28.02.2023 HINDI MURLI
“मीठे बच्चे - बाप के ज्ञान की कमाल है जो तुम इस ज्ञान और योगबल से बिल्कुल पवित्र बन जाते हो, बाप आये हैं तुम्हें ज्ञान से ज्ञान परी बनाने''
प्रश्नः- बाप की कमाल पर बच्चे बाप को इनएडवान्स कौन सा इनाम देते हैं?
उत्तर:- बाप पर बलि चढ़ना ही उन्हें इन-एडवांस इनाम देना है। ऐसे नहीं बाबा पहले ब्युटीफुल बनाये फिर बलिहार जायेंगे। अभी पूरा बलि चढ़ना है। शरीर निर्वाह करते, बाल-बच्चों को सम्भालते श्रीमत पर चलना ही बलिहार जाना है। इस पुरानी दुनिया में तो ठिक्कर-ठोबर हैं इनसे बुद्धियोग निकाल बाप और नई दुनिया को याद करना है।
गीत:- तू प्यार का सागर है...
ओम् शान्ति। बच्चे जानते हैं कि बाप सम्मुख बैठे हैं और जो दूर बैठे हैं, सभी के प्रति कहते हैं, सुनना तो उन्हों को भी है। बच्चे जानते हैं कि बाप ज्ञान का सागर है, तो जरूर उनमें ज्ञान होगा ना। जैसे संन्यासी विद्वान हैं तो वह समझते हैं हम विद्वान हैं। बच्चे जानते हैं परमपिता परमात्मा, मात-पिता के सम्मुख बैठे हैं। वह ज्ञान सागर है। ज्ञान से सद्गति होती है। उस ज्ञान सागर से जैसेकि लोटा भर लेते हैं। सागर तो सदैव भरपूर है ना। सागर से कितना पानी सारी दुनिया को मिलता रहता है। कभी खुटता नहीं, अथाह पानी है। तो बाप भी है ज्ञान का सागर, जब तक जीते हैं उनसे ज्ञान सुनते ही रहते हैं। वह सदा भरपूर है। थोड़े से ज्ञान रत्न दे देते हैं, जिससे सारी सृष्टि सद्गति को पाती है। वह है ज्ञान का सागर, शान्ति का सागर, सुख का सागर, उनके संग से पतित से पावन बनते हैं। तुम हो ज्ञान गंगायें, मानसरोवर होता है ना। सरोवर एक बड़ा तालाब है। वह भी कैलाश पर्वत पर दिखाते हैं। समझते हैं बड़ा सागर है, जिसमें डुबका मारने से मनुष्य परी बन जाते हैं। परियों का अर्थ तो समझ नहीं सकते। परियां बहुत शोभनिक होती हैं। अब तुम बच्चे जानते हो बाप हमको यह ज्ञान स्नान कराए ऐसा सुन्दर शोभनिक ज्ञान परी बनाते हैं। वहाँ तो नेचुरल ब्युटी होती है। यहाँ काजल क्रीम आदि लगाए श्रृंगार करते हैं। यह है आर्टीफिशल ब्युटी। तत्व ही तमोप्रधान हैं। वहाँ तत्व भी सतोप्रधान होते हैं। देवताओं जैसे शोभनिक कोई हो नहीं सकते। यहाँ की ब्युटी में हेल्थ तो नहीं रहती। वहाँ तुम्हारी हेल्थ भी अच्छी और ब्युटी भी रहती है। बच्चे समझते हैं बाबा तो कमाल कर देते हैं। मनुष्य बड़े-बड़े मार्बल की मूर्तियां बनाते हैं अथवा अच्छे आर्ट से चित्र बनाते हैं तो उनको बहुत इनाम मिलता है। अब विचार करो बाप ज्ञान और योगबल से हमको क्या से क्या बना देते हैं। यह तो बाप कमाल करते हैं। ज्ञान और योग की कितनी बड़ी बलिहारी है। कमाल है बाबा के ज्ञान बल से आत्मा बिल्कुल ही पवित्र हो जाती है। 5 तत्व भी प्योर हो जाते हैं, जिससे नैचुरल ब्युटी रहती है। नई दुनिया और पुरानी दुनिया में फ़र्क तो रहता है ना। हर एक चीज़ सतोप्रधान, सतो रजो तमो होती है। दुनिया भी ऐसे होती है। जैसे-जैसे मनुष्य ऐसे फिर उनके लिए वैभव रहते हैं। साहूकार के लिए वैभव भी अच्छे होते हैं ना। गरीब के पास ठिक्कर-ठोबर होते हैं। तो इस पुरानी दुनिया में भी ठिक्कर ठोबर हैं। नई दुनिया में सब कुछ नया होगा। तो कितना मोस्ट बील्वेड बाबा है, उनकी हम महिमा करेंगे। बाबा खुद तो नहीं कहेंगे - मैं कितना मोस्ट बील्वेड हूँ। बच्चे बाबा की महिमा करते हैं। बाप कहते हैं मैं तुमको ज्ञान योग से क्या बनाता हूँ। बाबा को फिर क्या इनाम मिलता है। इनएडवान्स ही बाबा को इनाम देते हैं अर्थात् उन पर बलि चढ़ते हैं। गाते भी हैं तुम पर बलिहार जाऊं, तो जरूर इनएडवांस बलिहार जायेंगे ना। ऐसे थोड़ेही पहले बाबा ब्युटीफुल बनावे फिर बाद में तुम बलिहार जायेंगे। बलिहारी भी पूरी चाहिए। वह भी राज़ समझाया है। ऐसे नहीं कि सभी बाबा के पास ले आकर बैठ जाना है। तुमको श्रीमत पर चलना है। वह है सर्व आत्माओं का बाप। उनको आत्माओं का रचयिता नहीं कहेंगे। सृष्टि का रचयिता वा स्वर्ग का रचयिता कहेंगे। बाकी आत्मा और यह खेल तो अनादि है। परन्तु इस समय पुरानी दुनिया को नया बनाते हैं। चेन्ज करते हैं। शरीर तो विनाशी है। बाबा अब हमारी कितनी आयु बढ़ाते हैं। बेहद की आयु बन जाती है। वहाँ एवरेज 150 वर्ष आयु रहती है। यहाँ तो कोई की एक वर्ष भी आयु रहती है। कोई की एक मास भी नहीं चलती। जन्मा और मरा। वहाँ ऐसे नहीं होता। सबकी आयु बड़ी रहती है। कायदे-अनुसार जल्दी से बर्तन टूट नहीं सकता। तो बाप समझाते हैं अब बहुत मेहनत करनी है। तुम शिव शक्ति सेना बाप के मददगार हो। तुम समझते हो इस समय रावण राज्य है, सब विकारी हैं। उन विकारियों से संन्यासी अलग हो जाते हैं फिर सृष्टि रची नहीं जाती। संन्यासी संन्यास सृष्टि ही रचेंगे अर्थात् मुख से आप समान संन्यासी बनायेंगे। उनको वंशावली नहीं कहेंगे। वंशावली गृहस्थ आश्रम में रहते हैं। सतयुग में वंशावली फूल जैसी होती है। संन्यासियों की वंशावली नहीं हो सकती। लिमिटेड हैं। यह तो अनलिमिटेड हैं ना। गृहस्थ आश्रम कहते हैं। वास्तव में आश्रम तो बहुत ऊंचा ठहरा। आश्रम पवित्र होता है। विकारी गृहस्थ को आश्रम नहीं कह सकते। बाप पवित्र गृहस्थ आश्रम धर्मी बनाते हैं, माया रावण अधर्मी बना देती है। मनुष्य अधर्मी बन पड़े हैं। धर्मी, अधर्मी मनुष्य को ही कहेंगे। जानवर को थोड़ेही कहेंगे। तो बाप आकर धर्मी बनाते हैं, माया अधर्मी बना देती है। परन्तु उनको जानते नहीं हैं। जैसे ईश्वर को नहीं जानते वैसे माया को भी नहीं जानते। परमात्मा के लिए कह देते सर्वव्यापी है। परन्तु सर्वव्यापी तो 5 विकार हैं। इस समय भक्त सब बाप को याद करते हैं अर्थात् सब में भगवान की याद है। ऐसे नहीं कि वह सर्वव्यापी है। 5 विकार ही दु:ख देते हैं। तो भक्त भगवान को याद करते हैं, बहुत दु:खी हैं। फिर कह देते हैं दु:ख सुख भगवान ही देते हैं। रावण का नाम ही भूल जाते हैं और माया फिर सम्पत्ति को समझ लेते हैं। सम्पत्ति तो धन को कहा जाता है। इस समय सभी मनुष्य माया रावण के मुरीद हैं। तुम आकर ईश्वर के मुरीद बने हो। वह रावण के दु:ख का वर्सा लेते हैं। तुम बाप से सुख का वर्सा लेते हो। बाप आकरके माताओं को गुरू पद देते हैं। यहाँ कहते हैं पति स्त्री का गुरू है, परन्तु वह तो और ही पतित बना देते हैं। द्रोपदी ने भी कहा ना हमारी लाज रखो। अब बाप कहते हैं इन कन्याओं द्वारा ही उद्धार करूँगा। कन्या का गायन है, कुमारी वह जो पियर और ससुरघर का 21 जन्मों के लिए उद्धार करे। इस समय तुम कन्यायें बनती हो ना। मातायें भी कुमारी बन जाती हैं। ब्रह्माकुमारियां हो ना। तो इस समय की तुम्हारी महिमा चली आती है। कुमारियों ने कमाल की है। बाप ने ही कुमारियों को अपना बनाया है। तो नाम बाला करना है। मातायें भी ईश्वरीय गोद ले कुमारी बन जाती हैं। तो कन्याओं की महिमा वैसे तो सिर्फ गायन-मात्र है। अब फिर प्रैक्टिकल में तुमको बाप जगाते हैं। बाप ने कुमारियों को अपना बनाया है। सीढ़ी चढ़ फिर उतरना मुश्किलात हो जाती है। अभी भी देखते हैं तो कहते हैं ना - नाहेक शादी की। फिर बच्चे पैदा होने से मोह की रग जुट जाती है। तो बाप समझाते हैं आधाकल्प कन्या को शादी कराए विकारी बनाया है। अभी बाप आया हुआ है कहते हैं पवित्र बनो। देखते हो पवित्रता में सुख भी है तो मान भी है। संन्यासियों का कितना मान है। बन्धनमुक्त हो जाते हैं। वह है पवित्रता का बल, वह कोई योग का बल नहीं है। योगबल सिर्फ तुम्हारे पास है। उन्हों का तो है तत्व से योग, जहाँ रहते हैं। जैसे 5 तत्व हैं वैसे वह फिर छठा तत्व है, उनको ब्रह्म ईश्वर कह देते हैं इसलिए उनका योग आर्टीफिशल है। उस योग से विकर्म विनाश नहीं होते, इसलिए गंगा स्नान करने जाते हैं। अगर निश्चय होता कि योग से पावन बनते हैं तो फिर गंगा स्नान नहीं करते। इससे सिद्ध होता है कि उन्हों का योग कायदे के विरुद्ध है। जैसे हिन्दू कोई धर्म नहीं वैसे ब्रह्म भी ईश्वर नहीं। रहने के स्थान को ईश्वर समझ लेते हैं। यह बाप आकर समझाते हैं। तो कुमारियां समझा सकती हैं। हम बी.के. इस भारत को स्वर्ग बनाते हैं, वर्ल्ड आलमाइटी अथॉरिटी राज्य बनाते हैं। बाप कहते हैं माताओं का नाम बहुत बाला करना है। पुरुषों को इसमें मदद करनी चाहिए। यह पवित्र रहना चाहती हैं तो पवित्र रहने दो। तो बाप आकर पहले माताओं और कुमारियों को ज्ञान देकर अपना बनाते हैं। शिव वंशी तो सब हैं ही, फिर ब्रह्माकुमार और कुमारियां बनते हैं। कुमार भी हैं परन्तु थोड़े। कुमारियां जास्ती हैं। तुम्हारे यादगार का मन्दिर भी यहाँ एक्यूरेट है। मनुष्य समझते हैं विकार बिगर सृष्टि कैसे पैदा होगी। बाप कहते हैं अभी यह दु:खदाई पतित सृष्टि नहीं चाहिए। तो जरूर पवित्र रहना पड़े। गवर्मेन्ट भी कहती है पैदाइस कम हो क्योंकि वह समझते हैं इतना अन्न कहाँ से आयेगा। वह पवित्रता की बात नहीं समझते। तुम जानते हो अभी शिवालय स्थापन होता है। बेहद की दुनिया शिवालय बन जाती है। उन्होंने तो एक मन्दिर का नाम रख दिया है शिवालय। वह हो गया हद का शिवालय। यह बनता है बेहद का शिवालय। सारा स्वर्ग शिवालय कहेंगे। शिव ने देवी-देवताओं की रचना की है। उनके मन्दिर बने हुए हैं। वह है चैतन्य शिवालय। फिर यह वेश्यालय बनता है। चैतन्य देवताओं के जड़ मन्दिर बनाकर उन्हों को फिर विकारी लोग पूजते हैं। शिवालय शिवबाबा बनाते हैं। मददगार हैं शिव शक्ति पाण्डव सेना। मैजारिटी शक्तियों की होने कारण उन्हों का नाम बाला हुआ है। कन्यायें जास्ती हैं। शिवबाबा तुम्हें अपना बनाते हैं। श्रीकृष्ण तो छोटा प्रिन्स था वह कैसे अपना बनायेगा। वह तो खुद ही स्वयंवर कर महाराजा बनते हैं। तो यहाँ शिवबाबा कंसपुरी से निकाल तुमको श्रीकृष्णपुरी सतयुग में ले चलते हैं। यह है कंसपुरी। अब सारी दुनिया है एक तरफ और तुम थोड़ी बच्चियां हो दूसरे तरफ। आधाकल्प मनुष्यों ने उल्टा समझाया है। बाप ने आकर सुल्टा समझाया है। आगे कान्ट्रास्ट का बहुत अच्छा किताब था। अभी तो प्वाइंट भी और-और अच्छी निकल रही हैं। बाप कहते हैं दिन-प्रतिदिन तुमको बहुत गुह्य बातें सुनाता हूँ। सब ज्ञान इकट्ठा तो नहीं देंगे। पहले हल्का सुनाते थे। दिन-प्रतिदिन गुह्य होता जाता है। सब गुह्य बातें एक समय कैसे सुनाऊंगा। जो कुछ समझाते वही कल्प पहले भी समझाया था, इसमें कोई संशय की बात नहीं। ऐसे नहीं कि आगे तो बाबा ऐसे कहते थे। अभी फिर ऐसे कहते हैं। अरे पहले तो पहला क्लास था। अजुन बहुत प्वाइंट्स हैं जो और निकलती रहेंगी। जब तक जियेंगे, बाबा सुनाते रहेंगे। बाबा ने कुछ गुह्य राज़ सुनाया तो फिर बतायेंगे। अभी हम पढ़ रहे हैं। उन शास्त्रवादियों को भी शास्त्र कण्ठ रहते हैं। अब 18 अध्याय तो हैं नहीं। यह तो ज्ञान सागर है। सुनाते ही रहते हैं। वह बाप ही ज्ञान का सागर, आनन्द का सागर, शान्ति का सागर है। इस दुनिया में तो कुछ भी नहीं है। न प्यार है, न सार है। वह तो सब बातों का सागर ही सागर है।
मनुष्य कहते हैं वह सर्वव्यापी है। हम भी वही हैं लेकिन उनकी तो महिमा बड़ी जबरदस्त है। सभी भक्त साधू आदि उनको याद करते हैं। दु:खी हैं तब तो कहते हैं वापिस निर्वाणधाम में जायें। सो तो जब निर्वाणधाम का मालिक आये तब ही ले जाये। स्वर्ग की सौगात बच्चों के लिए बाप ले आते हैं। खुद स्वर्ग का मालिक नहीं बनते हैं। बाप देते हैं स्वर्ग की सौगात। फिर रावण आकर दु:ख देते हैं। दु:ख को सौगात नहीं कहेंगे। स्वर्ग के सौगात की चाबी दी है कन्याओं को। कन्यायें भारत को स्वर्ग बनाती हैं। कन्यायें अपने मित्र-सम्बन्धियों को भी समझा सकती हैं - हमने पारलौकिक मात-पिता की गोद ली है। अच्छा!
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का यादप्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।
धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) गृहस्थ को आश्रम अर्थात् पवित्र बनाना है। पवित्रता में ही बल है, पवित्रता का ही मान है इसलिए योगबल और पवित्रता का बल जमा करना है।
2) मोस्ट बील्वेड एक बाबा है, उस पर पूरा-पूरा बलि चढ़ पुरानी दुनिया से बुद्धि निकाल देनी है।
वरदान:- रूहानी आकर्षण द्वारा सेवा और सेवाकेन्द्र को चढ़ती कला में ले जाने वाले योगी तू आत्मा भव
जो योगी तू आत्मायें रूहानियत में रहती हैं, उनकी रूहानी आकर्षण सेवा और सेवाकेन्द्र को स्वत: चढ़ती कला में ले जाती है। योगयुक्त हो रूहानियत से आत्माओं का आह्वान करने से जिज्ञासु स्वत: बढ़ते हैं। इसके लिए मन सदा हल्का रखो, किसी भी प्रकार का बोझ नहीं रहे। दिल साफ मुराद हांसिल करते रहो, तो प्राप्तियां आपके सामने स्वत: आयेंगी। अधिकार ही आप लोगों का है।
स्लोगन:- परमात्म ज्ञानी वह है जो सर्व बन्धनों एवं आकर्षणों से मुक्त है।
27.02.2023 HIND MURLI
“मीठे बच्चे - बाप आया है बेहद सृष्टि की सेवा पर, नर्क को स्वर्ग बनाना - यह सेवा कल्प-कल्प बाप ही करते हैं''
प्रश्नः- संगम की कौन सी रसम सारे कल्प से न्यारी है?
उत्तर:- सारे कल्प में बच्चे बाप को नमस्ते करते हैं, लेकिन संगम पर बाप बच्चों को नमस्ते करते हैं। बाप कहते हैं मैं तुम सिकीलधे बच्चों की सेवा पर उपस्थित हुआ हूँ तो तुम बच्चे बड़े ठहरे ना। बाप कल्प के बाद बच्चों के पास आते हैं, सारी सृष्टि के किचड़े को साफ कर नर्क को स्वर्ग बनाने। बाप जैसा निराकारी, निरहंकारी और कोई हो नहीं सकता। बाप अपने थके हुए बच्चों के पांव दबाते हैं।
ओम् शान्ति। बाप आने से ही पहले-पहले बच्चों को नमस्ते करे या बच्चे बाप को नमस्ते करें? (बच्चे बाप को नमस्ते करें) नहीं, पहले बाप को नमस्ते करना पड़े। संगमयुग की रसम-रिवाज ही सबसे न्यारी है। बाप खुद कहते हैं मैं तुम सबका बाप तुम्हारी सर्विस में आकर उपस्थित हुआ हूँ। तो जरूर बच्चे बड़े ठहरे ना। दुनिया में तो बच्चे बाप को नमस्ते करते हैं। यहाँ बाप नमस्ते करते हैं बच्चों को। गाया भी हुआ है निराकारी, निरहंकारी तो वह भी दिखलाना पड़े ना। वह तो संन्यासियों के चरणों में झुकते हैं। चरणों को चूमते हैं। समझते कुछ भी नहीं। बाप आते ही हैं बच्चों से मिलने - कल्प के बाद। बहुत सिकीलधे बच्चे हैं, इसलिए कहते हैं - मीठे बच्चे थके हो। द्रोपदी के भी पांव दबाये हैं ना। तो सर्वेन्ट हुआ ना। वन्दे मातरम् किसने उच्चारा है? बाप ने। बच्चे समझते हैं बाप आया हुआ है सारी सृष्टि की बेहद सेवा पर। सृष्टि पर कितना किचड़ा है। यह है ही नर्क तो बाप को आना पड़ता है, नर्क को स्वर्ग बनाने - बहुत उकीर (प्यार-उमंग) से आते हैं। जानते हैं मुझे बच्चों की सेवा में आना है। कल्प-कल्प सेवा पर उपस्थित होना है। जब वह खुद आते हैं तब बच्चे समझते हैं बाप हमारी सेवा में उपस्थित हुए हैं। यहाँ बैठे सभी की सेवा हो जाती है। ऐसे नहीं सबके पास जाता होगा। सर्वव्यापी का अर्थ भी नहीं जानते। सारी सृष्टि का कल्याणकारी दाता तो एक है ना। उनकी भेंट में मनुष्य कोई सेवा कर न सकें। उनकी है बेहद की सेवा।
गीत:- जाग सजनियां जाग...
ओम् शान्ति। देखो कितना अच्छा गीत है। नव युग और पुराना युग.... युगों पर भी समझाना चाहिए। युग भारतवासियों के लिए ही हैं। भारतवासियों से वह सुनते हैं कि सतयुग, त्रेता होकर गये हैं क्योंकि वह तो आते हैं द्वापर में। तो औरों से सुनते हैं प्राचीन खण्ड भारत था, उसमें देवी-देवतायें राज्य करते थे। आदि सनातन देवी-देवता धर्म था, अभी नहीं है। गाया जाता है ब्रह्मा द्वारा स्थापना, विष्णु द्वारा पालना कराते हैं। करते नहीं हैं, कराते हैं। तो यह है उनकी महिमा। वास्तव में उनको पहले रचना रचनी है सूक्ष्मवतन की क्योंकि क्रियेटर है। गीता के लिए तो सब कहते हैं सर्व शास्त्रमई शिरोमणी श्रीमद् भगवत गीता। परन्तु भगवान का नाम नहीं जानते, कौन सा भगवान? व्यास आदि शास्त्र बनाने वालों ने श्रीकृष्ण का नाम डाल दिया है। गीता तो देवी-देवता धर्म की माई बाप है। बाकी सब बाद में आये। तो यह हुई प्राचीन। अच्छा भगवान ने गीता कब सुनाई? जरूर सभी धर्म होने चाहिए। सभी धर्मों के लिए वास्तव में एक गीता है मुख्य। सब धर्म वालों को मानना चाहिए। परन्तु मानते कहाँ हैं। मुसलमान, क्रिश्चियन आदि बड़े कट्टर हैं। वह अपने धर्म शास्त्र को ही मानते हैं। जब मालूम पड़ता है कि गीता प्राचीन है तब मंगाते हैं। परन्तु यह तो जानते नहीं कि भगवान ने गीता कब सुनाई? चिन्मयानंद कहते हैं 3500 वर्ष बिफोर क्राइस्ट, गीता के भगवान ने गीता सुनाई। अब 3500 वर्ष पहले तो यह धर्म थे ही नहीं। फिर सभी धर्मों का वह शास्त्र कैसे हो सकता। इस समय तो सभी धर्म हैं। सभी धर्मों की गीता द्वारा सद्गति करने बाप आया हुआ है। गीता बाप की उच्चारी हुई है। उसमें बाप के बदले बच्चे का नाम डाल मुश्किलात कर दी है। इससे सिद्ध नहीं होता कि शिवरात्रि कब मनाये? शिव जयन्ती और कृष्ण जयन्ती लगभग हो जाती। शिव जयन्ती समाप्त होती और कृष्ण का जन्म हो जाता। कभी भी श्रीकृष्ण ज्ञान यज्ञ नहीं गाया जाता। रूद्र ज्ञान यज्ञ गाया जाता है, उनसे ही विनाश ज्वाला प्रज्जवलित हुई। सो तो बरोबर देख रहे हो। आदि सनातन देवी-देवता धर्म की फिर से स्थापना हो रही है। फिर और धर्म रहेंगे नहीं। कृष्ण भी तब आये जबकि सभी धर्म न हो। यह भी समझ की बात है ना। सतयुग में सूर्यवंशी देवी-देवताओं का राज्य था तो जरूर थोड़े मनुष्य होंगे। बाकी सब आत्मायें मुक्तिधाम में रहती हैं। भगवान से तो सबको मिलना होता है ना। बाप को सलाम तो करेंगे ना। बाप भी फिर से आकर सलाम करते हैं बच्चों को। बच्चे फिर बाप को करते हैं। इस समय बाप चैतन्य में आया हुआ है। फिर वहाँ सभी आत्मायें बाप से मिलेगी जरूर। सबको भगवान से मिलना जरूर है। कहाँ मिले? यहाँ तो मिल न सकें क्योंकि कोटों में कोई, कोई में भी कोई ही आयेंगे। तो सब भक्त कब और कहाँ मिलेंगे? जहाँ से भगवान से बिछुड़े हैं, वहाँ ही जाकर मिलेंगे। भगवान का निवास स्थान है ही परमधाम। बाप कहते हैं मैं सभी बच्चों को परमधाम ले जाता हूँ - दु:ख से लिबरेट कर। यह काम उनका ही है। अभी तो देखो अनेक भाषायें हैं। अगर संस्कृत भाषा शुरू करें तो इतने यह सब कैसे समझें। आजकल गीता संस्कृत में कण्ठ करा देते हैं। बहुत अच्छी गीता गाते हैं संस्कृत में। अब अहिल्यायें, कुब्जायें, अबलायें... संस्कृत कहाँ जानती। हिन्दी भाषा तो कॉमन है। हिन्दी का प्रचार जास्ती है। भगवान भी हिन्दी में सुना रहे हैं। वह तो गीता के अध्याय बतलाते हैं, इनके अध्याय कैसे बना सकेंगे। यह तो शुरू से लेकर मुरली चलती रहती है। बाप को आना ही है पतित सृष्टि को पावन बनाने। हेविनली गॉड फादर तो जरूर स्वर्ग ही क्रियेट करेगा। नर्क थोड़ेही रचेगा, नर्क की स्थापना रावण करते हैं। स्वर्ग की स्थापना बाप करते, उनका राइट नाम शिव ही है। शिव अर्थात् बिन्दी। आत्मा ही बिन्दी है ना। स्टार क्या है? कितना छोटा है? ऐसे थोड़ेही आत्मायें ऊपर जायेंगी तो बड़ी हो जायेंगी। यह तो भ्रकुटी के बीच में निशानी दिखाते हैं। कहते भी हैं भ्रकुटी के बीच में चमकता है अजब सितारा। तो जरूर भ्रकुटी में इतनी छोटी आत्मा ही रह सकेगी। तो जैसे आत्मा है वैसे परमात्मा। परन्तु वन्डर यह है जो हर एक इतनी छोटी आत्मा में सभी जन्मों का पार्ट भरा हुआ है। जो कभी घिसता नहीं है, फार एवर चलता रहेगा। कितनी गुह्य बातें हैं। आगे कब यह बातें सुनाई थी क्या? आगे तो कहते थे लिंग रूप है, अंगुष्ठाकार है। पहले ही अगर यह बातें सुनाते तो तुम समझ नहीं सकते। अभी बुद्धि में बैठता है। स्टार तो सब कहेंगे। साक्षात्कार भी स्टार का होता है। तुमको साक्षात्कार किस चीज़ का चाहिए? नई दुनिया का। नई दुनिया स्वर्ग रचते हैं बाप। वही सबको भेज देंगे। खुद एक ही बार आते हैं। अब मनुष्य मांगते हैं शान्ति क्योंकि सभी शान्ति में ही जाने वाले हैं। कहते हैं सुख काग विष्टा समान है। गीता में तो है राजयोग.... जिससे राजाओं का राजा बनते हैं। जो कहते हैं सुख काग विष्टा समान है तो उनको राजाई कैसे मिले। यह तो प्रवृत्ति मार्ग की बात है। संन्यासी तो गीता को भी उठा न सके। बाप कहते हैं संन्यास दो प्रकार के हैं। यूँ तो संन्यासियों में भी बहुत प्रकार के हैं। यहाँ तो एक ही प्रकार का संन्यास है। तुम बच्चे पुरानी दुनिया का संन्यास करते हो। गृहस्थ व्यवहार में रहते, कमल फूल समान रहना है। कैसे रहते हैं, सो इन्हों से पूछो। बहुत हैं जो ऐसे रहते हैं। संन्यासियों का यह काम नहीं है। नहीं तो खुद क्यों घरबार छोड़ते। चैरिटी बिगन्स एट होम। पहले-पहले तो स्त्री को सिखलायें। शिवबाबा भी कहते हैं पहले-पहले मैं अपनी स्त्री (साकार ब्रह्मा) को समझाता हूँ ना। चैरिटी बिगन्स एट होम। शिवबाबा का यह चैतन्य होम है। पहले-पहले यह स्त्री सीखती फिर उनसे एडाप्टेड चिल्ड्रेन नम्बरवार सीख रहे हैं। यह बड़ी गुह्य बातें हैं। सभी शास्त्रों में मुख्य शास्त्र है गीता। परन्तु गीता शास्त्र से कोई प्रेरणा नहीं करते हैं। वह तो यहाँ आते हैं, यादगार भी हैं। शिव के अनेक मन्दिर हैं। खुद कहते हैं मैं साधारण ब्रह्मा तन में आता हूँ। यह अपने जन्मों को नहीं जानते। एक की बात तो है नहीं। सभी ब्रह्मा मुख वंशावली बैठे हैं। सिर्फ इस एक को ही बाप समझाये, परन्तु नहीं। ब्रह्मा मुख द्वारा तुम ब्राह्मण रचे गये सो तो ब्राह्मणों को ही समझाते हैं। यज्ञ हमेशा ब्राह्मणों द्वारा ही चलता है। उन गीता सुनाने वालों के पास ब्राह्मण हैं नहीं, इसलिए वह यज्ञ भी नहीं ठहरा। यह तो बड़ा भारी यज्ञ है। बेहद के बाप का बेहद का यज्ञ है। कब से डेगियां चढ़ती आई हैं। अभी तक भण्डारा चलता ही रहता है। समाप्त कब होगा? जब सारी राजधानी स्थापन हो जायेगी। बाप कहते हैं तुमको वापिस ले जायेंगे। फिर नम्बरवार पार्ट बजाने भेज देंगे। ऐसे और तो कोई कह न सके कि हम तुम्हारा पण्डा हूँ, तुमको ले जाऊंगा। जो भी पतित मनुष्य हैं, सबको पावन बनाकर ले जाते हैं। फिर अपने-अपने धर्म स्थापन करने समय पावन आत्मायें आना शुरू करती हैं। अनेक धर्म अभी हैं। बाकी एक धर्म नहीं है, फिर आधाकल्प कोई शास्त्र नहीं रहता। तो गीता सब धर्मो की, सब शास्त्रों की शिरोमणी है क्योंकि इससे ही सबकी गति सद्गति होती है। तो समझाना चाहिए - सद्गति है भारतवासियों की, बाकी गति तो सबकी होती है। भारतवासियों में भी ज्ञान वह लेते हैं जो पहले-पहले परमात्मा से अलग हुए हैं, वही पहले ज्ञान लेंगे। वही फिर पहले-पहले जाना शुरू करेंगे। नम्बर-वार फिर सबको आना है। सतो रजो तमो से तो सबको पार करना है। अभी कल्प की आयु पूरी हुई है। सभी आत्मायें हाजिर हैं। बाप भी आ गया है। हरेक को अपना पार्ट बजाना है। नाटक में सभी एक्टर्स इकट्ठे तो नहीं आते, अपने-अपने टाइम पर आते हैं। बाप ने समझाया है नम्बरवार कैसे आते हैं। वर्णों का राज़ भी समझाया है। चोटी तो ब्राह्मणों की है। परन्तु ब्राह्मणों को भी रचने वाला कौन है? शूद्र तो नहीं रचेंगे। चोटी के ऊपर फिर ब्राह्मणों का बाप ब्रह्मा। ब्रह्मा का बाप फिर है शिवबाबा। तो तुम हो शिव वंशी ब्रह्मा मुख वंशावली। तुम ब्राह्मण फिर सो देवता बनेंगे। वर्णों का हिसाब समझाना है। बच्चों को राय भी दी जाती है। यह तो जानते हैं सब एक जैसे होशियार तो नहीं हैं। कोई नये के आगे विद्वान पण्डित आदि डिबेट करेंगे तो वह समझा नहीं सकेंगे। तो कह देना चाहिए कि मैं नई हूँ। आप फलाने टाइम पर आना फिर हमारे से बड़े आपको आकर समझायेंगे, मेरे से तीखे और हैं। क्लास में नम्बरवार होते हैं ना। देह-अभिमान में नहीं आना चाहिए। नहीं तो आबरू (इज्जत) चली जाती है। कहते हैं बी.के. तो पूरा समझा नहीं सकते, इसलिए देह-अभिमान छोड़ रेफर करना चाहिए और तरफ। बाबा भी कहते हैं ना हम ऊपर से पूछेंगे। पण्डित लोग तो बड़ा माथा खराब करेंगे। तो उनको कहना चाहिए - मैं सीख रही हूँ, माफ करिये। आप कल आना तो हमारे बड़े भाई-बहिनें आपको समझायेंगे। महारथी, घोड़ेसवार, प्यादे तो हैं ना। किन्हों की शेर पर सवारी भी है। शेर सबसे तीखा होता है। जंगल में अकेला रहता है। हाथी हमेशा झुण्ड में रहता है। अकेला होगा तो कोई मार भी दे। शेर तीखा होता है। शक्तियों की भी शेर पर सवारी है।
तुम्हारी मिशन भी बाहर निकलनी है। परन्तु बाबा देखते हैं पान का बीड़ा उठाने वाला कौन है? प्राचीन देवता धर्म किसने स्थापन किया - वह सिद्ध कर बताना है। बहुत तो गॉड गॉडेज भी कहते हैं। वह समझते हैं गॉड-गॉडेज अलग हैं, ईश्वर अलग है। लक्ष्मी-नारायण को भगवान भगवती कहते हैं। परन्तु लॉ के विरुद्ध है। वह तो हैं देवी-देवतायें। अगर लक्ष्मी-नारायण को भगवान भगवती कहते तो ब्रह्मा विष्णु शंकर को पहले भगवान कहना पड़े। समझ भी चाहिए। अच्छा!
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का यादप्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।
धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) देह-अभिमान छोड़ अपने से बड़ों को आगे करना है। बाप समान निरहंकारी बनना है।
2) चैरिटी बिगेन्स एट होम... पहले अपने गृहस्थ व्यवहार को कमल फूल समान बनाना है। घर में रहते हुए बुद्धि से पुरानी दुनिया का संन्यास करना है।
वरदान:- सम्बन्ध में सन्तुष्टता रूपी स्वच्छता को धारण कर सदा हल्के और खुश रहने वाले सच्चे पुरुषार्थी भव
सारे दिन में वैरायटी आत्माओं से संबंध होता है। उसमें चेक करो कि सारे दिन में स्वयं की सन्तुष्टता और सम्बन्ध में आने वाली दूसरी आत्माओं की सन्तुष्टता की परसेन्टेज कितनी रही? सन्तुष्टता की निशानी स्वयं भी मन से हल्के और खुश रहेंगे और दूसरे भी खुश रहेंगे। संबंध की स्वच्छता अर्थात् सन्तुष्टता यही सम्बन्ध की सच्चाई और सफाई है, इसलिए कहते हैं सच तो बिठो नच। सच्चा पुरुषार्थी खुशी में सदा नाचता रहेगा।
स्लोगन:- जिन्हें किसी भी बात का गम नहीं, वही बेगमपुर के बेफिक्र बादशाह हैं।
26.02.2023 HINDI MURLI
नये वर्ष में सदा उमंग-उत्साह में उड़ना और सर्व के प्रति महादानी, वरदानी बन व्यर्थ को समाप्त करना
आज नव युग नई सृष्टि के रचता बापदादा अपने नवयुग के आधारमूर्त बच्चों को देख रहे हैं। बापदादा के साथ-साथ आप सभी बच्चे सदा सहयोगी हो, इसलिये आप ही आधारमूर्त हो। दुनिया के हिसाब से आज का दिन वर्ष का संगम है। पुराना वर्ष जा रहा है और नया वर्ष आ रहा है। ये है वर्ष का संगम दिन और आप बैठे हो बेहद के संगमयुग पर। आप सभी नव वर्ष के साथ-साथ नव युग की सभी को मुबारक देते हो। एक दिन की मुबारक नहीं, लेकिन नव युग के अनेक जन्मों की मुबारक देते हो। इस संगम पर अच्छी तरह से अनुभव करते हो कि इस समय हम ब्राह्मण आत्माओं की नई जीवन है। नई जीवन में आ गये हो ना। ब्राह्मणों का संसार ही नया है। अमृतवेले से देखो तो नई रीत, नई प्रीत है। पुरानी दुनिया की दिनचर्या और नये जीवन ब्राह्मण जीवन की दिनचर्या में कितना अन्तर है! सब नया हो गया - स्मृति नई, वृत्ति नई, दृष्टि नई, सब बदल गया ना। और नई जीवन कितनी प्यारी लगती है! वैसे भी नई चीज़ सबको प्यारी लगती है। पुरानी चीज़ छोड़ना चाहते हैं और नई चीज़ लेना चाहते हैं। तो इस समय का यह छोटा-सा नया संसार है। संसार भी नया और संस्कार भी नये, इसलिये दुनिया वाले भी नये वर्ष को धूमधाम से मनाते हैं।
मनाने का अर्थ है उमंग-उत्साह में आना। उत्साह होता है, इसीलिये मनाने के दिन को उत्सव कहा जाता है। उत्साह से ही एक-दो को बधाइयां वा मुबारक देते हैं वा ग्रीटिंग्स देते हैं। आप ब्राह्मण आत्माओं के लिये हर दिन उत्सव है। सदा उत्सव अर्थात् उमंग-उत्साह में रहते हो। यह उमंग-उत्साह ही ब्राह्मण जीवन है। दुनिया की रीति प्रमाण विशेष दिन को मनाते हो, आज मनाने के लिये इकट्ठे हुए हो ना। लेकिन आपका नव युग नई जीवन का उमंग-उत्साह सदा ही है। ऐसे नहीं कि 2 तारीख हो जायेगी तो उमंग-उत्साह खलास हो जायेगा, एक मास हो गया तो और खत्म हो जायेगा। हर दिन उमंग-उत्साह बढ़ता जाता है, कम नहीं होता। ऐसे है ना? कि अपने-अपने स्थान पर जायेंगे तो उत्साह खत्म हो जायेगा? हर घड़ी उमंग-उत्साह की है क्योंकि उमंग-उत्साह ही आप ब्राह्मणों की उड़ती कला के पंख है। इस उमंग-उत्साह के पंखों से सदा उड़ते रहते हो। अगर कार्य अर्थ कर्म में भी आते हो फिर भी उड़ती कला की स्थिति से कर्मयोगी बन कर्म में आते हो। तो उड़ती कला वाले हो ना, तो बिना पंखों के तो उड़ नहीं सकते। यह उमंग-उत्साह उड़ती कला के पंख सदा साथ हैं। यह उमंग-उत्साह आप ब्राह्मणों के लिये बड़े से बड़ी शक्ति है। नीरस जीवन नहीं है। दुनिया वाले तो कहेंगे कि क्या करें, रस नहीं है, नीरस है, बेरस है और आप क्या कहेंगे उमंग-उत्साह का रस है ही है। कभी दिलशिकस्त नहीं हो सकते हो। सदा दिल खुश। कैसी भी मुश्किल बात हो, लेकिन उमंग-उत्साह मुश्किल को सहज कर देता है। उत्साह त़ूफान को भी तोह़फा बना देता है, पहाड़ को भी राई नहीं लेकिन रुई बना देता है। उत्साह किसी भी परीक्षा वा समस्या को मनोरंजन अनुभव कराता है इसलिये उमंग-उत्साह में रहने वाले नव युग के आधारमूर्त नव जीवन वाले ब्राह्मण आत्मायें हो। अपने को जानते हो। मानते भी हो या स़िर्फ जानते हो? क्या कहेंगे? जानते भी हैं, मानते भी हैं और उसी में चलते भी हैं। सदा यह उत्साह रहता है कि कल्प पहले भी हम ही थे, अब भी हैं और अनेक बार हम ही बनेंगे। तो अविनाशी उत्साह हो गया ना। थे, हैं और सदा होंगे - तीनों काल का हो गया ना। पास्ट, प्रेजेन्ट और फ्युचर तीन काल हो गये। तो अविनाशी हो गया ना। बापदादा देख रहे थे कि अविनाशी उमंग-उत्साह में रहने वाली आत्मायें नम्बरवार हैं या सब नम्बरवन हैं? जब हैं ही निश्चयबुद्धि विजयी तो विजयी तो ज़रूर नम्बरवन होंगे ना, नम्बरवार थोड़ेही होंगे।
तो सदा नव जीवन के इस उत्साह में उड़ते चलो क्योंकि आप आधारमूर्त हो। स़िर्फ अपने जीवन के लिये आधार नहीं हो लेकिन विश्व के सर्व आत्माओं के आधारमूर्त हो। आपकी श्रेष्ठ वृत्ति से विश्व का वातावरण परिवर्तन हो रहा है। आपके पवित्र दृष्टि से विश्व की आत्मायें और प्रकृति - दोनों पवित्र बन रही हैं। आपके दृष्टि से सृष्टि बदल रही है। आपके श्रेष्ठ कर्मों से श्रेष्ठाचारी दुनिया बन रही है। तो कितनी ज़िम्मेवारी है! विश्व की ज़िम्मेवारी का ताज पहना हुआ है ना? कि कभी भारी लगता है तो उतार देते हो? क्या करते हो? जो डबल लाइट रहते हैं उनको ये ज़िम्मेवारी का ताज भी सदा लाइट (हल्का) अनुभव होगा, भारी नहीं लगेगा। इस समय के ताजधारी भविष्य के ताजधारी बनते हैं। तो नये वर्ष में क्या करेंगे? अव्यक्त वर्ष भी मनाया, अव्यक्त वर्ष अर्थात् फ़रिश्ता बन गये कि अभी बनना है? फरिश्ते क्या करते हैं?
अव्यक्त का अर्थ ही है फ़रिश्ता। वर्ष पूरा किया तो फ़रिश्ता बने ना, कि नहीं? अव्यक्त वर्ष अभी लम्बा कर दें? दो वर्ष का एक वर्ष बना दें? अभी और आगे बढ़ना है ना। अव्यक्त वर्ष मनाया, अब फ़रिश्ता बनकर क्या करेंगे?
सदा हर दिन, हर समय महादानी और वरदानी बनना है। तो यह वर्ष महादानी वरदानी वर्ष मनाओ। जो भी सम्बन्ध-सम्पर्क में आये उस आत्मा को महादानी बन कोई न कोई शक्ति का, ज्ञान का, गुण का दान देना ही है। तीनों ख़ज़ाने कितने भरपूर हो गये हैं! ज्ञान का ख़ज़ाना भरपूर है कि थोड़ा कम है? मास्टर नॉलेजफुल हो ना। तो ज्ञान का ख़ज़ाना भी है, शक्तियों का ख़ज़ाना भी है और गुणों का ख़ज़ाना भी है। तीनों में सम्पन्न हो कि एक में सम्पन्न हो, दो में नहीं? वर्तमान समय आत्माओं को तीनों की बहुत आवश्यकता है। सारे दिन में कोई न कोई दान देना ही है, चाहे ज्ञान का, चाहे शक्तियों का, चाहे गुणों का, लेकिन देना ही है। महादानी आत्माओं का बिना दान दिये हुए कोई भी दिन न हो। ऐसे नहीं, वर्ष पूरा हो जाये और कहो हमें तो चान्स नहीं मिला। चान्स लेना भी अपने ऊपर है कि चान्स देने वाला दे तब चान्स ले सकते हैं या स्वयं भी चांस ले सकते हैं, लेना आता है? कि कोई देवे तो लेना आता है? कोई चान्स नहीं देगा तो क्या करेंगे? देखते, सोचते रहेंगे? सारे दिन में चाहे ब्राह्मण आत्माओं के, चाहे अज्ञानी आत्माओं के सम्बन्ध-सम्पर्क में तो आते ही हो ना, जिसके भी सम्बन्ध-सम्पर्क में आओ उनको कोई न कोई दान अर्थात् सहयोग दो। दान शब्द का रूहानी अर्थ है सहयोग देना। तो रोज़ महादानी वा वरदानी बन वरदान कैसे देंगे? वरदान देने की विधि क्या है? आपके जड़ चित्र तो अभी तक वरदान दे रहे हैं। तो वरदान देने की विधि है - जो भी आत्मा सम्बन्ध-सम्पर्क में आये उनको अपने स्थिति के वायुमण्डल द्वारा और अपने वृत्ति के वायब्रेशन्स द्वारा सहयोग देना अर्थात् वरदान देना। कैसी भी आत्मा हो, गाली देने वाली भी हो, निन्दा करने वाली हो लेकिन अपनी शुभ भावना, शुभ कामना द्वारा, वृत्ति द्वारा, स्थिति द्वारा ऐसी आत्मा को भी गुण दान या सहनशीलता की शक्ति का वरदान दो। अगर कोई क्रोध अग्नि में जलता हुआ आपके सामने आये तो आग में तेल डालेंगे या पानी डालेंगे? पानी डालेंगे ना कि थोड़ा तेल का भी छींटा डालेंगे? अगर क्रोधी के आगे आपने मुख से क्रोध नहीं किया, मुख से तो शान्त रहे लेकिन आंखों द्वारा, चेहरे द्वारा क्रोध की भावना रखी तो भी तेल के छींटे डाले। क्रोधी आत्मा परवश है, रहम के शीतल जल द्वारा वरदान दो। तो ऐसे वरदानी बने हो? कि जिस समय आवश्यकता है उस समय सहनशक्ति का तीर नहीं चलता है? अगर समय पर कोई भी अमूल्य वस्तु कार्य में नहीं लगी तो उसको अमूल्य कहा जायेगा? अमूल्य अर्थात् समय पर मूल्य कार्य में लगे। तो इस वर्ष क्या करेंगे? महादानी, वरदानी बनो। चैतन्य में संस्कार भरते हो तब तो जड़ चित्रों द्वारा भी वरदानी मूर्त बनते हो। संस्कार तो अभी भरने है ना, कि जिस समय मूर्ति बनेगी उस समय भरेंगे?
महादानी-वरदानी मूर्त बनने से व्यर्थ स्वत: ही खत्म हो जायेगा क्योंकि जो महादानी हैं, वरदानी हैं, दूसरे को देने वाले दाता हैं तो दाता का अर्थ ही है समर्थ। समर्थ होगा तब तो देगा। तो जहाँ समर्थ है वहाँ व्यर्थ स्वत: ही खत्म हो जाता है। समर्थ स्थिति है स्विच ऑन होना। जैसे इस स्थूल लाइट का स्विच ऑन करना अर्थात् अन्धकार को समाप्त करना, ऐसे समर्थ स्थिति अर्थात् स्विच ऑन करना। तो स्विच ठीक है या कभी ठीक, कभी लूज़ हो जाता है या फ्यूज़ हो जाता है? ऑन करना तो आता है ना। आजकल तो छोटे-छोटे बच्चे भी स्विच ऑन करने में होशियार होते हैं। टी.वी. का स्विच ऑन कर देते हैं ना। तो स्विच ऑन होने से एक-एक व्यर्थ संकल्प को समाप्त करने की मेहनत से छूट जायेंगे। अव्यक्त फ़रिश्तों का यही श्रेष्ठ कार्य है। और क्या नवीनता करेंगे? अव्यक्त वर्ष में अपना चार्ट रखा था कि कभी रखा, कभी नहीं रखा? कभी-कभी वाले बने या सदा वाले बनें? कभी-कभी वाले ज्यादा हैं।
इस नये वर्ष में नया चार्ट रखना। क्या नया चार्ट रखेंगे? चार सब्जेक्ट को तो अच्छी तरह से जानते हो। तो इस वर्ष का यही चार्ट रखना कि चारों ही सब्जेक्ट में - चाहे ज्ञान में, चाहे योग में, धारणा में, सेवा में, हर सब्जेक्ट में हर रोज़ कोई न कोई नवीनता लानी है। ज्ञान अर्थात् समझदार बनना, समझ देना और समझदार बन चलना। ज्ञान में भी नवीनता का अर्थ है जो अपने में कमी है उसको धारण किया तो नवीनता हुई ना। ना से हाँ हुई तो नया हुआ ना। इसी रीति से योग के प्रयोग में हर रोज़ कोई न कोई नया अनुभव करो। योग में बहुत अच्छे बैठे, बहुत अच्छा योग लगा, लेकिन नवीनता क्या हुई? परसेन्टेज़ बढ़ना भी नवीनता है। आज अगर आपकी परसेन्टेज़ योग की 50 प्रतिशत है और कल 50 से वृद्धि हो गई तो नवीनता हो गई। ऐसे नहीं कि एक ही मास में 50-50 लगाते जाओ। तो चारों ही सब्जेक्ट में स्व के प्रगति में नवीनता, विधि में नवीनता, प्रयोग में नवीनता, औरों को सहज योगी बनाने में और परसेन्टेज़ बढ़ना माना नवीनता। किसको दु:ख दिया, किसको क्रोध किया यह तो कॉमन चार्ट है। यह तो आपकी जो रॉयल प्रजा है वह भी रखती है। आप रॉयल प्रजा हो वा राजा हो? तो नवीनता से स्वत: ही तीव्र पुरुषार्थ के समीपता की अनुभूति होती रहेगी। समझा क्या चार्ट रखना है? और हर तीन मास में रोज़ का नहीं यहाँ भेजना, काम बढ़ जायेगा। इस वर्ष तो आपको इकॉनामी भी करनी है ना। यह वर्ष विशेष इकॉनामी का है। एक नामी और इकॉनामी। ज्ञान सरोवर बना रहे हो तो सबमें इकॉनामी करना। सब ख़ज़ानों में, समय में भी, संकल्प में भी, सम्पत्ति में भी, सबमें इकॉनामी। तो हर तीन मास का स्वयं ही साक्षी हो कर चार्ट चेक करके शॉर्ट में अपना समाचार देना। हर तीन मास में देखना प्रगति है या जैसे हैं वैसे ही हैं? गिरती कला में तो जाना नहीं। लेकिन ऐसा भी नहीं कि जैसा है, वैसा ही हो। पुरुषार्थ में मिडगेट नहीं बनना। मिडगेट अच्छा लगेगा! ऐसे नहीं कहना कि चाहते तो थे लेकिन क्या करें...! क्या-क्या नहीं कहना। ब्राह्मणों की यह भाषा नहीं है कि क्या करें, कैसे करें, ऐसा करें, वैसा करें... लेकिन दूसरों को भी सहयोग देंगे कि ऐसे करो। समझा क्या चार्ट रखना है? अब देखेंगे कौन-कौन क्या-क्या करता है?
बापदादा स्नेह के कारण नाम एनाउन्स नहीं करते हैं। किसने क्या-क्या किया, जानते तो हैं ना। आजकल टी.वी. का फ़ैशन है बापदादा के पास भी टी.वी. है। बापदादा जानते हैं जो पिछले वर्ष काम दिया वो किसने कितना किया? नाम एनाउन्स करें ह़ाफ कास्ट कितने रहे, फुल कॉस्ट कितने रहे?
तो इस वर्ष महादानी-वरदानी मूर्त स्वयं प्रति भी और सर्व प्रति भी बनो और हर रोज़ कोई न कोई नवीनता अर्थात् प्रोग्रेस अवश्य करो। तो ये हुआ स्व के पुरुषार्थ के प्रति। सेवा में क्या करेंगे? सेवा में भी नवीनता लानी है ना। मेले भी बहुत कर लिये, प्रदर्शनियां तो अनगिनत कर लीं, सेमीनार-कॉन्फ्रेन्स भी बहुत की, अभी आवाज़ बुलन्द करने वाले माइक तो तैयार करने ही हैं लेकिन उसकी विधि क्या है? वैसे पहले भी सुनाया है लेकिन किया कम है। सेवा की रिजल्ट में देखा गया है कि बड़े निमित्त आत्माओं को समीप लाने के पहले चाहे कोई नेता है, चाहे कोई बड़े इन्डस्ट्रियलिस्ट हैं, चाहे कोई बड़े ऑफिसर हैं, लेकिन उन्हों को समीप लाने का साधन है उन्हों के सेक्रेटरी को अच्छी तरह से समीप लाओ। आप लोग बड़ों के ऊपर टाइम देते हो। वो अच्छा-अच्छा कहकर फिर सो जाते हैं। उन्हों को फिर जगाने के लिये इतना टाइम तो मिलता नहीं, न वो देते हैं, न आप जा सकते हो, इसलिये सेक्रेटरी जो होते हैं वो बदलते भी नहीं हैं, बड़े तो सब बदल भी जाते हैं। आज एक मिनिस्टर की सेवा करते हो और कल वो प्रजा बन जाता है। सेक्रेटरी काफी सहयोगी बन सकते हैं। तो किसी भी वर्ग की सेवा में इस वर्ष विशेष सेक्रेटरी, मैनेजर्स या प्राइवेट असिस्टेन्ट जो भी शक्तिशाली हों, बड़ों के समीप हों, उन आत्माओं की सेवा विशेष करो।
दूसरी बात, पहले भी इशारा दिया है कि वर्तमान समय ‘कम खर्चा और नाम बाला' उसकी विधि है कि जो भी छोटी या बड़ी संस्थायें हैं, एसोसिएशन्स हैं उन्हों से सम्बन्ध-सम्पर्क रखो, बनी-बनाई स्टेज पर नाम बाला करो। कम खर्चा, नाम बाला। करते हो लेकिन और तीव्र गति से। हर देश में या हर गांव में या हर जिले में जो भी भिन्न-भिन्न प्रकार के एसोसिएशन्स हैं या बहुत वर्ग के कार्य करने वाले हैं, कॉन्फ्रेन्स करने वाले हैं या सम्मेलन करते हैं तो बनी-बनाई स्टेज पर सन्देश दो। तो समय और मेहनत, दोनों बच जायेंगी। अभी इसको तीव्र गति में लाओ। चेक करो कि जिस देश के या जिस स्थान के निमित्त बने हैं उस स्थान की कोई भी संस्था वंचित नहीं रह जाये क्योंकि वर्तमान समय वायुमण्डल परिवर्तन हो गया है। अभी डर कम है, स्नेह ज्यादा है, अच्छा मानते हैं। अच्छा बनते नहीं हैं लेकिन अच्छा मानते हैं इसलिये इस दो प्रकार की सेवा को और अण्डरलाइन करो तो सहज माइक तैयार हो जायेंगे। नया वर्ष शुरू किया है तो नया विधि और विधान भी चाहिये ना।
इस नये वर्ष का अमृतवेले सदा यह स्लोगन इमर्ज करना कि “सदा उमंग-उत्साह में उड़ना है और दूसरों को भी उड़ाना है।'' बीच-बीच में चेक करना। ऐसे नहीं कि अमृतवेले चेक करो और सारा दिन मर्ज कर दो। फिर रात को सोचो कि आज का दिन तो ऐसे ही रहा। नहीं, बीच-बीच में चेक करो, इमर्ज करो कि उमंग-उत्साह के बजाय कोई और रास्ते पर तो नहीं चले गये? उड़ती कला के बजाय और किसी कला ने तो अपने तरफ आकर्षित नहीं किया? अच्छा!
चारों ओर के नव जीवन अनुभव करने वाले सर्व ब्राह्मण बच्चों को, सदा नव युग के आधारमूर्त श्रेष्ठ आत्माओं को, सदा संकल्प, बोल और कर्म द्वारा महादानी-वरदानी आत्माओं को, सदा स्वयं की स्थिति द्वारा औरों की परिस्थिति को भी सहज बनाने वाली समर्थ आत्माओं को, सदा हर दिन स्वयं में प्रगति अर्थात् नवीनता अनुभव करने वाले समीप आत्माओं को, सदा एकनामी और इकॉनामी करने वाले बाप समान समीप आत्माओं को बापदादा का याद-प्यार और नमस्ते।
वरदान:- तन को आत्मा का मन्दिर समझ उसे स्वच्छ बनाने वाले नम्बरवन श्रेष्ठ ब्राह्मण आत्मा भव
हम ब्राह्मण आत्मायें सारे कल्प में नम्बरवन श्रेष्ठ आत्मायें हैं, हीरे तुल्य हैं, इस स्मृति से तन को आत्मा का मन्दिर समझकर स्वच्छ रखना है। जितनी मूर्ति श्रेष्ठ होती है उतना ही मन्दिर भी श्रेष्ठ होता है। तो इस शरीर रूपी मन्दिर के हम ट्रस्टी हैं, यह ट्रस्टीपन आपेही स्वच्छता वा पवित्रता लाता है। इस विधि से तन की पवित्रता सदा रूहानी खुशबू का अनुभव कराती रहेगी।
स्लोगन:- रूहानियत में रहने का व्रत लेना ही ज्ञानी तू आत्मा बनना है।
23.02.2023 HINDI MURLI
“मीठे बच्चे - तुम्हारा फ़र्ज है एक दो को बाप और वर्से की याद दिलाकर सावधान करना, इसमें ही सबका कल्याण समाया हुआ है''
प्रश्नः- तुम बच्चे किस एक गुह्य राज़ को समझते हो जो कोई साइन्सदान भी नहीं समझ सकते?
उत्तर:- तुम समझते हो कि आत्मा अति सूक्ष्म स्टार है, उसमें ही सब संस्कार भरे हुए हैं। वही शरीर द्वारा अपना-अपना पार्ट बजा रही है। शरीर जड़ है, आत्मा चैतन्य है। ऐसे ही फिर परमात्मा भी स्टार है, उसमें सारी नॉलेज है। वह मनुष्य सृष्टि का बीजरूप है, सत है, चैतन्य है। वह कोई हजारों सूर्यों से तेजोमय नहीं है। यह गुह्य राज़ तुम बच्चे समझते हो। साइन्सदान इन बातों को नहीं समझ सकते। तुम्हें सबको आत्मा और परमात्मा की पहचान पहले-पहले देनी है।
गीत:- माता ओ माता तू सबकी भाग्य विधाता...
ओम् शान्ति। बाप बच्चों प्रति कहे कि बच्चे स्वदर्शन चक्रधारी भव। यह बाप ने बच्चों को सावधानी दी। बच्चों को भी एक दो को सावधानी देनी है। बाप को याद करने से झट वह नशा चढ़ जाता है। स्मृति दिलाने के लिए एक दो को सावधान करना है। जैसे आपस में मिलते हैं तो नमस्ते आदि करते हैं ना। परन्तु उनसे कोई कल्याण नहीं होता है। कल्याण तब होगा जब तुम बच्चे एक दो को सावधानी देंगे। स्वदर्शन चक्रधारी अक्षर में सब कुछ आ जाता है। बाप का परिचय, मर्तबे का परिचय, चक्र का भी परिचय आ गया। तो एक दो को सावधानी देना पहला फ़र्ज है। याद कराने से खबरदार हो जायेंगे। घड़ी-घड़ी एक दो को सावधान करना है। बाप और वर्से को याद करते रहो। स्वदर्शन चक्रधारी हो, अपने को अशरीरी समझ, अशरीरी बाप को याद करते हो। याद अर्थात् योग। योग से ही तुम्हारी निरोगी काया बनती है। यह अभी का पुरुषार्थ है। अन्त में जब एकदम कर्मातीत अवस्था हो जायेगी तब निरोगी बनेंगे। अभी तो पुरुषार्थी हैं। अभी बाप बैठ बच्चों को समझाते हैं क्योंकि जानते हैं सभी बेसमझ हैं। जब देवताओं आदि की पूजा करते हैं, उन्हों के आक्यूपेशन का कोई को पता नहीं है, तो तुमको समझाना है - हम सबकी बायोग्राफी बता सकते हैं। पहले तो मुख्य परमपिता परमात्मा को जानना है। उसमें भी बहुत मनुष्य मूँझते हैं। कहते हैं परमात्मा का कोई नाम रूप नहीं है। तो पहली-पहली मुख्य बात है आत्मा परमात्मा का भेद और ज्ञान बताना। यह तो जानते हैं सब आत्मा हैं। पुण्य आत्मा, पाप आत्मा कहा जाता है। पाप परमात्मा नहीं कहेंगे। पतित दुनिया है ना। परमात्मा तो पतित नहीं होता, इसलिए मनुष्य को पहले-पहले आत्मा को जानना है क्योंकि आत्मा का ज्ञान कोई भी मनुष्य में नहीं है। आत्मा ही सुनती है, आत्मायें खाती-पीती, सब कुछ करती हैं इन आरगन्स द्वारा। आत्मा का रूप क्या है? कहते हैं चमकता है भ्रकुटी के बीज में अजब सितारा। तो आत्मा का रूप समझाना पड़े ना। आत्मा का रूप कोई इतना बड़ा तो नहीं है। आत्मा अति सूक्ष्म है। आत्मा का रूप है जीरो अथवा बुरी (बिन्दी) भी कहते हैं। अब इस पर भी विचार करना चाहिए कि आत्मा कितनी सूक्ष्म है। मनुष्य पूछते हैं आत्मा शरीर से कैसे निकलती है? कहाँ से निकलती है? कोई कहते हैं कि खोपड़ी से निकलती, कोई कहते आंखों से निकलती.... क्योंकि दरवाजे तो बहुत हैं ना। परन्तु आत्मा है क्या चीज़, यह जानना बड़ा वन्डरफुल है। तो पूछते हैं आत्मा निकलती कैसे है, यह नहीं कहते आत्मा आती कैसे है। परन्तु पहले तो मालूम होना चाहिए कि आत्मा क्या चीज़ है। कितनी छोटी सी आत्मा में 84 जन्मों का पार्ट भरा हुआ है। यह बातें मोस्ट वण्डरफुल हैं। आत्मा है तो बरोबर स्टार मुआफिक। उसको बड़ा नहीं कहेंगे। एरोप्लेन ऊपर जाने से बहुत छोटा दिखाई पड़ता है। परन्तु आत्मा बड़ी नहीं होती। उनका तो एक ही रूप है। तो पहले-पहले आत्मा को जानना चाहिए। मैं आत्मा कैसे इस शरीर में प्रवेश करता हूँ। भल कोई-कोई को साक्षात्कार होता है, जैसे स्टार है। उस छोटी सी आत्मा में सब नॉलेज भरी हुई है। आत्मा है एक ही। यह बड़ा वन्डर है। परमात्मा के रूप का भी किसको पता नहीं है। वास्तव में जैसी आत्मा है, वैसे ही परमपिता परमात्मा है। वह भी बाप है। भल यहाँ बाप और बच्चा छोटा बड़ा होता है, परन्तु आत्मा छोटी-बड़ी नहीं हो सकती। आत्मा और परमात्मा के रूप में कोई भेद नहीं है। बाकी दोनों के पार्ट में, संस्कारों में भेद है। बाप समझाते हैं मेरे में क्या संस्कार हैं। तुम आत्माओं में क्या संस्कार हैं? मनुष्य आत्मा और परमात्मा के रूप को न जानने कारण आत्मा-परमात्मा एक कह देते हैं। बड़ा घोटाला कर दिया है। जानना बहुत जरूरी है। परमात्मा भी है, ब्रह्मा विष्णु शंकर भी हैं, इन सबमें आत्मा है। जगत अम्बा सरस्वती को गॉडेज आफ नॉलेज कहते हैं। तो जरूर सरस्वती की आत्मा में नॉलेज होगी। परन्तु उनमें कौन सी नॉलेज है, यह कोई को पता नहीं है। सिर्फ कह देते हैं गॉडेज ऑफ नॉलेज। अखबारों में आर्टिकल्स आदि पड़ते हैं तो उस पर समझाना चाहिए। तुम कहते हो सरस्वती गॉडेज ऑफ नॉलेज परन्तु उसने कौन सी नॉलेज दी? कब दी? उनको जरूर गॉड से नॉलेज मिली होगी ना। गॉड का रूप क्या है? गॉडेज ऑफ नॉलेज यह नाम कैसे पड़ा? नॉलेजफुल तो गॉड है। उसने सरस्वती को नॉलेजफुल कैसे बनाया? एक ही बात पर किसको संगम पर खड़ा कर देना चाहिए।
बाबा कहते हैं हम समझाते हैं, बाकी लिखने के लिए तो संजय (जगदीश भाई निमित्त रहे) है। यह है नम्बरवन मुख्य एक्टर। यह तो बाबा के साथ राइटहैण्ड होना चाहिए। परन्तु ड्रामा की भावी ऐसी है जो इनको देहली में भी रहना होता है। कल्प पहले वाला पार्ट है। अर्जुन का नाम मुख्य गाया हुआ है। अब तुम बच्चे हर बात का अर्थ समझते हो। पहले-पहले तो आत्मा और परमात्मा को समझना है।
बाप ने बच्चों को समझाया है - आत्मा स्टार है। उसमें सारी नॉलेज कैसे भरी हुई है। यह कोई साइन्सदान भी समझ नहीं सकेंगे। आत्मा में ही सब संस्कार रहते हैं। अब आत्मा तो स्टार है। अच्छा परमात्मा का रूप क्या है? वह भी परम आत्मा ही है। फ़र्क नहीं है। यह जो महिमा गाते हैं वह हजारों सूर्यों से तीखा है, ऐसा नहीं है। बाप कहते हैं सिर्फ तुम्हारी आत्मा में नॉलेज नहीं है, मैं परमात्मा नॉलेजफुल हूँ - बस यह फ़र्क है। माया ने तुम्हारी आत्मा को पतित बना दिया है। बाकी कोई दीवा नहीं है, बुझा हुआ। सिर्फ आत्मा से नॉलेज निकल गई है - बाप और रचना की। सो अब तुमको नॉलेज मिल रही है। बाबा में नॉलेज है, वह भी आत्मा है। कोई बड़ी नहीं है। उनको भी नॉलेजफुल, सरस्वती को भी नॉलेजफुल कहा जाता है। अब उनको नॉलेज कब मिली? सरस्वती किसकी बच्ची है? यह कोई जानते नहीं हैं। तो दिल में आना चाहिए, उन्हों को कैसे समझायें। बाप परमात्मा कौन है, वह भी समझाना है कि वह स्टार है, उसमें सारी नॉलेज है। गॉड फादर मनुष्य सृष्टि का बीजरूप है। सबका बेहद का बाप है। वह सत है, चैतन्य है, उनमें सच्ची नॉलेज है। उनको ट्रूथ भी कहते हैं। और कोई में सच्ची नॉलेज है नहीं। रचयिता एक बाप है। तो सारी रचना की नॉलेज भी उनमें ही है। झाड़ का बीजरूप है ना। आत्मा तो चैतन्य हैं। शरीर तो जड़ है। जब आत्मा आती है तब यह चैतन्य होता है। तो बाप समझाते हैं मैं भी वही हूँ। आत्मा छोटी बड़ी हो नहीं सकती। जैसे तुम आत्मा हो वैसे परम आत्मा यानी परमात्मा है, फिर उनकी महिमा सबसे ऊंच हैं। मनुष्य सृष्टि का बीजरूप है। मनुष्य ही उनको याद करते हैं। यह तो जानते हैं बाप ऊपर में रहते हैं। आत्मा इन आरगन्स द्वारा कहती है हे परमपिता परमात्मा। मनुष्य यह नहीं जानते हैं क्योंकि देह-अभिमानी हैं। तुम अब देही-अभिमानी बने हो। अपने को आत्मा निश्चय करते हो। तुम जानते हो गॉड तो निराकार को ही कहा जाता है। हम उनकी सन्तान हैं। वह गॉड ही आकर नॉलेज देते हैं। उनको नॉलेजफुल, ब्लिसफुल कहा जाता है। रहम का सागर, सुख का सागर, शान्ति का सागर.. यह महिमा दी गई है। तो जरूर बाप से बच्चों को वर्सा मिलना है। उन्होंने कोई समय आकर वर्सा दिया है तब महिमा गाई जाती है। देवताओं की महिमा अलग है। बाप की महिमा अलग है। सब आत्माओं का वह बाप है। क्रियेटर होने के कारण उनको बीजरूप कहा जाता है। पहले-पहले बाप का परिचय देना है। शास्त्रों में दिखाते हैं - अंगुष्ठे मिसल है। हम कहते हैं वह ज्योर्तिबिन्दू है। चित्र भी बनाया है। परन्तु इतना बड़ा तो वह है नहीं। वह तो अति सूक्ष्म है। तो क्या समझायें? तुमको कहेंगे चित्र में इतना बड़ा रूप क्यों दिखाया है? बोलो नहीं तो क्या रखें। वह तो एक बिन्दी है फिर उनकी पूजा कैसे करेंगे? उन पर दूध कैसे चढ़ायेंगे? पूजा के लिए यह रूप बनाया हुआ है। बाकी यह समझते हैं कि वह है परमपिता परम आत्मा परमधाम में रहने वाले। वह परमधाम है हमारा स्वीट होम। निराकारी दुनिया, मूलवतन, सूक्ष्मवतन फिर स्थूलवतन। बाप निराकारी दुनिया में रहते हैं। आत्मा कहती है हम निर्वाणधाम में जावें। जहाँ यह आरगन्स न हों। आत्मा ही आकर शरीर धारण करती है। अब यह कैसे समझायें कि आत्मा कहाँ से जाती है। यह तो जानते हैं पिण्ड में आत्मा प्रवेश होने से चैतन्य बन जाती है। चीज़ कितनी सूक्ष्म है। उसी में सारे संस्कार भरे हुए हैं। फिर एक-एक जन्म के संस्कार प्रगट होते जायेंगे। तो बाप समझाते हैं हर एक बात को अच्छी रीति समझना है। सरस्वती की बात पर भी समझा सकते हैं। वह किसकी बच्ची है? इस समय तुमको तो गॉडेज कह न सकें। सरस्वती है ब्रह्मा की बेटी। तो जरूर वह भी गॉड आफ नॉलेज ठहरा। ब्रह्मा के मुख कमल से दिखाते हैं ज्ञान दिया। तो ब्रह्मा का भी नाम है ना। इस समय तुम हो ब्राह्मण। भल आत्मा प्योर होती जाती है परन्तु शरीर तो प्योर हो नहीं सकता। यह तमोप्रधान शरीर है। तो बाप समझाते हैं - बच्चे एक दो को सावधान कर उन्नति को पाना है। बाप और वर्से को याद करते हो? स्वदर्शन चक्र को याद करते हो? बाबा कहते हैं एक भी ऐसे सावधानी नहीं देते होंगे। बाप को याद करते-करते नींद को जीतने वाला बनना है, इसमें तो बहुत कमाई है। कमाई में कभी थकावट नहीं होती है। परन्तु स्थूल काम भी करने पड़ते हैं इसलिए थकावट भी होती है।
बाप समझाते हैं रात को भी जागकर बाबा से बातें करते, ज्ञान सागर में डुबकी लगानी होती है। जैसे एक जानवर होता है, पानी में डुबकी लगाता है। तो ऐसे डुबकी मारने से, विचार सागर मंथन करने से देखते हैं कि बहुत प्वाइंट्स आती हैं। कहाँ-कहाँ से निकल आती हैं। इसको कहा जाता है रात को जागकर ज्ञान का विचार सागर मंथन करना। मनुष्य बिल्कुल ही नहीं जानते हैं, उन्हों को समझाना है। बाप ज्ञान का सागर है, उनसे वर्सा मिलना है। जो आदि सनातन देवी-देवता धर्म वाले सतयुग में थे, उन्हों को जरूर वर्सा मिला होगा ना। अब सारी राजधानी को वर्सा कैसे मिला? कलियुग से सतयुग होने में देरी तो नहीं लगती। रात पूरी हो दिन होता है। कहाँ आइरन एजेड वर्ल्ड दु:खधाम, कहाँ वह सुखधाम। ब्रह्मा का दिन और ब्रह्मा की रात - कितना फर्क है! अभी गॉड फादर से तुमको नॉलेज मिल रही है। सरस्वती क्या करती थी? किसको पता नहीं। बस गॉडेज ऑफ नॉलेज सरस्वती का चित्र मिला और खुश हो गये। तो उन्हों को सावधान करना पड़ता है। परमात्मा का परिचय देना पड़े। फिर ब्रह्मा विष्णु शंकर का भी परिचय देना है। बाप ने आकर यह नॉलेज दे नर से नारायण बनाया है। बड़ा युक्ति से हर एक का आक्यूपेशन बताना है। सरस्वती भी ब्रह्मा मुख वंशावली है। तो जरूर परमपिता परमात्मा आया उसने ब्रहमा द्वारा मुख वंशावली रची। पहले-पहले नॉलेज किसको दी? कहते हैं कलष सरस्वती को दिया। बीच से ब्रह्मा को गुम कर दिया है। यह किसको पता नहीं है कि ब्रह्मा तन में आकर माताओं को कलष दिया है तो जरूर ब्रह्मा भी सुनते होंगे ना। ब्रह्मा के हाथ में शास्त्र भी दिखाते हैं। ब्रह्मा की मत मशहूर है। तो वह भी सभी वेदों शास्त्रों के सार की मत देता होगा। ब्रह्मा द्वारा शिवबाबा समझाते हैं। ब्रह्मा कहाँ से आया? यह रथ कहाँ से निकला? कोई नहीं जानते। बाबा ने अभी बताया है जो तुम समझा सकते हो। अच्छा!
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का यादप्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।
धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) रात को जागकर ज्ञान का विचार सागर मंथन करना है। ज्ञान सागर में डुबकी लगानी है। बाप को याद करते नींद को जीतने वाला बनना है।
2) स्वदर्शन चक्र फिराते रहना है। आपस में बाप और वर्से की याद दिलाते एक दो को सावधान कर उन्नति को पाना है।
वरदान:- स्वयं को संगमयुगी समझ व्यर्थ को समर्थ में परिवर्तन करने वाली समर्थ आत्मा भव
यह संगमयुग समर्थ युग है। तो सदा यह स्मृति रखो कि हम समर्थ युग के वासी, समर्थ बाप के बच्चे, समर्थ आत्मायें हैं, तो व्यर्थ समाप्त हो जायेगा। कलियुग है व्यर्थ, जब कलियुग का किनारा कर चुके, संगमयुगी बन गये तो व्यर्थ से किनारा हो ही गया। यदि सिर्फ समय की भी याद रहे तो समय के प्रमाण कर्म स्वत: चलेंगे। आधाकल्प व्यर्थ सोचा, व्यर्थ किया, लेकिन अब जैसा समय, जैसा बाप वैसे बच्चे।
स्लोगन:- जो सदा ईश्वरीय विधान पर चलते हैं वही ब्रह्मा बाप समान मास्टर विधाता बनते हैं।
22.02.2022 HINDI MURLI
“मीठे बच्चे - तुम्हें ज्ञान की सैक्रीन मिली है, सैक्रीन की वह बूंद है मनमनाभव, यही खुराक सबको खिलाते रहो''
प्रश्नः- सच्ची-सच्ची खुशखैराफत कौन सी है? तुम्हें सबकी कौन सी रूहानी खातिरी करनी है?
उत्तर:- हर एक को बाप का परिचय देना, यही है सच्ची-सच्ची खुश खैराफत। तुम श्रीमत पर सबको खुशी की खुराक खिलाते रहो। बेहद के बाप द्वारा जीवनमुक्ति की खुराक जो तुम्हें मिली है, वह सबको देते चलो। अतीन्द्रिय सुख में रह सबको ज्ञान योग की फर्स्टक्लास खुराक खिलाना, यही सबसे अच्छी रूहानी खातिरी है।
ओम् शान्ति। ज्ञान का तीसरा नेत्र देने वाला रूहानी बाप बैठ रूहानी बच्चों को समझाते हैं। ज्ञान का तीसरा नेत्र सिवाए बाप के और कोई दे नहीं सकता। अभी तुम बच्चों को ज्ञान का तीसरा नेत्र मिला है। अभी तुम जानते हो कि यह पुरानी दुनिया बदलने वाली है। बिचारे मनुष्य नहीं जानते कि कौन बदलाने वाला है और कैसे बदलाते हैं क्योंकि उन्हों को ज्ञान का तीसरा नेत्र ही नहीं है। तुम बच्चों को अभी ज्ञान का तीसरा नेत्र मिला है जिससे तुम सृष्टि के आदि मध्य अन्त को जान गये हो। यह है ज्ञान की सैक्रीन। सैक्रीन का एक बूंद भी कितना मीठा होता है। ज्ञान का भी एक ही अक्षर है मनमनाभव। सभी से कितना मीठा है। अपने को आत्मा समझ और बाप को याद करो। बाप शान्तिधाम और सुखधाम का रास्ता बता रहे हैं। बाप आये हैं बच्चों को स्वर्ग का वर्सा देने। तो बच्चों को कितनी खुशी रहनी चाहिए। कहते भी हैं खुशी जैसी खुराक नहीं। जो सदैव खुशी मौज में रहते हैं उनके लिए वह जैसे खुराक होती है। 21 जन्म मौज में रहने की यह जबरदस्त खुराक है। यह खुराक सदैव एक दो को खिलाते रहो। एक दो की जबरदस्त खातिरी यह करनी है। ऐसी खातिरी और कोई मनुष्य, मनुष्य की कर न सके।
तुम बच्चे श्रीमत पर सभी की रूहानी खातिरी करते हो। सच्ची-सच्ची खुश खैऱाफत भी यह है किसको बाप का परिचय देना। मीठे बच्चे जानते हैं बेहद के बाप द्वारा हमको जीवनमुक्ति की खुराक मिलती है। सतयुग में भारत जीवनमुक्त था, पावन था। बाप बहुत बड़ी ऊंची खुराक देते हैं, तब तो गायन है अतीन्द्रिय सुख पूछना हो तो गोप-गोपियों से पूछो। यह ज्ञान और योग की कितना फर्स्ट क्लास वन्डरफुल खुराक है और यह खुराक एक ही रूहानी सर्जन के पास है और किसको इस खुराक का मालूम ही नहीं है। बाप कहते हैं मीठे बच्चों तुम्हारे लिए तिरी (हथेली) पर सौगात ले आया हूँ। मुक्ति, जीवनमुक्ति की यह सौगात मेरे पास ही रहती है। कल्प-कल्प मैं ही आकर तुमको देता हूँ। फिर रावण छीन लेता है। तो अभी तुम बच्चों को कितना खुशी का पारा चढ़ा रहना चाहिए। तुम जानते हो हमारा एक ही बाप, टीचर और सच्चा-सच्चा सतगुरू है जो हमको साथ ले जाते हैं। मोस्ट बिलवेड बाप से विश्व की बादशाही मिलती है। यह कम बात है क्या! तो सदैव हर्षित रहना चाहिए। गाडली स्टूडेन्ट लाईफ इज़ दी बेस्ट। यह अभी का ही गायन है ना। फिर नई दुनिया में भी तुम सदैव खुशियाँ मनाते रहेंगे। दुनिया नहीं जानती कि सच्ची-सच्ची खुशियाँ कब मनाई जायेंगी। मनुष्यों को तो सतयुग का ज्ञान ही नहीं है। तो यहाँ ही मनाते रहते हैं। परन्तु इस पुरानी तमोप्र-धान दुनिया में खुशी कहाँ से आई। यहाँ तो त्राहि-त्राहि करते रहते हैं। कितना दु:ख की दुनिया है।
बाप तुम बच्चों को कितना सहज रास्ता बताते हैं। गृहस्थ व्यवहार में रहते कमल फूल समान रहो। धन्धा-धोरी आदि करते भी मुझे याद करते रहो। जैसे आशिक और माशुक होते हैं। वह तो एक दो को याद करते रहते हैं। वह उनका आशिक, वह उनका माशुक होता है। यहाँ यह बात नहीं है, यहाँ तो तुम सभी एक माशुक के जन्म-जन्मान्तर से आशिक हो रहते हो। बाप कभी तुम्हारा आशिक नहीं बनता। तुम उस माशुक से मिलने के लिए याद करते आये हो। जब दु:ख जास्ती होता है तो जास्ती सुमिरण करते हैं। गायन भी है दु:ख में सुमिरण सब करें, सुख में करे न कोय। इस समय बाप भी सर्वशक्तिवान है, तो दिन-प्रतिदिन माया भी सर्वशक्तिवान-तमोप्रधान होती जाती है इसलिए अब बाप कहते हैं मीठे बच्चे देही-अभिमानी बनो। अपने को आत्मा समझ मुझ बाप को याद करो और साथ-साथ दैवीगुण भी धारण करो तुम ऐसे (लक्ष्मी-नारायण) बन जायेंगे। इस पढ़ाई में मुख्य बात है ही याद की। ऊंच ते ऊंच बाप को बहुत प्यार, स्नेह से याद करना चाहिए। वह ऊंच ते ऊंच बाप ही नई दुनिया स्थापन करने वाला है। बाप कहते हैं मैं आया हूँ तुम बच्चों को विश्व का मालिक बनाने इसलिए अब मुझे याद करो तो तुम्हारे अनेक जन्मों के पाप कट जायें। पतित-पावन बाप कहते हैं तुम बहुत पतित बन गये हो इसलिए अब तुम मुझे याद करो तो तुम पावन बन और पावन दुनिया का मालिक बन जायेंगे। पतित-पावन बाप को ही बुलाते हैं ना। अब बाप आये हैं, तो जरूर पावन बनना पड़े। बाप दु:खहर्ता, सुखकर्ता है। बरोबर सतयुग में पावन दुनिया थी तो सभी सुखी थे। अब बाप फिर से कहते हैं बच्चे शान्ति-धाम और सुखधाम को याद करते रहो। अभी है संगमयुग। खिवैया तुमको इस पार से उस पार ले जाते हैं। नईया कोई एक नहीं, सारी दुनिया जैसे एक बड़ा जहाज है, उनको पार ले जाते हैं।
तुम मीठे बच्चों को कितनी खुशियाँ होनी चाहिए। तुम्हारे लिए तो सदैव खुशी ही खुशी है। बेहद का बाप हमको पढ़ा रहे हैं। वाह! यह तो कब न सुना, न पढ़ा। भगवानुवाच मैं तुम रूहानी बच्चों को राजयोग सिखा रहा हूँ, तो पूरी रीति सीखना चाहिए। धारणा करनी चाहिए। पूरी रीति पढ़ना चाहिए। पढ़ाई में नम्बरवार तो सदैव होते ही हैं। अपने को देखना चाहिए मैं उत्तम हूँ, मध्यम हूँ वा कनिष्ट हूँ? बाप कहते हैं अपने को देखो मैं ऊंच पद पाने के लायक हूँ? रूहानी सर्विस करता हूँ? क्योंकि बाप कहते हैं बच्चे सर्विसएबुल बनो, फालो करो। मैं आया ही हूँ सर्विस के लिए। रोज़ सर्विस करता हूँ इसलिए ही तो यह रथ लिया है। इनका रथ बीमार पड़ जाता है तो भी मैं इनमें बैठ मुरली लिखता हूँ। मुख से तो बोल नहीं सकते तो मैं लिख देता हूँ, ताकि बच्चों के लिए मुरली मिस न हो तो मैं भी सर्विस पर हूँ ना। यह है रूहानी सर्विस। तुम भी बाप की सर्विस में लग जाओ। आन गॉड फादरली सर्विस। बाप ही तुमको सारे विश्व का मालिक बनाने आये हैं। जो अच्छा पुरुषार्थ करते हैं उनको महावीर कहा जाता है। देखा जाता है कौन महावीर हैं जो बाबा के डायरेक्शन पर चलते हैं। बाप का फरमान है अपने को आत्मा समझ भाई-भाई देखो। इस शरीर को भूल जाओ। बाबा भी शरीर को नहीं देखते हैं। बाप कहते हैं मैं आत्माओं को देखता हूँ। बाकी यह तो ज्ञान है कि आत्मा शरीर बिगर बोल नहीं सकती। मैं भी इस शरीर में आया हूँ, लोन लिया हुआ है। शरीर के साथ ही आत्मा पढ़ सकती है। बाबा की बैठक यहाँ है। यह है अकाल तख्त। आत्मा अकालमूर्त है। आत्मा कब छोटी बड़ी नहीं होती है, शरीर छोटा बड़ा होता है। जो भी आत्मायें हैं उन सभी का तख्त यह भृकुटी का बीच है। शरीर तो सभी के भिन्न-भिन्न होते हैं। किसको अकाल तख्त पुरुष का है, किसका अकाल तख्त स्त्री का है। किसका अकाल तख्त बच्चे का है। बाप बैठ बच्चों को रूहानी ड्रिल सिखलाते हैं। जब कोई से बात करो तो पहले अपने को आत्मा समझो। हम आत्मा फलाने भाई से बात करते हैं। बाप का पैगाम देते हैं कि शिवबाबा को याद करो। याद से ही जंक उतरनी है। सोने में जब अलाय पड़ती है तो सोने की वैल्यु ही कम हो जाती है। तुम आत्माओं में भी जंक पड़ने से तुम वैल्युलेस हो गये हो। अब फिर पावन बनना है। तुम आत्माओं को अब ज्ञान का तीसरा नेत्र मिला है। उस नेत्र से अपने भाईयों को देखो। भाई-भाई को देखने से कर्मेन्द्रियाँ कब चंचल नहीं होंगी। राज-भाग लेना है, विश्व का मालिक बनना है तो यह मेहनत करो। भाई-भाई समझ सभी को ज्ञान दो। तो फिर यह टेव (आदत) पक्की हो जायेगी। सच्चे-सच्चे ब्रदर्स तुम सभी हो। बाप भी ऊपर से आये हैं, तुम भी आये हो। बाप बच्चों सहित सर्विस कर रहे हैं। सर्विस करने की बाप हिम्मत देते हैं। हिम्मते मर्दा... तो यह प्रैक्टिस करनी है - मैं आत्मा भाई को पढ़ाता हूँ। आत्मा पढ़ती है ना। इसको स्प्रीचुअल नॉलेज कहा जाता है, जो रूहानी बाप से ही मिलती है। संगम पर ही बाप आकर यह नॉलेज देते हैं कि अपने को आत्मा समझो। तुम नंगे आये थे फिर यहाँ शरीर धारण कर तुमने 84 जन्म पार्ट बजाया है। अब फिर वापिस चलना है इसलिए अपने को आत्मा समझ भाई-भाई की दृष्टि से देखना है। यह मेहनत करनी है। अपनी मेहनत करनी है, दूसरे में हमारा क्या जाता। चैरिटी बिगेन्स एट होम अर्थात् पहले खुद को आत्मा समझ फिर भाईयों को समझाओ तो अच्छी रीति तीर लगेगा। यह जौहर भरना है। मेहनत करेंगे तब ही ऊंच फल पायेंगे। बाप आये ही हैं फल देने लिए तो मेहनत करनी पड़े। कुछ सहन भी करना पड़ता है।
तुम्हें कोई उल्टी-सुल्टी बात बोले तो तुम चुप रहो। तुम चुप रहेंगे तो फिर दूसरा क्या करेगा। ताली दो हाथ से बजती है। एक ने मुख की ताली बजाई, दूसरा चुप कर दे तो वह आपेही चुप हो जायेंगे। ताली से ताली बजने से आवाज हो जाता है। बच्चों को एक दो का कल्याण करना है। बाप समझाते हैं बच्चे सदैव खुशी में रहने चाहते हो तो मनमनाभव। अपने को आत्मा समझ बाप को याद करो। भाईयों (आत्माओं) तरफ देखो। भाईयों को भी यह नॉलेज दो। यह टेव पड़ जाने से फिर कभी क्रिमिनल आई धोखा नहीं देगी। ज्ञान के तीसरे नेत्र से तीसरे नेत्र को देखो। बाबा भी तुम्हारी आत्मा को ही देखते हैं। कोशिश यह करनी है सदैव आत्मा को ही देखें। शरीर को देखें ही नहीं। योग कराते हो तो भी अपने को आत्मा समझ भाईयों को देखते रहेंगे तो सर्विस अच्छी होगी। बाबा ने कहा है भाईयों को समझाओ। भाई सभी बाप से वर्सा लेते हैं। यह रूहानी नॉलेज एक ही बार तुम ब्राह्मण बच्चों को मिलती है। तुम ब्राह्मण हो फिर देवता बनने वाले हो। इस संगमयुग को थोड़ेही छोड़ेंगे, नहीं तो पार कैसे जायेंगे। कूदेंगे थोड़ेही। यह वन्डरफुल संगमयुग है। तो बच्चों को रूहानी यात्रा पर रहने की टेव डालनी है। तुम्हारे ही फायदे की बात है। बाप की शिक्षा भाईयों को देनी है। बाप कहते हैं मैं तुम आत्माओं को ज्ञान दे रहा हूँ। आत्मा को ही देखता हूँ। मनुष्य-मनुष्य से बात करेगा तो उनके मुँह को देखेगा ना। तुम आत्मा से बात करते हो तो आत्मा को ही देखना है। भल शरीर द्वारा ज्ञान देते हो परन्तु इसमें शरीर का भान तोड़ना होता है। तुम्हारी आत्मा समझती है परमात्मा बाप हमको ज्ञान दे रहे हैं। बाप भी कहते हैं आत्माओं को देखता हूँ, आत्मायें भी कहती हैं हम परमात्मा बाप को देख रहे हैं। उनसे नॉलेज ले रहे हैं। इसको कहा जाता है स्प्रीचुअल ज्ञान की लेन-देन - आत्मा की आत्मा के साथ। आत्मा में ही ज्ञान है। आत्मा को ही ज्ञान देना है। यह जैसे जौहर है। तुम्हारे ज्ञान में यह जौहर भर जायेगा तो किसको भी समझाने से झट तीर लग जायेगा। बाप कहते हैं प्रैक्टिस करके देखो तीर लगता है या नहीं। यह नई टेव (आदत) डालनी है तो फिर शरीर का भान निकल जायेगा। माया के तूफान कम आयेंगे। बुरे संकल्प नहीं आयेंगे। क्रिमिनल आई भी नहीं रहेगी। हम आत्मा ने 84 का चक्र लगाया। अब नाटक पूरा होता है। अब बाबा की याद में रहना है। याद से ही तमोप्रधान से सतोप्रधान बन, सतोप्रधान दुनिया के मालिक बन जायेंगे। कितना सहज है। बाप जानते हैं बच्चों को यह शिक्षा देना भी मेरा पार्ट है। कोई नई बात नहीं। हर 5000 वर्ष बाद हमको आना होता है। मैं बंधायमान हूँ, बच्चों को बैठ समझाता हूँ - मीठे बच्चे रूहानी याद की यात्रा में रहो तो अन्त मते सो गति हो जायेगी। यह अन्त काल है ना। मामेकम् याद करो तो तुम्हारी सद्गति हो जायेगी। याद की यात्रा से पाया (पिल्लर) मजबूत हो जायेगा। यह देही-अभिमानी बनने की शिक्षा एक ही बार तुम बच्चों को मिलती है। कितना वन्डरफुल ज्ञान है। बाबा वन्डरफुल है तो बाबा का ज्ञान भी वन्डरफुल है। कब कोई बता न सके। अभी वापस चलना है इसलिए बाप कहते हैं मीठे बच्चों यह प्रैक्टिस करो। अपने को आत्मा समझ आत्मा को ज्ञान दो। तीसरे नेत्र से भाई-भाई को देखना है। यही बड़ी मेहनत है। अच्छा!
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का यादप्यार और गुडमार्निग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।
धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) आत्मा भाई-भाई को देखने का अभ्यास करना है। अपने को आत्मा समझ भाई भाई को ज्ञान देना है। महावीर बन इस फरमान को पालन करना है।
2) तुम्हें कोई उल्टी-सुल्टी बात बोले तो तुम चुप रहो। ताली दो हाथ से बजती है, एक ने मुख की ताली बजाई, दूसरा चुप कर दे तो वह आपेही चुप हो जायेंगे।
वरदान:- अमृतवेले के फाउण्डेशन द्वारा सारे दिन की दिनचर्या को ठीक रखने वाले सहज पुरुषार्थी भव
जैसे ट्रेन को पटरी पर खड़ा कर देते हैं तो आटोमेटिकली रास्ते पर चलती रहती है, ऐसे ही रोज़ अमृतवेले याद की लकीर पर खड़े हो जाओ। अमृतवेला ठीक है तो सारा दिन ठीक हो जायेगा। अमृतवेले का फाउण्डेशन पक्का है तो सारा दिन स्वत: सहयोग मिलता रहेगा और पुरुषार्थ भी सहज हो जायेगा। जो सदा बाप की याद और श्रीमत की लकीर के अन्दर रहने वाली ऐसी सच्ची सीतायें हैं उनके नस-नस में एक राम की स्मृति का आवाज रहता है।
स्लोगन:- बाबा की मदद को कैच करना है तो बुद्धि को एकाग्र कर लो।
20.02.2023 HINDI MURLI
“मीठे बच्चे - सूर्यवंशी विजय माला का दाना बनने के लिए श्रीमत पर पूरा पावन बनो, पावन बनने वाले बच्चे धर्मराज़ की सजाओं से छूट जाते हैं''
प्रश्नः- देही-अभिमानी बनने की मेहनत में लगे हुए बच्चों को कौन सा नशा रहेगा?
उत्तर:- मैं बाबा का हूँ, मैं बाबा के ब्रह्माण्ड का मालिक हूँ, बाबा से वर्सा ले विश्व का मालिक बनता हूँ। यह नशा देही-अभिमानी रहने वाले बच्चों को ही रहता, वही वारिस बनते हैं। उन्हें पुरानी दुनिया के सम्बन्ध याद नहीं रहते। देह-अभिमान में आने से ही माया की चमाट लगती है। खुशी गुम हो जाती है इसलिए बाबा कहते बच्चे देही-अभिमानी बनने की मेहनत करो। अपना चार्ट रखो।
गीत:- आने वाले कल की तुम तकदीर हो ...
ओम् शान्ति। बच्चे जानते हो कि शिवबाबा ने यहाँ संगमयुग पर अवतार लिया है या ऊपर से आया हुआ है और तुम शिव शक्तियां हो, शिव के वारिस। तुम्हारा नाम वास्तव में है शिवशक्तियां। शिव से पैदा हुई शक्तियां। शिव ने तुमको अपना बनाया है और तुम शक्तियों ने फिर शिवबाबा को अपना बनाया है। शिव ने आकर अपने वारिस बनाये हैं। तुम शक्तियां हो गई शिव-बाबा के वारिस। अभी यह तो तुम बच्चे जानते हो शिवबाबा आया हुआ है, नर्क को स्वर्ग बनाने। हम उनके वारिस उनके साथ मददगार हैं, उनसे वर्सा पाने के लिए। बाप आया हुआ है इस पतित दुनिया अथवा नर्क को पावन बनाने। पतित सृष्टि को पावन बनाने वाला निराकार परमपिता परमात्मा के सिवाए और कोई हो नहीं सकता। तुम हो निराकार शिवबाबा के बच्चे। वह यहाँ जिसमें आया हुआ है वह है साकारी तन। यूँ तो तुम जब निराकारी दुनिया में हो तो भी वारिस हो। सब आत्मायें उस परमपिता परमात्मा के बच्चे हैं। परन्तु वह हो गया निराकारी दुनिया में। वहाँ तुम जब मेरे पास हो तो मेरे ही बच्चे हो। फिर मुझे भी आना पड़ा है - पतित सृष्टि को पावन बनाने। आकर शरीर धारण करना पड़ा। अब उस निराकारी दुनिया से बाप आया हुआ है। तुम बच्चों को वारिस बनाया है वर्सा देने लिए। शिव शक्तियां तो मशहूर हैं, शिवशक्तियां अर्थात् शिव की औलाद। दुनिया में यह कोई नहीं जानते हैं कि पतित-पावन कौन है। पतित दुनिया को जरूर कलियुग कहेंगे, पावन दुनिया को सतयुग। निराकारी दुनिया में तुम आत्मायें सदैव पावन रहती हो। गाते भी हैं हे पतित-पावन आओ.. भिन्न-भिन्न प्रकार से याद करते हैं। परन्तु समझते कुछ भी नहीं हैं। यह नहीं समझते कि पावन बनाने के लिए जरूर कलियुग के अन्त में संगम पर आयेंगे। बाप कहते हैं मैं कल्प-कल्प, कल्प के संगमयुगे आता हूँ, आकर तुम बच्चों को अपना वारिस बनाता हूँ। गोया तुम डबल वारिस बनते हो। वैसे तो तुम शिवबाबा के बच्चे हो परन्तु अपने को भूल गये हो। अभी तुम जानते हो हम आत्मायें तो वास्तव में शिवबाबा के निर्वाण-धाम के वारिस हैं। शिवबाबा कहते हैं तुम सब वारिस हो ना। ब्रह्माण्ड में रहने वाले बच्चे ब्रह्माण्ड के मालिक हो। फिर यहाँ सृष्टि पर आकर पार्ट बजाना है। बाप को सभी याद तो बहुत करते हैं। जब बहुत दु:खी होते हैं तो रड़ियां मारते हैं - हे भगवान रहम करो। अजुन तो बहुत दु:ख आने वाला है। जैसे चीनी आदि पर कन्ट्रोल रखते, वैसे अनाज पर भी रखेंगे। मनुष्यों को अन्न तो चाहिए ना। फिर भूख मरेंगे तो मारपीट लूटमार करेंगे। जब दुनिया बहुत दु:खी हो तब तो बाप आकर सुखी दुनिया स्थापन करे ना। तो अब बाप की श्रीमत पर पूरा पावन बन दिखाना है। पूरा पावन बनने वाले ही सूर्यवंशी विजय माला के दाने बनते हैं। वह धर्मराज की सज़ायें नहीं खायेंगे। बाप हर एक बात अच्छी रीति बैठ समझाते हैं। यह तो समझाया है जगत पिता है तो जगत अम्बा भी है। परन्तु उनका गीता में कुछ वर्णन है नहीं। गीता का कनेक्शन सारा बिगड़ा हुआ है। भक्त भगवान को याद करते हैं। भगवान ही सब मनुष्यों की मनोकामनाएं पूरी कर सकते हैं, इसलिए उनको याद करते हैं। कृष्ण तो मनोकामना पूरी कर न सके। एक ही भगवान को कहा जाता है सभी की मनोकामना पूरी करने वाला। दूसरा फिर है जगत अम्बा, भगवती, सब मनोकामनायें पूरी करने वाली। जगत अम्बा कौन है? पूरा वारिस ब्रह्मा की बच्ची, शिवबाबा की पोत्री। और मनुष्य बड़े-बड़े राजाओं आदि के वारिस होते हैं। यह वारिस अक्षर फैमिली से लगता है। संन्यासियों से नहीं लगता है। तुम जानते हो हम अभी शिवबाबा के वारिस बने हुए हैं। वहाँ तो बाबा के साथ रहते हैं। वहाँ वर्से की कोई बात नहीं। यहाँ तो हमको वर्सा चाहिए। बाप की मिलकियत है स्वर्ग, वहाँ दु:ख की बात ही नहीं होती। अब तुम बच्चों को दादे की मिलकियत मिलती है, तो उनको याद करना है।
तुम हो ईश्वर के वारिस, बाकी सब हैं रावण के वारिस। रावण सम्प्रदाय गाया जाता है ना। यहाँ तुम हो ब्राह्मण सम्प्रदाय। वह हैं आसुरी रावण सम्प्रदाय। उनको वर्सा मिल रहा है रावण से। रावण राज्य है ना। 5 विकारों का वर्सा मिला हुआ है, जिस वर्से को फिर तुम आकर शिवबाबा को दान करते हो। कृष्ण को थोड़ेही 5 विकारों का दान देंगे। तुम शिवबाबा को 5 विकारों का दान देते हो। देवताओं को थोड़ेही दान देंगे। कृष्ण आदि देवताओं ने तो विकारों का दान शिवबाबा को दे ऐसा पद पाया है। वह फिर दान लेंगे कैसे? शिवबाबा कहते हैं यह 5 विकारों का दान दो तो छूटे ग्रहण। ग्रहण भी ऐसा लगा हुआ है जो एक भी कला नहीं रही है। बिल्कुल काले बन पड़े हैं। अभी हमें दान दे दो फिर विकारों में नहीं जाना। दान देकर फिर वापिस नहीं लेना है। अगर विकार में जायेंगे तो पद भ्रष्ट बन पड़ेंगे। सो नारायण बनना है तो भूतों को भगाना है। बाप आते ही हैं नर से नारायण बनाने। तुम जानते हो बाबा ने हमको हकदार बनाया है - अपने घर का और जायदाद का। डबल वर्सा हुआ ना। मुक्ति और जीवनमुक्ति दोनों वर्सा बाप देते हैं। जो बाप के वारिस बच्चे हैं वे अब मेरे को याद कर योग और ज्ञान बल से विकर्म विनाश करते हैं। ज्ञान भी बल है ना। नॉलेज है, नॉलेज पढ़कर बड़ा-बड़ा दर्जा पाते हैं। पुलिस के बड़े ऑफिसर्स आदि बनते हैं। मनुष्य कितना पुलिस से डरते हैं। कोई ऐसा काम करते हैं तो पुलिस का नाम सुन पीला पड़ जाते हैं। तुम बच्चे अभी पढ़ाई से ऊंच पद पाते हो। बाप का बच्चा बनकर और बाप को याद नहीं करेंगे तो वर्सा कैसे पायेंगे। वह तो है लौकिक बाप। इस पारलौकिक बाप को तो बहुत याद करना पड़े। बहुत याद करने से ही ऊंच पद पायेंगे। जितना मेहनत करेंगे उतना पावन बन पावन दुनिया का राज्य पायेंगे। वापिस मेरे पास आकर फिर सतयुग में जाए राजाई करनी है। सब भगवान को याद करते हैं कि फिर से हम बाप के पास जायें।
कहते हैं अमरनाथ ने पार्वती को कथा सुनाई सो तो तुम सब पार्वतियां हो। शिवबाबा ने सिर्फ एक पार्वती को थोड़ेही कथा सुनाई होगी। तुम तो बहुत सुनते हो ना। सब याद करते हैं कि हमको पतित से पावन बनाओ। पावन बनाने वाला है एक। कैसे पावन बनाते हैं? पहले-पहले जगत अम्बा पावन बनती है। फिर उनकी शक्तियां हैं। स्वर्ग का रचयिता एक ही बाप है और कोई हो न सके। अभी तुम अनुभवी बन गये हो। तुम बच्चों को कितना नशा रहना चाहिए। शिवबाबा तुमको गोद में ले स्वर्ग का मालिक बनने लायक बनाते हैं। तुम समझते हो हम ईश्वर की गोद में आये हैं। जरूर ईश्वर हमको वापिस अपने साथ ले जायेंगे। खास तुम बच्चों को वारिस बनाया है। तुम्हारा पार्ट है। अभी तुम्हारी बुद्धि कितनी विशाल हो गई है। समझना चाहिए सतयुग में है ही देवी-देवताओं का राज्य। जरूर भगवान ने स्थापन किया होगा। परन्तु कैसे किया? यह कोई नहीं जानते। नाम भी है यादव, कौरव, पाण्डव। पाण्डवों में सभी मेल्स ही दिखाते हैं। शक्ति सेना का नाम कहाँ? तुम हो गुप्त। उनको तो पता ही नहीं फिर कहते जो लड़ाई में मरेगा वह स्वर्ग में जायेगा। परन्तु कौन सी लड़ाई? यह है माया पर जीत पाने की लड़ाई, जो एक बाप ही सिखलाते हैं। जबकि तुम समझते हो बरोबर शिवबाबा ने हमको गोद में लिया है, एडाप्ट किया है। तो और सब तरफ से बुद्धियोग टूट जाना चाहिए। राजा की गोद में जायेंगे तो राजा-रानी का ही बच्चा अपने को समझेंगे। प्रिन्स-प्रिन्सेज ही मित्र-सम्बन्धी होंगे। वह कुल अथवा बिरादरी बदल जाती है। तो यहाँ भी ब्राह्मण कुल का बनना है। देवताओं अथवा शक्तियों के साथ नारद को भी बिठाते हैं। भगवान ने नारद को कहा तुम अपनी शक्ल तो देखो। नारद भक्ति करता था।
अभी तुम बच्चों को अच्छी रीति पुरुषार्थ करना है। तुम्हारे अन्दर कोई भी भूत नहीं होना चाहिए। कोई क्रोध करे तो समझो इनमें भूत है। पांच विकारों का यहाँ दान देना है, तब वह नशा चढ़ सके। फिर तुम बहुत खुश मिजाज़ रहेंगे। जैसे देवताओं के चेहरे रहते हैं। तुम रूप-बसन्त हो ना। जैसे बाबा ज्ञान रत्न देता है, तुम्हारे मुख से भी रत्न निकलने चाहिए। पुरुषार्थ करते रहो। मंजिल बहुत बड़ी है, विश्व का मालिक बनना होता है। हम ही अनेक बार विश्व के मालिक बने हैं। ऐसे और कोई संन्यासी आदि कह न सकें। बाप कहते हैं लाडले बच्चे तुम अनगिनत बार विश्व के मालिक बने हो, फिर हराया है। अब फिर जीत पहनो। है सारा पुरुषार्थ पर मदार। बच्चों को बड़ी खुशी रहनी चाहिए। हम विश्व के मालिक बनते हैं, तो वह खुशी स्थाई क्यों नहीं रहती? पुरानी दुनिया के सम्बन्ध याद आ जाते हैं। देह-अभिमान आ जाता है। पहला-पहला दुश्मन है ही देह-अभिमान। देह-अभिमान आया और लगी माया की चमाट। मैं बाबा का हूँ, बाबा के ब्रह्माण्ड का मालिक हूँ। बाबा से वर्सा ले विश्व का मालिक बनता हूँ, यह नशा रहना चाहिए। देही-अभिमानी बनने की मेहनत करनी चाहिए। कल्प में एक ही बार बाबा आकर तुमको देही-अभिमानी बनना सिखलाते हैं। कितना कहते हैं बाबा को याद करो। फिर भी भूल जाते हैं, चार्ट लिखने में थक जाते हैं। बच्चों को अपना चार्ट देखना है। एक बाबा इतने बच्चों का चार्ट कहॉ तक देखेंगे। बाबा को कितना काम रहता है। पत्रों के जवाब लिखने में अंगुलियां ही घिस जाती हैं। परन्तु बच्चों को शौक रहता है कि बाबा के हाथ का पत्र पढ़ें। तुम्हीं से बैठूँ, तुम्हीं से लिखा पढ़ी करुँ... लिखते भी हैं शिवबाबा केअरआफ ब्रह्मा। फिर बाबा जवाब भी देते हैं। कितने पत्र लिखने पड़ें। हाँ, सर्विसएबुल बच्चे सर्विस का समाचार देंगे तो बाप भी खुश होगा। अच्छी-अच्छी चिट्ठी आयेगी तो नयनों पर रखेंगे, दिल पर रखेंगे। नहीं तो वेस्ट पेपर बॉक्स में डाल देनी पड़ती हैं। सर्विसएबुल बच्चों की बहुत महिमा करता हूँ। सर्विस करने वाले बच्चे ही दिल पर चढ़ सकते हैं। सपूत बच्चे माँ बाप को फालो करते हैं। बाप कितना अच्छी रीति समझाते हैं। भक्ति मार्ग में मनुष्य मुक्ति के लिए कितने धक्के खाते रहते हैं। परन्तु वह जानते ही नहीं कि मुक्ति कहाँ है? कुछ नहीं जानते। ज्ञान है ही एक ज्ञान सागर के पास। सृष्टि के आदि, मध्य, अन्त को जानना, इसको ज्ञान कहा जाता है। जब तक सृष्टि के आदि मध्य अन्त को नहीं जाना तो ब्लाइन्ड हैं। महाभारत लड़ाई भी सामने खड़ी है। बहुत तकलीफ होने वाली है। यह दुनिया बड़ी गन्दी है। बाप बच्चों को फिर भी समझाते हैं बच्चे खबरदार रहना। कोई भूत होगा तो तुम गोरे कैसे बनेंगे? तुम कहते हो बाबा हम आपकी मत पर चलेंगे तो बाबा कहते हैं भूतों को भगाओ। इस दुनिया से ममत्व नहीं रखना है। बुद्धियोग नई दुनिया में चला जाना चाहिए। तुम जानते हो हमारे लिए स्वर्ग की स्थापना हो रही है। तो याद करना पड़े ना। बाप को, स्वीट होम को और राजधानी को याद करो। शरीर निर्वाह अर्थ सर्विस भी करो। फिर यह ईश्वरीय सर्विस भी करो। अच्छा!
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का यादप्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।
धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) रूप-बसन्त बन मुख से सदैव ज्ञान रत्न निकालने हैं। देवताओं जैसा खुशमिजाज़ बनना है।
2) ज्ञान और योग बल से विकर्म विनाश कर बाप से डबल वर्सा (मुक्ति-जीवनमुक्ति का) लेना है।
वरदान:- “छोड़ो तो छूटो'' इस पाठ द्वारा नम्बरवन लेने वाले उड़ता पंछी भव
उड़ता पछी बनने के लिए यह पाठ पक्का करो कि “छोड़ो तो छूटो''। किसी भी प्रकार की डाली को अपने बुद्धि रूपी पांव से पकड़कर नहीं बैठना। इसी पाठ से ब्रह्मा बाप नम्बरवन बने। यह नहीं सोचा कि साथी मुझे छोड़े तो छूटूं, सम्बन्धी छोड़ें तो छूटूं। विघ्न डालने वाले विघ्न डालने से छोड़ें तो छूटूं - स्वयं को सदा यही पाठ प्रैक्टिकल में पढ़ाया कि स्वयं छोड़ो तो छूटो। तो नम्बरवन में आने के लिए ऐसे फालो फादर करो।
| स्लोगन:- | जिनके संकल्पों में एक बाबा है उनकी मन्सा सदा शक्तिशाली है। |
19.02.2023 HINDI MURLI
“पवित्रता के दृढ़ व्रत द्वारा वृत्ति का परिवर्तन
आज ऊंचे से ऊंचा बाप अपने सर्व महान् बच्चों को देख रहे हैं। महान् आत्मा तो सभी बच्चे बने हैं क्योंकि सबसे महान् बनने का मुख्य आधार ‘पवित्रता' को धारण किया है। पवित्रता का व्रत सभी ने प्रतिज्ञा के रूप में धारण किया है। किसी भी प्रकार का दृढ़ संकल्प रूपी व्रत लेना अर्थात् अपनी वृत्ति को परिवर्तन करना। दृढ़ व्रत वृत्ति को बदल देता है इसलिये ही भक्ति में व्रत लेते भी हैं और व्रत रखते भी हैं। व्रत लेना अर्थात् मन में संकल्प करना और व्रत रखना अर्थात् स्थूल रीति से परहेज करना। चाहे खान-पान की, चाहे चाल-चलन की, लेकिन दोनों का लक्ष्य व्रत द्वारा वृत्ति को बदलने का है। आप सभी ने भी पवित्रता का व्रत लिया और वृत्ति श्रेष्ठ बनाई। सर्व आत्माओं के प्रति क्या वृत्ति बनाई? आत्मा भाई-भाई हैं। ब्रदरहुड, इस वृत्ति से ही ब्राह्मण महान् आत्मा बने। यह व्रत तो सभी का पक्का है ना?
ब्राह्मण जीवन का अर्थ ही है पवित्र आत्मा, और ये पवित्रता ब्राह्मण जीवन का फाउण्डेशन है। फाउण्डेशन पक्का है ना कि हिलता है? ये फाउण्डेशन सदा अचल-अडोल रहना ही ब्राह्मण जीवन का सुख प्राप्त करना है। कभी-कभी बच्चे जब बाप से रूहरिहान करते अपना सच्चा चार्ट देते हैं तो क्या कहते हैं? कि जितना अतीन्द्रिय सुख, जितनी शक्तियाँ अनुभव होनी चाहिये, उतनी नहीं हैं या दूसरे शब्दों में कहते हैं कि हैं, लेकिन सदा नहीं हैं। इसका कारण क्या? कहने में तो मास्टर सर्वशक्तिमान् कहते हैं, अगर पूछेंगे कि मास्टर सर्वशक्तिमान् हो, तो क्या कहेंगे? ‘ना' तो नहीं कहेंगे ना। कहते तो ‘हाँ' हैं। मास्टर सर्वशक्तिमान् हैं तो फिर शक्तियां कहाँ चली जाती हैं? और हैं ही ब्राह्मण जीवनधारी। नामधारी नहीं हैं, जीवनधारी हैं। ब्राह्मणों के जीवन में सम्पूर्ण सुख-शान्ति की अनुभूति न हो वा ब्राह्मण सर्व प्राप्तियों से सदा सम्पन्न न हों तो सिवाए ब्राह्मणों के और कौन होगा? और कोई हो सकता है? ब्राह्मण ही हो सकते हैं ना। आप सभी अपना साइन क्या करते हो? बी.के. फलानी, बी.के. फलाना कहते हो ना। पक्का है ना? बी.के. का अर्थ क्या है? ‘ब्राह्मण'। तो ब्राह्मण की परिभाषा यह है।
‘जितना' और ‘उतना' शब्द क्यों निकलता है? कहते हो सुख-शान्ति की जननी पवित्रता है। जब भी अतीन्द्रिय सुख वा स्वीट साइलेन्स का अनुभव कम होता है, इसका कारण पवित्रता का फाउण्डेशन कमजोर है। पहले भी सुनाया है कि पवित्रता स़िर्फ ब्रह्मचर्य का व्रत नहीं, ये व्रत भी महान् है क्योंकि इस ब्रह्मचर्य के व्रत को आज की महान् आत्मा कहलाने वाले भी मुश्किल तो क्या लेकिन असम्भव समझते हैं। तो असम्भव को अपने दृढ़ संकल्प द्वारा सम्भव किया है और सहज पालन किया है इसलिये ये व्रत भी धारण करना कम बात नहीं है। बापदादा इस व्रत को पालन करने वाली आत्माओं को दिल से दुआओं सहित मुबारक देते हैं। लेकिन बापदादा हर एक ब्राह्मण बच्चे को सम्पूर्ण और सम्पन्न देखना चाहते हैं। तो जैसे इस मुख्य बात को जीवन में अपनाया है, असम्भव को सम्भव सहज किया है तो और सर्व प्रकार की पवित्रता को धारण करना क्या बड़ी बात है! पवित्रता की परिभाषा सभी बहुत अच्छी तरह से जानते हो। अगर आप सबको कहें “पवित्रता क्या है'' इस टॉपिक पर भाषण करो तो अच्छी तरह से कर सकते हो ना? जब जानते भी हो और मानते भी हो फिर ‘उतना', ‘जितना' ये शब्द क्यों? कौन-सी पवित्रता कमजोर होती है, जो सुख, शान्ति और शक्ति की अनुभूति कम हो जाती है? पवित्रता किसी न किसी स्टेज में अचल नहीं रहती, तो किस रूप की पवित्रता की हलचल है उसको चेक करो। बापदादा पवित्रता के सर्व रूपों को स्पष्ट नहीं करते क्योंकि आप जानते हो, कई बार सुन चुके हो, सुनाते भी रहते हो, अपने आपसे भी बात करते रहते हो कि हाँ, ये है, ये है...। मैजारिटी की रिजल्ट देखते हुए क्या दिखाई देता है? कि ज्ञान बहुत है, योग की विधि के भी विधाता बन गये, धारणा के विषय पर वर्णन करने में भी बहुत होशियार हैं और सेवा में एक-दो से आगे हैं, बाकी क्या है? ज्ञाता तो नम्बरवन हो गये हैं, सिर्फ एक बात में अलबेले बन जाते हो, वो है “स्व को सेकेण्ड में व्यर्थ सोचने, देखने, बोलने और करने में फुलस्टॉप लगाकर परिवर्तन करना।'' समझते भी हो कि यही कमजोरी सुख की अनुभूति में अन्तर लाती है, शक्ति स्वरूप बनने में वा बाप समान बनने में विघ्न स्वरूप बनती है फिर भी क्या होता है? स्वयं को परिवर्तन नहीं कर सकते, फुलस्टॉप नहीं दे सकते। ठीक है, समझते हैं का कॉमा (,) लगा देते हैं, वा दूसरों को देख आश्चर्य की निशानी (!) लगा देते हो कि ऐसा होता है क्या! ऐसे होना चाहिये! वा क्वेश्चन मार्क की क्यू (लाइन) लगा देते हो, क्यों की क्यू लगा देते हो। फुलस्टॉप अर्थात् बिन्दु (.)। तो फुल स्टॉप तब लग सकता है जब बिन्दु स्वरूप बाप और बिन्दु स्वरूप आत्मा - दोनों की स्मृति हो। यह स्मृति फुलस्टॉप अर्थात बिन्दु लगाने में समर्थ बना देती है। उस समय कोई-कोई अन्दर सोचते भी हैं कि मुझे आत्मिक स्थिति में स्थित होना है लेकिन माया अपनी सैक्रीन द्वारा आत्मा के बजाय व्यक्ति वा बातें बार-बार सामने लाती है, जिससे आत्मा छिप जाती है और बार-बार व्यक्ति और बातें सामने स्पष्ट आती हैं। तो मूल कारण स्व के ऊपर कन्ट्रोल करने की कन्ट्रोलिंग पॉवर कम है। दूसरों को कन्ट्रोल करना बहुत आता है लेकिन स्व पर कन्ट्रोल अर्थात् परिवर्तन शक्ति को कार्य में लगाना कम आता है।
बापदादा कोई-कोई बच्चों के शब्द पर मुस्कराते रहते हैं। जब स्व के परिवर्तन का समय आता है वा सहन करने का समय आता है वा समाने का समय आता है तो क्या कहते हो? बहुत करके क्या कहते कि ‘मुझे ही मरना है', ‘मुझे ही बदलना है', ‘मुझे ही सहन करना है' लेकिन जैसे लोग कहते हैं ना कि ‘मरा और स्वर्ग गया' उस मरने में तो स्वर्ग में कोई जाते नहीं हैं लेकिन इस मरने में तो स्वर्ग में श्रेष्ठ सीट मिल जाती है। तो यह मरना नहीं है लेकिन स्वर्ग में स्वराज्य लेना है। तो मरना अच्छा है ना? क्या मुश्किल है? उस समय मुश्किल लगता है। मैं ग़लत हूँ ही नहीं, वो ग़लत है, लेकिन ग़लत को मैं राइट कैसे करूँ, यह नहीं आता। रांग वाले को बदलना चाहिये या राइट वाले को बदलना चाहिये? किसको बदलना है? दोनों को बदलना पड़े। ‘बदलने' शब्द को आध्यात्मिक भाषा में आगे बढ़ना मानो, ‘बदलना' नहीं मानो, ‘बढ़ना'। उल्टे रूप का बदलना नहीं, सुल्टे रूप का बदलना। अपने को बदलने की शक्ति है? कि कभी तो बदलेंगे ही।
पवित्रता का अर्थ ही है - सदा संकल्प, बोल, कर्म, सम्बन्ध और सम्पर्क में तीन बिन्दु का महत्व हर समय धारण करना। कोई भी ऐसी परिस्थिति आये तो सेकेण्ड में फुलस्टॉप लगाने में स्वयं को सदा पहले ऑफर करो “मुझे करना है''। ऐसी ऑफर करने वाले को तीन प्रकार की दुआएं मिलती हैं। (1) स्वयं को स्वयं की भी दुआएं मिलती हैं, खुशी मिलती है, (2) बाप द्वारा, (3) जो भी श्रेष्ठ आत्मायें ब्राह्मण परिवार की हैं उन्हों के द्वारा भी दुआएं मिलती हैं। तो मरना हुआ या पाना हुआ, क्या कहेंगे? पाया ना। तो फुलस्टॉप लगाने के पुरुषार्थ को वा कन्ट्रोलिंग पॉवर द्वारा परिवर्तन शक्ति को तीव्र गति से बढ़ाओ। अलबेलापन नहीं लाओ ये तो होता ही है, ये तो चलना ही है... ये अलबेलेपन के संकल्प हैं। अलबेलापन परिवर्तन कर अलर्ट बन जाओ। अच्छा!
चारों ओर के महान आत्माओं को, सर्वश्रेष्ठ पवित्रता के व्रत को धारण करने वाली आत्माओं को, सदा स्व को सेकेण्ड में फुलस्टॉप लगाए श्रेष्ठ परिवर्तक आत्माओं को, सदा स्वयं को श्रेष्ठ कार्य में निमित्त बनाने की ऑफर करने वाली आत्माओं को, सदा तीन बिन्दु का महत्व प्रैक्टिकल में धारण कर दिखाने वाली बाप समान आत्माओं को बापदादा का याद-प्यार और नमस्ते।
दादियों से मुलाकात
सभी आप लोगों को देखकर खुश होते हैं। क्यों खुश होते हैं? (बापदादा सभी से पूछ रहे हैं) दादियों को देख खुश होते हो ना? क्यों खुश होते हो? क्योंकि अपने वायब्रेशन वा कर्म द्वारा खुशी देते हैं इसलिये खुश होते हो। जब भी ऐसी श्रेष्ठ आत्माओं से मिलते हो तो खुशी अनुभव करते हो ना। (टीचर्स से) फ़ालो भी करती हो ना। कई सोचते हैं बाप तो बाप है, कैसे समान बन सकते हैं? लेकिन जो निमित्त आत्मायें हैं वो तो आपके हमजिन्स हैं ना? तो जब वो बन सकती हैं तो आप नहीं बन सकते? तो लक्ष्य सभी का सम्पूर्ण और सम्पन्न बनने का है। अगर हाथ उठवायेंगे कि 16 कला बनना है या 14 कला तो किसमें उठायेंगे? 16 कला। तो 16 कला का अर्थ क्या है? सम्पूर्ण ना। जब लक्ष्य ही ऐसा है तो बनना ही है। मुश्किल है नहीं, बनना ही है। छोटी-छोटी बातों में घबराओ नहीं। मूर्ति बन रहे हो तो कुछ तो हेमर लगेंगे ना, नहीं तो ऐसे कैसे मूर्ति बनेंगे! जो जितना आगे होता है उसको त़ूफान भी सबसे ज्यादा क्रॉस करने होते हैं लेकिन वो त़ूफान उन्हों को त़ूफान नहीं लगता, तोह़फा लगता है। ये त़ूफान भी गिफ्ट बन जाती है अनुभवी बनने की, तो तोह़फा बन गया ना। तो गिफ्ट लेना अच्छा लगता है या मुश्किल लगता है? तो ये भी लेना है, देना नहीं है। देना मुश्किल होता है, लेना तो सहज होता है।
ये नहीं सोचो मेरा ही पार्ट है क्या, सब विघ्नों के अनुभव मेरे पास ही आने है क्या! वेलकम करो आओ। ये गिफ्ट है। ज्यादा में ज्यादा गिफ्ट मिलती है, इसमें क्या? ज्यादा एक्यूरेट मूर्ति बनना अर्थात् हेमर लगना। हेमर से ही तो उसे ठोक-ठोक करके ठीक करते हैं। आप लोग तो अनुभवी हो गये हो, नथिंग न्यु। खेल लगता है। देखते रहते हो और मुस्कराते रहते हो, दुआयें देते रहते हो। टीचर्स बहादुर हो या कभी-कभी घबराती हो? ये तो सोचा ही नहीं था, ऐसे होगा, पहले पता होता तो सोच लेते...। डबल फ़ॉरेनर्स समझते हो इतना तो सोचा ही नहीं था कि ब्राह्मण बनने में भी ऐसा होता है? सोच-समझकर आये हो ना या अभी सोचना पड़ रहा है? अच्छा!
कितना भी कोई कैसा भी हो लेकिन बापदादा अच्छाई को ही देखते हैं इसलिये बापदादा सभी को अच्छा ही कहेंगे, बुरा नहीं कहेंगे। चाहे 9 बुराई हों और एक अच्छाई हो तो भी बाप क्या कहेगा? अच्छे हैं या कहेंगे कि ये तो बहुत खराब है, ये तो बड़ा कमजोर है? अच्छा। ये बड़ा ग्रुप हो गया है। (21 देशों के लोग आये हैं) अच्छा है, हाउसफुल हो तब तो दूसरा बनें। अगर फुल नहीं होगा तो बनने की मार्जिन नहीं होगी। आवश्यकता ही साधन को सामने लाती है।
अव्यक्त बापदादा की पर्सनल मुलाकात - हर कदम में पद्मों की कमाई जमा करने का युग - संगमयुग
अपने को पद्मापद्म भाग्यवान समझते हो? हर कदम में पद्मों की कमाई जमा हो रही है? तो कितने पद्म जमा किये हैं? अनगिनत हैं? क्योंकि जानते हैं कि जमा करने का समय अब है। सतयुग में जमा नहीं होगा। कर्म वहाँ भी होंगे लेकिन अकर्म होंगे क्योंकि वहाँ के कर्म का सम्बन्ध भी यहाँ के कर्मों के फल के हिसाब में है। तो यहाँ है करने का समय और वहाँ है खाने का समय। तो इतना अटेन्शन रहता है? कितने जन्मों के लिये जमा करना है? (84) जमा करने में खुशी होती है ना? मेहनत तो नहीं लगती? क्यों नहीं मेहनत महसूस होती है? क्योंकि प्रत्यक्षफल भी मिलता है। प्रत्यक्षफल मिलता है कि भविष्य के आधार पर चल रहे हो? भविष्य से भी प्रत्यक्षफल अति श्रेष्ठ है। सदा ही श्रेष्ठ कर्म और श्रेष्ठ प्रत्यक्षफल मिलने का साधन है कि सदा ये याद रखो कि “अब नहीं तो कब नहीं।'' जैसे नाम है डबल फॉरेनर्स, तो डबल का टाइटिल बहुत अच्छा है। तो सबमें डबल - खुशी में, नशे में, पुरुषार्थ में, सबमें डबल। सेवा में भी डबल। और रहते भी सदा डबल हो, कम्बाइण्ड, सिंगल नहीं। कभी डबल होने का संकल्प तो नहीं आता? कम्पनी चाहिये या कम्पैनियन चाहिये? चाहिये तो बता दो। ऐसे नहीं करना कि वहाँ जाकर कहो कम्पैनियन चाहिये। कितने भी कम्पैनियन करो लेकिन ऐसा कम्पैनियन नहीं मिल सकता। कितने भी अच्छे कम्पैनियन हो लेकिन सब लेने वाले होंगे, देने वाले नहीं। इस वर्ल्ड में ऐसा कम्पैनियन कोई है? अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, अफ्रीका आदि में थोड़ा ढूँढ कर आओ, मिलता है! क्योंकि मनुष्यात्मायें कितने भी देने वाले बनें फिर भी देते-देते लेंगे ज़रूर। तो जब दाता कम्पैनियन मिले तो क्या करना चाहिये? कहाँ भी जाओ, फिर आना ही पड़ेगा। ये सब जाने वाले नहीं हैं। कोई कमजोर तो नहीं हैं? फोटो निकल रहा है। फिर आपको फोटो भेजेंगे कि आपने कहा था। कहो यह होना ही नहीं है। बापदादा भी आप सबके बिना अकेला नहीं रह सकता। अच्छा।
वरदान:- महावीर बन बाप का साक्षात्कार कराने वाले वाहनधारी सो अलंकारधारी भव
महावीर अर्थात् शस्त्रधारी। शक्तियों वा पाण्डवों को सदा वाहन में दिखाते हैं और शस्त्र भी दिखाते हैं। शस्त्र अर्थात् अलंकार। वाहन है श्रेष्ठ स्थिति और अलंकार हैं सर्व शक्तियां। ऐसे वाहनधारी और अलंकारधारी ही साक्षात्कार मूर्त बन बाप का साक्षात्कार करा सकते हैं। यही महावीर बच्चों का कर्तव्य है। महावीर उसे ही कहा जाता है जो अपनी उड़ती कला द्वारा सर्व परिस्थितियों को पार कर ले।
स्लोगन:- एकरस पुरुषार्थ द्वारा ऊंची स्थिति बना लो तो हिमालय जैसा बड़ा पेपर भी रूई हो जायेगा।
सूचनाः- आज मास का तीसरा रविवार है, सभी राजयोगी तपस्वी भाई बहिनें सायं 6.30 से 7.30 बजे तक, विशेष योग अभ्यास के समय अनुभव करें कि ज्ञान सूर्य सर्वशक्तिवान परमात्मा की किरणें मुझ पर पड़ रही हैं और मुझसे सारे संसार में जा रही हैं, जिससे संसार से अज्ञान-अंधकार दूर होता जा रहा है।
18.02.2023 HINDI MURLI
“मीठे बच्चे - तुम्हें क्षीरखण्ड होकर रहना है, मतभेद में नहीं आना है, कोई भी गन्दी आदत है तो उसे छोड़ देना है, किसी को भी दु:ख नहीं देना है''
प्रश्नः- जन्म-जन्मान्तर के लिए ऊंच पद पाने के लिए कौन सा रहम स्वयं पर जरूर करना है?
उत्तर:- स्वयं की अन्दर से जांच करके जो भी बुरी आदतें हैं, क्रोध आदि विकार हैं उन्हें निकाल देना, क्षीरखण्ड होकर रहना, एक की श्रीमत पर चलना, मतभेद में न आना, कोई भी ईविल बातें न सुनना, न सुनाना - यही अपने ऊपर रहम करना है। इससे ही जन्म-जन्मान्तर के लिए ऊंच पद मिल जाता है। जो अपने ऊपर रहम नहीं करते वह 21 जन्मों के सुख को लकीर लगा देते हैं।
गीत:- ओम् नमो शिवाए......
ओम् शान्ति। शिवबाबा की महिमा बच्चों ने सुनी। यह महिमा कौन करते हैं और कौन जानते हैं? सिर्फ ब्राह्मण कुल भूषण अर्थात् नई मनुष्य सृष्टि की सम्प्रदाय जिन्हें परमपिता परमात्मा ने अपना बनाया या जन्म दिया है वही जानते हैं क्योंकि पहले-पहले इस सृष्टि में वही ब्रह्मा द्वारा जन्म लेते हैं। जैसे तुमने पहले-पहले जन्म लिया है परमपिता परमात्मा से। तो वह है सभी का सहायक, सारी दुनिया का सहायक, सभी दु:ख दूर करने वाला है। मनुष्य बहुत दु:खी हैं क्योंकि अभी है कलियुग का अन्त। तो सभी का सहायक बनते हैं। फिर भी अक्षर हैं ना आम और खास। तो खास भारत का है, उनमें भी खास जो बहुत जन्मों के अन्त के जन्म में आकर मिलते हैं अर्थात् जो पहले-पहले सृष्टि पर आते हैं। तुम बच्चे जानते हो तो कैसे सबका सहायक आकर बनते हैं। भगत भगवान को याद करते हैं, परन्तु भगवान को जानते नहीं हैं। जब भगवान को ही नहीं जानते हैं तो भगवान जो नई ब्राह्मण मुख वंशावली रचते हैं, उनको भी नहीं जानते। परमपिता परमात्मा आकर पहले-पहले ब्राह्मण सम्प्रदाय रचते हैं, यह कोई को पता ही नहीं। आदि सनातन देवी-देवता धर्म तो है सतयुग में। बाकी संगमयुग को भूल गये हैं क्योंकि गीता के भगवान को ही द्वापर में ले गये हैं। सतयुग के आदि और कलियुग के अन्त के संगम का किसको पता नहीं है। न गीता के भगवान को जानते हैं। गीता तो है ही सभी शास्त्रों की मात-पिता। ऐसे नहीं कि सिर्फ भारत के शास्त्रों की मात-पिता है। नहीं, जो भी बड़े ते बड़े शास्त्र सारी दुनिया में हैं, सभी की मात-पिता है। भगवानुवाच - मैं तुमको फिर से सहज राजयोग सिखाता हूँ जिसको फिर गीता नाम दिया है। तो अपने को भी कहना पड़ता है कि हम नई गीता सुनाते हैं। पुरानी गीता तो खण्डन की हुई है। यह तो भगवान खुद अपने मुख कंवल से बैठ सुनाते हैं। तुम्हारी बुद्धि में परमपिता परमात्मा शिव ही याद आता है। वह है स्वर्ग का रचयिता, सबका सहायक। श्रीकृष्ण को सभी का सहायक नहीं कहेंगे। भगवान सृष्टि का रचयिता एक ही है। श्रीकृष्ण तो स्वयं रचना है। बगीचे का फर्स्टक्लास फूल है। परमपिता परमात्मा को बागवान भी कहते हैं, खिवैया भी कहते हैं। मनुष्य तो समझ न सकें कि खिवैया कैसे है? बरोबर असार संसार से ले जाकर फिर यहाँ नई दुनिया में भेज देते हैं। यहाँ ही फूलों का बगीचा बनाते हैं। सभी बच्चे जो भगत बन गये हैं, असुल भगवान की सन्तान थे, उनको माया दु:खी बनाती है। भगवान तो है ही एक। वह सभी भक्तों को जरूर सुख देता है। कोई भी किसको सुख देता है तब उनको याद करते हैं। स्त्री पति को अथवा बच्चा बाप को अथवा दोस्त, दोस्त को याद करते हैं। जरूर उसने सुख दिया होगा। भाई से भी दोस्त प्यारा होता है क्योंकि सुख देते हैं। तो सुख देने वाले को ही याद किया जाता है। अभी सारी सृष्टि के मनुष्य भगत हैं। मनुष्य के ही 84 जन्म गाये हुए हैं। कुत्ते बिल्ली के 84 जन्म नहीं कहेंगे। गाया भी गया है कि आत्मा परमात्मा अलग रहे.... इस समय मेला होता है। परमपिता परमात्मा सभी बच्चों के बीच आते हैं। महफिल लगी हुई है ना। एक होती है सुख की महफिल, दूसरी होती है दु:ख की। सतयुग में है सुख की महफिल। यहाँ तो दु:ख की कहेंगे। कोई मरते हैं तो भी दु:ख की महफिल लग जाती है। कोई बड़ा आदमी मरता है तो शोक में झण्डा नीचे कर देते हैं। तो दु:ख की महफिल हुई ना। भगत बहुत दु:खी होते हैं तो भगवान को याद करते हैं। परन्तु उनको जानते बिल्कुल नहीं। कहते भी हैं उसने पैदा किया। आखरीन भी उनको जानेंगे या नहीं? अन्त में गायन करते हैं हे भगवान तेरी लीला अपरमअपार है। महिमा गाई हुई है। तुम जानते हो बाप नहीं होता तो सृष्टि चक्र का राज़ कौन समझाता, कौन हमको चक्रवर्ती बनाता?
अब संगम पर तुम सदा के लिए दु:ख से छूटने का प्रयत्न कर रहे हो। संगमयुग कोई बड़ा नहीं है। अपना यह नया जन्म है। यह छोटा सा युग है - हम बच्चों के पुरुषार्थ के लिए। बड़ा इम्तहान है। इनकी सब्जेक्ट सभी इम्तहानों से न्यारी है। पांच विकारों पर जीत पानी है। बहुत मनुष्य कहते हैं पवित्र रहना तो असम्भव है। गृहस्थ व्यवहार में रहते हुए माया को जीतना तो बड़ा मुश्किल है। समझते हैं ऐसा उस्ताद तो मिल न सके। संन्यासी भी घरबार छोड़ने बिगर पवित्र रह नहीं सकते। तो बाप इस माया पर जीत पाने की युक्ति बताते हैं। जैसे कल्प पहले भी सिखाई थी। जब बाबा सिखाते हैं तब हम भगत से ज्ञानी बनते हैं। इसको ही भारत का प्राचीन ज्ञान और योग कहा जाता है। इसको दुनिया में कोई भी नहीं जानते। बाप समझाते हैं यह ज्ञान प्राय:लोप हो जाता है और यह देवता धर्म भी लोप हो जाता है। ड्रामा में ही ऐसा है। जब प्राय:लोप हो जाए, सृष्टि दु:खी हो तब तो भगवान आकर फिर से स्थापन करे। यह भी कोई को पता नहीं कि कलियुग की आयु कब पूरी होती है। तुम ही बाप को और इस ड्रामा के आदि मध्य अन्त को जानते हो। देखने में कितने साधारण हो - कुब्जाएं-अहिल्यायें। परन्तु नॉलेज कितनी ऊंची है। अपने सारे 84 जन्मों के चक्र को तुम जानती हो। थोड़ा भी कोई याद करे तो भी अच्छा। परन्तु कोई प्रश्न पूछे और उत्तर देना न आये तो बोलना चाहिए कि हम अभी पढ़ रहे हैं। हमसे बहुत तीखे हैं। वह आपको अच्छी रीति समझा सकेंगे। अपना अहंकार नहीं रखना चाहिए। कह देना चाहिए, हमारी बड़ी बहन जी बहुत तीखी हैं। आप फिर कोई समय आना तो वह समझायेंगी। समझो कोई ऐसा प्रश्न निकलता है तो तीखी भी उसका उत्तर नहीं दे सकती तो बोलना चाहिए हम सब पढ़ रहे हैं। अन्त तक पढ़ते रहेंगे। गुह्य से गुह्य नॉलेज सुनते रहेंगे। यह प्वाइंट अभी हमको समझाई नहीं गई है। यह तो जरूर है, इतना समय जो पड़ा है तो जरूर अजुन गुह्य प्वाइंट रही हुई हैं, जो सुनाते रहेंगे। स्कूल में भी धीरे-धीरे पढ़ाया जाता है। ऐसे थोड़ेही एक ही दिन में सारी नॉलेज मिल जाती है। वैसे यहाँ भी पढ़ाई में, योग लगाने में, आप समान बनाने में समय लगता है। बाप दिन-प्रतिदिन सहज कर समझाते हैं। भगवान एक है, उनको ही सब याद करते हैं। भगवान ही हेविन स्थापन करते हैं तो जरूर देवता बनाने के लिए संगम पर ही राजयोग सिखायेंगे। तो मैनर्स भी ऐसे चाहिए। जब पाप खत्म हों तब तो विजय माला का दाना बनें। टाइम लगता है।
यह है सुहावना संगम का मेला। समझाना है सारी दुनिया के मनुष्य भगत हैं। साधना करते हैं भगवान के लिए कि वह परमात्मा आकर सभी को वापिस ले जाये। मुक्ति जीवनमुक्ति का ज्ञान दे देवे, देवता धर्म की स्थापना करे। संन्यासी तो समझते हैं सुख काग विष्टा समान है। सो तो जरूर इस दुनिया का सुख ऐसा है। परन्तु क्या भारत में कभी सुख नहीं था। संन्यासी तो पसन्द करते हैं मुक्ति को। वह कभी जीवनमुक्ति का ज्ञान दे न सके। भगवान को ही आकर राजयोग सिखाना है। संन्यासियों को नहीं सिखाना है क्योंकि वह कोई आदि सनातन देवी-देवता धर्म स्थापन नहीं करते हैं। अभी सब कहते भी हैं कि एक मत हो। परन्तु इस दुनिया में तो एकमत हो न सके। अथाह मतें हैं। माता पिता, भाई बहन, काका मामा आदि सभी अनेक मत देने वाले हैं। अब उन पर नहीं चलना है। एक की ही श्रीमत पर चलना है। भगवान आकर एक श्रीमत देते हैं तो फिर एक मत की राजधानी हो जाती है। देवी-देवतायें सदैव क्षीरखण्ड रहते हैं। यहाँ तो बहुत लड़ते झगड़ते रहते हैं। शास्त्रों में भी है कि कौरव पाण्डव दिन में लड़ते थे, रात को क्षीरखण्ड हो जाते थे। यहाँ भी बच्चे समझते हैं कि हमारे में क्रोध का अंश आ गया। बाबा हम आपसे माफी मांगते हैं। तो तुमको भी देखना चाहिए - सारे दिन में किसको दु:ख तो नहीं दिया? किससे मतभेद में तो नहीं आये? किससे ईविल तो नहीं बोला, जिससे कोई को दु:ख हुआ हो? ईविल तो कभी नहीं सुनना चाहिए, ऐसा कुछ देखा, सुना तो बाप को बतलाना चाहिए। बाप ही बच्चों को सब समझाते हैं। नहीं तो आदत पक्की हो जाए। कोई में कोई भी गन्दी आदत है तो छोड़ देना चाहिए, नहीं तो पद भ्रष्ट हो पड़ेंगे। बादशाही के आगे प्रजा के नौकर चाकर गरीब ही कहेंगे ना। यह मजदूर लोग क्या हैं? वहाँ भी मकान बनाने वाले तो होंगे ना। तो बाप समझाते हैं कभी लूनपानी नहीं होना चाहिए। क्रोध करना बहुत बुरा है। जन्म-जन्मान्तर के सुख को लकीर लग जाती है। अपने ऊपर रहम करते रहो। ज्ञान मार्ग में मैनर्स बहुत अच्छे चाहिए। पांच भूतों को भगाते रहो। बाप श्रीमत देते हैं और क्या करेंगे। बहुत लिखते भी हैं कि बाबा हमारा क्रोध छूट गया है। बीड़ी पीना आदि गंदी आदतें छूट गई हैं। तो गोया अपने पर रहम किया ना। अब हेविनली गॉड फादर स्वर्ग का पद प्राप्त कराने हमको पढ़ा रहे हैं। ऐसा बुद्धि में आता है? यह नशा रहना चाहिए। जितना याद करेंगे उतनी खुशी रहेगी। भल भगवान को सभी तो नहीं जानते परन्तु न जानते भी कल्याण तो सभी का होना है। सभी को यह पता पड़ जाए कि भगवान आया है तो यहाँ भीड़ मच जाए। चीटियों मिसल आकर इकट्ठे हों, मिल भी न सकें इसलिए बड़ा कायदे से यह ड्रामा बना हुआ है। अच्छा।
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का यादप्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।
धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) ज्ञान और योग सीख, भगत से ज्ञानी तू आत्मा बनना है। गृहस्थ व्यवहार में रहते माया को जीतना है। पवित्र जरूर बनना है।
2) ज्ञान मार्ग में बहुत अच्छे मैनर्स धारण करने हैं। बहुत-बहुत मीठा, निरंहकारी बनना है। ईविल बातें नहीं बोलनी हैं। मतभेद में नहीं आना है।
वरदान:- समेटने की शक्ति द्वारा पेटी बिस्तरा बंद करने वाले समय पर एवररेडी भव
एवररेडी उसे कहा जाता जो समेटने की शक्ति द्वारा देह, देह के संबंध, पदार्थ, संस्कार ...सबका पेटी बिस्तरा बंद करके तैयार हो, इसलिए चित्रों में भी समेटने की शक्ति को पेटी बिस्तरा पैक किया हुआ दिखाते हैं। संकल्प भी न आये कि अभी यह करना है, यह बनना है, अभी यह रह गया है। सेकण्ड में तैयार। समय का बुलावा हुआ और एवररेडी। कोई भी संबंध वा पदार्थ याद न आये।
स्लोगन:- परमात्मा के गुणों और शक्तियों को स्वयं में धारण करना ही महान तपस्या है।
17.02.2023 HINDI MURLI
“मीठे बच्चे - तुम्हें घर बैठे भगवान बाप मिला है तो तुम्हें अपार खुशी में रहना है, विकारों के वश खुशी को दबा नहीं देना है''
प्रश्नः- तुम बच्चों में लकी किसको कहेंगे और अनलकी किसको कहेंगे?
उत्तर:- लकी वह है जो बहुतों को आप समान बनाने की सेवा करते, सबको सुख देते हैं और अनलकी वह हैं जो सिर्फ सोते और खाते हैं। एक दो को दु:ख देते रहते हैं। पुरुषार्थ में कमी होने से ही अनलकी बन जाते हैं।
प्रश्नः- जिन बच्चों के तीसरे नेत्र का आपरेशन सक्सेसफुल होता है, उनकी निशानी क्या होगी?
उत्तर:- वह माया के तूफानों में घड़ी-घड़ी गिरेंगे नहीं, ठोकर नहीं खायेंगे। उनकी दैवी चलन होगी। धारणा अच्छी होगी।
गीत:- छोड़ भी दे आकाश सिंहासन....
ओम् शान्ति। शिव भगवानुवाच वा ऐसे भी कह सकते हैं कि गीता के भगवान शिव भगवानुवाच। गीता का नाम लिया जाता है क्योंकि गीता को ही खण्डन किया गया है। सारा मदार इस पर है कि गीता श्रीकृष्ण साकार देवता ने नहीं गाई है अर्थात् श्रीकृष्ण ने राजयोग नहीं सिखाया है वा श्रीकृष्ण द्वारा आदि सनातन देवी-देवता धर्म की स्थापना नहीं हुई है। श्रीकृष्ण को निराकार भगवान तो नहीं कह सकते। श्रीकृष्ण का चित्र ही अलग है। निराकार का रूप अलग है, वह है परम आत्मा। उनका कोई शरीर नहीं है। पुकारते ही हैं हे भगवान रूप बदलकर आओ। वह कोई जानवर का रूप तो नहीं धरेगा। मनुष्यों ने तो जानवर का भी रूप दे दिया है। कच्छ मच्छ अवतार, वाराह अवतार.. परन्तु खुद कहते हैं मैंने यह रूप धरे ही नहीं है। मुझे तो नई सृष्टि रचनी है। श्रीकृष्ण को सृष्टि नहीं रचनी है। ब्राह्मण कुल को रचने वाला ब्रह्मा। ब्रह्मा और श्रीकृष्ण में तो बहुत फर्क है। ब्रह्मा के मुख से ब्राह्मण रचे गये। श्रीकृष्ण के मुख से देवतायें रचे गये - ऐसे तो कहाँ भी नहीं लिखा हुआ है। अभी तुम बच्चे जानते हो दुनिया में ऐसा कोई नहीं जिसकी बुद्धि में यह हो कि निराकार परमात्मा साकार में आकर आत्माओं को ज्ञान देते हैं। ज्ञान लेने वाली भी आत्मा है तो देने वाली भी आत्मा है। अब आधाकल्प से भिन्न-भिन्न रूप से मात-पिता, गुरू गोसाई आदि सब देहधारी एक दो को कुछ न कुछ मत देते आये हैं। अभी इस समय त्वमेव माताश्च पिता.... पर समझाया जाता है। यह महिमा एक की ही गाई जाती है। बाप कहते हैं तुम्हारे जो भी लौकिक माँ बाप बन्धु गुरू गोसाई हैं, इन सभी की मत को छोड़ो। मैं ही आकर तुम्हारा बाप टीचर गुरू बन्धु आदि बनता हूँ। मेरी मत में सभी की मत समाई हुई है इसलिए मुझ एक की मत पर चलना अच्छा है। परमपिता परमात्मा जरूर अभी ही मत देंगे ना। यह परम आत्मा तुम आत्माओं को मत देते हैं और वह सभी मनुष्य मत देते हैं। वास्तव में तो वह भी आत्मायें आरगन्स द्वारा मत देती हैं परन्तु मनुष्य नाम रूप में फँसे हुए हैं तो इस राज़ को नहीं जानते हैं। जैसे कहते हैं बुद्ध पार निर्वाण गया। अब बुद्ध तो शरीर का नाम हो गया। वह शरीर तो कहाँ जाता नहीं वा कहेंगे फलाना वैकुण्ठ गया, वह नाम शरीर का लेंगे। ऐसे नहीं कहेंगे कि वह शरीर छोड़ उनकी आत्मा गई। ऐसे कोई जाते ही नहीं। तुम समझते हो आत्मा को ही स्वर्ग में जाना है। आत्मा कोई स्वर्ग से यहाँ नहीं आती, आते सब परमधाम से हैं। यह नॉलेज तुम बच्चों की बुद्धि में है। तुम जानते हो इस सृष्टि पर पहले देवी-देवताओं की आत्मायें थी, जिन्होंने सतयुग में पार्ट बजाया। तुम्हारी बुद्धि में आत्मा और परमात्मा का पूरा परिचय है। भल तुम घड़ी-घड़ी भूल जाते हो, देह-अभिमान में आ जाते हो, पूरी रीति कोई से मेहनत होती नहीं। माया ऐसी है जो पुरुषार्थ करने नहीं देती। खुद भी सुस्त हैं तो माया और ही सुस्त बना देती है। विश्व का मालिक खुद बैठ पढ़ाते हैं, जिसमें मात-पिता, बन्धु सखा, गुरू आदि सभी सम्बन्धों की ताकत आ जाती है। यह महिमा है ही एक निराकार परमात्मा की, परन्तु मनुष्य समझते नहीं। लक्ष्मी-नारायण आदि सबके आगे जाकर महिमा गाते रहते हैं।
तुम जानते हो हम आत्मायें 84 जन्मों का चक्र लगाकर आई हैं। अब यह अन्तिम जन्म है। यह घड़ी-घड़ी बुद्धि में याद रहना चाहिए। यह नॉलेज बड़ी खुशी की है। ऐसा बेहद का बाप स्वयं तुम बच्चों के और कोई को मिलता नहीं है। विवेक भी कहता है परमपिता परमात्मा का जो बच्चा बना है उनकी खुशी का पारावार नहीं होना चाहिए। परन्तु लोभ मोह आदि विकार आने से खुशी को दबा देते हैं। इन विकारों ने ही सारी दुनिया की खुशी को दबा दिया है। तुमको तो घर बैठे बाप आकर मिला है। भारत में आये हैं। भारतवासियों का तो भारत घर है ना। परन्तु आयेंगे तो जरूर एक घर में। ऐसे तो नहीं घर-घर में आयेंगे। फिर तो सर्वव्यापी हो गया। वह आयेंगे तो जरूर आकर पतितों को पावन बनायेंगे। दुनिया तो समझती है श्रीकृष्ण आयेगा। परन्तु तुम जानते हो परमपिता परमात्मा आया हुआ है, जो पतित-पावन, ज्ञान का सागर है, उनका नाम वास्तव में रूद्र है। यह बड़े से बड़ी भूल है। जब यह समझें कि वह बेहद का बाप सारी सृष्टि का रचयिता है तो खुशी का पारा चढ़ जाये। ऐसे बाप से तो जरूर वर्सा मिलेगा। श्रीकृष्ण से तो वर्सा मिल न सके। इन बातों पर भी किसकी बुद्धि नहीं चलती। दुनिया तो सारी शूद्र सम्प्रदाय है। ब्राह्मण भी सिर्फ कहलाने मात्र हैं। तुम ब्राह्मण जब विचार सागर मंथन करो तब औरों को भी परिचय दे सको। श्रीकृष्ण को तो सब जानते हैं। सिर्फ कोई कहते राधे-कृष्ण स्वर्ग के हैं, कोई फिर द्वापर में ठोक देते, यह भी मूँझ कर दी है। ईश्वर तो ज्ञान का सागर है। तुम ईश्वरीय सम्प्रदाय में ही ज्ञान आ सकता है। आसुरी सम्प्रदाय में ज्ञान कहाँ से आया? भल गाते भी हैं पतित-पावन.. परन्तु अपने को पतित समझते नहीं। स्वर्ग को तो बिल्कुल जानते ही नहीं। सिर्फ नाम मात्र कहते हैं, यह भी नहीं समझते हैं कि देवतायें स्वर्गवासी हैं। तुम जब समझाते हो तब आंखे खुलती हैं। माया ने आंखें ही बन्द कर दी हैं। प्राचीन भारत स्वर्ग था। लक्ष्मी-नारायण का राज्य था यह भी नहीं जानते। हम भी नहीं मानते थे। यह तो समझ सकते हैं कि अन्य धर्म तो बाद में आये हैं। देवताओं के समय यह धर्म नहीं थे। तो जरूर वहाँ सुख ही सुख होगा। बाप बच्चों को रचते ही हैं सुख के लिए। ऐसे नहीं सुख दु:ख दोनों देते हैं। लौकिक बाप भी बच्चा मांगता है तो उनको धन सम्पत्ति देने लिए, न कि दु:ख देने लिए। यह तो अभी हम समझाते हैं कि द्वापर से लेकर लौकिक बाप भी दु:ख ही देते आये हैं। सतयुग त्रेता में तो दु:ख नहीं देते। यहाँ माँ बाप प्यार तो बहुत करते हैं, परन्तु उनको फिर काम कटारी नीचे डाल देते हैं। तो दु:ख आरम्भ हो जाता है। सतयुग में तो ऐसे नहीं होता। वहाँ तो दु:ख की बात नहीं। यह बाप बैठ समझाते हैं। तुम्हारे में भी नम्बरवार समझते हैं। तुम्हारा यह ज्ञान योग से आपरेशन हो रहा है। परन्तु कोई का सक्सेसफुल होता है, कोई का नहीं होता है। जैसे आंखों का आपरेशन कराते हैं तो कोई की ठीक हो जाती हैं, कोई में थोड़ी खराबी रह जाती है, कोई की आंखें बिल्कुल खराब हो जाती हैं। तुमको भी अभी ज्ञान का तीसरा नेत्र मिल रहा है। तो बुद्धि रूपी नेत्र खुल जाता है तो अच्छा पुरुषार्थ करने लग पड़ते हैं। कोई का पूरा नहीं खुलता है, धारणा नहीं होती, दैवी चलन भी नहीं होती। माया के तूफान में घड़ी-घड़ी गिरते रहते हैं। एक तरफ है 21 जन्मों का सुख देने वाला उस्ताद, दूसरे तरफ है दु:ख देने वाला रावण। उसे भी उस्ताद कहेंगे। बाप कहते हैं मैं तो कोई को दु:ख नहीं देता। मैं तो सुख देने वाला नामीग्रामी हूँ। सतयुग त्रेता में सब सुखी हैं, सुख देने वाला और है। यह भी किसको पता नहीं है कि रावण राज्य कब आरम्भ होता है। आधा-कल्प रामराज्य, आधाकल्प रावण राज्य। यह है राम राज्य और रावण राज्य की कहानी। परन्तु यह भी कोई की बुद्धि में मुश्किल बैठता है। कोई तो बिल्कुल जड़जड़ीभूत अवस्था में हैं, जो कुछ भी नहीं समझते। जितना मनुष्य पढ़ते हैं उतना मैनर्स भी आते हैं। दबदबा रहता है। हमारा फिर गुप्त दबदबा है। आन्तरिक नारायणी नशा चढ़ा होगा तो वर्णन भी करेंगे, औरों को समझायेंगे। यह पढ़ाई तो राजाओं का राजा बनाने वाली है। कांग्रेसी लोग तो राजाओं का नाम सुनकर गर्म हो जाते हैं क्योंकि पिछाड़ी के राजायें ऐशी बन गये थे। परन्तु यह भूल गये हैं कि आदि सनातन देवी-देवतायें राजा रानी थे। अभी तुम फिर बाप से शक्ति ले 21 पीढ़ी राज्य भाग्य लो। यह सत्य नारायण की कथा तो मशहूर है। परन्तु विद्वान, आचार्य भी नहीं जानते। गीता का कितना आडम्बर बनाया है। लाखों सुनते हैं, परन्तु समझते कुछ भी नहीं हैं। अब इन विचारों को कौन सुजाग करे। यह तुम बच्चों का काम है। परन्तु बहुत थोड़े बच्चे हैं जो औरों को सुजाग कर सकते हैं, जो जितना आप समान बनायेंगे उतना पद भी ऊंच पायेंगे। बाप कहते हैं बीती सो बीती देखो। ड्रामा में ऐसे था। आगे के लिए पुरुषार्थ करो। अपना चार्ट देखो - इतने समय में क्या धारणा की है? कोई 25-30 वर्ष के हैं। कोई एक मास, कोई 7 रोज़ के बच्चे हैं। परन्तु 15-20 वर्ष वालों से गैलप कर रहे हैं। वन्डर है ना। या तो कहेंगे माया प्रबल है या तो ड्रामा पर रखेंगे। परन्तु ड्रामा पर रखने से पुरुषार्थ ठण्डा हो जाता है। समझते हैं हमारे भाग्य में नहीं है।
तुम सब लकी स्टार्स हो। तुम्हारी भेंट ऊपर के स्टार्स से की जाती है। तुम सृष्टि के सितारे हो। वह तो सिर्फ रोशनी देते हैं। तुम तो मनुष्यों को जगाने की सेवा करते हो। दु:खियों को सुखी बनाते हो। मनुष्य इन सितारों को नक्षत्र देवता कहते हैं, सच्चे देवता तो तुम बनते हो। उन सितारों को देवता कहते हैं क्योंकि वह ऊपर रहते हैं। परन्तु देवतायें कोई ऊपर नहीं रहते। रहते तो इसी सृष्टि पर हैं परन्तु मनुष्यों से ऊंच जरूर हैं। सबको सुख देते हैं, जो एक दो को दु:ख देते हैं उनको थोड़ेही लकी स्टार कहेंगे। लकी और अनलकी इस समय हैं। जो आप समान बनाते हैं उन्हें लकी कहेंगे। जो सिर्फ सोते और खाते हैं उनको अनलकी कहेंगे। स्कूल में भी ऐसे होते हैं। यह भी पढ़ाई है। बुद्धि से काम लेना पड़ता है। राधे-कृष्ण को 16 कला लकी कहेंगे। राम-सीता दो कला कम हो गये। सबसे नम्बरवन लकी लक्ष्मी-नारायण हैं। वह भी इस पढ़ाई से ऐसे बने हैं। पुरुषार्थ में कमी करने से अनलकी बन पड़ते हैं। तुमको तो बाप खुद पढ़ाते हैं। तुम स्टूडेन्ट ही गोप-गोपियां हो। वास्तव में यह अक्षर सतयुग से निकला है। वहाँ प्रिन्स प्रिन्सेज खेलपाल करते हैं तो प्रिय नाम गोप गोपियां रखा है। श्रीकृष्ण के साथ दिखाते हैं। बड़े हो जाते हैं तो गोप गोपियां नहीं कहा जाता है। होंगे तो सभी प्रिन्स ना। कोई दास दासियां वा बाहर के गांवड़े के लोगों से तो नहीं खेलेंगे। महल में बाहर वाले तो आ न सकें। श्रीकृष्ण बाहर जमुना आदि पर नहीं जाते हैं। अपने महल में ही अन्दर खेलते हैं। भागवत में तो कई फालतू बातें बैठ लिखी हैं। मटकी फोड़ी आदि... है कुछ भी नहीं। वहाँ तो बड़े कायदे हैं। तो बाप कितना समझाते हैं, कहते हैं श्रीमत पर चलो। इस समय तुमको सुख ही सुख मिलता है। उनकी कितनी महिमा है। सबके दु:ख कैन्सिल कराए सभी को सुख देते हैं। कहते हैं मामेकम् याद करो। यह बाप आकर न पढ़ाते तो हम क्या पढ़ सकते? नहीं। यह मोस्ट लवली बाप है। सबसे अच्छी मत देते हैं - मनमनाभव। मुझे याद करो। स्वर्ग को याद करो, चक्र को याद करो। इसमें सारा ज्ञान आ जाता है। वह तो सिर्फ विष्णु को स्वदर्शन चक्र दिखाते हैं, परन्तु अर्थ का पता नहीं। हम अभी जानते हैं कि शंख है ज्ञान का, जो निराकार बाप देते हैं। विष्णु थोड़ेही देते हैं। और देते हैं मनुष्यों को। जो फिर देवता अथवा विष्णु बनते हैं। कितना मीठा ज्ञान है। तो कितना खुशी से बाप को याद करना चाहिए। अच्छा!
मीठे-मीठे सिकीलधे ब्राह्मण कुल भूषण स्वदर्शन चक्रधारी बच्चों को यादप्यार। परन्तु बच्चे स्वदर्शन चक्र चलाते बहुत थोड़ा है। कोई तो बिल्कुल नहीं फिराते। बाप तो रोज़ कहते हैं स्वदर्शन चक्रधारी बच्चे.. यह भी आशीर्वाद मिलती है। अच्छा - मीठे-मीठे रूहानी बच्चों को रूहानी बाप की नमस्ते।
धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) एक बाप की मत में बाप, टीचर, गुरू, बन्धु आदि की सब मतें समाई हुई हैं, इसलिए उनकी मत पर ही चलना है। मनुष्य मत पर नहीं।
2) बीती को बीती कर पुरुषार्थ में गैलप करना है। ड्रामा कहकर ठण्डा नहीं होना है। आप समान बनाने की सेवा करनी है।
वरदान:- शान्ति की शक्ति द्वारा सर्व को आकर्षित करने वाले मास्टर शान्ति देवा भव
जैसे वाणी द्वारा सेवा करने का तरीका आ गया है ऐसे अब शान्ति का तीर चलाओ, इस शान्ति की शक्ति द्वारा रेत में भी हरियाली कर सकते हो। कितना भी कड़ा पहाड़ हो उसमें भी पानी निकाल सकते हो। इस शान्ति की महान शक्ति को संकल्प, बोल और कर्म में प्रैक्टिकल लाओ तो मास्टर शान्ति देवा बन जायेंगे। फिर शान्ति की किरणें विश्व की सर्व आत्माओं को शान्ति के अनुभूति की तरफ आकर्षित करेंगी और आप शान्ति के चुम्बक बन जायेंगे।
स्लोगन:- आत्म-अभिमानी स्थिति का व्रत धारण कर लो तो वृत्तियाँ परिवर्तन हो जायेंगी।
16.02.2023 HINDI MURLI
“मीठे बच्चे - इस समय सभी के सुख सम्पत्ति का देवाला रावण पांच विकारों ने निकाला है, तुम अभी रावण रूपी दुश्मन पर जीत पाकर जगतजीत बनते हो''
प्रश्नः- ड्रामा के किस राज़ को जानने के कारण तुम बच्चों के ख्यालात बड़े ऊंचे रहते हैं?
उत्तर:- तुम जानते हो ड्रामा अनुसार आटोमेटिक प्रभाव निकलता जायेगा। फिर भक्तों की भीड़ लगेगी उस समय सर्विस नहीं हो सकेगी। 2. जो बाबा के बच्चे दूसरे धर्मों में कनवर्ट हो गये हैं वो निकल आयेंगे इसलिए तुम्हारे ख्यालात बहुत ऊंचे रहते कि कहाँ से कोई निकले जो बच्चा बन बेहद बाप से अपना वर्सा ले। तुम्हें यह ख्याल नहीं रहता कि कोई निकले जो पैसा दे। लेकिन शिवबाबा पढ़ाते हैं यह निश्चय बैठे और बाबा से वर्सा लेने के लिए भागे।
गीत:- ले लो दुआयें माँ बाप की...
ओम् शान्ति। सेवा को सर्विस भी कहते हैं। पहले मात-पिता सेवा करते हैं। अब देखो प्रैक्टिकल में कर रहे हैं ना। अभी से ही सभी कायदे कानून परमपिता परमात्मा आकर स्थापन करते हैं। तुम बच्चे आते हो, मम्मा बाबा कहते हो तो मम्मा बाबा भी तुम्हारी सेवा करते हैं। हद के माँ बाप भी बच्चों की सेवा करते हैं। माँ, बाप, गुरू, वह सब हैं लौकिक, यह है पारलौकिक। लौकिक को तो सब जानते हैं, बरोबर बाप जन्म देते हैं। टीचर पढ़ाते हैं अर्थात् शिक्षा देते हैं। फिर वानप्रस्थ अवस्था में गुरू किया जाता है। यह रसम-रिवाज़ कब से शुरू हुई? अभी से ही यह आरम्भ होती है। इस समय ही सतगुरू आते हैं, समझाते हैं मैं तुम्हारा बाप भी हूँ, टीचर भी हूँ, सतगुरू भी हूँ। बाप के तो बच्चे बने हो। टीचर रूप में इनसे शिक्षा पा रहे हो। अन्त में सतगुरू बन तुमको सचखण्ड में ले जायेंगे। तीनों काम प्रैक्टिकल में करते हैं। तुम बच्चे मात-पिता कहते हो तो बाप भी स्वीकार करते हैं। यह तो जानते हैं सभी बच्चे एक समान सपूत नहीं हो सकते हैं। यहाँ भी बेहद का बाप कहते हैं - सब बच्चे सपूत नहीं हैं। यह तो तुम भी जानते हो। अभी है रावण राज्य। यह कोई विद्वान, पण्डित आदि नहीं जानते हैं। जब कोई आते हैं तो पहले तो उनसे पूछना है तुम क्या चाहते हो? फिर कोई शान्ति चाहते हैं इसलिए गुरू ढूंढते हैं। सतयुग में तो कोई गुरू आदि नहीं ढूँढते क्योंकि वहाँ दु:खी नहीं हैं। वहाँ कोई अप्राप्त वस्तु नहीं है। यहाँ तो कोई न कोई वस्तु की लालसा रख गुरू के पास जाते हैं। कोई का सुनेंगे कि उनकी मनोकामना पूरी हुई तो खुद भी उनके पिछाड़ी में जायेंगे। संन्यासी पवित्र बनते हैं तो उन्हों की महिमा तो बढ़नी ही है। बहुत शिष्य बन जाते हैं। विवेक भी कहता है जो पवित्र बनते हैं, उनकी महिमा जरूर बाप को करानी है। तुम पवित्र बनते हो तो तुम्हारी कितनी महिमा होती है। तुम्हारे द्वारा मनुष्यों का 21 जन्मों के लिए कल्याण हो जाता है। सर्व मनोकामनायें 21 जन्मों के लिए पूरी हो जाती हैं। यह भी तुम जानते हो, दुनिया में यह भी कोई नहीं जानते हैं कि परमात्मा कब आते हैं, जगत अम्बा कौन है, जिस द्वारा हमारी सभी मनोकामनायें पूरी हो जाती हैं। अब सब घोर अन्धियारे में हैं। यथा राजा रानी तथा प्रजा.... पहले कम अन्धियारा होता है फिर कलियुग में घोर अन्धियारा होता है। माया के राज्य को घोर अन्धियारा कहा जाता है। बाप कहते हैं भारत का बड़े ते बड़ा दुश्मन भी माया रूपी 5 विकार हैं। तुम जानते हो इस माया रावण ने सीताओं को हरण किया अर्थात् अपनी जंजीरों में कैद किया। बाप आते हैं इस बड़े ते बड़े दुश्मन से लिबरेट करने। यह भी कोई को पता नहीं कि भारत जो इतना मालामाल था, उनको इतना कंगाल किसने बनाया? यही रावण बड़ा दुश्मन है। इनकी प्रवेशता के कारण भारत का यह हाल हो गया है। कहा जाता है ना तुम्हारे में क्रोध का भूत है। परन्तु मनुष्य समझते नहीं हैं कि 5 विकारों को भूत कहा जाता है। यह भूत अर्थात् रावण ही सबसे बड़ा दुश्मन है। ऐसे नहीं कि मुसलमानों वा क्रिश्चियन ने भारत को कंगाल बनाया। नहीं, सबके सुख सम्पत्ति का देवाला इसी रावण ने निकाला है। यह बात कोई नहीं जानते हैं। अब संन्यास धर्म को 1500 वर्ष हुए हैं। उन्हों की संख्या बहुत वृद्धि को पाई हुई है। वृद्धि को पाते-पाते अभी आकर जड़जड़ीभूत अवस्था को पहुँचे हैं। तुम्हारा तो अब सतोप्रधान नया झाड़ है।
तुम अभी रावण के साथ युद्ध कर रहे हो। गीता में रावण का नाम नहीं है। उन्होंने फिर हिंसक युद्ध दिखा दी है। बाप कहते हैं तुम इन 5 विकार रूपी रावण पर जीत पाने से जगतजीत बनेंगे। अन्य सभी धर्मों को तो वापिस जाना है क्योंकि सतयुग में तो होगा ही एक धर्म, एक राज्य। सो जिन्होंने कल्प पहले लिया था, जो सूर्यवंशी बने थे वही सतोप्रधान नम्बरवन राज्य करेंगे। सतयुग में था ही एक धर्म। फिर पुनर्जन्म लेते-लेते अभी तो बहुत वृद्धि हो गई है। जैसे अन्य धर्मों में भी अनेक प्रकार की वृद्धि हो गई है। वैसे इसमें भी ब्रह्म समाजी, आर्य समाजी, संन्यासी आदि कितने हैं, वन्डर है। हैं तो सभी भारतवासी, एक आदि सनातन देवी-देवता धर्म के ना। सिजरा तो ऊपर से वही चला आता है ना। भारतखण्ड है सचखण्ड, जहाँ बाप आकर देवी-देवता धर्म में ट्रांसफर करते हैं। यह तुम जानते हो। पहले 7 रोज़ भट्ठी में रख शूद्र से ब्राह्मण बनाना पड़ता है। संन्यासियों को तो वैराग्य आता है, जो जंगल में चले जाते हैं। उन्हों का रास्ता ही अलग है। घर-बार छोड़ जाते हैं। उन्हों को कोई तकलीफ नहीं है। हाँ, मन्सा में तो संकल्प आयेंगे। काम विकार से तो छूट ही जाते हैं। बाकी क्रोध आता है, उनमें भी नम्बरवार तो होते हैं ना। कोई उत्तम, कोई मध्यम, कोई कनिष्ट, कोई तो एकदम डर्टी भी होते हैं। सतयुग में भी भल सुखी तो सब होते हैं परन्तु नम्बरवार मर्तबा तो है ना। सूर्यवंशी राजा रानी, प्रजा, चन्द्रवंशी राजा रानी, प्रजा..... उत्तम, मध्यम, कनिष्ट तो होते हैं। यह सभी धर्मों में होते हैं। तो बाप सभी राज़ बैठ समझाते हैं। इस मार्ग में डिफीकल्टी बहुत है, संन्यास मार्ग में इतनी नहीं है। उन्हों को तो वैराग्य आया, संन्यास लिया खलास। कोई-कोई फेल होते हैं। बाकी जो पक्के होते हैं उन्हों का वापिस आना मुश्किल है। यहाँ तो यह है गृहस्थ व्यवहार में रहते पवित्र रहना। बाप समझाते हैं बहादुर वह जो दोनों इकट्ठे रहो और बीच में ज्ञान योग की तलवार हो। ऐसे एक कहानी भी है कि उसने कहा कि घड़ा भल सिर पर रखो परन्तु तेरा अंग मेरे अंग से न लगे अर्थात् विकार की भावना न हो। उन्होंने फिर शरीर समझ लिया है। बात सारी विकार की है अर्थात् नंगन नहीं होना है। काम अग्नि में जलना नहीं है। बड़ी मंजिल है तो प्राप्ति भी बहुत बड़ी है। संन्यासी पवित्र बनते हैं तो उन्हों को भी कितनी प्राप्ति है। बड़े-बड़े महामण्डलेश्वर बन बैठे हैं, महलों में रहते हैं। बहुत लोग जाकर पैसा रखते हैं। चरण धोकर पीते हैं। बहुत महिमा होती है। परन्तु नम्बरवन महिमा है ईश्वर की। वही स्वर्ग का रचयिता है। वहाँ माया का नाम निशान नहीं रहता। संन्यासी भी यह नहीं समझते कि माया 5 विकार हैं, सिर्फ पवित्र रहते हैं। उन्हों का ड्रामा में यही पार्ट है। उन्हों का है ही हठयोग संन्यास। तुम्हारा है राजयोग संन्यास। वह राजयोग तो सिखला न सके। वह है शंकराचार्य, यह है शिवाचार्य। तुम भी परिचय देते हो हमको भगवान आकर पढ़ाते हैं। वह तो जरूर स्वर्ग का मालिक बनायेगा। नर्क का तो नहीं बनायेंगे। वह रचता ही स्वर्ग का है। तो गृहस्थ में रहकर पवित्र रहना - इसमें ही मेहनत है। कन्याओं को शादी बिगर रहने नहीं देते हैं। आगे विकार के लिए शादी करते थे। अब विकारी शादी कैन्सिल कर ज्ञान चिता पर बैठ पवित्र जोड़ा बनते हैं। तो अपनी जांच करनी होती है कि माया कहाँ चलायमान तो नहीं करती है? मन में तूफान तो नहीं आते हैं? भल मन में संकल्प आते हो परन्तु कर्मेन्द्रियों से विकर्म कभी नहीं करना। भाई-बहन समझने से, ज्ञान चिता पर रहने से काम अग्नि नहीं लगेगी। अगर आग लगी तो अधोगति को पा लेंगे। यूँ तो सारी दुनिया भाई-बहन है। परन्तु जब बाप आते हैं तो हम उनके बनते हैं। अभी तुम प्रैक्टिकल में ब्रह्मा मुख वंशावली हो, तुम्हारा यादगार भी यहाँ है। अधरकुमारी का मन्दिर भी है ना। जो काम चिता से उतर ज्ञान चिता पर बैठते हैं - उनको अधर कुमारी कहा जाता है। तुम संन्यासियों को भी समझा सकते हो। बाकी कोई से फालतू माथा नहीं मारना चाहिए। पात्र जिज्ञासु होगा, वह तो अकेला आकर प्रेम से समझेगा। कई हंसी उड़ाने के लिए भी आते हैं इसलिए नब्ज देख ऐसी दवाई देनी चाहिए। बाप ने कहा है पात्र को दान देना है।
आजकल दुनिया बहुत खराब है। संन्यासी लोग तो कफनी पहन लेते हैं और जाकर अलग रहते हैं। कुछ न कुछ मिल जाता है। मजे से खाते पीते रहते हैं। आजकल उन्हों का प्रभाव है ना। तुम्हारे में भी जो अच्छी सर्विस करते हैं तो उन्हों की महिमा से औरों की भी महिमा निकल पड़ती है। जो बच्चे अच्छी सर्विस करते हैं तो सब कहेंगे इनके माँ बाप भी ऐसे होंगे। मेहनत जरूर करनी है। संन्यासियों को तो घर बैठे वैराग्य आ जाता है तो हरिद्वार चले जाते। वहाँ कोई गुरू कर लेते। यहाँ की रसम ही निराली है। इनका कहाँ वर्णन है ही नहीं। गीता को ही झूठा बना दिया है। यह पहली बात खुल जाये तो सब बी.के. बहुत नामीग्रामी हो जाओ। सब तुम्हारे पर सदके जायें (बलिहार जायें)। प्रभाव निकलना तो है ना। अभी तो तुम्हारा बहुत सामना करते हैं। पहले तो घर के ही दुश्मन बनते हैं। इस बाबा के भी कितने दुश्मन बनें। श्रीकृष्ण के लिए भी कहते हैं ना - भगाता था। कितने कलंक लगाये हैं। यह भी ड्रामा में नूँध है। ड्रामा अनुसार आटोमेटिकली प्रभाव निकलता जायेगा। फिर भक्तों की भीड़ आकर होगी। परन्तु भीड़ में फिर सर्विस हो नहीं सकेगी। संन्यासियों के पास भीड़ होती है तो वह खुश होते हैं। यहाँ तुम जानते हो कोटो में कोई निकलेगा। संन्यासी तो यही सोचेंगे कि इनसे कोई निकलेंगे जो पैसे देंगे। तुम्हारा ख्याल चलता है कि इनसे कोई निकले जो बच्चा बन वर्सा लेवे। तो कितना फ़र्क है। तुम भाषण करते हो तो जो अपने बच्चे और धर्मों में कनवर्ट हो गये हैं वह निकलेंगे। कोई आर्य समाज से, कोई कहाँ से निकल आते हैं। तो जब फिर लोग सुनते हैं यह हमारे धर्म का ब्रह्माकुमार-ब्रह्माकुमारियों के पास भाग गया है तो समझते हैं हमारी नाक कट गई। इसमें समझाने की बड़ी युक्ति चाहिए। पहले तो बाप का परिचय देना है। भल कोई लिखकर भी देते हैं। बरोबर शिवबाबा पढ़ाते हैं परन्तु उसमें खुश नहीं होना है। निश्चय बिल्कुल नहीं बैठा है। भल कई बच्चे पत्र भी लिखते हैं। परन्तु बाबा लिख देते हैं - तुमको निश्चय बिल्कुल नहीं है। निश्चय बैठे - मोस्ट बिलवेड बाप से वर्सा मिलता है तो एक सेकेण्ड भी ठहरे नहीं। विवेक कहता है कि गरीब झट भागेंगे। साहूकार कोई बिरला निकलेगा। साधारण कुछ निकलेंगे। कोई भी आये बोलो यह राजयोग की पाठशाला है। जैसे डॉक्टरी योग वैसे यह राजयोग है, जिससे राजाओं का राजा बनना है। हमारा एम आब्जेक्ट है ही मनुष्य से देवता बनना। अच्छा।
बापदादा का मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति नम्बरवार पुरुषार्थ अनुसार यादप्यार। दिल पर वह चढ़ते हैं जो पुरुषार्थ कर आप समान बनाते हैं। बाकी बाप सभी को प्यार तो करेंगे ही। अच्छा-रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।
धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) कर्मेन्द्रियों से कोई भी विकर्म नहीं करना है। ज्ञान और योगबल से मन के तूफानों पर विजय प्राप्त करनी है।
2) सेवा ऐसी करनी है जिससे मात-पिता का नाम बाला हो। सबकी दुआयें मिलती रहें।
वरदान:- अपने अनादि स्वरूप में स्थित रह सर्व समस्याओं का हल करने वाले एकान्तवासी भव
आत्मा का स्वधर्म, सुकर्म, स्व स्वरूप और स्वदेश शान्त है। संगमयुग की विशेष शक्ति साइलेन्स की शक्ति है। आपका अनादि लक्षण है शान्त स्वरूप रहना और सर्व को शान्ति देना। इसी साइलेन्स की शक्ति में विश्व की सर्व समस्याओं का हल समाया हुआ है। शान्त स्वरूप आत्मा एकान्तवासी होने के कारण सदा एकाग्र रहती है और एकाग्रता से परखने वा निर्णय करने की शक्ति प्राप्त होती है जो व्यवहार वा परमार्थ दोनों की सर्व समस्याओं का सहज समाधान है।
स्लोगन:- अपनी दृष्टि, वृत्ति और स्मृति की शक्ति से शान्ति का अनुभव कराना ही महादानी बनना है। 15.02.2023 HINDI MURLI
“मीठे बच्चे - तुम्हारे लिये योग की भट्ठी मोस्ट वैल्युबुल है, क्योंकि इस भट्ठी से ही तुम्हारे विकर्म भस्म होते हैं''
प्रश्नः- किन बच्चों की बुद्धि में बीज और झाड़ की नॉलेज स्पष्ट बैठ सकती है?
उत्तर:- जो विचार सागर मंथन करते हैं। विचार सागर मंथन के लिए अमृतवेले का टाइम बहुत अच्छा है। अमृतवेले उठ-कर बुद्धि से एक बाबा को याद करो। तुम्हारा अजपाजाप चलता रहे। सूक्ष्म वा स्थूल में शिवबाबा, शिवबाबा कहने की दरकार नहीं। बुद्धि से याद करना है।
ओम् शान्ति। रूहानी बाप बैठकर रूहों को समझाते हैं अर्थात् बच्चों को समझाते हैं। बाप कहते हैं मुझे भी जिस्म है तब तो बात कर सकता हूँ। तुम भी ऐसे समझो मैं आत्मा हूँ, इस जिस्म द्वारा सुन रहा हूँ। यह नॉलेज अच्छी रीति धारण करनी है। जैसे बाप के पास धारण की हुई है। आत्मा की बुद्धि में धारणा होती है। तुम्हारी बुद्धि में ऐसी धारणा होनी चाहिए जैसे बाप की बुद्धि में है। बीज और झाड़ की समझानी तो बहुत सहज है। माली को नॉलेज रहता है ना कि फलाना बीज बोने से इतना बड़ा झाड़ निकलेगा। बस, बाबा भी ऐसे ही समझाते हैं, यह बुद्धि में धारण करना है। जैसे मेरी बुद्धि में है वैसे तुम्हारी बुद्धि में रहना चाहिए। वह रहेगा तब जब विचार सागर मंथन करेंगे। विचार सागर मंथन करने का समय सवेरे का बहुत अच्छा है। उस समय धन्धा आदि कोई नहीं रहता। भक्ति भी मनुष्य सवेरे करते हैं। यहाँ वहाँ जाते रहते हैं वा बैठकर कोई नाम जपते रहते हैं वा गीत गाते हैं, आवाज करते, कोई तो अन्दर ही राम-राम रटते हैं। यह भक्ति का अजपाजाप होता है। कोई माला भी फेरते रहते हैं। तुमको शिव-शिव कहना नहीं है। जो लोग भक्ति में करते वह ज्ञान में नहीं होना चाहिए। बहुतों को आदत पड़ी हुई है, शिव-शिव सिमरण करते होंगे। तुमको शिव-शिव न स्थूल में, न सूक्ष्म में जपना है। तुम बच्चे जानते हो कि हमारा बाप आया हुआ है। आयेगा भी जरूर कोई शरीर में। उनका कोई अपना शरीर तो है नहीं। वह पुनर्जन्म रहित है। पुनर्जन्म मनुष्य सृष्टि में होता है। विष्णु के दो रूप लक्ष्मी-नारायण हैं। देव-देव महादेव कहते हैं। ब्रह्मा और विष्णु का आपस में कनेक्शन है। शंकर का कोई कनेक्शन नहीं, इसलिए उनको बड़ा रखते हैं। उनका पुनर्जन्म नहीं, उनको सूक्ष्म शरीर मिलता है। शिवबाबा को सूक्ष्म शरीर भी नहीं है इसलिए वह सबसे ऊंचे ते ऊंच है। वह है बेहद का बाप। बच्चे जानते हैं बेहद के बाप से हम बेहद सुख का वर्सा लेते हैं। बाप की श्रीमत पर तुमको पूरा चलना है। जो खुद याद करते हैं, औरों को याद कराते हैं, वह जैसे बाबा के मददगार हैं। बाप और वर्से को याद करना है। बच्चों को समझाते रहते हैं - तुम्हारे अब 84 जन्म पूरे हुए हैं। बाकी थोड़ा टाइम है। नाटक में एक्टर समझते हैं - अभी बाकी आधा घण्टा है फिर हम घर जायेंगे। टाइम देखते रहते हैं। तुम्हारी तो बेहद की बहुत बड़ी घड़ी है। समझाया है कि अब घर चलना है। बाप को याद करने से तुम्हारे विकर्म विनाश होंगे और कोई शास्त्रों में ऐसा सहज योग है नहीं। वह तो बहुत हठयोग करते हैं, बहुत मेहनत करते हैं, जो तुम मातायें कर न सको। तुमको हठयोगियों के मुआफिक आसन नहीं लगाना है। हाँ सभा में ठीक होकर बैठना है। तुम्हारा राजयोग है - टांग पर टांग चढ़ाकर बैठना। ऐसे राजयोग में बैठने से नशा चढ़ेगा। हठयोग में दोनों टांग चढ़ाते हैं। बाबा तुमको तकलीफ नहीं देते हैं। सिर्फ थोड़ा फ़र्क रखना चाहिए। कामन बैठने में और योग में बैठने में। तुम राजयोग सीख रहे हो। तो ऐसे बैठना चाहिए जो मनुष्य समझें यह राजयोग में बैठे हैं। यह हमारा राजाई का ढंग है। तुम बेहद के बाप द्वारा राजाओं का राजा बन रहे हो। ऐसे बाप को घड़ी-घड़ी याद करना है। सतयुग में बाप को याद नहीं किया जाता है। अपने को किया जाता है। कलियुग में न बाप को जानते, न अपने को जानते हैं। सिर्फ बाप को पुकारते हैं। अभी तुम अच्छी रीति जान गये हो। और कोई ऐसे नहीं समझते हैं कि बाप बिन्दी है। अति सूक्ष्म भी कहते हैं फिर कहते हैं हजारों सूर्यों से भी तीखा है। तो बात मिलती नहीं है। जब कहते हैं नाम-रूप से न्यारा है फिर हजारों सूर्य से तीखा क्यों कहना चाहिए? पहले तुम भी ऐसे समझते थे। बाप कहते हैं - ड्रामा में यह समझानी देरी से मिलनी थी। सूक्ष्म ते सूक्ष्म गुह्य बातें समझकर समझाई जाती हैं। ऐसे नहीं ख्याल आना चाहिए कि पहले हजारों सूर्यों से तेजोमय कहते थे अब फिर बिन्दी क्यों कहते? जब आई.सी.एस. पढ़ेंगे तब आई.सी.एस. की बातें करेंगे, पहले कैसे करेंगे? इसमें मूँझने की दरकार नहीं है। ड्रामा में जब बाबा को समझाना है तब समझाते हैं, इनके बाद भी अजुन क्या-क्या समझायेंगे, क्योंकि बाप का भी प्रभाव तो निकलना है ना। जैसे तुम्हारी आत्मा है वैसे वह भी आत्मा है। परमधाम में रहते हैं। उनको परम आत्मा कहते हैं। यहाँ जब आते हैं तो नॉलेज देते हैं।
बाप कहते हैं - जब पतित दुनिया होगी तब मैं पावन दुनिया बनाने आऊंगा। पुकारते भी हैं हे पतित-पावन, हे दु:ख हर्ता सुख-कर्ता आओ। वह तो संगम पर आयेगा। जब रात पूरी होगी तब दिन होगा। पुरानी दुनिया का अन्त होगा। कर्मातीत अवस्था अन्त में होगी। तुमको रहना भी गृहस्थ व्यवहार में है, छोड़ना भी नहीं है। शरीर निर्वाह अर्थ व्यवहार करते हुए कमल फूल समान पवित्र रहना है। देवता तो हैं ही पूर्ण पवित्र। परन्तु कब और कैसे बनें! जरूर पुरुषार्थ किया तब तो प्रालब्ध पाई। पुरुषार्थ अनुसार प्रालब्ध बनी। जैसा कर्म वैसी प्रालब्ध, यह तो चलता ही रहता है। अभी तो तुमको कर्म सिखलाने वाला बाप मिला है। उनको अच्छी रीति याद करना चाहिए। तुम एडाप्टेड बच्चे हो। मारवाड़ियों में एडाप्शन बहुत होती है। तुम्हारी भी एडाप्शन है। तुम इनके गर्भ से नहीं निकले हो। एडाप्शन में दोनों बाप याद रहते हैं। अन्त तक जानते हैं कि हम असुल किसका था। अब इनकी गोद के बच्चे बने हैं। तुम भी जानते हो हम किसके थे और किसके बने हैं। मैं एडाप्ट हुआ हूँ परमपिता परमात्मा के पास, वह है स्वर्ग का रचयिता। उनकी रचना कितना समय चलती है? आधाकल्प। नर्क का रचयिता है रावण, उनका भी आधाकल्प राज्य चलता है। सतोप्रधान से तमोप्रधान बनते हैं। यह समझ की बात है। कुछ समझ में न आये तो पूछना चाहिए। जब सूर्य चांद को ग्रहण लगता है तो कहते हैं दे दान... सूर्य चांद को माँ-बाप कहा जाता है। यहाँ भी मेल फीमेल दोनों को ग्रहण लगता है, तब कहते हैं 5 विकारों का दान दे दो। वह तो वर्ष में 1-2 वारी ग्रहण लगता है। यह तो कल्प की बात है। बाप आकर एक ही बार दान लेते हैं। मनुष्य बिल्कुल सम्पूर्ण काले बन गये हैं। आइरन एज है। सच्चे सोने में अलाए पड़ने से काला हो जाता है। नया घर, पुराना घर। नये बच्चे और बूढ़े में फ़र्क तो है ना। छोटा बच्चा कितना मीठा प्रिय लगता है। सब उनको चूमते हैं। गोद में बिठाते हैं। पुराना जड़-जड़ीभूत हो जाता है तो कहते हैं कहाँ शरीर छूटे तो अच्छा। ज्यादा दु:ख क्यों सहन करें। आत्मा एक शरीर छोड़ जाकर दूसरा लेती है। यहाँ हम बीमार को मरने नहीं देते हैं फिर भी जितना सुने उतना अच्छा। शिवबाबा और वर्से को याद करते रहें। बीमारी में जब ज्यादा पीड़ा होती है तो सब भूल जाता है। बाकी जिसका किसमें भाव होता है वह सामने आ जाता है। तुम्हारा तो अन्जाम (वायदा) है मेरा तो एक शिवबाबा दूसरा न कोई। फिर दूसरे किसको याद क्यों करते हो। बाप कहते हैं - मेरे बिगर किसकी स्मृति भी न आये। गाया हुआ है अन्तकाल जो स्त्री सिमरे... सारा श्लोक कह देते, अर्थ कुछ भी नहीं समझते। है सारी संगम की बात जो भक्ति में गाते हैं, इस समय सिर्फ तुमको बाप और वर्से को याद करना है। श्री नारायण तुम्हारी प्रालब्ध है तो अर्थ पूरा बुद्धि में होना चाहिए। बिगर अर्थ तो बहुत याद करते रहते हैं। पिछाड़ी में जिसके साथ जास्ती प्रीत होती है, वही याद आते हैं। बड़ा खबरदार रहना चाहिए। तुमको याद करना है एक बाप को।
बाप कहते हैं - मनमनाभव। तुम बच्चे कहते हो बाबा हम कल्प-कल्प आपसे मिलते हैं। यह ज्ञान आपसे मधुबन में आकर लेते हैं। यह है वशीकरण मंत्र। सतगुरू है तो तुम्हें मंत्र भी ऐसा देता है, जो तुम अमर बन जाओ। यह है माया पर जीत पाने का मंत्र। इस पर गाते हैं तुलसीदास चन्दन घिसे.... यह भी अब की बात है जो बाद में गाई जाती है। तुम बच्चों को राजतिलक मिल रहा है - बाप और वर्से को याद करने से। बाप और बादशाही को याद कर शरीर छोड़ेंगे तो राजाई तिलक मिल जायेगा। एक को तो नहीं मिलेगा। माला 108 की भी है। 16108 की भी है।
अब तो सिर्फ तुमको एक्यूरेट बाबा को याद करना है। बाबा के लिए कहते हैं - तुम्हरी गत मत तुम ही जानो। सो बरोबर है। सद्गति दाता वह है, वही जाने। आगे तो सिर्फ गाते थे अर्थ रहित। उसको कहा जाता है, अनर्थ। प्राप्ति कुछ भी नहीं। मनुष्य दान-पुण्य आदि करते-करते उतरते ही आये हैं। प्राप्ति कुछ भी नहीं है। आसुरी मत पर सब अनर्थ हो गया है। यह भी नारायण की पूजा करते थे, अब फिर पुजारी से पूज्य बन रहे हैं - प्रैक्टिकल में। अब तुम बच्चे जानते हो शिवबाबा हमको पढ़ाते हैं। यह तो पक्का याद रखना है। नहीं तो विकर्म विनाश नहीं होंगे। यह योग की भट्ठी मोस्ट वैल्युबुल है। मुक्ति भी मिलती है ना। कोई कहते हैं हमको मन की शान्ति चाहिए, परन्तु पहले यह बताओ तुमको अशान्त किसने किया? जरूर पहले शान्ति थी। अभी अशान्त बने हो, तब तो शान्ति मांगते हो। शान्ति तो सारी दुनिया में चाहिए। एक को शान्ति मिलने से कुछ हो न सके। एक को शान्ति मिलने से सारी दुनिया में थोड़ेही शान्ति हो सकेगी। अशान्त किसने किया है? मूँझ पड़े हैं। समझाया जाता है शान्तिधाम, सुखधाम और यह है दु:खधाम। सुखधाम में मनुष्य बहुत थोड़े थे। उस समय बाकी सब आत्मायें शान्तिधाम में थी। तुमको शान्ति वहाँ मिलेगी। यहाँ तो मिल न सके। यहाँ तो है ही दु:खधाम। दु:ख में अशान्ति होती है। यह तो बहुत सहज है, किसको भी समझाना। सुख-शान्ति का वर्सा देने वाला एक ही बाप है। सतयुग में सुख-शान्ति दोनों ही हैं। यहाँ आत्मा चाहती है कि मेरा मन-शान्त हो। तो जाओ तुम अपने घर परमधाम। परन्तु पतित फिर जा भी न सकें, इसलिए बाप समझाते हैं मुझे याद करो तो अन्त मती सो गति हो जायेगी। बाप और वर्से को याद करो। परन्तु माया ऐसी है जो पवित्र बनने नहीं देती है। अबलाओं पर देखो कितने अत्याचार होते हैं। विष बिगर रह न सकें। बाबा के पास अनेक प्रकार के समाचार आते हैं। सबसे बड़ी हिंसा काम महाशत्रु की है। बाप कहते हैं - बच्चे विष छोड़ो, काला मुँह नहीं करो। तो कहते हैं कोशिश करेंगे। यह जहर है, आदि-मध्य-अन्त दु:ख देने वाला है। परन्तु तकदीर में नहीं है तो सुनते ही नहीं है। आत्माओं को बाप बैठ समझाते हैं - आज से विकार में नहीं जाना तो मुँह नीचे कर देते हैं। अरे काम महाशत्रु है। यह अच्छा थोड़ेही है। यह है ही विशश वर्ल्ड, सब पतित हैं। सतयुग में सभी सम्पूर्ण निर्विकारी हैं। अच्छा!
मात-पिता बापदादा के कल्प अथवा 5 हजार वर्ष के बाद मिले हुए मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों को याद-प्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।
धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) टाइम बहुत थोड़ा है इसलिए बाप का पूरा-पूरा मददगार बनकर रहना है। बाप और वर्से को याद करना है और दूसरों को भी कराना है।
2) अन्त समय में एक बाप की याद रहे इसके लिए दिल की प्रीत एक बाप से रखनी है। बाप बिगर और कोई की स्मृति न आये, इसके लिए खबरदार रहना है।
वरदान:- सोचना, कहना और करना इन तीनों को समान बनाने वाले बाप समान सम्पन्न भव
बापदादा अब सभी बच्चों को समान और सम्पन्न देखना चाहते हैं। सम्पन्न बनने के लिए सोचना, कहना और करना तीनों समान हो। इसके लिए सब तैयारी भी करते हो, संकल्प भी है, इच्छा भी यही है। लेकिन यह इच्छा पूरी तब होगी जब और सब इच्छाओं से इच्छा मात्रम् अविद्या बनेंगे। छोटी-छोटी अनेक प्रकार की इच्छायें ही इस एक इच्छा को पूर्ण करने नहीं देती हैं।
स्लोगन:- अव्यक्त व कर्मातीत स्थिति का अनुभव करना है तो कथनी, करनी और रहनी को समान बनाओ।
14.02.2023 HINDI MURLI
मीठे बच्चे - “सवेरे-सवेरे उठ बाप से गुडमार्निंग करो, ज्ञान के चिंतन में रहो तो खुशी का पारा चढ़ा रहेगा''
प्रश्नः- एक्यूरेट याद क्या है? उसकी निशानियां क्या होंगी?
उत्तर:- बड़े धैर्य, गम्भीरता और समझ से बाप को याद करना ही एक्यूरेट याद है। जो एक्यूरेट याद में रहते हैं उन्हें जास्ती करेन्ट मिलती है, पापों का बोझा उतरता जाता है। आत्मा सतोप्रधान बनती जाती है। उनकी आयु बढ़ती जाती है, उन्हें बाप की सर्चलाइट मिलती है।
ओम् शान्ति। बाप कहते हैं मीठे बच्चे ततत्वम् अर्थात् तुम आत्मायें भी शान्त स्वरूप हो। तुम सर्व आत्माओं का स्वधर्म है ही शान्ति। शान्तिधाम से फिर यहाँ आकर टाकी बनते हो। यह कर्मेन्द्रियां तुमको मिलती है पार्ट बजाने के लिए। आत्मा छोटी-बड़ी नहीं होती है। शरीर छोटा बड़ा होता है। बाप कहते हैं मैं तो शरीरधारी नहीं हूँ। मुझे बच्चों से सन्मुख मिलने आना होता है। समझो जैसे बाप है, इनसे बच्चे पैदा होते हैं, तो वह बच्चा ऐसे नहीं कहेगा कि मैं परमधाम से जन्म ले मात-पिता से मिलने आया हूँ। भल कोई नई आत्मा आती है किसके भी शरीर में, वा कोई पुरानी आत्मा किसके शरीर में प्रवेश करती है तो ऐसे नहीं कहेंगे कि मात-पिता से मिलने आया हूँ। उनको आटोमेटिकली मात-पिता मिल जाते हैं। यहाँ यह है नई बात। बाप कहते हैं मैं परमधाम से आकर तुम बच्चों के सम्मुख हुआ हूँ। बच्चों को फिर से नॉलेज देता हूँ क्योंकि मैं हूँ नॉलेजफुल, ज्ञान का सागर मैं आता हूँ तुम बच्चों को पढ़ाने, राजयोग सिखाने। राजयोग सिखाने वाला भगवान ही है। श्रीकृष्ण की आत्मा का यह ईश्वरीय पार्ट नहीं है। हर एक का पार्ट अपना, ईश्वर का पार्ट अपना है।
यह ड्रामा कैसा वन्डरफुल बना हुआ है यह भी तुम अभी समझते हो। यह पुरुषोत्तम संगमयुग है, इतना सिर्फ याद रहे तो भी पक्का हो जाता है कि हम सतयुग में जाने वाले हैं। अभी संगम पर हैं, फिर जाना है अपने घर इसलिए पावन तो जरूर बनना है। अन्दर में बहुत खुशी होनी चाहिए। ओहो! बेहद का बाप कहते हैं मीठे-मीठे बच्चों मुझे याद करो तो तुम सतोप्रधान बनेंगे। विश्व का मालिक बनेंगे। बाप कितना बच्चों को प्यार करते हैं। ऐसे नहीं कि सिर्फ टीचर के रूप में पढ़ाकर और घर चले जाते हैं। यह तो बाप भी है, टीचर भी है। तुमको पढ़ाते भी है। याद की यात्रा भी सिखलाते हैं।
ऐसा विश्व का मालिक बनाने वाले, पतित से पावन बनाने वाले बाप के साथ बहुत लव होना चाहिए। सवेरे-सवेरे उठने से ही पहले-पहले शिवबाबा से गुडमार्निंग करना चाहिए। तुम जितना प्यार से याद करेंगे उतना खुशी में रहेंगे। बच्चों को अपने दिल से पूछना है कि हम सवेरे उठकर कितना बेहद के बाप को याद करते हैं। मनुष्य भक्ति भी सवेरे करते हैं ना। भक्ति कितना प्यार से करते हैं। परन्तु बाबा जानते हैं कई बच्चे दिल व जान, सिक व प्रेम से याद नहीं करते हैं। सवेरे उठ बाबा से गुडमार्निंग करें, ज्ञान के चिन्तन में रहें तो खुशी का पारा चढ़े। बाप से गुडमार्निंग नहीं करेंगे तो पापों का बोझा कैसे उतरेगा। मुख्य है ही याद। इससे तुम्हारे भविष्य के लिए बहुत भारी कमाई होती है, कल्प-कल्पान्तर यह कमाई काम आयेगी। बड़ा धैर्य, गम्भीरता, समझ से याद करना होता है। मोटे हिसाब में तो भल करके यह कह देते हैं कि हम बाबा को बहुत याद करते हैं परन्तु एक्यूरेट याद करने में मेहनत है। जो बाप को जास्ती याद करते हैं उनको करेन्ट जास्ती मिलती है क्योंकि याद से याद मिलती है। योग और ज्ञान दो चीज़ें हैं। योग की सब्जेक्ट अलग है, बहुत भारी सबजेक्ट है। योग से ही आत्मा सतोप्रधान बनती है। याद बिना सतोप्रधान होना, असम्भव है। अच्छी रीति प्यार से बाप को याद करेंगे तो आटोमेटिक्ली करेन्ट मिलेगी, हेल्दी बन जायेंगे। करेन्ट से आयु भी बढ़ती है। बच्चे याद करते हैं तो बाबा भी सर्चलाइट देते हैं। बाप कितना बड़ा भारी खजाना तुम बच्चों को देते हैं।
मीठे बच्चों को यह पक्का याद रखना है, शिवबाबा हमको पढ़ाते हैं। शिवबाबा पतित-पावन भी हैं। सद्गति दाता भी हैं। सद्गति माना स्वर्ग की राजाई देते हैं। बाबा कितना मीठा है। कितना प्यार से बच्चों को बैठ पढ़ाते हैं। बाप दादा द्वारा हमको पढ़ाते हैं। बाबा कितना मीठा है। कितना प्यार करते हैं। कोई तकलीफ नहीं देते। सिर्फ कहते हैं मुझे याद करो और चक्र को याद करो। बाप की याद में दिल एकदम ठर जानी चाहिए। एक बाप की ही याद सतानी चाहिए क्योंकि बाप से वर्सा कितना भारी मिलता है। अपने को देखना चाहिए हमारा बाप के साथ कितना लव है। कहाँ तक हमारे में दैवी गुण हैं क्योंकि तुम बच्चे अब कांटों से फूल बन रहे हो। जितना-जितना योग में रहेंगे उतना कांटों से फूल, सतोप्रधान बनते जायेंगे। फूल बन गये फिर यहाँ रह नहीं सकेंगे। फूलों का बगीचा है ही स्वर्ग। जो बहुत कांटों को फूल बनाते हैं उन्हें ही सच्चा खुशबूदार फूल कहेंगे। कभी किसको कांटा नहीं लगायेंगे। क्रोध भी बड़ा कांटा है। बहुतों को दु:ख देते हैं। अभी तुम बच्चे कांटों की दुनिया से किनारे पर आ गये हो, तुम हो संगम पर। जैसे माली फूलों को अलग पाट (बर्तन) में निकाल रखते हैं, वैसे ही तुम फूलों को भी अब संगमयुगी पाट में अलग रखा हुआ है। फिर तुम फूल स्वर्ग में चले जायेंगे। कलियुगी कांटें भस्म हो जायेंगे।
मीठे बच्चे जानते हैं पारलौकिक बाप से हमको अविनाशी वर्सा मिलता है। जो सच्चे-सच्चे बच्चे हैं जिनका बापदादा से पूरा लव है उनको बड़ी खुशी रहेगी। हम विश्व का मालिक बनते हैं। हाँ पुरुषार्थ से ही विश्व का मालिक बना जाता है। सिर्फ कहने से नहीं। जो अनन्य बच्चे हैं उन्हों को सदैव यह याद रहेगा कि हम अपने लिए फिर से वही सूर्यवंशी, चन्द्रवंशी राजधानी स्थापन कर रहे हैं। बाप कहते हैं मीठे बच्चे जितना तुम बच्चे बहुतों का कल्याण करेंगे उतना तुमको उजूरा मिलेगा। बहुतों को रास्ता बतायेंगे तो बहुतों की आशीर्वाद मिलेगी। ज्ञान रत्नों से झोली भरकर फिर दान करना है। ज्ञान सागर तुमको रत्नों की थालियाँ भर-भर कर देते हैं। जो उन रत्नों का दान करते हैं वही सबको प्यारे लगते हैं। बच्चों के अन्दर में कितनी खुशी होनी चाहिए। सेन्सीबुल बच्चे जो होंगे वह तो कहेंगे हम बाबा से पूरा ही वर्सा लेंगे। एकदम चटक पड़ेंगे। बाप से बहुत लव रहेगा क्योंकि जानते हैं प्राण देने वाला बाप मिला है। नॉलेज का वरदान ऐसा देते हैं जिससे हम क्या से क्या बन जाते हैं! इनसालवेन्ट से सालवेन्ट बन जाते हैं! इतना भण्डारा भरपूर कर देते हैं। जितना बाप को याद करेंगे उतना लव रहेगा, कशिश होगी। सुई साफ होती है तो चुम्बक तरफ खैंच जाती है ना। बाप की याद से कट निकलती जायेगी। एक बाप के सिवाए और कोई याद न आये। जैसे स्त्री का पति के साथ कितना लव होता है। तुम्हारी भी सगाई हुई है ना। सगाई की खुशी कभी कम होती है क्या? शिवबाबा कहते हैं मीठे बच्चे तुम्हारी हमारे साथ सगाई हुई है, ब्रह्मा के साथ सगाई नहीं है। सगाई पक्की हो गई फिर तो उनकी ही याद सतानी चाहिए।
बाप समझाते हैं मीठे बच्चे गफलत मत करो। स्वदर्शन चक्रधारी बनो, लाइट हाउस बनो। स्वदर्शन चक्रधारी बनने की प्रैक्टिस अच्छी हो जायेगी तो फिर तुम जैसे ज्ञान का सागर हो जायेंगे। जैसे स्टूडेन्ट पढ़कर टीचर बन जाते हैं ना। तुम्हारा धन्धा ही यह है। सबको स्वदर्शन चक्रधारी बनाओ तब ही चक्रवर्ती राजा-रानी बनेंगे इसलिए बाबा सदैव बच्चों से पूछते हैं बच्चे स्वदर्शन चक्रधारी हो बैठे हो? बाप भी स्वदर्शन चक्रधारी है ना। बाप आये हैं तुम मीठे बच्चों को वापिस ले जाने। तुम बच्चों बिगर हमको भी जैसे बेआरामी होती है। जब समय होता है तो बेआरामी हो जाती है। बस अभी हम जाऊं। बच्चे बहुत पुकारते हैं, बहुत दु:खी हैं। तरस पड़ता है। अब तुम बच्चों को चलना है घर। फिर वहाँ से तुम आपेही चले जायेंगे सुखधाम। वहाँ मैं तुम्हारा साथी नहीं बनूँगा। अपनी अवस्था अनुसार तुम्हारी आत्मा चली जायेगी।
तुम बच्चों को यह नशा रहना चाहिए हम रूहानी युनिवर्सिटी में पढ़ रहे हैं। हम गाडली स्टूडेन्ट हैं। हम मनुष्य से देवता अथवा विश्व का मालिक बनने लिए पढ़ रहे हैं। इससे हम सारी डिग्रियां पा लेते हैं। हेल्थ की एज्यूकेशन भी पढ़ते हैं, कैरेक्टर सुधारने की भी नॉलेज पढ़ते हैं। हेल्थ मिनिस्टरी, फुड मिनिस्टरी, लैन्ड मिनिस्टरी, बिल्डिंग मिनिस्टरी सब इसमें आ जाती है। तुम बड़े ट्रेजरर (खजांची) भी हो। तुम्हारे जैसा अमूल्य खजाना और किसी के पास नहीं हो सकता। ऐसे-ऐसे तुम बच्चों को विचार सागर मन्थन कर रूहानी नशे में रहना चाहिए।
मीठे-मीठे बच्चों को बाप बैठ समझाते हैं जब कोई सभा में भाषण करते हो वा किसको समझाते हो तो घड़ी-घड़ी बोलो अपने को आत्मा समझ परमपिता परमात्मा को याद करो। इस याद से ही तुम्हारे विकर्म विनाश होंगे, तुम पावन बन जायेंगे। घड़ी-घड़ी यह याद करना है। परन्तु यह भी तुम तब कह सकेंगे जब खुद याद में होंगे। इस बात की बच्चों में बहुत कमजोरी है। याद में रहेंगे तब दूसरों को समझाने का असर होगा। तुम्हारा बोलना जास्ती नहीं होना चाहिए। आत्म-अभिमानी हो थोड़ा भी समझायेंगे तो तीर भी लगेगा। बाप कहते हैं बच्चे बीती सो बीती। अब पहले अपने को सुधारो। खुद याद करेंगे नहीं, दूसरों को कहते रहेंगे, यह ठगी चल न सके। अन्दर दिल जरूर खाती होगी। बाप के साथ पूरा लव नहीं है तो श्रीमत पर चलते नहीं हैं। बेहद के बाप जैसी शिक्षा तो और कोई दे न सके। बाप कहते हैं मीठे बच्चे इस पुरानी दुनिया को अब भूल जाओ। पिछाड़ी में तो यह सब भूल ही जाना है। बुद्धि लग जाती है अपने शान्तिधाम और सुखधाम में। बाप को याद करते-करते बाप के पास चले जाना है। पतित आत्मा तो जा न सके। वह है ही पावन आत्माओं का घर। यह शरीर 5 तत्वों से बना हुआ है। तो 5 तत्व यहाँ रहने लिए खींचते हैं क्योंकि आत्मा ने यह जैसे प्रापटी ली हुई है, इसलिए शरीर में ममत्व हो गया है। अब इनसे ममत्व निकाल अपने घर जाना है। वहाँ तो यह 5 तत्व हैं नहीं। सतयुग में भी शरीर योगबल से बनता है, सतोप्रधान प्रकृति होती है इसलिए खींचती नहीं। दु:ख नहीं होता। यह बड़ी महीन बातें हैं समझने की। यहाँ 5 तत्वों का बल आत्मा को खींचता है इसलिए शरीर छोड़ने की दिल नहीं होती है। नहीं तो इसमें और ही खुश होना चाहिए। पावन बन शरीर ऐसे छोड़ेंगे जैसे मक्खन से बाल। तो शरीर से, सब चीज़ों से ममत्व एकदम मिटा देना है। इससे हमारा कोई कनेक्शन नहीं। बस हम जाते हैं बाबा के पास। इस दुनिया में अपना बैग बैगेज तैयार कर पहले से ही भेज दिया है। साथ में तो चल न सके। बाकी आत्माओं को जाना है। शरीर को भी यहाँ छोड़ देना है। बाबा ने नये शरीर का साक्षात्कार करा दिया है। हीरे जवाहरों के महल मिल जायेंगे। ऐसे सुखधाम में जाने लिए कितनी मेहनत करनी चाहिए। थकना नहीं चाहिए। दिनरात बहुत कमाई करनी है इसलिए बाबा कहते हैं नींद को जीतने वाले बच्चे, मामेकम् याद करो और विचार सागर मन्थन करो। ड्रामा के राज़ को बुद्धि में रखने से बुद्धि एकदम शीतल हो जाती है। जो महारथी बच्चे होंगे वह कभी हिलेंगे नहीं। शिवबाबा को याद करेंगे तो वह सम्भाल भी करेंगे।
बाप तुम बच्चों को दु:ख से छुड़ाकर शान्ति का दान देते हैं। तुमको भी शान्ति का दान देना है। तुम्हारी यह बेहद की शान्ति अर्थात् योगबल दूसरों को भी एकदम शान्त कर देंगे। झट मालूम पड़ जायेगा। यह हमारे घर का है वा नहीं। आत्मा को झट कशिश होगी यह हमारा बाबा है। नब्ज भी देखनी होती है। बाप की याद में रह फिर देखो यह आत्मा हमारे कुल की है। अगर होगी तो एकदम शान्त हो जायेगी। जो इस कुल के होंगे उन्हों को ही इन बातों में रस बैठेगा। बच्चे याद करते हैं तो बाप भी प्यार करते हैं। आत्मा को प्यार किया जाता है। यह भी जानते हैं जिन्होंने बहुत भक्ति की है वह ही जास्ती पढ़ेंगे। उनके चेहरे से मालूम पड़ता जायेगा कि बाप में कितना लव है। आत्मा बाप को देखती है। बाप हम आत्माओं को पढ़ा रहे हैं। बाप भी समझते हैं हम इतनी छोटी बिन्दी आत्मा को पढ़ाता हूँ। आगे चल तुम्हारी यह अवस्था हो जायेगी। समझेंगे हम भाई-भाई को पढ़ाते हैं। शक्ल बहन की होते भी दृष्टि आत्मा तरफ जाए। शरीर पर दृष्टि बिल्कुल न जाये, इसमें बड़ी मेहनत है। यह बड़ी महीन बातें हैं। बड़ी ऊंच पढ़ाई है। वज़न करो तो इस पढ़ाई का तरफ बहुत भारी हो जायेगा। अच्छा!
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का यादप्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।
धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) बीती सो बीती कर पहले अपने को सुधारना है। आत्म अभिमानी रहने की मेहनत करनी है। जास्ती बोलना नहीं है।
2) अपनी झोली ज्ञान रत्नों से भरकर उनका दान कर बहुतों के कल्याण के निमित्त बनना है। सबका प्यारा बनना है। अपार खुशी में रहना है।
वरदान:- कर्मक्षेत्र पर कमल पुष्प समान रहते हुए माया की कीचड़ से सेफ रहने वाले कर्मयोगी भव
कर्मयोगी को ही दूसरे शब्दों में कमल पुष्प कहा जाता है। कर्मयोगी अर्थात् कर्म और योग दोनों कम्बाइन्ड हों, किसी भी कर्म का बोझ अनुभव न हो। किसी भी प्रकार का कीचड़ अर्थात् माया का वायब्रेशन टच न करे। आत्मा की कमजोरी से माया को जन्म मिलता है। कमजोरी को समाप्त करने का साधन है रोज़ की मुरली। यही शक्तिशाली ताजा भोजन है। मनन शक्ति द्वारा इस भोजन को हज़म कर लो तो माया की कीचड़ से सेफ रहेंगे।
स्लोगन:- सफलता की चाबी द्वारा सर्व खजानों को सफल करना ही महादानी बनना है।
13.02.2023 HINDI MURLI
“मीठे बच्चे - यह गॉड फादरली वर्ल्ड युनिवर्सिटी है - मनुष्य से देवता, नर से नारायण बनने की, जब यह निश्चय पक्का हो तब तुम यह पढ़ाई पढ़ सको''
प्रश्नः- मनुष्य से देवता बनने के लिए तुम बच्चे इस समय कौन सी मेहनत करते हो?
उत्तर:- आंखों को क्रिमिनल से सिविल बनाने की, साथ-साथ मीठा बनने की। सतयुग में तो हैं ही सबकी आंखें सिविल। वहाँ यह मेहनत नहीं होती। यहाँ पतित शरीर, पतित दुनिया में तुम बच्चे आत्मा भाई-भाई हो - यह निश्चय कर आंखों को सिविल बनाने का पुरुषार्थ कर रहे हो
प्रश्नः- भक्तों की किस एक बात से सर्वव्यापी की बात गलत हो जाती है?
उत्तर:- कहते हैं हे बाबा जब आप आयेंगे तो हम आप पर वारी जायेंगे... तो आना सिद्ध करता है वह यहाँ नहीं है।
ओम् शान्ति। बाप रूहानी बच्चों से पूछते हैं कि अपने आत्मा के स्वधर्म में बैठे हो? यह तो जानते हो कि एक ही बेहद का बाप है जिसको सुप्रीम रूह या परम आत्मा कहते हैं। परमात्मा है भी जरूर। परमपिता है ना। परमपिता माना परमात्मा। यह बातें तुम बच्चे ही समझ सकते हो। 5 हजार वर्ष पहले भी यह ज्ञान तुम सबने ही सुना था। तुम जानते हो आत्मा बहुत छोटी सूक्ष्म है, उनको इन आंखों से देखा नहीं जाता है। ऐसा कोई मनुष्य नहीं होगा जिसने आत्मा को देखा होगा। हाँ देखने में आ सकती है - परन्तु दिव्य दृष्टि से और वह भी ड्रामा के प्लैन अनुसार। भक्ति मार्ग में भी इन आंखों से कोई साक्षात्कार नहीं होता। दिव्य दृष्टि मिलती है, जिससे चैतन्य में देखते हैं। दिव्य दृष्टि अर्थात् चैतन्य में देखना। आत्मा को ज्ञान के चक्षु मिलते हैं। बाप ने समझाया है बहुत भक्ति करते हैं, जिसको नौधा भक्ति कहते हैं। जैसे मीरा को साक्षात्कार हुआ तो डांस करती थी। वैकुण्ठ तो उस समय नहीं था ना। मीरा को 5-6 सौ वर्ष हुआ होगा। जो पास्ट हो गया है वह दिव्य दृष्टि से देखा जाता है। हनूमान, गणेश आदि के चित्रों की बहुत भक्ति करते-करते उसमें जैसे लय हो जाते हैं। भल दीदार होगा परन्तु उससे कोई मुक्ति नहीं मिल सकती। मुक्ति जीवनमुक्ति का रास्ता बिल्कुल न्यारा है। भारत में भक्ति मार्ग में ढेर मन्दिर होते हैं। वहाँ शिवलिंग भी रखते हैं। कोई छोटा बनाते हैं, कोई बड़ा बनाते हैं। अभी तुम समझते हो जैसे तुम आत्मा हो वैसे वह सुप्रीम आत्मा है। साइज एक ही है। कहते भी हैं हम सब ब्रदर्स हैं, आत्मायें सब भाई-भाई हैं। बेहद का बाप एक है। बाकी सब भाई-भाई हैं, पार्ट बजाते हैं। यह समझने की बातें हैं। यह हैं ज्ञान की बातें जो एक ही बाप समझाते हैं। जिन्हों को समझाते हैं वह फिर औरों को समझा सकते हैं। पहले-पहले एक ही निराकार बाप समझाते हैं। उनके लिए ही फिर कह देते सर्वव्यापी है, ठिक्कर-भित्तर में है। यह तो राइट नहीं है ना। एक तरफ कहते बाबा जब आप आयेंगे तो हम वारी जायेंगे। ऐसे थोड़ेही कहते आप सर्वव्यापी हो। कहते हैं आप आयेंगे तो वारी जायेंगे। तो इसका मतलब यहाँ नहीं है ना। मेरे तो आप दूसरा न कोई। तो जरूर उनको याद करना पड़े ना। यह बाप ही बैठ बच्चों को समझाते हैं, इसको रूहानी नॉलेज कहा जाता है। यह जो गाया जाता है आत्मायें परमात्मा अलग रहे बहुकाल.... उसका हिसाब भी समझाया है। बहुकाल से अलग तुम आत्मायें रहती हो। अब बाप के पास आये हो - राजयोग सीखने। बाप तो सर्वेन्ट है। बड़े आदमी जब सही करते हैं तो नीचे लिखते हैं - ओबीडियेन्ट सर्वेन्ट.... बाप सब बच्चों का सर्वेन्ट है। कहते हैं बच्चे मैं तुम्हारा सर्वेन्ट हूँ। तुम कितनी हुज्जत से बुलाते हो कि भगवान आओ, आकर हम पतितों को पावन बनाओ। पावन होते ही हैं पावन दुनिया में। यह समझने की बातें हैं। बाकी तो सब है कनरस। यह है गॉड फादरली वर्ल्ड युनिवर्सिटी। एम आब्जेक्ट क्या है? मनुष्य से देवता बनाना। बच्चों को यह निश्चय है कि हमको यह बनना है। जिसको निश्चय नहीं होगा वह स्कूल में बैठेगा क्या? निश्चय होगा तो बैरिस्टर से, सर्जन से सीखेगा। एम-आब्जेक्ट का ही पता नहीं तो आयेगा नहीं। तुम बच्चे समझते हो हम मनुष्य से देवता, नर से नारायण बनते हैं। यह है सच्ची-सच्ची सत्य नर से नारायण बनने की कथा। कथा क्यों कहा जाता है? क्योंकि 5 हजार वर्ष पहले भी यह नॉलेज सीखी थी। तो पास्ट को कथा कह देते हैं, यह है सच्ची-सच्ची शिक्षा नर से नारायण बनने की। नई दुनिया में देवतायें, पुरानी दुनिया में मनुष्य रहते हैं। देवताओं में जो दैवीगुण हैं, वह मनुष्यों में नहीं हैं। मनुष्य उनको देवता कहते हैं और गाते हैं आप सर्वगुण सम्पन्न, 16 कला सम्पूर्ण, सम्पूर्ण निर्विकारी हो। अपने को कहते हैं हम पापी, नींच विकारी हैं। देवतायें कब थे? जरूर कहेंगे सतयुग में थे। ऐसे नहीं कहेंगे कलियुग में थे। आजकल मनुष्यों की तमोप्रधान बुद्धि होने के कारण बाप के टाइटिल भी अपने ऊपर रख देते हैं। वास्तव में श्रेष्ठ बनाने वाला श्री-श्री तो एक ही बाप है। श्रेष्ठ देवताओं की महिमा अलग है। अभी है कलियुग। संन्यासियों के लिए भी बाबा ने समझाया है एक है हद का संन्यास, दूसरा है बेहद का संन्यास। वो लोग कहते हैं हमने घरबार आदि सब छोड़ा है। परन्तु आजकल तो देखो लखपति बन बैठे हैं। संन्यास माना सुख का त्याग करना। तुम बच्चे बेहद का संन्यास करते हो क्योंकि समझते हो कि यह पुरानी दुनिया खत्म होने वाली है, इसलिए इनसे वैराग्य है। वो लोग तो घरबार छोड़ फिर अन्दर घुस आये हैं। अभी पहाड़ियों आदि पर ग़ुफाओं में नहीं रहते। कुटियायें बनाते हैं, तो भी कितना खर्च करते हैं। वास्तव में कुटिया पर कोई खर्चा थोड़ेही लगता है। बड़े-बड़े महल बनाकर रहते हैं। आजकल तो सब तमोप्रधान हैं। अभी है ही कलियुग। सतयुगी देवताओं के चित्र नहीं होते तो स्वर्ग का नामनिशान गुम हो जाता। तुमको समझाया जाता है अब मनुष्य से देवता बनना है। आधाकल्प भक्ति मार्ग की कथायें हैं। सुनकर सीढ़ी नीचे उतरते आये हो फिर 5 हजार वर्ष बाद एक्यूरेट वही ड्रामा रिपीट होगा। बाबा ने समझाया भी है, किसको ऐसे कहना नहीं है कि भक्ति को छोड़ो। ज्ञान आ जाता है तो फिर आपेही भक्ति छूट जायेगी। समझते हैं हम आत्मा हैं। अब बेहद के बाप से हमको वर्सा लेना है। पहले बेहद के बाप की पहचान चाहिए। वह निश्चय हो गया तो फिर हद के बाप से बुद्धि निकल जाती है। गृहस्थ व्यवहार में रहते बुद्धि का योग बाप के साथ लग जायेगा। बाप खुद कहते हैं शरीर निर्वाह अर्थ कर्म करते बुद्धि में याद रहे एक बाप की। देहधारियों की याद न रहे। वह होती है जिस्मानी यात्रा। यह तुम्हारी है रूहानी यात्रा, इसमें धक्का नहीं खाना है। भक्ति मार्ग है ही रात। धक्का खाना पड़ता है। यहाँ धक्के की बात ही नहीं। याद करने लिए कोई बैठता नहीं है। भक्ति मार्ग में कृष्ण के भगत चलते फिरते कृष्ण को याद नहीं कर सकते हैं क्या? दिल में तो उनकी याद रह जाती है ना। एक बार जो चीज़ देखी जाती है तो वह चीज़ याद रहती है। तो तुम घर बैठे शिवबाबा को याद नहीं कर सकते हो? यह है नई बात। कृष्ण को याद करना, वह पुरानी बात हो गई। शिवबाबा को तो कोई जानते ही नहीं कि उनका नाम रूप क्या है? सर्वव्यापी भी क्या है! कोई बताये ना। तुम बच्चे जानते हो हम आत्मा का बाप परमपिता परमात्मा है। आत्मा को परमात्मा कह नहीं सकते। अंग्रेजी में आत्मा को सोल कहा जाता है। एक भी मनुष्य नहीं जो पारलौकिक बाप को जानता हो। वह बाप ही ज्ञान का सागर है, उनमें नॉलेज है मनुष्य को देवता बनाने की। बाप कहते हैं रोज़-रोज़, गुह्य-गुह्य बातें सुनाता हूँ। मुख्य बात है याद की। याद ही भूल जाती है। बाबा रोज़ कहते हैं अपने को आत्मा समझ बाप को याद करो। मैं आत्मा बिन्दी हूँ। कहते भी हैं चमकता है अजब सितारा। आत्मा शरीर से निकलती है तो इन आंखों से देखने में नहीं आती है। कहा जाता है आत्मा निकल गई। जाकर दूसरे शरीर में प्रवेश किया। तुम जानते हो हम आत्मा कैसे पुनर्जन्म लेते अभी अपवित्र बनी हैं। पहले तुम आत्मा पवित्र थी, तुम्हारा गृहस्थ धर्म पवित्र था। अब दोनों ही अपवित्र बने हैं। जब दोनों पवित्र हैं, तो उन्हों की पूजा करते हैं। आप पवित्र हो, हम अपवित्र हैं। वह दोनों पवित्र, यहाँ दोनों अपवित्र। तो क्या पहले पवित्र थे फिर अपवित्र बने या अपवित्र ही जन्म लिया? बाप बैठ समझाते हैं पहले तुम आत्मायें आपेही पवित्र पूज्य थी। फिर आपेही पुजारी अपवित्र बनी हो। 84 जन्म लिये हैं। सारे वर्ल्ड की हिस्ट्री-जॉग्राफी तुम जानते हो। कौन-कौन राज्य करते थे, कैसे राज्य मिला। यह हिस्ट्री भी तुम जानते हो और कोई नहीं जानता। तुम भी अभी जानते हो, आगे नहीं जानते थे, पत्थरबुद्धि थे। रचता और रचना के आदि मध्य अन्त की नॉलेज नहीं थी, नास्तिक थे। अभी आस्तिक बनने से तुम कितने सुखी बन जाते हो। तुम यहाँ आये ही हो यह देवता बनने के लिए। इस समय बहुत मीठा बनना है। तुम एक बाप की सन्तान भाई-बहन ठहरे ना। क्रिमिनल दृष्टि जा न सके। इस समय मेहनत करनी पड़ती है। आंखें ही सबसे जास्ती क्रिमिनल होती हैं। आधाकल्प क्रिमिनल रहती हैं, आधाकल्प सिविल रहती हैं। सतयुग में देवताओं की आंखें सिविल रहती हैं, यहाँ क्रिमिनल रहती हैं। इस पर सूरदास की कथा बैठ सुनाते हैं। बाप कहते हैं मुझे आना ही पड़ता है पतित दुनिया, पतित शरीर में। जो पतित बने हैं उन्हों को ही पावन बनाना है।
तुम जानते हो कृष्ण और राधे दोनों अलग-अलग राजाई के थे। प्रिन्स-प्रिन्सेज थे। पीछे स्वयंवर बाद लक्ष्मी-नारायण बनते हैं तो फिर उन्हों की डिनायस्टी गाई जाती है। संवत भी उनसे कहा जायेगा। सतयुग की आयु ही लाखों वर्ष कह देते हैं। बाप कहते हैं 1250 वर्ष। रात-दिन का फर्क हो गया। रात ब्रह्मा की आधाकल्प फिर दिन ब्रह्मा का आधाकल्प। ज्ञान से है सुख, भक्ति से है दु:ख। यह सब बातें बाप बैठ समझाते हैं। फिर भी कहते हैं मीठे बच्चों अपने को आत्मा समझो। स्वधर्म में टिको, बाप को याद करो। वही पतित-पावन है। याद करते-करते तुम पावन बन जायेंगे। अन्त मती सो गति। बाप स्वर्ग का रचयिता है ना। तो याद दिलाते हैं तुम स्वर्ग के मालिक थे। अभी पतित हो इसलिए वहाँ जाने लायक नहीं हो, इसलिए पावन बनो। मुझे एक ही बार आना पड़ता है। एक गॉड है। एक ही दुनिया है। मनुष्यों की तो अनेक मतें, अनेक बातें हैं, जितनी जबान उतनी बातें। यहाँ है ही एक मत, अद्वेत मत। झाड़ में देखो कितने मत-मतान्तर हैं। झाड़ कितना बड़ा हो गया है। वहाँ एक मत एक राज्य था। तुम जानते हो हम ही विश्व के मालिक थे। भारत कितना साहूकार था। वहाँ अकाले मृत्यु कभी होता नहीं। यहाँ तो देखो बैठे-बैठे यह गया। चारों तरफ से मौत है। वहाँ तुम्हारी आयु बड़ी थी। अभी तुम ईश्वर से योग लगाए मनुष्य से देवता बन रहे हो। तो तुम ठहरे योगेश्वर, योगेश्वरी फिर बनेंगे राज राजेश्वरी, अभी हो ज्ञान ज्ञानेश्वरी। फिर राज राजेश्वरी कैसे बनें? ईश्वर ने बनाया। अभी तुम जानते हो इन्हों को राजयोग किसने सिखाया? ईश्वर ने। वहाँ उन्हों की 21 पीढ़ी राजाई चलती है। वह तो एक जन्म में दान-पुण्य करने से राजा बनते हैं। मर गया तो खलास। अकाले मृत्यु तो सबकी आती रहती है। सतयुग में यह लॉ नहीं। वहाँ ऐसे नहीं कहेंगे कि काल खा गया। एक खाल छोड़ दूसरी ले लेते हैं। जैसे सर्प खाल बदलते हैं। वहाँ सदैव खुशी ही खुशी रहती है। जरा भी दु:ख की बात नहीं। तुम सुखधाम का मालिक बनने के लिए अभी पुरुषार्थ कर रहे हो। अच्छा!
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का यादप्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।
धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) इस पुरानी दुनिया से बेहद का संन्यास करना है। शरीर निर्वाह अर्थ कर्म करते रूहानी यात्रा पर रहना है।
2) पुरुषार्थ कर आंखों को सिविल जरूर बनाना है। एम आब्जेक्ट बुद्धि में रख बहुत-बहुत मीठा बनना है।
वरदान:- हर कदम में पदमों की कमाई जमा करने वाले समझदार ज्ञानी तू आत्मा भव
समझदार ज्ञानी तू आत्मा वह है जो पहले सोचता है फिर करता है। जैसे बड़े आदमी पहले भोजन को चेक कराते हैं फिर खाते हैं। तो यह संकल्प बुद्धि का भोजन है इसे पहले चेक करो फिर कर्म में लाओ। संकल्प को चेक कर लेने से वाणी और कर्म स्वत: समर्थ हो जायेंगे। और जहाँ समर्थ है वहाँ कमाई है। तो समर्थ बन हर कदम अर्थात् संकल्प, बोल और कर्म में पदमों की कमाई जमा करो, यही ज्ञानी तू आत्मा का लक्षण है।
स्लोगन:- बाप और सर्व की दुआओं के विमान में उड़ने वाले ही उड़ता योगी हैं।
12.02.2023 HINDI MURLI
सच्चे स्नेही बन एक बाप द्वारा सर्व सम्बन्धों का साकार में अनुभव करो
आज विश्व स्नेही बापदादा अपने अति स्नेही और सदा बाप के साथी वा सहयोगी आत्माओं को देख रहे हैं। चारों ओर की सर्व ब्राह्मण आत्मायें स्नेही अवश्य हैं। स्नेह ने ब्राह्मण जीवन में परिवर्तन किया है। फिर भी स्नेही तीन प्रकार के हैं - एक हैं स्नेह करने वाले, दूसरे हैं स्नेह निभाने वाले और तीसरे हैं स्नेह में समाये हुए। समाना अर्थात् समान बनना। स्नेह करने वाले कभी स्नेह करते हैं लेकिन करते-करते कभी स्नेह टूट जाता है, कभी जुट जाता है इसलिये समय प्रति समय स्नेह जोड़ने में पुरुषार्थ करना पड़ता है क्योंकि बाप के साथ-साथ और कहाँ भी स्नेह, चाहे व्यक्ति से, चाहे प्रकृति के साधनों से, कहाँ भी संकल्प मात्र भी स्नेह जुटा हुआ है तो बाप से स्नेह करने वालों की लिस्ट में आ जाते हैं। स्नेह की निशानी है बिना कोई मेहनत के स्नेही के तरफ स्नेह स्वत: ही जाता है। स्नेह करने वाली आत्मा का हर समय, हर स्थिति, हर परिस्थिति में आधार अनुभव होता है। अगर साधनों से स्नेह है तो उस समय बाप से भी ज्यादा साधन का आधार अर्थात् सहारा अनुभव होता है। उस समय उस आत्मा के संकल्प में बाप का स्नेह याद भी आता है, सोचते भी हैं कि बाप का स्नेह श्रेष्ठ है लेकिन यह साधन वा व्यक्ति का आधार भी आवश्यक है इसलिये दोनों तरफ स्नेह अधूरा हो जाता है और बार-बार स्नेह जोड़ना पड़ता है। एक बल, एक भरोसा के बजाय दूसरा भी भरोसा साथ-साथ आवश्यक लगता है इसलिये बाप के स्नेह द्वारा जो सर्व प्राप्ति का अनुभव हो उसके बजाय दूसरे सहारे द्वारा अल्पकाल की प्राप्ति अपने तरफ आकर्षित कर लेती है। इतना आकर्षित करती है जो उसी को ही आवश्यक समझने लगते हैं। लगाव नहीं समझते, लेकिन सहारा समझते हैं। इसको कहा जाता है स्नेह करने वाले।
दूसरे हैं स्नेह निभाने वाले। स्नेह करने के साथ-साथ निभाने की भी शक्ति है। निभाना अर्थात् स्नेह का रेसपॉन्स देना, रिटर्न देना। स्नेह का रिटर्न है जो स्नेही बाप बच्चों से श्रेष्ठ आशायें रखते हैं वो सर्व आशायें प्रैक्टिकल में पूर्ण करना। तो निभाने वाले बहुत करके प्रैक्टिकल में करके दिखाते हैं, लेकिन सदा बाप समान अर्थात् समाये हुए वो अनुभूति कभी होती है, कभी नहीं होती। फिर भी निभाने वाले समीप हैं, लेकिन समान नहीं है। निभाने वालों को निभाने के रिटर्न में पद्मगुणा हिम्मत और उमंग-उत्साह की मदद विशेष बाप द्वारा मिलती रहती है। तीसरे, जो स्नेह में समाये हुए हैं उन आत्माओं के नयनों में, मुख में, संकल्प में, हर कर्म में सहज और स्वत: स्नेही बाप का साथ सदा ही अनुभव होता है। बाप उससे जुदा नहीं और वो बाप से जुदा नहीं। हर समय बाप के स्नेह के रिटर्न में प्राप्त हुई सर्व प्राप्तियों में सम्पन्न और सन्तुष्ट रहते हैं इसलिये और किसी भी प्रकार का सहारा उन्हों को आकर्षित नहीं कर सकता क्योंकि कोई न कोई अल्पकाल की प्राप्ति की आवश्यकता किसी और को सहारा बनाती है अर्थात् सम्पूर्ण स्नेह में अन्तर डालती है। स्नेह में समाई हुई आत्मायें सदा सर्व प्राप्ति सम्पन्न होने के कारण सहज ही ‘एक बाप दूसरा न कोई' इस अनुभूति में रहती हैं। तो स्नेही सभी हैं लेकिन तीन प्रकार के हैं। अब अपने से पूछो मैं कौन? अपने को तो जान सकते हैं ना। स्नेही हैं तभी स्नेह के कारण ब्राह्मण जीवन में चल रहे हो। लेकिन स्नेह के साथ निभाने की शक्ति, इसमें नम्बरवार बन जाते हैं। स्नेह के साथ शक्ति भी आवश्यक है। जिसमें स्नेह और शक्ति दोनों का बैलेन्स है, वही बाप समान बनता है। ऐसे समाई हुई आत्माओं का अनुभव यही होगा - बाप के स्नेह से दूर होना, यह मुश्किल है। समाना सहज है, दूर होना मुश्किल है क्योंकि समाई हुई आत्माओं के लिये एक बाप ही संसार है।
संसार में आकर्षित करने वाली दो ही बातें हैं - एक व्यक्ति का सम्बन्ध और दूसरा भिन्न-भिन्न वैभवों वा साधनों द्वारा प्राप्ति होना। तो समाई हुई आत्मा के लिये सर्व सम्बन्ध के रस का अनुभव एक बाप द्वारा सदा ही होता है। सर्व प्राप्तियों का आधार एक बाप है, न कि वैभव वा साधन। वैभव वा साधन रचना है और बाप रचता है। जिसका आधार रचता है उसको रचना द्वारा अल्पकाल के प्राप्ति का स्वप्न मात्र भी संकल्प नहीं हो सकता। बापदादा को कभी-कभी बच्चों की स्थिति को देख हंसी आती है क्योंकि आश्चर्य तो कह नहीं सकते, फुलस्टॉप है। चलते-चलते बीज को छोड़ टाल-टालियों में आकर्षित हो जाते हैं। कोई आत्मा को आधार बना लेते हैं, कोई साधनों को आधार बना लेते हैं क्योंकि बीज का रूप-रंग शोभनिक नहीं होता और टाल-टालियों का रूप-रंग बड़ा शोभनिक होता है। देहधारी के सम्बन्ध का आधार देह भान में सहज अनुभव होता है और बाप का आधार देह भान से परे होने से अनुभव होता है। देहभान में आने की आदत तो है ही। न चाहते भी हो सकते हैं इसलिये देहधारी के सम्बन्ध का आधार वा सहारा सहज अनुभव होता है। समझते भी हैं कि ये ठीक नहीं है फिर भी सहारा बना लेते हैं। बापदादा देख-देख मुस्कराते रहते हैं। उस समय की स्थिति हंसाने वाली होती है। जैसे आप लोग क्लासेस में वा भाषणों में एक तोते की कहानी सुनाते हो - उसको मना किया कि नलके पर नहीं बैठो लेकिन वो नलके पर बैठ करके बोल रहा था। ऐसे बच्चे भी उस समय मन में अपने आपसे एक तरफ यही सोचते रहते कि ‘एक बाप, दूसरा न कोई', बार-बार अपने आपसे रिपीट भी करते रहते लेकिन साथ-साथ फिर यह भी सोचते कि स्थूल में तो सहारा चाहिए। तो उस समय हंसी आयेगी ना और उस समय फिर माया चांस लेती है। बुद्धि को ऐसा परिवर्तन करेगी जो झूठा सहारा ही सच्चा सहारा अनुभव होगा। जैसे आजकल झूठा, सच्चे से भी अच्छा लगता है, ऐसे उस समय रांग, राइट अनुभव होता है। और वो रांग बात, झूठा सहारा उसको पक्का करने के लिये वा झूठ को सच्चा साबित करने के लिये, जैसे कोई भी कमजोर स्थान होता है तो उसको मज़बूत करने के लिये पिल्लर्स लगाये जाते हैं तो माया भी कमजोर संकल्प को मज़बूत बनाने के लिये बहुत रॉयल पिल्लर्स लगाती है। क्या पिल्लर लगाती है? माया यही संकल्प देती है कि ऐसा तो होता ही है, कई बड़े-बड़े भी ऐसे ही करते हैं, ऐसे ही चलते हैं, या कहते अभी तो पुरुषार्थी ही हैं, सम्पूर्ण तो हुए नहीं हैं, तो ज़रूर अभी कोई न कोई कमी रहेगी ही, आगे चल सम्पूर्ण बन जायेंगे - ऐसे-ऐसे व्यर्थ संकल्प रूपी पिल्लर्स कमजोरी को मज़बूत कर देते हैं। तो ऐसे पिल्लर का आधार नहीं लेना। समय आने पर यह आर्टीफिशयल पिल्लर धोखा दे देते हैं। सर्व सम्बन्धों का सहारा एक बाप सदा रहे, यह अनुभव कम करते हो। इस सर्व सम्बन्धों के अनुभव को बढ़ाओ। सर्व सम्बन्धों की अनुभूति कम होने के कारण कहीं न कहीं अल्पकाल का सम्बन्ध जुट जाता है। स्थूल जीवन में भी स्थूल रूप का सहारा वा हर परिस्थिति में स्थूल रूप का सहयोग देने वाला सहारा बाप है। यह अनुभव और बढ़ाओ। ऐसे नहीं कि बाप तो है ही सूक्ष्म में सहयोग देने वाला। निराकार है, आकार है, साकार तो है नहीं, लेकिन हर सम्बन्ध को साकार रूप में अनुभव कर सकते हो। साकार स्वरूप में साथ का अनुभव कर सकते हो। इस अनुभूति को गहराई से समझो और स्वयं को इसमें मज़बूत करो। तो व्यक्ति, वैभव व साधन अपने तरफ आकर्षित नहीं करेंगे। साधनों को निमित्त मात्र कार्य में लाना वा साक्षी हो सेवा प्रति कार्य में लगाना - ऐसी अनुभूति को बढ़ाओ। सहारा नहीं बनाओ, निमित्त मात्र हो। इसको कहा जाता है स्नेह में समाई हुई समान आत्मा। तो अपने से सोचना कि मैं कौन? समझा? अच्छा!
सदा स्नेह में समाये हुए समान आत्माओं को, सदा एक बाप से सर्व सम्बन्ध का अनुभव करने वाली आत्माओं को, सदा एक बाप को आधारमूर्त, सच्चा सहारा अनुभव करने वाली आत्माओं को, सदा सर्व प्राप्ति रचता बाप द्वारा अनुभव करने वाली आत्माओं को, सदा सहज स्वत: ‘एक बल, एक भरोसा' अनुभव करने वाली सच्चे स्नेही आत्माओं को बापदादा का याद-प्यार और नमस्ते।
दादियों से मुलाकात :- सदा समाये हुए हैं या याद करने की मेहनत करनी पड़ती है? सिवाए एक बाप के और कोई दिखाई नहीं देता। जब कहानियां सुनते हो तो हंसी आती है ना। कहानी जब तक चलती है तब तक समझ में नहीं आती और जब कहानी समाप्त होती है तो सोचते हैं यह क्या हुआ? मैं थी या और कोई था ऐसे भी सोचते हैंक्योंकि उस समय परवश होते हैं ना। तो परवश को अपना होश नहीं होता है। जब अपना होश आता है तो फिर आगे बढ़ने का जोश भी आता है। अच्छा, संगठन बढ़ता जा रहा है और बढ़ता ही रहेगा। और आप निमित्त आत्माएं यह सब खेल देख हर्षित होते रहते हो। सभी चल रहे हैं, कोई चल रहा है, कोई उड़ रहा है और आप लोग क्या करते हो? उड़ते-उड़ते साथ में औरों को भी उड़ा रहे हो क्योंकि रहमदिल बाप के रहमदिल आत्मायें बन गये, तो रहम आता है ना। घृणा नहीं आती लेकिन रहम आता है। और यह रहम ही दिल के प्यार का काम करता है। अच्छा, जो भी चल रहा है अच्छे ते अच्छा चल रहा है। अथक बन सेवा कर रहे हैं ना। निमित्त आत्माओं के अथकपन को देख सबमें उमंग आता है ना।
अव्यक्त बापदादा की पर्सनल मुलाकात - साधारणता को समाप्त कर विशेषता के संस्कार नेचुरल और नेचर बनाओ
अपने को सदा संगमयुग के रूहानी मौजों में रहने वाले अनुभव करते हो? मौजों में रहते हो वा कभी मौज में, कभी मूँझते भी हो या सदा मौज में रहते हो? क्या हाल-चाल है? कभी कोई ऐसी परिस्थिति आ जाए वा ऐसी कोई परीक्षा आ जाए तो मूंझते हो? (थोड़े टाइम के लिए) और उस थोड़े टाइम में अगर आपको काल आ जाए तो फिर क्या होगा? अकाले मृत्यु का तो समय है ना। तो थोड़ा समय भी अगर मौज के बजाए मूंझते हैं और उस समय अन्तिम घड़ी हो जाए तो अन्त मति सो गति क्या होगी? इसलिए सुनते रहते हो ना सदा एवररेडी! एवररेडी का मतलब क्या है? क्या हर घड़ी ऐसे एवररेडी हो? कोई भी समस्या सम्पूर्ण बनने में विघ्न रूप नहीं बने। अन्त अच्छी तो भविष्य आदि भी अच्छा होता है। तो एवररेडी का पाठ इसलिए पढ़ाया जा रहा है। ऐसे नहीं सोचो कि थोड़ा समय होता है लेकिन थोड़ा समय भी, एक सेकेण्ड भी धोखा दे सकता है। वैसे सोचते हैं ज्यादा टाइम नहीं चलता, ऐसा दो-चार मिनट चलता है लेकिन एक सेकेण्ड भी धोखा देने वाला हो सकता है तो मिनट की तो बात ही नहीं सोचो क्योंकि सबसे वैल्युएबुल आत्मायें हो, अमूल्य हो। अमूल्य आत्माओं का कोई दुनिया वालों से मूल्य नहीं कर सकते। दुनिया वाले तो आप सबको साधारण समझेंगे। लेकिन आप साधारण नहीं हो, विशेष आत्मायें हो। विशेष आत्मा का अर्थ ही है जो भी कर्म करे, जो भी संकल्प करे, जो भी बोल बोले वो हर बोल और हर संकल्प विशेष हैं, साधारण नहीं हो। समय भी साधारण रीति से नहीं जाये। हर सेकेण्ड और हर संकल्प विशेष हो। इसको कहा जाता है विशेष आत्मा। तो विशेष करते-करते साधारण नहीं हो जाये ये चेक करो। कई ऐसे सोचते हैं कि कोई गलती नहीं की, कोई पाप कर्म नहीं किया, कोई वाणी से भी ऐसा उल्टा-सुल्टा शब्द नहीं बोला, लेकिन भविष्य और वर्तमान श्रेष्ठ बनाया? बुरा नहीं किया लेकिन अच्छा किया? स़िर्फ ये नहीं चेक करो कि बुरा नहीं किया, लेकिन बुरे की जगह पर अच्छे ते अच्छा किया या साधारण हो गया? तो ऐसे साधारणता नहीं हो, श्रेष्ठता हो। नुकसान नहीं हुआ, लेकिन जमा हुआ? क्योंकि जमा का समय तो अभी है ना। अभी का जमा किया हुआ भविष्य अनेक जन्म खाते रहेंगे। तो जितना जमा होगा उतना ही खायेंगे ना। अगर कम जमा किया तो कम खाना पड़ेगा अर्थात् प्रालब्ध कम होगी। लेकिन लक्ष्य है श्रेष्ठ प्रालब्ध पाने का या साधारण भी हो जाये, तो कोई हर्जा नहीं? स्वर्ग में तो आ ही जायेंगे, दु:ख तो होगा नहीं, साधारण भी बने तो क्या हर्जा...? हर्जा है या चलेगा? तो चेक करो कि हर सेकेण्ड, हर संकल्प विशेष हो। जैसे आधा कल्प के देहभान का अभ्यास नेचुरली न चाहते हुए भी चलता रहता है ना। देह अभिमान में आना नेचुरल हो गया है ना। ऐसे देही अभिमानी अवस्था नेचुरल और नेचर हो जाये। तो जो नेचर होती है वह स्वत: ही अपना काम करती है, सोचना नहीं पड़ता है, बनाना नहीं पड़ता है, करना नहीं पड़ता है लेकिन स्वत: हो ही जाती है। तो ऐसे विशेषता के संस्कार नेचर बन जायें और हर एक के दिल से निकले। ऐसे नहीं कि मेरी नेचर यह है, मेरी नेचर यह है नहीं, हर एक के मुख से, मन से यही निकले कि मेरी नेचर है ही विशेष आत्मा के विशेषता की। तो ऐसे है या मेहनत करनी पड़ती है? जो नेचर होती है उसमें मेहनत नहीं होती। किसी की नेचर रमणीक है तो स्वत: ही रमणीकता चलती रहती है ना। उसको पता भी नहीं पड़ेगा कि मैंने क्या किया? कोई कहेगा तो भी कहेंगे कि मैं क्या करूँ, मेरी नेचर है। तो विशेषता की भी ऐसी नेचर हो जाये। कोई पूछे आपकी नेचर क्या है? तो सबके दिल से निकले कि हमारी नेचर है ही विशेषता की। साधारण कर्म की समाप्ति हो गई क्योंकि मरजीवा हो गये ना। तो साधारणता से मर गये, विशेषता में जी रहे हैं माना नया जन्म हो गया। तो साधारणता पास्ट जन्म की नेचर है, अभी की नहीं क्योंकि नया जन्म ले लिया। तो नये जन्म की नेचर विशेषता है, ऐसे अनुभव हो। तो अभी क्या करेंगे? साधारणता की समाप्ति। संकल्प में भी साधारणता नहीं।
मातायें मौज में रहती हो? कितना भी कोई मुंझाने की कोशिश करे लेकिन आप मौज में रहो। मुंझाने वाला मूंझ जाये लेकिन आप नहीं मूंझो क्योंकि अज्ञानियों का काम है मुंझाना और ज्ञानियों का काम है मौज में रहना। तो वो अपना काम करे और आप अपना काम करो। सदा मौज का अनुभव करो तब तो फ़लक से कह सकेंगे। होंगे तब ही तो कह सकेंगे ना? जो होगा नहीं तो कह भी नहीं सकता। चैलेन्ज कर सकते हो हम मूँझने वाले नहीं हैं क्योंकि विशेष आत्मायें हैं। क्या याद रखेंगे? मौज में रहने वाली विशेष आत्मा हैं। ऐसी हिम्मत वाले हो ना। हिम्मत वालों को मदद स्वत: ही मिलती है। अच्छा।
वरदान:- सहज विधि द्वारा विधाता को अपना बनाने वाले सर्व भाग्य के खजानों से भरपूर भव
भाग्य विधाता को अपना बनाने की विधि है - बाप और दादा दोनों के साथ संबंध। कई बच्चे कहते हैं हमारा तो डायरेक्ट निराकार से कनेक्शन है, साकार ने भी तो निराकार से पाया हम भी उनसे सब कुछ पा लेंगे। लेकिन यह खण्डित चाबी है, सिवाए ब्रह्माकुमार कुमारी बनने के भाग्य बन नहीं सकता। साकार के बिना सर्व भाग्य के भण्डारे का मालिक बन नहीं सकते क्योंकि भाग्य विधाता भाग्य बांटते ही हैं ब्रह्मा द्वारा। तो विधि को जानकर सर्व भाग्य के खजानों से भरपूर बनो।
स्लोगन:- स्वयं से, सेवा से, सर्व से सन्तुष्टता का सर्टीफिकेट लो तब सिद्धि स्वरूप बनेंगे।
“मीठे बच्चे - बाप तुम्हें हद और बेहद की नॉलेज दे, फिर इससे भी पार घर ले जाते हैं, सतयुग त्रेता है हद, द्वापर कलियुग है बेहद''
प्रश्नः- बाप द्वारा मिली हुई नॉलेज में मजबूत कौन रह सकता है?
उत्तर:- जो पूरा पवित्र बनता है। पवित्र नहीं तो नॉलेज धारण नहीं होती। पवित्र गोल्डन एजेड बुद्धि में ही सारी नॉलेज धारण होती है, वही बाप समान मास्टर नॉलेजफुल बनते हैं।
प्रश्नः- पुरुषार्थ करते-करते तुम बच्चों की कौन सी स्टेज बन जायेगी?
उत्तर:- अब तक जो उल्टे सुल्टे संकल्प-विकल्प चलते वह सब समाप्त हो जायेंगे। बुद्धियोग एक बाप से लग जायेगा। बुद्धि सोने का बर्तन बन जायेगी। बाप जो भी रत्न देते हैं वह सब धारण होते जायेंगे।
ओम् शान्ति। मीठे-मीठे रूहानी बच्चों को रूहानी बाप रोज़-रोज़ बैठ समझाते हैं। यह तो बच्चों को समझाया गया है कि ज्ञान, भक्ति और वैराग्य का यह सृष्टि चक्र बना हुआ है। हद और बेहद के पार जाना है। कहा जाता है ना - हद बेहद से पार। तो बुद्धि में यह ज्ञान रखना है कि हद और बेहद से पार जाना है। बाप के लिए भी कहा जाता है - हद बेहद से पार। इसका भी अर्थ समझना चाहिए। रूहानी बाप रूहानी बच्चों को टॉपिक पर समझाते हैं - ज्ञान, भक्ति पीछे है वैराग्य। यह तो जानते हो ज्ञान दिन को कहा जाता है जबकि नई दुनिया है। वहाँ भक्ति होती नहीं। वह है हद की दुनिया, वहाँ बहुत थोड़े मनुष्य होते हैं, फिर धीरे-धीरे वृद्धि को पाते हैं। आधाकल्प के बाद भक्ति शुरू होती है। जब ज्ञान अर्थात् दिन है तो कोई संन्यास धर्म नहीं है, वैराग्य नहीं है। संन्यास वा त्याग वहाँ होता नहीं, यह सब बातें बुद्धि में रहनी चाहिए। धीरे-धीरे सृष्टि की वृद्धि होती जाती है। जीव आत्माओं की वृद्धि होती है। आत्मायें परमधाम से आती रहती हैं। हद से शुरू होता है, इस समय बेहद में है। तो बाप हद बेहद से पार है। हद में कितने थोड़े बच्चे हैं फिर सृष्टि वृद्धि को पाती है। अब इनसे भी पार जाना है। इसको कहा जाता है बेहद, पहले आत्मायें हद में थी। सतयुग त्रेता में पार्ट बजाती थी। कहाँ 9 लाख मनुष्य, कहाँ 5-6 सौ करोड़ चले जाओ बेहद में। मनुष्य जांच करते हैं कहाँ तक आसमान है, कहाँ तक समुद्र है, इसका अन्त नहीं पा सकते। ऊपर जाने की कितनी कोशिश करते हैं। इतना तेल डालना पड़े जो फिर वापस भी आ सकें। बेहद में जा नहीं सकते, हद तक जायेंगे। हद बेहद से पार का राज़ बाप तुमको समझाते हैं। पहले-पहले नई दुनिया में हद है। बहुत थोड़े रहते हैं। तुमको रचना के आदि मध्य अन्त की नॉलेज होनी चाहिए। यह नॉलेज कोई को नहीं है। बाप को ही नहीं जानते। यह सब राज़ समझाने वाला बाप ही है जो हद बेहद से पार है। तो बाप बैठ तुमको रचना के आदि मध्य अन्त का राज़ समझाते हैं। फिर बाप कहते हैं बच्चे इनसे भी पार जाओ। वहाँ तो कुछ है नहीं। आसमान ही आसमान है, जल ही जल है। जमीन आदि कुछ नहीं, इसको कहा जाता है हद बेहद से पार। इसका कोई भी अन्त नहीं पा सकते हैं। बेअन्त, बेअन्त कहते हैं परन्तु अर्थ नहीं जानते। बाप ही सारी समझ देते हैं क्योंकि वह है श्रेष्ठ अर्थात् बहुत समझदार। समझ समझकर ही बहुत समझदार माला का दाना बने हैं। मनुष्य कोई भी रचता और रचना के आदि मध्य अन्त का राज़ नहीं समझते हैं। बाप ही समझाते हैं। कहते हैं मैं हद को भी देख रहा हूँ, बेहद में भी जाता हूँ। इतने सभी धर्म हैं, ऐसे-ऐसे स्थापना होती है। वह सतयुग है हद की सृष्टि फिर कलियुग में है बेहद। फिर हद बेहद से पार जहाँ हमारा शान्तिधाम है, स्वीट होम है। सतयुग भी है स्वीट होम। वहाँ शान्ति भी है तो राज्य भाग्य भी है। वहाँ सुख और शान्ति दोनों ही हैं। घर जायेंगे तो वहाँ सिर्फ शान्ति होगी, सुख का नाम नहीं। अभी तुम शान्ति और सुख दोनों स्थापन कर रहे हो। वहाँ अशान्ति का नाम नहीं। अशान्ति 5 विकारों से है, यह दुनिया में कोई नहीं जानता। आधाकल्प के बाद फिर रावण राज्य होता है। वो लोग कल्प की आयु लाखों वर्ष कह देते हैं। समझते कुछ भी नहीं, इसलिए भ्रष्टाचारी, दु:खी पतित हैं। जरा भी सभ्यता नहीं है। जो दैवी सभ्यता थी, उसके बदले असभ्यता, आसुरी गुण हो गये हैं।
यह है बेहद का ड्रामा। अब कहा जाता है हद बेहद से पार, बहुत दूर-दूर जाते हैं। मनुष्यों को तो खेल का कुछ भी पता नहीं कि सबसे बड़ा कौन? ऊंचे ते ऊंचा है भगवान, तब कहते हैं तुम्हरी गत मत तुम ही जानो। अब तुम बच्चे सब कुछ समझते हो। परन्तु तुम्हारे में भी नम्बरवार हैं। बाप बैठ समझाते हैं कि मेरी बुद्धि कहाँ तक जाती है। हद बेहद से पार... वहाँ कुछ भी नहीं है। तुम बच्चों के रहने का स्थान है वह ब्रह्माण्ड, ब्रह्म महतत्व। जैसे आकाश तत्व में यहाँ बैठे हो, कुछ भी देखने में नहीं आता है। पोलार ही पोलार है। रेडियो में कहते हैं आकाशवाणी। अब आकाश तो बहुत बड़ा है, उसका अन्त तो पा नहीं सकते। उसकी वाणी मनुष्य क्या समझेंगे। यह जो आकाश का तत्व है, इस मुख से, पोलार से वाणी निकलती है, इसको कहा जाता है आकाशवाणी। वाणी मुख से (पोलार से) निकलती है। वाणी कोई नाक कान से नहीं निकलेगी। तो बाप भी इस शरीर में बैठ इस मुख से तुम बच्चों को समझाते हैं। तुम बच्चे ही जानते हो बाप क्या है। जैसे हम आत्मा हैं वैसे बाबा भी ऊंचे ते ऊंची आत्मा है। सबको नम्बरवार पार्ट मिला हुआ है। ऊंचे ते ऊंचा बाप फिर नीचे आओ, नम्बरवार खेल में सब आते हैं। नई दुनिया में पहले-पहले हैं लक्ष्मी-नारायण, फिर उनके साथ जो नई दुनिया में रहते हैं, माला को देखो। ऊपर में फूल ऊंचे ते ऊंचा भगवान फिर है मेरू युगल। फिर माला देखो कैसे बढ़ती है।
यह सब पढ़ाई है ना। सारी पढ़ाई बुद्धि में रहती है। बीज और झाड़। बीज ऊपर में है। रचता बाप ने बैठ रचना के आदि मध्य अन्त का राज़ तुमको समझाया है। यह सृष्टि रूपी कल्प वृक्ष है, इनकी आयु भी एक्यूरेट है, इसमें एक सेकेण्ड का भी फर्क नहीं पड़ सकता है। तुमको कितनी नॉलेज मिली है, इसमें मजबूत वह रह सकते हैं जो पवित्र बनते हैं। नहीं तो नॉलेज धारण हो न सके। पवित्र बर्तन, गोल्डन एजेड बुद्धि होगी तो नॉलेज ऐसी सहज धारण रहेगी जैसे बाबा के पास है। नम्बरवार मास्टर नॉलेजफुल बन जायेंगे। यह राज़ बाप बिगर कोई समझा न सके। न देवताओं के मुख से सुनेंगे, न पतित मनुष्यों के मुख से सुनेंगे। बाप ही सुनाते हैं, सो भी अभी संगम पर ही तुम सुनते हो। बाप एक ही बार बाप टीचर सतगुरू बनते हैं। पार्ट बजाते हैं फिर 5 हजार वर्ष बाद वही पार्ट बजायेंगे। प्रलय तो होती नहीं। तो पहले है बाप, ऊंचे ते ऊंचा शिव फिर मेरू ऊंचे ते ऊंचा महाराजा महारानी। फिर अन्त में जाकर आदि देव, आदि देवी बनेंगे। सारा ज्ञान तुम्हारी बुद्धि में है, परन्तु नम्बरवार पुरुषार्थ अनुसार। यह नॉलेज तुम किसको भी सुनाओ तो वन्डर खायेंगे। बाप नॉलेजफुल बिगर यह नॉलेज कोई दे न सके। यह बच्चों को धारण करना बहुत सहज है, कोई मुश्किल नहीं परन्तु याद की यात्रा है मुख्य। सोने के बर्तन में रत्न ठहर सकेंगे। ऊंचे ते ऊंचे रत्न हैं। यह बाबा रत्नों का व्यापारी भी है ना। अच्छा रत्न आता था तो चांदी की डिब्बी में कपास डालकर ऐसे बनाकर रखते थे। फिर ऐसे खोलकर दिखाते थे जैसे बहुत फर्स्टक्लास चीज़ है। अच्छी चीज़, अच्छे बर्तन में ही शोभती है।
तुम्हारे यह कान हैं बर्तन, इन द्वारा तुम सुनते हो। धारण करते हो तो यह सोने का (पवित्र) चाहिए अर्थात् बुद्धियोग बाबा से पूरा होना चाहिए। बुद्धियोग ठीक नहीं होगा तो कोई बात ठहरेगी नहीं। उल्टे सुल्टे संकल्प भी नहीं उठने चाहिए। तूफान बन्द। पुरुषार्थ करते-करते यह स्टेज होगी। बुद्धि को सब तरफ से निकाल मेरे साथ लगाते-लगाते बर्तन सोना हो जायेगा, दूसरों को भी दान देते रहो। भारत महादानी है, भारत में धन आदि बहुत दान करते हैं। यह फिर है अविनाशी ज्ञान रत्नों का दान, जो बाप बच्चों को देते हैं। देह सहित, देह के जो भी सम्बन्धी हैं उन सबको छोड़ बुद्धि एक के साथ लगानी है। हम तो बाप के हैं। बस। बाबा एम आब्जेक्ट बता देते हैं। पुरुषार्थ करना बच्चों का काम है तब ही ऊंच पद पायेंगे। कोई भी उल्टा सुल्टा संकल्प नहीं उठना चाहिए। बाप है नॉलेज का सागर। हद बेहद से पार सब राज़ समझाते रहते हैं। मैं हद बेहद से पार चला जाता हूँ, तुम भी हद बेहद से पार हो, संकल्प आदि कुछ नहीं। फिर तुम भी पार चले जायेंगे। गृहस्थ व्यवहार में रहते कमल फूल समान बनना है। हथ कार डे दिल शिव बाबा को दे.. चलते-चलते कई बच्चे टूट भी पड़ते हैं। नापास हो पड़ते हैं। तुमको सब मालूम पड़ जायेगा। अच्छे-अच्छे महारथियों को भी माया हप कर गई। आज नहीं हैं। बाप को छोड़ जाकर माया की एशलम लेते हैं। पढ़ने वाले ऊंच चले जाते हैं और पढ़ाने वाली टीचर मायावी बन जाती है। जैसे ट्रेटर होते हैं, दूसरे पास जाकर शरण लेते हैं। जो पावरफुल देखते हैं उस तरफ चले जाते हैं। तुम जानते हो बहुत ताकत वाला तो एक बाप है, वही सर्वशक्तिमान है। हमको ऊंच पढ़ाए एकदम विश्व का मालिक बना देते हैं। कोई अप्राप्त वस्तु नहीं जिसके लिए पुरुषार्थ करना पड़े। ऐसी कोई चीज़ है ही नहीं जो तुम्हारे पास न हो। सो भी है नम्बरवार पुरुषार्थ अनुसार। बेहद के बाप बिगर यह बातें कोई जानते नहीं। तुम ही पूज्य थे फिर तुम ही पुजारी बने हो। अब फिर पूज्य बनने के लिए पुरुषार्थ कर रहे हो। जितना बाबा की याद में रहेंगे तो माया के तूफान खत्म होते जायेंगे। हातमताई का खेल दिखाते हैं। मुहलरा डालते थे तो माया भाग जाती थी। मुहलरा निकाला तो माया आ गई। बाप समझाते हैं बच्चे अपने को आत्मा भाई-भाई समझो। शरीर ही नहीं तो फिर दृष्टि कहाँ जायेगी। इतनी मेहनत करनी है। कल्प-कल्प तुम्हारा ही पुरुषार्थ चलता है। पुरुषार्थ से तुम अपना भाग्य बनाते हो।
बाप बच्चों को मुख्य बात कहते हैं अपने को आत्मा समझ मुझ बाप को याद करो। यह बात तुम ही जान सकते हो। भल वह कहते हैं गॉड फादर है, हम सभी ब्रदर्स हैं। परन्तु समझते नहीं हैं। गाते भी हैं सबका सद्गति दाता राम, सबको सुख देने वाला एक ही बाप है। राम को बाबा नहीं कहेंगे। बाबा एक शरीरधारी को दूसरा अशरीरी को कहते हैं। पहले-पहले है अशरीरी फिर शरीरी बनते हैं। पहले हम बाबा के साथ रहते फिर पार्ट बजाने के लिए लौकिक देहधारी बाप के पास आते हैं। यह सब हैं रूहानी बातें। उस लौकिक जिस्मानी पढ़ाई को भूल जाना है। चक्र सारा बुद्धि में है। अभी है संगमयुग, हमको अब नई दुनिया में जाना है। पुरानी दुनिया खत्म होनी है। अब नई दुनिया में जाने के लिए दैवी गुण भी जरूर धारण करना पड़े, पावन बनना पड़े। बाप को भी जरूर याद करना पड़े और पूरा-पूरा याद करना है ताकि पाप कट जाएं। बाप कहते हैं मुझे याद करो तो पावन बनेंगे, इनको कहा जाता है योग अग्नि। बाबा की श्रीमत पर चलना है। बाकी तो सारी दुनिया रावण की मत पर चल रही है। वह है विकारी मत। यह है निर्विकारी मत। पांच विकार हैं ना। पहले-पहले है देह अहंकार फिर काम, क्रोध.. मनुष्य अहंकार को पिछाड़ी में रखते हैं। वास्तव में अहंकार तो पहले होना चाहिए। पीछे और विकार आते हैं। बाप तुम बच्चों को समझाते हैं कल्प-कल्प अनेक बार समझाया है। हर 5000 वर्ष के बाद समझाते हैं। बुद्धि से समझते हो बाबा हमको आस्तिक बनाते हैं अर्थात् रचता और रचना का नॉलेज बताते हैं इसलिए उनको क्रियेटर कहा जाता है। यूँ तो अनादि क्रियेशन है फिर भी समझाने वाला एक है, उनमें सारा ज्ञान है। है अनादि बना हुआ ड्रामा, कोई बनाता नहीं है। वह हद का ड्रामा शूट करना सहज होता है। यह तो बड़ा बेहद का ड्रामा है। यह अनादि शूट किया हुआ है, बना बनाया है। इस ड्रामा में जरा भी फ़र्क नहीं पड़ सकता। बेहद ड्रामा का चक्र चलता रहता है। हम तमोप्रधान से सतोप्रधान फिर सतोप्रधान से तमोप्रधान बनते हैं। पवित्रता की ही मुख्य बात आती है। पवित्र दुनिया में कितना सुख है, पतित दुनिया में कितना दु:ख है। आधाकल्प सुखधाम, आधाकल्प दु:खधाम यह राज़ भी तुम्हारी बुद्धि में ही है, दूसरा कोई नहीं जानते। अच्छा!
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का यादप्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।
धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) उल्टे सुल्टे संकल्पों से मुक्त होने के लिए बुद्धियोग हद बेहद से पार घर में लगाना है। दैहिक दृष्टि समाप्त करने के लिए आत्मा भाई-भाई हूँ - यह अभ्यास पक्का करना है।
2) अविनाशी ज्ञान रत्नों का दान करना है। बुद्धि को सोना (पवित्र) बनाने के लिए और सब तरफ से निकाल एक बाप से लगाना है।
वरदान:- स्वयं को बाप हवाले कर बुद्धि से भी सरेन्डर होने वाले डबल लाइट भव
अपनी जिम्मेवारी बाप को देकर, स्वयं को बाप हवाले कर दो अर्थात् अपने सब बोझ बाप को दे दो तो डबल लाइट बन जायेंगे। बुद्धि से सरेन्डर हो जाओ तो और कोई भी बात बुद्धि में नहीं आयेगी, बस सब कुछ बाप का है, सब कुछ बाप में है तो और कुछ रहा ही नहीं, जब रहा ही नहीं तो बुद्धि कहाँ जायेगी, बस एक बाप, एक ही याद का रास्ता, इस रास्ते से सहज मंजिल पर पहुंच जायेंगे।
स्लोगन:- अडोलता के तख्त पर विराजमान हो, साक्षी दृष्टा बन पार्ट बजाने वाले ही श्रेष्ठ पार्टधारी हैं।
09.02.2023 HINDI MURLI
“मीठे बच्चे - इस पुरानी दुनिया में और कोई भी आश न रख भविष्य ऊंच पद पाने के लिए सिर्फ नष्टोमोहा बनो, बाप को याद करो और पवित्र रहो''
प्रश्नः-बाप कौन सा सीधा सरल रास्ता बताते हैं, किस बात से बाप का तैलुक नहीं?
उत्तर:-बाप बच्चों को शान्तिधाम, सुखधाम चलने का सीधा-सादा रास्ता बताते - बच्चे सिर्फ बाप को याद करो और पवित्र रहो। बाकी तुम्हारे सामने कोई विपदा आती, दु:ख वा बीमारी आती, देवाला मारते.. यह सब तुम्हारे अपने ही कर्मो का हिसाब है, इनसे बाप का कोई तैलुक नहीं। बाप युक्तियां बताते हैं, कर्मबन्धन से छूटना हरेक बच्चे का काम है।
प्रश्नः-कोई-कोई बच्चे किस एक कारण से सर्विस लायक नहीं बनते?
उत्तर:-फैमिलियरिटी का हल्का नशा है, माया का अन्दर कीड़ा लगा है - इस कारण सर्विस लायक नहीं बन सकते।
गीत:- लौट गया गम का जमाना...
ओम् शान्ति। खुशी और गम। अभी तो है रावणराज्य। मनुष्य तो जानते नहीं कि रावण राज्य किसको कहा जाता है। बाप आकर बच्चों को समझाते हैं कि गम कब होता है और खुशी कब होती है। इस रावण राज्य में गम भी है तो खुशी भी है। अभी-अभी खुशी, अभी-अभी गम। बच्चा जन्मा तो खुशी, मर गया तो गम। संन्यासी भी कहते हैं - यहाँ का सुख काग विष्टा के समान है। तो जरूर कहेंगे यह गम की दुनिया है। परन्तु उन्हों को यह पता ही नहीं कि सदा सुख, जहाँ गम का नाम निशान भी न हो, वह होता ही है सतयुग में। यह तुम बच्चे अभी जानते हो कि बरोबर अभी रात है। रात दु:ख की होती है, इसको रावण की रात कहा जाता है। रावण के आने से भक्ति आरम्भ होती है। विकार आरम्भ हो जाते हैं। अभी तुम बच्चे समझते हो कि हम सदा खुशी में रहने का अभी पुरुषार्थ कर रहे हैं। बाप समझा रहे हैं कि बच्चे भविष्य ऊंच पद पाने का पुरुषार्थ करो और कोई भी आश नहीं रखनी है। बच्चों को तो यह पता ही नहीं है कि बेहद के बाप से क्या मिलता है। बाप ही आकर बताते हैं। दुनिया यह नहीं जानती कि परमात्मा से क्या मिलता है। समझते हैं दु:ख-सुख वही देता है। बाप कहते हैं मैं तो सदा सुख देने आता हूँ। तुम सिर्फ श्रीमत पर चलो। मैं तो तुमको शान्तिधाम और सुखधाम का रास्ता बताने आया हूँ। उस रास्ते पर चलना तो तुम्हारा काम है और क्या झंझट सामने आता है? झंझटों में तो सारी दुनिया है। बाप कहते हैं मैं तो सीधा-सादा रास्ता बताता हूँ। वह तो बहुत सहज है। बाकी जो विपदायें झंझट आते हैं, दु:ख आता है, बीमारी आदि होती है, देवाला मारते हैं.. यह सब है तुम्हारे कर्मो का हिसाब। सो हर एक को भोगना ही है, इनसे हमारा कोई तैलुक नहीं है। इस समय भी कोई ऐसा पाप करते हैं तो दु:ख भोगना पड़ता है। मैं तो तुमको रास्ता बताने आया हूँ। मेरा फरमान है मुझ बाप को याद करो क्योंकि वापस जाना है। बाकी लड़ाई-झगड़े में तो सारी आयु गँवाई। मैं तो सीधा रास्ता बताता हूँ कि मुझे याद करो और पवित्र रहो। कैसे रहो, यह भी युक्तियां बताते हैं। बाकी माथा मारना पुरुषार्थ करना तो तुम्हारा काम है। यह सब कर्मबन्धन तुम बच्चों का है। बाप कहते हैं गृहस्थ व्यवहार में रह पवित्र रहना है। बाप जानते हैं स्त्री का पति में, बच्चों में मोह बहुत रहता है, उनसे छुटकारा पाना, नष्टोमोहा बनना... यह तो बच्चों का काम है।
बाप तो सिर्फ दो बातें कहते हैं - अगर पूरा वर्सा लेना है तो एक पवित्र जरूर बनना है और दूसरा योग में रहना है। कोई बात में तुमसे अगर कोई लड़ते हैं तो यह हुआ तुम्हारा कर्मो का हिसाब-किताब। बाकी तुम पवित्र रहो उसके लिए गवर्मेन्ट भी रोक नहीं सकती। बाप तो रास्ता बताते हैं कि तुमको घरबार नहीं छोड़ना है। गृहस्थ व्यवहार में रहते पवित्र रहना है और योग में रहना है। मनुष्य समझते हैं पवित्र रहना बड़ा मुश्किल है क्योंकि ऐसी शिक्षा किसी ने कभी नहीं दी है। भल कितने भी ब्रह्मचारी रहते हैं परन्तु यहाँ तो कायदा है गृहस्थ व्यवहार में रहकर पवित्र रहना है। कुमारी तो पवित्र ही है, उसके लिए तो बहुत सहज है, पवित्र ही रहो। गृहस्थ में न जाओ। इसमें सिर्फ हिम्मत चाहिए। तुम कह सकती हो कि हम भारत को स्वर्ग बनाने के लिए पवित्र रहना चाहते हैं, इसमें भारत का ही कल्याण है। पवित्रता का वर्सा हमको मिल जायेगा। यह है वर्सा लेने की बात। सतयुग में थी ही पवित्र दुनिया। संगम पर जो पवित्र बनते हैं वही पवित्र दुनिया के मालिक बनेंगे। इसमें सारी दुनिया का तो प्रश्न नहीं है कि सब कैसे पवित्र बनेंगे। अभी सबकी कयामत का समय है। अब सभी को हिसाब-किताब चुक्तू कर वापिस जाना है। सब तो आकर ज्ञान लेंगे नहीं। जो सहज राजयोग सीखेंगे वह वर्सा पायेंगे। सारी दुनिया तो क्या सारा भारत भी यह ज्ञान सुन धारण नहीं कर सकता है। बाकी कोई झगड़ा है वह तो तुम बच्चों को मिटाना है योगबल से। मार उन्हें खानी पड़ती है जिन्हों का कुछ ममत्व है, नष्टोमोहा नहीं बने हैं, वह ताकत नहीं है। बाबा के पास समाचार आया कि एक गोपिका ने बहुत आंसू बहाये। परन्तु रोने से क्या होगा? बाप ने युक्तियां तो बहुत बताई है। पति को बोलो हम पवित्र रहने चाहती हैं और बाकी सब सर्विस करने के लिए तैयार हैं। युक्ति से अपने को छुड़ा सकती हैं। परन्तु पहले अपनी दिल का ममत्व टूटना चाहिए। माताओं का पति और बच्चों में बहुत मोह होता है। फिर कहती है कोई छुड़ावे। परन्तु इसमें चिल्लाने वा रोने की कोई दरकार नहीं। यह समझ की बात है। समझो कोई अच्छे आदमी की स्त्री है, बच्चे भी फर्स्टक्लास हैं, बाबा तो कहेंगे गृहस्थ व्यवहार में रहकर पवित्र रहकर दिखाओ, इस अन्तिम जन्म के लिए। तो पति को समझाकर वश करना पड़े। नहीं तो जवाब देना पड़े। परन्तु जब नष्टोमोहा बन सके तब। कोई चाहे तो एक सेकेण्ड में नष्टोमोहा हो जाए, नहीं तो जीवन भर भी न हो सके। बहुतों को छोड़ने बाद भी ममत्व नहीं मिटता फिर रग जाती रहती है, तो वह अवस्था नहीं रहती, इसलिए बाप कहते हैं पहले नष्टोमोहा हो जाओ। बाकी सिर्फ कर्म कूटते रहेंगे तो बाप क्या करेंगे? सबके लिए रास्ता एक ही है पवित्र जरूर बनना है। अगर पवित्र नहीं रहने देते तो अपने पांव पर खड़ी हो कोई न कोई सर्विस में लग जाओ। यहाँ तो साफ दिल चाहिए। ऐसे नहीं, घर छोड़कर आये फिर ब्राह्मण कुल में रह कोई न कोई से फैमिलियरिटी में फँसी रहे। ऐसे भी बहुत हैं जिनको फैमिलियरिटी का हल्का नशा रहता है। उन्हों की अवस्था नहीं चढ़ती। सर्विस लायक नहीं बनते क्योंकि अन्दर कीड़ा लगा हुआ है। माया छोड़ती नहीं है। लिखते हैं बाबा बहुत माया के तूफान लगते हैं। तो जरूर हल्का नशा आता होगा। यहाँ कमल फूल समान रहना है। मुरझाने की बात नहीं। सबको अपना-अपना कर्मबन्धन है, तो दवाई भी अपनी-अपनी है। कोई कमाई लिए पूछते हैं तो बाबा उनका पोतामेल देख राय देते हैं। कई हैं जिनका धन्धा ऐसा है कि पाप करने बिगर शरीर निर्वाह चल नहीं सकता। आजकल समय ही ऐसा हो गया है। कोई पास बहुत पैसे हैं तो पाप करने की दरकार नहीं है। बाबा कहते हैं शान्त में बैठ योग की कमाई करो परन्तु काम करने से पहले राय लेनी होती है। ऐसे नहीं काम करने के बाद बोले इस बात में फंस गया हूँ - क्या करुँ? बाबा समझाते रहते हैं, अगर धन बहुत है तो शान्त में बैठ बाबा से वर्सा लो, धन्धेधोरी का झंझट छोड़ो। कदम-कदम पर श्रीमत पर चलना जरूरी है। आपस में बहुत मीठा रहना है। नहीं तो बापदादा का नाम बदनाम करेंगे। बापदादा वा सतगुरू की निंदा कराने वाला ऊंच ठौर नहीं पायेगा। अपने हाथ में लॉ नहीं उठाना चाहिए। नहीं तो सब कहेंगे ईश्वरीय कुल के भी ऐसे बच्चे होते हैं क्या? बाप कहते हैं किसको दु:ख मत दो। सवेरे उठ बाबा को याद करो। बाबा आप कितने मीठे हो, आप हमको राजाओं का राजा स्वर्ग का मालिक बनाते हो। हम आपकी श्रीमत पर जरूर चलेंगे। हम आसुरी मत पर नहीं चलेंगे। बाप को याद नहीं करते हैं तो बाप समझ जाते हैं इनके अजुन पुराने आसुरी संस्कार हैं। यह क्या स्वर्ग का राज्य भाग्य लेंगे। अपनी चलन तो देखो। नहीं तो तुम बच्चों जैसा तकदीरवान दुनिया भर में कोई नहीं। बाप तो कहेंगे - सगे बच्चे बनो। ऐसी चलन दिखाओ जो बाप भी खुश हो। बाप को बच्चों का बहुत ख्याल रहता है कि कैसे बच्चों को दु:ख से छुड़ाए ऊंच पद प्राप्त करायें।
बाबा समझाते हैं दिन में भल गोरखधन्धा करो परन्तु ब्रह्म-महूर्त में उठ बाबा से मीठी-मीठी बातें करनी चाहिए। बाबा आपने तो कमाल किया है! 21 जन्मों के लिए स्वर्ग की बादशाही तो आप देते हो! हम तो आप पर बलिहार जाऊं। तो बलिहार जाना है, सिर्फ कहना नहीं है। जितना समय याद में रहेंगे उसका असर सारा दिन चलेगा। बहुत बी.के. हैं जो सुबह को उठते नहीं हैं, तो धारणा भी नहीं होती है। सवेरे जागने की आदत पड़ जाए फिर देखो कैसे सर्विसएबुल बन जाते हैं। जिसको सर्विस का शौक है वह कहाँ भी सर्विस करेगा। गाली तो मिलेगी। सौ में से एक निकलेगा। इसमें लज्जा नहीं होनी चाहिए। सर्विस तो जहाँ तहाँ है, सिर्फ करने वाला हो। बाबा युक्तियां तो बताते रहते हैं। नशा होना चाहिए। और सभी नशों में है नुकसान, बिगर नशे नर को नारायण बनाने के। यह नशा बाप चढ़ाते हैं। बाकी कोई के पास ज्ञान का नशा है नहीं। पतित दुनिया और पावन दुनिया का भी किसको पता नहीं है। पतित दुनिया में जरूर पतित होंगे तब जो पावन देवताओं को पूजते हैं। सतयुग, त्रेता में तो पावन महाराजा, महारानी होकर गये हैं। रावण की राजधानी शुरू होती है द्वापर से।
बच्चे जानते हैं कि शिवबाबा हमको अच्छे कर्म सिखलाते हैं और फिर पद का भी साक्षात्कार कराते हैं। यह है प्रत्यक्षफल का साक्षात्कार। तो जबकि बाप स्वयं आये हैं सिखलाने के लिए तो सीखने की कितनी उत्कण्ठा होनी चाहिए। कर्मबन्धन है सिर्फ ऐसे कहना, इसको भी कमजोरी कहा जाता है। कर्मबन्धन से छूटने की युक्तियां भी बाबा बतलाते रहते हैं। परन्तु ऐसी राय पक्के को ही दे सकते हैं, न कि कच्चे को। कई बांधेलियां भी पुरुषार्थ कर ज्ञान योगबल से पति को वश कर उनको ले आती हैं, मार भी बहुत खाती हैं। कहा जाता है ना धरत परिये धर्म ना छोड़िये। तो यह भी प्रतिज्ञा की जाती है और उस पर कायम रहना चाहिए। अमल करना चाहिए। माया बड़ी प्रबल है उन पर विजय पानी है, पूरा पुरुषार्थ करना है। ऐसे नहीं कि स्वर्ग में क्या भी पद पायें। नहीं, पुरुषार्थ ऊंच बनने का करना चाहिए। अच्छा!
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का यादप्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।
धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) अपने हाथ में लॉ नहीं उठाना है। आपस में बहुत-बहुत मीठा रहना है। किसी को भी दु:ख नहीं देना है। ब्रह्म मुहूर्त में उठ बाप से मीठी-मीठी बातें करनी है।
2) सेकेण्ड में नष्टोमोहा बनना है। पवित्र रहने की युक्ति निकालनी है। हिम्मत रखनी है। ज्ञान-योगबल से हिसाब-किताब चुक्तू करने हैं।
वरदान:- सेवा के क्षेत्र में स्व-सेवा और सर्व की सेवा का बैलेन्स रखने वाले मायाजीत भव
सर्व की सेवा के साथ-साथ पहले स्व सेवा आवश्यक है। यह बैलेन्स सदा स्व में और सेवा में उन्नति को प्राप्त कराता है इसलिए सेवा के क्षेत्र में भाग-दौड़ करते दोनों बातों का बैलेन्स रखो तो मायाजीत बन जायेंगे। बैलेन्स रखने से कमाल होती है। नहीं तो सेवा में बाह्यमुखता के कारण कमाल के बजाए अपने वा दूसरों के भाव-स्वभाव की धमाल में आ जाते हो। सेवा की भाग-दौड़ में माया बुद्धि की भाग दौड़ करा देती है।
स्लोगन:- अपनी विशेषताओं के बीज को सर्वशक्तियों के जल से सींच कर उन्हें फलदायक बनाओ।
08.02.2023 HINDI MURLI
“मीठे बच्चे - तुम ब्राह्मण ही गॉडली स्टूडेन्ट हो, तुम्हें बाप ने रचता और रचना का ज्ञान देकर मास्टर जानी-जाननहार बनाया है, अभी तुम सब कुछ जान जाते हो''
प्रश्नः- दूसरों को समझाने की फलक किन बच्चों में रहेगी?
उत्तर:- जिनके पास ज्ञान की पूँजी है। जो स्वयं हर बात को समझकर धारण करते हैं वही दूसरों को फ़लक से समझा सकते हैं। तुम्हें फ़लक से सबको बाप का परिचय दे उनसे वर्सा लेने की विधि बतानी है।
गीत:- तकदीर जगाकर आई हूँ...
ओम् शान्ति। वास्तव में यह गीत गाने की जरूरत नहीं है। परन्तु बहलाने के लिए यह आवाज करना पड़ता है। वास्तव में आत्मा को आवाज करने की दरकार नहीं। आत्मा तो आवाज से परे निर्वाणधाम जाने चाहती है। बहुत बाजे गाजे तालियां आदि सुनकर आत्मा थकी हुई है इसलिए अब बाप को याद करती है - हे भगवान मुझे ले जाओ। बच्चे जानते हैं यह बाप हमको समझा रहे हैं। जैसे घर में बाप और दादा दोनों बच्चे-बच्चे कहते हैं। दादा ऐसे नहीं कहेंगे कि पोत्रे इधर आओ। दोनों ही कहेंगे बच्चे इधर आओ। यहाँ तो बाप और दादा, साकार और निराकार दोनों इकट्ठे हैं। वास्तव में सभी मनुष्य-मात्र का यह बाप और दादा है। तो जरूर परमपिता परमात्मा को सृष्टि रचने आना पड़े। तुम्हारा नाम बहुत अच्छा रखा हुआ है - ब्रह्माकुमार कुमारियां। आबू में भी अधर देवी और कुंवारी कन्या के मन्दिर हैं। तो एक कन्या तो नहीं होगी ना, जरूर बहुत होंगे। दोनों का अलग-अलग मन्दिर है। अधरकुमारी किसको कहा जाता है, कुंवारी कन्या किसको कहा जाता है - यह तो तुम ही जानते हो। यह है शिव शक्तियां। अन्दर बहुत बड़ा मन्दिर बना हुआ है। बहुत कोठरियां हैं तो मन्दिर भी साक्षी देता है कि कुमारियां और अधर-कुमारियां बहुत हैं। चित्र जो बनाते हैं वह भी यादगार है, जो होकर गये हैं। जैसे देवी देवताओं के चित्र हैं, जरूर होकर गये हैं। वे विश्व के मालिक थे। अब नहीं हैं। विश्व के रचता ने ही भारत को विश्व का मालिक बनाया। कैसे? सो अब प्रैक्टिकल बन रहे हैं। अभी कलियुग है। सतयुग है एक आदि सनातन देवी देवता धर्म। कलियुग में अनेक धर्म और अनेक प्रजा का राज्य है। तुम बच्चे जब सुनते हो तो समझते हो बाबा यथार्थ रीति ठीक समझाते हैं। परन्तु कोई कारणवश हमको धारणा नहीं होती है इसलिए औरों को भी धारणा नहीं करा सकते हैं। कोई न कोई विघ्न है। हम डल स्टूडेन्ट हैं। बाकी बाप तो बहुत अच्छी रीति समझाते हैं। अनेक मनुष्य, अनेक धर्म हैं। 5000 वर्ष पहले भारत स्वर्ग था। बहुत थोड़े मनुष्य थे। सिर्फ सूर्यवंशी और चन्द्रवंशी वह आत्मायें परमधाम से आई थी, अपना पार्ट बजाने। बाकी सभी धर्मों की आत्मायें निर्वाणधाम में थी। अभी अनेक धर्म हैं बाकी देवी-देवता धर्म प्राय:लोप है, तो जरूर फिर सतयुग बनेगा। परमपिता परमात्मा को ही आकर स्वर्ग रचना पड़े। भक्त जो भगवान को याद करते हैं तो उन्हों को भक्ति का फल देने के लिए भी यहाँ आना पड़ेगा। बाकी सबको वापिस मुक्तिधाम ले जाना होता है। और तो कोई वापिस ले जा नहीं सकता। अगर एक भी गुरू गति सद्गति का रास्ता जानता होता तो फिर उनके पिछाड़ी लाखों शिष्य भी जाते। उन यात्राओं में तो जाकर फिर लौट आते हैं। परन्तु मुक्तिधाम से फिर वापिस आये ही क्यों? एक को रास्ता मिले तो सबको ले जाएं। अब एक बाप आया है तो तुम सबको रास्ता मिलता है ना। सभी को दु:ख की दुनिया से छुड़ाते हैं, इसलिए उनको लिब्रेटर कहते हैं। उस निराकार को आने लिए शरीर चाहिए। तो नई दुनिया को रचने लिए प्रजापिता भी चाहिए। रचना यहाँ रचनी है। तो ब्रह्मा भी यहाँ का मनुष्य चाहिए। सूक्ष्मवतन से उतर नीचे तो नहीं आयेगा। कहते भी हैं अभी ब्रह्मा की रात है, तो ब्रह्मा मुख वंशावली की भी रात है। अब अन्त में बाप आये हैं दिन करने। ब्रह्मा की रात पूरी होती है तो बी.के. की रात भी पूरी होती है। प्रजापिता ब्रह्मा तो ठीक है। वास्तव में सभी मनुष्य आत्माओं का बाप परमात्मा को कहा जाता है। सभी उनको गॉड फादर परमपिता परमात्मा कहते हैं। सेन्सीबुल मनुष्य जब गॉड फादर कहते हैं तो कोई मनुष्य को याद नहीं करते। कोई तो कहते हैं वह ज्योति स्वरूप है, ब्रह्म है। ब्रह्मा विष्णु शंकर को तो ब्रह्म नहीं कहेंगे। तो पहले-पहले परिचय देना है अपना कि हम बी.के. हैं। ब्रह्मा को भी परमपिता परमात्मा रचते हैं फिर ब्रह्मा मुख से ब्राह्मणों को रचा। प्रजापिता है तो जरूर बहुत सन्तान होंगी। इस रीति सिजरा बढ़ता जाता है। ब्राह्मणों का वर्ण बदल सतयुगी देवता बनते हैं क्योंकि बाप बैठ ब्राह्मणों को राजयोग सिखलाते हैं। बाप कहते हैं तुम मेरे द्वारा मुझे और मेरी रचना को जानने से सब कुछ जान जाते हो। बाकी कुछ जानने के लिए नहीं रहता। इतना बड़ा इम्तहान पास कर लेते हो अर्थात् मास्टर जानी जाननहार बन गये। गॉडली स्टूडेन्ट सिर्फ ब्राह्मण ही होते हैं। देवतायें, वैश्य वा शूद्र कोई भी गॉडली स्टूडेन्ट नहीं होते हैं। भगवानुवाच होता ही ब्राह्मणों प्रति है। अगर कृष्ण भगवानुवाच हो तो भी किन्हों प्रति? जरूर ब्राह्मण चाहिए। तो प्रजापिता द्वारा ब्राह्मण रचते हैं। रूद्र ज्ञान यज्ञ भी ब्रह्मा ही रचते हैं। कृष्ण ज्ञान यज्ञ तो कभी नहीं कहते। तो पहले-पहले समझाना है कि हमको पढ़ाने वाला स्वयं परमपिता परमात्मा है जो ही ज्ञान सागर है। वही हमारा बाप टीचर सतगुरू है, फिर इसमें कोई उल्टा सुल्टा प्रश्न उठाने की दरकार ही नहीं। इतने ढेर बी.के. हैं कोई एक दो नहीं हैं। पहले-पहले पढ़ाना ही अल्फ है। अल्फ बिगर मनुष्य कुछ भी जान नहीं सकते। उन्हों को समझाना चाहिए कि परमपिता परमात्मा शिव ब्रह्मा मुख द्वारा ब्राह्मण रच रहे हैं। अकेला ब्रह्मा तो रचता नहीं है। यह प्वाइंट्स धारण करने की हैं। बाबा के पास ज्ञान है तो तुमको डिलेवरी करते हैं। तुम हो ज्ञान गंगायें। सागर तो एक ही है। यह ब्रह्मा भी ज्ञान कण्ठ करते हैं, तो यह भी ज्ञान गंगा हुई। ज्ञान कण्ठ करने वाले को ज्ञान गंगा कहा जाता है। उसमें मेल फीमेल दोनों आ जाते हैं। ज्ञान सागर तो एक ही बाप है। यहाँ देखो पानी के सागर को तो टुकड़ा-टुकड़ा कर दिया है। सतयुग में जब एक ही सूर्यवंशी राजाई थी तो सागर के टुकड़े नहीं थे। कहाँ भी जाकर सैर कर आते थे। वहाँ कोई कह न सके कि मेरी हद में न आओ अथवा पानी न लो। यहाँ तो एक दो का पानी ही बन्द कर देते हैं। कितने टुकड़े हो गये हैं। अब हम एक ही सचखण्ड स्वर्ग की स्थापना कर रहे हैं। बाप का भी विचार सागर मंथन होता है तब तो समझाते हैं। ब्रह्मा भी कहेंगे सभी जीव आत्मायें हमारे बच्चे हैं। आदि देव अथवा आदम सभी का बाप है। ऐसे नहीं उस समय कोई मनुष्य नहीं थे फिर आदम ने आदमी पैदा किये। नहीं, निराकार बाप को पहले जरूर आदम में आना पड़े तब तो मुख वंशावली रचे। बाकी ऐसे नहीं कोई मुख से निकल आये वा नासिका या पवन से पैदा हुए। यह सब हैं भक्ति की बातें। मनुष्य तो कच्छ-मच्छ को भी पूजते रहते हैं। तो पहली-पहली बात है कि आत्माओं का बाप कौन है? वह जरूर स्वर्ग रचता होगा। अब तो नर्क है। अभी हम स्वर्ग के लिए राजयोग सीख रहे हैं, परमपिता परमात्मा द्वारा। ब्रह्मा भी उन द्वारा पढ़ रहे हैं। परमपिता परमात्मा सभी आत्माओं का बाप है। ब्रह्मा जीव आत्माओं का बाप है। हम उनकी मुख वंशावली ब्रह्माकुमार और ब्रह्माकुमारियां हैं। हमको ज्ञान फिर भी ज्ञान सागर बाप ही देते हैं। हम श्रीमत पर चलते हैं, वह तो नामीग्रामी है। ब्रह्मा की मत मशहूर है। ऐसे कभी नहीं कहा जाता कि विष्णु भी उतर आये तो भी तुम नहीं मानेंगे। यह ब्रह्मा के लिए ही कहा जाता है। उनको ज्ञान देता है शिव। तुम भी श्रीमत पर चल श्रेष्ठ बनते हो। बाप समझाते हैं कि मैं आकर देवता धर्म की स्थापना करता हूँ। यह जो आर्य समाजी इतनी खिटपिट करते हैं उनको बोलो तुम देवताओं को तो मानते नहीं हो, उनको खण्डन करने वाले हो। हम हैं देवी-देवता धर्म के। तुम्हारा धर्म अलग, देवी-देवता धर्म अलग है। हरेक को फ्रीडम है अपने धर्म में कुछ भी करे। मुसलमानों का धर्म अलग है। वह बहुत डिबेट करते हैं कि तुम ऐसे क्यों करते हो। वैसे हमारा धर्म आदि सनातन देवी-देवता धर्म है, उसका ही प्रचार करते हैं। तुम इन्टरफियर क्यों करते हो? उन्हों को भी युक्ति से समझाना है। उनसे डिस्कश करने की जरूरत नहीं। उससे वह समझेंगे नहीं। जो भी कोई आये तो बाप का परिचय दो। हम बाप से वर्सा ले रहे हैं। तुमको भी लेना हो तो आओ। बाप अमरलोक स्थापन कर रहा है इसलिए तुमको पावन जरूर बनना पड़े। बाप कहते हैं इस रावण पर जीत जरूर पानी है। हम शक्ति सेना जीत पा रही हैं। हमारा उस्ताद कैसे हमको जीत पाना सिखला रहे हैं, सो आओ तो हम तुमको समझायें। अगर तुमको जीत पानी है तो तुम भी शक्तिदल में शामिल हो जाओ। बाकी फालतू बातें मत करो। परन्तु यह फ़लक से कह वही सकेंगे जिनके पास ज्ञान की पूँजी होगी। अच्छा!
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का यादप्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।
धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) ज्ञान को कण्ठ कर मास्टर ज्ञान सागर अथवा ज्ञान गंगा बन पतितों को पावन बनाने की सेवा करनी है।
2) हर एक को बहुत युक्ति से समझाना है, किसी से भी डिसकस नहीं करनी है। सबको बाप का परिचय देना है।
वरदान:- प्युरिटी की पर्सनैलिटी और रॉयल्टी द्वारा बाप के समीप आने वाले देही-अभिमानी भव
जैसे शरीर की पर्सनैलिटी आत्माओं को देहभान में लाती है, ऐसे प्युरिटी की पर्सनैलिटी देही-अभिमानी बनाए बाप के समीप लाती है। प्युरिटी की पर्सनैलिटी आत्माओं को प्युरिटी की तरफ आकर्षित करती है, प्युरिटी की रॉयल्टी धर्मराजपुरी की रॉयल्टी देने से छुड़ा देती है। इसी रायॅल्टी अनुसार भविष्य रायॅल फैमली में आ सकेंगे। देही-अभिमानी बच्चे इस पर्सनैलिटी द्वारा बाप का साक्षात्कार कराने वाले रूहानी दर्पण बन जाते हैं।
स्लोगन:- हरेक की विशेषता को देखने का चश्मा सदा लगा रहे तो विशेष आत्मा बन जायेंगे।
मातेश्वरी जी के अनमोल महावाक्य
1) अपना यह जो ईश्वरीय सतसंग है, कॉमन सतसंग नहीं है। यह है ईश्वरीय स्कूल, कॉलेज। जिस कॉलेज में अपने को रेग्युलर स्टडी करनी है, बाकी तो सिर्फ सतसंग करना, थोड़ा समय वहाँ सुना फिर तो जैसा है वैसा ही बन जाता है क्योंकि वहाँ कोई रेग्युलर पढ़ाई नहीं मिलती है, जहाँ से कोई प्रालब्ध बनें इसलिए अपना सतसंग कोई कॉमन सतसंग नहीं है। अपना तो ईश्वरीय कॉलेज है, जहाँ परमात्मा बैठ हमें पढ़ाता है और हम उस पढ़ाई को पूरी धारण कर ऊंच पद को प्राप्त करते हैं। जैसे रोज़ाना स्कूल में मास्टर पढ़ाए डिग्री देता है वैसे यहाँ भी स्वयं परमात्मा गुरू, पिता, टीचर के रूप में हमको पढ़ाए सर्वोत्तम देवी देवता पद प्राप्त कराते हैं इसलिए इस स्कूल में ज्वाइन्ट होना जरूरी है। यहाँ आने वाले को यह नॉलेज समझना जरूर है, यहाँ कौनसी शिक्षा मिलती है, इस शिक्षा को लेने से हमको क्या प्राप्ति होगी! हम तो जान चुके हैं कि हमको खुद परमात्मा आकर डिग्री पास कराते हैं और फिर एक ही जन्म में सारा कोर्स पूरा करना है। तो जो शुरू से लेकर अन्त तक इस ज्ञान के कोर्स को पूरी रीति उठाते हैं वो फुल पास होंगे, बाकी जो कोर्स के बीच में आयेंगे वो तो इतनी नॉलेज को उठायेंगे नहीं, उन्हों को क्या पता आगे का कोर्स क्या चला? इसलिए यहाँ रेग्युलर पढ़ना है, इस नॉलेज को जानने से ही आगे बढ़ेंगे इसलिए रेग्युलर स्टडी करनी है।
2) भगवानुवाच बच्चों के प्रति बच्चे, जब परमात्मा खुद इस सृष्टि पर उतरा हुआ है, तो उस परमात्मा को हमें पक्का हाथ देना है लेकिन पक्का सच्चा बच्चा ही बाबा को हाथ दे सकता है। इस बाप का हाथ कभी नहीं छोड़ना अगर छोड़ेंगे तो फिर निधण का बन कहाँ जायेंगे! जब परमात्मा का हाथ पकड़ लिया तो फिर सूक्ष्म में यह संकल्प नहीं चाहिए कि मैं छोड़ दूँ वा संशय नहीं होना चाहिए। पता नहीं हम पार करेंगे वा नहीं, कोई ऐसे भी बच्चे होते हैं जो पिता को न पहचानने के कारण पिता के भी सामने पड़ते हैं और ऐसे भी कह देते हैं हमको कोई की भी परवाह नहीं है। अगर ऐसा ख्याल आया तो ऐसे न लायक बच्चे की सम्भाल पिता कैसे करेगा फिर तो मानो कि गिरा कि गिरा क्योंकि माया तो गिराने की बहुत कोशिश करती है क्योंकि परीक्षा तो अवश्य लेगी कि कितने तक योद्धा रूसतम पहलवान है! अब यह भी जरूरी है, जितना जितना हम प्रभु के साथ रूसतम बनते जायेंगे उतना माया भी रूसतम बन हमको गिराने की कोशिश करेगी। जोड़ी पूरी बनेगी जितना प्रभु बलवान है तो माया भी उतनी बलवानी दिखलायेगी, परन्तु अपने को तो पक्का निश्चय है आखरीन भी परमात्मा महान बलवान है, आखरीन उनकी जीत है। श्वांसो श्वांस इस विश्वास में स्थित होना है, माया को अपनी बलवानी दिखलानी है, वह प्रभु के आगे अपनी कमजोरी नहीं दिखायेगी, बस एक बारी भी कमजोर बना तो खलास हुआ इसलिए भल माया अपना फोर्स दिखलाये, परन्तु अपने को मायापति का हाथ नहीं छोड़ना है, वो हाथ पूरा पकड़ा तो मानो उनकी विजय है, जब परमात्मा हमारा मालिक है तो हाथ छोड़ने का संकल्प नहीं आना चाहिए। अगर हाथ छोड़ा तो बड़ा मूर्ख ठहरा इसलिए परमात्मा कहता है, बच्चे जब मैं खुद समर्थ हूँ, तो मेरे साथ होते तुम्हें भी समर्थ अवश्य बनना है। समझा, बच्चे। अच्छा। ओम् शान्ति।
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07.02.2023 HINDI MURL i
“मीठे बच्चे - इस समय तुम्हें निराकारी मत मिल रही है, गीता शास्त्र निराकारी मत का शास्त्र है, साकारी मत का नहीं, यह बात सिद्ध करो''
प्रश्नः- कौन सी गुह्य बात बड़ी युक्ति से फर्स्टक्लास बच्चे ही समझा सकते हैं?
उत्तर:- यह ब्रह्मा ही श्रीकृष्ण बनते हैं। ब्रह्मा को प्रजापिता कहेंगे श्रीकृष्ण को नहीं। निराकार भगवान ने ब्रह्मा मुख से ब्राह्मण रचे हैं। श्रीकृष्ण तो छोटा बच्चा है। गीता का भगवान निराकार परमात्मा है। श्रीकृष्ण की आत्मा ने पुरुषार्थ करके यह प्रालब्ध पाई। यह बहुत गुह्य बात है - जो फर्स्टक्लास बच्चे ही युक्ति से समझा सकते हैं। 20 नाखून का जोर देकर यह बात सिद्ध करो तब सर्विस की सफलता होगी।
गीत:- कौन आया मेरे मन के द्वारे...
ओम् शान्ति। बच्चों ने सुना यह आंख नहीं जान सकती है, किसको? भगवान को। यह आंखे श्रीकृष्ण को तो जान सकती हैं। बाकी भगवान को नहीं जान सकती। आत्मा ही परमात्मा को जान सकती है। आत्मा मानती है कि हमारा परमपिता परमात्मा निराकार है। निराकार होने कारण, इन आंखों से न देखने कारण इतनी याद नहीं ठहरती। यह निराकार बाप निराकारी बच्चों (आत्माओं) को कहते हैं। तुमको निराकारी मत मिलती है। गीता शास्त्र है ही निराकारी मत का। साकारी मत का नहीं है। गीता धर्मशास्त्र है ना। इस्लामियों आदि का भी धर्म शास्त्र है। इब्राहिम ने उच्चारा, बुद्ध ने, क्राइस्ट ने उच्चारा। उन्हों के तो चित्र हैं। गीता जो सर्व शास्त्रमई शिरोमणी है, उसके लिए मनुष्यों ने श्रीकृष्ण का चित्र दिखा दिया है। परन्तु बाप समझाते हैं यह रांग है। गीता मैंने उच्चारी, मैंने राजयोग सिखलाया और स्वर्ग की स्थापना की है। मैं हूँ निराकार परमपिता परमात्मा। मैं तुम सर्व आत्माओं का बाप मनुष्य सृष्टि का बीजरूप हूँ। मुझे ही वृक्षपति कहा जाता है। श्रीकृष्ण को वृक्षपति नहीं कहेंगे। परमपिता परमात्मा ही मनुष्य सृष्टि का बीजरूप, क्रियेटर है। श्रीकृष्ण को क्रियेटर नहीं कहेंगे। वह तो सिर्फ दैवी गुण वाला मनुष्य है। भगवान है एक। श्रीकृष्ण को कोई सभी का परमात्मा नहीं कह सकते। बाप कहते हैं मैं 5 हजार वर्ष के बाद कल्प के संगम पर आता हूँ। मैं सारे सृष्टि का बाप हूँ, मुझे ही गॉड फादर कहते हैं। श्रीकृष्ण का नाम देने से परमपिता परमात्मा को जान नहीं सकते। यही बड़ी भारी भूल कर दी है। गीता द्वारा आदि सनातन देवी-देवता धर्म मैंने ही स्थापन किया है। मुझे शिव वा रूद्र भगवान कहा जाता है और कोई भी सूक्ष्म देवता को वा मनुष्य को भगवान नहीं कहा जाता। लक्ष्मी-नारायण आदि कोई को भी परमात्मा नहीं कहा जाता है। कहा जाता है परमात्मा एक है। भगवानुवाच भी है तो जरूर भगवान आया होगा और आकरके राजयोग सिखाया है। बाप कहते हैं कल्प पहले भी मैंने तुम बच्चों को कहा था। श्रीकृष्ण कभी भी बच्चे-बच्चे नहीं कह सकते। परमपिता परमात्मा ही सबको बच्चे कहते हैं। कल्प पहले भी मैंने तुम बच्चों को कहा था कि देही-अभिमानी बनो, मुझ निराकार को अपना बाप भगवान समझो। साकारी बाप प्रजापिता ब्रह्मा ठहरा क्योंकि ब्रह्मा द्वारा ही भगवान ने ब्राह्मण ब्राह्मणियां रचे हैं। श्रीकृष्ण प्रजापिता नहीं है। भगवान कहते हैं मैं ब्रह्मा मुख द्वारा ब्राह्मण ब्राह्मणियां रचता हूँ। यह ब्रह्मा ही श्रीकृष्ण बनता है, यह कितनी गुह्य बात है। यह समझाने में बड़ी युक्ति चाहिए। फर्स्टक्लास बच्चियां ही समझा सकेंगी। बाप कहते हैं बहुत अच्छा बच्चा वा बच्ची हो जो सिद्ध करे कि गीता का भगवान निराकार परमात्मा है। जिसने गीता रची उसने ही बच्चों को राजयोग सिखाया और स्वर्ग रचा। जरूर ऊंचे ते ऊंचा बाप ही राजयोग सिखायेगा। श्रीकृष्ण ने तो प्रालब्ध पाई है। प्रालब्ध देने वाला है परमपिता परमात्मा। श्रीकृष्ण है उनका बच्चा। श्रीकृष्ण की आत्मा ने पुरुषार्थ किया और प्रालब्ध पाई। पुरुषार्थ कराने वाले को उड़ाकर, पुरुषार्थ कर प्रालब्ध पाने वाले का नाम रख गीता को खण्डन कर दिया है।
सर्विस को बढ़ाने के लिए बच्चों को 20 नाखून का जोर देना चाहिए। गीता किसने उच्चारी? गीता द्वारा कौन सा धर्म किसने स्थापन किया? इस ही बात से तुम अच्छी रीति जीत पहन सकते हो। परमपिता परमात्मा द्वारा स्वर्ग के मालिक बनते हैं, ना कि श्रीकृष्ण द्वारा। तो इस बात पर मेहनत करनी है। सब शास्त्र हैं गीता के बच्चे। तो बच्चों से कभी वर्सा मिल नहीं सकता। वर्सा तो जरूर बाप ही देंगे। काका, चाचा, मामा, गुरू आदि कोई से भी वर्सा नहीं मिलता है। बेहद के बाप से ही बेहद का वर्सा मिलता है। यह लिखत ऐसी साफ कर लिखनी है कि समझ जायें तो बरोबर गीता खण्डन की है। गीता को डिफेम किया है, इसलिए भारत कंगाल बन गया है। कौड़ी तुल्य बन गया है। ऐसी लिखत लिखो। भारत को स्वर्ग बनाने वाला कौन है? स्वर्ग कहाँ है? कलियुग के बाद सतयुग होगा तो उनकी स्थापना जरूर संगम पर होनी चाहिए। शिव भगवानुवाच - मैं कल्प-कल्प संगम पर पावन दुनिया बनाने आता हूँ। ऐसे सिद्ध करो जो समझें कि शिव परमात्मा ही सबको दु:खों से लिबरेट करते हैं, न कि श्रीकृष्ण। गीता के भगवान को जो समझ जायेंगे वही आकर फूल चढ़ायेंगे। सभी नहीं चढ़ायेंगे, जो समझ गये वह फूल बन बलि चढ़ जायेंगे। बाबा को कोई फूल देते हैं तो बाबा कहते हैं मुझे ऐसे फूल (बच्चे) चाहिए। कांटे मेरे पर बलि चढ़ें तो मैं उनको फूल बनाऊं। बबुलनाथ भी मेरा नाम है। बबुल के कांटों को फूल बनाने वाला मुझे ही कहते हैं, श्रीकृष्ण तो स्वयं फूल है। वह है गार्डन ऑफ अल्लाह, यह है डेविल फारेस्ट। इनको फिर डीटी गार्डन बाप बनाता है। तुम ही नई दुनिया के मालिक बनते हो। लक्ष्मी-नारायण की डीटी डिनायस्टी कही गई है। ब्राह्मण कुल की डिनायस्टी नहीं कहेंगे। यह ब्राह्मण कुल है। परमपिता परमात्मा ने ब्रह्मा द्वारा प्रजा रची है, इसलिए इनको प्रजापिता कहा जाता है। शिवबाबा को वा श्रीकृष्ण को प्रजापिता नहीं कहेंगे। यह तो कृष्ण पर कलंक लगाये हैं कि 16108 रानियां थी। यह तो प्रजापिता ब्रह्मा ने इतने बच्चे और बच्चियां पैदा की हैं।
ज्ञान का सागर है ही एक परमपिता परमात्मा। पाप का दण्ड धर्मराज देते हैं। प्रेजीडेन्ट को भी बड़े से बड़ा जज कसम देंगे। राजा से कभी कसम नहीं उठवाया जाता है क्योंकि उन्हें राजा बनाता है भगवान। वह है अल्पकाल के लिए। यहाँ तो बाप 21 जन्मों के लिए राज्य-भाग्य देते हैं। वहाँ कसम उठाने की बात नहीं है। यह मनुष्य सृष्टि रूपी वृक्ष है, कोई जंगली वृक्ष नहीं है। परमपिता परमात्मा को वृक्षपति कहा जाता है। श्रीकृष्ण इस वृक्ष का राज़ नहीं बता सकते, वृक्षपति ही समझा सकते हैं। नर से नारायण तो बाप ही बनायेगा, न कि श्रीकृष्ण। मुख्य धर्म शास्त्र हैं 4, बाकी सब हैं दन्त कथायें। पहला-पहला धर्म कौन सा स्थापन हुआ और किसके द्वारा? स्वर्ग में था देवी-देवता धर्म, तो जरूर वह बाप ही रचेगा। बाप पुरानी दुनिया से लिबरेट करते हैं क्योंकि दु:ख बहुत है। त्राहि-त्राहि करते हैं। बाप से स्वर्ग का वर्सा लेना है तो अभी लो। साधारण आदमी कोई वर्सा दे नहीं सकता। बच्चों को सर्व प्राप्ति कराने वाला है ही बाप। बेहद का बाप ही स्वर्ग का मालिक बनाते हैं। ऐसी-ऐसी टैम्पटेशन देनी है। जैसे शिकारी लोग कोई से शिकार कराते हैं तो सारी तैयारी कर शिकार सामने लाकर सिर्फ उनसे शिकार कराते हैं। यहाँ शिकार कराना है माताओं से। बाप कहते हैं शिकार माताओं के आगे ले आना है। मातायें बहुत हैं। नाम एक का बाला हो जाता है। तुम शक्ति सेना हो। शक्ति डिनायस्टी नहीं कहेंगे। शक्ति सेना की मुख्य है जगदम्बा, काली, सरस्वती। बाकी चण्डिका आदि उल्टे नाम भी बहुत रख दिये हैं। तो तुम बच्चों को ऐसी बातों पर क्लीयर करना है कि ऊंचे ते ऊंचा भगवान फिर ब्रह्मा विष्णु शंकर। प्रजापिता ब्रह्मा की बेटी है सरस्वती। उनको गॉडेज ऑफ नॉलेज कहते हैं। तो जरूर उनके बच्चों को भी गॉडेज ऑफ नॉलेज कहेंगे। अन्त में विजय तो तुम्हारी होने वाली है। कोई-कोई गीता से वेदों का मान ज्यादा रखते हैं। तो भी गीता का प्रचार ज्यादा है। बाप कहते हैं मैं आता हूँ संगमयुग पर। श्रीकृष्ण का चित्र है ही सतयुग का। फिर 84 जन्मों में रूप बदलता जाता है। ज्ञानी तू आत्मा तब बन सकते हैं जब परमपिता परमात्मा आकर आत्मा का ज्ञान देवे। परमपिता परमात्मा है ज्ञान का सागर। उन द्वारा तुम ज्ञानी तू आत्मा बनते हो। बाकी सब हैं भक्त तू आत्मा। बाप कहते हैं मुझे ज्ञानी तू आत्मा प्रिय लगते हैं। महिमा सारी गीता की है। ध्यानी से ज्ञानी श्रेष्ठ हैं। ध्यान ट्रांस को कहा जाता है। यह तो बाप से योग लगाना है। ध्यान में जाने से कोई भी फ़ायदा नहीं है।
बाप कहते हैं मैंने राजयोग सिखाया था। श्रीकृष्ण को यह प्रालब्ध मैंने ही दी थी। जरूर अगले जन्म में पुरुषार्थ किया होगा। सारी सूर्यवंशी राजधानी ने मेरे द्वारा ही प्रालब्ध पाई है। देलवाड़ा मन्दिर का कान्ट्रास्ट भी ऐसे लिखो जो पढ़ने से ही मनुष्यों को झट तीर लग जाये। फार्म भी भराना है कि बेहद का बाप ज्ञान का सागर है, बहुत मीठा है, हमको राजयोग सिखलाता है। उस सतगुरु बिगर है घोर अन्धियारा। ऐसे बाप की महिमा करने से बुद्धि में लव आयेगा। बाप सम्मुख आकर जन्म दे तब तो लव होगा ना। तुमको जन्म दिया है तब तो लव हुआ है। बाप कहने से ही स्वर्ग याद आता है। बाबा स्वर्ग की स्थापना करते हैं। हम उनसे वर्सा ले रहे हैं। विश्वास करो या न करो। बेहद का बाप तो सभी का बाप है, उनसे जरूर स्वर्ग का वर्सा मिलेगा। बाप है ही नई दुनिया का रचयिता। तो जरूर नई दुनिया का वर्सा देगा। अच्छा।
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का यादप्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।
धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) बाप का प्रिय बनने के लिए बुद्धि में ज्ञान को धारण कर ज्ञानी तू आत्मा बनना है। बाप से योग लगाना है। ध्यान की आश नहीं रखनी है।
2) माताओं को आगे रख उनका नाम बढ़ाना है। अथॉरिटी से गीता के भगवान को सिद्ध करना है। 20 नाखून के जोर से सर्विस को बढ़ाना है।
वरदान:- श्रेष्ठ जीवन की स्मृति द्वारा विशाल स्टेज पर विशेष पार्ट बजाने वाले हीरो पार्टधारी भव
ब्रह्मा बाप ने आप बच्चों को दिव्य जन्म देते ही - पवित्र भव योगी भव का वरदान दिया। जन्मते ही बड़ी माँ के रूप में पवित्रता के प्यार से पालना की। सदा खुशियों के झूले में झुलाया, सर्वगुण मूर्त, ज्ञान मूर्त, सुख-शान्ति स्वरूप बनने की हर रोज़ लोरी दी, ऐसे मात-पिता के श्रेष्ठ बच्चे ब्रह्माकुमार कुमारी हैं, इस जीवन के महत्व को स्मृति में रख विश्व की विशाल स्टेज पर विशेष पार्ट, हीरो पार्ट बजाओ।
स्लोगन:- बिन्दू शब्द के महत्व को जान बिन्दू बन, बिन्दू बाप को याद करना ही योगी बनना है।
05.02.2023 HINDI MURLI
एकाग्रता की शक्ति से दृढ़ता द्वारा सहज सफलता की प्राप्ति
आज ब्राह्मण संसार के रचता अपने चारों ओर के ब्राह्मण परिवार को देख हर्षित हो रहे हैं। ये छोटा-सा न्यारा और अति प्यारा अलौकिक ब्राह्मण संसार है। सारे ड्रामा में अति श्रेष्ठ संसार है क्योंकि ब्राह्मण संसार की हर गति-विधि न्यारी और विशेष है। इस ब्राह्मण संसार में ब्राह्मण आत्मायें भी विश्व में से विशेष आत्मायें हैं इसलिये ही ये विशेष आत्माओं का संसार है। हर ब्राह्मण आत्मा की श्रेष्ठ वृत्ति, श्रेष्ठ दृष्टि और श्रेष्ठ कृति विश्व की सर्व आत्माओं के लिये श्रेष्ठ बनाने के निमित्त है। हर आत्मा के ऊपर ये विशेष जिम्मेवारी है तो हर एक अपने इस ज़िम्मेवारी को अनुभव करते हो? कितनी बड़ी जिम्मेवारी है! सारे विश्व का परिवर्तन! न स़िर्फ आत्माओं का परिवर्तन करते हो लेकिन प्रकृति का भी परिवर्तन करते हो। ये स्मृति सदा रहे इसमें नम्बरवार हैं। सभी ब्राह्मण आत्माओं के अन्दर संकल्प सदा रहता है कि हम विशेष आत्मा नम्बरवन बनें लेकिन संकल्प और कर्म में अन्तर पड़ जाता है। इसका कारण? कर्म के समय सदा अपनी स्मृति को अनुभवी स्थिति में नहीं लाते। सुनना, जानना, ये दोनों याद रहता है लेकिन स्वयं को उस स्थिति में मानकर चलना, इसमें मैजारिटी कभी अनुभवी और कभी स़िर्फ मानने और जानने वाले बन जाते हैं। इस अनुभव को बढ़ाने के लिये दो बातों के विशेष महत्व को जानो। एक स्वयं के महत्व को, दूसरा समय के महत्व को। स्वयं के प्रति बहुत जानते हो। अगर किसी से भी पूछेंगे कि आप कौन-सी आत्मा हो? वा अपने से भी पूछेंगे कि मैं कौन? तो कितनी बातें स्मृति में आयेंगी? एक मिनट के अन्दर अपने कितने स्वमान याद आ जाते हैं? एक मिनट में कितने याद आते हैं? बहुत याद आते हैं ना। कितनी लम्बी लिस्ट है स्वयं के महत्व की! तो जानने में तो बहुत होशियार हो। सभी होशियार हो ना? फिर अनुभव करने में अन्तर क्यों पड़ जाता है? क्योंकि समय पर उस स्थिति के सीट पर सेट नहीं होते हो। अगर सीट पर सेट है तो कोई भी, चाहे कमजोर संस्कार, चाहे कोई आत्मायें, चाहे प्रकृति, चाहे किसी भी प्रकार की रॉयल माया अपसेट नहीं कर सकती। जैसे शरीर के रूप में भी बहुत आत्माओं को एक सीट पर वा स्थान पर एकाग्र होकर बैठने का अभ्यास नहीं होता तो वह क्या करेगा? हिलता रहेगा ना। ऐसे मन और बुद्धि को किसी भी अनुभव के सीट पर सेट होना नहीं आता तो अभी-अभी सेट होगा, अभी-अभी अपसेट। शरीर को बिठाने के लिये स्थूल स्थान होता है और मन-बुद्धि को बिठाने के लिये श्रेष्ठ स्थितियों का स्थान है। तो बापदादा बच्चों का यह खेल देखते रहते हैं अभी-अभी अच्छी स्थिति के अनुभव में स्थित होते हैं और अभी-अभी अपने स्थिति से हलचल में आ जाते हैं। जैसे छोटे बच्चे चंचल होते हैं तो एक स्थान पर ज्यादा समय टिक नहीं सकते। तो कई बच्चे यह बचपन के खेल बहुत करते हैं। अभी-अभी देखेंगे बहुत एकाग्र और अभी-अभी एकाग्रता के बजाय भिन्न-भिन्न स्थितियों में भटकते रहेंगे। तो इस समय विशेष अटेन्शन चाहिये मन और बुद्धि सदा एकाग्र रहे।
एकाग्रता की शक्ति सहज निर्विघ्न बना देती है। मेहनत करने की आवश्यकता ही नहीं है। एकाग्रता की शक्ति स्वत: ‘एक बाप दूसरा न कोई' ये अनुभूति सदा कराती है। एकाग्रता की शक्ति सहज एकरस स्थिति बनाती है। एकाग्रता की शक्ति सदा सर्व प्रति एक ही कल्याण की वृत्ति सहज बनाती है। एकाग्रता की शक्ति सर्व प्रति भाई-भाई की दृष्टि स्वत: बना देती है। एकाग्रता की शक्ति हर आत्मा के सम्बन्ध में स्नेह, सम्मान, स्वमान के कर्म सहज अनुभव कराती है। तो अभी क्या करना है? क्या अटेन्शन देना है? ‘एकाग्रता'। स्थित होते हो, अनुभव भी करते हो लेकिन एकाग्र अनुभवी नहीं होते। कभी श्रेष्ठ अनुभव में, कभी मध्यम, कभी साधारण, तीनों में चक्कर लगाते रहते हो। इतना समर्थ बनो जो मन-बुद्धि सदा आपके ऑर्डर अनुसार चले। स्वप्न में भी सेकेण्ड मात्र भी हलचल में नहीं आये। मन, मालिक को परवश नहीं बनाये।
परवश आत्मा की निशानी है - उस आत्मा को उतना समय सुख, चैन, आनन्द की अनुभूति चाहते हुए भी नहीं होगी। ब्राह्मण आत्मा कभी किसी के परवश नहीं हो सकती, अपने कमजोर स्वभाव और संस्कार के वश भी नहीं। वास्तव में ‘स्वभाव' शब्द का अर्थ है ‘स्व का भाव'। स्व का भाव तो अच्छा होता है, खराब नहीं होता। ‘स्व' कहने से क्या याद आता है? आत्मिक स्वरूप याद आता है ना। तो स्वभाव अर्थात् स्व प्रति व सर्व प्रति आत्मिक भाव हो। जब भी कमजोरी वश सोचते हो कि मेरा स्वभाव वा मेरा संस्कार ही ऐसा है, क्या करुँ, है ही ऐसा... यह कौन-सी आत्मा बोलती है? यह शब्द वा संकल्प परवश आत्मा के हैं। तो जब भी यह संकल्प आये कि स्वभाव ऐसा है, तो श्रेष्ठ अर्थ में टिक जाओ। संस्कार सामने आये कि मेरा संस्कार..., तो सोचो क्या मुझ विशेष आत्मा के यह संस्कार हैं, जिसको मेरा संस्कार कह रहे हो? मेरा कहते हो तो कमजोर संस्कार भी मेरापन के कारण छोड़ते नहीं हैं क्योंकि यह नियम है जहाँ मेरापन होता है वहाँ अपनापन होता है और जहाँ अपनापन होता है वहाँ अधिकार होता है। तो कमजोर संस्कार को मेरा बना लिया तो वो अपना अधिकार छोड़ते नहीं हैं इसलिये परवश होकर बाप के आगे अर्जी डालते रहते हो कि छुड़ाओ-छुड़ाओ। ‘संस्कार' शब्द कहते याद करो कि अनादि संस्कार, आदि संस्कार ही मेरा संस्कार है। ये माया के संस्कार हैं, मेरे नहीं। तो एकाग्रता की शक्ति से परवश स्थिति को परिवर्तन कर मालिकपन की स्थिति की सीट पर सेट हो जाओ।
योग में भी बैठते हैं, बैठते तो सभी रुचि से हैं लेकिन जितना समय, जिस स्थिति में स्थित होना चाहते हैं, उतना समय एकाग्र स्थिति रहे, उसकी आवश्यकता है। तो क्या करना है? किस बात को अण्डरलाइन करेंगे? (एकाग्रता) एकाग्रता में ही दृढ़ता होती है और जहाँ दृढ़ता है वहाँ सफलता गले का हार है। अच्छा!
चारों ओर के अलौकिक ब्राह्मण संसार की विशेष आत्माओं को, सदा श्रेष्ठ स्थिति के अनुभव की सीट पर सेट रहने वाली आत्माओं को, सदा स्वयं के महत्व को अनुभव करने वाले, सदा एकाग्रता की शक्ति से मन-बुद्धि को एकाग्र करने वाले, सदा एकाग्रता के शक्ति से ही दृढ़ता द्वारा सहज सफलता प्राप्त करने वाले सर्वश्रेष्ठ, सर्व विशेष, सर्व स्नेही आत्माओं को बापदादा का याद-प्यार और नमस्ते।
अव्यक्त बापदादा की पर्सनल मुलाकात - उड़ती कला में जाने के लिए डबल लाइट बनो, कोई भी आकर्षण आकर्षित न करे
सभी अपने को वर्तमान समय के प्रमाण तीव्र गति से उड़ने वाले अनुभव करते हो? समय की गति तीव्र है वा आत्माओं के पुरुषार्थ की गति तीव्र है? समय आपके पीछे-पीछे है या आप समय के प्रमाण चल रहे हो? समय के इन्तज़ार में तो नहीं हो ना कि अन्त में सब ठीक हो जायेगा। सम्पूर्ण हो जायेंगे, बाप समान हो जायेंगे? ऐसे तो नहीं है ना! क्योंकि ड्रामा के हिसाब से वर्तमान समय बहुत तीव्र गति से जा रहा है, अति में जा रहा है। जो कल था उससे आज और अति में जा रहा है। यह तो जानते हो ना? जैसे समय अति में जा रहा है, ऐसे आप श्रेष्ठ आत्मायें भी पुरुषार्थ में अति तीव्र अर्थात् फ़ास्ट गति से जा रहे हो? कि कभी ढीले, कभी तेज़? ऐसे नहीं कि नीचे आकर फिर ऊपर जाओ। नीचे-ऊपर होने वाले की गति कभी एकरस फ़ास्ट नहीं हो सकती। तो सदा सर्व बातों में श्रेष्ठ वा तीव्र गति से उड़ने वाले हो। वैसे गायन है ‘चढ़ती कला सर्व का भला' लेकिन अभी क्या कहेंगे? ‘उड़ती कला, सर्व का भला'। अभी चढ़ती कला का समय भी समाप्त हुआ, अभी उड़ती कला का समय है। तो उड़ती कला के समय कोई चढ़ती कला से पहुँचना चाहे तो पहुँच सकेगा? नहीं। तो सदा उड़ती कला हो। उड़ती कला की निशानी है सदा डबल लाइट। डबल लाइट नहीं तो उड़ती कला हो नहीं सकती। थोड़ा भी बोझ नीचे ले आता है। जैसे प्लेन में जाते हैं, उड़ते हैं तो अगर मशीनरी में या पेट्रोल में ज़रा भी कचरा आ गया तो क्या हालत होती है? उड़ती कला से गिरती कला में आ जाता है। तो यहाँ भी अगर किसी भी प्रकार का बोझ है, चाहे अपने संस्कारों का, चाहे वायुमण्डल का, चाहे किसी आत्मा के सम्बन्ध-सम्पर्क का, कोई भी बोझ है तो उड़ती कला से हलचल में आ जाता है। कहेंगे वैसे तो मैं ठीक हूँ लेकिन ये कारण है ना इसीलिये ये संस्कार का, व्यक्ति का, वायुमण्डल का बन्धन है। लेकिन कारण कैसा भी हो, क्या भी हो, तीव्र पुरुषार्थी सभी बातों को ऐसे क्रॉस करते हैं जैसे कुछ है ही नहीं। मेहनत नहीं, मनोरंजन अनुभव करेंगे। तो ऐसी स्थिति को कहा जाता है उड़ती कला। तो उड़ती कला है या कभी-कभी नीचे आने का, चक्कर लगाने का दिल हो जाता है। कहीं भी लगाव नहीं हो। ज़रा भी कोई आकर्षण आकर्षित नहीं करे। रॉकेट भी तब उड़ सकता है, जब धरती की आकर्षण से परे हो जाये। नहीं तो ऊपर उड़ नहीं सकता। न चाहते भी नीचे आ जायेगा। तो कोई भी आकर्षण ऊपर नहीं ले जा सकती। सम्पूर्ण बनने नहीं देगी। तो चेक करो संकल्प में भी कोई आकर्षण आकर्षित नहीं करे। सिवाए बाप के और कोई आकर्षण नहीं हो। पाण्डव क्या समझते हैं? ऐसे तीव्र पुरुषार्थी बनो। बनना तो है ही ना। कितने बार ऐसे बने हो? अनेक बार बने हो। आप ही बने हो या दूसरे बने हैं? आप ही बने हो। तो नम्बरवार में तो नहीं आना है ना, नम्बरवन में आना है। मातायें क्या करेंगी? नम्बरवन या नम्बरवार भी चलेगा? 108 नम्बर भी चलेगा? 108 नम्बर बनेंगे कि पहला नम्बर बनेंगे? अगर बाप के बने हैं, अधिकारी बने हैं तो पूरा वर्सा लेना है या थोड़ा कम? फिर तो नम्बरवन बनेंगे ना। दाता फुल दे रहा है और लेने वाला कम ले तो क्या कहेंगे? इसलिये नम्बरवन बनना है। नम्बरवन चाहे एक ही हो लेकिन नम्बरवन डिविज़न तो बहुत हैं ना। तो सेकेण्ड में नहीं आना है। लेना है तो पूरा लेना है। अधूरा लेने वाले तो पीछे-पीछे बहुत आयेंगे। लेकिन आपको पूरा लेना है। सभी पूरा लेने वाले हो या थोड़े में राज़ी होने वाले हो? जब खुला भण्डार है और अखुट है तो कम क्यों लें? बेहद है ना, हद हो कि 8 हजार इसको मिलना है, 10 हजार इसको मिलना है तो कहेंगे भाग्य में इतना ही है, लेकिन बाप का खुला भण्डार है, अखुट है, जितना लेना चाहे ले सकते हैं फिर भी अखुट है। अखुट ख़ज़ाने के मालिक हो। बालक सो मालिक हो। तो सभी सदा खुश रहने वाले हो ना कि थोड़ा-थोड़ा कभी दु:ख की लहर आती है? दु:ख की लहर स्वप्न में भी नहीं आ सकती। संकल्प तो छोड़ो लेकिन स्वप्न में भी नहीं आ सकती। इसको कहा जाता है नम्बरवन। तो क्या कमाल करके दिखायेंगे? सभी नम्बरवन आकर दिखायेंगे ना?
वैसे भी दिल्ली को दिल कहते हैं। तो जैसा दिल होगा वैसा शरीर चलेगा। आधार तो दिल होता है ना। दिल है दिलाराम की दिल। तो दिल की गद्दी यथार्थ चाहिये ना, नीचे-ऊपर नहीं चाहिये। तो नशा है ना कि हम दिलाराम का दिल हैं। तो अभी अपने श्रेष्ठ संकल्पों से स्वयं को और विश्व को परिवर्तन करो। संकल्प किया और कर्म हुआ। ऐसे नहीं, सोचा तो बहुत था, सोचते तो बहुत हैं, लेकिन होता बहुत कम है, वे तीव्र पुरुषार्थी नहीं हैं। तीव्र पुरुषार्थी अर्थात् संकल्प और कर्म समान हो तब ही बाप समान कहेंगे। खुश हैं और सदा खुश रहेंगे। यह पक्का निश्चय है ना। खुश रहने वाले ही खुशनसीब हैं। यह पक्का है या थोड़ा-थोड़ा कच्चा हो जाता है? कच्ची चीज़ अच्छी लगती है? पक्के को पसन्द किया जाता है। तो पूरा ही पक्का रहना है।
रोज़ अमृतवेले यह पाठ पक्का करो कि कुछ भी हो जाये खुश रहना है, खुश करना है। अच्छा और कोई खेल नहीं दिखाना। यही खेल दिखाना, और-और खेल नहीं करना। अच्छा!
वरदान:- भाग्य और भाग्य विधाता बाप की स्मृति में रह भाग्य बांटने वाले फ्राकदिल महादानी भव
भाग्य विधाता बाप और भाग्य दोनों ही याद रहें तब औरों को भी भाग्यवान बनाने का उमंग-उत्साह रहेगा। जैसे भाग्यविधाता बाप ब्रह्मा द्वारा भाग्य बांटते हैं ऐसे आप भी दाता के बच्चे हो, भाग्य बांटते चलो। वे लोग कपड़ा बांटेंगे, अनाज बांटेंगे, कोई गिफ्ट देंगे.. लेकिन उससे कोई तृप्त नहीं हो सकते। आप भाग्य बांटो तो जहाँ भाग्य है वहाँ सब प्राप्तियां हैं। ऐसे भाग्य बांटने में फ्राकदिल, श्रेष्ठ महादानी बनो। सदा देते रहो।
स्लोगन:- जो एकनामी रहते और एकानामी से चलते हैं वही प्रभू प्रिय हैं।
04.02.2023 HINDI MURLI
“मीठे बच्चे - बाप से सर्व संबंधों का सुख लेना है तो और सबसे बुद्धि की प्रीत निकाल मामेकम् याद करो, यही मंजिल है''
प्रश्नः- तुम बच्चे इस समय कौन सा अच्छा कर्म करते हो, जिसके रिटर्न में साहूकार बन जाते हो?
उत्तर:- सबसे अच्छे से अच्छा कर्म है - ज्ञान रत्नों का दान करना। यह अविनाशी ज्ञान खजाना ही ट्रांसफर हो 21 जन्मों के लिए विनाशी धन बन जाता है, इससे ही मालामाल बन जाते। जो जितना ज्ञान रत्नों को धारण कर दूसरों को धारण कराते हैं उतना साहूकार बनते हैं। अविनाशी ज्ञान रत्नों का दान करना - यही है सर्वोत्तम सेवा।
ओम् शान्ति। शिवबाबा अपने सालिग्राम बच्चों को समझाते हैं। यह है परमात्मा का अपने बच्चों, आत्माओं प्रति ज्ञान। आत्मा, आत्मा को ज्ञान नहीं देती। परमात्मा शिव बैठ ब्रह्मा सरस्वती और तुम लकी स्टार्स बच्चों प्रति बैठ समझाते हैं इसलिए इनको परमात्म ज्ञान कहा जाता है। परमात्मा तो एक ही है बाकी क्रियेशन है क्रियेटर की। जैसे लौकिक बाप ऐसे नहीं कहेगा कि यह सब हमारे रूप हैं। नहीं। कहेगा यह हमारी रचना है। तो यह रूहानी बाप है जिसे भी पार्ट मिला हुआ है। वही मुख्य एक्टर, क्रियेटर और डायरेक्टर है। आत्मा को क्रियेटर नहीं कहेंगे। परमात्मा के लिए कहा जाता है तुम्हरी गत मत तुम ही जानो। उन सब गुरूओं की तो अपनी-अपनी अलग मत है इसलिए परमात्मा आकर एक मत देते हैं। वह है मोस्ट बिलवेड। उस एक के साथ बुद्धियोग लगाना है, और जिनके भी साथ तुम्हारी प्रीत है वह सब धोखा देने वाली है इसलिए उन सबसे बुद्धि निकालनी है। मैं तुमको सब सम्बन्धों का सुख दूंगा सिर्फ मामेकम्, यह है मंजिल। मैं सबका डियरेस्ट डैड (प्यारा पिता) भी हूँ, टीचर भी हूँ, गुरू भी हूँ। तुम समझते हो उस द्वारा हमको जीवनमुक्ति मिलती है। यही अविनाशी ज्ञान खजाना है, यह खजाना ट्रांसफर हो फिर 21 जन्म के लिए विनाशी धन बन जाता है। 21 जन्म हम बहुत मालामाल हो जाते हैं। राजाओं का राजा बनते हैं। इस अविनाशी धन का दान करना है। आगे तो विनाशी धन दान करते थे तो अल्पकाल क्षण भंगुर सुख दूसरे जन्म में मिलता था। कहा जाता है पास्ट जन्म में कुछ दान पुण्य किया है जिसका फल मिला है। वह फल एक जन्म का ही मिलता है। जन्म-जन्मान्तर की प्रालब्ध नहीं कहेंगे। हम जो अब करेंगे उसकी प्रालब्ध हमको जन्म-जन्मान्तर मिलेगी। तो अब यह है अनेक जन्मों की बाज़ी। परमात्मा से बेहद का वर्सा लेना है। सबसे अच्छा कर्म है अविनाशी ज्ञान खजाना दान करना। जितना धारण कर औरों को करायेंगे उतना खुद भी साहूकार बनेंगे, औरों को भी बनायेंगे। यह है सर्वोत्तम सेवा, जिससे सद्गति होती है। देवताओं की रसम-रिवाज़ देखो कैसे सम्पूर्ण निर्विकारी, अहिंसा परमोधर्म है। प्यूरीफिकेशन (सम्पूर्ण पवित्रता) सतयुग त्रेता में ही रहती है। देवतायें ही बहिश्त में रहने वाले हैं, उन्हों को ही ऊंच गाते हैं। जो सूर्यवंशी सतयुग में बनते हैं वही सम्पूर्ण हैं, फिर थोड़ी खाद पड़ जाती है। अब तुम समझते हो देवतायें किस बहिश्त के निवासी हैं। वैकुण्ठ है वन्डरफुल दुनिया, वहाँ दूसरे धर्म वाले जा नहीं सकेंगे। यह सब धर्मो को रचने वाला ऊंचे ते ऊंचा भगवत है। यह देवता धर्म कोई ब्रह्मा नहीं स्थापन करते हैं, यह तो कहते हैं मैं इमप्योर था, मेरे में ज्ञान कहाँ से आया। और सब प्योर सोल्स ऊपर से आती हैं अपना धर्म स्थापन करने। यहाँ तो परमात्मा धर्म स्थापन करते हैं, जब इसमें आते हैं तब इनका नाम ब्रह्मा रखते हैं। कहा जाता है ब्रह्मा देवताए नम:, विष्णु देवताए नम:.... अब प्रश्न उठता है कि इन देवताओं से मनुष्य सृष्टि रची गई क्या? नहीं। परमात्मा कहते हैं मैं जिस साधारण तन में आता हूँ, उसका नाम ब्रह्मा पड़ता है। वह सूक्ष्म ब्रह्मा है, तो दो ब्रह्मा हो गये। इनका ब्रह्मा नाम रखा गया है क्योंकि कहते हैं साधारण तन में आता हूँ। ब्रह्मा के मुख कंवल से ब्राह्मण रचता हूँ। आदि देव से ह्युमिनिटी रची गई, यह हुआ ह्युमिनिटी का पहला बाबा। फिर वृद्धि होती जाती है।
अब तुमको राजाओं का राजा बनाते हैं। परन्तु बनेंगे तब जब देह सहित देह के सब सम्बन्धों से नाता तोड़ेंगे। बाबा मैं तुम्हारा ही हूँ, बस। यह तो निश्चय है हम सो प्रिन्स बनते हैं। चतुर्भुज का साक्षात्कार होता है ना। वह है ही युगल। चित्रों में ब्रह्मा को 10-20 भुजायें दिखाते हैं। काली को कितनी भुजायें दी हैं, इतने बांहों वाली चीज़ तो होती नहीं। यह सब अस्त्र-शस्त्र हैं। अपना है ही प्रवृत्ति मार्ग। बाकी ब्रह्मा की जो इतनी भुजायें दिखाते हैं, समझते हैं यह जो ब्रह्मा के बच्चे हैं वह जैसे इनकी बांहे हैं। बाकी यह काली आदि कुछ नहीं है, जैसे कृष्ण को काला कर दिया है वैसे काली का भी चित्र काला कर दिया है। यह जगदम्बा भी ब्राह्मणी है। हम अपने को भगवान अथवा अवतार नहीं कहते हैं। बाबा कहते हैं सिर्फ मामेकम् याद करो। वास्तव में सब शिव कुमार हैं सालिग्राम। फिर मनुष्य तन में आने से तुम ब्रह्माकुमार ब्रह्माकुमारी कहलाते हो। ब्रह्माकुमार कुमारियां फिर जाकर विष्णुकुमार कुमारियां बनेंगे। बाप क्रियेट करते हैं फिर पालना भी उनको करनी पड़ती है। ऐसे डियरेस्ट डैड के तुम वारिस हो, उनसे तुम सौदा करते हो। यह तो बीच में दलाल है।
बाबा है होली गवर्मेन्ट, वह आये हैं इस गवर्मेन्ट को भी पाण्डव गवर्मेन्ट बनाने। यह है हमारी ऊंच सर्विस। गवर्मेन्ट की प्रजा को हम मनुष्य से देवता बनाते हैं बाबा की मदद से। तो हम उन्हों के सर्वेन्ट हैं ना। हम वर्ल्ड सर्वेन्ट हैं, हम बाबा के साथ आये हैं सारी दुनिया की सर्विस करने। हम कुछ लेते नहीं हैं। विनाशी धन, महल आदि हम क्या करेंगे। हमको तो सिर्फ 3 पैर पृथ्वी चाहिए।
तुम बच्चों को अभी सच्चा-सच्चा ज्ञान मिल रहा है, शास्त्रों के ज्ञान को ज्ञान नहीं कहेंगे, वह भक्ति है। ज्ञान माना सद्गति। सद्गति माना मुक्ति-जीवनमुक्ति। जब तक जीवनमुक्त नहीं हुए हैं तब तक मुक्त भी नहीं हो सकते। हम जीवन-मुक्त होते हैं। बाकी सब मुक्त होते हैं। तब तो कहते हैं तुम्हरी गत मत तुम ही जानों। फिर इसमें भी सर्वव्यापी परमात्मा है, यह बात नहीं रहती। यह तो कहते हैं कल्प-कल्प मैं अपनी मत से सबकी सद्गति करता हूँ। सद्गति के साथ गति आ ही जाती है। नई दुनिया में रहते ही थोड़े हैं। आगे हम कहते थे घट ही में सूर्य, घट ही में चांद, घट ही में 9 लख तारे.... घट में सूर्य इस समय है। घट में शिव है, जिसका ही इतना विस्तार है। फिर घट में मम्मा बाबा और लकी स्टार्स। विवेक भी कहता है सतयुग में जरूर थोड़ी संख्या होनी चाहिए। पीछे वृद्धि होती है। यह सब समझने की बातें हैं। जो जितना प्योर (पवित्र) होगा उतनी धारणा होगी। इमप्योरिटी से धारणा कम होगी। प्योरिटी फर्स्ट। क्रोध का भी भूत रह जाता है तो माया से हार खा लेते हैं। यह युद्ध है ना। उस्ताद को पूरा हाथ देना है। नहीं तो माया बड़ी प्रबल है। जिनका हाथ में हाथ है उनके लिए ही बरसात है। जैसे बाबा साक्षी हो पार्ट भी बजाते हैं, देखते भी हैं। यह तो समझ सकते हो कि माँ बाप और लकी स्टार्स जो अनन्य हैं उनको ही फालो करना है। यह तो समझाया है मुरली पढ़ना कभी नहीं छोड़ना। अच्छा!
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का यादप्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।
रात्रि क्लास 23-12-58
देखो, आलमाइटी बाबा के यह सब कितने रूहानी कारखाने (सेन्टर्स) हैं। जहाँ से हर एक को रूहानी रत्न मिलते हैं। बाबा है सब कारखानों का सेठ। मैनेजर्स लोग सम्भाल रहे हैं, दुकानें चल रही हैं। दुकान कहो, हॉस्टिल कहो.... यह तुम ब्राह्मणों की फैमिली भी है। तुम्हें अपना जीवन बनाना है एज्यूकेशन से। इसमें रूहानी और जिस्मानी दोनों इकट्ठा है। दोनों बेहद के हैं। और वह हैं रूहानी, जिस्मानी दोनों हद के। गुरू लोग जो भी शास्त्रों आदि की रूहानी शिक्षा देते हैं वह सब है हद की। हम किसी मनुष्य को गुरू नहीं मानते। हमारा है एक सतगुरू, जो एक ही रथ में आते हैं। घड़ी-घड़ी उनको याद करेंगे तब ही विकर्म विनाश होंगे। तुमको धन उस ग्रैन्ड फादर से मिलता है, इसलिए उनको याद करना है। कोई भी कर्म ऐसा नहीं करना है जो विकर्म बन जाए। सतयुग में कर्म, अकर्म होते हैं, यहाँ कर्म विकर्म होते हैं क्योंकि 5 भूत हैं। हम बिल्कुल सेफ हैं। बाबा कहते हैं विकार दान में दे दो फिर अगर वापिस लिया तो नुकसान हो जायेगा। ऐसे मत समझना छिपाकर करेंगे तो पता थोड़ेही पड़ेगा। धर्मराज को तो पता पड़ेगा ना। इस समय ही बाबा को अन्तर्यामी कहा जाता है, हर एक बच्चे का रजिस्टर वह देख सकते हैं। हम बच्चों के अन्दर को जानने वाला है इसलिए छिपाना नहीं चाहिए। ऐसे भी चिट्ठी लिखते हैं कि बाबा हमारे से भूल हुई है माफ करना। धर्मराज की दरबार में सजा नहीं देना। जैसेकि डायरेक्ट शिवबाबा को लिखते हैं। बाबा के नाम पर इस पोस्ट बाक्स में चिट्ठी डाल देते हैं। भूल बताने से आधी सजा कम हो जायेगी। यहाँ प्युरिटी बहुत चाहिए। सर्वगुण सम्पन्न, 16 कला सम्पन्न यहाँ बनना है। रिहर्सल यहाँ होगी फिर वहाँ प्रैक्टिकल पार्ट बजाना है। अपनी जांच करनी है - कोई विकर्म तो नहीं करते हैं? संकल्प तो बहुत आयेंगे, माया बहुत परीक्षा लेगी, डरना मत। बहुत नुकसान होंगे, धन्धा नहीं चलेगा, टांग टूट जायेगी, बीमार हो पड़ेंगे.... कुछ भी हो जाए बाबा का हाथ नहीं छोड़ना। अनेक प्रकार की परीक्षायें आयेंगी। पहले-पहले बाबा के सामने आती हैं, इसलिए बाबा बताते हैं खबरदार रहना। पहलवान बनना है।
देखो, भारत में जितनी सबको छुट्टियाँ मिलती हैं इतनी और कहाँ नहीं मिलती, परन्तु यहाँ हमको एक सेकण्ड भी छुट्टी नहीं मिलती क्योंकि बाबा कहते हैं श्वांसों श्वांस याद में रहो। एक एक श्वांस अमोलक है। तो वेस्ट कैसे कर सकते। जो वेस्ट करते हैं वह पद भ्रष्ट करते हैं। इस जन्म का एक एक श्वांस मोस्ट वैल्युबुल है। रात दिन बाबा की सर्विस में रहना चाहिए। तुम आलमाइटी बाबा के ऊपर आशिक हो या उनके रथ पर? या दोनों पर? जरूर दोनों का आशिक होना पड़े। बुद्धि में यह रहेगा कि वह इस रथ में है। उनके कारण तुम इस पर आशिक हुए हो। शिव के मन्दिर में भी बैल रखा हुआ है। वह भी पूजा जाता है। कितनी गुह्य बातें हैं जो रोज़ नहीं सुनते तो कोई कोई प्वांइटस मिस कर देते हैं। रोज़ सुनने वाले कभी प्वाइंटस में फेल नहीं होंगे। मैनर्स भी अच्छे रहेंगे। बाबा की याद में बहुत प्राफिट (फायदा) है। फिर है बाबा की नॉलेज को याद करना। योग में भी प्राफिट, ज्ञान में भी प्राफिट। बाबा को याद करना इसमें है मोस्ट प्राफिट क्योंकि विकर्म विनाश होते हैं और पद भी ऊंच मिलता है। अच्छा!
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का यादप्यार और गुडनाइट, रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।
धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) श्वांसों श्वांस बाप को याद करना है, एक भी श्वांस व्यर्थ नहीं गवाना है। कोई भी कर्म ऐसा नहीं करना है जो विकर्म बन जाए।
2) उस्ताद के हाथ में हाथ दे सम्पूर्ण पावन बनना है। कभी क्रोध के वशीभूत होकर माया से हार नहीं खानी है। पहलवान बनना है।
वरदान:- समर्थ स्थिति के आसन पर बैठ व्यर्थ और समर्थ का निर्णय करने वाले स्मृति स्वरूप भव
इस ज्ञान का इसेन्स है स्मृति स्वरूप बनना। हर कार्य करने के पहले इस वरदान द्वारा समर्थ स्थिति के आसन पर बैठ निर्णय करो कि यह व्यर्थ है वा समर्थ है फिर कर्म में आओ, कर्म करने के बाद फिर चेक करो कि कर्म का आदि, मध्य और अन्त तीनों काल समर्थ रहा? यह समर्थ स्थिति का आसन ही हंस आसन है, इसकी विशेषता ही निर्णय शक्ति है। निर्णय शक्ति द्वारा सदा ही मर्यादा पुरुषोत्तम स्थिति में आगे बढ़ते जायेंगे।
स्लोगन:- अनेक प्रकार के मानसिक रोगों को दूर भगाने का साधन है - साइलेन्स की शक्ति।
03.02.2023 HINDI MURLI
“मीठे बच्चे - नर से नारायण बनने के लिए परफेक्ट ब्राह्मण बनो, सच्चा ब्राह्मण वह जिसमें कोई भी विकार रूपी दुश्मन न हो''
प्रश्नः- बाप का रिगार्ड किन बच्चों को प्राप्त होता है? समझदार कौन हैं?
उत्तर:- बाप का रिगार्ड उन्हें मिलता जो यज्ञ का हर एक कार्य रेसपान्सिबिलिटी से करते हैं। कभी गफलत नहीं करते। पावन बनाने की रेसपान्सिबिलिटी समझ इसी सेवा पर तत्पर रहते हैं। चलन बहुत रॉयल है, कभी नाम बदनाम नहीं करते। आलराउन्डर हैं। समझदार वह जो फुल पास होने की कोशिश करते हैं। कभी दु:खदाई नहीं बनते। कोई भी उल्टा कार्य नहीं करते।
गीत:- आज नहीं तो कल बिखरेंगे यह बादल...
ओम् शान्ति। यह बच्चों को कौन डायरेक्शन देते हैं? बेहद का बाप, जिसको बच्चे इतना पितावृता होकर याद नहीं करते। बाप कहते हैं बच्चे अब वापिस घर चलना है। बच्चे किसको कहते हैं? जो ब्रह्मा मुख वंशावली ब्राह्मण हैं उन्हों को बाप बच्चे कहेंगे क्योंकि उनकी सन्तान बने हैं। बाप बैठ समझाते हैं जब नई सृष्टि रचनी है तो पुरानी सृष्टि की आत्माओं को घर चलना है। अब तुम बच्चे बाप और बाप के घर को जानते हो। इतना जरूर है कोई तो बाप को अच्छी रीति याद करते हैं। श्रीमत पर चलते हैं, कोई देह-अभिमान के कारण याद नहीं करते हैं। पावन नहीं रहते। ब्राह्मण हैं ही ईश्वरीय सन्तान, ब्रह्मा मुख वंशावली। रचयिता बाप गाया जाता है ना। ब्रह्मा मुख कमल से सन्तान रचते हैं। तुम बच्चे जानते हो बरोबर हम ईश्वर की सन्तान ब्रह्मा के मुख वंशावली ब्राह्मण बने हैं। ब्राह्मण उनको कहा जाता है जो पावन रहते हैं। सारा मदार है ही पवित्रता पर। इसको कहा जाता है अपवित्र पतित दुनिया। मनुष्य मात्र जो पतित हैं, वह पावन का अर्थ नहीं समझते। कलियुग पतित दुनिया, सतयुग पावन दुनिया है - यह कोई भी नहीं जानते। कई तो कह देते हैं सतयुग त्रेता में भी पतित लोग हैं। सीता चुराई गई..... यह हुआ पावन दुनिया की ग्लानी करना। जैसी दृष्टि, वैसी सृष्टि देखने में आती है। पावन दुनिया में भी पतित हैं तो क्या बाप ने पतित दुनिया रची? बाप तो पावन दुनिया ही स्थापन करते हैं। गाया भी है पतित-पावन आओ, आकर इस सृष्टि को, उसमें भी खास भारत को पावन बनाओ। अब यह ब्रह्माकुमार-कुमारी नाम पड़ता ही उन पर है जो पावन होकर रहते हैं। पतित को ब्राह्मण ब्राह्मणी वा बी.के. कह नहीं सकते। वह हैं ही कुख वंशावली। तुम ब्राह्मण हो ब्रह्मा मुख वंशावली। ब्रह्मा कुख वंशावली तो नहीं कहा जाता। वह हैं ही पतित। अब तुम ईश्वरीय सन्तान बने ही इसलिए हो कि पावन दुनिया के मालिक बनें। ब्राह्मण ब्राह्मणी अथवा ब्रह्माकुमार कुमारी कहलाकर यदि पतित होते हैं या विकार में जाते हैं तो वह बी.के. नहीं हुए। ब्राह्मण कभी विकार में नहीं जाते। विकार में जाने वाले को शूद्र कहा जाता है। ईश्वर की औलाद बनते ही इसलिए हैं कि ईश्वर से हम राज्य भाग्य लेवें। राजाई का वर्सा लेने के लिए पुरुषार्थ करना चाहिए। लक्ष्य रखना है कि हम नर से नारायण बनें।
तुम बच्चे जानते हो कि नम्बरवन है काम। सेकेण्ड नम्बर है क्रोध। क्रोध आदि का भूत रह जाता है तो वह पूरे वर्से के लायक नहीं बनते। कहा जाता है यह काम वा क्रोध के भूतवश, परवश हो गया। बाप को याद न करने कारण रावण के वश हो जाते हैं। ऐसे क्रोधी वा कामी नर से नारायण पद पा नहीं सकते। यहाँ चाहिए परफेक्ट ब्राह्मण। बाप समझाते हैं पहले नम्बर का भूत आता है देह-अभिमान। अगर देही-अभिमानी हो बाप को याद करते रहें तो बाप मदद भी करे। जो जितना याद करते हैं उतनी उनको मदद मिलती है। ब्राह्मण सच्चा वह जिसमें यह विकार रूपी दुश्मन न हो। मुख्य देह-अभिमान के कारण ही और और दुश्मन आते हैं। यह भारत शिवालय था तब दु:ख की कोई बात नहीं थी। यह मनुष्यों को पता नहीं है। वह तो कह देते हैं माया भी है ही, ईश्वर भी है ही। अरे ईश्वर अपने समय पर आता, माया अपने समय पर आती। आधाकल्प है ईश्वरीय राज्य, आधा-कल्प है माया का राज्य। यह समझानी शास्त्रों में नहीं है। वह है ही भक्ति मार्ग। ज्ञान का सागर एक ही बाप है जिसको पतित-पावन कहा जाता है। जो बाप को याद नहीं करते हैं उनसे पतित काम जरूर होते ही रहेंगे। उनको ब्राह्मण ब्राह्मणी कह नहीं सकते। बड़ी सूक्ष्म बातें हैं। शिवबाबा (दादे) को याद नहीं करेंगे तो वर्सा कहाँ से मिलेगा। फिर उनको इस पुरानी दुनिया के मित्र-सम्बन्धी आदि याद आते हैं। अच्छी रीति बाप को याद करेंगे तो बाप भी मदद देंगे। तुम कहाँ मुरली चलाने में मूंझ जायेंगे तो भी शिवबाबा प्रवेश कर आए मुरली चलायेंगे। बच्चों को पता नहीं पड़ता कि शिवबाबा आकर मदद करते हैं। समझते हैं हमने आज अच्छी मुरली चलाई। अरे आज अच्छी चलाई, कल क्यों नहीं चलाते थे। तुमको यह भी पता थोड़ेही पड़ता है - शिवबाबा बोलते हैं या ब्रह्मा बोलते हैं! शिवबाबा कहते हैं - बच्चे, तुम मेरी ईश्वरीय औलाद हो, मेरे को याद करो। ऐसे और कोई कह न सके। मैं ही इनमें प्रवेश कर कह सकता हूँ। मैं ज्ञान सागर हूँ ना। तुम ज्ञानी तू आत्मा बन रहे हो। तो जो बाप से योग रखते हैं तो बाप भी आकर मदद करते हैं। देह-अभिमानी याद थोड़ेही करेंगे। बाप को जरूर याद करना है। अहंकार नहीं आना चाहिए - मैंने अच्छी मुरली चलाई। नहीं, समझना चाहिए शिवबाबा ने आकर मुरली चलाई। घड़ी-घड़ी शिवबाबा को याद करना चाहिए। बहुत बच्चे हैं जो पूरा याद नहीं करते हैं तो कर्मभोग मिटता नहीं। बीमारियां आ जाती हैं। विकर्म विनाश नहीं होते हैं।
बच्चों को बाप के साथ योग लगाना है। हम राजयोगी हैं। बाप से राजाई लेनी है। हम नर से नारायण बनेंगे। दिल में समझना है मैं इतना पढ़ता हूँ जो सूर्यवंशी में जाऊं। ऐसे नहीं, पहले दास-दासी बन फिर राजाई पावें। बाप को याद करने से बाप की मदद मिलेगी। नहीं तो कुछ न कुछ पाप, नुकसान आदि होता है। वह दु:खदाई बहुत बनते हैं। लक्ष्मी-नारायण तो सुखदाई हैं ना। समझदार बच्चे कोशिश करेंगे फुल पास होने की। ऐसे नहीं, जो मिला सो ठीक। हर बात में आलराउन्ड पुरुषार्थ करना चाहिए। ऐसे भी नहीं कि यह काम इनका है हम क्यों करें, बाबा आलराउन्ड काम करते हैं ना। बच्चों की चलन ठीक नहीं रहती तो फिर नाम बदनाम कराते हैं। बाप कहते हैं मेरा बनकर और फिर उल्टा काम करते तो पद भ्रष्ट हो जाता है। ऐसे मत समझो कि यह ब्रह्मा बाबा डायरेक्शन देते हैं। शिवबाबा याद रहना चाहिए।
बच्चों को समझना है दुनिया को पावन बनाने का बोझा सिर पर है। हम रेसपॉन्सिबुल हैं। भारत को पावन बनाने की बहुत बड़ी रेसपॉन्सिबिल्टी है। यज्ञ का हर एक कार्य रेसपान्सिबिल्टी से करना है। कोई ग़फलत न हो तब बाबा भी रिगार्ड देंगे। नहीं तो धर्मराज ऐसी सजा खिलाते हैं जो कभी जेल में भी नहीं खाई होगी इसलिए बाप कहते हैं विनाश होने के पहले सब विकर्म योग से भस्म करो। नहीं तो जन्म-जन्मान्तर के विकर्मो की सजा धर्मराजपुरी में बहुत खानी पड़ेगी इसलिए ग़फलत मत करो। यह अन्तिम जन्म है। फिर तो जायेंगे ही स्वर्ग में। मोचरे खाकर फिर प्रजा पद पाना इसको पुरुषार्थ नहीं कहा जाता। उस समय त्राहि-त्राहि करना पड़ेगा। यह भी बाप साक्षात्कार करायेंगे कि बार-बार समझाया था, ब्राह्मण बनना कोई मासी का घर नहीं है। ईश्वर का बच्चा बनते हो तो फिर कोई विकार नहीं होना चाहिए। इसमें भी काम महाशत्रु है। जो काम वश हो जाते हैं उन्हें ब्राह्मण नहीं कह सकते। माया बहुत पिछाड़ेगी परन्तु कर्मेन्द्रियों से कोई काम नहीं करना है। फैमिलियरटी का हल्का नशा - यह भी माया का नशा है। बाबा ने समझाया है इससे भी बोझा चढ़ जायेगा। तुम व्यभिचारी बन गये। ईश्वरीय औलाद में यह काम-क्रोध आदि शैतान थोड़ेही होते हैं। वह शैतानी आसुरी गुण हैं। बहुत हैं जो ईश्वर के बनते फिर माया के बनन्ती हो जाते हैं। देह-अभिमान में आ जाते हैं। बाप की श्रीमत पर चलना है तब रेसपान्सिबुल वह रहेंगे। ब्रह्मा की मत भी गाई हुई है। इनकी मत पर चलने से भी रेसपान्सिबुल बाप हो जायेगा। तो क्यों न अपने से रेसपॉन्सिबिलिटी उतार देनी चाहिए। बाप-दादा, दोनों की मत मशहूर है। माता की मत पर भी चलना चाहिए क्योंकि माता गुरू बनती है। वह मात-पिता अलग हैं। इस समय माता को गुरू बनाने का सिलसिला चलता है।
तुम पुरुषार्थ कर रहे हो शिवालय के लिए। सतयुग को शिवालय कहा जाता है। परमात्मा का एक्यूरेट नाम शिव है। शिवजयन्ती ही गाई जाती है। शिव को कल्याणकारी कहा जाता है, वह है बिन्दी। परमपिता परमात्मा का रूप है ही स्टार। सोने अथवा चांदी का छोटा स्टॉर बनाकर टीका भी लगाते हैं। वास्तव में वह एक्यूरेट ठीक है और स्टार रहता भी भ्रकुटी में है। परन्तु मनुष्यों को ज्ञान नहीं है। कोई फिर त्रिशूल देते हैं। त्रिनेत्री, त्रिकालदर्शी की निशानी यानी दिव्य दृष्टि, दिव्य बुद्धि की निशानी देते हैं। अभी तुम बच्चों को इन बातों का ज्ञान है। तुम चाहो तो स्टार लगा सकते हो। अपनी निशानी सफेद स्टार है। आत्मा का रूप भी ऐसे स्टार मिसल है। बाप सभी राज़ समझाते हैं। सावधानी भी देते हैं। बी.के. वह जिनकी प्रतिज्ञा की हुई है कि पाप का काम कभी नहीं करेंगे। यह याद रखना है। किसकी दिल को दुखाना नहीं है। अगर दुखाते हैं तो शिवबाबा का बच्चा नहीं ठहरा। शिवबाबा आते ही हैं सुख देने। वहाँ यथा राजा रानी तथा प्रजा - सभी एक दो को सुख देते हैं। यहाँ सब सांवरे बने हैं, काम कटारी चलाते रहते हैं। यह है ही एक दो को दु:ख देने की दुनिया। सतयुग है एक दो को सुख देने की दुनिया। समझाना चाहिए कि हम ईश्वरीय सन्तान बने हैं। हम कोई पाप नहीं करते। नहीं तो पुण्य आत्माओं की दुनिया में इतना पद पा नहीं सकेंगे। हर एक की नब्ज से पता पड़ सकता है कि यह हमारे कुल का है वा नहीं।
हम कहते हैं भगवानुवाच तो गाया हुआ है कि हम तुमको राजयोग सिखलाते हैं। भगवान तो एक निराकार को कहा जाता है। तो कब आकर राजयोग सिखलायेंगे? जरूर जब नई दुनिया स्थापन होगी। नई दुनिया के लिए जरूर पुरानी में आना पड़े। भगवानुवाच - हम तुमको राजयोग सिखाते हैं। कहाँ के लिए? क्या नर्क के लिए? पावन दुनिया के लिए। भगवानुवाच - मैं तुमको राजाओं का राजा बनाता हूँ। बताओ कब आया था, वह कौन था फिर कब आयेगा? जरूर सतयुग के लिए ही सिखलायेगा। बहुत सहज है। परन्तु किसकी तकदीर में नहीं है तो बुद्धि में बैठ नहीं सकता। जैसे तत्ते तवे। फिर समझना चाहिए यह हमारे सूर्य-वंशी, चन्द्रवंशी राजाई का नहीं है बाकी प्रजा तो बहुत ही बननी है। अच्छा!
मीठे-मीठे सिकीलधे 5 हजार वर्ष बाद आकर मिले हो बाप से वर्सा लेने, ऐसे बच्चों को मात-पिता बापदादा का यादप्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।
धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) किसी की दिल को कभी भी दुखाना नहीं है। प्रतिज्ञा करनी है कभी कोई पाप का काम नहीं करेंगे। सदा सुखदाई बनेंगे।
2) कर्मेन्द्रियों से कोई भी उल्टा कर्म नहीं करना है। बाप और दादा की मत पर चल अपना बोझ उतार देना है।
वरदान:- अमृतवेले से लेकर रात तक मर्यादापूर्वक चलने वाले मर्यादा पुरुषोत्तम भव
संगमयुग की मर्यादायें ही पुरुषोत्तम बनाती हैं इसलिए मर्यादा पुरुषोत्तम कहा जाता है। तमोगुणी वायुमण्डल, वायब्रेशन से बचने का सहज साधन यह मर्यादायें हैं। मर्यादाओं के अन्दर रहने वाले मेहनत से बच जाते हैं। हर कदम के लिए बापदादा द्वारा मर्यादायें मिली हुई हैं, उसी प्रमाण कदम उठाने से स्वत: ही मर्यादा पुरुषोत्तम बन जाते हैं। तो अमृतवेले से रात तक मर्यादापूर्वक जीवन हो तब कहेंगे पुरूषोत्तम अर्थात् साधारण पुरुषों से उत्तम आत्मायें।
स्लोगन:- जो किसी भी बात में स्वयं को मोल्ड कर लेते हैं वही सर्व की दुआओं के पात्र बनते हैं।
02.02.2023 HINDI MURLI
“मीठे बच्चे - एक ईश्वर की मत ही श्रेष्ठ मत है, जिस मत पर चलने से ही तुम सच्चा सोना बनेंगे, बाकी सब मतें असत्य बनाने वाली हैं''
प्रश्नः- कौन सा पार्ट एक ज्ञान सागर बाप में भरा है, जो किसी मनुष्य-आत्मा में नहीं?
उत्तर:- बाबा कहते - मुझ आत्मा में भक्तों की सम्भाल करने का, सबको सुख देने का पार्ट है। मैं ज्ञान सागर बाप सभी बच्चों पर अविनाशी ज्ञान की बरसात करता हूँ, जिन ज्ञान रत्नों का कोई मूल्य नहीं कर सकता। मैं लिबरेटर हूँ, रूहानी पण्डा बन तुम आत्माओं को वापिस शान्तिधाम ले जाता हूँ। यह सब मेरा पार्ट है। मैं किसी को दु:ख नहीं देता, इसलिए सब मुझे आंखों पर रखते हैं। रावण दुश्मन दु:ख देता है इसलिए उसकी एफ़ीजी जलाते हैं।
गीत:- जो पिया के साथ है...
ओम् शान्ति। बाप ने ओम् का अर्थ तो बच्चों को समझा दिया है। ओम् अर्थात् अहम आत्मा। बस, अर्थ ही इतना छोटा है। ऐसे नहीं कि आई एम गॉड। पण्डितों आदि से पूछेंगे ओम् का अर्थ क्या है? तो वह बहुत लम्बा-चौड़ा सुनायेंगे और यथार्थ भी नहीं सुनायेंगे। यथार्थ और अयथार्थ, सत्य और असत्य। सत्य तो है ही एक बाप। बाकी इस समय तो है ही असत्यता का राज्य। रामराज्य को ही सत्य का राज्य कहेंगे। रावण राज्य को असत्यता का राज्य कहेंगे। वह अयथार्थ ही सुनाते हैं। बाप है सत्य, वह सब सत्य सुनाकर सच्चा सोना बना देते हैं। फिर माया असत्य बनाती है। माया की प्रवेशता के कारण मनुष्य जो कुछ कहेंगे वह असत्य ही कहेंगे, जिसको आसुरी मत कहा जाता है। बाप की है ईश्वरीय मत। आसुरी मत वाले झूठ ही बतायेंगे। आसुरी मतें दुनिया में अनेकानेक हैं। गुरू भी अनेक हैं। उन्हों की श्रीमत नहीं कहेंगे। एक ईश्वर की मत को ही श्रीमत कहेंगे। अभी तुम बच्चे समझते हो हम श्रीमत पर चल श्रेष्ठ बनते हैं। सबसे श्रेष्ठ तो है ही परमपिता परमात्मा। जो रहते भी ऊंचे ते ऊंचे हैं। सब भक्त उनको याद करते हैं। भक्त श्रीमत को याद करते हैं, तो जरूर कोई आसुरी मत पर हैं। अभी तुम श्रीमत पर श्रेष्ठ बनते हो, फिर वहाँ भगवान कहकर याद करने की दरकार ही नहीं। देवी-देवताओं को कोई दु:ख नहीं जो याद करना पड़े। भक्तों को तो अपार दु:ख है। अभी तो बहुत दु:ख के पहाड़ गिरने हैं। महाभारी लड़ाई, यह दु:खों का पहाड़ है - मनुष्यों के लिए। तुम बच्चों के लिए सुख का पहाड़ है। दु:ख के बाद सुख जरूर आना है। इस विनाश के बाद फिर तुम्हारा ही राज्य होना है। अनेक धर्मों का विनाश होता है और जो धर्म अब प्राय:लोप है, उनकी स्थापना होती है। गोया इस महाभारी लड़ाई द्वारा स्वर्ग के गेट्स खुलते हैं। इस गेट से कौन जायेंगे? जो राजयोग सीख रहे हैं। सिखलाने वाला बाप है। जो पिया के साथ है उनके लिए यह ज्ञान बरसात है। पिया बाप को कहा जाता है। वह वर्षा तो पानी के सागर से निकलती है। यह अविनाशी ज्ञान रत्नों की बरसात है। जो पिया ज्ञान सागर के साथ है, उनके लिए अविनाशी ज्ञान रत्नों की बरसात है। इन अविनाशी ज्ञान रत्नों की तुम्हारी बुद्धि रूपी झोली में धारणा होती है। एज्यूकेशन बुद्धि में धारण की जाती है ना। आत्मा है मन-बुद्धि सहित तो जैसेकि आत्मा ग्रहण (धारण) करती है। जैसे आत्मा को यह शरीर है, वैसे आत्मा को मन-बुद्धि है। बुद्धि से ग्रहण करते हैं। ग्रहण तब होता है, (धारणा तब होती है) जबकि योग है। यह बाप बैठ बहुत सहज बातें समझाते हैं। मनुष्यों ने तो बहुत डिफीकल्ट बातें सुना दी हैं। शास्त्रों में भी बहुत मतें हैं। गीता का बहुत प्रचार है। अध्याय का अर्थ बहुत करते हैं। कितनी अनेकानेक गीतायें बना दी हैं और कोई शास्त्र नहीं, जिसके लिए कहें फलाने का वेद, फलाने का शास्त्र। गीता के लिए कहते हैं - गांधी गीता, टैगोर गीता, ज्ञानेश्वर गीता, अष्टापा गीता .... बहुत नाम गीता के रख दिये हैं और वेद शास्त्र के कभी इतने नाम नहीं सुनेंगे। परन्तु मनुष्य समझते कुछ भी नहीं हैं। यह ज्ञान ही प्राय:लोप हो जाता है। अब डीटी सावरन्टी कहाँ से मिलेगी? जरूर जो सतयुग की स्थापना करने वाला होगा वही देगा। अब बाप आया हुआ है, तुम बच्चों को स्वर्ग की राजाई देने। सो भी 21 जन्मों के लिए। गाया जाता है कुमारी वह जो 21 कुल का उद्धार करे। अब वह कुमारी कौन सी? तुम सब कुमार कुमारी हो। तुम कोई को भी 21 जन्मों के लिए राज्य भाग्य प्राप्त करा सकते हो। श्रीमत से अथवा बाप की मत से। पाठशाला में जो पढ़ते हैं वह जानते हैं कि हम स्टूडेन्ट हैं। और सतसंगों में अपने को स्टूडेन्ट नहीं समझेंगे। स्टूडेन्ट को एम आब्जेक्ट बुद्धि में रहती है। तुम हो ईश्वरीय स्टूडेन्ट्स। भगवानुवाच - मैं तुमको राजयोग सिखाता हूँ, मनुष्य से देवता बनाता हूँ। देवताओं की राजधानी थी। यथा राजा रानी देवी-देवता तथा प्रजा... नर से नारायण बनते हैं। यह एम आब्जेक्ट है फर्स्ट। ऐसे नहीं राजा राम वा रानी सीता बनायेंगे। यह है ही राजयोग। राजाओं का राजा बनायेंगे। कल्प-कल्प मैं फिर से आता हूँ, गँवाया हुआ राज्य देने। तुम्हारा राज्य कोई मनुष्यों ने नहीं छीना है। छीना है माया ने। अब जीत भी माया पर पानी है। वह लड़ाई होती है राजाओं की। एक दो के ऊपर जीत पाने लिए लड़ते हैं। अब तो प्रजा का प्रजा पर राज्य हो गया है। हद के राजाओं की अनेकानेक लड़ाईयां लगी हैं। उनसे हद की राजाई मिलती है और इस योगबल से तुम विश्व की राजधानी स्थापन करते हो, इसको अहिंसक लड़ाई कहा जाता है। लड़ाई अथवा मरने मारने की बात नहीं है। यह है योगबल। कितना सहज है। बाबा के साथ योग लगाने से हम विकर्माजीत बनते हैं। फिर कोई माया का वार नहीं होगा। हातमताई का खेल दिखाते हैं। वह मुहलरा मुख में डालते थे तो माया गुम हो जाती थी। मुहलरा निकालते थे तो माया आ जाती थी। अल्लाह अवलदीन का भी नाटक है। ठका करने से बहिश्त निकल आता था। वह है बहिश्त अथवा स्वर्ग। तो बाप बैठ बहिश्त की स्थापना करते हैं ब्रह्मा द्वारा। परमपिता परमात्मा कोई नर्क की स्थापना थोड़ेही करेंगे। ऐसा होता तो उनकी एफ़ीज़ी बनाते। एफ़ीज़ी तो रावण की निकाली जाती है, क्योंकि रावण ही सबका दुश्मन है। बाप जो स्वर्ग की स्थापना करते हैं उनको तो आंखों पर रखा जाता है। बाप कहते हैं मुझे भक्त याद करते हैं कि आकर दु:ख से छुड़ाओ इसलिए आकर लिबरेट करता हूँ। बाप लिबरेटर भी है, रूहानी पण्डा भी है। तुमको ले जाते हैं अपने शान्तिधाम। जो पिया के साथ है, उनके लिए अविनाशी ज्ञान रत्नों की बरसात है, जिन ज्ञान रत्नों का मूल्य नहीं किया जाता। बाबा है ज्ञान सागर तो जरूर आत्मा में पार्ट भरा हुआ है। परमपिता परमात्मा खुद भी कहते हैं मेरी जो आत्मा है, जिसको तुम परमात्मा कहते हो, मेरे में भी पार्ट भरा हुआ है। भक्तों की सम्भाल करना, सबको सुख देना। दु:ख तो माया देती है। भक्तों को अल्पकाल के लिए सुख देने का भी मेरा पार्ट है। मैं ही साक्षात्कार कराता हूँ और दिव्य बुद्धि देता हूँ। जिसको ज्ञान का तीसरा नेत्र कहा जाता है। जिससे तुम्हारी बुद्धि का गॉडरेज का ताला खुलता है। मेरा भी पार्ट है तो जो बाप के साथ हैं उनके लिए ज्ञान बरसात है। अब इतने सब बच्चे कैसे साथ रह सकते! तुम बाप को याद करते रहेंगे तो गोया बाप के साथ ही हो। कोई लन्दन, कोई कहाँ हैं, फिर साथ कहाँ हैं? उनको भी मुरली जाती है। जो सयाने समझदार होते हैं वह एक हफ्ता भी अच्छी रीति समझें तो उनको स्वदर्शन चक्रधारी बना देता हूँ। 84 जन्मों के स्वदर्शन चक्र का राज़ अभी तुम बच्चों ने समझा है। जिस स्वदर्शन चक्र फिराने से माया रावण का सिर काट देते हो अर्थात् उन पर जीत पाते हो। बाकी सिर काटने की कोई बात नहीं है। उन्होंने फिर हिंसक अस्त्र शस्त्र दे दिये हैं। वास्तव में शंख यह मुख है। चक्र फिराना यह बुद्धि का काम है। तो यह अलंकार भक्तिमार्ग में बहुत दे दिये हैं। शास्त्र आदि जो भक्ति मार्ग में चल रहे हैं ड्रामा अनुसार फिर वही निकलेंगे। हो सकता है यह सच्ची गीता भी कोई न कोई के हाथ में आ जाये तो कुछ इनसे भी डाल देंगे। बाकी सभी वही निकलेंगे। कोई-कोई अक्षर उनमें यहाँ के आये हैं। भगवानुवाच ठीक है। राजयोग भी ठीक है। बाप कहते हैं अब वापिस जाना है। इस शरीर सहित सब कुछ भूलना है, इसके बदले तुमको प्योर शरीर मिलेगा। आत्मा भी प्योर हो जायेगी। धन भी तुम्हारे पास अथाह होगा। तुमको बहुत लोभ है। परन्तु इनको शुद्ध कहा जाता है, इससे भारत सारा शुद्ध बनता है। भारतवासी चाहते हैं रामराज्य, वन गवर्मेन्ट, वन नेशन हो, एक मत, अद्वेत मत हो। अद्वेत का अर्थ ही है देवता। यह है आसुरी मत। श्रीमत बिगर सब आसुरी मतें हैं। जिस कारण एक दो में लड़ते झगड़ते रहते हैं। ईश्वर के बच्चे न होने कारण निधन के बन पड़े हैं। सतयुग में देवतायें हैं धनी के। वहाँ जानवर भी कभी लड़ते नहीं। यहाँ तो सब लड़ते झगड़ते हैं। सतयुग में है सबको बेहद का सुख।
अब तुम बच्चे जानते हो हम बाप से ईश्वरीय जन्म सिद्ध अधिकार ले रहे हैं। ईश्वर सम्मुख है ना। कहते हैं मैं कल्प-कल्प आता हूँ - स्वर्ग स्थापन करने। तुम बच्चों के लिए वण्डरफुल सौगात ले आता हूँ। बाप कहते हैं मेरे लाडले सिकीलधे बच्चों 5 हजार वर्ष बाद आकर तुम मिलते हो। ऐसे और कोई कह न सके। भल अपने को ब्रह्मा, विष्णु, शंकर कहलावें। परन्तु ऐसी बातें किसको कहने आयेंगी ही नहीं। इसमें कोई कॉपी कर न सके। बाप कहते हैं मेरे लाडले सिकीलधे बच्चों 5 हजार वर्ष के बाद फिर से आकर तुम मिले हो। सिर्फ तुम ही। बहुत बच्चे मिलते रहेंगे। राजधानी स्थापन करने में बहुत मेहनत लगती है। राजा रानी एक, फिर उनके बच्चे वृद्धि को पायेंगे। भारत में प्रिन्स प्रिन्सेज कितने होंगे। समझो लाख दो हैं, प्रजा होगी 40-50 करोड़। तो मंजिल बहुत बड़ी है। यह बाप की कॉलेज है। तो कितना अच्छी रीति पुरुषार्थ करना चाहिए। बाप तो कहेंगे राजाओं का राजा बनो, न कि प्रजा। बनेंगे वही जो कल्प पहले बने होंगे। हम साक्षी होकर देखेंगे कौन किस प्रकार का वर्सा लेते हैं। कोई तो एकदम पकड़ लेते हैं। मोस्ट बिलवेड बाप है। चुम्बक पर सुईयां खींचकर आती हैं। कोई में कट (जंक) जास्ती होती है, कोई में कम। नजदीक वाले तो एकदम आकर मिलेंगे, साफ सुई झट खींच आयेगी। बाप कट को निकाल कर ऐसा चमकाते हैं जो तुम बच्चे वहाँ साथ रहेंगे। तुमको रूद्र माला में पिरोना है। गायन भी है परन्तु जानते नहीं हैं कि यह माला किसकी बनी हुई है। बाप कहते हैं मेरी माला जो होगी वह स्वर्ग की मालिक होगी। भक्त माला को भी तुम समझ गये हो। वह रावण की माला है। पहले रावण की माला में कौन आते हैं, पूज्य से पुजारी कौन बनते हैं? आपेही पूज्य देवता, फिर पुजारी बनते हैं। यह कितनी गुह्य बातें समझने की हैं।
तुम हो फ्लैन्थ्रोफिस्ट। देह सहित सब कुछ बाबा को बलि चढ़ते हो। संन्यासी फ्लैन्थ्रोफिस्ट नहीं बनते। वह तो घरबार छोड़ जंगल में चले जाते हैं। तुम सब कुछ ईश्वर अर्पण करते हो। एवरीथिंग फार गॉड फादर। तो बाप फिर कहते हैं मेरा सब कुछ तुम बच्चों के लिए है। मनुष्य जब मरते हैं तो सब सामग्री करनीघोर को देते हैं। बाप कहते हैं मैं भी करनीघोर हूँ। तुम्हारे पास पुराना कख-पन है, सब दान करते हो। बाप पर बलिहार जाते हो। काम तो फिर भी तुम्हारे ही आता है। बाबा तो मकान आदि भी अपने लिए नहीं बनाते हैं। शिवबाबा है दाता। सारे स्वर्ग की राजाई तुमको दे देते हैं, इसलिए इनको सौदागर भी कहते हैं। कितनी मीठी-मीठी बातें हैं। इम्तहान पूरा होने वाला है। बाबा आखिर इम्तहान कभी पूरा होगा? बाबा कहते हैं - जब तुम मरने पर आयेंगे, ज्ञान पूरा होगा तब यह विनाश आरम्भ होगा। फिर गोल्डन स्पून इन माउथ। जन्म लेंगे और स्पून मिलेगा। यहाँ तो 30-40 वर्ष पढ़ते हैं, तो यहाँ ही उसका फल मिल जाता है। तुम्हारा तो है भविष्य के लिए। भविष्य जन्म तुमको मिलेगा तो तुम प्रिन्स बनेंगे। तो इम्तहान तब पूरा होगा जब विनाश शुरू होगा। एक तरफ पढ़ाई पूरी होगी और विनाश शुरू हो जायेगा। बाकी रिहर्सल तो होती रहेगी। तुमको इस पढ़ाई का फल फिर नई दुनिया में मिलना है। वहाँ आत्मा, शरीर, राजाई सब नया होता है। यह बड़ी गुह्य धारणा की बातें हैं। पढ़ाई कभी छोड़नी नहीं चाहिए। बाप बैठ समझाते हैं वण्डरफुल बातें हैं ना। देरी से आने वाले भी झट योग और ज्ञान में लग जाते हैं तो वह भी ऊंच पद पा सकते हैं। अच्छा!
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का यादप्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।
धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) शरीर और आत्मा दोनों को पवित्र बनाने के लिए इस पुराने शरीर सहित सब कुछ भूलना है। देह सहित बाप पर पूरा बलि चढ़ फ्लैन्थ्रोफिस्ट (महादानी) बनना है।
2) बाप की श्रीमत पर चल बेहद का सुख लेना है। यह शुद्ध लोभ रखना है, जिससे सारी विश्व सुखी बनें। बाकी अशुद्ध लोभ त्याग देना है।
वरदान:- अमृतवेले के महत्व को जान महान बनने वाले विशेष सेवाधारी भव
सेवाधारी अर्थात् आंख खुले और सदा बाप के साथ बाप के समान स्थिति का अनुभव करें। जो विशेष वरदान के समय को जानते हैं और वरदानों का अनुभव करते हैं वही विशेष सेवाधारी हैं। अगर यह अनुभव नहीं तो साधारण सेवाधारी हुए, विशेष नहीं। जिसे अमृतवेले का, संकल्प का, समय का और सेवा का महत्व है ऐसे सर्व महत्व को जानने वाले महान बनते हैं और औरों को भी महत्व बतलाकर महान बनाते हैं।
स्लोगन:- जीवन की महानता सत्यता की शक्ति है जिससे सर्व आत्मायें स्वत: झुकती हैं।
01.02.2023 HINDI MURLI
“मीठे बच्चे - तुम्हारी नज़र किसी भी देह-धारी की तरफ नहीं जानी चाहिए, क्योंकि तुम्हें पढ़ाने वाला स्वयं निराकार ज्ञान सागर बाप है''
प्रश्नः-ऊंच पद के लिए कौन सी एक मेहनत तुम बच्चे गृहस्थ व्यवहार में रहते भी कर सकते हो?
उत्तर:-गृहस्थ व्यवहार में रहते सिर्फ ज्ञान कटारी चलाओ। स्वदर्शन चक्रधारी बनो और शंख ध्वनि करते रहो। चलते-फिरते बेहद के बाप को याद करो और उसी सुख में रहो तो ऊंच पद मिल जायेगा। यही मेहनत है।
प्रश्नः-योग से तुम्हें कौन सा डबल फ़ायदा होता है?
उत्तर:-एक तो इस समय कोई विकर्म नहीं होता है, दूसरा पास्ट के किये हुए विकर्म विनाश हो जाते हैं।
गीत:-माता तू है सबकी भाग्य विधाता...
ओम् शान्ति। सतसंग वा कॉलेज आदि जो होते हैं वहाँ देखने में आता है - कौन पढ़ाते हैं। नज़र पड़ती है जिस्म पर। कॉलेज में कहेंगे फलाना प्रोफेसर पढ़ाते हैं। सतसंग में कहेंगे फलाना विद्वान सुनाते हैं। मनुष्य पर ही नज़र जाती है। यहाँ तुम्हारी नज़र किसी देहधारी पर नहीं जाती है। तुम्हारी बुद्धि में है कि निराकार परमपिता परमात्मा इस तन द्वारा सुनाते हैं। बुद्धि चली जाती है मात-पिता और बापदादा तरफ। बच्चे सुनाते हैं - तो कहेंगे ज्ञान सागर बाप द्वारा सुना हुआ सुनाते हैं। फ़र्क पड़ गया ना। सतसंगों में कुछ भी सुनते हैं तो समझते हैं फलाना यह वेद सुनाते हैं। मनुष्यों की मर्तबे पर, जाति-पांति पर दृष्टि जाती है। यह हिन्दू है, यह मुसलमान है, दृष्टि वहाँ चली जाती है। यहाँ तुम्हारी दृष्टि जाती है शिवबाबा तरफ। शिवबाबा पढ़ाते हैं। अभी बाप भविष्य नई दुनिया के लिए वर्सा देने आये हैं और कोई ऐसे कह न सके कि हे बच्चों तुमको स्वर्ग के लिए राजयोग सिखला रहे हैं। अब यह गीत भी सुना। गीत तो है पास्ट का। ऐसे जगत अम्बा थी। बरोबर उसने सौभाग्य बनाया, जिसके मन्दिर भी हैं। परन्तु वह कौन थी, कैसे आई, भाग्य कौनसा बनाया, कुछ भी नहीं जानते। तो इस पढ़ाई और उस पढ़ाई में रात-दिन का फ़र्क है। यहाँ तुम समझते हो ज्ञान सागर परमपिता परमात्मा ब्रह्मा मुख द्वारा पढ़ाते हैं। बाप आया हुआ है। भक्तों के पास भगवान को आना ही है। नहीं तो भक्त भगवान को क्यों याद करते हैं? सब भगवान हैं - यह तो रांग हो जाता है। वह सर्वव्यापी के ज्ञान वाले अपनी बात को सिद्ध करने लिए भी अपना 20 नाखूनों का जोर देते हैं। तुम्हारा समझाना अलग हो जाता है। बेहद के बाप से बच्चों को ही वर्सा मिलता है। संन्यासियों का है ही वैराग्य मार्ग, निवृत्ति मार्ग। उनसे कभी भी प्रापर्टी का हक मिल न सके। वह प्रापर्टी चाहते ही नहीं। तुम तो सदा सुख की प्रापर्टी चाहते हो। नर्क के धन दौलत में दु:ख है। भल धनवान हैं परन्तु चलन ऐसी गन्दी चलते हैं, पैसा उड़ाते रहते हैं। फिर बच्चे भूख मरते हैं। तो अपने को भी दु:खी, बच्चों को भी दु:खी करते हैं। यह है बेहद का बाप, वह बैठ बच्चों को समझाते हैं। वह तो भिन्न-भिन्न अनेक बाप हैं, जिनसे अल्पकाल के लिए वर्सा मिलता है। भल राजायें हैं वह भी हद के हो गये। हद का अल्पकाल का सुख है। यह बेहद का बाप अविनाशी सुख देने आते हैं। समझाते हैं भारतवासी जो डबल सिरताज थे स्वर्ग के मालिक थे, अब नर्क के मालिक बन पड़े हैं। नर्क में है दु:ख, बाकी ऐसे कोई नदियां आदि नहीं हैं जैसे रौरव नर्क, विषय वैतरणी नदी आदि के चित्र गरुड़ पुराण में दिखाते हैं। यह तो सज़ायें खानी होती हैं। तो वह रोचक बातें लिख दी हैं। आगे तो जो जिस अंग से बुरा काम करते थे तो वह अंग उनका काटा जाता था। बहुत कड़ी सजा मिलती थी। अब इतनी कड़ी सजा नहीं मिलती है। फांसी की सजा कोई कड़ी नहीं है। वह तो बहुत इज़ी है। मनुष्य आपघात भी बहुत खुशी से करते हैं। शिव पर देवताओं पर झट बलि चढ़ जाते हैं। तुम जानते हो आत्मा दु:खी होती है तो चाहती है एक शरीर छोड़ जाकर दूसरा ले लेवें। वह आपघात करने वाले ऐसे नहीं समझते हैं। वह तो यहाँ ही एक शरीर छोड़ फिर भी यहाँ ही गंदा जन्म ले लेते हैं। ज्ञान तो है नहीं, सिर्फ शरीर को खत्म कर देते हैं - दु:ख के कारण। फिर भी दु:खी जन्म ही पाते हैं। तुम तो जानते हो हम तो नई दुनिया के लायक बन रहे हैं। जीवघात करने वालों में भी वेराइटी होती है। जैसे कोई-कोई स्त्री पति के पिछाड़ी अपना शरीर होमती है। (सती हो जाती है) वह बात अलग है। समझते हैं हम पतिलोक में जायेंगी क्योंकि सुना हुआ है, बहुतों ने किया है। शास्त्रों में भी है कि पति लोक में जाती है। परन्तु वह पति तो कामी ठहरा। फिर भी इसी मृत्युलोक में ही आना पड़े। यहाँ तो ज्ञान चिता पर बैठने से स्वर्ग में चले जाते हैं।
अभी तुम बच्चे जानते हो कि यह जगत अम्बा, जगत पिता जो स्थापना अर्थ निमित्त बने हुए हैं, यही फिर स्वर्ग में पालन-कर्ता बनेंगे। मनुष्य तो जानते नहीं विष्णु कुल किसको कहा जाता है। विष्णु तो है सूक्ष्मवतनवासी, उनका फिर कुल कैसे हो सकता? अभी तुम जानते हो विष्णु के दो रूप लक्ष्मी-नारायण बन पालना करते हैं, राज्य करते हैं। यह है ज्ञान चिता। तुम योग लगाते हो उस एक पतियों के पति साथ। वह है शिवबाबा, वही पतियों का पति, पिताओं का पिता है। सब कुछ वह एक ही है। उसमें सर्व सम्बन्ध आ जाते हैं। बाप कहते हैं इस समय के जो भी चाचे काके आदि तुम्हारे हैं, वह सब तुमको दु:ख की राय बतायेंगे। उल्टे रास्ते की आसुरी मत ही देंगे। बेहद का बाप आकर बच्चों को सुल्टी मत देते हैं। समझो लौकिक बाप कहते हैं कॉलेज में पढ़कर बैरिस्टर आदि बनो। वह कोई उल्टी मत थोड़ेही है। शरीर निर्वाह अर्थ तो वह राइट है। वह पुरुषार्थ तो करना ही है। उनके साथ-साथ फिर भविष्य 21 जन्मों के शरीर निर्वाह अर्थ भी पुरुषार्थ करना है। पढ़ाई होती ही है शरीर निर्वाह के लिए। शास्त्रों की पढ़ाई भी है निवृत्ति मार्ग वालों के शरीर निर्वाह अर्थ। वह अपने शरीर निर्वाह अर्थ ही पढ़ते हैं। संन्यासी भी शरीर निर्वाह अर्थ कोई 50, कोई 100, कोई हजार भी कमाते हैं। एक ही कश्मीर का राजा मरा तो कितने पैसे मिल गये आर्य समाजियों आदि को। तो यह सब करते ही हैं पेट के लिए। सम्पत्ति बिगर तो सुख होता नहीं। धन है तो मोटरों आदि में घूमते हैं। आगे संन्यासी पैसे के लिए संन्यास नहीं करते थे, वह तो चले जाते थे जंगल में। इस दुनिया से तंग हो अपने को छुड़ाते हैं। परन्तु छूट नहीं सकते। बाकी पवित्र रहते हैं। पवित्रता के बल से भारत को थमाते हैं। यह भी भारत को सुख देते हैं। यह पवित्र नहीं बनते तो भारत टू मच वेश्यालय बन जाता। पवित्रता सिखलाने वाले एक यह निवृत्ति मार्ग वाले हैं, दूसरा है बाप। वह है निवृत्ति मार्ग वाली पवित्रता। यह है प्रवृत्ति मार्ग की पवित्रता। भारत में पवित्र प्रवृत्ति मार्ग था। हम देवी-देवतायें पवित्र थे। अब अपवित्र बन गये हैं। पूरा आधाकल्प 5 विकारों द्वारा हम अपवित्र बनते हैं। माया ने थोड़ा-थोड़ा करते पूरा ही अपवित्र, पतित बना दिया है। दुनिया में यह कोई भी मनुष्य नहीं जानते कि हम पावन से पतित कैसे बनते हैं। समझते भी हैं कि यह पतित दुनिया है। समझो किसी मकान की आयु 100 वर्ष है, तो कहेंगे 50 वर्ष नया, 50 वर्ष पुराना, आहिस्ते-आहिस्ते पुराना होता जाता है। इस सृष्टि का भी ऐसे है। एकदम नई दुनिया में सुख होता है फिर आधा के बाद पुरानी होती है। गाया भी जाता है सतयुग में अथाह सुख है। फिर पुरानी दुनिया होती है तो दु:ख शुरू होता है। रावण दु:ख देते हैं। पतित रावण ने किया है, जिसका बुत जलाते हैं। यह बड़ा दुश्मन है। कोई ने गवर्मेन्ट को अप्लाई किया कि रावण को नहीं जलाया जाए, बहुतों को दु:ख होता है। रावण को विद्वान बताते हैं। मिनिस्टर आदि कोई भी समझते नहीं हैं। अभी तुम जानते हो कि रावण का राज्य द्वापर से शुरू होता है। भारत में ही रावण को जलाते हैं। बाप समझाते हैं द्वापर से यह भक्ति, अज्ञान मार्ग शुरू होता है। ज्ञान से दिन, भक्ति से रात।
अब देखो जगत अम्बा का गीत गाते हैं। परन्तु समझते नहीं कि सौभाग्य विधाता कैसे है। कितना बड़ा मेला लगता है। परन्तु जगदम्बा है कौन, यह भी जानते नहीं। बंगाल में काली को भी बहुत मानते हैं, परन्तु जानते नहीं हैं कि काली और जगदम्बा में क्या फ़र्क है। जगदम्बा को गोरा दिखाते हैं, काली को काला बना दिया है। जगदम्बा ही लक्ष्मी बनती है तो गोरी है। फिर 84 जन्म लेते-लेते काली हो जाती है। तो मनुष्य कितने मूँझे हुए हैं। वास्तव में काली अथवा अम्बा है तो एक ही। कुछ भी नहीं जानते - इसको कहा जाता है अन्धश्रद्धा। अभी तुम बच्चे जानते हो जो पास्ट में जगत अम्बा थी - उसने भारत का भाग्य बनाया था। तुम भी भारत का सौभाग्य बना रहे हो। माताओं का ही मुख्य नाम है। संन्यासियों का भी माताओं को उद्धार करना है। यह भी नूँध है। परमपिता परमात्मा ने डायरेक्शन दिया है, इन्हों को ज्ञान बाण मारो। तुम बच्चियां भी संन्यासियों आदि से मिलती हो तो समझाती हो कि हमको ज्ञान सागर परमपिता परमात्मा पढ़ाते हैं। तुम हद के संन्यासी हो, हम हैं बेहद के। हमको बाप राजयोग सिखलाते ही तब हैं जबकि तुम्हारा हठयोग पूरा होना है। हठयोग और राजयोग दोनों इकट्ठे रह नहीं सकते। तो टाइम कोई अब जास्ती नहीं है, बहुत थोड़ा टाइम है। बाप कहते हैं बच्चे गृहस्थ व्यवहार में रहते कमलफूल समान बनो। ब्राह्मणों को ही कमलफूल समान रहना है। कुमारियां तो हैं ही पवित्र, कमलफूल समान। बाकी जो विकार में जाते हैं उनको कहते हैं पवित्र बनो। गृहस्थ व्यवहार में रहते कमल फूल समान बनो। हर एक स्वदर्शन चक्रधारी बनो। शंख बजाओ। ज्ञान कटारी चलाओ तो बेड़ा पार हो जायेगा। मेहनत है, मेहनत बिगर इतना ऊंचा पद पा नहीं सकते। चलते-फिरते उसी सुख में रहो। बाप को याद करो। जो बहुत सुख देते हैं उनकी याद रहती है ना। अब तुम्हें याद करना है बेहद के बाप को। उनका ही परिचय देना है। समझाना है बोलो, तुम राज-विद्या इस जन्म में पढ़कर बैरिस्टर आदि बनेंगे। अच्छा समझो, पढ़ते-पढ़ते अथवा इम्तहान पास करते तुम्हारी आयु पूरी हो जाये, शरीर छूट जाये तो पढ़ाई यहाँ ही खत्म हो जायेगी। कोई इम्तहान पास कर लण्डन गया, वहाँ मर पड़ा तो पढ़ाई खत्म हो जायेगी। वह है ही विनाशी पढ़ाई। यह है अविनाशी पढ़ाई। इसका कभी विनाश नहीं होता है। तुम जानते हो नई दुनिया में आकर हमको राज्य करना है। वह है अल्पकाल का सुख। सो भी जब नसीब मे हो। पता नहीं कितना समय चले। यहाँ तो सर्टेन है। इम्तहान पूरा हुआ और तुम जाकर 21 जन्म का राज्य-भाग्य लेंगे। हद के बाप, टीचर, गुरू से हद का ही वर्सा मिलता है। समझते हैं गुरू से शान्ति मिली। अरे यहाँ थोड़ेही शान्ति हो सकती है। आरगन्स से काम करते-करते थक जाते हैं तो आत्मा शरीर से डिटेच हो जाती है। बाप कहते हैं शान्ति तो तुम्हारा स्वधर्म है। यह आरगन्स हैं, काम नहीं करने चाहते हो तो चुप हो बैठ जाओ। हम अशरीरी हैं, बाप से योग लगाते हैं तो विकर्म विनाश हो जायें। भल कोई संन्यासी से तुमको शान्ति मिले परन्तु उससे विकर्म विनाश नहीं हो सकता। यहाँ बाप को याद करने से विकर्माजीत बनते जायेंगे। अच्छा वो शान्ति में बैठे हैं, करके विकर्म भी विनाश होंगे। डबल फ़ायदा होगा। पुराने विकर्म भी विनाश होते हैं। सिवाए इस योगबल के पुराने विकर्म किसी भी हालत में किसके विनाश हो नहीं सकते। प्राचीन योग भारत का ही गाया हुआ है। इससे ही जन्म-जन्मान्तर के विकर्म विनाश होते हैं और कोई उपाय है नहीं। अभी यह वृद्धि बन्द होनी है। गवर्मेन्ट भी चाहती है वृद्धि जास्ती न हो। हम तो वृद्धि इतनी कम करते हैं जो बहुत थोड़े रहेंगे, बाकी सब चले जायेंगे। मनुष्य समझते भी हैं कि विनाश होगा परन्तु लड़ाई को बन्द देख फिर समझते हैं पता नहीं होगा या नहीं। ठण्डे हो जाते हैं। बाप समझाते हैं - बच्चे समय बाकी थोड़ा है इसलिए ग़फलत मत करो। अच्छा।
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का यादप्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।
धारणा के लिए मुख्य सार:-1) शरीर से डिटेच हो, अशरीरी बन सच्ची शान्ति का अनुभव करना है। बाप की याद से स्वयं को विकर्माजीत बनाना है।
2) अविनाशी प्रालब्ध बनाने के लिए अविनाशी पढ़ाई पर पूरा ध्यान देना है। उल्टी सब मतों को छोड़ एक बाप की सुल्टी मत पर चलना है।
वरदान:- ऊंची स्टेज पर रह प्रकृति की हलचल के प्रभाव से परे रहने वाले प्रकृतिजीत भव
मायाजीत तो बन रहे हो लेकिन अब प्रकृतिजीत भी बनो क्योंकि अभी प्रकृति की हलचल बहुत होनी है। कभी समुद्र का जल अपना प्रभाव दिखायेगा, तो कभी धरनी अपना प्रभाव दिखायेगी। अगर प्रकृतिजीत होंगे तो प्रकृति की कोई भी हलचल हिला नहीं सकेगी। सदा साक्षी होकर सब खेल देखेंगे। जैसे फरिश्तों को सदा ऊंची पहाड़ी पर दिखाते हैं, ऐसे आप फरिश्ते सदा ऊंची स्टेज पर रहो तो जितना ऊंचें होंगे उतना हलचल से स्वत: परे हो जायेंगे।
स्लोगन:- अपने श्रेष्ठ वायब्रेशन से सर्व आत्माओं को सहयोग की अनुभूति कराना भी तपस्या है।
इस मास की सभी मुरलियाँ (ईश्वरीय महावाक्य) निराकार परमात्मा शिव ने ब्रह्मा मुखकमल से अपने ब्रह्मावत्सों अर्थात् ब्रह्माकुमार एवं ब्रह्माकुमारियों के सम्मुख 18-1-1969 से पहले उच्चारण की थी। यह केवल ब्रह्माकुमारीज़ की अधिकृत टीचर बहनों द्वारा नियमित बीके विद्यार्थियों को सुनाने के लिए हैं।
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