''अव्यक्त-बापदादा'' रिवाइज: 26-01-95 ''अव्यक्त-बापदादा''
ब्रह्मा
बाप के और दो
कदम - फ़रमानबरदार-व़फादार
आज बापदादा चारों ओर के स्नेही और सहयोगी बच्चों को और शक्तिशाली समान बच्चों को देख रहे हैं। स्नेही सभी बच्चे हैं लेकिन शक्तिशाली यथाशक्ति हैं। स्नेही बच्चों को स्नेह का रिटर्न पद्म गुणा स्नेह और सहयोग प्राप्त होता है। शक्तिशाली समान बच्चों को सदा सहज विजयी भव का रिटर्न मिलता है। मिलता सभी को है। स्नेही बच्चे यथा शक्तिशाली होने के कारण सदा सहज विजय का अनुभव नहीं कर पाते। कभी सहज, कभी मेहनत। बापदादा स्नेही बच्चों को भी मेहनत को सहज करने का सहयोग देते हैं क्योंकि स्नेही आत्मायें सहयोगी भी रहती ही हैं। तो सहयोग के रिटर्न में बापदादा सहयोग जरूर देते हैं लेकिन योग यथार्थ न होने कारण सहयोग मिलते भी प्राप्ति का अनुभव नहीं कर पाते। योग द्वारा ही सहयोग का अनुभव होता है और शक्तिशाली समान बच्चे सदा योगयुक्त हैं इसलिये सहयोग का अनुभव करते सहज विजयी बन जाते हैं। लेकिन बाप को दोनों ही बच्चे प्यारे हैं। प्यार और सदा विजयी रहने की शुभ चाहना सभी बच्चों में रहती है लेकिन शक्ति कम होने के कारण समय पर और सर्व शक्तियाँ कार्य में नहीं लगा सकते। बाप वर्से के अधिकार में सर्व शक्तियों का अधिकार सभी बच्चों को देते हैं। अधिकार देने में बापदादा अन्तर नहीं रखते, सभी को सम्पूर्ण अधिकारी बनाते हैं लेकिन लेने में नम्बरवार बन जाते हैं। बापदादा किसको स्पेशल, किसको अलग ट्युशन देते हैं क्या? नहीं देते। पढ़ाई सबकी एक है, पालना सबकी एक है। पाण्डवों को अलग पालना हो, शक्तियों को अलग हो - ऐसे है क्या? सबको एक जैसी पालना और पढ़ाई है। लेकिन लेने में, रिज़ल्ट में कितना अन्तर हो जाता है! कहाँ अष्ट रत्न और कहाँ 16108 रत्न - कितना अन्तर है! यह अन्तर क्यों हुआ? पढ़ाई और पालना को, वरदानों को धारण करना और कार्य में लगाना - इसमें अन्तर हो जाता है। कई बच्चे धारण भी कर लेते हैं लेकिन समय प्रमाण कार्य में लगाना नहीं आता है। बुद्धि तक बहुत भरपूर होंगे लेकिन कर्म में आने में फर्क पड़ जाता है।
ब्रह्मा बाप नम्बरवन क्यों बना? दो कदम पहले सुनाये ना! तीसरा - सदा बाप, शिक्षक और सद्गुरु के फ़रमानबरदार बनें। हर फ़रमान को जी हाज़िर किया। बाप का फ़रमान है सदा सर्व खजानों के वर्से में सम्पन्न बनना और बनाना। तो प्रत्यक्ष देखा कि सर्व खजाने - ज्ञान, शक्तियाँ, गुण, श्रेष्ठ समय, श्रेष्ठ संकल्पों का खजाना पहले दिन से लेकर लास्ट दिन तक कार्य में लगाया। लास्ट दिन भी समय, संकल्प बच्चों प्रति लगाया। ज्ञान का खजाना, याद की शक्ति और सहनशीलता के गुण का स्वरूप - यह सब खजाने लास्ट समय तक, शरीर को भी भूल सेवा में प्रैक्टिकल में लगाकर दिखाया। तो इसको कहा जाता है फ़रमानबरदार नम्बरवन बच्चा क्योंकि बाप का विशेष फ़रमान यही है कि याद और सेवा में सदा बाप समान रहो। तो आदि से लेकर अन्त घड़ी तक दोनों ही फ़रमान प्रैक्टिकल में देखा ना? स्नेह की निशानी है फॉलो करना। तो चेक करो - आदि से अब तक सर्व खजानों को स्व के साथ-साथ सेवा में लगाया है? बाप का फ़रमान एक श्वास वा संकल्प, सेकेण्ड व्यर्थ नहीं गँवाना है। तो सारे दिन में ये फ़रमान प्रैक्टिकल में लाया? वा कभी लाया, कभी नहीं लाया? अगर कभी-कभी फ़रमानबरदार बने और कभी नहीं बने तो किस लिस्ट में जायेंगे? अगर बापदादा फ़रमानबरदार की लिस्ट निकाले तो आप किस लिस्ट में होंगे? अपने को तो जानते हो ना? क्योंकि आप सभी सर्व खजानों के ट्रस्टी, मालिक हो। तो एक संकल्प भी बिना बाप के फ़रमान के यूज़ नहीं कर सकते हो। या सोचते हो कि हम बालक सो मालिक हैं, इसलिए व्यर्थ गँवायें या क्या भी करें, इसमें बाप का क्या जाता है! बाप ने दे दिया, अभी हिसाब क्यों लेते हैं? नहीं। आप रोज़ बाप के आगे कहते हो कि सब तेरा है, मेरा नहीं है। कहते हो ना! कि टाइम पर मेरा और टाइम पर तेरा! जब हमारा मतलब हो तो मेरा, वैसे तेरा... ऐसी चतुराई तो नहीं करते हो? ब्रह्मा बाप को देखा - अपना आराम का समय भी विचार सागर मंथन कर बच्चों के प्रति लगाया। रात्रि में भी जागकर बच्चों को योग की शक्ति देते रहे। ये चरित्र तो सुने हैं ना? ब्रह्मा की कहानी सुनी है ना? फॉलो फादर किया कि सिर्फ सुन लिया? सुनना अर्थात् करना।
तो तीसरा कदम सदा जी
हाज़िर, सदा हज़ूर हाज़िर
और नाज़िर। कभी ब्रह्मा बाप
से शिव बाप अलग
नहीं हुए, हाज़िर-नाज़िर
रहे ना! बच्चे ने
कहा बाबा और बाप
ने कहा मीठे बच्चे।
तो मन की स्थिति
में सदा हाज़िर और
नाज़िर अनुभव किया। सेवा में सदा
जी हाज़िर किया। चाहे रात हो,
चाहे दिन हो, सेवा
का डायरेक्शन मिला और प्रैक्टिकल
किया और कर्म में
सदा हाँ जी किया।
हाँ जी का पाठ
पढ़ाया ना? तो आप
क्या फॉलो करते हो?
कभी हाँ जी, कभी
ना जी तो नहीं
करते? तो प्यार का
सबूत दिखाओ। ऐसे नहीं सोचो
कि जितना बाबा से मेरा
प्यार है उतना और
किसका नहीं। मेरे दिल में
देख लो, क्या दिखाऊं,
क्या सुनाऊं... बच्चे ऐसे गीत गाते
हैं। लेकिन सबूत दिखाओ। सबूत
है फॉलो फादर। तो
चेक करो - स्थिति में, सेवा में,
कर्म अर्थात् सम्बन्ध-सम्पर्क में, (सम्बन्ध और सम्पर्क में
आना ही कर्म है)
तीनों में सदा फॉलो
फादर हैं? हर फ़रमान
सिर्फ बुद्धि तक रहता है
या कर्म में भी
आता है? रिज़ल्ट में
देखा जाता है कि
अगर बुद्धि और वाणी में
100 बातें रहती है तो
कर्म में 50 हैं। तो उन्हों
को फॉलो फादर कहें?
अधूरी रिज़ल्ट वालों को फॉलो फादर
की लिस्ट में रखें? आप
क्या समझते हैं? वे फ़रमानबरदार
हैं? कि आप आधे
में राज़ी हैं? थोड़ा-थोड़ा
अन्तर पसन्द है! शुरू-शुरू
में माला भी बनाते
थे, गोल्डन-सिल्वर भी लिस्ट निकालते
थे। तो अभी फिर
से लिस्ट निकालें? कि सिल्वर में
नाम देखकर कॉपर बन जायेंगे?
समय
की सूचना बाप तो दे
ही रहे हैं लेकिन
प्रकृति भी दे रही
है। प्रकृति भी चैलेन्ज कर
रही है तो समय
के प्रमाण आप लोग औरों
को भी सूचना देते
रहते हो। भाषणों में
सबको कहते हो कि
समय आ गया है,
समय आ गया है।
तो अपने को भी
कहते हो या सिर्फ
दूसरों को कहते हो?
दूसरों को कहना तो
सहज होता है ना?
तो स्वयं भी ये चैलेन्ज
स्मृति में लाओ। समय
के प्रमाण अपने पुरुषार्थ की
गति क्या है? बापदादा
एक बात पर अन्दर
ही अन्दर मुस्कराते रहते हैं। किस
बात पर मुस्कराते हैं,
जानते हो? एक तरफ
मैजारिटी बच्चे कभी-कभी एक
सेकेण्ड ये सोचते हैं
कि समय प्रमाण पुरुषार्थ
में तीव्रता होनी चाहिये और
दूसरे तरफ जब माया
अपना प्रभाव डाल देती है
तो दूसरे सेकेण्ड ये सोचते हैं
कि यह तो सब
चलता ही है, ये
तो महारथियों से भी परम्परा
चला आता है। तो
बापदादा क्या करेंगे? गुस्सा
तो नहीं करेंगे ना!
मुस्करायेंगे। और इसका विशेष
कारण है कि समय
प्रति समय पुरुषार्थ को
बहुत सहज कर दिया
है, इज़ी कर लिया
है। स्वभाव को इज़ी नहीं
करते, स्वभाव में टाइट होते
हैं और पुरुषार्थ में
इज़ी हो जाते हैं।
फिर सोचते हैं सहज योग
है ना! लेकिन जीवन
में, पुरुषार्थ में इज़ी रहना
- इसको सहज योग नहीं
कहा जाता क्योंकि इज़ी
रहने से शक्तियाँ मर्ज
हो जाती हैं, इमर्ज
नहीं होती। आप सभी अपने
ब्राह्मण जीवन के आदि
का समय याद करो।
उस समय कैसा पुरुषार्थ
रहा? इज़ी पुरुषार्थ रहा
या अटेन्शन वाला पुरुषार्थ रहा?
अटेन्शन वाला रहा, उमंग-उत्साह वाला रहा और
अभी अलबेलेपन के डनलप के
तकिये और बिस्तरे मिल
गये हैं। साधनों ने
आराम पसन्द ज्यादा बना दिया है।
तो अपने आदि के
पुरुषार्थ, आदि की सेवा
और आदि के उमंग-उत्साह को चेक करो
- क्या था? आराम पसन्द
थे? (नहीं) और अभी थोड़ा-थोड़ा हैं? साधन सेवा
के प्रति हैं, साधन स्वयं
को आराम पसन्द बनाने
के लिये नहीं हैं।
तो अभी डनलप का
तकिया और बिस्तरा निकालो।
पटरानियाँ बनो, पटराने बनो।
भले पलंग पर सोओ
लेकिन स्थिति पटरानी-पटराने की हो। देखो,
आदि सेवा के समय
में साधन नहीं थे,
लेकिन साधना कितनी श्रेष्ठ रही। जिस आदि
की साधना ने ये सारी
वृद्धि की है। तो
साधना के बीज को
विस्तार में छिपा नहीं
दो। जब विस्तार होता
है तो बीज छिप
जाता है। तो साधना
है बीज, साधन है
विस्तार। तो साधना का
बीज छिपने नहीं दो, अभी
फिर से बीज को
प्रत्यक्ष करो।
बापदादा
ने इस सीज़न में
काम दिया था लेकिन
किया नहीं। याद है क्या
दिया था? कि कापियों
में है! काम दिया
था कि बेहद के
वैराग्य वृत्ति पर स्वयं से
भी चर्चा करो और आपस
में भी चर्चा करो
और प्रैक्टिकल में इस साधना
के बीज को प्रत्यक्ष
करो। तो किया? कि
एक दिन सिर्फ डिबेट
कर ली, वर्कशॉप तो
हो गई लेकिन वर्क
में नहीं आई। तो
वर्तमान समय के प्रमाण
अभी अपनी सेवा वा
सेवा-स्थानों की दिनचर्या बेहद
के वैराग्य वृत्ति की बनाओ। अभी
आराम की दिनचर्या मिक्स
हो गई है। ये
अलबेलापन शरीर की छोटी-छोटी बीमारियों के
भी बहाने बनाता है। पहले भी
तो बीमारी होती थी ना,
लेकिन सेवा का उमंग
बीमारी को मर्ज कर
देता है। जब कोई
आपके दिल पसन्द सेवा
होती है तो बीमारी
याद आती है? अगर
आपको इन्चार्ज बहन कहे - नहीं,
आपकी तबियत ठीक नहीं है,
दूसरे को करने दो,
तो करने देंगे? उस
समय बुखार वा सिर दर्द
कहाँ चला जाता है?
और जब सेवा कोई
पसन्द नहीं होगी तो
क्या होगा? सिर दर्द भी
आ जायेगा तो पेट दर्द
भी आ जायेगा। सुनाया
है ना कि अगर
बहानेबाजी में बुखार कहेंगी
तो टीचर कहेगी कि
थर्मा मीटर लगाओ लेकिन
पेट दर्द और सिर
दर्द का थर्मा मीटर
तो है ही नहीं।
मूड ठीक नहीं होगा
और कहेंगे कि पेट दर्द
है! तो ये अलबेलेपन
के बहाने हैं। बेहद की
वैराग्य वृत्ति मर्ज हो गई
है और बहानेबाजी इमर्ज
हो गई है।
बापदादा
देख रहे थे कि
सभी बच्चे बहुत स्नेह से
मधुबन में पहुँच गये
हैं। तो स्नेह तो
दिखाया, उसकी मुबारक हो।
बापदादा को भी बच्चों
की खुशी देखकर खुशी
होती है लेकिन आगे
क्या करना है? सिर्फ
मधुबन तक पहुँचना है
या स्नेह का सबूत दिखाने
के लिये फरिश्ते रूप
में वतन में पहुँचना
है? क्या करना है?
मधुबन में पहुँचे उसकी
मुबारक है लेकिन फ़रिश्ता
बन वतन में कब
पहुँचेंगे? चलते-फिरते आप
सभी को फ़रिश्ता ही
देखें। बोल-चाल, रहन-सहन सब फ़रिश्तों
का बन जाये। और
फ़रिश्ते का अर्थ ही
है डबल लाइट। तो
दिनचर्या में लाइट नहीं
बनना है लेकिन सम्बन्ध-सम्पर्क में, स्थिति में
लाइट। तो लाइट बनना
आता है कि बोझ
खींचता है? बापदादा स्नेह
का सबूत देखना चाहते
हैं और जब स्नेह
का सबूत देंगे तो
आपको तालियाँ बजाने की जरूरत नहीं
पड़ेगी लेकिन माया भी ताली
बजायेगी - वाह विजयी वाह,
प्रकृति भी ताली बजायेगी।
तो अभी कुछ परिवर्तन
करो।
अभी
स्वयं को स्नेह के
साथ शक्तिशाली बनाओ। स्वयं के परिवर्तन में
शक्तिरूप बनो। सहज योगी,
सहज योगी करके अलबेलापन
नहीं लाओ। बापदादा देखते
हैं कि स्व प्रति,
चाहे सेवा प्रति, चाहे
औरों के सम्बन्ध-सम्पर्क
प्रति अलबेलापन ज्यादा आ गया है।
ऐसे नहीं सोचो कि
सब चलता है। एक-दो को कॉपी
नहीं करो, बाप को
कॉपी करो। दूसरों को
देखने की आदत थोड़ी
ज्यादा हो गई है।
अपने को देखने में
अलबेलापन आ गया है।
बापदादा ने सुनाया था
ना कि नजदीक की
नज़र कमजोर हो गई है
और दूर की नज़र
तेज हो गई है।
तो अभी क्या करेंगे?
सीज़न का फल क्या
देंगे? कि सिर्फ बाप
आया, मिला, मनाया, मुरली सुनी - ये फल है?
हर सीजन का फल
होता है ना? तो
इस सीज़न का फल बापदादा
को क्या भोग लगायेंगे?
भोग लगाते हो तो फल
भी रखते हो ना?
वो तो बाजार में
मिल जाता है, कोई
बड़ी बात नहीं। अब
इस सीज़न का फल क्या
भेंट करेंगे या भोग लगायेंगे?
लगाना है या मुश्किल
है? तो देखेंगे कि
नम्बरवन भोग कहाँ से
आता है। वायदा तो
बहुत अच्छा करके जाते हो,
कभी भी ना नहीं
करते हो, हाँ ही
करते हो! खुश कर
देते हो। लेकिन अभी
क्या करेंगे? टीचर्स नम्बरवन भोग लगायेंगी ना?
सभी सेन्टर्स का भोग देखेंगे।
प्रवृत्ति वाले भी भोग
तो लगाते हो ना कि
खुद ही खा जाते
हो? तो ये नहीं
सोचना कि सिर्फ सेन्टर्स
वालों का काम है।
सभी का काम है।
तो फ़रमानबरदार का कदम प्रैक्टिकल
में लाना है।
चौथा
कदम है - व़फादार। कभी
भी मन से, बुद्धि
से, संकल्प से बाप के
बेव़फा नहीं बनना। व़फादार
का अर्थ ही है
सदा एक बाप, दूसरा
न कोई। संकल्प में
भी देह, देह के
सम्बन्ध, देह के पदार्थ
वा देहधारी व्यक्ति आकर्षित नहीं करें। जैसे
जब पति-पत्नि एक-दो के व़फादार
बनते हैं तो स्वप्न
में भी अगर पर
(दूसरे) की याद आ
गई तो व़फादार नहीं
कहा जाता। तो ब्रह्मा बाप
को देखा, संकल्प भी दूसरे के
तरफ नहीं। एक बाप सब
कुछ है, इसको कहा
जाता है व़फादार। अगर
पदार्थ की भी आकर्षण
है, साधनों की भी आकर्षण
है तो साधना खण्डित
हो जाती है, व़फादारी
खण्डित हो जाती है।
और खण्डित कभी भी सम्पन्न,
पूज्य नहीं गाया जाता
है। तो चेक करो
कि संकल्प में भी कोई
आकर्षण बेवफा तो नहीं बना
देती? अगर ज़रा भी
किसी के प्रति विशेष
झुकाव है, थोड़ा भी
पर्सनल झुकाव है, चाहे गुण
के ऊपर, चाहे सेवा
के ऊपर, चाहे अच्छे
संस्कारों के ऊपर भी
अगर एक्स्ट्रा प्रभावित हैं तो व़फादार
नहीं कहा जायेगा। सबकी
विशेषता, बेहद की विशेषता
पर आकर्षित है, वो दूसरी
बात है लेकिन किसी
विशेष व्यक्ति या वैभव के
ऊपर आकर्षित है तो व़फादार
की लिस्ट में खण्डित गाया
जायेगा। तो चेक करो
कि खण्डित मूर्ति तो नहीं है?
पूज्य है? कहाँ एक्स्ट्रा
लगाव व झुकाव तो
नहीं है? संकल्प मात्र
भी झुकाव नहीं। वाचा-कर्मणा की
तो बात ही छोड़ो।
लेकिन संकल्प मात्र भी है तो
खण्डित के लिस्ट में
आ जायेंगे। तो चेक करना
आता है ना? अच्छा।
चारों
ओर के स्नेह का
सबूत देने वाले, हर
फ़रमान को संकल्प, बोल
और कर्म में लाने
वाले, सदा स्वयं को
बाप समान सिम्पल और
सैम्पल बनाने वाले, ब्रह्मा बाप के हर
कदम पर कदम रखने
वाले ऐसे शक्तिशाली बाप
समान बनने के दृढ़
संकल्पधारी सर्व बच्चों को
बापदादा का याद-प्यार
और नमस्ते।
वरदान:- साक्षीपन
की स्थिति द्वारा हीरो पार्ट बजाने
वाले सहज पुरुषार्थी भव
साक्षीपन
की स्थिति ड्रामा के अन्दर हीरो
पार्ट बजाने में सहयोगी बनती
है। अगर साक्षीपन नहीं
तो हीरो पार्ट बजा
नहीं सकते। साक्षीपन अर्थात् देह से न्यारे,
आत्मा मालिकपन की स्टेज पर
स्थित रहे। देह से
भी साक्षी, मालिक। इस देह से
कर्म कराने वाली, ऐसी साक्षी स्थिति
ही सहज पुरुषार्थ का
अनुभव कराती है क्योंकि इस
स्थिति में किसी भी
प्रकार का विघ्न या
मुश्किलात नहीं आ सकती,
यह है मूल अभ्यास।
इसी अभ्यास से लास्ट में
विजयी बनेंगे।
स्लोगन:- फरिश्ता
बनना है तो अपने
सर्व रिश्ते एक प्रभू के
साथ जोड़ लो।
2
''अव्यक्त-बापदादा'' रिवाइज: 26-02-1995 ''अव्यक्त-बापदादा''
संगमयुग उत्सव का युग है - उत्सव मनाना अर्थात् अविनाशी उमंग- उत्साह में रहना
आज त्रिदेव रचता त्रिमूर्ति शिव बाप अपने रूहानी डायमण्ड्स के साथ डायमण्ड जुबली वा डायमण्ड जयन्ती मनाने आये हैं। इसी विचित्र जयन्ती को डायमण्ड जयन्ती कहते हो क्योंकि बाप अवतरित होते ही हैं कौड़ी समान आत्माओं को हीरे तुल्य बनाने। तो बापदादा चारों ओर के बच्चों को जो हीरे से भी अमूल्य हैं, सबको सामने देख रहे हैं। बापदादा के आगे सिर्फ मधुबन की सभा नहीं है लेकिन विश्व के चारों ओर के ब्राह्मण बच्चों की सभा है। सबके दिल की मुबारक के स्नेह भरे गीत कहो, बोल कहो बाप समीप से सुन रहे हैं। दिल का आवाज़ दिलाराम के पास पहले पहुँचता है। तो बापदादा देख रहे हैं कि बच्चों के सेवा का प्रत्यक्ष प्रमाण चारों ओर से मधुबन, बाप के स्वीट होम तक पहुँच रहा है। वैसे भी शिव जयन्ती को उत्सव कहते हैं। यथार्थ रीति से उत्सव आप ब्राह्मण ही मनाते हो क्योंकि उत्सव का अर्थ ही है - सर्व उत्साह-उमंग में रहें। तो आप जो भी बैठे हो, सभी के दिल में उत्साह और उमंग कितना है? अविनाशी है या आज के लिये है? अविनाशी है ना? इसलिये बापदादा इस श्रेष्ठ संगमयुग को उत्सव का युग कहते हैं। हर दिन आपके लिये उत्साह सम्पन्न है। हर दिन उत्सव है।
जो गायन है, आप लोग टॉपिक रखते हो ‘अनेकता में एकता' तो प्रैक्टिकल में अनेक देश, अनेक भाषायें, अनेक रूप-रंग लेकिन अनेकता में भी सबके दिल में एकता है ना! क्योंकि एक बाप है। चाहे अमेरिका से आये हो, चाहे अफ्रीका से आये हो लेकिन दिल में एक बाप है। एक श्रीमत पर चलने वाले हो। तो बापदादा को अच्छा लगता है कि अनेक भाषाओं में होते हुए भी मन का गीत, मन की भाषा एक है। चाहे किसी भी भाषा वाले हो, काला ताज तो मिला है (सभी हेडफोन से अपनी-अपनी भाषा में सुन रहे हैं), अभी यही काला ताज बदलकर गोल्डन हो जायेगा। लेकिन सबके मन की भाषा एक है और एक ही शब्द है, ‘मेरा बाबा'। सभी भाषा वाले बोलो ‘मेरा बाबा'। हाँ, यह एक ही है। तो अनेकता में एकता है ना!
तो उत्साह में रहने वाले अर्थात् सदा उत्सव मनाने वाली श्रेष्ठ आत्मायें हो। कभी भी उत्साह कम नहीं होना चाहिये। पहले भी सुनाया था - ब्राह्मण जीवन का सांस है उमंग-उत्साह। अगर सांस चला जाये तो जीवन सेकेण्ड में खत्म हो जायेगी ना! तो ब्राह्मण जीवन में यदि उमंग-उत्साह का सांस नहीं तो ब्राह्मण जीवन नहीं। जो सदा उमंग-उत्साह में होगा, वो फ़लक से कहेगा कि ब्राह्मण हैं ही उत्साह-उमंग के लिये। और जिसका उमंग-उत्साह कम हो जाता है उसके बोल ही बदल जाते हैं। वो कहेगा - हैं तो सही..., होना तो चाहिये..., हो जायेगा... तो ये भाषा और उस भाषा में कितना अन्तर है! उसके हर बोल में ‘तो' जरूर होगा - होना तो चाहिये... तो ये जो ‘तो-तो' होता है ना, ये उमंग-उत्साह का प्रेशर कम होने से ही ऐसे बोल, कमजोरी के बोल निकलते हैं। तो उमंग-उत्साह कभी कम नहीं होना चाहिये। उमंग-उत्साह कम क्यों होता है? बापदादा कहते हैं सदा वाह-वाह कहो और कहते हैं व्हाई-व्हाई (क्यों, क्यों)। अगर कोई भी परिस्थिति में व्हाई शब्द आ जाता है तो उमंग-उत्साह का प्रेशर कम हो जाता है। बापदादा ने अगले साल भी विशेष डबल फारेनर्स को कहा था कि व्हाई शब्द को ब्राह्मण डिक्शनरी में चेंज करो, जब व्हाई शब्द आये तो फ्लाय शब्द याद रखो तो व्हाई खत्म हो जायेगा। कोई भी परिस्थिति छोटी भी जब बड़ी लगती है तो व्हाई शब्द आता है - ये क्यों, ये क्या... और फ्लाय कर लो तो परिस्थिति क्या होगी? छोटा-सा खिलौना। तो जब भी व्हाई शब्द मन में आवे तो कहो ब्राह्मण डिक्शनरी में व्हाई शब्द नहीं है, फ्लाय है क्योंकि व्हाई-व्हाई, हाय-हाय करा देता है। बापदादा को हंसी भी आती है, एक तरफ कहेंगे - नहीं, हमारे जैसा श्रेष्ठ भाग्य किसका नहीं है। अभी-अभी यह कहेंगे और अभी-अभी उत्साह कम हुआ तो कहेंगे - पता नहीं मेरा भाग्य ही ऐसा है! मेरे भाग्य में इतना ही है! तो हाय-हाय हो गया ना! तो जब भी हाय-हाय का नज़ारा आवे तो वाह-वाह कर लो तो नज़ारा भी बदल जायेगा और आप भी बदल जायेंगे।
डबल विदेशी आजकल ‘पॉजिटिव थिंकिंग' का कोर्स कराते हो ना। सभी विदेश में विशेष कोर्स यह कराते हो? तो अपने को भी कराते हो या दूसरों को कराते हो? जिस समय कोई ऐसी परिस्थिति आ जाये तो अपने को ही स्टूडेण्ड बनाकर, खुद ही टीचर बन करके अपने को यह कोर्स कराओ। अपने को करा सकते हो या सिर्फ दूसरे को करा सकते हो? दूसरे को कराना सहज है। जब यह नेचुरल स्थिति हो जाये कि हर व्यक्ति को, बात को पॉजिटिव वृत्ति से देखो, सुनो या सोचो तो कैसी स्थिति रहेगी? आजकल के साइन्स द्वारा भी ऐसे साधन निकले हैं जो ऱफ माल को भी बहुत सुन्दर रूप में बदल देते हैं। देखा है ना - क्या से क्या बना देते हैं! तो आपकी वृत्ति क्या ऐसा परिवर्तन नहीं कर सकती? आवे निगेटिव रूप में लेकिन आप निगेटिव को पॉजिटिव वृत्ति से बदल दो। अगर हलचल में आते हैं तो उसका कारण है - निगेटिव सुनना, सोचना वा बोलना या करना। ये मॉडल बनाते हो ना - न सोचो, न देखो, न बोलो, न करो। साइलेन्स की पॉवर क्या निगेटिव को पॉजिटिव में नहीं बदल सकती! आपका मन और बुद्धि ऐसा बन जाये जो निगेटिव टच नहीं करे, सेकेण्ड में परिवर्तन हो जाये। ऐसे तीव्र गति की अनुभूति कर सकते हो? मन और बुद्धि ऐसा तीव्र गति का यंत्र बन जाये। बन सकता है कि टाइम लगेगा? कि निगेटिव बात आयेगी तो कहेंगे कि थोड़ा सोचने तो दो, देखें तो सही क्या है! क्विक स्पीड से परिवर्तन हो जाये - इसको कहा जाता है ब्राह्मण जीवन का मज़ा, मौज़। अगर जीना है तो मौज़ से जीयें। सोच-सोचकर जीना वो जीना नहीं है। आप लोग औरों को कहते हो कि राजयोग जीने की कला है। तो आप लोग राजयोगी जीवन वाले हो ना! कि कहने वाले हो? जब राजयोग जीने की कला है तो राजयोगियों की कला क्या है? यही है ना? तो उत्सव मनाना अर्थात् मौज में रहना। मन भी मौज में, तन भी मौज में, सम्बन्ध-सम्पर्क भी मौज में।
कई बच्चे कहते हैं अपने रीति से तो ठीक रहते हैं, अपने मौज में रहते हैं लेकिन सम्बन्ध-सम्पर्क में मौज में रहें, यह कभी-कभी होता है। लेकिन सम्बन्ध-सम्पर्क ही आपके स्थिति का पेपर है। यदि स्टूडेण्ट कहे वैसे तो मैं पास विद् ऑनर हूँ लेकिन पेपर के टाइम मार्क्स कम हो जाती है तो ऐसे को क्या कहेंगे? तो ऐसे तो नहीं हो ना! फुल पास होने वाले हो ना? बापदादा ने सुनाया है कि जो सदा बाप के पास रहते हैं वो पास हैं। पास नहीं रहते तो पास नहीं हैं। तो सदा कहाँ रहते हो? दूर रहते हो, पास नहीं रहते हो! डबल विदेशियों को तो डबल पास होना चाहिये ना! अच्छा।
तो डबल विदेशियों ने इस बारी हाई जम्प लगा दी है। मधुबन में हाई जम्प लगाकर पहुँच गये हैं। (इस बार हर वर्ष से ज्यादा संख्या में डबल विदेशी मधुबन पहुँचे हुए हैं) अच्छा, डबल विदेशियों को भी कइयों को पटरानी बनने का चांस तो अच्छा मिला है। पटरानी बनने में मज़ा है कि नहीं? आप लोगों की तो अटैची इतनी है जो उस पर ही सो सकते हैं क्योंकि एक बड़ी लाते हैं, एक छोटी लाते हैं, तो छोटी को तकिया बनाओ। जगह बच जायेगी ना! अच्छा लगता है बापदादा सीन देखते हैं कैसे भारी-भारी अटैचियाँ घसीट कर ला रहे हैं! अच्छी सीन लगती है ना! संगम पर ये मेहनत भी थोड़े समय की है फिर तो प्रकृति भी आपकी दासी होगी तो दासियाँ भी बहुत होंगी। फिर आपको सामान उठाने की जरूरत नहीं। अभी अपना राज्य स्थापन हो रहा है, इस समय गुप्त वेश में हो, सेवाधारी हो फिर राज्य अधिकारी बनेंगे। तो सेवाधारियों को तो सब प्रकार की सेवा करनी पड़ती है। जितनी अभी तन, मन, धन और सम्पर्क से सेवा करते हो उतना ही वहाँ सेवाधारी मिलेंगे। सबसे पहले तो ये प्रकृति के पांच ही तत्व आपके सेवाधारी बनेंगे। अपना राज्य-भाग्य स्मृति में है ना! कितने बारी राज्य अधिकारी बने हैं! अनगिनत बार बने हैं और बनते ही रहेंगे। लेकिन राज्य अधिकारी से भी अब का सेवाधारी जीवन श्रेष्ठ है क्योंकि अभी बाप और बच्चों का साथ है। चाहे किसी भी प्रकार की सेवा है लेकिन सेवा का प्रत्यक्षफल अभी मिलता है। बाप का स्नेह, सहयोग और बाप द्वारा मिले हुए खजाने प्रत्यक्षफल के रूप में मिलते हैं। जब भी कोई विशेष सेवा करते हो और युक्तियुक्त सेवा करते हो तो कितनी खुशी होती है! उस समय के चेहरे का फ़ोटो निकालो तो कैसा होता है! तो एक तरफ सेवा करते हो, दूसरे तरफ प्रत्यक्षफल आपके लिये सदा तैयार है ही है। एक हाथ से सेवा करो, दूसरे हाथ से फल खाओ - ऐसे अनुभव होता है? कि सेवा में बड़ी मेहनत है? सेवा में हलचल होती है या नहीं? कभी-कभी होती है। ये हलचल ही परिपक्व बनाती है, अनुभवी बनाती है। हलचल में इसीलिये आते हो जो सिर्फ वर्तमान को देखते हो। लेकिन वर्तमान में छिपा हुआ भविष्य जो है वो स्पष्ट नहीं दिखाई देता है, इसलिये हलचल में आ जाते हैं। कोई भी बड़े ते बड़ी नाज़ुक परिस्थिति वास्तव में आगे के लिये बहुत बड़ा पाठ पढ़ाती है, परिस्थिति नहीं है लेकिन वह आपकी टीचर है। उस नज़र से देखो कि इस परिस्थिति ने क्या पाठ पढ़ाया? इसको कहा जाता है निगेटिव को पॉजिटिव में परिवर्तन करना। सिर्फ परिस्थिति को देखते हो तो घबरा जाते हो। और परिस्थिति माया द्वारा सदा नये-नये रूप से आयेगी। वैसे ही नहीं आयेगी, जिस रूप में आ चुकी है, उस रूप में नहीं आयेगी। नये रूप में आयेगी। तो उसमें घबरा जाते हैं - ये तो नई बात है, ये तो होता नहीं है, ये तो होना नहीं चाहिये...। लेकिन समझ लो कि माया अन्त तक बहुरूपी बन बहुरूप दिखायेगी। माया को बहुरूपी बनना बहुत जल्दी और अच्छा आता है। जैसे आपकी स्थिति होगी ना वैसी परिस्थिति बनाकर आयेगी। आज मानो आप थोड़ा-सा अलबेले जीवन में हो तो माया भी उसी अलबेले परिस्थिति के रूप में आयेगी। आज मूड थोड़ी ऑफ है, जैसे होनी चाहिये वैसे नहीं है, तो मूड ऑफ की परिस्थिति के रूप में ही आयेगी। फिर सोचते हैं कि पहले ही मैं सोच रही थी फिर ये क्या हुआ? इसलिये माया को देखने के लिये, जानने के लिये त्रिकालदर्शी और त्रिनेत्री बनो। आगे, पीछे, सामने त्रिनेत्री बनो।
आप सभी त्रिनेत्री और त्रिकालदर्शी हो ना? डबल फॉरेनर्स त्रिकालदर्शी हैं - यस या नो? सब बोलो - हाँ जी या ना जी। (हाँ जी) अपनी भाषा से तो ये अच्छा बोलते हो। सब खुश हो? (हाँ जी) इतने बड़े संगठन में मज़ा आ रहा है? (हाँ जी) कोई-कोई यह तो नहीं सोच रहे हैं कि अगले वर्ष भीड़ में नहीं आयेंगे, थोड़ा पीछे आयेंगे? संगठन का मज़ा भी प्यारा है। वैसे आना तो प्रोग्राम प्रमाण ही, ज्यादा नहीं आना लेकिन आदत ऐसी होनी चाहिये जो सबमें एडजेस्ट कर सके। एडजेस्ट करने की पॉवर सदा विजयी बना देती है। ब्रह्मा बाप को देखा तो बच्चों से बच्चा बनकर एडजेस्ट हो जाता, बड़ों से बड़ा बनकर एडजेस्ट हो जाता। चाहे बेगरी लाइफ, चाहे साधनों की लाइफ, दोनों में एडजेस्ट होना और खुशी-खुशी से होना, सोचकर नहीं। यहाँ दु:खी तो नहीं होते हो लेकिन खुशी के बजाय थोड़ा सोच में पड़ जाते हो - ये क्या हुआ, कैसे हुआ...। तो सोचने वाले को एडजेस्ट होने के मजे में कुछ समय लग जाता है। अपने को चेक करो कि कैसी भी परिस्थिति हो, चाहे अच्छी हो, चाहे हिलाने वाली हो लेकिन हर समय, हर सरकमस्टांस के अन्दर अपने को एडजेस्ट कर सकते हैं? डबल फॉरेनर्स को अकेलापन भी अच्छा लगता है और कम्पैनियन भी बहुत अच्छे लगते हैं। लेकिन कम्पनी में हो या अकेले हो, दोनों में एडजेस्ट होना - ये है ब्राह्मण जीवन। ऐसे नहीं, संगठन हो और माथा भारी हो जाये - नहीं, मुझे एकान्त चाहिये, ये घमसान में नहीं, मुझे अकेला चाहिये...। मन अकेला अर्थात् बाहरमुखता से अन्तर्मुख में चले जाओ तो अकेलापन है। कोई-कोई कहते हैं ना - अकेला कमरा चाहिये, दो भी नहीं चाहिये। अकेला मिले तो भी मौज़ से सोओ और दस के बीच में भी सोना हो तो मौज़ से सोओ। फॉरेनर्स दस के बीच में सो सकते हैं कि मुश्किल है? सो सकते हैं? (हाँ जी) अच्छा, अभी अगले वर्ष 20-20 को सुलायेंगे। देखो समय बदलता रहता है और बदलता रहेगा। दुनिया की हालतें नाज़ुक हो रही हैं और भी होंगी। होनी ही है। अभी सिर्फ एक स्थान पर अलग-अलग होती हैं, आखिर में सब तरफ इकट्ठी होगी। तो नाज़ुक समय तो आना ही है। समय नाज़ुक हो लेकिन आपकी नेचर नाज़ुक नहीं हो। कइयों की नेचर बहुत नाज़ुक होती है ना, थोड़ा-सा आवाज़ हुआ, थोड़ा-सा कुछ हुआ तो डिस्टर्ब हो गये। इसको कहते हैं नाज़ुक स्थिति, नाजुक नेचर। तो नाज़ुक नेचर नहीं हो। जैसा समय वैसा अपने को एडजेस्ट कर सको। ये अभ्यास आगे चलकर आपको बहुत काम में आयेगा क्योंकि हालतें सदा एक जैसी नहीं रहनी है। और फाइनल पेपर आपका नाज़ुक समय पर होना है। आराम के समय पर नहीं होना है। नाजुक समय पर होना है। तो जितना अभी से अपने को एडजेस्ट करने की शक्ति होगी तो नाजुक समय पर पास विद् ऑनर हो सकेंगे। पेपर बहुत टाइम का नहीं है, पेपर तो बहुत थोड़े समय का है लेकिन चारों ओर की नाजुक परिस्थितियाँ, उनके बीच में पेपर देना है इसलिये अपने को नेचर में भी शक्तिशाली बनाओ। क्या करें, मेरी नेचर ये है, मेरी आदत ही ऐसी है, ये नहीं, इसको नाज़ुक नेचर कहा जाता है। देखो, बापदादा ने स्थापना के आदि में सब अनुभव करा लिया। जब आदि हुई तो राजकुमार और राजकुमारियों से भी ज्यादा पालना, साधन, सब अनुभव कराया और आगे चलकर बेगरी लाइफ का भी पूरा अनुभव कराया। तो जिन्होंने दोनों अनुभव किया उनकी आदत बन गई। तो आप लोगों के आगे तो ऐसा समय आया नहीं है लेकिन आना है। जहाँ भी रहते हो, सभी हिलने हैं, सब आधार टूटने हैं। तो ऐसे टाइम पर क्या चाहिये? एक ही बाप का आधार। आप लोग तो बहुत-बहुत-बहुत लक्की हो, जो आने का समय आपका सहज साधनों का है। सहज साधनों के साथ-साथ आपका ब्राह्मण जन्म है। लेकिन साधन और साधना - साधनों को देखते साधना को नहीं भूल जाना क्योंकि आखिर में साधना ही काम में आनी है। समझा? अच्छा।
चारों ओर के अमूल्य विशेष रत्नों को, सदा हर दिन उत्साह से उत्सव मनाने वाली श्रेष्ठ आत्माओं को, सदा स्व-स्थिति और सेवा के उन्नति में बैलेन्स रखने वाली ब्लेसिंग के अधिकारी आत्माओं को, सदा परिस्थिति को सहज पार करने वाली ऐसे अचल, अडोल, महावीर आत्माओं को बापदादा का याद-प्यार और नमस्ते।
वरदान:- सम्पूर्णता द्वारा सम्पन्नता की प्रालब्ध का अनुभव करने वाले सर्व झमेलों से मुक्त भव
संगमयुग पर सागर गंगा से अलग नहीं, गंगा सागर से अलग नहीं। इसी समय नदी और सागर के समाने का मेला होता है। जो इस मेले में रहते हैं वह सर्व झमेलों से मुक्त हो जाते हैं। लेकिन इस मेले का अनुभव वही कर सकते हैं जो समान बनते हैं। समान बनना अर्थात् समा जाना। जो सदा स्नेह में समाये हुए हैं वह सम्पूर्णता और सम्पन्नता की प्रालब्ध का अनुभव करते हैं। उन्हें कोई भी अल्पकाल के प्रालब्ध की इच्छा नहीं रहती।
स्लोगन:- सदा एक बाप के श्रेष्ठ संग में रहो तो होलीएस्ट और हाइएस्ट बन जायेंगे।
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