह बाप ठहरा। गुरूनानक ने भी उनकी महिमा की है तो जरूर उनको याद करना पड़े। पहले वह अपने पास ले जायेगा फिर पावन दुनिया में भेज देगा। कोई भी आये तो उनको समझाना है - यह गॉडली कालेज है। भगवानुवाच, और स्कूलों में तो कभी भगवानुवाच नहीं कहेंगे। भगवान है ही निराकार ज्ञान का सागर, मनुष्य सृष्टि का बीजरूप.. तुम बच्चों को बैठ पढ़ाता हूँ। यह गॉडली नॉलेज है। सरस्वती को गॉडेज़ आफ नॉलेज कहते हैं। तो जरूर गाडली नॉलेज से गॉड-गाडेज ही बनते होंगे। बैरिस्टरी नॉलेज से बैरिस्टर ही बनेंगे। यह है गाडली नॉलेज। सरस्वती को गाड ने नॉलेज दी है। तो जैसे सरस्वती गॉडेज आफ नॉलेज है, वैसे तुम बच्चे हो। सरस्वती को बहुत बच्चे हैं ना। परन्तु हर एक गॉडेज आफ नॉलेज कहलाये जायें, यह नहीं हो सकता। इस समय अपने को गॉडेज नहीं कह सकते। वहाँ भी तो देवी-देवतायें ही कहेंगे। गॉड नॉलेज बरोबर देते हैं। लेसन ऐसे धारण कराते हैं। यह मर्तबा देते हैं बड़ा। बाकी देवतायें गॉड गाडेज तो हो नहीं सकते। यह मात-पिता तो जैसे कि गॉड गाडेज हो जाते। परन्तु हैं तो नहीं ना। निराकार बाप को गाड फादर कहेंगे। इन (साकार) को गॉड थोड़ेही कहेंगे। यह बड़ी गुह्य बातें हैं। आत्मा और परमात्मा का रूप और फिर सम्बन्ध कितनी गुह्य बातें हैं। वह जिस्मानी सम्बन्ध काका, चाचा, मामा आदि तो कामन हैं। यह तो है रूहानी सम्बन्ध। समझाने की बड़ी युक्ति चाहिए। मात-पिता अक्षर गाते हैं तो जरूर कोई अर्थ है ना। वह अक्षर अविनाशी बन जाता है। भक्तिमार्ग में भी चला आता है।
तुम बच्चे जानते हो हम स्कूल में बैठे हैं। पढ़ाने वाला ज्ञान सागर है। इनकी आत्मा भी पढ़ती है। इस आत्मा का बाप वह परमात्मा है, जो सभी का बाप है, वह पढ़ाते हैं। उनको गर्भ में तो आना नहीं है, तो नॉलेज कैसे पढ़ायें। वह आते हैं ब्रह्मा के तन में। उन्होंने फिर ब्रह्मा के बदले श्रीकृष्ण का नाम डाल दिया है। यह भी ड्रामा में हैं। कुछ भूल हो तब तो बाप आकर इस भूल को करेक्ट कर अभुल बनाये। निराकार को न जानने कारण ही मूँझ गये हैं। बाप समझाते हैं मैं तुम्हारा बेहद का बाप बेहद का वर्सा देने वाला हूँ। लक्ष्मी-नारायण स्वर्ग के मालिक कैसे बने, यह कोई भी नहीं जानते। जरूर कोई ने तो कर्म सिखाये होंगे ना और वह भी जरूर बड़ा होगा, जो इतना ऊंच पद प्राप्त कराया। मनुष्य कुछ भी नहीं जानते। बाप कितना प्यार से समझाते हैं, कितनी बड़ी अथॉरिटी है। सारी दुनिया को पतित से पावन बनाने वाला मालिक है। समझाते हैं यह बना-बनाया ड्रामा है। तुमको चक्र लगाना होता है। इस बनावट को कोई भी जानते नहीं। ड्रामा में कैसे हम एक्टर्स हैं, यह चक्र कैसे फिरता है, दु:खधाम से सुखधाम कौन बनाते हैं, यह तुम जानते हो। तुमको सुखधाम के लिए पढ़ाता हूँ। तुम ही 21 जन्मों के लिए सदा सुखी बनते हो और कोई वहाँ जा न सके। सुखधाम में जरूर थोड़े मनुष्य होंगे। समझाने लिए प्वाइंटस बहुत अच्छी चाहिए। कहते तो हैं बाबा हम आपके हैं, परन्तु पूरा बनने में टाइम लगता है। कोई का कर्मबन्धन झट छूट जाता है, कोई को टाइम लगता है। कई तो ऐसे भाग्यशाली भी हैं जिनका कर्मबन्धन टूटा हुआ है, परन्तु पढ़ाई में अटेन्शन नहीं देते हैं तो उनको कहा जाता है दुर्भाग्यशाली। पुत्र, पोत्रे, धोत्रे आदि में बुद्धि चली जाती है। यहाँ तो एक को ही याद करना है। बहुत भारी वर्सा मिलता है। तुम जानते हो हम राजाओं के राजा बनते हैं। पतित राजायें कैसे बनते हैं और पावन राजाओं के राजा कैसे बनते हैं, वह भी बाप तुमको समझाते हैं। मैं स्वयं आकर राजाओं का राजा स्वर्ग का मालिक बनाता हूँ - इस राजयोग से। वह पतित राजायें तो दान करने से बनते हैं। उन्हों को मैं थोड़ेही आकर बनाता हूँ। वह बहुत दानी होते हैं। दान करने से राजाई कुल में जन्म लेते हैं। मैं तो 21 जन्मों के लिए तुमको सुख देता हूँ। वह तो एक जन्म के लिए बनते सो भी पतित दु:खी रहते हैं। मैं तो आकर बच्चों को पावन बनाता हूँ। मनुष्य समझते हैं सिर्फ गंगा स्नान करने से पावन बनते हैं, कितने धक्के खाते हैं। गंगा जमुना आदि की कितनी महिमा करते हैं। अब इसमें महिमा की तो बात ही नहीं। पानी सागर से आता है। ऐसे तो बहुत नदियां हैं। विलायत में भी बड़ी-बड़ी नदियां खोदकर बनाते हैं, इसमें क्या बड़ी बात है। ज्ञान सागर और ज्ञान गंगायें कौन हैं, यह तो जानते ही नहीं। शक्तियों ने क्या किया, कुछ भी जानते नहीं। वास्तव में ज्ञान गंगा अथवा ज्ञान सरस्वती यह जगदम्बा है। मनुष्य तो जानते ही नहीं, जैसे भील हैं। बिल्कुल ही बुद्धू, बेसमझ हैं। बाप आकर बेसमझ को कितना समझदार बनाते हैं। तुम बता सकते हो इन्हों को राजाओं का राजा किसने बनाया। गीता में भी है मैं राजाओं का राजा बनाता हूँ। मनुष्य तो यह जानते नहीं। हम खुद भी नहीं जानते थे। यह जो खुद बना था, अब नहीं है, वही नहीं जानता तो और फिर कैसे जान सकते। सर्वव्यापी के ज्ञान में कुछ भी है नहीं, योग किसके साथ लगायें, पुकारे किसको? खुद ही खुदा हैं फिर प्रार्थना किसकी करेंगे! बड़ा वन्डर है। बहुत भक्ति जो करते हैं उनका मान होता है। भक्त माला भी है ना। ज्ञान माला है रूद्र माला। यह फिर भक्त माला। वह है निराकारी माला। सभी आत्मायें वहाँ रहती हैं। उनमें भी पहला नम्बर आत्मा किसकी है? जो नम्बरवन में जाते हैं, सरस्वती की आत्मा वा ब्रह्मा की आत्मा नम्बरवन पढ़ती है। यह आत्मा की बात है। भक्ति मार्ग में तो सब जिस्मानी बातें हैं - फलाना भक्त ऐसा था, उनके शरीर का नाम लेंगे। तुम मनुष्य को नहीं कहेंगे। तुम जानते हो ब्रह्मा की आत्मा क्या बनती है। वह जाकर शरीर धारण कर राजाओं का राजा बनते हैं। आत्मा शरीर में प्रवेश कर राज्य करती है। अभी तो राजा नहीं है। राज्य करती तो आत्मा है ना। मैं राजा हूँ, मैं आत्मा हूँ, इस शरीर का मालिक हूँ। अहम् आत्मा शरीर का नाम श्री नारायण धराए फिर राज्य करेंगे। आत्मा ही सुनती और धारण करती है। आत्मा में संस्कार रहते हैं। अब तुम जानते हो हम बाप से राजाई लेते हैं श्रीमत पर चलने से। बापदादा दोनों मिलकर कहते हैं बच्चे, दोनों को बच्चे कहने का हक है। आत्मा को कहते हैं निराकारी बच्चे, मुझ बाप को याद करो। और कोई कह न सके कि हे निराकारी बच्चे, हे आत्मायें मुझ बाप को याद करो। बाप ही आत्माओं से बात करते हैं। ऐसे तो नहीं कहते हे परमात्मा मुझ परमात्मा को याद करो। कहते हैं, हे आत्मायें मुझ बाप को याद करो तो इस योग अग्नि से तुम्हारे विकर्म विनाश होंगे। बाकी गंगा स्नान से कभी कोई पाप आत्मा से पुण्य आत्मा नहीं बन सकते। गंगा स्नान कर फिर घर में आकर पाप करते हैं। इन विकारों के कारण ही पाप आत्मा बनते हैं। यह कोई समझते नहीं। बाप समझाते हैं कि अब तुमको राहू का कड़ा ग्रहण लगा हुआ है। पहले हल्का ग्रहण होता है। अब दे दान तो छूटे ग्रहण। प्राप्ति बहुत भारी है। तो पुरुषार्थ भी ऐसे करना चाहिए ना। बाप कहते हैं मैं तुमको राजाओं का राजा बनाऊंगा इसलिए मुझे और वर्से को याद करो। अपने 84 जन्मों को याद करो इसलिए बाबा ने नाम ही रखा है “स्वदर्शन चक्रधारी बच्चे।'' तो स्वदर्शन का ज्ञान भी चाहिए ना।
बाप समझाते हैं - यह पुरानी दुनिया खत्म होनी है। तुमको मैं नई दुनिया में ले चलता हूँ। संन्यासी सिर्फ घरबार को भूलते हैं, तुम सारी दुनिया को भूलते हो। यह बाप ही कहते हैं कि अशरीरी बनो। मैं तुमको नई दुनिया में ले चलता हूँ इसलिए पुरानी दुनिया से, पुराने शरीर से ममत्व तोड़ो। फिर नई दुनिया में तुमको नया शरीर मिलेगा। देखो, श्रीकृष्ण को श्याम-सुन्दर कहते हैं। सतयुग में वह गोरा था अब अन्तिम जन्म में काला हो गया है। तो कहेंगे ना श्याम ही सुन्दर बनता है, फिर सुन्दर से श्याम बनता है। तो नाम रख दिया है श्याम सुन्दर। काला बनाते हैं 5 विकार रावण और फिर गोरा बनाते हैं परमपिता परमात्मा। चित्र में भी दिखाया है कि मैं पुरानी दुनिया को लात मार गोरा बन रहा हूँ। गोरी आत्मा स्वर्ग की मालिक बनती है। काली आत्मा नर्क की मालिक बनती है। आत्मा ही गोरी और काली बनती है। अब बाप कहते हैं तुमको पवित्र बनना है। वह हठयोगी पवित्र बनने के लिए बहुत हठ करते हैं। परन्तु योग बिगर तो पवित्र बन न सके, या तो सजायें खाकर पवित्र बनना पड़े इसलिए बाप को क्यों न याद करें और 5 विकारों को भी जीतना है। बाप कहते हैं यह काम विकार ही आदि-मध्य-अन्त दु:ख देने वाला है। जो विकारों को नहीं जीत सकते वह वैकुण्ठ के राजा थोड़ेही बन सकते हैं इसलिए बाप कहते हैं देखो मैं तुमको कितने अच्छे कर्म सिखाता हूँ - बाप, टीचर, सतगुरू रूप में। योगबल से विकर्म विनाश कराए विकर्माजीत राजा बनाता हूँ। वास्तव में सतयुग के देवी-देवताओं को ही विकर्माजीत कहा जाता है। वहाँ विकर्म तो होते नहीं। विकर्माजीत संवत और विक्रम संवत अलग-अलग है। एक राजा विक्रम भी होकर गया है और विकर्माजीत राजा भी हो गया है। हम अभी विकर्मों को जीत रहे हैं। फिर द्वापर से नये-सिर विकर्म शुरू होते हैं। तो नाम रख दिया है राजा विक्रम। देवतायें हैं विकर्माजीत। अभी हम वह बनते हैं फिर जब वाम मार्ग में आते हैं तो विकर्मों का खाता शुरू हो जाता है। यहाँ विकर्मो का खाता चुक्तू कर फिर हम विकर्माजीत बनते हैं। वहाँ कोई विकर्म होते नहीं। तो बच्चों को यह नशा होना चाहिए कि हम यहाँ ऊंच तकदीर बनाते हैं। यह है बड़े ते बड़ी तकदीर बनाने की पाठशाला। सतसंग में तकदीर बनने की बात नहीं रहती। पाठशाला में हमेशा तकदीर बनती है। तुम जानते हो हम नर से नारायण अथवा राजाओं का राजा बनेंगे। बरोबर पतित राजायें, पावन राजाओं को पूजते हैं। मैं तुमको पावन बनाता हूँ। पतित दुनिया में तो राज्य नहीं करेंगे। अच्छा!
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का यादप्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।
धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) बुद्धि में स्वदर्शन चक्र का ज्ञान रख, राहू के ग्रहण से मुक्त होना है। श्रेष्ठ कर्म और योगबल से विकर्मों का खाता चुक्तू कर विकर्माजीत बनना है।
2) अपनी ऊंची तकदीर बनाने के लिए पढ़ाई पर पूरा-पूरा ध्यान देना है।
वरदान:- बाह्यमुखता के रसों की आकर्षण के बन्धन से मुक्त रहने वाले जीवनमुक्त भव
बाहयमुखता अर्थात् व्यक्ति के भाव-स्वभाव और व्यक्त भाव के वायब्रेशन, संकल्प, बोल और संबंध, सम्पर्क द्वारा एक दो को व्यर्थ की तरफ उकसाने वाले, सदा किसी न किसी प्रकार के व्यर्थ चिन्तन में रहने वाले, आन्तरिक सुख, शान्ति और शक्ति से दूर.....यह बाह्यमुखता के रस भी बाहर से बहुत आकर्षित करते हैं, इसलिए पहले इसको कैंची लगाओ। यह रस ही सूक्ष्म बंधन बन सफलता की मंजिल से दूर कर देते हैं, जब इन बंधनों से मुक्त बनो तब कहेंगे जीवनमुक्त।
स्लोगन:- जो अच्छे बुरे कर्म करने वालों के प्रभाव के बन्धन से मुक्त साक्षी व रहमदिल है वही तपस्वी है।
“मीठे बच्चे - जितना-जितना दूसरों को ज्ञान सुनायेंगे उतना तुम्हारी बुद्धि में ज्ञान रिफाइन होता जायेगा, इसलिए सर्विस जरूर करनी है''
प्रश्नः- बाप के पास दो प्रकार के बच्चे कौन से हैं, उन दोनों में अन्तर क्या है?
उत्तर:- बाप के पास एक हैं लगे (सौतेले) बच्चे, दूसरे हैं सगे (मातेले) बच्चे। लगे बच्चे - मुख से सिर्फ बाबा मम्मा कहते लेकिन श्रीमत पर पूरा नहीं चल सकते। पूरा-पूरा बलिहार नहीं जाते। सगे बच्चे तो तन-मन धन से पूर्ण समर्पण अर्थात् ट्रस्टी होते हैं। कदम-कदम श्रीमत पर चलते हैं। लगे बच्चे सेवा न करने के कारण चलते-चलते गिर पड़ते हैं। संशय आ जाता है। सगे बच्चे पूरा निश्चयबुद्धि होते हैं।
गीत:- बचपन के दिन भुला न देना...
ओम् शान्ति। बाप बच्चों को समझाते हैं। कौन सा बाप? वास्तव में दोनों बाप हैं। एक रूहानी, जिसको बाबा कहा जाता, दूसरा जिस्मानी जिसको दादा कहा जाता। यह तो सभी सेन्टर्स के बच्चे जानते हैं कि हम बापदादा के बच्चे हैं। रूहानी बाप शिव है। वह है सभी आत्माओं का बाप और ब्रह्मा दादा है सारे मनुष्य सिजरे का हेड। उनके तुम आकर बच्चे बने हो। उनमें भी कोई तो पक्के सगे हैं, कोई फिर लगे भी हैं। मम्मा बाबा तो दोनों ही कहते हैं परन्तु लगे बलि नहीं चढ़ सकते। बलि न चढ़ने वालों को इतनी ताकत नहीं मिल सकती अर्थात् अपने बाप को तन-मन-धन का ट्रस्टी नहीं बना सकते। श्रेष्ठ बनने के लिए उनकी श्रीमत पर नहीं चल सकते। सगे बच्चों को सूक्ष्म मदद मिलती है। परन्तु वह भी बहुत थोड़े हैं। भल सगे भी हैं परन्तु उनको भी अभी पक्के नहीं कहेंगे, जब तक रिजल्ट नहीं निकली है। भल यहाँ रहते भी हैं, बहुत अच्छे हैं, सर्विस भी करते हैं फिर गिर भी पड़ते हैं। यह है सारी बुद्धियोग की बात। बाबा को भूलना नहीं है। बाबा इस भारत को बच्चों की मदद से स्वर्ग बनाते हैं। गाया हुआ भी है शिव शक्ति सेना। हरेक को अपने से बात करनी है - बरोबर हम शिवबाबा के एडाप्टेड चिल्ड्रेन हैं। बाप से हम स्वर्ग का वर्सा पा रहे हैं। द्वापर से लेकर हमने जो लौकिक बाप का वर्सा पाया है वह नर्क का ही पाया है। दु:खी होते आये हैं। भक्तिमार्ग में तो है ही अन्धश्रद्धा। जब से भक्ति शुरू हुई है तब से जो-जो वर्ष बीता हम नीचे उतरते आये। भक्ति भी पहले अव्यभिचारी थी। एक की पूजा करते थे। उसके बदले अब अनेकों की पूजा करते आये हैं। अब यह सब बातें ऋषि, मुनि, साधु, सन्त आदि नहीं जानते कि भक्ति कब शुरू होती है। शास्त्रों में भी है ब्रह्मा का दिन और ब्रह्मा की रात। भल ब्रह्मा सरस्वती ही लक्ष्मी-नारायण बनते हैं परन्तु नाम ब्रह्मा का दिया है। ब्रह्मा के साथ बच्चे भी बहुत हैं। लक्ष्मी-नारायण के बच्चे तो बहुत नहीं होंगे। प्रजापिता भी उनको नहीं कहेंगे। अब नई प्रजा बन रही है। नई प्रजा होती ही है ब्राह्मणों की। ब्राह्मण ही अपने को ईश्वरीय सन्तान समझते हैं। देवता तो नहीं समझेंगे। उनको चक्र का ही पता नहीं।
अभी तुम जानते हो हम शिवबाबा के बच्चे बने हैं। उन्होंने ही हमें 84 का चक्र समझाया है। उनकी मदद से हम भारत को फिर से दैवी पावन राजस्थान बना रहे हैं। यह बड़ी समझ की बात है। किसको समझाने की भी हिम्मत चाहिए। तुम हो शिव शक्ति पाण्डव सेना। पण्डे भी हो, सबको रास्ता बताते हो। तुम्हारे बिगर रूहानी स्वीट होम का रास्ता कोई बता न सके। वह पण्डे लोग तो करके अमरनाथ पर, कोई तीर्थ पर ले जाते हैं। तुम बी.के. तो एकदम सभी से दूर परमधाम ले जाते हो। वह जिस्मानी गाइड हैं - धक्के खिलाने वाले। तुम सभी को बाप के पास शान्तिधाम ले जाते हो। तो सदैव यह याद करना पड़े - हम भारत को फिर से दैवी राजस्थान बना रहे हैं। यह तो कोई भी मानेंगे। भारत का आदि सनातन देवी-देवता धर्म था। भारत सतयुग में बेहद का दैवी पावन राजस्थान था, फिर पावन क्षत्रिय राजस्थान बना, फिर माया की प्रवेशता होने से आसुरी राजस्थान बन जाता है। यहाँ भी पहले राजा रानी राज्य करते थे, परन्तु बिगर लाइट के ताज वाली राजाई चलती आई है। दैवी राजस्थान के बाद हुआ आसुरी पतित राजस्थान, अभी तो पतित प्रजा का स्थान है, पंचायती राजस्थान। वास्तव में इनको राजस्थान कह नहीं सकते, परन्तु नाम लगा दिया है। राजाई तो है नहीं। यह भी ड्रामा बना हुआ है। यह लक्ष्मी-नारायण के चित्र तुमको बहुत काम आयेंगे। इन पर समझाना है, भारत ऐसा डबल सिरताज था। इन लक्ष्मी-नारायण का राज्य था, छोटेपन में राधे कृष्ण थे, फिर त्रेता में रामराज्य हुआ, फिर द्वापर में माया आ गई। यह तो बिल्कुल सहज है ना। भारत की हिस्ट्री-जॉग्राफी नटशेल में समझाते हैं। द्वापर में ही फिर पावन राजा-रानी लक्ष्मी-नारायण के मन्दिर बने। देवतायें स्वयं तो वाममार्ग में चले गये। पतित होने लग पड़े। फिर जो पावन देवतायें होकर गये हैं, उनके मन्दिर बनाकर पूजा शुरू की। पतित ही पावन को माथा टेकते हैं। जब तक ब्रिटिश गवर्मेन्ट का राज्य था तो राजा-रानी थे। जमींदार भी राजा रानी का लकब (टाइटल) ले लेते थे, इससे उनका दरबार में मान होता था। अभी तो कोई राजा नहीं है। पीछे जब आपस में लड़े हैं तब मुसलमान आदि आये हैं। अभी तुम बच्चे जानते हो फिर से कलियुग का अन्त आ गया है। विनाश सामने खड़ा है। बाप फिर से राजयोग सिखला रहे हैं। कैसे स्थापना होती है, सो तो तुम जानते हो, फिर यह हिस्ट्री-जॉग्राफी मिट जाती है। फिर भक्ति में वो लोग अपनी गीता बना देते हैं, उसमें बहुत फ़र्क पड़ जाता है। भक्ति के लिए उन्हों को देवी-देवता धर्म का पुस्तक जरूर चाहिए। सो ड्रामा अनुसार गीता बना दी है। ऐसे नहीं भक्ति मार्ग की उस गीता से कोई राजाई स्थापन करेंगे वा नर से नारायण बनेंगे। बिल्कुल नहीं।
अब बाप समझाते हैं तुम हो गुप्त सेना। बाबा भी गुप्त है। तुमको भी गुप्त योगबल से राजाई प्राप्त करा रहे हैं। बाहुबल से हद की राजाई मिलती है। योगबल से बेहद की राजाई मिलती है। तुम बच्चों को दिल अन्दर यह निश्चय है कि हम अभी भारत को वही दैवी राजस्थान बना रहे हैं। जो मेहनत करता है, उसकी मेहनत छिपी नहीं रह सकती। विनाश तो होना ही है। गीता में भी यह बात है। पूछते हैं, इस समय की मेहनत अनुसार हमको भविष्य में क्या पद मिलेगा? यहाँ भी कोई शरीर छोड़ता है तो संकल्प चलेगा कि यह किस पद को प्राप्त करेगा। सो तो बाप ही जाने कि इसने किस प्रकार से तन-मन-धन की सेवा की है! यह बच्चे नहीं जान सकते, बापदादा जाने। बताया भी जा सकता है, इस प्रकार की सेवा तुमने की है। ज्ञान उठाया या नहीं, परन्तु मदद तो बहुत की है। जैसे मनुष्य दान करते हैं तो समझते हैं संस्था बहुत अच्छी है। अच्छा कार्य कर रही है। परन्तु मेरे में पावन रहने की ताकत नहीं है। मैं यज्ञ को मदद करता हूँ। तो उसका भी रिटर्न उनको मिल जाता है। जैसे मनुष्य कालेज बनाते हैं, हॉस्पिटल बनाते हैं औरों के लिए। ऐसे नहीं कहेंगे कि मैं बीमार पडूँ तो हॉस्पिटल में जाऊं। जो कुछ बनाते हैं दूसरों के लिए। तो उसका फल भी मिलता है, उसको दान कहा जाता है। यहाँ फिर क्या होता है। आशीर्वाद देते हैं तुम्हारा लोक परलोक सुहेला हो। सुखी हो। लोक और परलोक, सो तो इस संगमयुग की बात है। यह है मृत्युलोक का जन्म और अमरलोक का जन्म, दोनों सफल हों। बरोबर तुम्हारा अभी यह जन्म सफल हो रहा है, फिर कोई तन से कोई मन से कोई धन से सेवा करते हैं। बहुत हैं जो ज्ञान नहीं उठा सकते हैं, कहते हैं बाबा हमारे में हिम्मत नहीं है। बाकी मदद कर सकते हैं। तो बाप बतायेंगे कि तुम इतना धनवान बन सकते हो। कोई भी बात हो तो पूछ सकते हो। फालो फादर करना है तो पूछना भी उनसे है, इस हालत में हम क्या करें? श्रीमत देने वाला बाप बैठा है। उनसे पूछना है, छिपाना नहीं है। नहीं तो बीमारी बढ़ जायेगी। कदम-कदम श्रीमत पर न चले तो रोला पड़ जायेगा। बाबा कोई दूर थोड़ेही है। सम्मुख आकर पूछना चाहिए। ऐसे बापदादा के पास घड़ी-घड़ी आना चाहिए। वास्तव में ऐसे मोस्ट बिलवेड बाप के साथ तो इकट्ठा रहना चाहिए। साजन को चटक जाना चाहिए, वह है जिस्मानी, यह है रूहानी। इसमें चटकने की बात नहीं, यहाँ सबको बिठा नहीं देंगे। यह ऐसी चीज़ है, बस सामने बैठे ही रहें, सुनते ही रहें। उनकी मत पर चलते ही रहें। परतु बाबा कहेंगे यहाँ बैठ नहीं जाना है। गंगा नदी बनो, जाओ सर्विस पर। बच्चों का लव ऐसा होना चाहिए - जैसे मस्ताना होता है। परन्तु फिर सर्विस भी तो करनी है। निश्चयबुद्धि तो एकदम लटक पड़ते हैं। बच्चे लिखते हैं फलाना बहुत अच्छा निश्चयबुद्धि है। मैं लिखता हूँ कुछ भी नहीं समझा है। अगर निश्चयबुद्धि है कि स्वर्ग का मालिक बनाने वाला बाप आ गया है तो एक सेकेण्ड भी मिलने बिगर रह न सके। बहुत ही बच्चियाँ हैं जो तड़पती हैं। फिर घर बैठे उनको साक्षात्कार होते हैं ब्रह्मा और कृष्ण का। निश्चय हो कि बाप परमधाम से हमें राजधानी देने आये हैं तो फिर आकर बाबा से मिलें। ऐसे भी आते हैं फिर समझाया जाता है कि ज्ञान गंगा बनो। प्रजा तो बहुत चाहिए। राजधानी स्थापन हो रही है। यह चित्र समझाने लिए बहुत अच्छा है। तुम किसको भी कह सकते हो कि हम फिर से राजधानी स्थापन कर रहे हैं। विनाश भी सामने खड़ा है। मरने से पहले बाप से वर्सा लेना है। सभी चाहते हैं वन आलमाइटी गवर्मेन्ट हो। अब सब मिलकर एक थोड़ेही बन सकते हैं। एक राज्य था जरूर, जिसका गायन भी है। सतयुग का नाम बहुत बाला है। फिर से उसकी स्थापना हो रही है। कोई इन बातों को झट मानेंगे, कोई नहीं मानेंगे। पाँच हजार वर्ष पहले लक्ष्मी-नारायण का राज्य था फिर इन राजाओं का राज्य हो गया। राजायें भी अब पतित हो गये हैं। अब फिर पावन लक्ष्मी-नारायण का राज्य होगा। तुम्हारे लिए तो समझाना बहुत ही सहज है। हम दैवी राजधानी स्थापन कर रहे हैं, शिवबाबा की श्रीमत से और उनकी मदद से। शिवबाबा से शक्ति भी मिलती है। यह नशा रहना चाहिए। तुम वारियर्स हो। मन्दिरों में भी तुम जाकर समझा सकते हो तो स्वर्ग की स्थापना जरूर रचयिता द्वारा ही होगी ना। तुम जानते हो बेहद का बाप एक है। तुम्हारे सम्मुख तुमको ज्ञान श्रृंगार कर रहे हैं। राजयोग सिखला रहे हैं। वो गीता सुनाने वाले कभी राजयोग सिखला न सकें। यह अभी तुम बच्चों की बुद्धि में नशा चढ़ाया जाता है। बाबा आया है स्वर्ग की स्थापना करने। स्वर्ग में है ही पावन राजस्थान। मनुष्य तो लक्ष्मी-नारायण के राज्य को ही भूल गये हैं। अब बाप सम्मुख बैठ समझाते हैं, तुम कोई भी गीता पाठशाला आदि में चले जाओ। सारी हिस्ट्री-जॉग्राफी अथवा 84 जन्मों का समाचार कोई सुना न सके। लक्ष्मी-नारायण के चित्र साथ राधे कृष्ण का भी हो तो समझाने में सहज होगा। यह है करेक्ट चित्र। लिखत भी उनकी अच्छी हो। तुम्हारी बुद्धि में सारा चक्र याद है। साथ में चक्र को समझाने वाला भी याद है। बाकी निरन्तर याद के अभ्यास में मेहनत बहुत है। निरन्तर याद ऐसी पक्की हो जो अन्त में कोई किचड़पट्टी याद न आये। बाप को कभी भूलना नहीं है। छोटे बच्चे बाप को बहुत याद करते हैं फिर बच्चा बड़ा होता है तो धन को याद करते हैं। तुमको भी धन मिलता है। जो अच्छी रीति धारण कर फिर दान करना चाहिए। पूरा फ्लेन्थ्रोफिस्ट बनना है। मैं सम्मुख आकर राजयोग सिखाता हूँ। वह गीता तो जन्म जन्मान्तर पढ़ी, कुछ भी प्राप्ति नहीं हुई। यहाँ तो तुमको नर से नारायण बनाने लिए यह शिक्षा दे रहा हूँ। वह है भक्ति मार्ग। यहाँ भी कोटों में कोई निकलेगा जो तुम्हारे दैवी घराने का होगा। फिर ब्राह्मण बनने जरूर आयेंगे, फिर चाहे राजा रानी बनें, चाहे प्रजा। उसमें भी कई तो सुनन्ती, कथन्ती, भागन्ती हो जाते हैं। जो बच्चा बन फिर फारकती देते हैं, उन पर बहुत बड़ा दण्ड है। कड़ी सजा है। इस समय ऐसा कोई कह नहीं सकता कि हम निरन्तर याद करते हैं। अगर कोई कहे तो चार्ट लिखकर भेजे तो बाबा सब समझ जायेंगे। भारत की सेवा में ही तन-मन-धन लगा रहे हैं। लक्ष्मी-नारायण का चित्र हमेशा पाकेट में पड़ा हो। बच्चों को बहुत नशा होना चाहिए।
सोशल वर्कर्स तुम्हारे से पूछते हैं तुम भारत की क्या सेवा कर रहे हो? बोलो, हम अपने तन-मन-धन से भारत को दैवी राजस्थान बना रहे हैं। ऐसी सेवा और कोई कर नहीं सकता। तुम जितनी सर्विस करेंगे उतनी बुद्धि रिफाइन होती जायेगी। ऐसे भी बहुत बच्चे हैं जो ठीक रीति नहीं समझा सकते हैं तो नाम बदनाम होता है। कोई-कोई में क्रोध का भूत भी है तो यह भी डिस्ट्रेक्टिव काम किया ना। उनको कहेंगे तुम अपना मुँह तो देखो। तुम लक्ष्मी या नारायण को वरने लायक बने हो? ऐसे जो आबरू (इज्जत) गँवाने वाले बच्चे हैं, वह क्या पद पायेंगे। वह प्यादों की लाइन में आ जाते हैं। तुम भी सेना हो ना। अच्छा।
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का यादप्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।
धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) अविनाशी ज्ञान रत्नों का महादानी बनना है। तन-मन-धन से भारत को स्वर्ग बनाने की सेवा करनी है।
2) कोई भी डिस्ट्रेक्टिव (विनाशकारी) कार्य नहीं करना है। निरन्तर याद के अभ्यास में रहना है।
वरदान:- एकरस और निरन्तर खुशी की अनुभूति द्वारा नम्बरवन लेने वाले अखुट खजाने से सम्पन्न भव
नम्बरवन में आने के लिए एकरस और निरन्तर खुशी की अनुभूति करते रहो, किसी भी झमेले में नहीं जाओ। झमेले में जाने से खुशी का झूला ढीला हो जाता है फिर तेज नहीं झूल सकते इसलिए सदा और एकरस खुशी के झूले में झूलते रहो। बापदादा द्वारा सभी बच्चों को अविनाशी, अखुट और बेहद का खजाना मिलता है। तो सदा उन खजानों की प्राप्ति में एकरस और सम्पन्न रहो। संगमयुग की विशेषता है अनुभव, इस युग की विशेषता का लाभ उठाओ।
स्लोगन:- मन्सा महादानी बनना है तो रूहानी स्थिति में सदा स्थित रहो।
15.01.2023 HINDI MURLI
संगमयुग के राजदुलारे सो भविष्य के राज्य अधिकारी
आज सर्व बच्चों के दिलाराम बाप अपने चारों ओर के सर्व राजदुलारे बच्चों को देख रहे हैं। हर एक बच्चा दिलाराम के दुलार का पात्र है। यह दिव्य दुलार, परमात्म दुलार कोटों में कोई भाग्यवान आत्माओं को ही प्राप्त होता है। अनेक जन्म आत्माओं वा महान् आत्माओं द्वारा दुलार अनुभव किया। अब इस एक अलौकिक जन्म में परमात्म प्यार वा दुलार अनुभव कर रहे हो। इस दिव्य दुलार द्वारा राज दुलारे बन गये हो, इसलिये दिलाराम बाप को भी अलौकिक फ़खर है कि मेरा हर एक बच्चा राजा बच्चा है। राजा हो ना? प्रजा तो नहीं? सभी अपना टाइटल क्या बताते हो? राजयोगी। सभी राजयोगी हो वा कोई प्रजायोगी भी है? सब राजयोगी हो तो प्रजा कहाँ से आयेगी? राज्य किस पर करेंगे? प्रजा तो चाहिये ना? तो वो प्रजायोगी कब आयेंगे? राजदुलारे अर्थात् अब के भी राजे और भविष्य के भी राजे। डबल राज्य है। स़िर्फ भविष्य का राज्य नहीं। भविष्य से पहले अब स्वराज्य अधिकारी बने हो। अपने स्वराज्य के राज्य कारोबार को चेक करते हो? जैसे भविष्य राज्य की महिमा करते हो - एक राज्य, एक धर्म, सुख, शान्ति, सम्पत्ति सम्पन्न राज्य है, ऐसे हे स्वराज्य अधिकारी राजे, स्वराज्य के राज कारोबार में यह सब बातें सदा हैं?
एक राज्य है अर्थात् सदा मुझ आत्मा का राज्य इन सर्व राज्य कारोबारी कर्मेन्द्रियों पर है वा बीच-बीच में स्वराज्य के बजाय पर-राज्य अपना अधिकार तो नहीं करते? पर-राज्य है - माया का राज्य। पर-राज्य की निशानी है पर-अधीन बन जायेंगे। स्वराज्य की निशानी है सदा श्रेष्ठ अधिकारी अनुभव करेंगे। पर-राज्य, पर-अधीन वा परवश बनाता है। जब भी कोई अन्य राजा किसी राज्य पर अधिकार प्राप्त करता है तो पहले राजा को ही कैदी बनाता है अर्थात् पर-अधीन बनाता है। तो चेक करो कि एक राज्य है? कि बीच-बीच में माया के राज्य अधिकारी, आप स्वराज्य अधिकारी राजाओं को वा आपके कोई भी कर्मेन्द्रियों रूपी राज कारोबारी को परवश तो नहीं बना देते हैं? तो एक राज्य है वा दो राज्य है? आप स्वराज्य अधिकारी का लॉ और ऑर्डर चलता है वा बीच-बीच में माया का भी ऑर्डर चलता है?
साथ-साथ एक धर्म, धर्म अर्थात् धारणा। तो स्वराज्य का धर्म वा धारणा एक कौन-सी है? ‘पवित्रता'। मन, वचन, कर्म, सम्बन्ध, सम्पर्क सब प्रकार की पवित्रता इसको कहा जाता है - एक धर्म अर्थात् एक धारणा। स्वप्न मात्र, संकल्प मात्र भी अपवित्रता अर्थात् दूसरा धर्म न हो क्योंकि जहाँ पवित्रता है वहाँ अपवित्रता अर्थात् व्यर्थ वा विकल्प का नाम-निशान नहीं होगा। ऐसे समर्थ सम्राट बने हो? वा ढीलेढाले राजे हो? वा कभी ढीले, कभी सम्राट? कौन से राजे हो? अगर अभी छोटा-सा एक जन्म का राज्य नहीं चला सकते तो 21 जन्म का राज्य अधिकार कैसे प्राप्त करेंगे? संस्कार अब भर रहे हैं। अभी के श्रेष्ठ संस्कार से भविष्य संसार बनेगा। तो अभी से एक राज्य, एक धर्म के संस्कार भविष्य संसार का फाउण्डेशन हैं।
तो चेक करो - सुख, शान्ति, सम्पत्ति अर्थात् सदा हद की प्राप्तियों के आधार पर सुख है वा आत्मिक अतीन्द्रिय सुख परमात्म सुखमय राज्य है? साधन वा सैलवेशन वा प्रशंसा के आधार पर सुख की अनुभूति है वा परमात्म आधार पर अतीन्द्रिय सुखमय राज्य है? इसी प्रकार से अखण्ड शान्ति - किसी भी प्रकार की अशान्ति की परिस्थिति अखण्ड शान्ति को खण्डित तो नहीं करती है? अशान्ति का त़ूफान चाहे छोटा हो, चाहे बड़ा हो लेकिन स्वराज्य अधिकारी के लिये त़ूफान अनुभवी बनाने की उड़ती कला का तोह़फा बन जाये, लिफ्ट की गिफ्ट बन जाये। इसको कहा जाता है अखण्ड शान्ति। तो चेक करो अखण्ड शान्तिमय स्वराज्य है?
ऐसे ही सम्पत्ति अर्थात् स्वराज्य की सम्पत्ति ज्ञान, गुण और शक्तियां हैं। इन सर्व सम्पत्तियों से सम्पन्न स्वराज्य अधिकारी हैं? सम्पन्नता की निशानी है - सम्पन्नता अर्थात् सदा सन्तुष्टता, अप्राप्ति का नाम-निशान नहीं। हद के इच्छाओं की अविद्या इसको कहा जाता है सम्पत्तिवान। और राजा का अर्थ ही है दाता। अगर हद की इच्छा वा प्राप्ति की उत्पत्ति है तो वो राजा के बजाय मंगता (मांगने वाला) बन जाता है, इसलिये अपने स्वराज्य अधिकार को अच्छी तरह से चेक करो कि मेरा स्वराज्य एक राज्य, एक धर्म, सुख-शान्ति सम्पन्न बना है? कि अभी तक बन रहे हैं? अगर राजा बन रहे हैं तो जब राज्य अधिकारी स्थिति नहीं है तो उस समय क्या हो? प्रजा बन जाते हो वा न राजा, न प्रजा। बीच में हो? अभी बीच में नहीं रहो। यह भी नहीं सोचना कि अन्त में बन जायेंगे। अगर बहुतकाल का राज्य-भाग्य प्राप्त करना ही है तो बहुतकाल के स्वराज्य का फल है बहुतकाल का राज्य। फुल समय के राज्य अधिकार का आधार वर्तमान सदाकाल का स्वराज्य है। समझा? कभी अलबेले नहीं रह जाना। हो जायेगा, हो जायेगा नहीं करते रहना। बाप-दादा को बहुत मीठी बातों से बहलाते हैं। राजा के बजाय बहुत बढ़िया वकील बन जाते हैं। ऐसी-ऐसी लॉ प्वॉइन्ट्स सुनाते हैं जो बाप भी मुस्कराते रहते हैं। वकील अच्छा या राजा अच्छा? बहुत होशियारी से वकालत करते हैं इसलिये अब वकालत करना छोड़ दो, राज दुलारे बनो। बाप का बच्चों से स्नेह है इसलिये सुनते-देखते भी मुस्कराते रहते हैं। अभी धर्मराज से काम नहीं लेते।
स्नेह सभी को चला रहा है। स्नेह के कारण ही पहुँच गये हो ना। तो स्नेह के रेसपान्स में बापदादा भी पद्मगुणा स्नेह का रिटर्न दे रहे हैं। देश-विदेश के सभी बच्चे स्नेह के विमान द्वारा मधुबन में पहुँचे हो। बापदादा साकार रूप में आप सबको और स्नेह स्वरूप में सर्व बच्चों को देख रहे हैं। अच्छा!
सर्व स्नेह में समाये हुए समीप बच्चों को, सर्व स्वराज्य अधिकारी सो विश्व राज्य अधिकारी श्रेष्ठ आत्माओं को, सर्व प्राप्तियों सम्पन्न श्रेष्ठ सम्पत्तिवान विशेष आत्माओं को, सदा एक धर्म, एक राज्य सम्पन्न स्वराज्य अधिकारी बाप समान भाग्यवान आत्माओं को भाग्यविधाता बापदादा का याद-प्यार और नमस्ते।
दादियों से मुलाकात:- सभी कार्य अच्छे चल रहे हैं ना? अच्छे उमंग-उत्साह से कार्य हो रहा है। करावनहार करा रहे हैं और निमित्त बन करने वाले कर रहे हैं। ऐसे अनुभव होता है ना? सर्व के सहयोग की अंगुली से हर कार्य सहज और सफल होता है। कैसे हो रहा है ये जादू लगता है ना। दुनिया वाले तो देखते और सोचते रह जाते हैं। और आप निमित्त आत्मायें सदा आगे बढ़ते जायेंगे क्योंकि बे]िफा बादशाह हो। दुनिया वालों को तो हर कदम में चिन्ता है और आप सबके हर संकल्प में परमात्म चिन्तन है इसलिये बे]िफा हैं। बे]िफा हैं ना? अच्छा है, अविनाशी सम्बन्ध है। अच्छा, तो सब ठीक चल रहा है और चलना ही है। निश्चय है और निश्चिन्त हैं। क्या होगा, कैसे होगा यह चिन्ता नहीं है।
टीचर्स को कोई चिन्ता है? सेन्टर्स कैसे बढ़ेंगे यह चिन्ता है? सेवा कैसे बढ़ेगी यह चिन्ता है? नहीं है? बे]िफा हो? चिन्तन करना अलग चीज़ है, चिन्ता करना अलग चीज़ है। सेवा बढ़ाने का चिन्तन अर्थात् प्लैन भले बनाओ। लेकिन चिन्ता से कभी सफलता नहीं होगी। चलाने वाला चला रहा है, कराने वाला करा रहा है इसलिये सब सहज होना ही है, स़िर्फ निमित्त बन संकल्प, तन, मन, धन सफल करते चलो। जिस समय जो कार्य होता है वो कार्य हमारा कार्य है। जब हमारा कार्य है, मेरा कार्य है तो जहाँ मेरापन होता है वहाँ सब कुछ स्वत: ही लग जाता है। तो अभी ब्राह्मण परिवार का विशेष कार्य कौन-सा है? टीचर्स बताओ। ब्राह्मण परिवार का अभी विशेष कार्य कौन सा है, किसमें सफल करेंगे? (ज्ञान सरोवर में) सरोवर में सब स्वाहा करेंगे। परिवार में जो विशेष कार्य होता है तो सबका अटेन्शन कहाँ होता है? उसी विशेष कार्य के तरफ अटेन्शन होता है। ब्राह्मण परिवार में बड़े से बड़ा कार्य वर्तमान समय यही है ना। हर समय का अपना-अपना है, वर्तमान समय देश-विदेश सर्व ब्राह्मण परिवार का सहयोग इस विशेष कार्य में है ना कि अपने-अपने सेन्टर में है? जितना बड़ा कार्य उतना बड़ा दिल। और जितना बड़ा दिल होता है ना उतना स्वत: ही सम्पन्नता होती है। अगर छोटा दिल होता है तो जो आना होता है वह भी रुक जाता है, जो होना होता है वह भी रुक जाता है और बड़े दिल से असम्भव भी सम्भव हो जाता है। मधुबन का ज्ञान सरोवर है वा आपका है? किसका है? मधुबन का है ना? गुजरात का तो नहीं है, मधुबन का है? महाराष्ट्र का है? विदेश का है? सभी का है। बेहद की सेवा का बेहद का स्थान अनेक आत्माओं को बेहद का वर्सा दिलाने वाला है। ठीक है ना। अच्छा!
अव्यक्त बापदादा की पर्सनल मुलाकात
1) स्व-परिवर्तन का वायब्रेशन ही विश्व परिवर्तन करायेगा
सभी अपने को खुशनसीब आत्मायें अनुभव करते हो? खुशी का भाग्य जो स्वप्न में भी नहीं था वो प्राप्त कर लिया। तो सभी की दिल सदा यह गीत गाती है कि सबसे खुशनसीब हूँ तो मैं हूँ। यह है मन का गीत। मुख का गीत गाने के लिये मेहनत करनी पड़ती है। लेकिन मन का गीत सब गा सकते हैं। सबसे बड़े से बड़ा ख़ज़ाना है खुशी का ख़ज़ाना क्योंकि खुशी तब होती है जब प्राप्ति होती है। अगर अप्राप्ति होगी तो कितना भी कोई किसी को खुश रहने के लिये कहे, कितना भी आर्टीफिशयल खुश रहने की कोशिश करे लेकिन रह नहीं सकते। तो आप सदा खुश रहते हो या कभी-कभी रहते हो? जब चैलेन्ज करते हो कि हम भगवान के बच्चे हैं, तो जहाँ भगवान् है वहाँ कोई अप्राप्ति हो सकती है? तो खुशी भी सदा है क्योंकि सदा सर्व प्राप्ति स्वरूप हैं। ब्रह्मा बाप का क्या गीत था? पा लिया - जो था पाना। तो यह स़िर्फ ब्रह्मा बाप का गीत है या आप सबका? कभी-कभी थोड़ी दु:ख की लहर आ जाती है? कब तक आयेगी? अभी थोड़ा समय भी दु:ख की लहर नहीं आये। जब विश्व परिवर्तन करने के निमित्त हो तो अपना ये परिवर्तन नहीं कर सकते हो? अभी भी टाइम चाहिये, फुलस्टॉप लगाओ। ऐसा श्रेष्ठ समय, श्रेष्ठ प्राप्तियाँ, श्रेष्ठ सम्बन्ध सारे कल्प में नहीं मिलेगा। तो पहले स्व-परिवर्तन करो। यह स्व-परिवर्तन का वायब्रेशन ही विश्व परिवर्तन करायेगा।
डबल विदेशी आत्माओं की विशेषता है फ़ास्ट लाइफ़। तो परिवर्तन में फ़ास्ट हैं? फ़ारेन में कोई ढीला-ढाला चलता है तो अच्छा नहीं लगता है ना। तो इसी विशेषता को परिवर्तन में लाओ। अच्छा है। आगे बढ़ रहे हैं और बढ़ते ही रहेंगे। पहचानने की दृष्टि अच्छी तेज़ है जो बाप को पहचान लिया। अभी पुरुषार्थ में भी तीव्र, सेवा में भी तीव्र और मंज़िल पर सम्पूर्ण बन पहुँचने में भी तीव्र। फ़र्स्ट नम्बर आना है ना? जैसे ब्रह्मा बाप फर्स्ट हुआ ना तो ब्रह्मा बाप के साथी बन फर्स्ट के साथ फर्स्ट में आयेंगे। ब्रह्मा बाप से प्यार है ना। अच्छा, मातायें कमाल करेंगी ना। जो दुनिया असम्भव समझती है वो आपने सहज करके दिखा दिया। ऐसा कमाल कर रही हो ना। दुनिया वाले समझते हैं कि मातायें निर्बल हैं, कुछ नहीं कर सकतीं आप असम्भव को सम्भव करके विश्व परिवर्तन में सबसे आगे बढ़ रही हो। पाण्डव क्या कर रहे हो? असम्भव को सम्भव तो कर रहे हो ना। पवित्रता का झण्डा लहराया है ना। हाथ में अच्छी तरह से झण्डा पकड़ा है या कभी नीचे हो जाता है? सदा पवित्रता के चैलेन्ज का झण्डा लहराते रहो।
2) रोज़ अमृतवेले कम्बाइण्ड स्वरूप की स्मृति का तिलक लगाओ
सदा अपने को सहज योगी अनुभव करते हो? कितनी भी परिस्थितियां मुश्किल अनुभव कराने वाली हों लेकिन मुश्किल को भी सहज करने वाले सहजयोगी हैं, ऐसे हो या मुश्किल के समय मुश्किल का अनुभव होता है? सदा सहज है? मुश्किल होने का कारण है बाप का साथ छोड़ देते हो। जब अकेले बन जाते हो तो कमजोर पड़ जाते हो और कमजोर को तो सहज बात भी मुश्किल लगती है इसलिये बापदादा ने पहले भी सुनाया है कि सदा कम्बाइण्ड रूप में रहो। कम्बाइण्ड को कोई अलग नहीं कर सकता। जैसे इस समय आत्मा और शरीर कम्बाइण्ड है ऐसे बाप और आप कम्बाइण्ड रहो। मातायें क्या समझती हो? कम्बाइण्ड हो या कभी अलग, कभी कम्बाइण्ड? ऐसा साथ फिर कभी मिलना है? फिर क्यों साथ छोड़ देती हो? काम ही क्या दिया है? स़िर्फ यह याद रखो कि ‘मेरा बाबा'। इससे सहज काम क्या होगा? मुश्किल है? (63 जन्मों का संस्कार है) अभी तो नया जन्म हो गया ना। नया जन्म, नये संस्कार। अभी पुराने जन्म में हो या नये जन्म में? या आधा-आधा है? तो नये जन्म में स्मृति के संस्कार हैं या विस्मृति के? फिर नये को छोड़कर पुराने में क्यों जाते हो? नई चीज़ अच्छी लगती है या पुरानी चीज़ अच्छी लगती है? फिर पुराने में क्यों चले जाते हो? रोज़ अमृतवेले स्वयं को ब्राह्मण जीवन के स्मृति का तिलक लगाओ। जैसे भक्त लोग तिलक ज़रूर लगाते हैं तो आप स्मृति का तिलक लगाओ। वैसे भी देखो मातायें जो तिलक लगाती है वो साथ का तिलक लगाती हैं। तो सदा स्मृति रखो कि हम कम्बाइण्ड हैं तो इस साथ का तिलक सदा लगाओ। अगर युगल होगा तो तिलक लगायेंगे, अगर युगल नहीं होगा तो तिलक नहीं लगायेंगे। यह साथ का तिलक है। तो रोज़ स्मृति का तिलक लगाती हो या भूल जाता है? कभी लगाना भूल जाता, कभी मिट जाता! जो सुहाग होता है, साथ होता है वह कभी भूलता नहीं। तो साथी को सदा साथ रखो।
यह ग्रुप सुन्दर गुलदस्ता है। वैराइटी फूलों का गुलदस्ता शोभनीक लगता है। तो सभी जो भी, जहाँ से भी आये हैं, सभी एक-दो से प्यारे हैं। सभी सन्तुष्ट हो ना? सदा साथ हैं और सदा सन्तुष्ट हैं। बस, यही एक शब्द याद रखना कि कम्बाइण्ड हैं और सदा ही कम्बाइण्ड रह साथ जायेंगे। लेकिन साथ रहेंगे तो साथ चलेंगे। साथ रहना है, साथ चलना है। जिससे प्यार होता है उससे अलग हो नहीं सकते। हर सेकेण्ड, हर संकल्प में साथ है ही। अच्छा!
वरदान:- बैलेन्स की विशेषता को धारण कर सर्व को ब्लैसिंग देने वाले शक्तिशाली, सेवाधारी भव
अभी आप शक्तिशाली आत्माओं की सेवा है सर्व को ब्लैसिंग देना। चाहे नयनों से दो, चाहे मस्तकमणी द्वारा दो। जैसे साकार को लास्ट कर्मातीत स्टेज के समय देखा-कैसे बैलेन्स की विशेषता थी और ब्लैसिंग की कमाल थी। तो फालो फादर करो - यही सहज और शक्तिशाली सेवा है। इसमें समय भी कम, मेहनत भी कम और रिजल्ट ज्यादा निकलती है। तो आत्मिक स्वरूप से सबको ब्लैसिंग देते चलो।
स्लोगन:- विस्तार को सेकण्ड में समाकर ज्ञान के सार का अनुभव कराना ही लाइट-माइट हाउस बनना है।
सूचनाः- आज मास का तीसरा रविवार है, सभी राजयोगी तपस्वी भाई बहिनें सायं 6.30 से 7.30 बजे तक, विशेष योग अभ्यास के समय लाइट माइट स्वरूप में स्थित रह लाइट हाउस बन पूरे ग्लोब पर शान्ति और शक्ति की सकाश फैलायें।
ओम् शान्ति। भोलानाथ सदैव शिवबाबा को कहा जाता है। शंकर को नहीं कहा जाता। वह तो विनाश करता है और शिवबाबा स्थापना करते हैं। यह तो जरूर है स्थापना स्वर्ग की और विनाश नर्क का करेंगे। तो ज्ञान सागर भोलानाथ शिव को ही कहेंगे। अब तुम बच्चे तो अनुभवी हो। जरूर कल्प पहले भी शिवबाबा आया होगा और अब आया है जरूर। उनको आना जरूर है क्योंकि नई मनुष्य सृष्टि को रचना है। इस ड्रामा के आदि मध्य अन्त का राज़ बताना है इसलिए जरूर यहाँ आना है। सूक्ष्मवतन में तो नहीं बतायेंगे। सूक्ष्मवतन की भाषा अलग है, मूलवतन में तो भाषा है नहीं। यहाँ है टाकी। शिवबाबा ही बिगड़ी को बनाने वाला है। जब सृष्टि तमोप्रधान हो जाती है तो सबको सद्गति देने वाला भगवान कहते हैं कि मुझे आना पड़ता है। यादगार भी यहाँ हैं। इस नाटक में जो-जो मनुष्य के चित्र हैं वह एक ही बार देख सकते हैं। ऐसे नहीं कि लक्ष्मी-नारायण के चित्र (चेहरे) सतयुग के सिवाए कभी भी कहाँ देख सकते हैं। वह पुनर्जन्म लेंगे तो नाम रूप भिन्न हो जायेगा। वही लक्ष्मी-नारायण का रूप एक बार देखा फिर 5 हजार वर्ष के बाद ही देखेंगे। जैसे गांधी का हूबहू चित्र फिर 5 हजार वर्ष के बाद देखेंगे। अथाह मनुष्य हैं जो भी मनुष्यों के चित्र अब देखे हैं वह फिर 5 हजार वर्ष के बाद देखेंगे। 84 जन्मों के लिए 84 चित्र बनेंगे। और सभी भिन्न-भिन्न होंगे। कर्म भी किसके साथ नहीं मिल सकते। जिसने जो कर्म किया, वही कर्म 5 हजार वर्ष के बाद फिर करेंगे। यह बहुत समझने की बातें हैं। बाबा का भी चित्र है। हम समझते हैं जरूर पहले-पहले सृष्टि रचने वह आया होगा। तुम्हारी बुद्धि का ताला अब खुला है तब तुम समझते हो। अब फिर औरों का भी ऐसे ताला खोलना है। निराकार बाप जरूर परमधाम में रहते होंगे। जैसे तुम भी सब मेरे साथ रहते हो। पहले जब मैं आता हूँ तो मेरे साथ ब्रह्मा, विष्णु, शंकर होते हैं। मनुष्य सृष्टि तो पहले से ही है फिर वह कैसे पलटा खाती है, रिपीट कैसे होती है। पहले-पहले जरूर सूक्ष्मवतन रचना पड़े फिर स्थूलवतन में आना पड़े क्योंकि मनुष्य जो देवता थे, वह अब शूद्र बने हैं। उन्हों को फिर ब्राह्मण से देवता बनाना पड़े। तो जो कल्प पहले मैंने ज्ञान दिया था फिर वही रिपीट करूंगा। इस समय बैठ राजयोग सिखाता हूँ। फिर आधाकल्प के बाद भक्ति आरम्भ होती है। बाप खुद बैठ समझाते हैं कि पुरानी सृष्टि फिर नई कैसे बनती है। अन्त से फिर आदि कैसे होती है। मनुष्य समझते हैं परमात्मा आया था परन्तु कब, कैसे आया। आदि-मध्य-अन्त का राज़ कैसे खोला, यह नहीं जानते।
बाप कहते हैं फिर मैं सम्मुख आया हूँ - सभी को सद्गति देने। माया रावण ने सभी की किस्मत बिगाड़ दी है तो बिगड़ी को बनाने वाला जरूर कोई चाहिए। बाप कहते हैं 5 हजार वर्ष पहले भी ब्रह्मा तन में आया था। मनुष्य सृष्टि जरूर यहाँ ही रची है। यहाँ आकर सृष्टि को पलटाए काया कल्प वृक्ष समान बनाते हैं। अब तुम्हारी काया बिल्कुल पुरानी हो गयी है, इसको फिर ऐसा बनाते हैं जो आधाकल्प के लिए तुम अमर बन जाते हो। भल शरीर बदलते हो परन्तु खुशी से। जैसे पुराना चोला छोड़ नया लेते हैं। वहाँ ऐसे नहीं कहेंगे कि फलाना मर गया, उनको मरना नहीं कहा जाता है। जैसे तुम्हारा यह जीते जी मरना है तो तुम मरे थोड़ेही हो। तुम तो शिवबाबा के बने हो। बाबा कहते हैं तुम मेरे नूरे रत्न, सिकीलधे बच्चे हो। शिवबाबा भी कहते तो ब्रह्मा बाबा भी कहते हैं। वह निराकारी बाप, यह साकारी बाप। अभी तुम कहते हो बाबा आप भी वही हो ना। हम भी वही हैं, जो फिर आकर मिले हैं। बाप कहते हैं मैं आकर स्वर्ग स्थापन करता हूँ। राजाई तो जरूर चाहिए इसलिए राजयोग सिखाता हूँ। पीछे तो तुमको राजाई मिल जायेगी फिर इस ज्ञान की वहाँ दरकार नहीं रहती। फिर यह शास्त्र आदि सब भक्ति में काम आते हैं, पढ़ते रहते हैं। जैसे कोई बड़े आदमी हिस्ट्री-जॉग्राफी लिख जाते हैं, वह पीछे पढ़ते रहते हैं। अथाह किताब हैं। मनुष्य पढ़ते ही रहते हैं। स्वर्ग में तो कुछ भी नहीं होगा। वहाँ तो भाषा ही एक होगी। तो बाबा कहते हैं अब मैं आया हूँ सृष्टि को नया बनाने। पहले नई थी, अब पुरानी हो गई है। मेरे सब पुत्रों को (बच्चों को) माया ने जलाए राख कर दिया था। वह दिखाते हैं सगर के बच्चे... ज्ञान सागर तो बरोबर है, उनके तुम बच्चे हो। भल बच्चे तो वास्तव में सभी हैं परन्तु तुम बच्चे अब प्रैक्टिकल में गाये जाते हो। तुम्हारे कारण ही बाप आते हैं। कहते हैं मैं आया हूँ फिर से तुम बच्चों को सुरजीत करने। जो बिल्कुल काले, पत्थरबुद्धि हो गये हैं उनको फिर से आकर पारसबुद्धि बनाता हूँ। तुम जानते हो इस ज्ञान से हम पारसबुद्धि कैसे बनते हैं। जब तुम पारसबुद्धि बन जायेंगे तब यह दुनिया भी पत्थरपुरी से बदल पारसपुरी बन जायेगी, जिसके लिए बाबा पुरुषार्थ कराते रहते हैं। तो बाबा को जरूर मनुष्य सृष्टि रचने के लिए यहाँ ही आना पड़ेगा ना। जिसके तन में आते हैं, उन द्वारा मुख वंशावली बनाते हैं। तो यह हो गई माता। कितनी गुह्य बात है। है तो यह मेल, इनमें बाबा आते हैं तो यह माता कैसे हुई, इसमें मूंझेंगे जरूर।
तुम सिद्ध कर बताते हो कि यह मात-पिता, ब्रह्मा सरस्वती दोनों कल्प वृक्ष के नीचे बैठे हैं, राजयोग सीख रहे हैं तो जरूर उन्हों का गुरू चाहिए। ब्रह्मा सरस्वती और बच्चे सभी को राजऋषि कहते हैं। राजाई के लिए योग लगाते हैं। बाप आकर राजयोग और ज्ञान सिखाते हैं जो और कोई भी सिखा न सके। न कोई का राजयोग है। वह तो सिर्फ कहेंगे योग सीखो। हठयोग तो अनेक प्रकार के होते हैं। राजयोग कोई भी सिखला न सके। भगवान ने आकर राजयोग सिखाया था। कहते हैं हमको कल्प-कल्प फिर आना पड़ता है जबकि मनुष्य सृष्टि नई रचनी है। प्रलय तो होती नहीं। अगर प्रलय हो जाए तो फिर हम आवें किसमें? निराकार क्या आकर करेंगे? बाप समझाते हैं सृष्टि तो पहले से ही है। भक्त भी हैं, भगवान को बुलाते भी हैं, इससे सिद्ध है कि भक्त हैं। भगवान को आना ही तब है जब भक्त बहुत दु:खी हैं, कलियुग का अन्त है। रावण राज्य खत्म होना है, तब ही मुझे आना पड़ता है। बरोबर इस समय सभी दु:खी हैं। महाभारी लड़ाई सामने खड़ी है।
यह पाठशाला है। यहाँ एम आबजेक्ट है। तुम जानते हो सतयुग में लक्ष्मी-नारायण का राज्य था फिर सिंगल ताज वालों का राज्य हुआ फिर और-और धर्म वृद्धि को पाये हैं फिर राजाई आदि बढ़ाने के लिए युद्ध आदि हुए। तुम जानते हो जो पास्ट हो गया, वह फिर रिपीट होगा। फिर लक्ष्मी-नारायण का राज्य आरम्भ होगा। बाबा वर्ल्ड की हिस्ट्री-जॉग्राफी का राज़ पूरा समझाते हैं। डिटेल में जाने की दरकार नहीं। जानते हैं कि हम सूर्यवंशी हैं तो जरूर पुनर्जन्म भी सूर्यवंशी में ही लेते होंगे। नाम रूप तो बदलते होंगे। माँ बाप भी दूसरे मिलेंगे, यह सारा ड्रामा बुद्धि में रखना है। बाप कैसे आता है वह भी समझ लिया। मनुष्यों की बुद्धि में वही गीता का ज्ञान है। आगे हमारी बुद्धि में भी वही पुराना गीता का ज्ञान था। अभी बाप गुह्य बातें सुनाते हैं जो सुनते-सुनते सारे राज़ समझ गये हैं। मनुष्य भी कहते हैं आगे आपका ज्ञान और था, अब बहुत अच्छा है। अब समझ गये हैं कि कैसे गृहस्थ व्यवहार में रह कमल फूल समान बनना है। यह सबका अन्तिम जन्म है। मरना भी सबको है। खुद बेहद का बाप कहते हैं तुम पवित्र बनने की प्रतिज्ञा करो तो 21 जन्म के लिए स्वर्ग के मालिक बनेंगे। यहाँ तो कोई पदमपति हैं तो भी दु:खी हैं। काया कल्पतरू होती नहीं। तुम्हारी काया कल्पतरू होती है। तुम 21 जन्म मरते नहीं। बाप कहते हैं यहाँ आयेंगे भी वही जो सूर्यवंशी, चन्द्रवंशी काम चिता पर बैठ सांवरे हो गये हैं इसलिए राधे-कृष्ण, श्रीनारायण सबको सांवरा दिखाते हैं। अभी तो सभी सांवरे हैं। काम चिता पर बैठने से सांवरे हो गये हैं। अब तुमको काम चिता से उतरकर ज्ञान चिता पर बैठना है। विष का हथियाला कैन्सिल कर ज्ञान अमृत का हथियाला बांधना है। समझाना ऐसे है जो वह कहे कि तुम तो शुभ कार्य कर रहे हो। जब तक कुमार कुमारी है तो उनको मूतपलीती नहीं कहेंगे। बाप कहते हैं तुमको गन्दा कभी नहीं बनना है। आगे चलकर ढेर आयेंगे, कहेंगे यह बहुत अच्छा है - ज्ञान चिता पर बैठने से तो हम स्वर्ग के मालिक बनेंगे। अक्सर ब्राह्मण ही सगाई कराते हैं। राजाओं के पास भी ब्राह्मण रहते हैं, उन्हों को राजगुरू कहते हैं। आजकल तो संन्यासी भी हथियाला बांधते हैं। तुम जब यह ज्ञान की बातें सुनाते हो तो लोग बहुत खुश होते हैं। झट राखी भी बंधवा लेते हैं। फिर घर में झगड़ा भी होता है। कुछ सहन तो जरूर करना पड़े।
तुम हो गुप्त शिव शक्ति सेना। तुम्हारे पास कोई हथियार नहीं, देवियों को बहुत हथियार दिखाते हैं। यह सब हैं ज्ञान की बातें। यहाँ है ही योगबल की बातें। तुम योगबल से विश्व की बादशाही लेते हो। बाहुबल से हद की राजाई मिलती है। बेहद की राजाई तो बेहद का मालिक ही देंगे। लड़ाई की कोई बात नहीं। बाप कहते हैं मैं कैसे लड़ाऊंगा। मैं तो लड़ाई झगड़ा मिटाने के लिए आया हूँ फिर इनका नाम-निशान भी नहीं रहता, तब तो परमात्मा को सब याद करते हैं। कहते हैं मेरी लाज़ रखो फिर भी एक में निश्चय नहीं तो और-और को पकड़ते रहते हैं। कहते हैं हमारे में भी ईश्वर है फिर अपने में भी विश्वास नहीं रखते, गुरू करते हैं। जब तुम्हारे में भगवान है तो गुरू क्यों करते हो। यहाँ तो बात ही न्यारी है। बाप कहते हैं कल्प पहले भी मैं ऐसे ही आया था जैसे अब आया हूँ। अब तुम जानते हो कि रचता बाप कैसे बैठ रचना करते हैं, यह भी ड्रामा है। जब तक इस चक्र को नहीं जाना तब तक कैसे जानें कि आगे क्या होना है। कहते हैं यह कर्मक्षेत्र है। हम निराकारी दुनिया से पार्ट बजाने आये हैं। तो तुमको सारे ड्रामा के क्रियेटर, डायरेक्टर का मालूम होना चाहिए। हम सब एक्टर्स तो जान गये हैं कि यह ड्रामा कैसे बना हुआ है, यह सृष्टि कैसे वृद्धि को पाती है, जबकि अब कलियुग का अन्त है तो जरूर सतयुग स्थापन होना चाहिए। इस चक्र की समझानी बिल्कुल ठीक है जो ब्राह्मण कुल के होंगे वह समझ जायेंगे। फिर भी यह प्रजापिता है तो अपना कुल बढ़ता ही जायेगा। बढ़ना तो है ही। कल्प पहले मुआफिक सब पुरूषार्थ करते ही रहते हैं। हम साक्षी होकर देखते हैं। हर एक को अपना मुखड़ा आइने में देखते रहना है - कहाँ तक हम लायक बने हैं - सतयुग में राजधानी लेने के? यह कल्प-कल्प की बाजी़ है, जो जितनी सर्विस करेंगे, तुम हो बेहद के रूहानी सोशल वर्कर्स। तुम सुप्रीम रूह की मत पर चलते हो। ऐसे अच्छी-अच्छी प्वाइंट्स धारण करनी हैं। बाप आकर काल के पंजे से छुड़ाते हैं। वहाँ मृत्यु का नाम नहीं, यह है मृत्युलोक, वह है अमरलोक। यहाँ आदि-मध्य-अन्त दु:ख है, वहाँ दु:ख का नाम-निशान नहीं। अच्छा!
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का यादप्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।
धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) हम निराकारी और साकारी दोनों बाप के सिकीलधे नूरे रत्न हैं, हम शिवबाबा के जीते जी वारिस बने हैं, इसी नशे में रहना है।
2) योगबल से विश्व की राजाई लेनी है, पवित्रता की राखी बांधी है तो सहन भी करना है। पतित कभी नहीं बनना है।
वरदान:- सुख के सागर बाप की स्मृति द्वारा दु:ख की दुनिया में रहते भी सुख स्वरूप भव
सदा सुख के सागर बाप की स्मृति में रहो तो सुख स्वरूप बन जायेंगे। चाहे दुनिया में कितना भी दु:ख अशान्ति का प्रभाव हो लेकिन आप न्यारे और प्यारे हो, सुख के सागर के साथ हो इसलिए सदा सुखी, सदा सुखों के झूले में झूलने वाले हो। मास्टर सुख के सागर बच्चों को दु:ख का संकल्प भी नहीं आ सकता क्योंकि दु:ख की दुनिया से किनारा कर संगम पर पहुंच गये। सब रस्सियां टूट गई तो सुख के सागर में लहराते रहो।
स्लोगन:- मन और बुद्धि को एक ही पावरफुल स्थिति में स्थित करना ही एकान्तवासी बनना है।
13.01.2023 HINDI MURLI
“मीठे बच्चे - यहाँ तुम्हें सुख-दु:ख, मान-अपमान.. सब सहन करना है, पुरानी दुनिया के सुखों से बुद्धि हटा देनी है, अपनी मत पर नहीं चलना है''
प्रश्नः- देवताई जन्म से भी यह जन्म बहुत अच्छा है, कैसे?
उत्तर:- इस जन्म में तुम बच्चे शिवबाबा के भण्डारे से खाते हो। यहाँ तुम अथाह कमाई करते हो, तुमने बाप की शरण ली है। इस जन्म में ही तुम अपना लोक-परलोक सुहेला (सुखी) करते हो। सुदामा मिसल दो मुट्ठी दे 21 जन्म की बादशाही लेते हो।
गीत:- चाहे पास हो चाहे दूर हो...
ओम् शान्ति। गीत का कितना अच्छा अर्थ है। बाप बैठ बच्चों को समझाते हैं - चाहे हम इस तन से नजदीक हैं वा दूर हैं क्योंकि सम्मुख योग की शिक्षा दे रहे हैं। प्रेरणा से तो नहीं देंगे ना। चाहे मैं नजदीक हूँ, चाहे दूर हूँ - याद तो मुझे ही करना है। भगवान के पास जाने के लिए ही तो भक्ति करते हैं। बाप बैठ समझाते हैं कि हे जीव की आत्मायें, इस शरीर में निवास करने वाली आत्मायें, आत्माओं से परमपिता परमात्मा बैठ बात करते हैं। परमात्मा को आत्माओं से मिलना है जरूर, इसलिए जीव आत्मायें भगवान को याद करती हैं क्योंकि दु:खी हैं। सतयुग में तो कोई याद नहीं करते। अभी तुम बच्चे जानते हो हम बहुत पुराने भक्त हैं। जबसे हमको माया ने पकड़ा है, तब से भगवान की, शिव की याद शुरू हुई है क्योंकि शिवबाबा ने हमको स्वर्ग का मालिक बनाया था, तो उनका यादगार बनाकर भक्ति करते हैं। अब तुम जानते हो बाप सम्मुख आये हैं लेने के लिए, क्योंकि अब बाप के पास जाना है। जब तक यहाँ हैं तब तक पुराने शरीर को, पुरानी दुनिया को बुद्धि से भूलना है और योग में रहना है। तो इस योग अग्नि से पाप भस्म होंगे। इसमें मेहनत लगती है। पद भी तो जबरदस्त है। विश्व का मालिक बनना है। मनुष्य कहते हैं कि विश्व का मालिक तो शिवबाबा है। परन्तु नहीं, विश्व का मालिक मनुष्य ही बनते हैं। बाप बैठ बच्चों को विश्व का मालिक बनाते हैं। कहते हैं तुम ही विश्व के मालिक थे, फिर 84 जन्म लेते-लेते अब कौड़ी के भी मालिक नहीं रहे हो। पहला नम्बर जन्म और अभी का अन्तिम जन्म देखो कितना रात दिन का फ़र्क है। कोई को भी याद नहीं आ सकता, जब तक बाप आकर साक्षात्कार न कराये। ज्ञान बुद्धि से भी साक्षात्कार होता है। जो सयाने बच्चे हैं, नित्य बाप को याद करते हैं, उन्हों को बहुत मजा आयेगा। यहाँ तुम सब नई बातें सुनते हो। मनुष्य तो कुछ नहीं जानते हैं। वह तो गपोड़े लगाते रहते और दर-दर धक्के खाते रहते हैं। तुमको तो भटकने से छुड़ाया जाता है। बाप कहते हैं तुम आत्मा हो, मुझ बाप को याद करते रहो। बुद्धि में यही विचार रहे कि हम आत्माओं को बाबा के पास जाना है, यह सृष्टि जैसे हमारे लिए है नहीं। यह पुरानी सृष्टि तो खत्म हो जायेगी। फिर हम स्वर्ग में आकर नये महल बनायेंगे। दिन-रात बुद्धि में यह चलना चाहिए। बाप अपना अनुभव सुनाते हैं। रात को सोता हूँ, तो यही ख्यालात चलते हैं। यह नाटक अब पूरा होता है, यह पुराना चोला छोड़ना है। हाँ विकर्मों का बोझा बहुत है, इसलिए निरन्तर बाबा को याद करना है। अपनी अवस्था को दर्पण में देखना है - हमारी बुद्धि सबसे हटी हुई है? धन्धे आदि में रहते हुए भी बुद्धि से काम ले सकते हो। बाबा के ऊपर कितना ओना है। कितने ढेर बच्चे हैं। उन्हों का ख्याल रखना पड़ता है। बच्चों को पनाह (शरण) देनी है। दु:खी तो बहुत हैं ना! हंगामें में कितने दु:खी हो मरते हैं। यह समय बहुत खराब है। तो बच्चों को शरण देने के लिए यह मकान बन रहे हैं। यहाँ तो सब अपने बच्चे ही रहते हैं। कोई डर नहीं और फिर योगबल भी रहता है। बच्चों ने साक्षात्कार भी किया है, जो बाप को अच्छी रीति याद करते हैं तो बाप उन्हों की रक्षा भी करता है। दुश्मन को भयंकर रूप दिखाकर भगा देते हैं। तुमको जब तक शरीर है, तब तक योग में रहना है। नहीं तो सजायें खानी पड़ेंगी। बड़े आदमी का बच्चा सजा खाता है तो उनका काँध नीचे हो जाता है। तुमको भी काँध नीचे करना पड़ेगा। बच्चों के लिए तो और कड़ी सजायें हैं। कोई ऐसे भी हैं जो कहते अभी तो माया का सुख ले लेवें, जो होगा सो देखा जायेगा। बहुतों को इस पुरानी दुनिया के सुख मीठे लगते हैं। यहाँ तो सुख-दु:ख, मान-अपमान... सब सहन करना पड़ता है। ऊंच प्राप्ति अगर चाहते हो तो फालो करना चाहिए, माँ बाप के फरमान पर चलना चाहिए। अपनी मत माना रावण की मत। सो तो तकदीर को लकीर लगाने की ही निकलेगी। बाप से पूछेंगे तो बाबा झट कहेंगे - यह आसुरी मत है। श्रीमत नहीं है। कदम-कदम पर श्रीमत चाहिए। देखना है कहाँ उल्टा काम कर बाप की निंदा तो नहीं कराते? देवी-देवता तब बनेंगे जब ऐसे लक्षण होंगे। ऐसे नहीं वहाँ ऑटोमेटिकली लक्षण आ जायेंगे। यहाँ बहुत मीठी चलन चाहिए। अगर समझो शिवबाबा ने नहीं, ब्रह्मा बाबा ने कहा तो भी रेसपान्सिबुल यह रहेगा ना! अगर कुछ नुकसान भी हुआ तो हर्जा नहीं। यह ड्रामा में था तो तुम्हारे पर कोई दोष नहीं। अवस्था बहुत अच्छी चाहिए। भल तुम यहाँ बैठे हो, बुद्धि में यही रहे कि हम ब्रह्माण्ड के मालिक वहाँ के रहने वाले हैं। इस रीति घर में रहते, धन्धा करते, उपराम होते जायेंगे। जैसे संन्यासी गृहस्थ से उपराम हो जाते हैं। तुम तो सारी पुरानी दुनिया से उपराम होते हो। उस हठयोग संन्यास और इस संन्यास में रात दिन का फ़र्क है। यह राजयोग बाप सिखलाते हैं। संन्यासी सिखला न सकें क्योंकि मुक्ति-जीवनमुक्ति दाता है ही एक। सभी की मुक्ति अब होनी है क्योंकि सब वापिस जाने हैं। साधू लोग साधना करते हैं कि हम वापिस जायें। यहाँ दु:खी हैं। कोई फिर कहते हैं हम ज्योति-ज्योत में समायें। अनेक मत हैं।
बाबा ने समझाया है कि कोई-कोई बच्चे हैं जिन्हों को पुराने सम्बन्धी भी याद आते हैं। उस दुनिया के सुखों की आश हुई और यह मरा। फिर उसका पैर यहाँ ठहर न सके। माया बहुत लालच देती है। एक कहावत है “भगवान को याद करो नहीं तो बाज आ जायेगा'' यह माया भी बाज मिसल वार करती है। अब जबकि बाप आये हैं तो अभी भी पुरुषार्थ कर ऊंच पद नहीं पाया तो कल्प-कल्पान्तर भी नहीं पायेंगे। यहाँ बाप के पास तो तुमको कोई दु:ख नहीं है, तो पुरानी दु:ख की दुनिया को भूलना चाहिए ना। सारे दिन का पोतामेल देखना चाहिए। कितना समय बाप को याद किया? किसको जीयदान दिया? बाप ने तुमको भी जीयदान दिया है ना। सतयुग त्रेता तक तुम अमर रहते हो। यहाँ कोई मरता है तो कितना रोते पीटते हैं। स्वर्ग में दु:ख का नाम नहीं। समझेंगे पुरानी खाल छोड़ नई लेते हैं। यह मिसाल भी तुमसे लगता है और कोई यह मिसाल दे नहीं सकते। वह थोड़ेही पुरानी खाल को भूलते हैं। वह तो पैसे इकट्ठे करते रहते। यहाँ तुम जो बाप को देते हो तो बाप खुद थोड़ेही खाते वा अपने पास रखते हैं। उनसे बच्चों की ही परवरिश करते हैं इसलिए यह सच्चा-सच्चा शिवबाबा का भण्डारा है, इस भण्डारे से खाने वाले यहाँ भी सुखी तो जन्म-जन्मान्तर सुखी रहते हैं।
तुम्हारा यह जन्म बहुत दुर्लभ है। देवताई जन्म से भी तुम यहाँ सुखी हो क्योंकि बाप की शरण में हो। यहाँ से ही तुम अथाह कमाई करते हो जो फिर जन्म-जन्मान्तर भोगेंगे। सुदामें को भी दो मुट्ठी के बदले 21 जन्मों के लिए महल मिल गये। यह लोक भी सुहैला (सुखी) तो परलोक भी सुहैला, जन्म-जन्मान्तर के लिए इसलिए यह जन्म बहुत अच्छा है। कोई कहते जल्दी विनाश हो तो हम स्वर्ग में चलें। परन्तु अभी तो बहुत खजाना बाप से लेना है। अभी राजधानी कहाँ बनी है। फिर जल्दी विनाश कैसे करायेंगे! बच्चे अभी लायक कहाँ बने हैं! अभी तो बाप पढ़ाने के लिए आते रहते हैं। बाबा की सर्विस तो अपरमअपार है। बाप की महिमा भी अपरमअपार है। जितना ऊंच हूँ, सर्विस भी उतनी ऊंच करता हूँ, तब तो मेरी यादगार है। ऊंच ते ऊंच बाबा की गद्दी है जो जितना पुरुषार्थ करते हैं, वह अपना भाग्य बनाते हैं। यह है अविनाशी ज्ञान रत्नों की कमाई, जो वहाँ अथाह धन बन जाता है। तो बच्चों को पुरुषार्थ बहुत अच्छा करना है। बाप को यहाँ भी याद करो तो वहाँ भी याद करो। सीढ़ी तो है ना। दिल दर्पण में देखना है मैं कितना बाप का सपूत बच्चा हूँ। अन्धों को रास्ता बताता हूँ। अपने से बातें करने में खुशी होती है। जैसे बाबा अनुभव बताते हैं - सोता हूँ तो भी बातें करता हूँ। बाबा आपकी तो कमाल है। भक्ति मार्ग में फिर हम आपको भूल ही जायेंगे। इतना वर्सा आपसे पाते हैं फिर सतयुग में यह भूल जायेंगे। फिर भक्ति मार्ग में आपका यादगार बनायेंगे। परन्तु आपका आक्यूपेशन बिल्कुल भूल जाते हैं। जैसे बुद्धू, अज्ञानी बन जाते हैं। अब बाप ने कितना ज्ञानी बनाया है। रात दिन का फ़र्क है। ईश्वर सर्वव्यापी है, यह कोई ज्ञान थोड़ेही है। ज्ञान तो सृष्टि चक्र का चाहिए। अब हम 84 का चक्र पूरा कर वापिस जाते हैं फिर हमको जीवन-मुक्ति में आना है। ड्रामा से बाहर थोड़ेही निकल सकते हैं। हम हैं ही जीवनमुक्ति के राही। अच्छा !
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का यादप्यार और गुडमार्निग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।
रात्रि क्लास - 16-12-68
किसको बाबा बच्ची कहते हैं, किसको माइयाँ कहते हैं; ज़रूर कुछ फ़र्क होगा। कोई की सर्विस से खुशबू आती है, कोई तो जैसे अक के फूल हैं। यह तो बाप ने समझाया है तुम जैसे हमारे साथ आये हो। ऊपर से बाप भी आये हैं विश्व को पावन बनाने। तुम्हारा भी यह कर्तव्य है। वहाँ से जो पहले आते हैं वह है पवित्र। नये आते वह ज़रूर खुशबू देते होंगे। बगीचे से भी भेंट करते हैं। जैसी सर्विस वैसा खुशबूदार फूल। विवेक कहता है शिव बाबा का बच्चा कहलाया और हकदार बना। तो वह खुशबू आनी चाहिए। हकदार है तब तो सभी को नमस्ते करते हैं। तुम विश्व के मालिक बेशक रहते हो, परन्तु पढ़ाई में फर्क तो बहुत रहता है। यह होना भी है ज़रूर। बच्चों को निश्चय हो जाता है यह बाबा है, और चक्र भी बुद्धि में है। तो बाप कहते हैं और जास्ती क्यों बतायें। बाप बिगर स्वदर्शन चक्रधारी कोई बना न सके। बनते हैं इशारे से। जो कल्प पहले बने हैं वही बनते हैं। ढेर के ढेर बच्चे आते हैं। पवित्रता के ऊपर कितने अत्याचार होते हैं! जिस द्वारा बाप गीता सुनाते हैं उनको कितनी गालियाँ देते हैं। शिवबाबा को भी गाली देते हैं। कच्छ, मच्छ अवतार कहना भी तो गाली है ना! न जानने के कारण बाप पर, तुम्हारे पर कितने कलंक लगाते हैं! बच्चे कितना माथा मारते हैं। पढ़ाई से कोई तो बहुत साहूकार हो जाते हैं, कितना कमाते हैं! एक-एक आपरेशन के दो हज़ार, 4 हज़ार मिल जाते हैं। कोई तो कुटुम्ब की पालना भी नहीं कर सकते। फिक्र है ना। कोई जन्म-जन्मान्तर बादशाही लेते हैं। कोई जन्म-जन्मान्तर के लिये ग़रीब बनते हैं। बाप कहते हैं तुमको समझदार बनाते हैं। अभी तुम सभी बात में कहेंगे ड्रामा है। सभी का पार्ट है। जो पास्ट हुआ सो ड्रामा। होता वही है जो ड्रामा में है। ड्रामा अनुसार जो कुछ होता है ठीक है। तुम कितना भी समझाओ, समझते ही नहीं हैं, इसमें मैनर्स भी अच्छे चाहिए। हरेक अपने अन्दर में देखे कोई खामी तो नहीं है? माया बहुत कड़ी है। उनको कैसे भी निकालना है। सभी खामियाँ निकालनी है। बाप कहते हैं बाँधेलियाँ सभी से जास्ती याद में रहती हैं। वही अच्छा पद पाती हैं। जितना जास्ती मार खाती हैं उतना जास्ती याद में रहती हैं। हाय शिवबाबा निकलेगा। ज्ञान से शिवबाबा को याद करते हैं। उन्हों का चार्ट अच्छा रहता है। ऐसे जो मार खाकर आते हैं वह सर्विस में भी अच्छे लग जाते हैं। अपना जीवन ऊंच बनाने लिये अच्छी सर्विस करते हैं। सर्विस न करें तो दिल खाती है। दिल टपकती है हम जावें सर्विस पर। भल समझते हैं सेन्टर छोड़कर जाना पड़ता है, परन्तु प्रदर्शनी में सर्विस बहुत है तो सेन्टर की भी परवाह न कर यह भागना चाहिए। जितना हम दान करेंगे उतना बल भी भरता रहेगा। दान भी ज़रूर करना है ना। यह हैं अविनाशी ज्ञान रत्न, जिनके पास होंगे वही दान करेंगे। बच्चों को अब सारी सृष्टि के आदि, मध्य, अन्त का ज्ञान याद आ जाना चाहिए। सारा चक्र फिरना चाहिए। बाप भी इस सृष्टि के आदि, मध्य, अन्त को जानने वाला है। ज़रूर ज्ञान का सागर है। सृष्टि के चक्र को जानने वाला है। यह दुनिया के लिए बिल्कुल नया ज्ञान है, जो कब पुराना बनता ही नहीं है। वण्डरफुल नॉलेज है ना जो बाप ही बताते हैं। कोई कितना भी साधू-महात्मा हो सीढ़ी चढ़कर ऊपर तो जाता ही नहीं। सिवाय बाप के मनुष्य गति-सद्गति दे न सके। न मनुष्य, न देवता दे सकते हैं। स़िर्फ एक बाप ही दे सकते हैं। दिन-प्रतिदिन वृद्धि होनी ही है। बाबा ने कहा था प्रभात-फेरी में यह लक्ष्मी-नारायण का चित्र, सीढ़ी ट्रान्सलाइट का भी होना चाहिए। बिजली की ऐसी कोई चीज़ हो जिससे चमक आती रहे। स्लोगन भी बोलते जाओ। राजयोग परमपिता परमात्मा ही सिखा रहे हैं भागीरथ द्वारा। और कोई भी यह राजयोग सिखला नहीं सकते, ऐसा-ऐसा आवाज़ बहुत सुनेंगे। अच्छा! मीठे-मीठे बच्चों को गुडनाईट।
धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) यह नाटक अब पूरा हो रहा है इसलिए इस पुरानी दुनिया से उपराम रहना है। श्रीमत पर अपनी तकदीर ऊंच बनानी है। कभी कोई उल्टा कर्म नहीं करना है।
2) अविनाशी ज्ञान रत्नों की कमाई करनी और करानी है। एक बाप की याद में रह सपूत बच्चा बन अनेकों को रास्ता बताना है।
वरदान:-त्याग और तपस्या के वातावरण द्वारा विघ्न-विनाशक बनने वाले सच्चे सेवाधारी भव
जैसे बाप का सबसे बड़े से बड़ा टाइटल है वर्ल्ड सर्वेन्ट। वैसे बच्चे भी वर्ल्ड सर्वेन्ट अर्थात् सेवाधारी हैं। सेवाधारी अर्थात् त्यागी और तपस्वी। जहाँ त्याग और तपस्या है वहाँ भाग्य तो उनके आगे दासी के समान आता ही है। सेवाधारी देने वाले होते हैं, लेने वाले नहीं इसलिए सदा निर्विघ्न रहते हैं। तो सेवाधारी समझकर त्याग और तपस्या का वातावरण बनाने से सदा विघ्न-विनाशक रहेंगे।
स्लोगन:- किसी भी परिस्थिति का सामना करने का साधन है-स्व स्थिति की शक्ति।
प्रश्नः- अभी तुम बच्चे कौन सा श्रेष्ठ कर्म करते हो जिसका रिवाज भक्ति में भी चला आता है?
उत्तर:- तुम अभी श्रीमत पर अपना तन-मन-धन भारत तो क्या विश्व के कल्याण अर्थ अर्पण करते हो इसी का रिवाज़ भक्ति में मनुष्य ईश्वर अर्थ दान करते हैं। उन्हें फिर उसके बदले दूसरे जन्म में राजाई घर में जन्म मिलता है। और तुम बच्चे संगम पर बाप के मददगार बनते हो तो मनुष्य से देवता बन जाते हो।
गीत:- तूने रात गंवाई...
ओम् शान्ति। बाप बच्चों को समझाते हैं, जब बच्चे समझते हैं तब फिर औरों को समझाते हैं। नहीं समझते तो औरों को समझा नहीं सकते। अगर खुद समझते औरों को समझा नहीं सकते तो गोया कुछ भी नहीं समझते। कोई हुनर सीखता है तो उसको फैलाता है। यह हुनर तो बाप उस्ताद से सीखा जाता है कि मनुष्य से देवता कैसे बनाया जाए। देवतायें जिनके चित्र भी हैं, मनुष्य को देवता बनाते हैं तो गोया वह देवता अभी नहीं हैं। देवताओं के गुण गाये जाते हैं। सर्वगुण सम्पन्न.... यहाँ कोई मनुष्य के तो ऐसे गुण नहीं गाये जाते। मनुष्य मन्दिरों में जाकर देवताओं के गुण गाते हैं। भल पवित्र तो संन्यासी भी हैं परन्तु मनुष्य उन्हों के ऐसे गुण नहीं गाते। वह संन्यासी तो शास्त्र आदि भी सुनाते हैं। देवताओं ने तो कुछ नहीं सुनाया है। वह तो प्रालब्ध भोगते हैं। अगले जन्म में पुरुषार्थ कर मनुष्य से देवता बने थे। अभी कोई में भी देवताओं जैसे गुण नहीं हैं, जहाँ गुण नहीं वहाँ जरूर अवगुण हैं। सतयुग में इसी भारत में यथा राजा रानी तथा प्रजा सर्वगुण सम्पन्न थे। उनमें सभी गुण थे। उन देवताओं के ही गुण गाये जाते हैं। उस समय और धर्म थे नहीं। गुण वाले देवतायें थे सतयुग में, और अवगुण वाले मनुष्य हैं कलियुग में। अब ऐसे अवगुण वाले मनुष्य को देवता कौन बनावे। गाया भी हुआ है मनुष्य से देवता... यह महिमा तो है परमपिता परमात्मा की। हैं तो देवतायें भी मनुष्य, परन्तु उनमें गुण हैं, उनमें अवगुण हैं। गुण प्राप्त होते हैं बाप से, जिसको सतगुरू भी कहते हैं। अवगुण प्राप्त होते हैं माया रावण से। इतने गुणवान फिर अवगुणी कैसे बनते हैं। सर्वगुण सम्पन्न और फिर सर्व अवगुण सम्पन्न कौन बनाते हैं! यह तुम बच्चे जानते हो। गाते भी हैं मुझ निर्गुण हारे में कोई गुण नाही। देवताओं के कितने गुण गाते हैं। इस समय तो वह गुण किसी में नहीं हैं। खान-पान आदि कितना गंदा है। देवतायें हैं वैष्णव सम्प्रदाय और इस समय के मनुष्य हैं रावण सम्प्रदाय। खान-पान कितना बदल गया है। सिर्फ ड्रेस को नहीं देखना है। देखा जाता है खान-पान और विकारीपन को। बाप खुद कहते हैं मुझे भारत में ही आना पड़ता है। ब्रह्मा मुख वंशावली ब्राह्मण ब्राह्मणियों द्वारा स्थापना कराता हूँ। यह ब्राह्मणों का यज्ञ है ना। वह विकारी ब्राह्मण कुख वंशावली, यह हैं मुख वंशावली। बहुत फ़र्क है। वो साहूकार लोग जो यज्ञ रचते हैं उसमें जिस्मानी ब्राह्मण होते हैं। यह है बेहद का बाप साहूकारों से साहूकार, राजाओं का राजा। साहूकारों का साहूकार क्यों कहा जाता है? क्योंकि साहूकार भी कहते हैं हमको ईश्वर ने धन दिया है, ईश्वर अर्थ दान करते हैं तो दूसरे जन्म में धनवान बनते हैं। इस समय तुम शिवबाबा को सब कुछ तन-मन-धन अर्पण करते हो। तो कितना ऊंच पद पाते हो।
तुम श्रीमत पर इतने ऊंच कर्म सीखते हो तो तुमको जरूर फल मिलना चाहिए। तन-मन-धन अर्पण करते हो। वह भी ईश्वर अर्थ करते हैं, कोई के थ्रू। यह रिवाज़ भारत में ही है। तो बाप तुमको बहुत अच्छे कर्म सिखलाते हैं। तुम यह कर्तव्य सिर्फ भारत तो क्या, परन्तु सारी दुनिया के कल्याण अर्थ करते हो तो उसका एवजा मिलता है - मनुष्य से देवता बनने का। जो श्रीमत पर जैसा कर्म करते हैं, ऐसा फल मिलता है। हम साक्षी हो देखते रहते हैं। कौन श्रीमत पर चल मनुष्य को देवता बनाने की सेवा करते हैं। कितना जीवन परिवर्तन हो जाता है। श्रीमत पर चलने वाले ब्राह्मण ठहरे। बाप कहते हैं ब्राह्मणों द्वारा शूद्रों को बैठ राजयोग सिखलाता हूँ - 5 हजार वर्ष की बात है। भारत में ही देवी-देवताओं का राज्य था। चित्र दिखाने चाहिए। चित्रों बिगर समझेंगे पता नहीं यह कौनसा नया धर्म है, जो शायद विलायत से आता है। चित्र दिखाने से समझेंगे यह देवताओं को मानते हैं। तो समझाना है कि श्रीनारायण के अन्तिम 84 वें जन्म में परमपिता परमात्मा ने प्रवेश किया है और राजयोग सिखला रहे हैं। यह उनके 84 वें जन्म का भी अन्त है। जो सूर्यवंशी देवता थे उन सभी को आकर फिर से राजयोग सीखना है। ड्रामा अनुसार पुरुषार्थ भी जरूर करेंगे। तुम बच्चे अभी सम्मुख सुन रहे हो और बच्चे फिर इस टेप द्वारा सुनेंगे तो समझेंगे हम भी मात-पिता के साथ फिर सो देवता बन रहे हैं। इस समय 84 वें जन्म में पूरे बेगर जरूर बनना है। आत्मा बाप को सब कुछ सरेन्डर करती है। यह शरीर ही अश्व है, जो स्वाहा होता है। आत्मा खुद बोलती है हम बाप के बने हैं। दूसरा न कोई। मैं आत्मा इस जीव द्वारा परमपिता परमात्मा के डायरेक्शन अनुसार सेवा कर रहा हूँ।
बाप कहते हैं योग भी सिखाओ और सृष्टि चक्र कैसे फिरता है वह भी समझाओ। जिसने सारा चक्र पास किया होगा - वह इन बातों को झट समझेंगे। जो इस चक्र में आने वाला नहीं होगा वह ठहरेगा नहीं। ऐसे नहीं सारी सृष्टि आयेगी! इसमें भी प्रजा ढेर आयेगी। राजा रानी तो एक होता है ना। जैसे लक्ष्मी-नारायण एक गाया जाता है, राम सीता एक गाया जाता है। प्रिन्स प्रिन्सेज तो और भी होंगे। मुख्य तो एक होगा ना। तो ऐसा राजा रानी बनने के लिए बहुत मेहनत करनी है। साक्षी हो देखने से पता पड़ता है - यह साहूकार राजाई कुल का है या गरीब कुल का है। कोई माया से कैसे हारते हैं, जो भागन्ती भी हो जाते हैं। माया एकदम कच्चा खा जाती है इसलिए बाबा पूछते हैं राजी-खुशी हो? माया के थप्पड़ से बेहोश वा बीमार तो नहीं पड़ते हो! ऐसे कोई बीमार हो पड़ते हैं फिर बच्चे उनके पास जाते हैं ज्ञान-योग की संजीवनी बूटी देकर सुरजीत कर देते हैं। ज्ञान और योग में न रहने कारण माया एकदम कला-काया चट कर देती है। श्रीमत छोड़ मनमत पर चल पड़ते हैं। माया एकदम बेहोश कर देती है। वास्तव में संजीवनी बूटी यह ज्ञान की है, इससे माया की बेहोशी उतर जाती है। यह बातें सभी इस समय की हैं। सीतायें भी तुम हो। राम आकर माया रावण से तुमको छुड़ाते हैं। जैसे बच्चों को सिन्ध में छुड़ाया। रावण लोग फिर चुरा ले जाते थे। अभी तुमको फिर माया के चम्बे से सबको छुड़ाना है। बाबा को तो तरस पड़ता है, देखते हैं कैसे माया थप्पड़ लगाए बच्चों की बुद्धि ही एकदम फिरा देती है। राम से बुद्धि फेर रावण की तरफ कर देती है। जैसे एक खिलौना होता है। एक तरफ राम, एक तरफ रावण। इसको कहा जाता है आश्चर्यवत बाप का बनन्ती, फिर रावण का बनन्ती। माया बड़ी दुस्तर है। चूहे मुआफिक काट कर खाना खराब कर देती है, इसलिए श्रीमत कभी छोड़नी नहीं है। कठिन चढ़ाई है ना। अपनी मत माना रावण की मत। उस पर चले तो बहुत घुटका खायेंगे। बहुत बदनामी कराते हैं। ऐसे सभी सेन्टर्स पर हैं। नुकसान फिर भी अपना करते हैं। सर्विस करने वाले रूप-बसन्त छिपे नहीं रहते। दैवी राजधानी स्थापन हो रही है, इसमें सभी अपना-अपना पार्ट जरूर बजायेंगे। दौड़ी लगायेंगे तो अपना कल्याण करेंगे। कल्याण भी एकदम स्वर्ग का मालिक। जैसे माँ बाप तख्तन-शीन होते हैं तो बच्चों को भी होना है। बाप को फालो करना है। नहीं तो अपना पद कम कर देंगे। बाबा ने यह चित्र कोई रखने लिए नहीं बनाये हैं। इनसे बहुत सर्विस करनी है। बड़े-बड़े साहूकार लोग लक्ष्मी-नारायण का मन्दिर बनवाते हैं परन्तु यह किसको पता नहीं है कि यह कब आये, इन्हों ने भारत को कैसे सुखी बनाया, जो सभी उन्हों को याद करते हैं।
तुम जानते हो कि मन्दिर होना चाहिए एक दिलवाला का। यह एक ही काफी है। लक्ष्मी-नारायण के मन्दिर से भी क्या होगा! वह कोई कल्याणकारी नहीं हैं। शिव का मन्दिर बनाते हैं, वह भी अर्थ रहित। उनका आक्यूपेशन तो जानते ही नहीं। मन्दिर बनावे, आक्यूपेशन को न जानें तो क्या कहेंगे? जब स्वर्ग में देवतायें हैं तो मन्दिर होते नहीं। जो मन्दिर बनाते हैं, उन्हों से पूछना चाहिए लक्ष्मी-नारायण कब आये थे? उन्हों ने क्या सुख दिया था? कुछ समझा नहीं सकते। इससे सिद्ध है कि जिनमें अवगुण हैं वह गुणवान के मन्दिर बनाते हैं। तो बच्चों को बहुत सर्विस का शौक होना चाहिए। बाबा को सर्विस का बहुत शौक है तब तो ऐसे-ऐसे चित्र बनवाते हैं। भल चित्र शिवबाबा बनवाते हैं परन्तु बुद्धि दोनों की चलती है। अच्छा -
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का यादप्यार और गुडमार्निग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।
रात्रि क्लास - 28-6-68
यहाँ सभी बैठे हैं समझते हैं कि हम आत्मायें हैं, बाप बैठा है। आत्म अभिमानी हो बैठना इसको कहा जाता है। सभी ऐसे नहीं बैठे हैं कि हम आत्मा हैं बाबा के सामने बैठे हैं। अब बाबा ने याद दिलाया है तो स्मृति आयेंगी अटेन्शन देंगे। ऐसे बहुत हैं जिनकी बुद्धि बाहर भागती है। यहाँ बैठे भी जैसे कि कान बन्द हैं। बुद्धि बाहर में कहाँ न कहाँ दौड़ती रहती है। बच्चे जो बाप की याद में बैठे हैं वे कमाई कर रहे हैं। बहुतों का बुद्धि योग बाहर में रहता है, वह जैसे कि यात्रा में नहीं हैं। टाइम वेस्ट होता है। बाप को देखने से भी बाबा याद पड़ेगा। नम्बरवार पुरुषार्थ अनुसार तो है ही। कोई कोई को पक्की आदत पड़ जाती है। हम आत्मा हैं, शरीर नहीं हैं। बाप नॉलेजफुल है तो बच्चों को भी नॉलेज आ जाती है। अभी वापिस जाना है। चक्र पूरा होता है अभी पुरुषार्थ करना है। बहुत गई थोड़ी रही..... इम्तिहान के दिनों में फिर बहुत पुरुषार्थ करने लग पड़ेंगे। समझेंगे अगर हम पुरुषार्थ नहीं करेंगे तो नापास हो जायेंगे। पद भी बहुत कम हो जायेगा। बच्चों का पुरुषार्थ तो चलता ही रहता है। देह अभिमान कारण विकर्म होंगे। इसका सौ गुणा दण्ड हो जायेगा क्योंकि हमारी निन्दा कराते हैं। ऐसा कर्म नहीं करना चाहिए जो बाप का नाम बदनाम हो इसलिए गाते हैं सद्गुरू के निन्दक ठौर न पावें। ठौर माना बादशाही। पढ़ाने वाला भी बाप है। और कहाँ भी सत्संग में एम आब्जेक्ट नहीं है। यह है हमारा राजयोग। और कोई ऐसे मुख से कुछ कह न सके कि हम राजयोग सिखलाते हैं। वह तो समझते हैं शान्ति में ही सुख है? वहाँ तो न दु:ख, न सुख की बात है। शान्ति ही शान्ति है। फिर समझा जाता है इनकी तकदीर में कम है। सभी से तकदीर ऊंची उनकी है जो पहले से पार्ट बजाते हैं। वहाँ उनको यह ज्ञान नहीं रहता। वहाँ संकल्प ही नहीं चलेगा। बच्चे जानते हैं हम सभी अवतार लेते हैं। भिन्न भिन्न नाम रूप में आते हैं। यह ड्रामा है ना। हम आत्मायें शरीर धारण कर इसमें पार्ट बजाती हैं। वह सारा राज़ बाप बैठ समझाते हैं। तुम बच्चों को अन्दर में अतीन्द्रिय सुख रहता है। अन्दर में खुशी रहती है। कहेंगे यह देही-अभिमानी है। बाप समझाते भी हैं तुम स्टूडेन्ट हो। जानते हो हम देवता स्वर्ग के मालिक बनने वाले हैं। सिर्फ देवता भी नहीं। हम विश्व के मालिक बनने वाले हैं। यह अवस्था स्थाई तब रहेगी जब कर्मातीत अवस्था होगी। ड्रामा प्लैन अनुसार होनी है ज़रूर। तुम समझते हो हम ईश्वरीय परिवार में हैं। स्वर्ग की बादशाही मिलनी है ज़रूर। जो जास्ती सर्विस करते हैं, बहुतों का कल्याण करते हैं तो ज़रूर ऊंच पद मिलेगा। बाबा ने समझाया है यह योग की बैठक यहाँ हो सकती है। बाहर सेन्टर पर ऐसे नहीं हो सकती है। चार बजे आना, नेष्टा में बैठना, वहाँ कैसे हो सकता है। नहीं। सेन्टर में रहने वाले भल बैठे। बाहर वाले को भूले चुके भी कहना नहीं है। समय ऐसा नहीं है। यह यहाँ ठीक है। घर में ही बैठे हैं। वहाँ तो बाहर से आना पड़ता है। यह सिर्फ यहाँ के लिये है। बुद्धि में ज्ञान धारण होना चाहिए। हम आत्मा हैं। उनका यह अकाल तख्त है। टेव (आदत) पड़ जानी चाहिए। हम भाई-भाई हैं, भाई से हम बात करते हैं। अपने को आत्मा समझ बाप को याद करो तो विकर्म विनाश हो जायें। अच्छा!
मीठे मीठे रूहानी बच्चों को रूहानी बापदादा का यादप्यार, गुडनाईट और नमस्ते।
1) ज्ञान-योग की संजीवनी बूटी से स्वयं को माया की बेहोशी से बचाते रहना है। मनमत पर कभी नहीं चलना है।
2) रूप-बसन्त बन सर्विस करनी है। मात-पिता को फालो कर तख्तनशीन बनना है।
वरदान:- अपनी शक्तिशाली स्थिति द्वारा दान और पुण्य करने वाले पूज्यनीय और गायन योग्य भव
अन्तिम समय में जब कमजोर आत्मायें आप सम्पूर्ण आत्माओं द्वारा प्राप्ति का थोड़ा भी अनुभव करेंगी तो यही अन्तिम अनुभव के संस्कार लेकर आधाकल्प के लिए अपने घर में विश्रामी होंगी और फिर द्वापर में भक्त बन आपका पूजन और गायन करेंगी इसलिए अन्त की कमजोर आत्माओं के प्रति महादानी वरदानी बन अनुभव का दान और पुण्य करो। यह सेकण्ड का शक्तिशाली स्थिति द्वारा किया हुआ दान और पुण्य आधाकल्प के लिए पूज्यनीय और गायन योग्य बना देगा।
स्लोगन:- परिस्थितियों में घबराने के बजाए साक्षी हो जाओ तो विजयी बन जायेंगे।
11.01.2023 HINDI MURLI
“मीठे बच्चे - बुद्धि का योग बाप से लगाते रहो तो लम्बी मुसाफिरी को सहज ही पार कर लेंगे''
प्रश्नः- बाप पर कुर्बान जाने के लिए किस बात का त्याग जरूरी है?
उत्तर:- देह-अभिमान का। देह-अभिमान आया तो मरा, व्यभिचारी हुआ इसलिए कुर्बान होने में बच्चों का हृदय विदीरण होता है। जब कुर्बान हो गये तो उस एक की ही याद रहे। उन पर ही बलिहार जाना है, उनकी ही श्रीमत पर चलना है।
गीत:- रात के राही....
ओम् शान्ति। भगवानुवाच - भगवान अपने बच्चों को राजयोग और ज्ञान सिखला रहे हैं। यह कोई मनुष्य नहीं। गीता में लिखा हुआ है श्रीकृष्ण भगवानुवाच। अब श्रीकृष्ण सारी दुनिया को माया से लिबरेट करे, यह तो सम्भव नहीं है। बाप ही आकर बच्चों प्रति समझाते हैं। जिन्होने बाप को अपना बनाया है और बाप के सम्मुख बैठे हैं। श्रीकृष्ण को बाप नहीं कहा जा सकता। बाप को कहा जाता है परमपिता, परमधाम में रहने वाला। आत्मा इस शरीर द्वारा भगवान को याद करती है। बाप बैठ समझाते हैं कि मैं तुम्हारा बाप परमधाम में रहने वाला हूँ। मैं सभी आत्माओं का बाप हूँ। मैंने ही कल्प पहले भी बच्चों को आकर सिखाया था कि बुद्धि का योग मुझ परमपिता से लगाओ। आत्माओं से बात की जाती है। आत्मा जब तक शरीर में न आये तो आंखों द्वारा देख न सके। कानों द्वारा सुन न सके। आत्मा बिना शरीर के जड़ हो जाता है। आत्मा चैतन्य है। गर्भ में बच्चा है, परन्तु जब तक उसमें आत्मा ने प्रवेश नहीं किया है तब तक चुरपुर नहीं होती। तो ऐसी चैतन्य आत्माओं से बाप बात करते हैं। कहते हैं मैंने यह शरीर लोन पर लिया है। मैं आकर सभी आत्माओं को वापिस ले जाता हूँ। फिर जो आत्मायें सम्मुख होती हैं उन्हों को राजयोग सिखाता हूँ। राजयोग सारी दुनिया नहीं सीखेगी। कल्प पहले वाले ही राजयोग सीख रहे हैं।
अब बाबा समझाते हैं बुद्धि का योग बाप के साथ अन्त तक लगाते रहना है, इसमें अटकना नहीं है। स्त्री पुरुष होते हैं तो पहले एक दो को जानते भी नहीं हैं। फिर जब दोनों की सगाई होती है फिर कोई 60-70 वर्ष भी इकट्ठे रहते हैं, तो सारी जीवन जिस्म, जिस्म को याद करते रहते हैं। वह कहेगी यह मेरा पति है, वह कहेगा यह मेरी पत्नि है। अब तुम्हारी सगाई हुई है निराकार से। निराकार बाप ने ही आकर सगाई कराई है। कहते हैं कल्प पहले मुआफिक तुम बच्चों की अपने साथ सगाई कराता हूँ। मैं निराकार इस मनुष्य सृष्टि का बीजरूप हूँ। सभी कहेंगे यह मनुष्य सृष्टि गॉड फादर ने रची है। तो तुम्हारा बाप सदैव परमधाम में रहते हैं। अभी कहते हैं मुझे याद करो। मुसाफिरी लम्बी होने कारण बहुत बच्चे थक पड़ते हैं। बुद्धि का योग पूरा लगा नहीं सकते। माया की बहुत ठोकरें खाने से थक पड़ते हैं, मर भी पड़ते हैं। फिर हाथ छोड़ देते हैं। कल्प पहले भी ऐसे ही हुआ था। यहाँ तो जब तक जीना है, तब तक याद करना है। स्त्री का पति मर जाता है तो भी याद करती रहती है। यह बाप वा पति ऐसे छोड़कर जाने वाला तो नहीं है। कहते हैं मैं तुम सजनियों को साथ ले जाऊंगा। परन्तु इसमें समय लगता है, थकना नहीं है। पापों का बोझा सिर पर बहुत है, वो योग में रहने से ही उतरेगा। योग ऐसा हो जो अन्त में बाप वा साजन के सिवाए और कोई याद न पड़े। अगर और कुछ याद पड़ा तो व्यभिचारी हो गया, फिर पापों का दण्ड भोगना पड़े इसलिए बाप कहते हैं परमधाम के राही थक मत जाना।
तुम जानते हो मैं ब्रह्मा द्वारा आदि सनातन देवी-देवता धर्म की स्थापना कर रहा हूँ और शंकर द्वारा सभी धर्मों का विनाश कराता हूँ। अभी कान्फ्रेन्स करते रहते हैं तो सभी धर्म मिलकर एक कैसे हो जाएं, सभी शान्त में कैसे रहें, उसका रास्ता निकालें। अब अनेक धर्मों की एक मत तो हो नहीं सकती। एक मत से तो एक धर्म की स्थापना होती है। वह सभी धर्म सर्वगुण सम्पन्न, सम्पूर्ण निर्विकारी हो तब आपस में क्षीरखण्ड हो सकते हैं। रामराज्य में सभी क्षीरखण्ड थे। जानवर भी लड़ते नहीं थे। यहाँ तो घर-घर में झगड़ा है। लड़ते तब हैं जब उनका कोई धनी-धोणी नहीं है। अपने मात-पिता को नहीं जानते हैं। गाते भी हैं तुम मात-पिता हम बालक तेरे.. तुम्हारी कृपा से सुख घनेरे.. सुख घनेरे तो अभी हैं नहीं। तो कहेंगे मात-पिता की कृपा नहीं है। बाप को जानते ही नहीं, तो बाप कृपा कैसे करे? फिर टीचर के डायरेक्शन पर चलें तब कृपा हो। वह तो कह देते सर्वव्यापी है, तो कौन कृपा करे और किस पर करे? कृपा लेने वाला और करने वाला दोनों चाहिए। स्टूडेण्ट पहले तो आकर टीचर के पास पढ़े। यह कृपा अपने ऊपर करे। फिर टीचर के डायरेक्शन पर चले। पुरुषार्थ कराने वाला भी चाहिए। यह बाप भी है, टीचर भी है तो सतगुरू भी है, उनको परम-पिता, परमशिक्षक, परम सतगुरू भी कहा जाता है। बाप कहते हैं मैं कल्प-कल्प यह स्थापना का कार्य कराता हूँ। पतित दुनिया को पावन दुनिया बनाता हूँ। वर्ल्ड आलमाइटी अथॉरिटी है ना। तो वर्ल्ड अथॉरिटी का राज्य कायम करते हैं। सारी सृष्टि पर एक ही लक्ष्मी-नारायण का राज्य था। उन्हों की आलमाइटी अथॉरिटी थी। वहाँ कोई लड़ाई झगड़ा कर न सके। वहाँ माया है ही नहीं। है ही गोल्डन एज, सिलवर एज। सतयुग त्रेता दोनों को स्वर्ग अथवा वैकुण्ठ कहेंगे। सभी गाते भी हैं चलो वृन्दावन भजो राधे गोबिन्द.. जाते तो कोई हैं नहीं। सिर्फ याद जरूर करते हैं। अब तो माया का राज्य है। सभी रावण की मत पर हैं। देखने में तो बड़े-बड़े मनुष्य अच्छे आते हैं। बड़े-बड़े टाइटिल मिलते हैं। थोड़ी जिस्मानी हिम्मत दिखाते हैं वा अच्छा कर्म करते हैं तो टाइटिल मिलते हैं। कोई को डाक्टर ऑफ फिलासाफी, कोई को क्या.. ऐसे-ऐसे टाइटिल देते रहते हैं। अभी तुम तो हो ब्राह्मण। बरोबर भारत की सर्विस में हो। तुम दैवी राजधानी स्थापन कर रहे हो। जब स्थापना हो जायेगी तब तुमको टाइटिल्स मिलेंगे। सूर्यवंशी राजा रानी, चन्द्र-वंशी राजा रानी... फिर तुम्हारा राज्य चलेगा। वहाँ कोई को टाइटिल नहीं मिलता। वहाँ दु:ख की कोई बात ही नहीं, जो कोई का दु:ख दूर करे वा बहादुरी दिखाये.. जो टाइटिल मिले। जो रसम-रिवाज यहाँ होती है वह वहाँ नहीं होती। न लक्ष्मी-नारायण इस पतित दुनिया में आ सकते हैं, इस समय कोई भी पावन देवता नहीं है। यह है ही पतित आसुरी दुनिया। अनेक मत-मतान्तर में मूँझ गये हैं। यहाँ तो एक ही श्रीमत है, जिससे राजधानी स्थापन हो रही है। हाँ चलते-चलते कोई को माया का कांटा लग जाता है तो लंगड़ाते रहते हैं इसलिए बाप कहते हैं सदैव श्रीमत पर चलो। अपनी मनमत पर चलने से धोखा खायेंगे। सच्ची कमाई होती है सच्चे बाप की मत पर चलने से। अपनी मत से बेड़ा गर्क हो जायेगा। कितने महावीर श्रीमत पर न चलने कारण अधोगति को पहुँच गये।
अभी तुम बच्चों को सद्गति को पाना है। श्रीमत पर न चला और दुर्गति को पाया तो फिर बहुत पश्चाताप करना पड़ेगा। फिर धर्मराजपुरी में शिवबाबा इस तन में बैठ समझायेंगे कि मैंने तुमको इस ब्रह्मा तन द्वारा इतना समझाया, पढ़ाया, कितनी मेहनत की, तुमने निश्चय पत्र लिखे कि श्रीमत पर चलेंगे, परन्तु नहीं चले। श्रीमत को कभी नहीं छोड़ना चाहिए। कुछ भी हो, बाप को बताने से सावधानी मिलती रहेगी। कांटा लगता ही तब है जब बाप को भूलते हैं। बच्चे सद्गति करने वाले बाप से भी 3 कोस दूर भागते हैं। गाते भी हैं वारी जाऊं, कुर्बान जाऊं। परन्तु किस पर? ऐसे तो नहीं लिखा है - संन्यासी पर वारी जाऊं! वा ब्रह्मा विष्णु शंकर पर वारी जाऊं! वा श्रीकृष्ण पर वारी जाऊं! कुर्बान जाना है परमपिता परमात्मा पर। कोई मनुष्य पर नहीं। वर्सा मिलता है बाप से। बाप बच्चों पर कुर्बान होता है। यह बेहद का बाप भी कहते हैं, मैं कुर्बान होने आया हूँ। परन्तु बाप पर कुर्बान होने में बच्चों का हृदय कितना विदीरण होता है। देह-अभिमान में आया तो मरा, व्यभिचारी हुआ। याद उस एक की रहनी चाहिए। उन पर बलिहार जाना चाहिए। अब नाटक पूरा होता है। अब हमको वापिस जाना है। बाकी मित्र-सम्बन्धी आदि तो सब कब्रदाखिल होने हैं। उनको क्या याद करेंगे, इसमें अभ्यास बहुत चाहिए। गाया भी हुआ है चढ़े तो चाखे अमृतरस,... जोर से गिरते हैं तो पद गँवा देते हैं। ऐसे नहीं स्वर्ग में नहीं आयेंगे। परन्तु राजा रानी बनने और प्रजा बनने में फ़र्क तो है ना। यहाँ का भील भी देखो, मिनिस्टर भी देखो। फ़र्क है ना इसलिए पुरुषार्थ पूरा करना है। कोई गिरते हैं तो एकदम पतित बन जाते हैं। श्रीमत पर चल नहीं पाते तो माया नाक से पकड़ एकदम गटर में डाल देती है। बापदादा का बनकर फिर ट्रेटर बनना, गोया उनका सामना करना है इसलिए बाप कहते हैं कदम-कदम सम्भाल कर चलो। अब माया का अन्त होने वाला है, तो माया बहुतों को गिराती है, इसलिए बच्चों को खबरदार रहना है। रास्ता जरा लम्बा है, पद भी बहुत भारी है। अगर ट्रेटर बना तो सजा भी भारी है। जब धर्मराज बाबा सजा देते हैं तो बहुत रड़ियां मारते हैं। जो कल्प-कल्प के लिए कायम हो जाती हैं। माया बड़ी प्रबल है। थोड़ा सा भी बाप का डिसरिगार्ड किया तो मरा। गाया हुआ है सतगुरू का निंदक ठौर न पाये। काम वश, क्रोध वश उल्टे काम करते हैं। गोया बाप की निंदा कराते हैं और दण्ड के निमित्त बन जाते हैं। अगर कदम-कदम पर पदमों की कमाई है तो पदमों का घाटा भी है। अगर सर्विस से जमा होता है तो उल्टे विकर्म से ना भी होती है। बाबा के पास सारा हिसाब रहता है। अब सम्मुख पढ़ा रहे हैं तो सारा हिसाब जैसे उनकी हथेली पर है। बाप तो कहेंगे शल कोई बच्चा शिवबाबा का डिसरिगार्ड न करे, बहुत विकर्म बनते हैं। यज्ञ सेवा में हड्डी-हड्डी देनी पड़ती है। दधीचि ऋषि का मिसाल है ना! उसका भी पद बनता है। नहीं तो प्रजा में भी भिन्न-भिन्न पद हैं। प्रजा में भी नौकर चाकर सभी चाहिए। भल वहाँ दु:ख नहीं होगा परन्तु नम्बरवार पद तो हैं ही। अच्छा।
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का यादप्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।
धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) याद की यात्रा में थकना नहीं है। ऐसी सच्ची याद का अभ्यास करना है जो अन्त समय में बाप के सिवाए कोई भी याद न आये।
2) सच्चे बाप की मत पर चल सच्ची कमाई करनी है। अपनी मनमत पर नहीं चलना है। सद्गुरू की निंदा कभी भी नहीं करानी है। काम, क्रोध के वश कोई उल्टा काम नहीं करना है।
वरदान:- संकल्प शक्ति द्वारा हर कार्य में सफल होने की सिद्धि प्राप्त करने वाले सफलतामूर्त भव
संकल्प शक्ति द्वारा बहुत से कार्य सहज सफल होने की सिद्धि का अनुभव होता है। जैसे स्थूल आकाश में भिन्न-भिन्न सितारे देखते हो ऐसे विश्व के वायुमण्डल के आकाश में चारों ओर सफलता के चमकते हुए सितारे तब दिखाई देंगे जब आपके संकल्प श्रेष्ठ और शक्तिशाली होंगे, सदा एक बाप के अन्त में खोये रहेंगे, आपके यह रूहानी नयन, रूहानी मूर्त दिव्य दर्पण बनेंगे। ऐसे दिव्य दर्पण ही अनेक आत्माओं को आत्मिक स्वरूप का अनुभव कराने वाले सफलतामूर्त होते हैं।
स्लोगन:- निरन्तर ईश्वरीय सुखों का अनुभव करने वाले ही बेफिक्र बादशाह हैं।
10-01-2023 HINDI MURLI
“मीठे बच्चे - तुम्हारा यह मरजीवा जन्म है, तुम ईश्वर बाप से वर्सा ले रहे हो, तुम्हें बहुत बड़ी लाटरी मिली है, इसलिए अपार खुशी में रहना है''
प्रश्नः- अपने आपको कौन सी समझानी दो तो चिन्ता समाप्त हो जायेगी? गुस्सा चला जायेगा?
उत्तर:- हम ईश्वर की सन्तान हैं, हमें तो बाप समान मीठा बनना है। जैसे बाबा मीठे रूप से समझानी देते, गुस्सा नहीं करते। ऐसे हमें भी आपस में मीठा रहना है। लूनपानी नहीं होना है क्योंकि जानते हैं जो सेकेण्ड पास हुआ, वह ड्रामा में पार्ट था। चिन्ता किस बात की करें। ऐसे-ऐसे अपने आपको समझाओ तो चिन्ता खत्म हो जायेगी। गुस्सा भाग जायेगा।
गीत:- यही बहार है...
ओम् शान्ति। यह है ईश्वरीय सन्तान की खुशियों का गायन। तुम इतना खुशी का गायन सतयुग में नहीं कर सकेंगे। अभी तुमको खजाना मिल रहा है। यह है बड़े से बड़ी लाटरी। जब लाटरी मिलती है तो खुशी होती है। तुम फिर इस लाटरी से जन्म-जन्मान्तर स्वर्ग में सुख भोगते रहते हो। यह है तुम्हारा मरजीवा जन्म। जो जीते जी मरते नहीं, उनका मरजीवा जन्म नहीं कहेंगे। उन्हों को तो खुशी का पारा भी चढ़ नहीं सकता। जब तक मरजीवा नहीं बने हैं अर्थात् बाप को अपना नहीं बनाया है, तब तक पूरा वर्सा भी मिल नहीं सकता। जो बाप के बनते हैं, जो बाप को याद करते हैं उनको बाप भी याद करते हैं। तुम हो ईश्वरीय सन्तान। तुम्हें नशा है कि हम ईश्वर बाप से वर्सा अथवा वर ले रहे हैं, जिसके लिए भक्त लोग भक्ति मार्ग में धक्का खाते रहते हैं। बाप से मिलने के लिए अनेकानेक उपाय करते हैं। कितने वेद, शास्त्र, मैगज़ीन आदि अथाह पढ़ते रहते हैं। परन्तु दुनिया तो दिन प्रतिदिन दु:खी ही होती जाती है, इनको तमोप्रधान होना ही है। यह बबुल ट्री है ना। बबुलनाथ फिर आकर काँटों से फूल बनाते हैं। कॉटे बहुत बड़े-बड़े हो गये हैं। बड़े जोर से लगते हैं। उसको अनेक प्रकार के नाम दिये हुए हैं। सतयुग में तो होते नहीं। बाप समझाते हैं - यह है कॉटों की दुनिया। एक दो को दु:ख देते रहते हैं। घर में बच्चे भी ऐसे कपूत निकल पड़ते हैं जो बात मत पूछो। माँ-बाप को बहुत दु:खी करते हैं। सभी कोई एक समान भी नहीं होते। सबसे जास्ती दु:ख देने वाला कौन है? मनुष्य यह नहीं जानते। बाप कहते हैं इन गुरूओं ने परमात्मा की महिमा गुम कर दी है। हम तो उनकी बहुत महिमा करते हैं। वह परम पूज्य परमपिता परमात्मा है। शिव का चित्र भी बहुत अच्छा है। परन्तु बहुत लोग ऐसे हैं जो मानेंगे नहीं कि शिव कोई ऐसा ज्योर्तिबिन्दु है क्योंकि वह तो आत्मा सो परमात्मा कह देते हैं। आत्मा अति सूक्ष्म है जो भ्रकुटी के बीच में बैठी है, फिर परमात्मा इतना बड़ा आकार वाला कैसे हो सकता है? बहुत विद्वान, आचार्य लोग बी.के. पर हँसी उड़ाते हैं कि परमात्मा का ऐसा रूप तो हो नहीं सकता। वह तो अखण्ड ज्योतिर्मय तत्व हजारों सूर्यों से भी तेजोमय है। वास्तव में यह रॉग है। इनकी राइट महिमा तो बाप खुद ही बताते हैं। वह मनुष्य सृष्टि का बीजरूप है। यह सृष्टि एक उल्टा झाड़ है। सतयुग, त्रेता में उनको कोई याद नहीं करते। मनुष्य को जब दु:ख होता है तब उनको याद करते हैं - हे भगवान, हे परमपिता परमात्मा रहम करो। सतयुग, त्रेता में तो कोई रहम माँगने वाला होता नहीं। वह है बाप रचयिता की नई रचना। इस बाप की महिमा ही अपरमअपार है। ज्ञान का सागर, पतित-पावन है। ज्ञान का सागर है तो जरूर ज्ञान दिया होगा। वह सत, चित्, आनन्द स्वरूप है। चैतन्य है। ज्ञान तो चैतन्य आत्मा ही धारण करती है। समझो हम शरीर छोड़ जाते हैं तो आत्मा में ज्ञान के संस्कार तो हैं ही हैं। बच्चा बनेंगे तो भी वह संस्कार होंगे, परन्तु आरगन्स छोटे हैं तो बोल नहीं सकते। आरगन्स बड़े होते हैं तो याद कराया जाता है, तो स्मृति में आ जाता है। छोटे बच्चे भी शास्त्र आदि कण्ठ कर लेते हैं। यह सभी अगले जन्म के संस्कार हैं। अब बाप हमको अपना ज्ञान का वर्सा देते हैं। सारे सृष्टि का ज्ञान इनके पास है क्योंकि बीजरूप है। हम अपने को बीजरूप नहीं कहेंगे। बीज में जरूर झाड़ के आदि-मध्य-अन्त का ज्ञान होगा ना। तो बाप खुद कहते हैं मैं हूँ सृष्टि का बीजरूप। इस झाड़ का बीज ऊपर है। वह बाप सत् चित आनन्द स्वरूप, ज्ञान का सागर है। सृष्टि के आदि-मध्य-अन्त का ही उसमें ज्ञान होगा। नहीं तो क्या होगा! क्या शास्त्रों का ज्ञान होगा? वह तो बहुतों में है। परमात्मा की तो जरूर कोई नई बात होगी ना। जो कोई भी विद्वान आदि नहीं जानते। कोई से भी पूछो - इस सृष्टि रूपी झाड़ की उत्पत्ति, पालना, संघार कैसे होता है, इनकी आयु कितनी है, यह कैसे वृद्धि को पाता है... बिल्कुल कोई नहीं समझा सकता है।
एक गीता ही है सर्व शास्त्रमई शिरोमणी, बाकी तो सब हैं उनके बाल बच्चे। जबकि गीता पढ़ने से भी कुछ नहीं समझते तो बाकी शास्त्र पढ़ने से फ़ायदा ही क्या? वर्सा तो फिर भी गीता से मिलना है। अब बाप सारे ड्रामा का राज़ समझाते हैं। बाप पत्थरबुद्धि से पारसबुद्धि बनाए पारसनाथ बनाते हैं। अब तो सब पत्थरबुद्धि, पत्थरनाथ हैं। परन्तु वह अपने को बड़े-बड़े टाइटिल्स देकर अपने को पारसबुद्धि समझ बैठे हैं। बाप समझाते हैं मेरी महिमा सबसे न्यारी है। मैं ज्ञान का सागर, आनंद का सागर, सुख का सागर हूँ। ऐसी महिमा तुम देवताओं की नहीं कर सकते। भक्त लोग देवताओं के आगे जाकर कहेंगे आप सर्वगुण सम्पन्न... हैं। बाप की तो एक ही महिमा है। वह भी हम जानते हैं। अभी हम मन्दिर में जायेंगे तो बुद्धि में पूरा ज्ञान है कि इन्होंने तो पूरे 84 जन्म लिये होंगे। अभी अपने को कितनी खुशी है। आगे थोड़ेही यह ख्याल आता था। अभी समझते हैं हमको ऐसा बनना है। बुद्धि में बहुत परिवर्तन आ जाता है।
बाप बच्चों को समझाते हैं - आपस में बहुत मीठे बनो। लूनपानी मत बनो। बाबा कभी भी किससे गुस्सा करता है क्या? बड़े मीठे रूप से समझानी देते हैं। एक सेकण्ड पास हुआ कहेंगे यह भी ड्रामा में पार्ट था। इसकी चिंता क्या करनी है। ऐसे-ऐसे अपने को समझाना है। तुम ईश्वरीय सन्तान कम थोड़ेही हो। यह तो समझ सकते हो कि ईश्वरीय सन्तान जरूर ईश्वर के पास रहते होंगे। ईश्वर निराकार है तो उसकी सन्तान भी निराकार हैं। वही सन्तान यहाँ चोला लेकर पार्ट बजाती है। स्वर्ग में मनुष्य हैं देवी-देवता धर्म के। अगर सबका बैठ हिसाब निकालें तो कितना माथा मारना पड़े। परन्तु समझ सकते हैं कि नम्बरवार समय अनुसार थोड़े-थोड़े जन्म मिलते होंगे। आगे तो समझते थे मनुष्य कुत्ता बिल्ली बनते हैं। अभी तो बुद्धि में रात दिन का फ़र्क आ गया है। यह सब हैं धारणा करने की बातें। नटशेल में समझाते हैं कि अब 84 जन्म का चक्र पूरा हुआ। अभी इस छी-छी शरीर को छोड़ना है। यह सबका पुराना जड़जड़ीभूत, तमोप्रधान शरीर है, इससे ममत्व मिटा देना है। पुराने शरीर को याद क्या करें। अब तो अपने नये शरीर को याद करेंगे, जो मिलना है सतयुग में। वाया मुक्तिधाम होकर सतयुग में आयेंगे। हम जीवनमुक्ति में जाते हैं और सब मुक्तिधाम में चले जाते हैं। इसको जयजयकार कहा जाता है, हाहाकार के बाद जयजयकार होना है। इतने सब मरेंगे कोई तो निमित्त कारण बनेगा। नैचुरल कैलेमिटीज़ होंगी। सिर्फ सागर ही थोड़ेही सभी खण्डों को खलास करेगा। सब कुछ खलास तो होना ही है। बाकी भारत अविनाशी खण्ड रह जाता है क्योंकि यह है शिवबाबा का बर्थ प्लेस। तो यह हो गया सबसे बड़ा तीर्थ स्थान। बाप सबकी सद्गति करते हैं, यह कोई मनुष्य नहीं जानते हैं। उन्हों को न जानना ही ड्रामा में नूँध है। तब तो बाप कहते हैं कि हे बच्चे तुम कुछ नहीं जानते थे, मैं ही तुमको रचता और रचना अथवा मनुष्य सृष्टि के आदि-मध्य-अन्त का सारा भेद समझाता हूँ। जिसको ऋषि मुनि भी बेअन्त, बेअन्त कहकर गये हैं। यह थोड़ेही समझते हैं कि सारी दुनिया के 5 विकार बड़े भारी दुश्मन हैं। जिस रावण को भारतवासी वर्ष-वर्ष जलाते ही आते हैं। उसको जानते कोई नहीं क्योंकि वह न जिस्मानी है, न रूहानी है। विकारों का तो कोई रूप ही नहीं है। मनुष्य एक्ट में आता है तब पता पड़ता है कि इनमें काम का, क्रोध का भूत आया है। इस विकार की स्टेज में भी उत्तम, मध्यम, कनिष्ट होते हैं। कोई में काम का नशा एकदम तमोप्रधान हो जाता है, कोई को रजो नशा, कोई को सतो नशा रहता है। कोई तो बाल ब्रह्मचारी भी रहते हैं। समझते हैं यह भी एक झंझट है सम्भालना। सबसे अच्छा उनको कहेंगे। संन्यासियों में भी बाल ब्रह्मचारी अच्छे गिने जाते हैं। गवर्मेन्ट के लिए भी अच्छा है, बच्चों की वृद्धि नहीं होगी। पवित्रता की ताकत मिलती है। यह हुई गुप्त। संन्यासी भी पवित्र रहते हैं, छोटे बच्चे भी पवित्र रहते हैं, वानप्रस्थी भी पवित्र रहते हैं। तो पवित्रता का बल मिलता ही आता है। उन्हों का भी कायदा चला आता है कि बच्चे को इतनी आयु तक पवित्र रहना है। तो वह भी बल मिलता है। तुम हो सतोप्रधान पवित्र। यह अन्तिम जन्म तुम बाप से प्रतिज्ञा करते हो। तुम सतयुग की स्थापना करने वाले हो। जो करेगा सो पवित्र दुनिया का मालिक बनेगा, नम्बरवार पुरुषार्थ अनुसार।
यह है ईश्वरीय कुटुम्ब। ईश्वर के साथ हम रहते हैं कल्प में एक बार। बस फिर दैवी घराने में तो बहुत जन्म रहेंगे। यह एक जन्म ही दुर्लभ है। यह ईश्वरीय कुल है उत्तम से उत्तम। ब्राह्मण कुल सबसे ऊंची चोटी है। नीच ते नीच कुल से हम ऊंच ब्राह्मण कुल के हो गये। शिवबाबा जब ब्रह्मा को रचे तब तो ब्राह्मण रचे। कितनी खुशी रहती है, जो बाबा की सर्विस में रहते हैं। हम ईश्वर की औलाद बने हैं और ईश्वर की श्रीमत पर चलते हैं। अपनी चलन से उनका नाम बाला करते हैं। बाबा कहते हैं वह तो हैं आसुरी गुणों वाले, तुम दैवीगुणों वाले बन रहे हो। जब तुम सम्पूर्ण बन जायेंगे तो तुम्हारी चलन बहुत अच्छी हो जायेगी। बाबा कहेंगे यह हैं दैवी गुणों वाले, नम्बरवार पुरुषार्थ अनुसार। आसुरी गुण वाले भी नम्बरवार हैं। बाल ब्रह्मचारी भी हैं। संन्यासी पवित्र रहते हैं सो तो बहुत अच्छा है। बाकी वह किसकी सद्गति तो कर नहीं सकते। अगर कोई गुरू लोग सद्गति करने वाले होते तो साथ ले जाते, परन्तु खुद ही छोड़कर चले जाते हैं। यहाँ यह बाप कहते हैं मैं तुमको साथ ले जाऊंगा। मैं आया ही हूँ तुमको साथ ले जाने के लिए। वह तो ले नहीं जाते। खुद ही गृहस्थियों के पास जन्म लेते रहते हैं। संस्कारों के कारण फिर संन्यासियों के झुण्ड में चले जाते हैं। नाम रूप तो हर जन्म में बदलता रहता है। यह अभी तुम बच्चे जानते हो कि सतयुग में यहाँ के पुरुषार्थ अनुसार पद होगा। वहाँ यह मालूम नहीं होगा कि हमने यह पद कैसे पाया। यह तो अभी पता है जिसने जैसे कल्प पहले पुरुषार्थ किया था, वैसा ही अब करेंगे। बच्चों को साक्षात्कार भी कराया हुआ है कि वहाँ शादी आदि कैसे होती है। बड़े-बड़े मैदान, बगीचे आदि होंगे। अब तो भारत में ही करोड़ों की आबादी है। वहाँ तो कुछ लाख ही रहते हैं। वहाँ थोड़ेही इतनी मंजिलों वाले मकान होंगे। यह अभी हैं क्योंकि जगह नहीं है। वहाँ इतनी सर्दी नहीं होगी। वहाँ दु:ख की निशानी भी नहीं है। न बहुत गर्मी होती, जो पहाड़ों पर जाना पड़े। नाम ही है स्वर्ग। इस समय मनुष्य कॉटों के जंगल में पड़े हैं। जितना सुख की चाहना करते हैं उतना दु:ख बढ़ता ही जाता है। अब बहुत दु:ख होगा। लड़ाई होगी तो खून की नदियाँ बहेंगी। अच्छा।
यह मुरली सब बच्चों के आगे सुनाई। सम्मुख सुनना नम्बरवन, टेप से सुनना नम्बर टू, मुरली से पढ़ना नम्बर थ्री। सतोप्रधान, सतो और रजो। तमो तो कहेंगे नहीं। टेप में हूबहू आती है। अच्छा।
बापदादा और मीठी माँ का सिकीलधे बच्चों को यादप्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।
धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) अपनी चलन वा दैवीगुणों से बाप का नाम बाला करना है। आसुरी अवगुण निकाल देने हैं।
2) इस पुराने जड़जड़ीभूत शरीर में ममत्व नहीं रखना है। नये सतयुगी शरीर को याद करना है। पवित्रता की गुप्त मदद करनी है।
वरदान:- रूहानियत की शक्ति द्वारा दूर रहने वाली आत्माओं को समीपता का अनुभव कराने वाले मा. सर्वशक्तिमान भव
जैसे साइन्स के साधनों द्वारा दूर की हर वस्तु समीप अनुभव होती है, ऐसे दिव्य बुद्धि द्वारा दूर की वस्तु समीप अनुभव कर सकते हो। जैसे साथ रहने वाली आत्माओं को स्पष्ट देखते, बोलते, सहयोग देते और लेते हो, ऐसे रूहानियत की शक्ति द्वारा दूर रहने वाली आत्माओं को समीपता का अनुभव करा सकते हो। सिर्फ इसके लिए मास्टर सर्वशक्तिमान, सम्पन्न और सम्पूर्ण स्थिति में स्थित रहो और संकल्प शक्ति को स्वच्छ बनाओ।
स्लोगन:- अपने हर संकल्प, बोल और कर्म द्वारा औरों को प्रेरणा देने वाले ही प्रेरणामूर्त हैं।
08-01-2023 AVAKTYA HINDI MURLI REVISE COURSE:23-04-93
निश्चयबुद्धि भव, अमर भव
आज बापदादा सर्व अति स्नेही, आदि से यज्ञ की स्थापना के सहयोगी, अनेक प्रकार के आये हुए भिन्न-भिन्न समस्याओं के पेपर में निश्चयबुद्धि विजयी बन पार करने वाली आदि स्नेही, सहयोगी, अटल, अचल आत्माओं से मिलन मनाने आये हैं। निश्चय की सब्जेक्ट में पास हो चलने वाले बच्चों के पास आये हैं। यह निश्चय चाहे इस पुरानी जीवन में, चाहे अगले जीवन में भी सदा विजय का अनुभव कराती रहेगी। ‘निश्चय' का, ‘अमर भव' का वरदान सदा साथ रहे। विशेष आज जो बहुतकाल की अनुभवी बुजुर्ग आत्मायें हैं, उन्हों के याद और स्नेह के बन्धन में बंधकर बाप आये हैं। निश्चय की मुबारक!
एक तरफ यज्ञ अर्थात् पाण्डवों के किले की जो नींव अर्थात् फाउण्डेशन आत्मायें हैं वह भी सभी सामने हैं और दूसरे तरफ आप अनुभवी आदि आत्मायें इस पाण्डवों के किले की दीवार की पहली ईटें हो। फाउण्डेशन भी सामने है और आदि ईटे, जिनके आधार पर यह किला मजबूत बन विश्व की छत्रछाया बना, वह भी सामने हैं। तो जैसे बाप ने बच्चों के स्नेह में “जी हज़ूर, हाज़िर'' करके दिखाया, ऐसे ही सदा बापदादा और निमित्त आत्माओं की श्रीमत वा डायरेक्शन को सदा ‘जी हाज़िर' करते रहना। कभी भी व्यर्थ मन-मत वा परमत नहीं मिलाना। हाज़िर हज़ूर को जान श्रीमत पर उड़ते चलो। समझा? अच्छा!
मधुबन निवासियों को सेवा की मुबारक देते हुए बापदादा बोले :-
अच्छा, विशेष मधुबन निवासियों को बहुत-बहुत मुबारक हो। सारा सीज़न अपनी मधुरता और अथक सेवा से सर्व की सेवा के निमित्त बने। तो सबसे पहले सारी सीजन में निमित्त सेवाधारी विशेष मधुबन निवासियों को बहुत-बहुत मुबारक। मधुबन है ही मधु अर्थात् मधुरता। तो मधुरता सर्व को बाप के स्नेह में लाती है इसलिए चाहे हॉल में हो, चाहे चले गये हो लेकिन सभी को विशेष एक-एक डिपार्टमेन्ट को बापदादा विशेष मुबारक सेवा की दे रहे हैं और “सदा अथक भव, मधुर भव'' के वरदानों से बढ़ते, उड़ते चलो।
अव्यक्त बापदादा की पर्सनल मुलाकात
1) अलबेलापन कमजोरी लाता है, इसलिये अलर्ट रहो
सभी संगमयुगी श्रेष्ठ आत्मायें हो ना! संगमयुग की विशेषता क्या है जो किसी भी युग में नहीं है? संगमयुग की विशेषता है एक तो प्रत्यक्ष फल मिलता है और एक का पद्म गुणा प्राप्ति का अनुभव इसी जन्म में ही होता है। प्रत्यक्ष फल मिलता है ना। अगर एक सेकेण्ड भी हिम्मत रखते हो तो मदद कितने समय तक मिलती रहती है! किसी एक की भी सेवा करते हो तो खुशी कितनी मिलती है! तो एक की पद्म गुणा प्राप्ति अर्थात् प्रत्यक्षफल इस संगम पर मिलता है। तो ताजा फ्रूट खाना अच्छा लगता है ना। तो आप सभी प्रत्यक्ष फल अर्थात् ताजा फल खाने वाले हो, इसीलिए शक्तिशाली हो। कमजोर तो नहीं हैं ना। सब पॉवरफुल हैं। कमजोरी को आने नहीं देना। जब तन्दरुस्त होते हैं तब कमजोरी स्वत: खत्म हो जाती है। सर्वशक्तिवान बाप द्वारा सदा शक्ति मिलती रहती है, तो कमजोर कैसे होंगे। कमजोरी आ सकती है? कभी गलती से आ जाती है? जब कुम्भकरण की नींद में अलबेले होकर सो जाते हो तब आ सकती है, नहीं तो नहीं आ सकती है। आप तो अलर्ट हो ना। अलबेले हो क्या? सभी अलर्ट हैं? सदा अलर्ट हैं? संगमयुग में बाप मिला सब-कुछ मिला। तो अलर्ट ही रहेंगे ना। जिसको बहुत प्राप्तियां होती रहती हैं वो कितना अलर्ट रहते हैं! रिवाजी बिजनेसमैन को बिजनेस में प्राप्तियां होती रहती हैं तो अलबेला होगा या अलर्ट होगा? तो आपको एक सेकेण्ड में कितना मिलता है! तो अलबेले कैसे होंगे? बाप ने सर्व शक्तियां दे दीं। जब सर्व शक्तियां साथ हैं तो अलबेलापन नहीं आ सकता है। सदा होशियार, सदा खबरदार रहो!
यू.के. को तो बापदादा कहते ही हैं ओ.के.। तो जो ओ.के. (बिल्कुल ठीक) होगा वह जब अलर्ट होगा तब तो ओ.के. होगा ना। फाउण्डेशन पॉवरफुल है, इसलिए जो भी टाल-टालियां निकली हैं वह भी शक्तिशाली हैं। विशेष बापदादा ने ब्रह्मा बाप ने अपने दिल से लण्डन का पहला फाउण्डेशन डाला है। ब्रह्मा बाप का विशेष लाडला है। तो आप प्रत्यक्ष फल के सदा अधिकारी आत्मायें हो। कर्म करने के पहले फल तैयार है ही। ऐसे ही लगता है ना। या मेहनत लगती है? नाचते-गाते फल खाते रहते हो। वैसे भी डबल विदेशियों को फल अच्छा लगता है ना। बापदादा भी यू.के. अर्थात् सदा ओ.के. रहने वाले बच्चों को देख हर्षित होते हैं। अपना यह टाइटल सदा याद रखना, ओ.के.। यह कितना बढ़िया टाइटल है! सभी सदा ओ.के. रहने वाले और औरों को भी अपने चेहरे से, वाणी से, वृत्ति से ओ.के. बनाने वाले। यही सेवा करनी है ना! अच्छा है। सेवा का शौक भी अच्छा है। जो भी जहाँ से भी आये हो लेकिन सभी तीव्र पुरुषार्थी और उड़ती कला वाले हो। सबसे ज्यादा खुश कौन रहता है? नशे से कहो मैं! सिवाए खुशी के और है ही क्या! ‘खुशी' ब्राह्मण जीवन की खुराक है। खुराक के बिना कैसे चलेंगे। चल रहे हो, तो खुराक है तभी तो चल रहे हो ना। स्थान भी बढ़ रहे हैं। देखो, पहले तीन पैर पृथ्वी लेना बड़ी बात लगती थी और अभी क्या लगता है? सहज लगता है ना। तो लण्डन ने कमाल की है ना। (अभी 50 एकड़ जमीन मिली है) हिम्मत दिलाने वाले भी अच्छे हैं और हिम्मत रखने वाले भी अच्छे हैं। देखो, आप सबकी अंगुली नहीं होती तो कैसे होता। तो सभी यू.के. वाले लक्की हैं और अंगुली देने में बहादुर हैं।
2) अपनी सर्व जिम्मेवारियां बाप को देकर बेफिक्र बादशाह बनो
सदा अपने को बेफिक्र बादशाह अनुभव करते हो? या थोड़ा-थोड़ा फिक्र है? क्योंकि जब बाप ने आपकी जिम्मेवारी ले ली, तो जिम्मेवारी का फिक्र क्यों? अभी सिर्फ रेस्पान्सिबिल्टी है बाप के साथ-साथ चलते रहने की। वह भी बाप के साथ-साथ है, अकेले नहीं। तो क्या फिक्र है? कल क्या होगा ये फिक्र है? जॉब का फिक्र है? दुनिया में क्या होगा ये फिक्र है? क्योंकि जानते हो कि हमारे लिए जो भी होगा अच्छा होगा। निश्चय है ना। पक्का निश्चय है या हिलता है कभी? जहाँ निश्चय पक्का है, वहाँ निश्चय के साथ विजय भी निश्चित है। ये भी निश्चय है ना कि विजय हुई पड़ी है। या कभी सोचते हो कि पता नहीं होगी या नहीं? क्योंकि कल्प-कल्प के विजयी हैं और सदा रहेंगे ये अपना यादगार कल्प पहले वाला अभी फिर से देख रहे हो। इतना निश्चय है ना कि कल्प-कल्प के विजयी हैं। इतना निश्चय है? कल्प पहले भी आप ही थे या दूसरे थे? तो सदा यही याद रखना कि हम निश्चयबुद्धि विजयी रत्न हैं। ऐसे रत्न हो जिन रत्नों को बापदादा भी याद करते हैं। ये खुशी है ना? बहुत मौज में रहते हो ना। इस अलौकिक दिव्य श्रेष्ठ जन्म की और अपने मधुबन घर में पहुंचने की मुबारक।
3) बाप और आप - ऐसे कम्बाइण्ड रहो जो कभी कोई अलग न कर सके
सभी अपने को सदा बाप और आप कम्बाइण्ड हैं - ऐसा अनुभव करते हो? जो कम्बाइण्ड होता है उसे कभी भी, कोई भी अलग नहीं कर सकता। आप अनेक बार कम्बाइण्ड रहे हो, अभी भी हो और आगे भी सदा रहेंगे। ये पक्का है? तो इतना पक्का कम्बाइण्ड रहना। तो सदैव स्मृति रखो कि कम्बाइण्ड थे, कम्बाइण्ड हैं और कम्बाइण्ड रहेंगे। कोई की ताकत नहीं जो अनेक बार के कम्बाइण्ड स्वरूप को अलग कर सके। तो प्यार की निशानी क्या होती है? (कम्बाइण्ड रहना) क्योंकि शरीर से तो मजबूरी में भी कहाँ-कहाँ अलग रहना पड़ता है। प्यार भी हो लेकिन मजबूरी से कहाँ अलग रहना भी पड़ता है। लेकिन यहाँ तो शरीर की बात ही नहीं। एक सेकेण्ड में कहाँ से कहाँ पहुंच सकते हो! आत्मा और परमात्मा का साथ है। परमात्मा तो कहाँ भी साथ निभाता है और हर एक से कम्बाइण्ड रूप से प्रीत की रीति निभाने वाले हैं। हरेक क्या कहेंगे मेरा बाबा है। या कहेंगे तेरा बाबा है? हरेक कहेगा मेरा बाबा है! तो मेरा क्यों कहते हो? अधिकार है तब ही तो कहते हो। प्यार भी है और अधिकार भी है। जहाँ प्यार होता है वहाँ अधिकार भी होता है। अधिकार का नशा है ना। कितना बड़ा अधिकार मिला है! इतना बड़ा अधिकार सतयुग में भी नहीं मिलेगा! किसी जन्म में परमात्म-अधिकार नहीं मिलता। प्राप्ति यहाँ है। प्रालब्ध सतयुग में है लेकिन प्राप्ति का समय अभी है। तो जिस समय प्राप्ति होती है उस समय कितनी खुशी होती है! प्राप्त हो गया फिर तो कॉमन बात हो जाती है। लेकिन जब प्राप्त हो रहा है, उस समय का नशा और खुशी अलौकिक होती है! तो कितनी खुशी और नशा है! क्योंकि देने वाला भी बेहद का है। तो दाता भी बेहद का है और मिलता भी बेहद का है। तो मालिक किसके हो हद के या बेहद के? तीनों लोक अपने बना दिये हैं। मूलवतन, सूक्ष्मवतन हमारा घर है और स्थूलवतन में तो हमारा राज्य आने वाला ही है। तीनों लोकों के अधिकारी बन गये! तो क्या कहेंगे - अधिकारी आत्मायें। कोई अप्राप्ति है? तो क्या गीत गाते हो? (पाना था वह पा लिया) पाना था वह पा लिया, अभी कुछ पाने को नहीं रहा। तो ये गीत गाते हो? या कोई अप्राप्ति है पैसा चाहिए, मकान चाहिए! नेता की कुर्सी चाहिए? कुछ नहीं चाहिए क्योंकि कुर्सी होगी तो भी एक जन्म का भी भरोसा नहीं और आपको कितनी गारन्टी है? 21 जन्म की गारन्टी है। गारन्टी-कार्ड माया तो चोरी नहीं कर लेती है? जैसे यहाँ पासपोर्ट खो लेते हैं तो कितनी मुश्किल हो जाती है! तो गारन्टी-कार्ड माया तो नहीं ले लेती है? छुपा-छुपी करती है। फिर आप क्या करते हो? लेकिन ऐसे शक्तिशाली बनो जो माया की हिम्मत नहीं।
4) हर कर्म त्रिकालदर्शी बनकर करो
सभी अपने को तख्तनशीन आत्मायें अनुभव करते हो? अभी तख्त मिला है या भविष्य में मिलना है, क्या कहेंगे? सभी तख्त पर बैठेंगे? (दिलतख्त बहुत बड़ा है) दिलतख्त तो बड़ा है लेकिन सतयुग के तख्त पर एक समय में कितने बैठेंगे? तख्त पर भले कोई बैठे लेकिन तख्त अधिकारी रॉयल फैमिली में तो आयेंगे ना। तख्त पर इकट्ठे तो नहीं बैठ सकेंगे! इस समय सभी तख्तनशीन हैं इसलिए इस जन्म का महत्व है। जितने चाहें, जो चाहें दिलतख्त-नशीन बन सकते हैं। इस समय और कोई तख्त है? कौनसा है? (अकाल-तख्त) आप अविनाशी आत्मा का तख्त ये भृकुटी है। तो भृकुटी के तख्त-नशीन भी हो और दिलतख्त-नशीन भी हो। डबल तख्त है ना! नशा है कि मैं आत्मा भृकुटी के अकालतख्त-नशीन हूँ! तख्त-नशीन आत्मा का स्व पर राज्य है, इसीलिए स्वराज्य अधिकारी हैं। स्वराज्य अधिकारी हूँ यह स्मृति सहज ही बाप द्वारा सर्व प्राप्ति का अनुभव करायेगी। तो तीनों ही तख्त की नॉलेज है। नॉलेजफुल हो ना! पॉवरफुल भी हो या सिर्फ नॉलेजफुल हो? जितने नॉलेजफुल हो, उतने ही पॉवरफुल हो या नॉलेजफुल अधिक, पॉवर-फुल कम? नॉलेज में ज्यादा होशियार हो! नॉलेजफुल और पॉवरफुल दोनों ही साथ-साथ। तो तीनों तख्त की स्मृति सदा रहे।
ज्ञान में तीन का महत्व है। त्रिकालदर्शी भी बनते हैं। तीनों काल को जानते हो। या सिर्फ वर्तमान को जानते हो? कोई भी कर्म करते हो तो त्रिकालदर्शी बनकर कर्म करते हो या सिर्फ एकदर्शी बनकर कर्म करते हो? क्या हो एक दर्शी या त्रिकालदर्शी? तो कल क्या होने वाला है वह जानते हो? कहो हम यह जानते हैं कि कल जो होगा वह बहुत अच्छा होगा। ये तो जानते हो ना! तो त्रिकालदर्शी हुए ना। जो हो गया वो भी अच्छा, जो हो रहा है वह और अच्छा और जो होने वाला है वह और बहुत अच्छा! यह निश्चय है ना कि अच्छे से अच्छा होना है, बुरा नहीं हो सकता। क्यों? अच्छे से अच्छा बाप मिला, अच्छे से अच्छे आप बने, अच्छे से अच्छे कर्म कर रहे हो। तो सब अच्छा है ना। कि थोड़ा बुरा, थोड़ा अच्छा है? जब मालूम पड़ गया कि मैं श्रेष्ठ आत्मा हूँ, तो श्रेष्ठ आत्मा का संकल्प, बोल, कर्म अच्छा होगा ना! तो यह सदा स्मृति रखो कि कल्याणकारी बाप मिला तो सदा कल्याण ही कल्याण है। बाप को कहते ही हैं विश्व-कल्याणकारी और आप मास्टर विश्व-कल्याणकारी हो! तो जो विश्व का कल्याण करने वाला है उसका अकल्याण हो ही नहीं सकता इसलिए यह निश्चय रखो कि हर समय, हर कार्य, हर संकल्प कल्याणकारी है। संगमयुग को भी नाम देते हैं कल्याणकारी युग। तो अकल्याण नहीं हो सकता। तो क्या याद रखेंगे? जो हो रहा है वह अच्छा और जो होने वाला वह बहुत-बहुत अच्छा। तो यह स्मृति सदा आगे बढ़ाती रहेगी। अच्छा, सभी कोने-कोने में बाप का झण्डा लहरा रहे हो। सभी बहुत हिम्मत और तीव्र पुरुषार्थ से आगे बढ़ रहे हो और सदा बढ़ते रहेंगे। फ्युचर दिखाई देता है ना। कोई भी पूछे आपका भविष्य क्या है? तो बोलो हमको पता है, बहुत अच्छा है। अच्छा।
वरदान:- अपने मस्तक पर श्रेष्ठ भाग्य की लकीर देखते हुए सर्व चिंताओं से मुक्त बेफिक्र बादशाह भव
बेफिक्र रहने की बादशाही सब बादशाहियों से श्रेष्ठ है। अगर कोई ताज पहनकर तख्त पर बैठ जाए और फिकर करता रहे तो यह तख्त हुआ या चिंता? भाग्य विधाता भगवान ने आपके मस्तक पर श्रेष्ठ भाग्य की लकीर खींच दी, बेफिक्र बादशाह हो गये। तो सदा अपने मस्तक पर श्रेष्ठ भाग्य की लकीर देखते रहो - वाह मेरा श्रेष्ठ ईश्वरीय भाग्य, इसी फ़खुर में रहो तो सब फिकरातें (चिंतायें) समाप्त हो जायेंगी।
स्लोगन:- एकाग्रता की शक्ति द्वारा रूहों का आवाह्न कर रूहानी सेवा करना ही सच्ची सेवा है।
07-01-2023 HIND MURLI
“मीठे बच्चे - तुम्हें बाप द्वारा बाप की लीला अर्थात् ड्रामा के आदि-मध्य-अन्त का ज्ञान मिला है, तुम जानते हो अब यह नाटक पूरा होता है, हम घर जाते हैं''
प्रश्नः- स्वयं को बाप के पास रजिस्टर कराना है तो उसके लिए कौनसा कायदा है?
उत्तर:- बाप के पास रजिस्टर होने के लिए 1- बाप पर पूरा पूरा बलि चढ़ना पड़ता। 2-अपना सब कुछ भारत को स्वर्ग बनाने की सेवा में सफल करना होता। 3- सम्पूर्ण निर्विकारी बनने का कसम उठाना पड़ता और फिर रहकर भी दिखाना होता। ऐसे बच्चों का नाम आलमाइटी गवर्मेन्ट के रजिस्टर में आ जाता है। उन्हें नशा रहता कि हम भारत को स्वर्ग वा राजस्थान बना रहे हैं। हम भारत की सेवा के लिए बाप पर बलि चढ़ते हैं।
गीत:- ओम् नमो शिवाए.....
ओम् शान्ति। जिसकी महिमा में यह गीत है वही बैठकर अपने रचना की महिमा सुनाते हैं। जिसको लीला भी कहा जाता है। लीला कहा जाता है नाटक को और महिमा होती है गुणवान की। तो उनकी महिमा सबसे न्यारी है। मनुष्य तो जानते नहीं। बच्चे जानते हैं कि उस परमपिता परमात्मा का ही इतना गायन है जिसकी शिव जयन्ती भी अब नजदीक है। शिव जयन्ती के लिए यह गीत भी अच्छा है। तुम बच्चे उसकी लीला को और उनकी महिमा को जानते हो, बरोबर यह लीला है। इसको नाटक (ड्रामा) भी कहा जाता है। बाप कहते हैं कि देवताओं से भी मेरी लीला न्यारी है। हरेक की अलग-अलग लीला होती है। जैसे गवर्मेन्ट में प्रेजीडेन्ट का, मिनिस्टर का मर्तबा अलग-अलग है ना। अगर परमात्मा सर्वव्यापी होता तो सबकी एक एक्ट हो जाती। सर्वव्यापी कहने से ही भूख मरे हैं। कोई भी मनुष्य न बाप को, न बाप की अपरमअपार महिमा को जानते हैं। जब तक बाप को न जानें तब तक रचना को भी जान न सकें। अभी तुम बच्चों ने रचना को भी जाना है। ब्रह्माण्ड, सूक्ष्मवतन और मनुष्य सृष्टि का चक्र बुद्धि में फिरता रहता है। यह है लीला अथवा रचना के आदि-मध्य-अन्त की नॉलेज। इस समय दुनिया के मनुष्य हैं नास्तिक। कुछ भी नहीं जानते और गपोड़े कितने लगाते हैं। साधू लोग भी कानफ्रेन्स आदि करते रहते हैं, बिचारों को यह पता ही नहीं कि अब नाटक पूरा होता है। अभी कुछ टच होता है। जबकि नाटक पूरा होने को आया है। अभी सब कहते हैं रामराज्य चाहिए। क्रिश्चियन के राज्य में ऐसे नहीं कहते थे कि नया भारत हो। अभी बहुत दु:ख है। तो सभी आवाज करते हैं कि हे प्रभू दु:ख से छुड़ाओ। कलियुग अन्त में जरूर जास्ती दु:ख होगा। दिन-प्रतिदिन दु:ख वृद्धि को पाता जायेगा। वह समझते हैं सभी अपना-अपना राज्य करने लग पड़ेंगे। परन्तु यह विनाश तो होना ही है। यह कोई जानते नहीं।
तुम बच्चों को कितना खुशी में रहना चाहिए। तुम किसको भी कह सकते हो कि बेहद का बाप स्वर्ग रचता है तो बच्चों को भी स्वर्ग की बादशाही होनी चाहिए। भारतवासी खास इसलिए याद करते हैं। भक्ति करते हैं भगवान से मिलने चाहते हैं। श्रीकृष्णपुरी में जाने चाहते हैं, जिसको ही स्वर्ग कहते हैं। परन्तु यह नहीं जानते कि सतयुग में ही श्रीकृष्ण का राज्य था। फिर अभी यह कलियुग पूरा होगा, सतयुग आयेगा तब फिर श्रीकृष्ण का राज्य होगा। यह तो सभी जानते हैं कि शिव परमात्मा की सभी सन्तान हैं। फिर परमात्मा ने नई सृष्टि रची होगी। तो जरूर ब्रहमा के मुख द्वारा रची होगी। ब्रह्मा मुख वंशावली तो जरूर ब्राह्मण कुल भूषण होंगे, वह समय भी संगम का होगा। संगम है कल्याणकारी युग। जब परमात्मा ने बैठ राजयोग सिखाया होगा। अभी हम हैं ब्रह्मा मुख वंशावली ब्राह्मण। बाकी तुम कहेंगे हम कैसे मानें कि ब्रह्मा के तन में परमात्मा आकर राजयोग सिखाते हैं। तुम भी ब्रह्मा मुख वंशावली बन राजयोग सीखो तो आपेही तुमको भी अनुभव हो जायेगा। इसमें बनावट की वा अन्धश्रधा की कोई बात ही नहीं। अन्धश्रधा तो सारी दुनिया में है, इसमें भी खास भारत में गुड़ियों की पूजा बहुत होती है। आइडल-प्रस्थ भारत को ही कहा जाता है। ब्रह्मा को कितनी भुजायें देते हैं। अभी यह कैसे हो सकता। हाँ ब्रह्मा के बहुत बच्चे हैं। जैसे विष्णु को 4 भुजायें दिखाते हैं दो लक्ष्मी की, दो नारायण की। वैसे ब्रह्मा के भी इतने बच्चे होंगे। समझो 4 करोड़ बच्चे हो तो ब्रह्मा की 8 करोड़ भुजा हो जायें। परन्तु ऐसे है नहीं। बाकी प्रजा तो जरूर होगी। यह भी ड्रामा में नूँध है। बाप आकर यह सब बातें समझाते हैं। वह तो समझ नहीं सकते कि आखरीन क्या होना है। कितने प्लैन्स बनाते हैं। किसम-किसम के प्लैन्स बनाते हैं। यहाँ बाबा का तुम बच्चों के लिए एक ही प्लैन है, और यह राजधानी स्थापन हो रही है। जो जितनी मेहनत कर आप समान बनायेंगे, उतना ऊंच पद पायेंगे। बाप को नॉलेजफुल, ब्लिसफुल, रहमदिल कहते हैं। बाप कहते हैं मेरा भी ड्रामा में पार्ट है। माया सब पर बेरहमी कर रही है। हमको आकर रहम करना पड़ता है। तुम बच्चों को राजयोग भी सिखाता हूँ। सृष्टि चक्र का राज़ भी समझाता हूँ। नॉलेजफुल को ज्ञान का सागर कहा जाता है। तुम बच्चे जानते हो, किसको समझा भी सकते हो। यहाँ अन्धश्रधा की तो कोई बात ही नहीं। हम निराकार परमपिता परमात्मा को मानते हैं। पहले-पहले उनकी महिमा करनी चाहिए। वह आकर राजयोग द्वारा स्वर्ग रचते हैं। फिर स्वर्गवासियों की महिमा करनी चाहिए। भारत स्वर्ग था तो सभी सर्वगुण सम्पन्न 16 कला सम्पूर्ण... थे। 5 हजार वर्ष की बात है। तो परमात्मा की महिमा सबसे न्यारी है। फिर है देवताओं की महिमा। इसमें अन्धश्रधा की कोई बात नहीं। यहाँ तो सब बच्चे हैं। फालोअर्स नहीं हैं। यह तो फैमिली है। हम ईश्वर की फैमिली हैं। असुल में तो हम सब आत्मायें परमपिता परमात्मा के बच्चे हैं तो फैमिली हुई ना। वह निराकार फिर साकार में आते हैं। इस समय यह वन्डरफुल फैमिली है, इसमें संशय की बात ही नहीं। शिव की सभी सन्तान हैं। प्रजापिता ब्रह्मा की सन्तान भी गाये हुए हैं। हम ब्रह्माकुमार कुमारियां हैं, नई सृष्टि की स्थापना हो रही है। पुरानी सृष्टि सामने है। पहले तो बाप की पहचान देनी है। ब्रह्मा वंशी बनने बिगर बाप का वर्सा मिल न सके। ब्रह्मा के पास यह ज्ञान नहीं है। ज्ञान सागर शिवबाबा है। उनसे ही हम वर्सा पाते हैं। हम हैं मुख वंशावली। सभी राजयोग सीख रहे हैं। हम सबको पढ़ाने वाला शिवबाबा है, जो इस ब्रह्मा तन में आकर पढ़ाते हैं। यह प्रजापिता ब्रह्मा जो व्यक्त है, वह जब सम्पूर्ण बन जाते हैं तब फरिश्ता बन जाते हैं। सूक्ष्मवतनवासियों को फरिश्ता कहा जाता है, वहाँ हड्डी मास नहीं रहता। बच्चियां साक्षात्कार भी करती हैं। बाप कहते हैं भक्ति मार्ग में अल्पकाल का सुख भी मेरे द्वारा ही तुमको मिलता है। दाता मैं एक ही हूँ, इसलिए ईश्वर अर्पण करते हैं। समझते हैं ईश्वर ही फल देते हैं। साधू सन्त आदि का कभी नाम नहीं लेते हैं। देने वाला एक बाप है। करके निमित्त कोई द्वारा दिलाते हैं, उनकी महिमा बढ़ाने के लिए। वह सब है अल्पकाल का सुख। यह है बेहद का सुख। नये-नये बच्चे आते हैं तो समझते हैं जिस मत पर हम थे उनको फिर हम यह नॉलेज समझायें। इस समय सब माया की मत पर हैं। यहाँ तो तुमको ईश्वरीय मत मिलती है। यह मत आधाकल्प चलती है क्योंकि सतयुग त्रेता में हम इसकी प्रालब्ध भोगते हैं। वहाँ उल्टी मत होती नहीं क्योंकि माया ही नहीं है। उल्टी मत तो बाद में ही शुरू होती है। अब बाबा हमको आप समान त्रिकालदर्शी, त्रिलोकीनाथ बनाते हैं। ब्रह्माण्ड का मालिक भी बनते हैं, फिर सृष्टि के मालिक भी हम बनते हैं। बाप ने बच्चों की महिमा अपने से भी ऊंच की है। सारी सृष्टि में ऐसा बाप कभी देखा जो बच्चों के ऊपर इतनी मेहनत करे और अपने से भी तीखा बनाये! कहते हैं तुम बच्चों को विश्व की बादशाही देता हूँ, मैं नही भोगता। बाकी दिव्य दृष्टि की चाबी मैं अपने हाथ में रखता हूँ। भक्ति मार्ग में भी मुझे काम में आती है। अब भी ब्रह्मा का साक्षात्कार कराता हूँ कि इस ब्रह्मा के पास जाकर राजयोग सीख भविष्य प्रिन्स बनो। यह तो बहुतों को साक्षात्कार होता है। प्रिन्स तो सभी ताज सहित होते हैं। बाकी बच्चों को यह पता नहीं पड़ता कि सूर्यवंशी प्रिन्स का साक्षात्कार हुआ वा चन्द्रवंशी प्रिन्स का। जो बाप के बच्चे बनते हैं वह प्रिन्स-प्रिन्सेज तो जरूर बनेंगे फिर आगे वा पीछे। अच्छा पुरुषार्थ होगा तो सूर्यवंशी बनेगा नहीं तो चन्द्रवंशी। तो सिर्फ प्रिन्स को देख खुश नहीं होना है। यह सब पुरुषार्थ पर मदार रखते हैं। बाबा तो हर बात क्लीयर कर समझाते हैं, इसमें अन्धश्रधा की बात नहीं है। यह है ईश्वरीय फैमिली। इस हिसाब से तो वह भी ईश्वरीय सन्तान हैं। परन्तु वह कलियुग में हैं, तुम संगम पर हो। किसके पास भी जाओ बोलो हम शिववंशी, ब्रह्मा मुख वंशावली ब्राह्मण ही स्वर्ग का वर्सा पा सकते हैं। किसको अच्छी रीति समझाने की मेहनत करनी पड़ती है। 100-50 को समझायें तब उनसे कोई एक निकले। जिसकी तकदीर में होगा वह कोटो में कोई निकलेगा। आप समान बनाने में टाइम लगता है। बाकी साहूकार का आवाज बड़ा होता है। मिनिस्टर के पास जाते हैं तो पहले वह पूछते हैं आपके पास कोई मिनिस्टर आता है? जब सुनाते हैं कि हाँ आते हैं तो कहेंगे अच्छा हम भी चलते हैं।
बाप कहते हैं मैं बिल्कुल साधारण हूँ। तो साहूकार कोई विरला ही आते हैं। आने जरूर हैं परन्तु अन्त में। तुम बच्चों को बहुत नशा रहना चाहिए। उन्हों को समझाना है हम तो भारत की तन-मन-धन से सेवा करते हैं। तुम भारत की सेवा के लिए ही बलि चढ़े हो ना। ऐसा फ्लैन्थ्रोफिस्ट कोई होता नहीं। वह तो पैसे इकट्ठे कर मकान आदि बनाते रहते हैं। आखिर तो यह सब कुछ मिट्टी में मिल जाना है। तुमको तो सब कुछ बाबा पर बलि चढ़ाना है। भारत को स्वर्ग बनाने की सेवा में ही सब कुछ लगाना है। तो फिर वर्सा भी तुम ही पाते हो। तुमको नशा चढ़ा हुआ है - हम आलमाइटी अथॉरिटी के बच्चे हैं। हम उनके पास रजिस्टर हो गये। बाबा पास रजिस्टर होने में बहुत मेहनत लगती है। जब सम्पूर्ण निर्विकारी-पने का कसम उठावे और रहकर भी दिखाये तब बाबा उसे रजिस्टर करते हैं। बच्चों को बहुत नशा रहना चाहिए कि हम भारत को स्वर्ग वा राजस्थान बना रहे हैं, तब उस पर राज्य करेंगे। अच्छा!
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का यादप्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।
धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) हम ईश्वरीय सन्तान एक ईश्वर की फैमिली के हैं। हमें अभी ईश्वरीय मत मिल रही है, इस रूहानी नशे में रहना है। उल्टी मतों पर नहीं चलना है।
2) भारत की सेवा के लिए ब्रह्मा बाप के समान पूरा-पूरा बलि चढ़ना है। तन-मन-धन भारत को स्वर्ग बनाने में सफल करना है। पूरा-पूरा फ्लैन्थ्रोफिस्ट (दानी) बनना है।
वरदान:- परमात्म प्यार की छत्रछाया में सदा सेफ रहने वाले दु:खों की लहरों से मुक्त भव
जैसे कमल पुष्प कीचड़ पानी में होते भी न्यारा रहता है। और जितना न्यारा उतना सबका प्यारा है। ऐसे आप बच्चे दु:ख के संसार से न्यारे और बाप के प्यारे हो गये, यह परमात्म प्यार छत्रछाया बन जाता है। और जिसके ऊपर परमात्म छत्रछाया है उसका कोई क्या कर सकता! इसलिए फ़खुर में रहो कि हम परमात्म छत्रछाया में रहने वाले हैं, दु:ख की लहर हमें स्पर्श भी नहीं कर सकती।
स्लोगन:- जो अपने श्रेष्ठ चरित्र द्वारा बापदादा तथा ब्राह्मण कुल का नाम रोशन करते हैं वही कुल दीपक हैं।
06-01-2022 HNDI MURLI
“मीठे बच्चे - क्रोध बहुत दु:खदाई है, यह अपने को भी दु:खी करता तो दूसरे को भी दु:खी करता, इसलिए श्रीमत पर इन भूतों पर विजय प्राप्त करो''
प्रश्नः- कल्प-कल्प का दाग किन बच्चों पर लगता है? उनकी गति क्या होती है?
उत्तर:- जो अपने को बहुत होशियार समझते, श्रीमत पर पूरा नहीं चलते। अन्दर कोई न कोई विकार गुप्त व प्रत्यक्ष रूप में है, उसे निकालते नहीं। माया घेराव करती रहती है। ऐसे बच्चों पर कल्प-कल्प का दाग लग जाता है। उन्हें फिर अन्त में बहुत पछताना पड़ेगा। वह अपने को घाटा डालते हैं।
गीत:- आज अन्धेरे में है इंसान...
ओम् शान्ति। बच्चे जानते हैं कि बेहद का बाप जिसको हेविनली गॉड फादर कहा जाता है वह सबका बाप है। वह बच्चों को सम्मुख बैठ समझाते हैं। बाप तो सभी बच्चों को इन नयनों से देखते हैं। उनको बच्चों को देखने के लिए दिव्य दृष्टि की दरकार नहीं। बाप जानते हैं परमधाम से बच्चों के पास आया हुआ हूँ। यह बच्चे भी यहाँ देहधारी बन पार्ट बजा रहे हैं, इन बच्चों को सम्मुख बैठ पढ़ाता हूँ। बच्चे भी जानते हैं बेहद का बाप जो स्वर्ग की स्थापना करने वाला है, वह फिर से हमको भक्ति मार्ग के धक्कों से छुड़ाए हमारी ज्योत जगा रहे हैं। सभी सेन्टर्स के बच्चे समझते हैं कि अब हम ईश्वरीय कुल के वा ब्राह्मण कुल के हैं। सृष्टि का रचता कहा जाता है परमपिता परमात्मा को। सृष्टि कैसे रची जाती है, वह बाप बैठ समझाते हैं। बच्चे जानते हैं मात-पिता बिगर कभी मनुष्य सृष्टि रची नहीं जा सकती। ऐसे नहीं कहेंगे कि पिता द्वारा सृष्टि रची जाती है, नहीं। गाया ही जाता है तुम मात-पिता... यह मात-पिता सृष्टि रचकर फिर उन्हों को लायक बनाते हैं। यह बड़ी खूबी है। ऐसे तो नहीं ऊपर से देवतायें आकर धर्म स्थापन करेंगे। जैसे क्राइस्ट क्रिश्चियन धर्म की स्थापना करते हैं। तो क्राइस्ट को भी क्रिश्चियन लोग फादर कहते हैं। अगर फादर है तो मदर भी जरूर चाहिए। उन्होंने मदर रखा है “मेरी'' को। अब मेरी कौन थी? क्राइस्ट की नई आत्मा ने आकर तन में प्रवेश किया तो जिसमें प्रवेश किया, उसके मुख से प्रजा रची। वह हो गये क्रिश्चियन। यह भी समझाया गया है कि नई आत्मा जो ऊपर से आती है, उनका ऐसा कोई कर्म नहीं है जो दु:ख भोगे। पवित्र आत्मा आती है। जैसे परमपिता परमात्मा कभी दु:ख नहीं भोग सकता। दु:ख अथवा गाली आदि सब इस साकार को देते हैं। तो क्राइस्ट को भी जब क्रास पर चढ़ाया तो जरूर जिस तन में क्राइस्ट की आत्मा ने प्रवेश किया उसने ही यह दु:ख सहन किया। क्राइस्ट की प्युअर सोल तो दु:ख नहीं सहन कर सकती। तो क्राइस्ट हुआ फादर। माँ कहाँ से लावें! फिर मेरी को मदर बना दिया है। दिखाते हैं मेरी कुमारी थी उनसे क्राइस्ट पैदा हुआ। यह सब शास्त्रों से उठाया है। दिखाया है ना कुन्ती कन्या थी उनसे कर्ण पैदा हुआ। अब यह दिव्य दृष्टि की बात है। परन्तु उन्होंने फिर कापी किया है। तो जैसे यह ब्रह्मा मदर है। मुख द्वारा बच्चे पैदा कर फिर सम्भालने के लिए मम्मा को दिया। तो क्राइस्ट का भी ऐसे है। क्राइस्ट ने प्रवेश कर धर्म की स्थापना की। उनको कहेंगे क्राइस्ट की मुख वंशावली भाई और बहन। क्रिश्चियन का प्रजापिता हो गया क्राइस्ट। जिसमें प्रवेश कर बच्चे पैदा किये वह हो गई माता। फिर सम्भालने लिये दिया मेरी को, उन्हों ने मेरी को मदर समझ लिया है। यहाँ तो बाप कहते हैं मैं इनमें प्रवेश कर मुख सन्तान रचता हूँ। तो उसमें यह मम्मा भी मुख सन्तान ठहरी। यह हैं डिटेल में समझने की बातें।
दूसरी बात - बाप समझाते हैं आज एक पार्टी आबू में आने वाली है - वेजीटेरियन का प्रचार करने। तो उनको समझाना है बेहद का बाप अब देवी-देवता धर्म की स्थापना कर रहे हैं जो पक्के वेजीटेरियन थे। और कोई भी धर्म इतना वेजीटेरियन होता नहीं है। अब यह सुनायेंगे कि वैष्णव बनने में कितने फायदे हैं। परन्तु सब तो बन नहीं सकते क्योंकि बहुत हिरे हुए हैं। (आदत पड़ी हुई है) छोड़ना बड़ा मुश्किल है। परन्तु इस पर समझाना है कि बेहद के बाप ने जो हेविन स्थापन किया है, उसमें सभी वैष्णव अर्थात् विष्णु की वंशावली थे। देवतायें बिल्कुल वाइसलेस थे। आजकल के वेजीटेरियन तो विशश हैं। क्राइस्ट से 3 हजार वर्ष पहले भारत हेविन था। तो ऐसे-ऐसे समझाना है। तुम बच्चों के बिगर ऐसा कोई मनुष्य नहीं जिसको मालूम हो कि स्वर्ग क्या चीज़ है? कब स्थापन हुआ? वहाँ कौन राज्य करते हैं? लक्ष्मी-नारायण के मन्दिर में भल जाते हैं। बाबा भी जाते थे परन्तु यह नहीं जानते कि स्वर्ग में इन्हों की राजधानी होती है। सिर्फ महिमा गाते हैं परन्तु उन्हों को किसने राज्य दिया, कुछ भी पता नहीं। अब तक बहुत मन्दिर बनाते हैं क्योंकि समझते हैं लक्ष्मी ने धन दिया है इसलिए दीपमाला पर व्यापारी लोग लक्ष्मी की पूजा करते हैं। इन मन्दिर बनाने वालों को भी समझाना चाहिए। जैसे फॉरेनर्स आते हैं तो उनको भारत की महिमा बतानी चाहिए कि क्राइस्ट से 3 हजार वर्ष पहले भारत ऐसा वेजीटेरियन था, ऐसा कोई हो नहीं सकता। उनमें बहुत ताकत थी। गॉड गॉडेज का राज्य कहा जाता है। अब वही राज्य फिर से स्थापन हो रहा है। यह वही समय है। शंकर द्वारा विनाश भी गाया हुआ है, फिर विष्णु का राज्य होगा। बाप द्वारा स्वर्ग का वर्सा लेना हो तो आकर ले सकते हो। रमेश उषा दोनों को सर्विस का बहुत शौक है। यह वन्डरफुल जोड़ा है, बहुत सर्विसएबुल है। देखो नये-नये आते हैं तो पुरानों से भी तीखे चले जाते हैं। बाबा युक्तियां बहुत बताते हैं, परन्तु कोई न कोई विकार का नशा है तो माया उछलने नहीं देती है। कोई में काम का थोड़ा अंश है, क्रोध तो बहुतों में है। परिपूर्ण कोई बना नहीं है। बन रहे हैं। माया भी अन्दर काटती रहती है। जब से रावण राज्य आरम्भ हुआ है तब से इन चूहों ने कुतरना (काटना) शुरू किया है। अब तो भारत बिल्कुल ही कंगाल हो गया है। माया ने सबको पत्थरबुद्धि बना दिया है। अच्छे-अच्छे बच्चों को भी माया ऐसे घेरती है जो उन्हों को पता नहीं पड़ता कि हमारा कदम पीछे कैसे जा रहा है। फिर संजीवनी बूटी सुंघाकर होश में लाते हैं। क्रोध भी दु:खदाई है। अपने को भी दु:खी करता, दूसरों को भी दु:खी करता है। कोई में गुप्त है, कोई में प्रत्यक्ष। कितना भी समझाओ, समझते नहीं हैं। अभी अपने को बहुत होशियार समझते हैं। पीछे बहुत पछताना पड़ेगा। कल्प-कल्प का दाग लग जायेगा। श्रीमत पर चले तो फायदा भी बहुत है। नहीं तो घाटा भी बहुत है। मत दोनों की मशहूर है। श्रीमत और ब्रह्मा की मत। कहते हैं ब्रह्मा भी उतर आये तो भी यह नहीं मानेगा... श्रीकृष्ण का नाम नहीं लेते हैं। अब तो परमपिता परमात्मा खुद मत देते हैं। ब्रह्मा को भी उनसे ही मत मिलती है। बाप का बच्चों पर बहुत प्यार होता है। बच्चों को सिरकुल्हे चढ़ाते हैं। बाप की एम रहती है कि बच्चा ऊंच चढ़े तो कुल का नाम निकलेगा। परन्तु बच्चा न बाप की मानें, न दादा की मानें तो गोया बड़ी माँ की भी नहीं माना। उसका क्या हाल होगा! बात मत पूछो। बाकी सर्विसएबुल बच्चे तो बापदादा की दिल पर चढ़ते हैं। तो उनकी बाबा खुद महिमा करते हैं। तो उन्हों को समझाना है कि इसी भारत में विष्णु के घराने का राज्य था जो फिर स्थापन हो रहा है। अब बाबा फिर उसी भारत को विष्णुपुरी बना रहे हैं।
तुमको बहुत नशा होना चाहिए। वह लोग तो मुफ्त अपना नाम निकालने के लिए माथा मार रहे हैं। खर्चा तो गवर्मेन्ट से मिल जाता है। सन्यासियों को तो बहुत पैसे मिलते हैं। अभी भी कहते हैं भारत का प्राचीन योग सिखलाने जाते हैं तो झट पैसे देंगे। बाबा को तो किसी के पैसे की दरकार नहीं। यह खुद सारी दुनिया को मदद करने वाला भोला भण्डारी है, मदद मिलती है बच्चों की। हिम्मते बच्चे मददे बाप। जब कोई बाहर से आते हैं तो हिरे हुए हैं, समझते हैं आश्रम है कुछ देवें। परन्तु तुमको बोलना है क्यों देते हो? ज्ञान तो कुछ सुना नहीं है। कुछ पता नहीं। हम बीज बोते हैं स्वर्ग में फल मिलना है, यह पता भी तब हो जब ज्ञान सुनें। ऐसे आने वाले करोड़ों आयेंगे। यह अच्छा है जो बाबा गुप्त रूप में आया है। श्रीकृष्ण के रूप में आता तो रेती मुआफिक इकट्ठे हो जाते, एकदम चटक पड़ते, कोई घर में बैठ न सके। तुम ईश्वरीय सन्तान हो। यह भूलो मत। बाप की तो दिल में रहता है कि बच्चे पूरा वर्सा लेवें। स्वर्ग में तो ढेर आयेंगे परन्तु हिम्मत कर ऊंच पद पायें, वह कोटों में कोई निकलेगा। अच्छा!
मात-पिता बापदादा का मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति यादप्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।
रात्रि क्लास 15-6-68
पास्ट जो हो गया है उनको रिवाईज करने से जिनकी कमज़ोर दिल है तो उन्हों के दिल की कमज़ोरी भी रिवाईज हो जाती है इसलिए बच्चों को ड्रामा के पट्टे पर ठहराया गया है। मुख्य फायदा है ही याद से। याद से ही आयु बड़ी होनी है। ड्रामा को बच्चे समझ जायें तो कब ख्याल न हो। ड्रामा में इस समय ज्ञान सीखने और सिखाने का चल रहा है। फिर पार्ट बन्द हो जायेगा। न बाप का, न हमारा पार्ट रहेगा। न उनका देने का पार्ट, न हमारा लेने का पार्ट होगा। तो एक हो जायेंगे ना। हमारा पार्ट नई दुनिया में हो जायेगा। बाबा का पार्ट शान्तिधाम में होगा। पार्ट का रील भरा हुआ है ना हमारा प्रारब्ध का पार्ट, बाबा का शान्तिधाम का पार्ट। देने और लेने का पार्ट पूरा हुआ, ड्रामा ही पूरा हुआ। फिर हम राज्य करने आयेंगे, वह पार्ट चेंज होगा। ज्ञान स्टाप हो जायेगा। हम वह बन जायेंगे। पार्ट ही पूरा तो बाकी फर्क नहीं रहेगा। बच्चों के साथ बाप का भी पार्ट नहीं रहेगा। बच्चे ज्ञान को पूरा ले लेते हैं। तो उनके पास कुछ रहता ही नहीं है। न देने वाले के पास रहता, न लेने वाले में कमी रहती तो दोनों एक दो के समान हो गये। इसमें विचार सागर मंथन करने की बुद्धि चाहिए। खास पुरुषार्थ है याद की यात्रा का। बाप बैठ समझाते हैं। सुनाने में तो मोटी बात हो जाती है, बुद्धि में तो सूक्ष्म है ना। अन्दर में जानते हैं शिव बाबा का रूप क्या है। समझाने में मोटा रूप हो जाता है। भक्ति मार्ग में बड़ा लिंग बना देते हैं। आत्मा है तो छोटी ना। यह है कुदरत। कहाँ तक अन्त पायेंगे? फिर पिछाड़ी में बेअन्त कह देते। बाबा ने समझाया है सारा पार्ट आत्मा में भरा हुआ है। यह कुदतर है। अन्त नहीं पाया जा सकता। सृष्टि चक्र का अन्त तो पाते हैं। रचयिता और रचना के आदि मध्य अन्त को तुम ही जानते हो। बाबा नॉलेजफुल है। फिर भी हम फुल बन जायेंगे, पाने के लिये कुछ रहेगा नहीं। बाप इसमें प्रवेश कर पढ़ाते हैं। वह है बिन्दी। आत्मा का वा परमात्मा का साक्षात्कार होने से खुशी थोड़ेही होती है। मेहनत कर बाप को याद करना है तो विकर्म विनाश होंगे। बाप कहते हैं मेरे में ज्ञान बन्द हो जायेगा तो तेरे में भी बन्द हो जायेगा। नॉलेज ले ऊंच बन जाते हैं। सभी कुछ ले लेते हैं फिर भी बाप तो बाप है ना। तुम आत्मायें आत्मा ही रहेंगे, बाप होकर तो नहीं रहेंगे। यह तो ज्ञान है। बाप बाप है, बच्चे बच्चे हैं। यह सभी विचार सागर मंथन कर डीप में जाने की बातें हैं। यह भी जानते हैं जाना तो सभी को है। सभी चले जाने वाले हैं। बाकी आत्मा जाकर रहेगी। सारी दुनिया ही खत्म होनी है, इसमें निडर रहना होता है। पुरुषार्थ करना है निडर हो रहने का। शरीर आदि का कोई भी भान न आये, उसी अवस्था में जाना है। बाप आप समान बनाते हैं, तुम बच्चे भी आप समान बनाते रहते हो। एक बाप की ही याद रहे ऐसा पुरुषार्थ करना है। अभी टाइम पड़ा है। यह रिहर्सल तीखी करनी पड़े। प्रैक्टिस नहीं होगी तो खड़े हो जायेंगे। टांगे थिरकने लग पड़ेंगी और हार्टफेल अचानक होता रहेगा। तमोप्रधान शरीर को हार्टफेल होने में देरी थोड़ेही लगती है। जितना अशरीरी होते जायेंगे, बाप को याद करते रहेंगे तो नज़दीक आते जायेंगे। योग वाले ही निडर रहेंगे। योग से शक्ति मिलती है। ज्ञान से धन मिलता है। बच्चों को चाहिए शक्ति। तो शक्ति पाने लिये बाप को याद करते रहो। बाबा है अविनाशी सर्जन। वह कब पेशेन्ट बन न सके। अभी बाप कहते हैं तुम अपनी अविनाशी दवाई करते रहो। हम ऐसी संजीवनी बूटी देते हैं जो कब कोई बीमार न पड़े। सिर्फ पतित-पावन बाप को याद करते रहो तो पावन बन जायेंगे। देवतायें सदैव निरोगी पावन हैं ना। बच्चों को यह तो निश्चय हो गया है हम कल्प कल्प वर्सा लेते हैं। अनगिनत बार बाप आया है, जैसे अभी आया है। बाबा जो सिखलाते, समझाते हैं यही राजयोग है। वह गीता आदि सभी भक्ति मार्ग के हैं। यह ज्ञान मार्ग बाप ही बताते हैं। बाप ही आकर नीचे से ऊपर उठाते हैं। जो पक्के निश्चय बुद्धि हैं वही माला का दाना बनते हैं। बच्चे समझते हैं भक्ति करते करते हम नीचे गिरते आये हैं। अभी बाप आकर सच्ची कमाई कराते हैं। लौकिक बाप इतनी कमाई नहीं कराते जितनी पारलौकिक बाप कराते हैं। अच्छा - बच्चों को गुडनाईट और नमस्ते।
धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) सर्विसएबुल बनने के लिए विकारों के अंश को भी समाप्त करना है। सर्विस के प्रति उछलते रहना है।
2) हम ईश्वरीय सन्तान हैं, श्रीमत पर भारत को विष्णुपुरी बना रहे हैं, जहाँ सब पक्के वैष्णव होंगे... इस नशे में रहना है।
वरदान:- दु:ख के चक्करों से सदा मुक्त रहने और सबको मुक्त करने वाले स्वदर्शन चक्रधारी भव
जो बच्चे कर्मेन्द्रियों के वश होकर कहते हैं कि आज आंख ने, मुख ने वा दृष्टि ने धोखा दे दिया, तो धोखा खाना अर्थात् दु:ख की अनुभूति होना। दुनिया वाले कहते हैं - चाहते नहीं थे लेकिन चक्कर में आ गये। लेकिन जो स्वदर्शन चक्रधारी बच्चे हैं वह कभी किसी धोखे के चक्कर में नहीं आ सकते। वह तो दु:ख के चक्करों से मुक्त रहने और सबको मुक्त करने वाले, मालिक बन सर्व कर्मेन्द्रियों से कर्म कराने वाले हैं।
स्लोगन:- अकाल तख्तनशीन बन अपनी श्रेष्ठ शान में रहो तो कभी परेशान नहीं होंगे।
05-01-2023 HINDI MURLI
“मीठे बच्चे - भक्तों पर जब भीड़ पड़ी है, विपदा आई है तब बाप आये हैं, ज्ञान से गति सद्गति करने''
प्रश्नः- विकर्माजीत कौन बनते हैं? विकर्माजीत बनने वालों की निशानी क्या होगी?
उत्तर:- विकर्माजीत वही बनते जो कर्म-अकर्म और विकर्म की गति को जान श्रेष्ठ कर्म करते हैं। विकर्माजीत बनने वाले कभी भी कर्म कूटते नहीं। उनके कर्म विकर्म नहीं बनते।
प्रश्नः- इस समय बाप डबल सर्विस कौन सी करते हैं?
उत्तर:- आत्मा और शरीर दोनों को पावन भी बनाते और फिर अपने साथ वापस घर भी ले जाते हैं। चरित्र एक बाप के हैं। मनुष्यों के हो नहीं सकते।
गीत:- ओम् नमो शिवाए...
ओम् शान्ति। यह गीत बच्चों ने सुना। जो भी भक्ति मार्ग वाले हैं, वह ऐसे गीत गाते हैं। घोर अन्धियारे से उजियारा चाहते हैं और दु:ख से छूटने की पुकार करते रहते हैं। तुम तो हो शिव वंशी ब्रह्माकुमार कुमारियां। यह तो समझने की बात है। इतने बच्चे कुख वंशावली तो हो नहीं सकते। जरूर मुख वंशावली होंगे। श्रीकृष्ण को इतनी रानियां अथवा बच्चे नहीं थे। गीता का भगवान तो राजयोग सिखलाते हैं, तो जरूर मुख वंशावली होंगे। प्रजापिता अक्षर तो नामीग्रामी है। इनके मुख से बाप आकर ब्राह्मण धर्म रचते हैं। प्रजापिता नाम बाप का शोभता है। अब तुम प्रैक्टिकल में उस बाप के बने हो। वह तो कह देते कि श्रीकृष्ण भी भगवान था, शिव भी भगवान था। रूद्र भगवान के बदले श्रीकृष्ण का नाम डाल दिया है। कहते भी हैं शंकर पार्वती, रूद्र पार्वती नहीं कहेंगे। शिव शंकर महादेव कहते हैं। अब श्रीकृष्ण को रूद्र वा शंकर तो नहीं कहेंगे। भक्त गाते हैं परन्तु भगवान को नहीं जानते। भारत में वास्तव में सच्चे-सच्चे भक्त वह हैं, जो पूज्य थे वही अब पुजारी बने हैं। उनमें भी नम्बरवार हैं। तुम्हारे में भी नम्बरवार हैं। तुम हो ब्राह्मण, वह हैं शूद्र। देवता धर्म वाले ही बहुत दु:खी होते हैं क्योंकि उन्होंने बहुत सुख भी देखे हैं। अब तुम्हारा दर-दर भटकना बन्द हो गया है, आधाकल्प के लिए। यह राज़ भी तुम ब्राह्मण ही जानते हो, सो भी नम्बरवार। जिन्होंने कल्प पहले जितना पुरुषार्थ किया था उतना ही अब करते हैं। ऐसे नहीं जो ड्रामा में होगा, फिर भी पुरुषार्थ का नाम आता है। ड्रामा को बच्चों से पुरुषार्थ कराना ही है। जैसा पुरुषार्थ वैसा पद मिलेगा। हम जानते हैं कल्प पहले भी ऐसा पुरुषार्थ किया था। ऐसे सितम हुए थे, यज्ञ में विघ्न पड़े थे।
तुम बच्चे जानते हो बाबा फिर से आया हुआ है। कल्प पहले भी इसी समय आया था जबकि अग्रेजों का राज्य था। जिन्हों से कांग्रेस ने राज्य लिया फिर पाकिस्तान हुआ। यह कल्प पहले भी हुआ था। गीता में यह बातें नहीं हैं। आखरीन समझ जायेंगे कि बरोबर अब वही समय है। कोई-कोई समझते हैं कि ईश्वर आ गया है। जब महाभारी लड़ाई लगी थी तो भगवान आया था। कहते ठीक हैं, सिर्फ नाम बदल दिया है। रूद्र नाम लेवें तो भी समझें कि ठीक है। रुद्र ने ज्ञान यज्ञ रचा था, जिससे दुनिया की विपदा टली थी। यह भी धीरे-धीरे तुम्हारे द्वारा पता लग जायेगा। इसमें अभी समय पड़ा है। नहीं तो यहाँ ऐसी भीड़ मच जाए जो तुम पढ़ भी न सको। यहाँ भीड़ का कायदा नहीं है। गुप्तवेश में काम चलता रहेगा। अब कोई बड़ा आदमी यहाँ आये तो कहेंगे इनका माथा खराब है। यह तो बाप तुम बच्चों को पढ़ा रहे हैं। देवता धर्म तो भगवान आकर रचेगा ना। वह अब आया है नई दुनिया रचने, भक्तों की भीड़ (विपदा) उतारने। विनाश के बाद तो कोई दु:ख होगा नहीं। वहाँ सतयुग में भक्त होते नहीं। न कोई ऐसे कर्म करेंगे जो दु:खी हों।
(बम्बई से रमेश भाई का फोन आया) बापदादा चले आते हैं तो बच्चे उदास होते हैं। जैसे स्त्री का पति विलायत में जाता है तो याद में रो पड़ती है। वह है जिस्मानी संबंध। यहाँ बाबा के साथ रूहानी संबंध है। बाबा से बिछुड़ते हैं तो प्रेम के आंसू आ जाते हैं। जो सर्विसएबुल बच्चे हैं, बाबा को उनका कदर है। सपूत बच्चों को फिर बाप का कदर रहता है। शिवबाबा का तो बहुत ऊंचे ते ऊंचा संबंध है। उनसे ऊंच संबंध तो कोई होता नहीं। शिवबाबा तो बच्चों को अपने से भी ऊंच बनाते हैं। पावन तो तुम बनते हो, परन्तु बाप समान एवर पावन नहीं हो सकते। हाँ पावन देवता बनते हो। बाप तो ज्ञान का सागर है। हम कितना भी सुनें तो भी ज्ञानसागर नहीं बन सकते। वह ज्ञान का सागर, आनंद का सागर है, बच्चों को आनंदमय बनाते हैं। और तो सिर्फ नाम रखवाते हैं। इस समय दुनिया में भक्त माला बड़ी लम्बी चौड़ी है। तुम्हारी है 16108 की माला। भक्त तो करोड़ों हैं। यहाँ भक्ति की बात नहीं। ज्ञान से ही सद्गति होती है। अब तुमको भक्ति की जंजीरों से छुड़ाया जाता है। बाबा कहते हैं सब भक्तों पर जब भीड़ होती है तब मुझे आना पड़ता है, सभी की गति सद्गति करने। स्वर्ग के देवताओं ने जरूर ऐसे कर्म किये हैं तब इतना ऊंच पद पाया है। कर्म तो मनुष्यों के चले आते हैं। परन्तु वहाँ कर्म कूटते नहीं। यहाँ कर्म विकर्म बनते हैं क्योंकि माया है। वहाँ माया होती नहीं। तुम विकर्माजीत बनते हो, जिन बच्चों को अभी कर्म अकर्म और विकर्म की गति समझाता हूँ वही विकर्माजीत बनेंगे। कल्प पहले भी तुम बच्चों को राजयोग सिखाया था, वही अब भी सिखला रहा हूँ। कांग्रेसियों ने फिरंगियों (अंग्रेजों) को निकाल राजाओं से राजाई छीन ली और राजा नाम ही गुम कर दिया। 5 हजार वर्ष पहले भारत राजस्थान था, लक्ष्मी-नारायण का राज्य था। देवताओं का राज्य था तो परिस्तान था। जरूर उन्हों को भगवान ने राजयोग सिखाया होगा तब उन्हों का नाम भगवती भगवान पड़ा है। परन्तु अभी अपने में ज्ञान है तो हम भगवती भगवान नहीं कह सकते। नहीं तो यथा राजा रानी तथा प्रजा भी भगवती भगवान होने चाहिए। परन्तु ऐसे हो नहीं सकता। लक्ष्मी-नारायण का नाम भी प्रजा में कोई अपने ऊपर रख न सके, लॉ नहीं है। विलायत में भी राजा का नाम कोई अपने ऊपर नहीं रखेंगे। उनकी बहुत इज्जत करते हैं। तो बच्चे समझते हैं 5 हजार वर्ष पहले बाप आया था। अब भी बाप आया है - दैवी राजस्थान स्थापन करने। शिवबाबा का आना भी अब हुआ है। वह है पाण्डवों का पति, न कि श्रीकृष्ण। बाप पण्डा बनकर आया है वापिस ले जाने के लिए और नई सतयुगी दुनिया रचने के लिए। तो जरूर ब्रह्मा द्वारा ही ब्राह्मण रचेंगे। मुख्य गीता को ही खण्डन कर दिया है। अब बाप समझाते हैं मैं श्रीकृष्ण नहीं हूँ। मुझे रूद्र वा सोमनाथ कह सकते हैं। तुमको ज्ञान सोमरस पिला रहा हूँ। बाकी लड़ाई आदि की कोई बात नहीं। तुमको योगबल से राजाई का माखन मिल जाता है। श्रीकृष्ण को माखन जरूर मिलता है। यह है श्रीकृष्ण के अन्तिम जन्म की आत्मा। इनको (ब्रह्मा सरस्वती को) भी बाप ऐसे कर्म सिखला रहे हैं जो भविष्य में लक्ष्मी-नारायण बन जाते हैं। यह लक्ष्मी-नारायण ही छोटेपन में राधे-कृष्ण हैं इसलिए लक्ष्मी-नारायण के साथ राधे कृष्ण का भी चित्र दिया है। बाकी इनकी कोई बड़ाई नहीं है। चरित्र है एक गीता के भगवान का। वह शिवबाबा बच्चों को भिन्न-भिन्न साक्षात्कार कराते हैं। बाकी मनुष्य के कोई चरित्र नहीं हैं। क्राइस्ट आदि ने भी आकर धर्म स्थापन किया सो तो सभी को अपना पार्ट बजाना ही है, इसमें चरित्र की तो कोई बात ही नहीं। वह कोई को गति दे न सकें। अब बेहद का बाप कहते हैं कि मैं तुम बच्चों की डबल सर्विस करने आया हूँ, जिससे तुम्हारी आत्मा और शरीर दोनों पवित्र हो जायेंगे। सभी को वापिस घर मुक्तिधाम में ले जाता हूँ। फिर वहाँ से अपना-अपना पार्ट बजाने आयेंगे। कितना अच्छी रीति बच्चों को समझाते हैं। इन लक्ष्मी-नारायण के चित्र पर समझाना बड़ा सहज है। त्रिमूर्ति और शिवबाबा का चित्र भी है। कोई कहते हैं त्रिमूर्ति न हो, जैसे कोई कहते हैं श्रीकृष्ण के चित्र में 84 जन्मों की कहानी न हो। लेकिन हम तो सिद्ध कर बतलाते हैं, जरूर पहले नम्बर वाले श्रीकृष्ण को सबसे जास्ती जन्म लेने पड़ेंगे। नई-नई प्वाइंट्स तो रोज़ आती हैं, परन्तु धारणा भी होनी चाहिए। सबसे सहज है लक्ष्मी-नारायण के चित्र पर समझाना। मनुष्य थोड़ेही कोई भी चित्र का अर्थ समझते हैं। उल्टा सुल्टा चित्र बना देते हैं। नारायण को दो भुजायें तो लक्ष्मी को 4 भुजायें दे देते हैं। सतयुग में इतनी भुजायें होती नहीं। सूक्ष्मवतन में तो हैं ही ब्रह्मा विष्णु शंकर। उन्हों को भी इतनी भुजायें हो नहीं सकती। मूलवतन में हैं ही निराकारी आत्मायें। फिर यह 8-10 भुजा वाले कहाँ के रहने वाले हैं। मनुष्य सृष्टि में रहने वाले पहले-पहले हैं लक्ष्मी-नारायण, दो भुजा वाले। परन्तु उनको 4 भुजायें दे दी हैं। नारायण को सांवरा तो लक्ष्मी को गोरा दिखाते हैं। तो उनके जो बच्चे होंगे, वह कैसे और कितनी भुजाओं वाले होंगे? क्या बच्चे को 4 भुजा, बच्ची को दो भुजा होंगी क्या? ऐसे-ऐसे प्रश्न पूछ सकते हो। बच्चों को समझाया है हमेशा ऐसे समझो कि हमको शिवबाबा मुरली सुनाते हैं। कभी यह (ब्रह्मा) भी सुनाते हैं। शिवबाबा कहते हैं मैं गाइड बनकर आया हूँ। यह ब्रह्मा है मेरा बच्चा बड़ा। कहते हैं त्रिमूर्ति ब्रह्मा। त्रिमूर्ति शंकर वा विष्णु नहीं कहेंगे। महादेव शंकर को कहते हैं। फिर त्रिमूर्ति ब्रह्मा क्यों कहते हैं? इसने प्रजा रची है तो यह उनकी (शिवबाबा की) वन्नी (युगल) बनते हैं। शंकर वा विष्णु को वन्नी नहीं कहेंगे। यह बहुत वन्डरफुल बातें समझने की हैं। यहाँ सिर्फ बाप और वर्से को याद करना है। बस इसमें ही मेहनत है। अभी तुम कितने समझदार बने हो। बेहद के बाप द्वारा तुम बेहद के मालिक बनते हो। यह धरती, यह आसमान सब तुम्हारा हो जायेगा। ब्रह्माण्ड भी तुम्हारा हो जायेगा। आलमाइटी अथॉरिटी राज्य होगा। वन गवर्मेन्ट होगी। जब सूर्यवंशी गवर्मेन्ट थी तो चन्द्रवंशी नहीं थे। फिर चन्द्रवंशी होते हैं तो सूर्यवंशी नहीं। वह पास्ट हो गया। ड्रामा पलट गया। यह बड़ी वन्डरफुल बातें हैं। बच्चों को कितना खुशी का पारा चढ़ना चाहिए। बेहद के बाप से हम बेहद का वर्सा जरूर लेंगे। उस पति को कितना याद करते हैं। यह बेहद की बादशाही देने वाला है। ऐसे पतियों के पति को कितना याद करना पड़े। कितनी भारी प्राप्ति होती है। वहाँ तुम कोई से कभी भीख नहीं मांगते हो। वहाँ गरीब होते नहीं। बेहद का बाप भारत की झोली भर देते हैं। लक्ष्मी-नारायण के राज्य को गोल्डन एज कहा जाता है। अब है आइरन एज, फ़र्क देखो कितना है। बाप कहते हैं मैं बच्चों को राजयोग सिखला रहा हूँ। तुम सो देवी-देवता थे फिर क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र बने। अब फिर सो ब्राह्मण बने हो, फिर सो देवता बनेंगे। इस 84 के चक्र को तुम याद करो। चित्रों पर समझाना बड़ा सहज है। जब देवी-देवताओं का राज्य था तो कोई और राज्य नहीं था। एक ही राज्य था, बहुत थोड़े थे। उसको कहा जाता है स्वर्ग, वहाँ पवित्रता भी थी, सुख-शान्ति भी थी। पुनर्जन्म लेते-लेते नीचे आये हैं। 84 जन्म भी इन्होंने लिये हैं, यही तमोप्रधान बन जाते हैं। फिर उन्हों को ही सतोप्रधान होना है। सतोप्रधान कैसे बनें, जरूर सिखलाने वाला चाहिए। सिवाए बाप के कोई सिखला न सके। तुम जानते हो शिवबाबा इनके बहुत जन्मों के अन्त में इनमें प्रवेश करते हैं। कितना साफ करके समझाते हैं। अच्छा!
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का यादप्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।
धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) एक बाप से ही सर्व रूहानी सम्बन्ध रखने हैं। सर्विसएबुल बच्चों का कदर रखना है। आप समान बनाने की सेवा करनी है।
2) बेहद बाप द्वारा हमें बेहद विश्व का राज्य भाग्य मिल रहा है। धरती आसमान सब पर हमारा अधिकार होगा - इस नशे और खुशी में रहना है। बाप और वर्से को याद करना है।
वरदान:- बालक और मालिकपन के बैलेन्स से पुरुषार्थ और सेवा में सदा सफलतामूर्त भव
सदा यह नशा रखो कि बेहद बाप और बेहद वर्से का बालक सो मालिक हूँ लेकिन जब कोई राय देनी है, प्लैन सोचना है, कार्य करना है तो मालिक होकर करो और जब मैजॉरिटी द्वारा या निमित्त बनी आत्माओं द्वारा कोई भी बात फाइनल हो जाती है तो उस समय बालक बन जाओ। किस समय राय बहादुर बनना है, किस समय राय मानने वाला - यह तरीका सीख लो तो पुरुषार्थ और सेवा दोनों में सफल रहेंगे।
स्लोगन:- निमित्त और निमार्णचित्त बनने के लिए मन और बुद्धि को प्रभू अर्पण कर दो।
04-01-2023 HINDI MURLI
“मीठे बच्चे - तुम मोती चुगने वाले हंस हो, तुम्हारी है हंसमण्डली, तुम लकी सितारे हो, क्योंकि स्वयं ज्ञान सूर्य बाप तुम्हें सम्मुख पढ़ा रहे हैं''
प्रश्नः-बाप ने सभी बच्चों को कौन सी रोशनी दी है, जिससे पुरुषार्थ तीव्र हो गया?
उत्तर:-बाप ने रोशनी दी, बच्चे अब इस ड्रामा की अन्त है, तुम्हें नई दुनिया में चलना है। ऐसे नहीं जो मिलना होगा वह मिलेगा। पुरुषार्थ है फर्स्ट। पवित्र बनकर औरों को पवित्र बनाना, यह बहुत बड़ी सेवा है। यह रोशनी आते ही तुम बच्चों का पुरुषार्थ तीव्र हो गया।
गीत:-तू प्यार का सागर है...
ओम् शान्ति। बच्चे जानते हैं कि प्यार का सागर, शान्ति का सागर, आनन्द का सागर बेहद का बाप सम्मुख बैठ हमको शिक्षा दे रहे हैं। कितने लकी सितारे हैं, जिनको सम्मुख ज्ञान सूर्य बाप पढ़ा रहे हैं। अब जो बगुला मण्डली थी, वह हंस-मंडली बन गई है। मोती चुगने लग गये हैं। यह भाई-बहन सब हैं हंस, इनको हंस मण्डली भी कहा जाता है। कल्प पहले वाले ही इस समय, इस जन्म में एक दो को पहचानते हैं। रूहानी पारलौकिक माँ बाप और भाई बहन आपस में एक दो को पहचानते हैं। याद है कि 5 हजार वर्ष पहले भी हम आपस में इसी नाम रूप से मिले थे? यह तुम अभी कह सकते हो, फिर कभी भी कोई जन्म में ऐसे कह नहीं सकेंगे। जो भी ब्रह्माकुमार कुमारियाँ बनते हैं, वही एक दो को पहचानेंगे। बाबा आप भी वही हो, हम आपके बच्चे भी वही हैं, हम भाई-बहन फिर से अपने बाप से वर्सा लेते हैं। अभी बाप और बच्चे सम्मुख बैठे हैं फिर यह नाम-रूप आदि सब बदल जायेगा। सतयुग में लक्ष्मी-नारायण ऐसे थोड़ेही कहेंगे कि हम वही कल्प पहले वाले लक्ष्मी-नारायण हैं वा प्रजा थोड़ेही कहेगी कि यह वही कल्प पहले वाले लक्ष्मी-नारायण हैं। नहीं। यह सिर्फ इस समय तुम बच्चे ही जानते हो। इस समय तुम बहुत कुछ जान जाते हो। पहले तो तुम कुछ नहीं जानते थे। मैं ही कल्प के संगमयुगे आकर अपनी पहचान देता हूँ। यह सिर्फ बेहद का बाप ही कह सकते हैं। नई दुनिया की स्थापना तो पुरानी दुनिया का विनाश भी जरूर होना चाहिए। यह है दोनों का संगमयुग। यह बहुत कल्याणकारी युग है। सतयुग को वा कलियुग को कल्याणकारी नहीं कहेंगे। तुम्हारा यह अभी का जीवन अमूल्य गाया हुआ है। इसी जीवन में कौड़ी से हीरे जैसा बनना है। तुम बच्चे सच्चे-सच्चे खुदाई खिदमतगार हो। ईश्वरीय सैलवेशन आर्मी हो। ईश्वर आकर माया से तुमको लिबरेट करते हैं। तुम जानते हो कि हमको इनपर्टीक्युलर (खास) और दुनिया को इनजनरल (आम) माया की जंजीरों से छुड़ाते हैं। यह भी ड्रामा में नूँध है। अब बड़ाई किसको देवें? जिसकी एक्टिंग अच्छी होती है, उनका ही नाम होता है। तो बड़ाई भी परमपिता परमात्मा को ही दी जाती है। अब धरती पर पापात्माओं का बहुत बोझ है। सरसों मिसल कितने ढेर मनुष्य हैं। बाप आकर बोझ उतारते हैं। वहाँ तो कुछ लाख ही होते हैं, तो क्या क्वार्टर परसेन्ट भी नहीं हुआ। तो इस ड्रामा को भी अच्छी रीति समझना है। परमात्मा को सर्वशक्तिमान् कहते हैं। यह भी उनका ड्रामा में पार्ट है। बाप कहते हैं मैं भी ड्रामा में बाँधा हुआ हूँ। यदा यदाहि धर्मस्य... लिखा हुआ है। अब वही धर्म की ग्लानि भी भारत में बरोबर है। मेरी भी ग्लानी करते हैं, देवताओं की भी ग्लानी करते हैं, इसलिए बहुत पाप आत्मा बन पड़े हैं। यह भी उन्हों को बनना ही है। सतो, रजो, तमो में आना ही है। तुम इस ड्रामा को समझ गये हो। बुद्धि में चक्र फिरता रहता है। बाप ने आकर रोशनी दी है। अभी इस ड्रामा की अन्त है। अब तुम फिर नई दुनिया के लिए पुरुषार्थ करो। ऐसे नहीं जो मिलना होगा वह मिलेगा। नहीं। पुरुषार्थ फर्स्ट। सारी ताकत पवित्रता में है। पवित्रता की बलिहारी है। देवतायें पवित्र हैं तब अपवित्र मनुष्य उन्हों के आगे जाकर माथा झुकाते हैं। संन्यासियों को भी माथा टेकते हैं। मरने के बाद उन्हों का यादगार बनाया जाता है क्योंकि पवित्र बने हैं। कोई-कोई जिस्मानी काम भी बहुत करते हैं। हॉस्पिटल खोलते हैं वा कालेज बनाते हैं तो उन्हों का भी नाम निकलता है। सबसे बड़ा नाम उनका है जो सबको पवित्र बनाते हैं और जो उनके मददगार बनते हैं। तुम पवित्र बनते हो, उस एवर-प्योर के साथ योग लगाने से। जितना तुम योग लगाते जायेंगे उतना तुम पवित्र बनते जायेंगे, फिर अन्त मती सो गति। बाप के पास चले जायेंगे। वो लोग यात्रा पर जाते हैं तो ऐसे नहीं समझते हैं कि बाप के पास जाना है। फिर भी पवित्र रहते हैं। यहाँ तो बाप सभी को पवित्र बनाते हैं। ड्रामा को भी समझना कितना सहज है। बहुत प्वॉइन्ट्स समझाते रहते हैं। फिर कहते हैं सिर्फ बाप और वर्से को याद करो। मरने समय सब भगवान की याद दिलाते हैं। अच्छा भगवान क्या करेगा? फिर कोई शरीर छोड़ते हैं तो कहते हैं स्वर्गवासी हुआ। गोया परमात्मा की याद में शरीर छोड़ने से वैकुण्ठ में चले जायेंगे। वो लोग बाप को जानते नहीं। यह भी किसकी बुद्धि में नहीं है कि हम बाप को याद करने से, वैकुण्ठ में पहुँच जायेंगे। वह सिर्फ कहते हैं परमात्मा को याद करो। अंग्रेजी में गॉड फादर कहते हैं। यहाँ तुम कहते हो परमपिता परमात्मा। वो लोग पहले गॉड फिर फादर कहते। हम पहले परमपिता फिर परमात्मा कहते। वह सबका फादर है। अगर सभी फादर हों तो फिर ओ गॉड फादर कह न सकें। थोड़ी सी बात भी नहीं समझ सकते। बाप ने तुमको सहज करके समझाया है। मनुष्य जब दु:खी होते हैं तो परमात्मा को याद करते हैं। मनुष्य हैं देह-अभिमानी और याद करती है देही (आत्मा) अगर परमात्मा सर्वव्यापी है तो फिर आत्मा (देही) क्यों याद करे? अगर आत्मा निर्लेप है फिर भी देही अथवा आत्मा क्या याद करती है? भक्तिमार्ग में आत्मा ही परमात्मा को याद करती है क्योंकि दु:खी है। जितना सुख मिला है उतना याद करना पड़ता है।
यह है पढ़ाई, एम-आबजेक्ट भी क्लीयर है। इसमें अंधश्रद्धा की कोई बात नहीं। तुम सभी धर्म वालों को जानते हो - इस समय सभी मौजूद हैं। अब फिर देवी-देवता धर्म की हिस्ट्री-रिपीट होनी है। यह कोई नई बात नहीं। कल्प-कल्प हम राज्य लेते हैं। जैसे वह हद का खेल रिपीट होता है वैसे यह बेहद का खेल है। आधाकल्प का हमारा दुश्मन कौन? रावण। हम कोई लड़ाई कर राज्य नहीं लेते हैं। न कोई हिंसक लड़ाई लड़ते हैं, न कोई जीत पहनने के लिए लश्किर लेकर लड़ते हैं। यह हार जीत का खेल है। परन्तु हार भी सूक्ष्म तो जीत भी सूक्ष्म। माया से हारे हार है, माया से जीते जीत है। मनुष्यों ने माया के बदले मन अक्षर डाल दिया है तो उल्टा हो गया है। यह ड्रामा में खेल भी पहले ही बना हुआ है। बाप खुद बैठ परिचय देते हैं। रचयिता को और कोई मनुष्य जानते ही नहीं, तो परिचय कैसे दे सकते। रचयिता है एक बाप, बाकी हम हैं रचना। तो जरूर हमको राज्य-भाग्य मिलना चाहिए। मनुष्य तो कह देते परमात्मा सर्वव्यापी है तो सब रचता हो गये। रचना को उड़ा दिया है, कितने पत्थरबुद्धि, दु:खी हो गये हैं। सिर्फ अपनी महिमा करते हैं कि हम वैष्णव हैं, गोया हम आधा देवता हैं। समझते हैं देवतायें वैष्णव थे। वास्तव में वेजीटेरियन का मुख्य अर्थ है अहिंसा परमोधर्म। देवताओं को पक्के वैष्णव कहा जाता है। ऐसे तो अपने को वैष्णव कहलाने वाले बहुत हैं। परन्तु लक्ष्मी-नारायण के राज्य में वैष्णव सम्प्रदाय पवित्र भी थे। अब उस वैष्णव सम्प्रदाय का राज्य कहाँ है? अब तुम ब्राह्मण बने हो, तुम ब्रह्माकुमार कुमारियां हो तो जरूर ब्रह्मा भी होगा, तब तो नाम रखा हुआ है शिववंशी प्रजापिता ब्रह्मा की औलाद। गाया भी जाता है कि शिवबाबा आया था, उसने ब्राह्मण सम्प्रदाय रची, जो ब्राह्मण फिर देवता बने। अब तुम शुद्र से ब्राह्मण बने हो तब ब्रह्माकुमार कुमारी कहलाते हो। विराट रूप के चित्र पर भी समझाना अच्छा है। विष्णु का ही विराट रूप दिखाया है। विष्णु और उसकी राजधानी (सन्तान) ही विराट चक्र में आते हैं। यह सब बाबा के विचार चलते हैं। तुम भी विचार सागर मंथन की प्रैक्टिस करेंगे तो रात्रि को नींद नहीं आयेगी। यही चिंतन चलता रहेगा। सुबह को उठ धन्धे आदि में लग जायेंगे। कहते हैं सुबह का सांई.... तुम भी किसको बैठ समझायेंगे तो कहेंगे - ओहो! यह तो हमको मनुष्य से देवता, बेगर से प्रिन्स बनाने आये हैं। पहले अलौकिक सेवा करनी चाहिए, स्थूल सर्विस बाद में। शौक चाहिए। खास मातायें बहुत अच्छी रीति सर्विस कर सकती हैं। माताओं को कोई धिक्कारेंगे नहीं। सब्जी वाले, अनाज वाले, नौकर आदि सबको समझाना है। कोई रह न जाए जो उल्हना देवे। सर्विस में दिल की सच्चाई चाहिए। बाप से पूरा योग चाहिए तब धारणा हो सके। वक्खर (सामग्री) भरकर फिर पोर्ट पर स्टीम्बर डिलेवरी करने जायें। उनको फिर घर में सुख नहीं आयेगा, भागता रहेगा। यह चित्र भी बहुत मदद देते हैं। कितना साफ है - शिवबाबा ब्रह्मा द्वारा विष्णुपुरी की स्थापना करा रहे हैं। यह है रूद्र ज्ञान यज्ञ, कृष्ण ज्ञान यज्ञ नहीं। इस रूद्र ज्ञान यज्ञ से विनाश ज्वाला प्रज्जवलित हुई है। श्रीकृष्ण तो यज्ञ रच नहीं सकते। वह 84 जन्म लेंगे तो नाम-रूप बदल जायेगा और कोई रूप में श्रीकृष्ण हो न सके। श्रीकृष्ण का पार्ट तो जब उसी रूप में आये तब ही रिपीट करे। अच्छा-
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का यादप्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।
धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) सच्चे-सच्चे खुदाई खिदमतगार अथवा ईश्वरीय सैलवेशन आर्मी बन सबको माया से लिबरेट करना है। इस जीवन में कौड़ी से हीरे जैसा बनना और बनाना है।
2) जैसे बाबा विचार सागर मंथन करते हैं, ऐसे ज्ञान का विचार सागर मंथन करना है। कल्याणकारी बन अलौकिक सेवा में तत्पर रहना है। दिल की सच्चाई से सेवा करनी है।
वरदान:- छोटी-छोटी अवज्ञाओं के बोझ को समाप्त कर सदा समर्थ रहने वाले श्रेष्ठ चरित्रवान भव
जैसे अमृतवेले उठने की आज्ञा है तो उठकर बैठ जाते हैं लेकिन विधि से सिद्धि को प्राप्त नहीं करते, स्वीट साइलेन्स के साथ निद्रा की साइलेन्स मिक्स हो जाती है। 2-बाप की आज्ञा है किसी भी आत्मा को न दु:ख दो, न दु:ख लो, इसमें दु:ख देते नहीं हैं लेकिन ले लेते हैं। 3- क्रोध नहीं करते लेकिन रोब में आ जाते हैं, ऐसी छोटी-छोटी अवज्ञायें मन को भारी कर देती हैं। अब इन्हें समाप्त कर आज्ञाकारी चरित्र का चित्र बनाओ तब कहेंगे सदा समर्थ चरित्रवान आत्मा।
स्लोगन:- सम्मान मांगने के बजाए सबको सम्मान दो तो सबका सम्मान मिलता रहेगा।
03-01-2023 HINDI MURLI
“मीठे बच्चे - यह सृष्टि वा जमाना दु:ख का है इससे नष्टोमोहा बनो, नये जमाने को याद करो, बुद्धियोग इस दुनिया से निकाल नई दुनिया से लगाओ''
प्रश्नः-कृष्णपुरी में चलने के लिए तुम बच्चे कौन सी तैयारी करते और कराते हो?
उत्तर:-कृष्णपुरी में चलने के लिए सिर्फ इस अन्तिम जन्म में सब विकारों को छोड़ पावन बनना और दूसरों को बनाना है। पावन बनना ही दु:खधाम से सुखधाम में जाने की तैयारी है। तुम सबको यही सन्देश दो कि यह डर्टी दुनिया है, इससे बुद्धियोग निकालो तो नई सतयुगी दुनिया में चले जायेंगे।
गीत:- मुझको सहारा देने वाले....
ओम् शान्ति। इस गीत में बच्चे कहते हैं कि बाबा। बच्चों की बुद्धि चली जाती है बेहद के बाप तरफ। जिन बच्चों को अब सुख मिल रहा है अथवा सुखधाम का रास्ता मिल रहा है। समझते हैं बरोबर बाप स्वर्ग के 21 जन्मों का सुख देने आया है। इस सुख की प्राप्ति के लिए स्वयं बाप आकर शिक्षा दे रहे हैं। समझा रहे हैं कि यह जो जमाना है अर्थात् इतने जो मनुष्य हैं वे कुछ भी दे नहीं सकते हैं। यह तो सब रचना है ना। आपस में भाई-बहन हैं। तो रचना एक दो को सुख का वर्सा दे कैसे सकते! सुख का वर्सा देने वाला जरूर एक रचयिता बाप ही होगा। इस जमाने में ऐसा कोई मनुष्य नहीं जो किसको सुख दे सके। सुखदाता सद्गति दाता है ही एक सतगुरू। अब सुख कौन सा मांगते हैं? यह तो सभी भूल गये हैं कि स्वर्ग में बहुत सुख थे और अभी नर्क में दु:ख है। तो जरूर सभी बच्चों पर मालिक को ही तरस पड़ेगा। बहुत हैं जो सृष्टि के मालिक को मानते हैं। परन्तु वह कौन हैं, उनसे क्या मिलता है वह कुछ पता नहीं है। ऐसे तो नहीं मालिक से हमको दु:ख मिला है। याद करते ही हैं उनको सुख शान्ति के लिए। भक्त भगवान को याद करते हैं जरूर प्राप्ति के लिए। दु:खी हैं तब सुख-शान्ति के लिए याद करते हैं। बेहद का सुख देने वाला एक है, बाकी हद का अल्पकाल सुख तो एक दो को देते ही रहते हैं। वह कोई बड़ी बात नहीं। भक्त सभी पुकारते हैं एक भगवान को, जरूर भगवान सबसे बड़ा है, उनकी महिमा बहुत बड़ी है। तो जरूर बहुत सुख देने वाला होगा। बाप कभी बच्चों को वा जमाने को दु:ख नहीं दे सकते। बाप समझाते हैं तुम विचार करो - मैं जो सृष्टि अथवा जमाना रचता हूँ तो क्या दु:ख देने के लिए? मैं तो रचता हूँ सुख देने के लिए। परन्तु यह ड्रामा सुख दु:ख का बना हुआ है। मनुष्य कितने दु:खी हैं। बाप समझाते हैं कि जब नया जमाना, नई सृष्टि होती है, तो उसमें सुख होता है। दु:ख पुरानी सृष्टि में होता है। सब कुछ पुराना जड़जड़ीभूत हो जाता है। पहले जो मैं सृष्टि रचता हूँ उसको सतोप्रधान कहा जाता है। उस समय सभी मनुष्य कितने सुखी रहते हैं। वह धर्म अब प्राय:लोप होने के कारण कोई की बुद्धि में नहीं है।
तुम बच्चे जानते हो नया जमाना सतयुग था। अब पुराना है तो आशा रखते हैं कि बाप जरूर नई दुनिया बनायेगा। पहले नई सृष्टि नये जमाने में बहुत थोड़े थे और बहुत सुखी थे, जिन सुखों का पारावार नहीं था। नाम ही कहते हैं स्वर्ग, वैकुण्ठ, नई दुनिया। तो जरूर उसमें नये मनुष्य होंगे। जरूर वह देवी-देवताओं की राजधानी मैंने स्थापन की होगी ना। नहीं तो जब कलियुग में एक भी राजा नहीं, सब कंगाल हैं। फिर एकदम सतयुग में देवी-देवताओं की राजाई कहाँ से आई? यह दुनिया बदली कैसे? परन्तु सभी की बुद्धि इतनी मारी हुई है जो कुछ भी समझते नहीं हैं। बाप आकर बच्चों को समझाते हैं। मनुष्य मालिक पर दोष धरते हैं कि वही सुख दु:ख देते हैं, परन्तु ईश्वर को तो याद ही करते हैं कि आकर हमको सुख-शान्ति दो। स्वीट होम में ले चलो। फिर पार्ट में तो जरूर भेजेंगे ना! कलियुग के बाद फिर सतयुग जरूर आना है। मनुष्य तो रावण की मत पर हैं। श्रेष्ठ मत तो है ही श्रीमत। बाप कहते हैं मैं सहज राजयोग सिखाता हूँ। मैं कोई गीता का श्लोक आदि नहीं गाता हूँ जो तुम गाते हो। क्या बाप बैठ गीता सिखायेंगे? मैं तो सहज राजयोग सिखाता हूँ। स्कूल में गीत कविताएं सुनाई जाती हैं क्या? स्कूल में तो पढ़ाया जाता है। बाप भी कहते हैं तुम बच्चों को मैं पढ़ा रहा हूँ, राजयोग सिखला रहा हूँ। मेरे साथ और कोई का भी योग नहीं है। सब मेरे को भूल गये हैं। यह भूलना भी ड्रामा में नूँध है। मैं आकर फिर याद दिलाता हूँ। मैं तो तुम्हारा बाप हूँ। मानते भी हो इनकारपोरियल गॉड है तो उनके तुम भी इनकारपोरियल बच्चे हो। निराकार आत्मायें, तुम फिर यहाँ आते हो पार्ट बजाने। सभी निराकार आत्माओं का निवास स्थान निराकारी दुनिया है, जो ऊंच ते ऊंच है। यह साकारी दुनिया फिर आकारी दुनिया और वह निराकारी दुनिया सबसे ऊपर तीसरे तबके पर है। बाप सम्मुख बैठ बच्चों को समझाते हैं, हम भी वहाँ के रहने वाले हैं। जब नई दुनिया थी तो वहाँ एक धर्म था, जिसको हेविन कहा जाता है। बाप को कहा ही जाता है हेविनली गॉड फादर। कलियुग है कंसपुरी। सतयुग है कृष्णपुरी। तो पूछना चाहिए अब तुम कृष्णपुरी चलेंगे? अगर तुम कृष्णुपरी चलने चाहते हो तो पवित्र बनो। जैसे हम तैयारी कर रहे हैं दु:खधाम से सुखधाम में चलने की, ऐसे तुम भी करो। उसके लिए विकार जरूर छोड़ने पड़ेंगे। यह सबका अन्तिम जन्म है। सभी को वापस जाना है। क्या तुम भूल गये हो - 5 हजार वर्ष पहले यह महाभारी लड़ाई नहीं लगी थी? जिसमें सभी धर्म विनाश हुए थे और एक धर्म की स्थापना हुई थी। सतयुग में देवी देवतायें थे ना। कलियुग में नहीं हैं। अब तो रावण राज्य है। आसुरी मनुष्य हैं। उन्हों को फिर देवता बनाना पड़े। तो उसके लिए आसुरी दुनिया में आना पड़े वा दैवी दुनिया में आयेंगे? वा दोनों के संगम पर आयेंगे? गाया भी हुआ है कल्प-कल्प, कल्प के संगमयुगे-युगे आता हूँ। बाप हमको ऐसे समझाते हैं, हम उनकी श्रीमत पर हैं। कहते हैं मैं गाइड बन तुम बच्चों को वापिस ले जाने के लिए आया हूँ, इसलिए मुझे कालों का काल भी कहते हैं। कल्प पहले भी महाभारी लड़ाई लगी थी, जिससे स्वर्ग के द्वार खुले थे। परन्तु सभी तो वहाँ नहीं गये, सिवाए देवी-देवताओं के। बाकी सब शान्तिधाम में थे। तो मैं निर्वाणधाम का मालिक आया हूँ, सभी को निर्वाणधाम ले जाने। तुम रावण की जंजीरों में फँसे हुए विकारी मूत पलीती आसुरी गुणों वाले हो। काम है नम्बरवन डर्टी। फिर क्रोध, लोभ नम्बरवार डर्टी हैं। तो सारी दुनिया से नष्टोमोहा भी होना है तब तो स्वर्ग चलेंगे। जैसे बाप हद का मकान बनाते हैं तो बुद्धि उसमें लग जाती है। बच्चे कहते हैं बाबा इसमें यह बनाना, अच्छा मकान बनाना। वैसे बेहद का बाप कहते हैं मैं तुम्हारे लिए नई दुनिया स्वर्ग कैसा अच्छा बनाता हूँ। तो तुम्हारा बुद्धियोग पुरानी दुनिया से टूट जाना चाहिए। यहाँ रखा ही क्या है? देह भी पुरानी, आत्मा में भी खाद पड़ी हुई है। वह निकलेगी तब जब तुम योग में रहेंगे। ज्ञान भी धारण होगा। यह बाबा भाषण कर रहे हैं ना। हे बच्चे, तुम सभी आत्मायें मेरी रचना हो। आत्मा के स्वरूप में भाई-भाई हो। अब तुम सभी को मेरे पास वापिस आना है। अभी सब तमोप्रधान बन चुके हो। रावण राज्य है ना। तुम पहले नहीं जानते थे कि रावण राज्य कब से आरम्भ होता है। सतयुग में 16 कला हैं, फिर 14 कला होती हैं। तो ऐसे नहीं एकदम दो कला कम हो जाती हैं। धीरे-धीरे उतरते हैं। अभी तो कोई कला नहीं है। पूरा ग्रहण लगा हुआ है। अब बाप कहते हैं कि दे दान तो छूटे ग्रहण। 5 विकारों का दान दे दो और कोई पाप नहीं करो। भारतवासी रावण को जलाते हैं, जरूर रावण का राज्य है। परन्तु रावण राज्य किसको कहते हैं, राम राज्य किसको कहते हैं, यह भी नहीं जानते। कहते हैं रामराज्य हो, नया भारत हो परन्तु एक भी नहीं जानते कि नई दुनिया नया भारत कब होता है। सभी कब्र में सोये पड़े हैं।
अब तुम बच्चों को तो सतयुगी झाड़ देखने में आ रहे हैं। यहाँ तो कोई देवता है नहीं। तो यह बाप आकर सब समझाते हैं। मात-पिता तुम्हारा वही है, स्थूल में फिर यह मात-पिता हैं। तुम मात-पिता उनको गाते हो। सतयुग में तो ऐसे नहीं गायेंगे। वहाँ न कृपा की बात है, यहाँ मात-पिता का बनकर फिर लायक भी बनना पड़ता है। बाप स्मृति दिलाते हैं हे भारतवासी तुम भूल गये हो, तुम देवतायें कितने धनवान थे, कितने समझदार थे। अब बेसमझ बन देवाला मार दिया है। ऐसा बेसमझ माया रावण ने तुमको बनाया है, तब तो रावण को जलाते हो। दुश्मन का एफ़ीजी बनाए उनको जलाते हैं ना। तुम बच्चों को कितनी नॉलेज मिलती है। परन्तु विचार सागर मंथन नहीं करते, बुद्धि भटकती रहती है तो ऐसी-ऐसी प्वाइन्ट्स भाषण में सुनाने भूल जाते हैं। पूरा समझाते नहीं हैं। तुमको तो बाप का पैगाम देना है कि बाबा आया हुआ है। यह महाभारी लड़ाई सामने खड़ी है। सभी को वापिस जाना है। स्वर्ग स्थापन हो रहा है। बाप कहते हैं देह सहित देह के सभी सम्बन्धों को भूल मुझे याद करो। बाकी सिर्फ ऐसे नहीं कहना है कि इस्लामी, बौद्धी आदि सब भाई-भाई हैं। यह तो सभी देह के धर्म हैं ना। सभी की जो आत्मायें हैं वह बाप की सन्तान हैं। बाप कहते हैं यह सब देह के धर्म छोड़ मामेकम् याद करो। यह बाप का मैसेज देने के लिए हम शिव जयन्ती मना रहे हैं। हम ब्रह्माकुमार कुमारियां शिव के पोत्रे हैं। हमको उनसे स्वर्ग की राजधानी का वर्सा मिल रहा है। बाप हमको पैगाम देते हैं कि मनमनाभव। इस योग अग्नि से तुम्हारे विकर्म विनाश होंगे। अशरीरी बनो। अच्छा।
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का यादप्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।
रात्रि क्लास:
अभी तुम बच्चे स्थूलवतन, सूक्ष्मवतन और मूलवतन को अच्छी तरह समझ गये हो। सिर्फ तुम ब्राह्मण ही यह नॉलेज पाते हो। देवताओं को तो यह दरकार ही नहीं है। तुमको सारे विश्व की अब नॉलेज है। तुम पहले शूद्र वर्ण के थे। फिर ब्रह्माकुमार बने तो यह नॉलेज देते हैं जिससे तुम्हारी डीटी डिनायस्टी स्थापन हो रही है। बाप आकर ब्राह्मण कुल, सूर्यवंशी, चन्द्रवंशी डिनायस्टी स्थापन करते हैं। वह भी इस संगम पर स्थापना करते हैं। और धर्म वाले फट से डिनायस्टी नहीं स्थापन करते हैं। उनको गुरू नहीं कहा जाता। बाप ही आकर धर्म की स्थापना करते हैं। बाप कहते हैं अभी सिर पर फुरना है बाप की याद का, जिसे घड़ी-घड़ी भूल जाते हैं। पुरुषार्थ कर धंधा आदि भी करते रहे और याद भी करते रहे हेल्दी बनने के लिये। बाप कमाई बड़ी जोर से कराते हैं, इसमें सभी कुछ भुलाना पड़ता है। हम आत्मा जा रही हैं, प्रैक्टिस कराई जाती है। खाते हो तो क्या बाप को याद नहीं कर सकते हो? कपड़ा सिलाई करते हैं बुद्धियोग बाप की याद में रहे। किचड़ा तो निकालना है। बाबा कहते हैं शरीर निर्वाह लिए भल कोई काम करो। है बहुत सहज। समझ गये हो 84 का चक्र पूरा हुआ। अब बाप राजयोग सिखाने आये हैं। यह वर्ल्ड की हिस्ट्री-जाग्राफी इस समय रिपीट होती है। कल्प पहले जैसे ही रिपीट हो रही है। रिपीटेशन का राज़ भी बाप ही समझाते हैं। वन गाड, वन रिलीजन भी कहते हैं ना। वहाँ ही शान्ति होगी। वह है अद्वैत राज्य, द्वैत माना आसुरी रावण राज्य। वह है देवता, यह है दैत्य। आसुरी राज्य और दैवी राज्य का भारत पर ही खेल बना हुआ है। भारत का आदि सनातन धर्म था, पवित्र प्रवृत्ति मार्ग था। फिर बाप आकर पवित्र प्रवृत्ति मार्ग बनाते हैं। हम सो देवता थे, फिर कला कम होती गई। हम सो शूद्र डिनायस्टी में आये। बाप पढ़ाते ऐसे हैं जैसे टीचर लोग पढ़ाते हैं, स्टूडेन्ट सुनते हैं। अच्छे स्टूडेन्ट पूरा ध्यान देते हैं, मिस नहीं करते हैं। यह पढ़ाई रेग्युलर चाहिए। ऐसी गॉडली युनिवर्सिटी में अबसेन्ट होनी नहीं चाहिए। बाबा गुह्य-गुह्य बातें सुनाते रहते हैं। अच्छा, गुडनाईट। रूहानी बच्चों को नमस्ते।
धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) देह के सब धर्मों को छोड़, अशरीरी आत्मा समझ एक बाप को याद करना है। योग और ज्ञान की धारणा से आत्मा को पावन बनाना है।
2) बाप जो नॉलेज देते हैं, उस पर विचार सागर मंथन कर सबको बाप का पैगाम देना है। बुद्धि को भटकाना नहीं है।
वरदान:- बाप के कदम पर कदम रखते हुए परमात्म दुआयें प्राप्त करने वाले आज्ञाकारी भव
आज्ञाकारी अर्थात् बापदादा के आज्ञा रूपी कदम पर कदम रखने वाले। ऐसे आज्ञाकारी को ही सर्व संबंधों से परमात्म दुआयें मिलती हैं। यह भी नियम है। साधारण रीति भी कोई किसी के डायरेक्शन प्रमाण हाँ जी कहकर कार्य करते हैं तो जिसका कार्य करते उसकी दुआयें उनको जरूर मिलती हैं। यह तो परमात्म दुआयें हैं जो आज्ञाकारी आत्माओं को सदा डबल लाइट बना देती हैं।
स्लोगन:- दिव्यता और अलौकिकता को अपने जीवन का श्रंगार बना लो तो साधारणता समाप्त हो जायेगी।
02-02-2022 ADVANCE HINDI MURLI
मीठे बच्चे - तुम राजऋषि हो , तुम्हें बेहद का बाप सारी पुरानी दुनिया का संन्यास सिखलाते हैं जिससे तुम राजाई पद पा सको ''
प्रश्नः- इस समय किसी भी मनुष्य के कर्म अकर्म नहीं हो सकते हैं, क्यों?
उत्तर:- क्योंकि सारी दुनिया में माया का राज्य है। सबमें 5 विकार प्रवेश हैं इसलिए मनुष्य जो भी कर्म करते हैं, वह विकर्म ही बनता है। सतयुग में ही कर्म अकर्म होते हैं क्योंकि वहाँ माया होती नहीं।
प्रश्नः- किन बच्चों को बहुत अच्छी प्राइज़ मिलती है?
उत्तर:-जो श्रीमत पर पवित्र बन अन्धों की लाठी बनते हैं। कभी 5 विकारों के वश हो कुल कलंकित नहीं बनते, उन्हें बहुत अच्छी प्राइज़ मिल जाती है। अगर कोई बार-बार माया से हार खाते हैं तो उनका पासपोर्ट ही कैन्सिल हो जाता है।
गीत:-ओम् नमो शिवाए...
ओम शान्ति। सबसे ऊंच है परमपिता परमात्मा अर्थात् परम आत्मा। वह है रचयिता। पहले ब्रह्मा, विष्णु, शंकर को रचते हैं फिर आओ नीचे अमरलोक में, वहाँ है लक्ष्मी-नारायण का राज्य। सूर्यवंशी का राज्य, चन्द्रवंशी का नहीं है। यह कौन समझा रहे हैं? ज्ञान का सागर। मनुष्य, मनुष्य को कब समझा न सके। बाप सबसे ऊंच है, जिसको भारत-वासी मात-पिता कहते हैं। तो जरूर प्रैक्टिकल में मात-पिता चाहिए। गाते हैं तो जरूर कोई समय हुए होंगे। तो पहले-पहले ऊंच ते ऊंच है वह निराकार परमपिता परमात्मा, बाकी तो हरेक में आत्मा है। आत्मा जब शरीर में है तो दु:खी वा सुखी बनती है। यह बड़ी समझने की बातें हैं। यह कोई दन्त कथायें नहीं हैं। बाकी जो भी गुरू गुसाई आदि सुनाते हैं, वह सब दन्त कथायें हैं। अब भारत नर्क है। सतयुग में इनको स्वर्ग कहा जाता है। लक्ष्मी-नारायण राज्य करते थे, वहाँ सब सौभाग्यशाली रहते थे। कोई दुर्भाग्यशाली थे ही नहीं। कोई भी दु:ख रोग था ही नहीं। यह है पाप आत्माओं की दुनिया। भारतवासी स्वर्गवासी थे, लक्ष्मी-नारायण का राज्य था। श्रीकृष्ण को तो सभी मानते हैं। देखो, इनको दो गोले दिये हैं। श्रीकृष्ण की आत्मा कहती है अब मैं नर्क को लात मार रहा हूँ। स्वर्ग हाथ में ले आया हूँ। पहले कृष्णपुरी थी, अब कंसपुरी है। इसमें यह श्रीकृष्ण भी है। इनके 84 जन्मों के अन्त का यह जन्म है। परन्तु अब वह श्रीकृष्ण का रूप नहीं है। यह बाप बैठ समझाते हैं। बाप ही आकर भारत को स्वर्ग बनाते हैं। अब नर्क है फिर स्वर्ग बनाने बाप आये हैं। यह पुरानी दुनिया है। जो नई दुनिया थी, अब वह पुरानी है। मकान भी नये से पुराना होता है। आखरीन तोड़ने लायक हो जाता है। अब बाप कहते हैं मैं बच्चों को स्वर्गवासी बनाने राजयोग सिखाता हूँ। तुम हो राजऋषि। राजाई प्राप्त करने के लिए तुम संन्यास करते हो विकारों का। वह हद के संन्यासी घरबार छोड़ जंगल में चले जाते हैं। परन्तु हैं फिर भी पुरानी दुनिया में। बेहद का बाप तुमको नर्क का संन्यास कराते हैं और स्वर्ग का साक्षात्कार कराते हैं। बाप कहते हैं मैं आया हूँ तुमको ले जाने। बाप सभी को कहते हैं तुम अपने जन्मों को नहीं जानते हो। यह तो जरूर है जो जैसा कार्य करेगा अच्छा वा बुरा, उस संस्कार अनुसार जाकर जन्म लेंगे। कोई साहूकार, कोई गरीब, कोई रोगी कोई तन्दरूस्त बनते हैं। यह है अगले जन्मों के कर्मो का हिसाब। कोई तन्दरूस्त है जरूर आगे जन्म में हॉस्पिटल आदि बनाये होंगे। दान पुण्य जास्ती करते हैं तो साहूकार बनते हैं। नर्क में मनुष्य जो भी कर्म करते हैं वह जरूर विकर्म ही बनेंगे क्योंकि सबमें 5 विकार हैं। अब संन्यासी पवित्र बनते हैं, पाप करना छोड़ देते हैं, जंगल में जाकर रहते हैं। परन्तु ऐसे नहीं उनके कर्म अकर्म होते हैं। बाप समझाते हैं इस समय है ही माया का राज्य इसलिए मनुष्य जो भी कर्म करेंगे वह पाप ही होंगे। सतयुग त्रेता में माया होती नहीं, इसलिए कभी विकर्म नहीं बनते। न दु:ख होगा। इस समय एक तो हैं रावण की जंजीरें, फिर भक्तिमार्ग की जंजीरें। जन्म-जन्मान्तर धक्के खाते आये हैं। बाप कहते हैं हमने आगे भी कहा था कि इन जप तप आदि से मैं नहीं मिलता हूँ। मैं आता ही तब हूँ जब भक्ति का अन्त होता है। भक्ति शुरू होती है द्वापर से। मनुष्य दु:खी होते हैं तब याद करते हैं। सतयुग त्रेता में हैं सौभाग्यशाली और यहाँ हैं दुर्भाग्यशाली। रोते पीटते रहते हैं। अकाले मृत्यु होता रहता है। बाप कहते हैं मैं आऊंगा तब जब नर्क को स्वर्ग बनना है। भारत प्राचीन देश है, जो पहले थे, उनको ही अन्त तक रहना है। 84 का चक्र गाया जाता है। गवर्मेन्ट जो त्रिमूर्ति बनाती है उनमें होना चाहिए ब्रह्मा, विष्णु, शंकर, परन्तु जानवर लगा देते हैं। बाप रचयिता का चित्र है नहीं और नीचे चक्र भी लगाया है। वह समझते हैं चरखा है परन्तु है ड्रामा सृष्टि का चक्र। अब चक्र का नाम रखा है अशोक चक्र। अब तुम इस चक्र को जानने से ही अशोक बन जाते हो। बात तो ठीक है, सिर्फ उलट पुलट कर दिया है। तुम इस 84 जन्मों के चक्र को याद करने से ही चक्रवर्ती राजा बनते हो - 21 जन्मों के लिए। इस दादा ने भी 84 जन्म पूरे किये हैं। यह श्रीकृष्ण का अन्तिम जन्म है। इनको बाप बैठ समझाते हैं। वास्तव में तुम सबका अन्तिम जन्म है, जो भारतवासी देवी-देवता धर्म के थे उन्हों ने ही पूरे 84 जन्म भोगे हैं। अभी तो सबका चक्र पूरा होता है। अब यह तुम्हारा तन छी-छी हो गया है। यह दुनिया ही छी-छी है, इसलिए तुमको इस दुनिया से संन्यास कराते हैं। इस कब्रिस्तान से दिल नहीं लगानी है। अब बाप और वर्से से दिल लगाओ। तुम आत्मा अविनाशी हो, यह शरीर विनाशी है। अब मुझे याद करो तो अन्त मती सो गति हो जायेगी। गायन भी है अन्तकाल जो स्त्री सिमरे... अब बाप कहते हैं अन्तकाल जो शिवबाबा सिमरे वह नारायण पद प्राप्त कर सकता है। नारायण पद मिलता ही है सतयुग में। बाप के सिवाए यह पद कोई दिला न सके। यह पाठशाला है ही मनुष्य से देवता बनने की। पढ़ाने वाला है बाप। जिसकी महिमा सुनी - ओम् नमो शिवाए। तुम जानते हो हम उनके बच्चे बन गये हैं। अब वर्सा ले रहे हैं।
अब तुम मनुष्य मत पर नहीं चलते। मनुष्य मत पर चलने से तो सब नर्कवासी बन गये हैं। शास्त्र भी मनुष्यों के ही गाये हुए हैं अथवा बनाये हुए हैं। सारा भारत इस समय धर्म भ्रष्ट, कर्म भ्रष्ट बन पड़ा है। देवतायें तो पवित्र थे। अब बाप कहते हैं अगर सौभाग्यशाली बनने चाहते हो तो पवित्र बनो, प्रतिज्ञा करो - बाबा हम पवित्र बन आपसे पूरा वर्सा जरूर लेंगे। यह तो पुरानी पतित दुनिया खत्म होने वाली है। लड़ाई झगड़ा क्या क्या लगा पड़ा है। क्रोध कितना है। बाम्बस कितने बड़े-बड़े बनाये हैं। कितने क्रोधी, लोभी हैं। वहाँ श्रीकृष्ण कैसे गर्भ महल से निकलते हैं सो तो बच्चों ने साक्षात्कार किया है। यहाँ है गर्भ जेल, बाहर निकलने से माया पाप कराने लग पड़ती है। वहाँ तो गर्भ महल से बच्चा निकलता है, रोशनी हो जाती है। बड़े आराम से रहते हैं। गर्भ से निकला और दासियाँ उठा लेती, बाजे बजने लग पड़ते। यहाँ वहाँ में कितना फ़र्क है।
अब तुम बच्चों को तीन धाम समझाये हैं। शान्तिधाम से ही आत्मायें आती हैं। आत्मा तो स्टार के मिसल है, जो भ्रकुटी के बीच में रहती है। आत्मा में 84 जन्मों का अविनाशी रिकार्ड भरा हुआ है। न ड्रामा कभी विनाश होता, न एक्ट बदली हो सकती। यह भी वण्डर है - कितनी छोटी आत्मा में 84 जन्मों का पार्ट बिल्कुल एक्यूरेट भरा हुआ है। यह कभी पुराना नहीं होता। नित्य नया है। हूबहू आत्मा फिर से अपना वही पार्ट शुरू करती है। अब तुम बच्चे आत्मा सो परमात्मा नहीं कह सकते। हम सो का अर्थ बाप ही यथार्थ रीति समझाते हैं। वे तो उल्टा अर्थ बना देते हैं या तो कहते अहम् ब्रह्मस्मि, हम परमात्मा हैं माया को रचने वाले। अब वास्तव में माया को रचा नहीं जाता। माया है 5 विकार। वह बाप माया को नहीं रचते। बाप तो नई सृष्टि रचते हैं। मैं सृष्टि रचता हूँ, यह और कोई नहीं कह सकते। बेहद का बाप एक ही है। ओम् का अर्थ भी बच्चों को समझाया गया है। आत्मा है ही शान्त स्वरूप। शान्तिधाम में रहती है। परन्तु बाप है ज्ञान का सागर, आनन्द का सागर। आत्मा की यह महिमा नहीं गायेंगे। हाँ आत्मा में नॉलेज आती है। बाप कहते हैं मैं एक ही बार आता हूँ। मुझे वर्सा भी जरूर देना पड़े। मेरे वर्से से भारत एकदम स्वर्ग बन जाता है। वहाँ पवित्रता, सुख-शान्ति सब कुछ था। यह है बेहद के बाप का सदा सुख का वर्सा। पवित्रता थी तो सुख शान्ति भी थी। अभी अपवित्रता है तो दु:ख अशान्ति है। बाप बैठ समझाते हैं तुम आत्मा पहले पहले मूलवतन में थी। फिर देवी-देवता धर्म में आई, फिर क्षत्रिय धर्म में आई, 8 जन्म सतोप्रधान में फिर 12 जन्म सतो में, फिर 21 जन्म द्वापर में, फिर 42 जन्म कलियुग में। यहाँ शूद्र बन पड़े, अब फिर ब्राह्मण वर्ण में आना है फिर देवता वर्ण में जायेंगे। अब तुम ईश्वरीय गोद में हो। बाप कितना अच्छी रीति समझाते हैं। 84 जन्मों को जानने से फिर उसमें सब कुछ आ जाता है। सारे चक्र का ज्ञान बुद्धि में है। यह भी तुम जानते हो सतयुग में है एक धर्म। वर्ल्ड आलमाइटी अथॉरिटी राज्य। अब तुम लक्ष्मी-नारायण पद पा रहे हो। सतयुग है पावन दुनिया, वहाँ बहुत थोड़े होते हैं। बाकी सब आत्मायें मुक्तिधाम में रहती हैं। सबका सद्गति दाता एक ही बाप है। उनको कोई जानता ही नहीं और ही कह देते हैं कि परमात्मा सर्वव्यापी है। बाप कहते हैं तुमको किसने कहा? कहते हैं गीता में लिखा हुआ है। गीता किसने बनाई? भगवानुवाच, मैं तो इस साधारण ब्रह्मा तन का आधार लेता हूँ। लड़ाई के मैदान में एक अर्जुन को कैसे बैठ ज्ञान सुनायेंगे। तुमको कोई लड़ाई वा जुआ आदि थोड़ेही सिखाई जाती है। भगवान तो है ही मनुष्य से देवता बनाने वाला। वह कैसे कहेंगे कि जुआ खेलो, लड़ाई करो। फिर कहते द्रोपदी को 5 पति थे। यह कैसे हो सकता। कल्प पहले बाबा ने स्वर्ग बनाया था। अब फिर से बना रहे हैं। श्रीकृष्ण के 84 जन्म पूरे हुए, यथा राजा रानी तथा प्रजा, सबके 84 जन्म पूरे हुए। अब तुम शूद्र से बदल ब्राह्मण बने हो। जो ब्राह्मण धर्म में आयेंगे, वही मम्मा बाबा कहेंगे। फिर भल कोई माने वा न माने। समझते हैं हमारे लिए मंजिल ऊंची है। फिर भी कुछ न कुछ सुनते हैं तो स्वर्ग में जरूर आयेंगे। परन्तु कम पद पायेंगे। वहाँ यथा राजा रानी तथा प्रजा सब सुखी रहते हैं। नाम ही है हेविन। हेविनली गॉड फादर हेविन स्थापन करते हैं, यह है हेल। सब सीताओं को रावण ने जेल में बाँध रखा है। सभी शोक में बैठ भगवान को याद कर रहे हैं कि इस रावण से छुड़ाओ। सतयुग है अशोक वाटिका। जब तक सूर्यवंशी राजधानी तुम्हारी स्थापन नहीं हुई है तब तक विनाश नहीं हो सकता। राजधानी स्थापन हो, बच्चों की कर्मातीत अवस्था हो तब फाइनल लड़ाई होगी, तब तक रिहर्सल होती रहती है। इस लड़ाई के बाद स्वर्ग के गेट खुलने वाले हैं। तुम बच्चों को स्वर्ग में चलने लायक बनना है। बाबा पासपोर्ट निकालते हैं। जितना-जितना पवित्र बनेंगे, अन्धों की लाठी बनेंगे तो प्राइज़ भी अच्छी मिलेगी। बाबा से प्रतिज्ञा करनी है मीठे बाबा हम आपकी याद में जरूर रहेंगे। मुख्य बात है पवित्रता की। पाँच विकारों का दान जरूर देना पड़े। कोई हार खाकर खड़े भी हो जाते हैं। अगर दो चार बारी माया का घूँसा खाकर फिर गिरा तो नापास हो जायेगा। पासपोर्ट कैन्सिल हो जाता है। बाप कहते हैं बच्चे कुल कलंकित मत बनो। तुम विकारों को छोड़ो। मैं तुमको स्वर्ग का मालिक अवश्य ही बनाऊंगा। अच्छा।
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का यादप्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।
धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) सौभाग्यशाली बनने के लिए बाप से पवित्रता की प्रतिज्ञा करनी है। इस छी-छी पतित दुनिया से दिल नहीं लगानी है।
2) माया का घूँसा कभी नहीं खाना है। कुल कलंकित नहीं बनना है। लायक बन स्वर्ग का पासपोर्ट बाप से लेना है।
वरदान:- मन को बिजी रखने की कला द्वारा व्यर्थ से मुक्त रहने वाले सदा समर्थ स्वरूप भव
जैसे आजकल की दुनिया में बड़ी पोजीशन वाले अपने कार्य की दिनचर्या को समय प्रमाण सेट करते हैं ऐसे आप जो विश्व के नव निर्माण के आधारमूर्त हो, बेहद ड्रामा के अन्दर हीरो एक्टर हो, हीरे तुल्य जीवन वाले हो, आप भी अपने मन और बुद्धि को समर्थ स्थिति में स्थित करने का प्रोग्राम सेट करो। मन को बिजी रखने की कला सम्पूर्ण रीति से यूज़ करो तो व्यर्थ से मुक्त हो जायेंगे। कभी भी अपसेट नहीं होंगे।
स्लोगन:- ड्रामा के हर दृश्य को देख हर्षित रहो तो कभी अच्छे बुरे की
आकर्षण में नहीं आयेंगे।
01-01-2023 HINDI MURLI
अव्यक्त वर्ष में लक्ष्य और लक्षण को समान बनाओ
आज निराकारी और आकारी बापदादा सर्वश्रेष्ठ ब्राह्मण आत्माओं को आकार रूप से और साकार रूप से देख रहे हैं। साकार रूप वाली आप सभी आत्मायें भी बाप के सम्मुख हो और आकारी रूपधारी बच्चे भी सम्मुख हैं। दोनों को बापदादा देख हर्षित हो रहे हैं। सभी के दिल में एक ही संकल्प है, उमंग है कि हम सभी बाप समान साकारी सो आकारी और आकारी सो निराकारी बाप समान बनें। बापदादा सभी के इस लक्ष्य और लक्षण को देख रहे हैं। क्या दिखाई दिया? मैजॉरिटी का लक्ष्य बहुत अच्छा दृढ़ है लेकिन लक्षण कभी दृढ़ हैं, कभी साधारण हैं। लक्ष्य और लक्षण में समानता आना, यह निशानी है समान बनने की। लक्ष्य धारण करने में 99 प्रतिशत भी कोई हैं, बाकी नम्बरवार हैं। लेकिन सदा, सहज और नेचुरल नेचर में लक्षण धारण करने में कहाँ तक हैं, इसमें मेनॉरिटी 90 प्रतिशत तक हैं, बाकी और नम्बरवार हैं। तो लक्ष्य और लक्षण में और लक्षण को भी नेचुरल और नेचर बनाने में अन्तर क्यों है? समय प्रमाण, सरकमस्टांश प्रमाण, समस्या प्रमाण कई बच्चे पुरुषार्थ द्वारा अपने लक्ष्य और लक्षण को समान भी बनाते हैं। लेकिन यह नेचुरल और नेचर हो जाये, उसमें अभी और अटेन्शन चाहिए। यह वर्ष अव्यक्त फरिश्ता स्थिति में स्थित रहने का मना रहे हो। यह देख बापदादा बच्चों के प्यार और पुरुषार्थ - दोनों को देख-देख खुश होते हैं, “वाह बच्चे, वाह'' का गीत भी गाते हैं। साथ-साथ अभी और आगे सर्व बच्चों के लक्ष्य और लक्षण में समानता देखना चाहते हैं। आप सब भी यही चाहते हो ना। बाप भी चाहते, आप भी चाहते, फिर बीच में बाकी क्या है? वह भी अच्छी तरह से जानते हो। आपस में वर्कशॉप करते हो ना!
बापदादा ने लक्ष्य और लक्षण में अन्तर होने की विशेष एक ही बात देखी। चाहे आकारी फरिश्ता, चाहे निराकारी निरन्तर, नेचुरल नेचर हो जाये - इसका मूल आधार है निरहंकारी बनना। अहंकार अनेक प्रकार का है। सबसे विशेष कहने में भल एक शब्द ‘देह-अभिमान' है लेकिन देह-अभिमान का विस्तार बहुत है। एक है मोटे रूप में देह-अभिमान, जो कई बच्चों में नहीं भी है। चाहे स्वयं की देह, चाहे औरों की देह, अगर औरों की देह का भी आकर्षण है, वो भी देह-अभिमान है। कई बच्चे इस मोटे रूप में पास हैं, मोटे रूप से देह के आकार में लगाव वा अभिमान नहीं है। परन्तु इसके साथ-साथ देह के सम्बन्ध से अपने संस्कार विशेष हैं, बुद्धि विशेष है, गुण विशेष हैं, कोई कलायें विशेष हैं, कोई शक्ति विशेष है उसका अभिमान अर्थात् अहंकार, नशा, रोब - ये सूक्ष्म देह-अभिमान है। अगर इन सूक्ष्म अभिमान में से कोई भी अभिमान है तो न आकारी फरिश्ता नेचुरल-निरन्तर बन सकते, न निराकारी बन सकते क्योंकि आकारी फरिश्ते में भी देहभान नहीं है, डबल लाइट है। देह-अहंकार निराकारी बनने नहीं देगा। सभी ने इस वर्ष अटेन्शन अच्छा रखा है, उमंग-उत्साह भी है, चाहना भी बहुत अच्छी है, चाहते भी हैं लेकिन आगे और अटेन्शन प्लीज! चेक करो “किसी भी प्रकार का अभिमान वा अहंकार नेचुरल स्वरूप से पुरुषार्थी स्वरूप तो नहीं बना देता है? कोई भी सूक्ष्म अभिमान अंश रूप में भी रहा हुआ तो नहीं है जो समय प्रमाण और कहाँ सेवा प्रमाण भी इमर्ज हो जाता है?'' क्योंकि अंश-मात्र ही समय पर धोखा देने वाला है इसलिए इस वर्ष में जो लक्ष्य रखा है, बापदादा यही चाहते हैं कि लक्ष्य सम्पन्न होना ही है।
चलते-चलते कोई विशेष स्थूल रूप में उस दिन, उस समय कोई भूल भी नहीं करते हो लेकिन कभी-कभी ये अनुभव करते हो ना कि “आज वा अभी नामालूम क्या है जो जैसी खुशी होनी चाहिए वैसी नहीं है, ना-मालूम आज अकेलापन वा निराशा वा व्यर्थ संकल्पों का अचानक तूफान क्यों आ रहा है! अमृतवेला भी किया, क्लास भी किया, सेवा भी, जॉब भी किया परन्तु ये क्यों हो रहा है?'' कारण क्या होता है? मोटे रूप को तो चेक कर लेते हो और उसमें समझते हो कि कोई गलती नहीं हुई। लेकिन सूक्ष्म अभिमान के स्वरूप का अंश सूक्ष्म में प्रकट होता है इसलिए कोई भी काम में दिल नहीं लगेगी, वैराग्य, उदास-उदास फील होगा। या तो सोचेंगे कोई एकान्त के स्थान पर चले जायें, या सोचेंगे सो जायें, रेस्ट में चले जायें या परिवार से किनारा कर लें थोड़े टाइम के लिए। इन सब स्थितियों का कारण अंश की कमाल होती है। कमाल नहीं कहो, धमाल ही कहो। तो सम्पूर्ण निरहंकारी बनना अर्थात् आकारी-निराकारी सहज बनना। जैसे कभी-कभी दिल नहीं होती कि क्या सदा एक ही दिनचर्या में चलना है, चेंज तो चाहिए ना? न चाहते भी यह स्थिति आ जाती है।
जब निरहंकारी बन जायेंगे तो आकारी और निराकारी स्थिति से नीचे आने की दिल नहीं होगी। उसी में ही लवलीन अनुभव करेंगे क्योंकि आपकी ओरीज़नल अनादि स्टेज तो निराकारी है ना। निराकार आत्मा ने इस शरीर में प्रवेश किया है। शरीर ने आत्मा में नहीं प्रवेश किया, आत्मा ने शरीर में प्रवेश किया। तो अनादि ओरीजनल स्वरूप तो निराकारी है ना कि शरीरधारी है? शरीर का आधार लिया लेकिन लिया किसने? आप आत्मा ने, निराकार ने साकार शरीर का आधार लिया। तो ओरीज़नल क्या हुआ, आत्मा या शरीर? आत्मा। ये पक्का है? तो ओरीजनल स्थिति में स्थित होना सहज या आधार लेने वाली स्थिति में सहज?
अहंकार आने का दरवाजा एक शब्द है, वो कौनसा? ‘मैं'। तो यह अभ्यास करो जब भी ‘मैं' शब्द आता है तो ओरीजनल स्वरूप सामने लाओ ‘मैं' कौन? मैं आत्मा या फलाना-फलानी? औरों को ज्ञान देते हो ना ‘मैं' शब्द ही उड़ाने वाला है, ‘मैं' शब्द ही नीचे ले आने वाला है। ‘मैं' कहने से ओरीजनल निराकार स्वरूप याद आ जाये, ये नेचुरल हो जाये तो यह पहला पाठ सहज है ना। तो इसी को चेक करो, आदत डालो ‘मैं' सोचा और निराकारी स्वरूप स्मृति में आ जाये। कितनी बार ‘मैं' शब्द कहते हो! मैंने यह कहा, ‘मैं' यह करूँगी, ‘मैं' यह सोचती हूँ... अनेक बार ‘मैं' शब्द यूज़ करते हो। तो सहज विधि यह है निराकारी वा आकारी बनने की जब भी ‘मैं' शब्द यूज़ करो, फौरन अपना निराकारी ओरीजनल स्वरूप सामने आये। ये मुश्किल है वा सहज है? फिर तो लक्ष्य और लक्षण समान हुआ ही पड़ा है। सिर्फ यह युक्ति निरहंकारी बनाने का सहज साधन अपनाकर के देखो। यह देहभान का ‘मैं' समाप्त हो जाये। क्योंकि ‘मैं' शब्द ही देह-अहंकार में लाता है और अगर ‘मैं' निराकारी आत्मा स्वरूप हूँ - यह स्मृति में लायेंगे तो यह ‘मैं' शब्द ही देह-भान से परे ले जायेगा। ठीक है ना। सारे दिन में 25-30 बार तो जरूर कहते होंगे। बोलते नहीं हों तो सोचते तो होंगे ‘मैं' यह करूँगी, मुझे यह करना है...। प्लैन भी बनाते हो तो सोचते हो ना। तो इतने बार का अभ्यास, आत्मा स्वरूप की स्मृति क्या बना देगी? निराकारी। निराकारी बन, आकारी फरिश्ता बन कार्य किया और फिर निराकारी! कर्म-सम्बन्ध के स्वरूप से सम्बन्ध में आओ, सम्बन्ध को बन्धन में नहीं लाओ। देह-अभिमान में आना अर्थात् कर्म-बन्धन में आना। देह सम्बन्ध में आना अर्थात् कर्म-सम्बन्ध में आना। दोनों में अंतर है। देह का आधार लेना और देह के वश होना दोनों में अन्तर है। फरिश्ता वा निराकारी आत्मा देह का आधार लेकर देह के बन्धन में नहीं आयेगी, सम्बन्ध रखेगी लेकिन बन्धन में नहीं आयेगी। तो बापदादा फिर इसी वर्ष में रिजल्ट देखेंगे कि निरहंकारी, आकारी फरिश्ते और निराकारी स्थिति में लक्ष्य और लक्षण कितने समान हुए?
महानता की निशानी है निर्मानता। जितना निर्मान उतना सबके दिल में महान् स्वत: ही बनेंगे। बिना निर्मानता के सर्व के मास्टर सुखदाता बन नहीं सकते। निर्मानता निरहंकारी सहज बनाती है। निर्मानता का बीज महानता का फल स्वत: ही प्राप्त कराता है। निर्मानता सबके दिल में दुआयें प्राप्त कराने का सहज साधन है। निर्मानता सबके मन में निर्मान आत्मा के प्रति सहज प्यार का स्थान बना देती है। निर्मानता महिमा योग्य स्वत: ही बनाती है। तो निरहंकारी बनने की विशेष निशानी है - निर्मानता। वृत्ति में भी निर्मानता, दृष्टि में भी निर्मानता, वाणी में भी निर्मानता, सम्बन्ध-सम्पर्क में भी निर्मानता। ऐसे नहीं कि मेरी वृत्ति में नहीं था लेकिन बोल निकल गया। नहीं। जो वृत्ति होगी वो दृष्टि होगी, जो दृष्टि होगी वो वाणी होगी, जो वाणी होगी वही सम्बन्ध-सम्पर्क में आयेगा। चारों में ही चाहिए। तीन में है, एक में नहीं है तो भी अहंकार आने की मार्जिन है। इसको कहा जाता है फरिश्ता। तो समझा, बापदादा क्या चाहते हैं और आप क्या चाहते हो? ‘चाहना' दोनों की एक है, अभी ‘करना' भी एक करो। अच्छा!
आगे सेवा के नये-नये प्लैन क्या बनायेंगे? कुछ बनाया है, कुछ बनायेंगे। चाहे यह वर्ष, चाहे आगे का वर्ष जैसे और प्लैन सोचते हो कि भाषण भी करेंगे, सम्बन्ध-सम्पर्क भी बढ़ायेंगे, बड़े प्रोग्राम भी करेंगे, छोटे प्रोग्राम भी करेंगे ये तो सोचते ही हो लेकिन वर्तमान समय के गति प्रमाण अभी सेवा की भी फास्ट गति चाहिए। वो कैसे होगी? वाणी द्वारा, सम्बन्ध-सम्पर्क द्वारा तो सेवा कर ही रहे हो, मन्सा-सेवा भी करते हो लेकिन अभी चाहिए थोड़े समय में सेवा की सफलता ज्यादा हो। सफलता अर्थात् रिजल्ट। उसकी विधि है कि वाणी के साथ-साथ पहले अपनी स्थिति और स्थान के वायब्रेशन्स पॉवरफुल बनाओ। जैसे आपके जड़ चित्र क्या सेवा कर रहे हैं? वायब्रेशन्स द्वारा कितने भक्तों को प्रसन्न करते हैं! डबल विदेशियों ने मन्दिर देखे हैं? आपके ही तो मन्दिर हैं ना! कि सिर्फ भारत वालों के मन्दिर हैं? आपके चित्र सेवा कर रहे हैं ना! तो वाणी द्वारा भल करो लेकिन अभी ऐसी प्लैनिंग करो, वाणी के साथ-साथ वायब्रेशन की ऐसी विधि बनाओ जो वाणी और वायब्रेशन डबल काम करे। वायब्रेशन बहुतकाल रहता है। वाणी से सुना हुआ कभी-कभी कइयों को भूल भी जाता है लेकिन वायब्रेशन की छाप ज्यादा समय चलती है। जैसे आप लोग अपने जीवन में अनुभवी हो कि कोई का उल्टा वायब्रेशन अगर आपके मन में या बुद्धि में बैठ जाता है, तो उल्टा कितना समय चलता है! वायब्रेशन अन्दर बैठ जाता है ना। और बोल तो उसी समय भूल जायेगा लेकिन वायब्रेशन के रूप में मन और बुद्धि में छाप लग जाती है। और कितना समय उसी वायब्रेशन के वश, उस व्यक्ति से व्यवहार में आते हो? चाहे उल्टा हो, चाहे सुल्टा हो लेकिन वायब्रेशन मुश्किल से मिटता है।
लेकिन यह रूहानी वायब्रेशन्स फैलाने के लिए पहले अपने मन में, बुद्धि में व्यर्थ वायब्रेशन्स समाप्त करेंगे तब रूहानी वायब्रेशन फैला सकेंगे। किसी के भी प्रति अगर व्यर्थ वायब्रेशन्स धारण किये हुए हैं तो रूहानी वायब्रेशन्स नहीं फैला सकते। व्यर्थ वायब्रेशन रूहानी वायब्रेशन के आगे एक दीवार बन जाती है। चाहे सूर्य कितना भी प्रकाशमय हो, अगर सामने दीवार आ गई, बादल आ गये तो सूर्य के प्रकाश को प्रज्ज्वलित होने नहीं देते। जो पक्का वायब्रेशन है वो है दीवार और जो हल्के वायब्रेशन हैं वो है हल्के बादल या काले बादल। वो रूहानी वायब्रेशन्स को आत्माओं तक पहुँचने नहीं देंगे। जैसे सागर में कोई जाल डालकर अनेक चीजों को एक ही बार इकट्ठा कर देते हैं या कहाँ भी अपनी जाल फैलाकर एक समय पर अनेकों को अपना बना लेते हैं, तो वायब्रेशन्स एक ही समय पर अनेक आत्माओं को आकर्षित कर सकते हैं। वायब्रेशन्स वायुमण्डल बनाते हैं। तो आगे की सेवा में वृत्ति द्वारा रूहानी वायब्रेशन से साथ-साथ सेवा करो, तभी फास्ट होगी। वायब्रेशन और वायुमण्डल के साथ-साथ वाणी की भी सेवा करेंगे तो एक ही समय पर अनेक आत्माओं का कल्याण कर सकते हो।
बाकी प्रोग्राम्स के लिए आगे भी बनी बनाई स्टेज का प्रयोग और ज्यादा करो, उसको और बढ़ाओ। सम्पर्क वालों द्वारा यह सहयोग लेकर इस सेवा की वृद्धि को प्राप्त कर सकते हैं। सहयोगियों का सहयोग किसी भी विधि से बढ़ाते चलो तो स्वत: ही सेवा में सहयोगी बनने से सहज योगी बन जायेंगे। कई ऐसी आत्मायें होती हैं जो सीधा सहजयोगी नहीं बनेंगी लेकिन सहयोग लेते जाओ, सहयोगी बनाते जाओ। तो सहयोग में आगे बढ़ते-बढ़ते सहयोग उन्हों को योगी बना देता है। तो सहयोगी आत्माओं को और स्टेज पर लाओ, उन्हों का सहयोग सफल करो। समझा, क्या करना है? कोई एक आत्मा भी सहयोगी बनती है तो वह आत्मा प्रैक्टिकल में सहयोग लेने से, देने से, प्रत्यक्ष दुआओं से सहज आगे बढ़ती है और अनेकों की सेवा के निमित्त बनती है।
साथ-साथ वर्ष में मास मुकरर करो कुछ मास विशेष स्वयं के पुरुषार्थ वा श्रेष्ठ शक्ति धारण करने के अभ्यास के, जिसको आप तपस्या, रिट्रीट या भट्ठियां कहते हो। हरेक देश के प्रमाण दो-दो मास फिक्स करो, जैसी सीज़न हो। दो मास तपस्या के, दो मास छोटी-छोटी सेवाओं के, दो मास बड़े रूप की सेवाओं के ऐसे फिक्स करो। ऐसे नहीं कि 12 मास सेवा में इतने बिजी हो जाओ जो स्व की प्रगति के लिए टाइम कम मिले। जैसा देश का सीज़न हो, कई समय ऐसे होते हैं जिसमें बाहर की विशेष सेवा नहीं कर सकते, वो समय अपने प्रगति के प्रति विशेष रूप से रखो। सारा साल सेवा नहीं करो यह भी नहीं हो सकता, सारा साल सिर्फ तपस्या करो यह भी नहीं हो सकता, इसलिये दोनों को साथ-साथ लक्ष्य में रखते हुए अपने स्थान के प्रमाण मुकरर करो जिसमें सेवा और स्व की प्रगति दोनों साथ-साथ चलें।
अच्छा। इस वर्ष की सीज़न की समाप्ति है। समाप्ति में क्या किया जाता है? समाप्ति में एक तो समारोह किया जाता है और दूसरा आध्यात्मिक बातों में स्वाहा किया जाता है। तो अभी स्वाहा क्या करेंगे? एक बात विशेष मन-बुद्धि से स्वाहा करो, वाणी से नहीं, सिर्फ पढ़ लिया वह नहीं, मन-बुद्धि से स्वाहा करो। फिर देखो, स्व और सेवा में तीव्र गति कैसे होती है! तो आज की लहर है किसी भी आत्मा के प्रति व्यर्थ वायब्रेशन को स्वाहा करो। स्वाहा कर सकते हो? कि थोड़ा-थोड़ा रहेगा? ऐसे नहीं समझो कि यह है ही ऐसा तो वायब्रेशन तो रहेगा ना! कैसा भी हो लेकिन आप निगेटिव वायब्रेशन को बदल पॉजिटिव वायब्रेशन रखेंगे तो वह आत्मा भी निगेटिव से पॉजिटिव में आ ही जायेगी, आनी ही है क्योंकि जब तक यह व्यर्थ वायब्रेशन मन-बुद्धि में है, तो फास्ट गति की सेवा हो ही नहीं सकती।
वृत्ति द्वारा रूहानी वायब्रेशन्स फैलाने हैं। वृत्ति है रॉकेट, जो यहाँ बैठे-बैठे जहाँ भी चाहो, जितना भी पॉवरफुल परिवर्तन करने चाहो वह कर सकते हो। यह रूहानी रॉकेट है। जहाँ तक जितनों को पहुँचाने चाहो, उतना पॉवरफुल वृत्ति से वायब्रेशन, वायब्रेशन से वायुमण्डल बना सकते हो। चाहे वो रीयल में रांग भी हो लेकिन आप उसका रांग धारण नहीं करो। रांग को आप क्यों धारण करते हो? ये श्रीमत है क्या? समझना अलग चीज़ है। नॉलेजफुल भले बनो लेकिन नॉलेजफुल के साथ पॉवरफुल बनकर के उसको समाप्त कर दो। समझना अलग चीज़ है, समाना अलग चीज़ है, समाप्त करना और अलग चीज़ है। भल समझते हो ये रांग है, ये राइट है, ये ऐसा है। लेकिन अन्दर वह समाओ नहीं। समाना आता है, समाप्त करना नहीं आता है। ज्ञान अर्थात् समझ। लेकिन समझदार उसको कहा जाता है जिसको समझना भी आता हो और मिटाना भी आता हो, परिवर्तन करना भी आता हो।
इस वर्ष में मन और बुद्धि को बिल्कुल व्यर्थ से फ्री करो। यही फास्ट गति को साधारण गति में ले आती है इसलिए ये समाप्ति समारोह करो अर्थात् स्वाहा करो। बिल्कुल क्लीन। कैसा भी है, लेकिन क्षमा करो। शुभ भावना, शुभ कामना की वृत्ति से शुभ वायब्रेशन्स धारण करो क्योंकि लास्ट में आगे बढ़ते हुए यही वृत्ति-वायब्रेशन आपकी सेवा बढ़ायेगी, तब जल्दी से जल्दी कम से कम 9 लाख बना सकेंगे। समझा, क्या स्वाहा करना है? व्यर्थ वृत्ति, व्यर्थ वायब्रेशन स्वाहा! फिर देखो, नेचुरल योगी और नेचर में फरिश्ता बने ही हुए हैं। इस अनुभव पर रिट्रीट करो, वर्कशॉप करो “कैसे होगा, नहीं; ऐसे होगा।'' अच्छा!
सदा स्वयं को बार-बार ओरीजनल स्वरूप ‘मैं निराकारी हूँ' - ऐसे निश्चय और नशे में उड़ने वाले, सदा निर्मानता द्वारा महानता की प्राप्ति के अनुभवी आत्मायें, ऐसे निर्मान, सदा महान् और सदा आकारी निराकारी स्थिति को नेचर और नेचुरल बनाने वाले सर्व श्रेष्ठ आत्माओं को बापदादा का बहुत-बहुत-बहुत याद-प्यार और नमस्ते।
वरदान:- इस मरजीवा जीवन में सदा सन्तुष्ट रहने वाले इच्छा मात्रम् अविद्या भव
आप बच्चे मरजीवा बने ही हो सदा सन्तुष्ट रहने के लिए। जहाँ सन्तुष्टता है वहाँ सर्वगुण और सर्वशक्तियां हैं क्योंकि रचयिता को अपना बना लिया, तो बाप मिला सब कुछ मिला। सर्व इच्छायें इक्ट्ठी करो उनसे भी पदमगुणा ज्यादा मिला है। उसके आगे इच्छायें ऐसे हैं जैसे सूर्य के आगे दीपक। इच्छा उठने की तो बात ही छोड़ो लेकिन इच्छा होती भी है - यह क्वेश्चन भी नहीं उठ सकता। सर्व प्राप्ति सम्पन्न हैं इसलिए इच्छा मात्रम् अविद्या, सदा सन्तुष्ट मणि हैं।
स्लोगन:- जिनके संस्कार इज़ी हैं वे कैसी भी परिस्थिति में स्वयं को मोल्ड कर लेंगे।
31.12.2022 HINDI MURLI
मीठे बच्चे - तुम्हें शिव जयन्ति का त्योहार बड़ी धूमधाम से मनाना है। यह तुम्हारे लिए बहुत बड़ा खुशी का दिन है, सबको बाप का परिचय देना है''
प्रश्नः- कौन से बच्चे अपना बहुत बड़ा नुकसान करते हैं? घाटा कब पड़ता है?
उत्तर:- जो बच्चे चलते-चलते पढ़ाई छोड़ देते हैं, वे अपना बहुत बड़ा नुकसान करते हैं। बाबा रोज़ इतने हीरे रत्न देते हैं, गुह्य पाइंटस सुनाते हैं, अगर कोई रेगुलर नहीं सुनते हैं तो घाटा पड़ जाता है। नापास हो जाते हैं, स्वर्ग की ऊंची बादशाही गंवा देते हैं। पद भ्रष्ट हो जाता है।
गीत:- रात के राही थक मत जाना......
ओम् शान्ति। यह रात और दिन मनुष्यों के लिए हैं। शिवबाबा के लिए रात और दिन नहीं है। यह तुम बच्चों के लिए है, मनुष्यों के लिए है। ब्रह्मा की रात ब्रह्मा का दिन गाया जाता है। शिव का दिन, शिव की रात ऐसे कभी नहीं कहा जाता है। सिर्फ एक ब्रह्मा भी नहीं कहा जायेगा। एक की रात नहीं होती है। गाया जाता है ब्राह्मणों की रात। तुम जानते हो अभी है भक्ति मार्ग का अन्त, साथ-साथ घोर अन्धियारे का भी अन्त है। बाप कहते हैं - मैं आता ही तब हूँ जबकि ब्रह्मा की रात होती है। तुम अभी सवेरे के लिए चलने लग पड़े हो। जब तुम ब्रह्मा की सन्तान आकर बनते हो तब तुमको ब्राह्मण कहा जाता है। ब्राह्मणों की रात पूरी हो फिर देवताओं का दिन शुरू होता है। ब्राह्मण जाकर देवता बनेंगे। इस यज्ञ से बहुत बड़ी बदली होती है। पुरानी दुनिया बदलकर नई होती है। कलियुग है पुराना युग, सतयुग है नया युग। फिर त्रेता 25 प्रतिशत पुराना, द्वापर 50 प्रतिशत पुराना। युग का नाम ही बदल जाता है। कलियुग को सब पुरानी दुनिया कहेंगे। ईश्वर कहा जाता है बाप को, जो ईश्वरीय राज्य स्थापन करते हैं। बाप कहते हैं मैं कल्प-कल्प संगमयुग में आता हूँ। टाइम तो लगता है ना। यूँ तो है एक सेकण्ड की बात, परन्तु विकर्म विनाश होने में समय लगता है क्योंकि आधाकल्प के पाप सिर पर हैं। बाप स्वर्ग रचता है तो तुम बच्चे भी स्वर्ग के मालिक तो बनेंगे। परन्तु सिर पर जो पापों का बोझा है उनको उतारने में टाइम लगता है। योग लगाना पड़ता है। अपने को आत्मा जरूर समझना है। आगे जब बाबा कहते थे तो जिस्मानी बाप याद आता था। अभी बाबा कहने से बुद्धि ऊपर चली जाती है। दुनिया में और किसकी बुद्धि में यह नहीं होगा कि हम आत्मा रूहानी बाप की सन्तान हैं। हमारा बाप टीचर गुरू तीनों ही रूहानी हैं। याद भी उनको करते हैं। यह है पुराना शरीर, इनको क्या श्रृंगार करना है। परन्तु अन्दर में समझते हैं अभी हम वनवाह में हैं। ससुरघर नई दुनिया में जाने वाले हैं। पिछाड़ी में कुछ भी नहीं रहता है। फिर हम जाकर विश्व के मालिक बनते हैं। इस समय सारी दुनिया जैसे वनवाह में है, इसमें रखा ही क्या है, कुछ भी नहीं। जब ससुरघर था तो हीरे-जवाहरों के महल थे। माल-ठाल थे। अभी फिर पियरघर से ससुरघर जाना है। अभी तुम किसके पास आये हो? कहेंगे बापदादा के पास। बाप ने दादा में प्रवेश किया है, दादा तो है ही यहाँ का रहवासी। तो बापदादा दोनों कम्बाइण्ड हैं। परमपिता परमात्मा पतित-पावन है। उनकी आत्मा अगर श्रीकृष्ण में होती, वह ज्ञान सुनाती तो श्रीकृष्ण को भी बापदादा कहा जाता। परन्तु श्रीकृष्ण को बापदादा कहना शोभता ही नहीं। ब्रह्मा ही प्रजापिता गाया हुआ है। बाप ने समझाया है यह 5 हजार वर्ष का चक्र है। तुम बच्चे प्रदर्शनी जब दिखाते हो तो उनमें यह भी लिखो कि आज से 5 हजार वर्ष पहले भी हमने यह प्रदर्शनी दिखाई थी और समझाया था कि बेहद बाप से स्वर्ग का वर्सा कैसे लिया जाता है। आज से 5 हजार वर्ष पहले मुआफिक फिर से हम त्रिमूर्ति शिव जयन्ति मनाते हैं। यह अक्षर जरूर डालना पड़े। यह बाबा डायरेक्शन दे रहे हैं, उस पर चलना है। शिव जयन्ति की तैयारी करनी है। नई-नई बात देख मनुष्य वन्डर खायेंगे। अच्छा भभका करना चाहिए। हम त्रिमूर्ति शिव की जयन्ति मनाते हैं। छुट्टी करते हैं। शिव जयन्ति की छुट्टी आफीशियल है। कोई करते हैं, कोई नहीं करते हैं। तुम्हारा यह बहुत बड़ा दिन है। जैसे क्रिश्चियन लोग क्रिसमस मनाते हैं। बहुत खुशी मनाते हैं। अब तुमको यह खुशी मनानी चाहिए। सबको बताना है कि हम बेहद के बाप से वर्सा ले रहे हैं। जो जानते हैं वही खुशी मनायेंगे। सेन्टर्स में आपस में मिलेंगे। यहाँ तो सब आ न सकें। हम मनाते हैं जन्मदिन। शिव-बाबा का मृत्यु तो हो न सके। जैसे शिवबाबा आया है वैसे चले जायेंगे। ज्ञान पूरा हो गया। लड़ाई शुरू हो गई। बस। इनको अपना शरीर तो है नहीं। तुम बच्चों को अपने को आत्मा समझ पूरा देही-अभिमानी बनना है, इसमें मेहनत लगती है। सतयुग में तो आत्म-अभिमानी हैं। वहाँ अकाले मृत्यु नहीं होगा। यहाँ बैठे-बैठे काल आ जाता है, हार्टफेल हो जाता है। कहेंगे ईश्वर की भावी। परन्तु ईश्वर की भावी नहीं है। तुम कहेंगे ड्रामा की भावी। ड्रामा में इनका पार्ट ऐसा था। अभी तो है ही आइरन एज़, नई दुनिया गोल्डन एज़ थी। सतयुग के महल कितने हीरों से सजाये हुए होंगे। अकीचार धन होगा। परन्तु उनका पूरा वृतान्त नहीं है। कुछ अर्थक्वेक आदि होती है तो टूट-फूट पड़ती, नीचे चली जाती है तो इन बातों का बुद्धि से काम लेना है। यह खाना बुद्धि के लिए है। तुम्हारी बुद्धि ऊपर चली गई है। रचता को जानने से रचना को भी जानते हैं। सारे सृष्टि का राज़ बुद्धि में है। ड्रामा में ऊंचे ते ऊंचा है भगवान। फिर ब्रह्मा-विष्णु-शंकर हम इन तीनों का आक्यूपेशन बता सकते हैं। क्या-क्या पार्ट है? जगत-अम्बा का कितना बड़ा मेला लगता है। जगत-अम्बा, जगत-पिता का आपस में क्या सम्बन्ध है? यह कोई नहीं जानते क्योंकि यह गुप्त बात है। माँ तो यह बैठी है, वह थी एडाप्ट की हुई इसलिए चित्र उनके बने हैं। उनको जगत-अम्बा कहा जाता है। ब्रह्मा की बेटी सरस्वती। भल माँ का टाइटिल दिया है परन्तु थी तो बेटी। सही करती थी ब्रह्माकुमारी सरस्वती। तुम उनको मम्मा कहते थे। ब्रह्मा को माँ कहना शोभता नहीं। यह समझने और समझाने में बड़ी रिफाईन बुद्धि चाहिए। यह गुह्य बातें हैं। तुम किसके भी मन्दिर में जायेंगे तो झट उनका आक्यूपेशन जान लेंगे। गुरूनानक के मन्दिर में जायेंगे तो झट बता देंगे कि वह फिर कब आयेंगे? उन लोगों को कुछ पता नहीं क्योंकि कल्प की आयु लम्बी कर दी है। तुम वर्णन कर सकते हो। बाप कहते हैं देखो मैं तुमको कैसे पढ़ाता हूँ? आता कैसे हूँ? श्रीकृष्ण की तो बात ही नहीं। गीता का पाठ करते रहते हैं, कोई 18 अध्याय याद करते हैं तो उनकी कितनी महिमा हो जाती है। एक श्लोक सुनायेंगे तो कहेंगे वाह! वाह! इन जैसे महात्मा तो कोई नहीं। आजकल तो रिद्धि-सिद्धि भी बहुत है। जादू का खेल बहुत दिखाते हैं। दुनिया में ठगी बहुत है। बाप तुमको कितना सहज समझाते हैं परन्तु पढ़ने वालों पर मदार है। टीचर तो एकरस पढ़ाते हैं कोई नहीं पढ़ेंगे तो नापास होंगे। यह भी होना जरूर है। सारी राजधानी स्थापन होनी है। तुम यह ज्ञान-स्नान कर, ज्ञान का गोता लगाए परिस्तान की परी अर्थात् स्वर्ग के मालिक बन जाते हो। रात-दिन का फ़र्क है। वहाँ तत्व भी सतोप्रधान होने से शरीर भी एक्यूरेट बनता है। नेचुरल ब्युटी रहती है। वह है ईश्वर की स्थापन की हुई भूमि। अभी आसुरी भूमि है। स्वर्ग, नर्क में बहुत फर्क है। अभी तुम्हारी बुद्धि में ड्रामा के आदि-मध्य-अन्त का राज़ बैठा हुआ है, नम्बरवार पुरुषार्थ अनुसार।
बाप कहते हैं - अच्छी रीति पुरुषार्थ करो। बच्चियां नये-नये स्थान पर चक्र लगाने जाती हैं। अगर अच्छी मातायें आदि हैं तो सर्विस को जमाना पड़े। सेन्टर पर अगर कोई नहीं आते हैं तो अपना नुकसान करते हैं। कोई पढ़ने के लिए नहीं आते हैं तो उनको फिर लिखना चाहिए। तुम पढ़ते नहीं हो इससे तुमको बहुत घाटा पड़ जायेगा। रोज़-रोज़ बहुत गुह्य प्वाइंट्स निकलती हैं। यह हैं हीरे रत्न, तुम पढ़ेंगे नहीं तो नापास हो जायेंगे। इतनी ऊंची स्वर्ग की बादशाही गँवा देंगे। मुरली तो रोज़ सुननी चाहिए। ऐसे बाप को छोड़ दिया तो याद रखना, नापास हो जायेंगे, फिर बहुत रोयेंगे। खून के ऑसू बहायेंगे। पढ़ाई तो कभी नहीं छोड़नी चाहिए। बाबा रजिस्टर देखते हैं। कितने रेगुलर आते हैं। न आने वालों को फिर सावधान करना चाहिए। श्रीमत कहती है - पढ़ेंगे नहीं तो पद भ्रष्ट हो जायेंगे। बहुत घाटा पड़ जायेगा। ऐसे लिखा-पढ़ी करो - तब तुम स्कूल को अच्छी तरह उठा सकेंगे। ऐसे नहीं कोई नहीं आया तो छोड़ दिया। टीचर को ओना रहता है कि हमारे स्टूडेन्ट जास्ती नहीं पास होंगे तो इज्जत जायेगी। बाबा लिखते भी हैं तुम्हारे सेन्टर पर सर्विस कम चलती है, शायद तुम सोते रहते हो। अच्छा!
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बादादा का याद-प्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।
धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) इस पुराने शरीर का श्रृंगार नहीं करना है। वनवाह में रह नये घर में चलने की तैयारी करनी है।
2) ज्ञान स्नान रोज़ करना है। कभी भी पढ़ाई मिस नहीं करनी है।
वरदान:- महानता के साथ निर्मानता को धारण कर सर्व का मान प्राप्त करने वाले सुखदाई भव
महानता की निशानी निर्मानता है। जितना महान उतना निर्मान क्योंकि सदा भरपूर हैं। जैसे वृक्ष जितना भरपूर होगा उतना झुका हुआ होगा। तो निर्मानता ही सेवा करती है और जो निर्मान रहता है वह सर्व द्वारा मान पाता है। जो अभिमान में रहता है उसको कोई मान नहीं देता, उससे दूर भागते हैं। जो निर्मान हैं वे सुखदायी होंगे। उनसे सभी सुख की अनुभूति करेंगे। सभी उनके समीप आना चाहेंगे।
स्लोगन:- उदासी को तलाक देने के लिए खुशियों का खजाना सदा साथ रखो।
मातेश्वरी जी के मधुर महावाक्य
गीत:- नयनहीन को राह दिखाओ प्रभु ... अब यह जो
मनुष्य गीत गाते हैं नयनहीन को राह बताओ, तो गोया राह
दिखाने वाला एक ही परमात्मा ठहरा, तभी तो परमात्मा
को बुलाते हैं और जिस समय कहते हैं प्रभु राह बताओ तो जरुर मनुष्यों को राह दिखाने
के लिये खुद परमात्मा को निराकार रूप से साकार रूप में अवश्य आना पड़ेगा, तभी तो स्थूल में राह बतायेगा, आने बिगर राह तो बता नहीं सकेंगे। अब मनुष्य जो मूंझे हुए हैं, उन मूंझे हुए को राह चाहिए इसलिए परमात्मा को कहते हैं
नयनहीन को राह बताओ प्रभु... इसको ही फिर खिवैया भी कहा जाता है, जो उस पार अथवा इन 5 तत्वों की जो बनी हुई सृष्टि है इससे
पार कर उस पार अर्थात् 5 तत्वों से पार जो छट्ठा तत्व अखण्ड ज्योति महतत्व है
उसमें ले चलेगा। तो परमात्मा भी जब उस पार से इस पार आवे तभी तो ले चलेगा। तो
परमात्मा को भी अपने धाम से आना पड़ता है, तभी तो परमात्मा
को खिवैया कहते हैं। वही हम बोट को (आत्मा रूपी नांव को) पार ले चलता है। अब जो
परमात्मा के साथ योग रखता है उनको साथ ले जायेगा। बाकी जो बच जायेंगे वे धर्मराज
की सजायें खाकर बाद में मुक्त होते हैं।
2) कांटों की दुनिया से ले चलो फूलों की छांव
में, अब यह बुलावा सिर्फ परमात्मा के लिये कर रहे
हैं। जब मनुष्य अति दु:खी होते हैं तो परमात्मा को याद करते हैं, परमात्मा इस कांटों की दुनिया से ले चल फूलों की छांव में,
इससे सिद्ध है कि जरूर वो भी कोई दुनिया है। अब यह तो सभी
मनुष्य जानते हैं कि अब का जो संसार है वो कांटों से भरा हुआ है। जिस कारण मनुष्य
दु:ख और अशान्ति को प्राप्त कर रहे हैं और याद फिर फूलों की दुनिया को करते हैं।
तो जरूर वो भी कोई दुनिया होगी जिस दुनिया के संस्कार आत्मा में भरे हुए हैं। अब
यह तो हम जानते हैं कि दु:ख अशान्ति यह सब कर्मबन्धन का हिसाब किताब है। राजा से
लेकर रंक तक हर एक मनुष्य मात्र इस हिसाब में पूरे जकड़े हुए हैं इसलिए परमात्मा
तो खुद कहता है अब का संसार कलियुग है, तो वो सारा
कर्मबन्धन का बना हुआ है और आगे का संसार सतयुग था जिसको फूलों की दुनिया कहते
हैं। अब वो है कर्मबन्धन से रहित जीवनमुक्त देवी देवताओं का राज्य, जो अब नहीं है। अब यह जो हम जीवनमुक्त कहते हैं, तो इसका मतलब यह नहीं कि हम कोई देह से मुक्त थे, उन्हों को कोई देह का भान नहीं था, मगर वो देह में होते हुए भी दु:ख को प्राप्त नहीं करते थे, गोया वहाँ कोई भी कर्मबन्धन का मामला नहीं है। वो जीवन लेते,
जीवन छोड़ते आदि मध्य अन्त सुख को प्राप्त करते थे। तो
जीवनमुक्ति का मतलब है जीवन होते कर्मातीत, अब यह सारी दुनिया 5 विकारों में पूरी जकड़ी हुई है, मानो 5 विकारों का पूरा पूरा वास है, परन्तु मनुष्य
में इतनी ताकत नहीं है जो इन 5 भूतों को जीत सके, तब ही परमात्मा खुद आकर हमें 5 भूतों से छुड़ाते हैं और भविष्य प्रालब्ध देवी
देवता पद प्राप्त कराते हैं। अच्छा - ओम् शान्ति।
30.12.2022 HINDI MURLI
मीठे बच्चे - दूरदेश से बाप आये हैं धर्म और राज्य दोनों की स्थापना करने, जब देवता धर्म है तो राजाई भी देवताओं की है, दूसरा धर्म वा राज्य नहीं
प्रश्नः- सतयुग में सब पुण्य आत्मायें हैं, कोई पाप आत्मा नहीं, उसकी निशानी क्या है?
उत्तर:- वहाँ कोई कर्मभोग (बीमारी) आदि नहीं होता है। यहाँ बीमारियाँ आदि सिद्ध करती हैं कि आत्मायें पापों की सज़ा कर्मभोग के रूप में भोग रही हैं, जिसे ही पास्ट का हिसाब-किताब कहा जाता है।
प्रश्नः- बाप के किस इशारे को दूरादेशी बच्चे ही समझ सकते हैं?
उत्तर:- बाप इशारा करते हैं - बच्चे तुम बुद्धियोग की दौड़ी लगाओ। यहाँ बैठे बाप को याद करो। प्यार से याद करेंगे तो तुम बाप के गले का हार बन जायेंगे। तुम्हारे प्रेम के ऑसू माला का दाना बन जाते हैं।
गीत:- आखिर वह दिन आया आज....
.ओम् शान्ति। बच्चों ने गीत सुना। गीत का अर्थ समझा। भारत तो बहुत बड़ा है। सारे भारत को नहीं पढ़ाया जा सकता है। यह तो पढ़ाई है - कॉलेज खुलते जायेंगे। यह हुई बेहद के बाप की युनिवर्सिटी। इनको कहा जाता है - पाण्डव गवर्मेन्ट। गवर्मेन्ट कहा जाता है सावरन्टी को। अब तुम बच्चे जानते हो - सावरन्टी स्थापन हो रही है। धर्म पलस सावरन्टी। रिलीजो पोलीटिकल... देवी-देवता धर्म भी स्थापन हो रहा है और कोई भी धर्म वाले राजाई नहीं स्थापन करते। वह सिर्फ धर्म स्थापन करते हैं। बाबा कहते हैं मैं आदि सनातन धर्म और राजाई स्थापन कर रहा हूँ, इसलिए रिलीजो पोलीटिकल कहा जाता है। बच्चों को बहुत दूरादेश बुद्धि बनना चाहिए। बाप दूरदेश से आये हुए हैं। यूँ दूरदेश से तो सब आत्मायें आती हैं। तुम भी दूरदेश से आये हो। नया धर्म जो स्थापन करने आते हैं - उनकी आत्मायें दूर से आती हैं। वह है धर्म स्थापक और इसको कहा जाता है धर्म और सावरन्टी स्थापक। भारत में सावरन्टी थी। महाराजा-महारानी थे। महाराजा श्री नारायण, महारानी श्री लक्ष्मी। तो अब तुम बच्चे कहेंगे हम श्रीमत पर चल रहे हैं। बाबा, जिसको हम सब भारतवासी पुकारते आये हैं कि आओ - आकर पुरानी दुनिया को बदल नई सुख की दुनिया स्थापन करो। पुराने घर और नये घर में अन्तर तो होता है ना। बुद्धि में नया मकान ही याद रहता है। आजकल तो मकान बहुत फैशनबुल बनते हैं। ख्याल करते रहते हैं - ऐसा-ऐसा मकान बनायें। तुम जानते हो हम अपना धर्म और राजाई स्थापन कर रहे हैं। स्वर्ग में हम हीरे-जवाहरों के महल बनायेंगे। दूसरे धर्म वाले ऐसे नहीं समझते। जैसे क्राइस्ट क्रिश्चियन धर्म स्थापन करने आया, यह उस समय नहीं समझते, जब वृद्धि होती है तब नाम रखते हैं क्रिश्चियन धर्म। इस्लामी आदि धर्म कोई भी निशानी वा नाम नहीं रहता। तुम्हारी निशानी शुरू से लेकर अभी तक चलती रहती है। लक्ष्मी-नारायण के चित्र हैं - यह भी जानते हो तो इन्हों का राज्य सतयुग में था। तुमको यह ज्ञान वहाँ नहीं होगा कि पास्ट में किसकी राजधानी थी, फ्यूचर में किसकी राजधानी होगी। सिर्फ प्रेजेन्ट को जानते हैं, बस। अभी तुम पास्ट, प्रेजेन्ट, फ्युचर को जानते हो। पहले-पहले हमारा धर्म था, फिर यह धर्म आये हैं। संगम पर ही बाप बैठ समझाते हैं। अभी तुम त्रिकालदर्शी बन गये हो। सतयुग में त्रिकालदर्शी नहीं होंगे। वहाँ तो राजाई करते रहेंगे और धर्मों का नाम-निशान नहीं रहेगा। अपनी मौज में राजाई करते रहेंगे।
अभी तुम सारे चक्र को जानते हो। मनुष्य यह तो नहीं जानते हैं कि बरोबर देवी-देवता धर्म था। परन्तु वह कैसे स्थापन हुआ, कितना समय चला - यह नहीं जानते हैं। तुम जानते हो सतयुग में इतने जन्म राज्य किया फिर त्रेता में इतने जन्म लिये। इन्हों को भी जानना पड़ेगा। बच्चे जानते हैं बरोबर बेहद का बाप हमको पढ़ाते हैं। तुम जानते हो कृष्ण की आत्मा का यह बहुत जन्मों के अन्त का जन्म है, इनमें ही आकर प्रवेश किया है। इनका नाम ब्रह्मा जरूर चाहिए। ब्रह्मा सो विष्णु, विष्णु सो ब्रह्मा। यह त्रिमूति की नॉलेज बहुत सिम्पुल है। यह निराकार बाप शिव, इनसे यह वर्सा मिलता है। निराकार से वर्सा कैसे मिला - यह प्रजापिता ब्रह्मा द्वारा ब्राह्मण सो देवता बन रहे हैं। फिर वही देवतायें 84 जन्मों के बाद ब्राह्मण बनते हैं। यह चक्र बुद्धि में रहना चाहिए। हम सो ब्राह्मण, ब्रह्मा के बच्चे सो रूद्र (शिव) के बच्चे। हम आत्मायें निराकारी बच्चे हैं। बाप को याद करते हैं। इन चित्रों पर समझाना बहुत सहज है। तपस्या कर रहे हैं फिर सतयुग में आयेंगे। तुम्हारी बुद्धि में रहना चाहिए - हम मनुष्य से देवता बन रहे हैं। फिर देवता धर्म का बादशाह बन राज्य करेंगे। योग से ही तुम्हारे विकर्म विनाश होंगे। अगर अभी भी पाप करते रहेंगे तो क्या बनेंगे। यात्रा पर जब जाते हैं तो पाप नहीं करते हैं। पवित्र भी जरूर रहते हैं। समझते हैं देवताओं के पास जाते हैं। मन्दिर में भी हमेशा स्नान करके जाते हैं। स्नान क्यों करते हैं? एक तो विकार में जाते हैं, दूसरा लेट्रीन में जाते हैं। फिर स्वच्छ बनकर देवताओं का दर्शन करने जाते हैं। यात्रा पर कब पतित नहीं बनते। 4 धामों की परिक्रमा पावन होकर देते हैं। तो पवित्रता है मुख्य। देवतायें भी अगर पतित होते तो फ़र्क क्या रहा। देवतायें पावन हैं, हम पतित हैं। तुम जानते हो बाबा ने हमको ब्रह्मा द्वारा गोद लिया है। यूँ तो तुम सब आत्मायें हमारे बच्चे हो, परन्तु तुमको पढ़ाऊं कैसे? राजयोग कैसे सिखलाऊं? तुम मीठे-मीठे बच्चों को स्वर्ग का मालिक कैसे बनाऊं? तुम जानते हो बाबा नई दुनिया स्थापन करते हैं। तो भगवान जरूर बच्चों को लायक बनाकर वर्सा देंगे। कहाँ लायक बनायेंगे? संगमयुग में। बाप कहते हैं, मैं संगम पर आता हूँ। यह बीच का ब्राह्मण धर्म ही अलग हो जाता है। कलियुग में है शूद्र धर्म। सतयुग में है देवता धर्म। यह है ब्राह्मण धर्म। तुम ब्राह्मण धर्म के हो। यह संगमयुग बहुत छोटा है। अभी तुम सारे चक्र को जान गये हो। दूरादेशी बन गये हो।
तुम जानते हो यह बाबा का रथ है, इनको नंदीगण भी कहते हैं। सारा दिन सवारी थोड़ेही होती है। आत्मा शरीर पर सारा दिन सवारी करती है। अलग हो जाए तो शरीर न रहे। बाबा तो आ-जा सकता है क्योंकि उनकी अपनी आत्मा है। तो मैं इनमें सदैव नहीं रहता हूँ, सेकण्ड में आ-जा सकता हूँ। मेरे जैसा तीखा राकेट कोई हो नहीं सकता। आजकल राकेट, एरोप्लेन आदि कितनी चीज़ें बनाई हैं। परन्तु सबसे तीखी आत्मा है। तुम बाप को याद करो - यह आया। आत्मा को हिसाब-किताब अनुसार लण्डन में जन्म लेना होगा तो सेकण्ड में वहाँ जाकर गर्भ में प्रवेश करेगी। तो सबसे तीखी दौड़ी पहनने वाली आत्मा है। अभी आत्मा अपने घर में जा नहीं सकती क्योंकि वह ताकत ही नहीं रही है। कमजोर हो गई है, उड़ नहीं सकती। आत्मा पर पापों का बोझ बहुत है, शरीर पर अगर बोझा होता तो आग से पवित्र हो जाता, परन्तु आत्मा में ही खाद पड़ती है। तो आत्मा ही साथ में हिसाब-किताब ले जाती है इसलिए कहा जाता है - पास्ट का कर्मभोग है। आत्मा संस्कार साथ में ले जाती है। कोई जन्म से लंगड़ा होता है तो कहा जाता है पास्ट में ऐसे कर्म किये हैं। जन्म-जन्मान्तर के कर्म हैं जो भोगने पड़ते हैं। सतयुग में है ही पुण्य आत्मा। वहाँ यह बातें होती नहीं। यहाँ हैं सब पाप आत्मायें। संन्यासियों को भी अर्धांग (लकवा) हो जाए तो कहेंगे कर्मभोग। अरे महात्मा श्री श्री 108 जगतगुरू को फिर यह बीमारी क्यों? कहेंगे कर्मभोग। देवताओं के लिए ऐसे नहीं कहेंगे। गुरू मरेगा तो फालोअर्स को जरूर अ़फसोस होगा। बाप पर भी जास्ती लव होता है तो रोते हैं। स्त्री का पति से जास्ती लव होगा तो रोयेगी। पति दु:खी करने वाला होगा तो नहीं रोयेगी। मोह नहीं होगा तो समझेगी भावी। तुम्हारा भी बाप के साथ बहुत लव है। पिछाड़ी में बाबा चला जायेगा - तुम कहेंगे ओहो! बाबा चला गया, जिसने इतना सुख दिया! पिछाड़ी में बहुत रहते हैं। बाप से बहुत लव रहता है। तुम कहेंगे बाबा हमको राजाई देकर चला गया। प्रेम के ऑसू आयेंगे, दु:ख के नहीं। यहाँ भी बच्चे बहुत समय के बाद आकर बाप से मिलते हैं तो प्रेम के ऑसू आते हैं। यह प्रेम के ऑसू फिर माला का दाना बन जायेंगे। हमारा पुरुषार्थ ही है कि हम बाबा के गले का हार बनें, इसलिए बाबा को याद करते रहते हैं।
बाबा का फरमान है - याद की यात्रा करते रहो। जैसे दौड़ाया जाता है फलाने स्थान को हाथ लगाकर आओ, फिर नम्बरवार होता है। यहाँ भी जितना बाबा को जास्ती याद करेंगे, जो पहले दौड़ी लगाकर जायेंगे वही फिर पहले स्वर्ग में लौट आकर राज्य करेंगे। तुम सब आत्मायें बुद्धि के योग से दौड़ रही हो। यहाँ बैठे हुए वहाँ दौड़ रही हो। हम शिव-बाबा के बच्चे हैं। बाबा इशारा करते हैं - मुझे याद करो, दूरादेशी बनो। तुम दूरदेश से आये हो। अब यह पराया देश विनाश हो जायेगा। इस समय तुम रावण के देश में हो, यह धरनी रावण की है। फिर तुम बेहद के बाप की धरनी पर आयेंगे। वहाँ है रामराज्य। रामराज्य बाप स्थापन करते हैं। फिर आधा में रावण राज्य ड्रामा अनुसार नूँधा हुआ है। यह सब बातें तुम बच्चे ही जानते हो इसलिए तुम प्रश्न पूछते हो, कोई नहीं बता सकेगा। अगर कहे आत्मा का फादर, गॉड फादर है। अच्छा - तुमको उनसे क्या वर्सा मिलना चाहिए? यह है पतित दुनिया। बाप ने पतित दुनिया तो नहीं रची है ना। कोई को भी समझाना बहुत सहज है। चित्र दिखाना पड़े। त्रिमूति का चित्र कितना अच्छा है। ऐसा कायदे अनुसार त्रिमूति शिव का चित्र कहाँ है नहीं। ब्रह्मा को दाढ़ी दिखाते हैं। विष्णु और शंकर को नहीं दिखाते हैं। उनको देवता समझते हैं। ब्रह्मा तो प्रजापिता है। कोई ने कैसे, कोई ने कैसे बनाया है। अभी तुम बच्चों की बुद्धि में यह सब बातें हैं, और कोई की बुद्धि में नहीं आता है। जैसे बांवरे हैं। रावण को क्यों जलाते हैं - कुछ पता ही नहीं। रावण है कौन? कब से आया? कह देते हैं अनादि काल से जलाते हैं। तुम समझते हो - यह आधाकल्प का दुश्मन है। दुनिया में अनेक मतें हैं, जिसने जो समझाया वह नाम रख दिया। कोई ने महावीर नाम डाल दिया। अब महावीर तो हनूमान को दिखाते हैं। यहाँ आदि देव महावीर नाम क्यों रखा है? मन्दिर में महावीर, महावीरनी और तुम बच्चे बैठे हो। उन्होंने माया पर जीत पाई है इसलिए महावीर कहा जाता है। तुम भी अनायास ही अपनी जगह पर आकर बैठे हो। वह तुम्हारा यादगार है। वह है जड़। फिर भी चित्र जरूर लगाना पड़े, जब तक चैतन्य के पास आकर समझें। देलवाड़ा मन्दिर का राज़ बहुत अच्छा समझा सकते हो। यह पढ़कर गये हैं तब भक्ति मार्ग में यह यादगार बने हैं। तुम्हारी राजधानी स्थापन करने में बड़ी मेहनत लगती है। गालियाँ भी खानी पड़ती हैं क्योंकि कलंगीधर बनना है। अभी तुम सब गाली खाते हो। सबसे जास्ती ग्लानि मेरी की है। फिर प्रजापिता ब्रह्मा को भी गाली देते हैं। मित्र सम्बन्धी आदि सब बिगड़ पड़ते हैं। विष्णु वा शंकर को थोड़ेही गाली देंगे। बाप कहते हैं - मैं गाली खाता हूँ। तुम बच्चे बने हो तो तुमको भी हिस्सा लेना पड़ता है। नहीं तो यह अपने धन्धे में था, गाली की बात ही नहीं। सबसे जास्ती गाली मुझे देते हैं। अपना धर्म-कर्म भूल गये हैं। कितना समझाते हैं। अच्छा!
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।
धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) दूरादेशी बनना है। याद की यात्रा से विकर्मों का विनाश करना है। यात्रा पर कोई भी पाप कर्म नहीं करने हैं।
2) महावीर बन माया पर जीत पानी है। ग्लानि से डरना नहीं है, कलंगीधर बनना है।
वरदान:- सर्व शक्तियों का अनुभव करते हुए समय पर सिद्धि प्राप्त करने वाले निश्चित विजयी भव
सर्व शक्तियों से सम्पन्न निश्चयबुद्धि बच्चों की विजय निश्चित है ही। जैसे किसी के पास धन की, बुद्धि की वा सम्बन्ध-सम्पर्क की शक्ति होती है तो उसे निश्चय रहता है कि यह क्या बड़ी बात है! आपके पास तो सब शक्तियां हैं। सबसे बड़ा धन अविनाशी धन सदा साथ है, तो धन की भी शक्ति है, बुद्धि और पोजीशन की भी शक्ति है, इन्हें सिर्फ यूज़ करो, स्व के प्रति कार्य में लगाओ तो समय पर विद्धि द्वारा सिद्धि प्राप्त होगी।
स्लोगन:- व्यर्थ देखने वा सुनने का बोझ समाप्त करना ही डबल लाइट बनना है।
29.12.2022 Hindi Murli मीठे बच्चे - दूरदेश से बाप आये हैं धर्म और राज्य दोनों की स्थापना करने, जब देवता धर्म है तो राजाई भी देवताओं की है, दूसरा धर्म वा राज्य नहीं प्रश्नः- सतयुग
में सब पुण्य आत्मायें हैं, कोई पाप आत्मा
नहीं, उसकी निशानी क्या है? उत्तर:- वहाँ कोई कर्मभोग (बीमारी) आदि नहीं होता है। यहाँ बीमारियाँ आदि सिद्ध करती हैं कि आत्मायें पापों की सज़ा कर्मभोग के रूप में भोग रही हैं, जिसे ही पास्ट का हिसाब-किताब कहा जाता है। प्रश्नः- बाप के किस इशारे को दूरादेशी बच्चे ही समझ सकते हैं? उत्तर:- बाप इशारा करते हैं - बच्चे तुम बुद्धियोग की दौड़ी लगाओ। यहाँ बैठे बाप को याद करो। प्यार से याद करेंगे तो तुम बाप के गले का हार बन जायेंगे। तुम्हारे प्रेम के ऑसू माला का दाना बन जाते हैं। गीत:- आखिर वह दिन आया आज..... |
स्लोगन:- विघ्न-विनाशक
वही बनता है जो सर्व शक्तियों से सम्पन्न है। |
28.12.2022 HINDI MURLI
“मीठे बच्चे - बेहद के बाप से तुम बहुत ऊंची पढ़ाई पढ़ रहे हो, बुद्धि में है पतित-पावन गॉड फादर के हम स्टूडेन्ट हैं, नई दुनिया के लिए पढ़ रहे हैं''
प्रश्नः- रूहानी गवर्मेन्ट से इज़ाफा किन बच्चों को मिलता है?
उत्तर:- जो बहुतों को आप समान बनाने की मेहनत करते हैं। सर्विस का सबूत निकालते हैं उन्हें रूहानी गवर्मेन्ट बहुत बड़ा इज़ाफा देती है। वह भविष्य 21 जन्मों के लिए ऊंच पद के अधिकारी बनते हैं।
ओम् शान्ति। बाप कहते हैं बच्चों को कि मेरे द्वारा तुम मीठे-मीठे बच्चे पढ़ाई पढ़ रहे हो। यह पढ़ाई है ही नई दुनिया के लिए और कोई ऐसा कह न सके कि हम नई दुनिया के लिए पढ़ रहे हैं। जितना अच्छी रीति पढ़ेंगे उतनी प्रालब्ध 21 जन्मों के लिए तुम्हारी जमा हो जायेगी। बेहद के बाप से बेहद की पढ़ाई पढ़ रहे हैं। यह बेहद की बहुत ऊंची पढ़ाई है। बाकी तो सब पाई-पैसे की पढ़ाई है। तो इस बेहद की पढ़ाई में जितना तुम पुरुषार्थ करेंगे उतना ऊंच पद पायेंगे। तुम्हारी बुद्धि में सदैव यह बातें रहनी चाहिए कि हम पतित-पावन गॉड फादर के स्टूडेन्ट हैं और नई दुनिया के लिए पढ़ रहे हैं तो तुमको कितना अच्छा पुरुषार्थ करना चाहिए कि हम पढ़कर पहले बाबुल के पास जायेंगे फिर अपनी-अपनी पढ़ाई अनुसार जाकर नई दुनिया में पद पायेंगे। वह है लौकिक पढ़ाई, यह है पारलौकिक पढ़ाई अर्थात् परलोक के लिए पढ़ाई। यह तो पुराना पतित लोक है। तुम जानते हो हम नर्कवासी से स्वर्गवासी बन रहे हैं। यह घड़ी-घड़ी याद पड़ना चाहिए तब तुम्हारे दिमाग में खुशी चढ़ेगी। शादी आदि में जाने से बहुत बच्चे भूल जाते हैं। पढ़ाई कभी भूलना नहीं चाहिए और ही खुशी रहनी चाहिए। हम भविष्य 21 जन्मों के लिए स्वर्ग के मालिक बनते हैं। जो अच्छी तरह बहुतों को आप समान बनाते हैं, वह फिर जरूर ऊंच पद पायेंगे। यह राज़ और कोई की बुद्धि में बैठ न सके। सर्विस करने का भी अक्ल होता है। डिपार्टमेंट अलग-अलग होती हैं। स्लाइड बनाने वालों को भी बाबा कहते हैं कि स्लाइड एक ही साइज़ में हो जो कोई भी प्रोजेक्टर में चल सके। पहले-पहले स्लाइड हो परमपिता परमात्मा से तुम्हारा क्या सम्बन्ध है? तो वह समझ जायें कि परमपिता परमात्मा हमारा बाप है। उनसे वर्सा क्या मिलता है? फिर दिखाना है त्रिमूर्ति ब्रह्मा द्वारा हमको यह सूर्यवंशी पद मिलता है। तुम भी पुरुषार्थ कर रहे हो नई दुनिया के लिए। अभी तुम हो संगम पर, पावन दुनिया बनाते हो। तुम्हारी बुद्धि में अब स्मृति आ गई है। बरोबर हम 5 हजार वर्ष पहले देवी-देवता थे। फिर राज्य गँवाया। बाकी यह राजाई आदि लेते हैं। वह सब हद की बातें हैं। तुम्हारी है बेहद की लड़ाई, श्रीमत पर तुम 5 विकार रूपी रावण के साथ लड़ते हो। तुम जानते हो ड्रामा में हार जीत का पार्ट है। हर 5 हजार वर्ष के बाद यह ड्रामा का चक्र फिरता है। तो अब तुम बच्चों को श्रीमत पर चलना पड़े, जिसको जो डायरेक्शन मिले। बच्चे कहते हैं हम समझते हैं परन्तु किसको समझा नहीं सकते। यह तो ऐसे हुआ जैसे समझा नहीं है। जितना खुद समझा हुआ है उतना ही पद पायेंगे। बुद्धि में स्वदर्शन चक्र फिरता ही रहे। स्वदर्शन चक्रधारी तुम बनते हो। दूसरे को अगर आप समान नहीं बनाया तो सर्विसएबुल नहीं ठहरे, इसलिए पूरा पुरुषार्थ करना चाहिए। औरों को भी सिखाना है। ब्राह्मणियों को हर एक के ऊपर मेहनत करनी है। टीचर्स बहुत मेहनत करती हैं तब तो इज़ाफा मिलता है। तुमको तो बहुत बड़ी गवर्मेंन्ट से इज़ाफा मिलता है। सर्विस का सबूत निकालना है। ग़फलत नहीं करनी चाहिए। यहाँ एक क्लास में हर प्रकार की पढ़ाई होती है। तुम जानते हो हम भविष्य में जाकर देवी-देवता बनेंगे। विनाश भी जरूर होना है। जैसे कल्प पहले स्वर्ग में मकान आदि बनाये थे वही फिर बनायेंगे। ड्रामा मदद करते हैं। वहाँ तो बड़े-बड़े महल बड़े-बड़े तख्त बनाते हैं। यहाँ थोड़ेही इतने बड़े महल सोने-चाँदी आदि के हैं। वहाँ तो हीरे-जवाहरात पत्थरों के मिसल होंगे। भक्ति में ही इतने हीरे-जवाहरात होते हैं तो सतयुग आदि में क्या नहीं होगा। भल करके साहूकार लोग यहाँ राधे-कृष्ण अथवा लक्ष्मी-नारायण आदि को सजाते हैं। सोने के जेवर आदि पहनाते हैं। बाबा को याद है - एक सेठ था उसने बोला लक्ष्मी-नारायण का मन्दिर बनाता हूँ, उसके लिए नये जेवर बनाने हैं। उस समय तो बहुत सस्ताई थी। तो सतयुग में क्या होगा। भक्ति मार्ग में बहुत माल थे, जो सब लूटकर ले गये। अब तुम बच्चों को सारा मालूम पड़ गया है। यह पढ़ाई है बहुत ऊंची। छोटे-छोटे बच्चों को भी सिखलाना चाहिए। राजविद्या के साथ यह भी विद्या देते रहो। शिवबाबा की याद दिलाते रहो। चित्रों पर समझाओ। बच्चों का भी कल्याण करो। शिवबाबा स्वर्ग का रचयिता है। तुम शिवबाबा को याद करेंगे तो स्वर्ग के मालिक बनेंगे। अविनाशी ज्ञान का विनाश तो होता नहीं है। थोड़ा भी सुनाने से राजधानी में आ जायेंगे। सतयुग में लक्ष्मी-नारायण का राज्य था। वह फिर कहाँ गया? हम तुमको समझाते हैं गोया तुमको उस स्वर्ग के मालिक बना देंगे। सिखाने से सीख जायेंगे, मेहनत करनी है। फालतू बातों में टाइम वेस्ट नहीं करना चाहिए। ग़फलत करने से बहुत पछतायेंगे। बाप धन कमाकर बच्चों को देकर जाते हैं। अभी तो सबका विनाश होना है। अभी भी कितने लड़ाई-झगड़े मौत आदि होते रहते हैं। यह कुछ नहीं है। अभी करोड़ों की अन्दाज़ में विनाश होगा, सब जल मर खत्म हो जाने हैं। कब्रिस्तान बनना है तब फिर परिस्तान बनेगा। कब्रिस्तान तो बड़ा है परिस्तान तो छोटा होगा। मुसलमान भी कहते हैं सब कब्रदाखिल हैं। खुदा आकर सबको जगाते हैं और वापिस ले जाते हैं। इस समय सब आत्मायें कोई न कोई रूप में हैं। कब्र में शरीर पड़ा है, बाकी आत्मा जाकर दूसरा शरीर लेती है। इस समय माया ने सबको कब्रदाखिल कर रखा है। सब मरे पड़े हैं। खत्म होने वाले हैं इसलिए किसी से दिल नहीं लगानी है। दिल लगानी है एक के साथ। आखरीन में तुम्हारा सबसे ममत्व मिट जायेगा। एक बाप को याद करना है बस। तुम समझते हो हम यह पढ़ाई भविष्य 21 जन्मों के लिए पतित-पावन बाप के द्वारा पढ़ रहे हैं। परमपिता परमात्मा मनुष्य सृष्टि का बीजरूप है, चैतन्य है। आत्मा भी चैतन्य है। जब तक आत्मा शरीर में न आये तो शरीर जड़ है। आत्मा ही चैतन्य है। अभी आत्मा को ज्ञान मिला है। हर एक आत्मा में अपना-अपना पार्ट नूँधा हुआ है। हर एक की एक्ट अपनी-अपनी है। वन्डरफुल ड्रामा है, इसको कुदरत कहा जाता है। इतनी छोटी सी आत्मा में कितना पार्ट नूँधा हुआ है। यह रूहानी बातें जो सुप्रीम रूह बैठ तुमको समझाते हैं। सैर कराते हैं, यह भी ड्रामा बना हुआ है, जो ड्रामा में नूँध है, उसका साक्षात्कार कराते रहते हैं। भल खेल पहले से ही अनादि बना हुआ है परन्तु मनुष्य नहीं जानते यह अनादि है। तुम तो सब कुछ जानते हो। जो कुछ होता है, एक सेकण्ड के बाद वह पास्ट हो जायेगा। जो पास्ट हो जाता है, तुम समझते हो यह ड्रामा में था। बाप ने समझाया है - सतयुग से लेकर क्या-क्या पार्ट हुआ है। यह बातें दुनिया नहीं जानती। बाप कहते हैं मेरी बुद्धि में जो नॉलेज है, वह तुमको दे रहा हूँ। तुमको भी आप समान बनाता हूँ। यह तो जानते हो सारी दुनिया भ्रष्टाचारी है। अब पहले-पहले पावन बनना और बनाना है। तुम्हारे सिवाए कोई पवित्र बना न सके।
अब बाप की श्रीमत पर चल दैवीगुण धारण करने हैं। बहुत मीठा बोलना है। कोई भी कड़ुआ बोल न निकले। सब पर रहम करना है। तुम सबको सिखला सकते हो - भगवानुवाच मनमनाभव। उनको यह पता नहीं है कि भगवान कौन है और उसने कब गीता सुनाई। तुम अभी समझते हो भगवानुवाच - अशरीरी बनो। देह के सब धर्म, मैं मुसलमान हूँ, पारसी हूँ, यह सब छोड़ दो। यह कौन कहते हैं? आत्मायें तो सभी आपस में भाई-भाई हैं। एक बाप के बच्चे हैं। आत्मायें अपने भाईयों को समझाती हैं कि बाप कहते हैं मामेकम् याद करो तो तुम मुक्तिधाम में जायेंगे। सब निर्वाण-धाम जाने वाले हैं। दो अक्षर भी याद कर समझाना चाहिए। भगवान सबका एक है। श्रीकृष्ण तो हो न सके। अब बाप कहते हैं देह के सभी धर्म त्याग मामेकम् याद करो। आत्मा प्रकृति का आधार लेकर यहाँ पार्ट बजाती है। क्राइस्ट के लिए भी कहते हैं कि अभी वह बेगर है। सभी की पुरानी जुत्ती है। क्राइस्ट ने भी जरूर पुनर्जन्म लिया होगा। अभी तो लास्ट जन्म में होगा। इन मैसेन्जर्स को भी बाप ही आकर जगाते हैं। पतितों को पावन बनाने वाला एक ही बाप है। सभी को पुनर्जन्म लेते-लेते नीचे आना ही है। अभी कलियुग का अन्त है। आगे चलकर यह भी मानेंगे। आवाज निकलेगा कि बाप आया हुआ है। महाभारी लड़ाई में भगवान का नाम है ना। परन्तु नाम बदली कर दिया है। विनाश और स्थापना यह तो भगवान का ही काम है। बाप ही आकर स्वर्ग के द्वार खोलेंगे। तुम बुलाते हो बाबा आओ, आकर वैकुण्ठ का द्वार खोलो। तुम्हारे द्वारा बाप आकर द्वार खोलते हैं। तुम्हारा नाम बाला है - शिव शक्ति सेना। तुमको पाण्डव क्यों कहते हैं क्योंकि तुम रूहानी पण्डे हो, स्वर्ग का रास्ता बताते हो। बाप बैठ सभी शास्त्रों का सार बताते हैं। इन बातों को समझेंगे वही जिन्होंने कल्प पहले समझा है। हम आत्मायें पण्डे हैं सबको शान्तिधाम में ले जायेंगे फिर सुखधाम में आना है। दु:खधाम का विनाश होना है - इसके लिए यह महाभारत लड़ाई है। तुम्हारी बुद्धि में सारी डिटेल है। मनमनाभव, मध्याजीभव इनमें सारा ज्ञान आ जाता है। जैसे बाबा नॉलेजफुल है, तुम बच्चे भी बनते हो। सिर्फ दिव्य दृष्टि की चाबी मैं अपने पास रखता हूँ। इसके बदले फिर तुमको विश्व का मालिक बनाता हूँ। मैं नहीं बनता हूँ। यह फ़र्क रहता है। दिव्य दृष्टि का पार्ट भी तुम्हारे काम में आता है। भावना के भूगरे (चने) दे देते हैं। बाबा ने समझाया है - जगत अम्बा का कितना मेला लगता है। लक्ष्मी का इतना मेला नहीं लगता। कितना फ़र्क है। लक्ष्मी के चित्र को तिजोरी में रखते हैं कि धन मिलेगा। भक्ति मार्ग में मिलते हैं भूगरे (चने) ज्ञान में मिलते हैं हीरे। लक्ष्मी से सिर्फ धन मांगते हैं। उनको ऐसे नहीं कहेंगे कि बच्चा दो, तन्दरूस्ती दो। जगत अम्बा के पास सब आशायें ले जाते हैं।
अभी तुम समझते हो हम पूज्य थे, अब पुजारी बने हैं फिर पूज्य बनते हैं। ज्ञान से रोशनी मिल गई है बच्चों को। तुम कितने निराले बन गये हो। ज्ञान अंजन सतगुरू दिया... तुम ड्रामा के आदि-मध्य-अन्त को जान गये हो। बुद्धि में आ गया है तो तुमको इस पढ़ाई का कितना कदर रहना चाहिए। वह पढ़ाई तुम जन्म-जन्मान्तर पढ़ते आये हो, मिलता क्या है? भूगरे (चने)। यह पढ़ाई एक जन्म पढ़ने से तुमको हीरे-जवाहरात मिलते हैं। अब पुरुषार्थ करना तो तुम बच्चों का काम है। नहीं पढ़ते हैं तो इसमें टीचर क्या करेंगे? कृपा की तो यहाँ बात ही नहीं। संगम पर देवताओं की सारी राजधानी स्थापन हो रही है। योगबल से तुम अपने विकर्मों का विनाश करते हो और ज्ञान बल अर्थात् नॉलेज से तुम कितना ऊंच बनते हो। ज्ञान सागर और ज्ञान नदियों द्वारा स्नान करने से सद्गति होती है। बच्चों को समझाने की युक्तियाँ मिलती रहती हैं। ड्रामा प्लैन अनुसार जो कल्प पहले समझाया है वही समझाते रहते हैं। बच्चे भी नम्बरवार आते रहते हैं। ब्राह्मण कुल की वृद्धि होनी ही है। तुम बच्चों को महादानी बनना है। जो कोई आये उनको कुछ न कुछ समझाते रहो। शंखध्वनि करनी है। यहाँ जितनी तुम धारणा कर सकते हो उतनी घर में नहीं होती। शास्त्रों में भी मधुबन का गायन है वहाँ मुरली बजती है। अच्छा!
1) पढ़ाई का बहुत कदर रखना है। बाप से कृपा आदि नहीं मांगनी है। ज्ञान और योगबल जमा करना है।
2) रहमदिल बनना है। मुख से कभी कड़ुवे बोल नहीं बोलने हैं। सदा मीठा बोलना है। आप समान बनाने की सेवा जरूर करनी है।
वरदान:- विकारों रूपी सांपों को गले की माला बना देने वाले सच्चे तपस्वी भव
ये पांच विकार लोगों के लिए जहरीले सांप हैं लेकिन आप योगी तपस्वी आत्माओं के लिए ये सांप गले की माला बन जाते हैं इसलिए आप ब्राह्मणों के और ब्रह्मा बाप के अशरीरी, तपस्वी शंकर स्वरूप के यादगार में सांपों की माला गले में दिखाते हैं। सांप आपके लिए खुशी में नाचने की स्टेज बन जाते हैं, यह अधीनता की निशानी दिखाई है। स्थिति ही स्टेज है। तो जब विकारों पर इतनी विजय हो तब कहेंगे सच्चे तपस्वी।
स्लोगन:- पुराने संसार वा संस्कारों से मरना ही जीते जी मरना है।
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