Monday, January 30, 2023

31.01.2023 HINDI MURLI

                                                  31.01.2023 HINDI MURLI 

मीठे बच्चे - तुम हो मोस्ट लकी बच्चे क्योंकि तुम्हारे सम्मुख स्वयं बाप है, वह तुम्हें सुना रहे हैं''

प्रश्नः-भक्ति मार्ग का कौन सा संस्कार अभी तुम बच्चों में नहीं हो सकता? क्यों?

उत्तर:-भक्ति मार्ग में जिस भी देवी या देवता के पास जायेंगे उससे कुछ कुछ मांगते ही रहेंगे। किसी से धन मांगेंगे, किसी से पुत्र मांगेगे। यह मांगने के संस्कार अभी तुम बच्चों में नहीं हो सकते क्योंकि बाप ने संगम पर तुम्हें कामधेनु बनाया है। तुम बाप समान सबकी मनोकामनायें पूर्ण करने वाले हो। तुम स्वयं के प्रति कोई आशा नहीं रख सकते। तुम जानते हो फल देने वाला एक ही दाता बाप है, जिसे याद करने से सब प्राप्तियां हो जाती हैं इसलिए मांगने के संस्कार समाप्त हो जाते हैं।

गीत:-ओम् नमो शिवाए...


ओम् शान्ति। भगवानुवाच। अब अच्छी रीति समझकर फिर समझाने के लिए एक गीता शास्त्र ही है। शास्त्र तो बनाया है मनुष्यों ने। परन्तु राजयोग मनुष्य नहीं सिखाते। बाप कहते हैं मैंने ही 5 हजार वर्ष पहले भी तुम भारतवासी सिकीलधे बच्चों को राजयोग सिखाया था। सिकीलधे का अर्थ तो समझाया है कि तुम ही पूरे 84 जन्म लेकर फिर आए मिले हो। 5 हजार वर्ष पहले भी तुम मिले थे और तुम आकर ब्रह्मा मुख वंशावली अर्थात् ब्राह्मण ब्राह्मणी बने थे। बाप डायरेक्ट बोलते हैं। वह गीता पाठी आदि यह बातें नहीं करेंगे। बाप डायरेक्ट समझाकर गये थे फिर भक्ति मार्ग से शास्त्र बनाते हैं। अब ड्रामा पूरा होता है। फिर बाप आया है कहते हैं बच्चों को, कौन से बच्चे? कहते हैं खास तुम और आम सारी दुनिया। तुम अभी सम्मुख हो। तुमको बैठ बाबा ने अपना परिचय दिया है। यह राजयोग तुमको और कोई सिखला न सके। बाप ने ही पहले योग सिखलाया था, अब सिखला रहे हैं जिससे तुम फिर राजाओं का राजा बनेंगे और कोई स्वर्ग का मालिक बना न सके। मैं तुम्हारा बाप आया हूँ फिर से तुमको राजयोग सिखलाने। अच्छा अब बाबा तुमको झाड़ पर समझाते हैं। यह समझानी भी बहुत जरूरी है। इनको कल्प-वृक्ष कहा जाता है। बाप कहते हैं यह मनुष्य सृष्टि रूपी झाड़ कल्प वृक्ष है। वह गीता सुनाने वाले कहेंगे भगवान ने यह कहा था और तुम कहेंगे भगवान कह रहा है। यह है मनुष्य सृष्टि का झाड़। इसमें कोई फल फ्रूट आम आदि नहीं हैं। उस फल फ्रूट का झाड़ जो होता है उनका बीज नीचे, झाड़ ऊपर में होता है। इनका बीच ऊपर और झाड़ नीचे हैं। कहते भी हैं ईश्वर ने हमको पैदा किया है अर्थात् बाप ने बच्चे दिये हैं। बाप ने धन दिया है। बाबा आप हमारे सब दु:ख दूर करो। बाबा, बाबा कहते रहते हैं। लक्ष्मी-नारायण के आगे जाते हैं, उनसे भी मांगते हैं, महालक्ष्मी हमको धन दो। यह सब मांगने के संस्कार हैं। जगत अम्बा से कोई पुत्र मांगेंगे तो कोई कहेंगे हमारी बीमारी दूर करो। लक्ष्मी के आगे ऐसी आशायें नहीं रखेंगे, उनसे सिर्फ धन मांगते हैं। यह तो तुम जानते हो - जगत अम्बा सो लक्ष्मी, सो फिर 84 जन्मों का चक्र लगाकर फिर जगत अम्बा बनती है। झाड़ में देखो जगत अम्बा बैठी है। यही फिर महारानी बनेंगी जरूर, तुम बच्चे भी राजधानी में आयेंगे। तुम कल्प वृक्ष के नीचे बैठे हो। संगम पर फाउन्डेशन लगा रहे हो। कामधेनु के तुम बच्चे ही सबकी मनोकामना पूर्ण करने वाले हो। तुम भारत माता शक्ति सेना हो, इसमें पाण्डव भी हैं।

बच्चों को समझाया गया है कि याद एक बाप को ही करना है। देने वाला एक बाप है। भल तुम किसकी भी भक्ति करो, किसको भी याद करो परन्तु फल देने वाला फिर भी एक ही दाता है। वही सब कुछ देता है। भक्ति मार्ग में तुम श्रीनारायण की, श्रीकृष्ण की पूजा करते हो, कृष्ण को झुलाते भी हो, प्यार करते हो। उनसे तुम क्या मांगेंगे। तुम चाहते हो हम उनकी राजधानी में जायें अथवा हमको श्रीकृष्ण जैसा बच्चा मिले। गाते हैं भजो राधे गोविन्द चलो वृन्दावन। जहाँ राज्य भाग्य करते थे वैकुण्ठ में। उस समय कोई भी अप्राप्ति नहीं होती। श्रीकृष्ण के राज्य को याद तो बहुत करते हैं। भारत में जब श्रीकृष्ण का राज्य था तो और कोई राज्य नहीं था। अब बाप आये हैं कहते हैं चलो कृष्णपुरी में, चलकर श्रीकृष्ण की पत्नि बनो या राधे का पति बनो। बात एक ही है। वहाँ विष नहीं मिलेगा। वह है ही सम्पूर्ण निर्विकारी दुनिया। अभी तुम स्टूडेन्ट हो, पढ़ रहे हो नर से नारायण, बेगर से प्रिन्स बनने के लिए। यहाँ भल कोई करोड़-पति हैं, 50 करोड़ हैं लेकिन तुम्हारी भेंट में वह गरीब हैं क्योंकि यह सब उनका धन मिट्टी में मिल जाना है। कुछ भी साथ नहीं चलेगा। हाथ खाली जायेंगे। तुम तो हाथ भरतू करके जाते हो 21 जन्मों के लिए। अभी तुम राजयोग सीख रहे हो। फिर सतयुग में आकर राज्य करेंगे। तुम पुनर्जन्म लेते वर्णो में आते रहते हो। सतयुग में हैं 16 कला, त्रेता में हैं 14 कला। फिर भक्ति मार्ग शुरू होता है फिर इब्राहम, बुद्ध आते हैं। क्राइस्ट के 3 हजार वर्ष पहले देवी-देवताओं का राज्य था। अब सारा झाड़ जड़जड़ीभूत अवस्था को पाया हुआ है। अभी तुम कल्पवृक्ष के नीचे संगम पर बैठे हो, इसको कहा जाता है कल्प का संगम अथवा कलियुग और सतयुग का संगम। सतयुग के बाद त्रेता, फिर त्रेता के बाद द्वापर और कलियुग का संगम। कलियुग के बाद फिर सतयुग जरूर आयेगा। बीच में संगम जरूर चाहिए। कल्प के संगमयुगे बाप आते हैं। उन्होंने कल्प अक्षर बदल सिर्फ युगे-युगे लिख दिया है। बाप कहते हैं मैं निराकार परमपिता परमात्मा ज्ञान का सागर हूँ। भारत में ही शिव जयन्ती गाई जाती है। श्रीकृष्ण तो ज्ञान दे न सके। तुम कहते हो हम स्वर्ग में श्रीकृष्ण के साथ मिलेंगे। बाप कहते हैं भक्ति में श्रीकृष्ण का साक्षात्कार मैं तुमको कराता हूँ। कृष्ण जयन्ती पर बहुत प्रेम से उनको झूला झुलाते हैं, पूजा करते हैं। उनको जैसे सच-सच श्रीकृष्ण दिखाई पड़ता है। साक्षात्कार होगा, कृष्ण का चित्र होगा तो उनको भी उठाकर भाकी पहनेंगे। भक्ति मार्ग में मैं ही मदद करता हूँ। दाता मैं हूँ। लक्ष्मी की पूजा करते हैं, अब वह तो है ही पत्थर की मूर्ति। वह क्या देगी? देना फिर भी मुझे ही पड़ता है। साक्षात्कार भी मैं ही कराता हूँ। यह भी ड्रामा में नूँध है। जैसे कहते हैं परमपिता परमात्मा के हुक्म से पत्ता-पत्ता हिलता है क्योंकि वह समझते हैं पत्ते-पत्ते में परमात्मा है। क्या परमात्मा बैठ पत्ते को हुक्म करेगा क्या! यह तो ड्रामा बना हुआ है। अभी तुम जैसी एक्ट कर रहे हो, वह कल्प के बाद भी तुम ऐसे ही करेंगे। जो कुछ शूटिंग में शूट हुआ वही चलेगा। उसमें कुछ फ़र्क नहीं पड़ सकता। ड्रामा को भी अच्छी रीति समझना है। बाप समझाते हैं बेहद का सुख कल्प-कल्प भारत को ही मिलता है। परन्तु जो ब्राह्मण बनते हैं वही वर्णों में आते हैं। 84 जन्म लेते हैं। फिर औरों के जन्म नम्बरवार कम होते जायेंगे। कितने छोटे-छोटे मठ पंथ हैं। भल उन्हों की महिमा है - क्योंकि पवित्र हैं। स्वर्ग का रचयिता तो है बाप, और कोई मनुष्य थोड़ेही स्वर्ग रचेगा। फिर राजयोग भी कोई सिखलावे?

अभी तुम श्रीकृष्णपुरी में जाने के लिए राजयोग सीख रहे हो। पुरुषार्थ हमेशा ऊंचा करना चाहिए। तुम कहते हो श्रीकृष्ण जैसा बच्चा मिले, श्रीकृष्ण जैसा पति मिले। श्रीकृष्ण ही श्रीनारायण बनता है फिर श्रीकृष्ण जैसा क्यों कहते! तुमको तो कहना चाहिए नारायण जैसा पति मिले। नारद ने भी कहा हम लक्ष्मी को वरें। राधे के लिए नहीं कहा। बाप समझाते हैं तुमको कृष्णपुरी चलना है तो खूब पुरुषार्थ करो, वह है श्रीकृष्ण का दैवी कुल। कंस का है आसुरी कुल। तुम अभी हो संगम पर। शूद्र सम्प्रदाय तो ब्राह्मण ब्राह्मणी कहला न सकें। जो ब्राह्मण न कहलायें वह शूद्र वर्ण के हैं। भारत की ही बात है। भारत ही स्वर्ग बनता फिर भारत ही नर्क बन जाता है। लक्ष्मी-नारायण को भी 84 जन्म ले रजो तमो में आना ही है। जबकि वह भी चक्र में आते हैं तो बुद्ध आदि वापिस निर्वाणधाम में कैसे जा सकते। कोई तो कह देते कृष्ण सर्वव्यापी है, जिधर देखो कृष्ण ही कृष्ण है। राम के भक्त कहेंगे राम सर्वव्यापी है। वह कृष्ण को नहीं मानेंगे। बाबा के पास एक राधापंथी आया था कहता था राधे ही राधे... राधे हाज़िराहज़ूर है। तेरे में मेरे में राधे ही राधे है। गणेश का पुजारी कहेगा तेरे में मेरे में गणेश ही गणेश है। क्रिश्चियन फिर कहते क्राइस्ट गॉड का सन (बच्चा) है। अरे क्राइस्ट सन था तो तुम किसके सन (बच्चे) हो? अनेक मत मतान्तर हैं। रास्ता कोई को भी मिलता नहीं। सिर्फ माथा टेकते, भटकते रहते हैं। मुक्ति और जीवनमुक्ति भगवान ही देंगे ना! उनसे हम क्या मांगें! कोई को पता ही नहीं। बाप को न जानने कारण निधनके बन गये हैं। फिर धनी आकर धणका बनाते हैं। मनुष्य कितने धक्के खाते हैं, समझते हैं भक्ति से भगवान मिलेगा। बाप कहते हैं मैं आता ही हूँ अपने समय पर। भल कोई कितना भी पुकारे परन्तु मैं आता हूँ संगम पर। एक ही बार भारत को स्वर्ग बनाए सबको शान्ति में भेज देता हूँ। फिर नम्बरवार अपने-अपने समय पर आते हैं। जो देवी-देवता थे वह भी सब आत्मायें बैठी हुई हैं। फिर से अपना राज्य भाग्य ले रहे हैं। अभी तो देवी-देवता धर्म ही नहीं है। सब अपने को हिन्दू कहलाने लग पड़े हैं। ड्रामा अनुसार फिर भी ऐसा होगा। जो कुछ हो चुका है वह फिर रिपीट होगा। फिर ऐसे हम चक्र में आयेंगे, इतने जन्म लेंगे। हिसाब निकालो। हर एक धर्म वाले पीछे कितने जन्म लेंगे? झाड़ पर समझाना बहुत सहज है। आपेही मनुष्यों को टच होगा कि कोई की प्रेरणा से यह विनाश ज्वाला की तैयारी हो रही है। यूरोपवासी यादव बाम्ब्स बनाते हैं। वह भी कहते हैं हमको कोई प्रेरणा देने वाला है। हम जानते हैं कि इससे हम अपने ही कुल का विनाश करते हैं। न चाहते हुए भी यह मौत का सामान बनाते हैं। धीरे-धीरे प्रभाव पड़ेगा। धीरे धीरे झाड़ बढ़ता है ना। कोई कांटे से कली, कोई फूल बनते हैं। कोई कोई फूलों को भी तूफान लगता है तो मुरझा जाते हैं। बाबा ने कल्प-कल्प कहा था आश्चर्यवत सुनन्ती, कथन्ती... अब फिर बाबा खुद कह रहे हैं, हमारे पास आवन्ती, ब्रह्माकुमार कुमारी बनन्ती, कथन्ती फिर भी अहो मम माया अच्छे-अच्छे बच्चों को खावन्ती (खा गई) आगे चलकर देखना कैसे अच्छे-अच्छे बच्चे भी खत्म हो जाते हैं।

जो पास्ट हो गया सो फिर अब प्रेजन्ट में बाप समझाते हैं। फिर भक्ति मार्ग में शास्त्र बनायेंगे। यह ड्रामा ऐसा बना हुआ है। अब बाप आकर ब्रह्मा द्वारा सभी वेदों शास्त्रों का सार समझा रहे हैं। जो धर्म स्थापन करते हैं उनके नाम पर ही शास्त्र बनाते हैं। उसको धर्म शास्त्र कहा जाता है। देवी-देवता धर्म का शास्त्र एक ही गीता है। हरेक धर्म का एक शास्त्र होना चाहिए। श्रीमत भगवद गीता ठीक है। भगवानुवाच है। भगवान ने आदि सनातन देवी-देवता धर्म की स्थापना की। यह है सबसे प्राचीन धर्म। हरेक धर्म का अपना-अपना शास्त्र है और पढ़ते रहते हैं। अभी तुम देवता बनते हो लेकिन तुमको शास्त्र पढ़ने की दरकार नहीं, वहाँ शास्त्र होता ही नहीं। यह सब खत्म हो जायेंगे फिर गीता कहाँ से आई? द्वापर में बैठ मनुष्यों ने बनाई, जो गीता अभी है फिर भी वही गीता खोजकर निकालेंगे। जैसे कल्प पहले बनाई है वैसे फिर यह शास्त्र बनेंगे। भक्ति मार्ग की सामग्री बनती ही जायेगी।

बाप समझाते हैं सिकीलधे बच्चे मुझ बाप की श्रीमत पर चल श्रेष्ठ बनो। तुम अभी संगमयुग पर राजयोग सीख रहे हो, जबकि कलियुग को सतयुग बनाना है। उन्होंने कल्प की आयु लम्बी बताए सभी को घोर अन्धियारे में डाल दिया है। मनुष्य तो मूंझे हुए हैं, ड्रामा अनुसार तुम बच्चों को ही बेहद के बाप से वर्सा लेना है। बाबा ने बहुत युक्तियां बताई हैं सिर्फ बाबा को याद करो, चार्ट रखो। भोजन बनाने समय भी याद करो। भोजन बनाने समय पति, बच्चा याद पड़ता है तो शिवबाबा क्यों नही पड़ सकता! यह तुम्हारा काम है। बाबा बुद्धि की सीढ़ी देते हैं फिर चढ़ो न चढ़ो, यह है तुम्हारा काम। जितना याद करेंगे उतनी सीढ़ी चढ़ते जायेंगे। नहीं तो इतना सुख नहीं मिलेगा। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे अर्थात् 5 हजार वर्ष के बाद फिर आए मिले हुए बच्चों को नम्बरवार पुरुषार्थ अनुसार मात-पिता बापदादा का यादप्यार और गुडमार्निंग। मीठे-मीठे रूहानी बाप का रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) कृष्णपुरी में चलने के लिए पुरुषार्थ बहुत अच्छा करना है। शूद्र पन के सस्कारों को परिवर्तन कर पक्का ब्राह्मण बनना है।

2) बुद्धिबल से याद की सीढ़ी पर चढ़ना है। सीढ़ी चढ़ने से ही अपार सुख का अनुभव होगा।


वरदान:- अटेन्शन और चेकिंग की विधि द्वारा व्यर्थ के खाते को समाप्त करने वाले मा. सर्वशक्तिमान् भव

ब्राह्मण जीवन में व्यर्थ संकल्प, व्यर्थ बोल, व्यर्थ कर्म बहुत समय व्यर्थ गंवा देते हैं। जितनी कमाई करने चाहो उतनी नहीं कर सकते। व्यर्थ का खाता समर्थ बनने नहीं देता इसलिए सदा इस स्मृति में रहो कि मैं मास्टर सर्वशक्तिमान हूँ। शक्ति है तो जो चाहे वो कर सकते हैं। सिर्फ बार-बार अटेन्शन दो। जैसे क्लास के समय वा अमृतवेले की याद के समय अटेन्शन देते हो, ऐसे बीच-बीच में भी अटेन्शन और चेकिंग की विधि अपना लो तो व्यर्थ का खाता समाप्त हो जायेगा।

स्लोगन:- राजऋषि बनना है तो ब्राह्मण आत्माओं की दुआओं से अपनी स्थिति को निर्विघ्न बनाओ।

Sunday, January 29, 2023

30.01.2023 BANGLA MURLI

                                  30.01.2023 BANGLA MURLI



 

"মিষ্টি বাচ্চারা - তোমরা হলে ঈশ্বরীয় সন্তান, এ হলো তোমাদের অমূল্য জীবন, তোমাদের ঈশ্বরীয় কুল হলো অতীব শ্রেষ্ঠ। স্বয়ং ঈশ্বর তোমাদের অ্যাডপ্ট (দত্তক) করেছেন, সেই নেশাতেই থাকো"

প্রশ্নঃ -  শরীরের বোধ ছিন্ন হয়ে যায় - এর জন্য কোন্ অভ্যাসের আবশ্যকতা রয়েছে?

উত্তরঃ -চলতে-ফিরতে অভ্যাস করো যে আমি হলাম এই শরীরে অল্প সময়ের জন্য নিমিত্ত মাত্র রয়েছি। যেমন বাবা অল্প সময়ের জন্য শরীরে এসেছেন তেমনই আমরা আত্মারাও শ্রীমতানুসারে ভারতকে স্বর্গে পরিণত করার জন্য এই শরীর ধারণ করেছি। বাবা আর উত্তরাধিকার স্মরণে থাকলে এই দেহ বোধ ছিন্ন হয়ে যাবে, একেই বলা হয়ে থাকে সেকেন্ডে জীবনমুক্তি। ২) অমৃতবেলায় উঠে বাবার সাথে মিষ্টি মিষ্টি কথা বলো তাতেও দেহ বোধ সমাপ্ত হতে থাকবে।

*গীতঃ- ওম্ নমঃ শিবায়....


ওম্ শান্তি । ঈশ্বর হলেনই অদ্বিতীয়, যিনি আবার বাবাও। বাচ্চাদের বোঝানো হয়েছে আত্মার রূপ এত বড় কোনো লিঙ্গ নয়। আত্মা তো অতি ক্ষুদ্র নক্ষত্রের মতন, ভ্রুকুটির মধ্যভাগে থাকে। এত বড় কোনো জ্যোতির্লিঙ্গম নয় যা মন্দিরে রাখা হয়ে থাকে । যেমন আত্মা তেমনই পরমাত্মা বাবাও। আত্মার রূপ মানুষের মতন নয়। আত্মা তো মানুষের শরীরের আধার নেবে। আত্মাই সব কিছু করে। সমস্ত সংস্কার আত্মাতেই রয়েছে। আত্মা হলো স্টার। আত্মাই ভালো মন্দ সংস্কার অনুসারে জন্ম নিয়ে থাকে। তাই এই কথাগুলিকে ভালোভাবে বুঝতে হবে। মন্দিরে শিবলিঙ্গ রাখা রয়েছে, সেইজন্য বোঝানোর জন্য আমরাও শিবলিঙ্গ দেখিয়ে থাকি। এঁনার নাম হলো শিব, নাম ব্যতীত কোন বস্তুই হয় না। কিছু না কিছু আকার রয়েছে। বাবা হলেন পরমধাম-নিবাসী। পরমাত্মা বাবা বলে থাকেন - যেমন আত্মা শরীরে থাকে তেমনই আমাকেও আসতে হয়, নরককে স্বর্গে পরিণত করার জন্য। বাবার মহিমা হলো সবথেকে আলাদা। বাচ্চারা, তোমরা এখন জানো, তোমরা আত্মারা এসেছো এখানে (নিজের) ভূমিকা পালন করতে। এ হলো অসীমের অনাদি, অবিনাশী ড্রামা, এর কখনো বিনাশ হয় না। এ আবর্তিত (ঘুরতেই) হতেই থাকে। রচয়িতা বাবাও এক, রচনাও এক। এ হলো অসীম জগতের সৃষ্টিচক্র। যার ৪টি যুগ রয়েছে। দ্বিতীয় হলো কল্পের সঙ্গমযুগ, যেখানে বাবা এসে পতিত দুনিয়াকে পবিত্র করেন। এই চক্র আবর্তিত হতে থাকে। বাচ্চারা, তোমাদের এখন স্মৃতি এসেছে যে আমরা সমস্ত বাচ্চারাই হলাম পরমধাম-নিবাসী। এই কর্মক্ষেত্রে ভূমিকা পালন করতে এসেছি। এই অসীম জগতের ড্রামাকে পুনরাবৃত হতে হবে। বাবা হলেন অসীম জগতের মালিক। ওই বাবার অপার মহিমা রয়েছে। এমন মহিমা আর কারোর নেই। তিনি হলেন মনুষ্য সৃষ্টির বীজরূপ। তিনি হলেন সকলের বাবা। আমি ভিনদেশী (অপরের) রাবণের দুনিয়ায় এসেছি। একদিকে হলো আসরীক-গুণ সম্পন্ন সম্প্রদায়। অন্যদিকে হলো দৈবী-গুণসম্পন্ন সম্প্রদায়। একে কংসপুরীও বলা হয়ে থাকে। কংস অসুরকে বলা হয়। শ্রীকৃষ্ণকে দেবতা বলা হয়ে থাকে। এখন বাবা এসেছেন দেবতা বানাতে আর সকলকে ফিরিয়ে নিয়ে যেতে, আর কারোর এই শক্তি নেই। বাবাই বসে বাচ্চাদের শিক্ষা দিয়ে দৈবীগুণ ধারণ করান। এ হলো বাবারই কর্তব্য। বাবা বলেন যখন সকলেই তমোপ্রধান হয়ে যায়, আমাকে ভুলে যায়, না কেবল ভুলে যায় উপরন্তু আমাকে পাথর-মাটির টুকরোর মধ্যে ফেলে দেয়। এত গ্লানি করে, তবেই তো আমি আসি। আমার মতন গ্লানি আর কারোর করে না, তবেই তো আমি এসে তোমাদের লিবারেটর (মুক্তিদাতা) হই। সকলকে মশার ঝাঁকের মতন নিয়ে যাব। আর কেউই এমন বলতে পারেনা যে মন্মনাভব, আমাকে অর্থাৎ নিজের পরমপিতা পরমাত্মাকে স্মরণ করো তবেই বিকর্ম বিনাশ হবে। শ্রীকৃষ্ণ তো এমন বলতে পারেনা। পরমাত্মার মহিমা তো বাচ্চারা জানে। তিনি হলেন জ্ঞানের সাগর সুখের সাগর। তারপর দ্বিতীয় নাম্বারে হলো ব্রহ্মা, বিষ্ণু, শংকর। ব্রহ্মার দ্বারা স্থাপনা কে করবে? শ্রীকৃষ্ণ কি? পরমপিতা পরমাত্মা শিব বসে বুঝিয়ে থাকেন যে সর্বপ্রথমে আমার ব্রাহ্মণ চাই। তাই ব্রহ্মার দ্বারা ব্রাহ্মণ মুখ-বংশাবলী রচনা করে থাকি। ওরা হলো গর্ভজাত। এখন সঙ্গমে তোমরা হলে ব্রহ্মার সন্তান। বাবা এসে শূদ্র থেকে ব্রাহ্মণে পরিনত করেন। এখন তোমরা হলে ঈশ্বরীয় কুলের। ঈশ্বর হলেন নিরাকার, ব্রহ্মা হলেন সাকারী। বাবা সর্বপ্রথমে ব্রাহ্মণ তারপর দেবতা তৈরি করেন। দেবতার পর ক্ষত্রিয়...….. এই চক্র আবর্তিত হতেই থাকে। তারপর এর থেকে অন্য ধর্ম বেরিয়ে আসে। মূল হলো ভারত‌, এই ভারত হলো অবিনাশী খন্ড, যেখানে বাবা এসে স্বর্গ রচনা করেন। তিনি বাবাও, শিক্ষকও, আবার সদ্গুরুও। তাহলে ওঁনাকে সর্বব্যাপী কিভাবে বলা যেতে পারে? উনি তো হলেন তোমাদের বাবা। এই দুনিয়ায় তোমরা ব্রাহ্মণেরা ছাড়া আর কেউই ত্রিকালদর্শী হতে পারে না। বাচ্চারা, তোমরা মনে করো পরমপিতা পরমাত্মার সাথে আমরা পরমধামে বাস করি। তারপর নম্বরের ক্রমানুসারে কর্মক্ষেত্রে আসি। তারপর পরে আমরাই ফিরে যাই। সম্পূর্ণ ৮৪ জন্ম নিতে হবে।

বাবা বুঝিয়ে থাকেন - তোমরা কত জন্ম নিয়েছো আর কীভাবে বর্ণে এসেছো। এই চক্র ঘুরতেই থাকে। এখন তোমরা হলে ঈশ্বরীয় সম্প্রদায়ভুক্ত, এ হলো তোমাদের অমূল্য জীবন যখন তোমরা ঈশ্বরীয় সন্তান হয়েছো। বাবা এসে ব্রহ্মার দ্বারা অ্যাডপ্ট (দত্তক) করেন। বাবা হলেন স্বর্গের রচয়িতা, সেইজন্য স্বয়ং-ই এসে স্বর্গের মালিকও বানিয়ে দেন। এখন সমগ্র বিশ্বে শান্তি স্থাপন করা - এ তো বাবারই কাজ। বাবা বলেন আমার ভূমিকা হলো, আমি পুনরায় তোমাদের রাজযোগ শিখিয়ে থাকি, যার দ্বারা তোমরা এভারহেলদি হয়ে যাবে। যেভাবে দেবতা হয়েছিলে, পুনরায় এখন রিপিট হয়ে থাকে। এই চারাগাছ(স্যাপলিং) রোপন হচ্ছে। বাবা হলেন বাগানের মালি, ওঁনার দ্বারা কলম লাগানো হচ্ছে। বাবা সম্মুখে বসে বোঝান - আমার আদরের বাচ্চারা, অনেক সময়ের জন্য আলাদা হয়ে যাওয়া বাচ্চারা, স্মরণে রয়েছে তো, তাই না ! -- আমি তোমাদেরকে স্বর্গে পাঠিয়েছিলাম। তারপর তোমরা ৮৪ র চক্র ঘুরে এখন আবার মিলিত হয়েছো। এখন নিজেকে আত্মা মনে করে আমাকে অর্থাৎ বাবাকে স্মরণ করো। তোমাদের অবশ্যই ফিরিয়ে নিয়ে যেতে হবে। তোমরা চাও বা না চাও, অবশ্যই নিয়ে যেতে হবে। প্রথমে আদি সনাতন দেবী দেবতা ধর্ম হয়েছে, তারপর রাবণ রাজ্য হয়েছে। দৈবী রাজ্যের পর পবিত্রতা তো চলে গেছে, সেইজন্য এক মুকুটধারী হয়ে গেছে, এখন প্রজার উপর প্রজার রাজ্য, তারপর দৈবী রাজ্যের স্থাপনা হতে চলেছে। আসুরীও রাজ্যের বিনাশের জন্য এই রুদ্র যজ্ঞ থেকে এই বিনাশের অগ্নি প্রজ্জ্বলিত হয়েছে। তোমরা পতিত সৃষ্টিতে রাজ্য করবে নাকি ! না তা করবে না। এখন হলো সঙ্গম। সত্যযুগে তো এরকম বলবে না। বাচ্চারা এখন তোমরা পুরুষার্থ করছো। করান (করাবনহার) কে ? শ্রীমৎ প্রদানকারী সমর্থ। শ্রেষ্ঠ থেকে শ্রেষ্ঠ হলেনই একমাত্র বাবা। তিনিই ব্রহ্মার দ্বারা স্থাপনা করাচ্ছেন। বাবা বলেন - আমি হলাম ভারতের মোস্ট ওবিডিয়েন্ট সার্ভেন্ট (সবচেয়ে আজ্ঞাকারী সেবক)। ভারতকে স্বর্গে পরিণত করি। সেখানে যেমন রাজা-রানী তেমনই প্রজা, সকলেই সুখী থাকে। ন্যাচারাল বিউটি থাকে। লক্ষ্মী-নারায়ণকে দেখো, কত সুন্দর। হেভেনলি গডফাদার হলেন হেভেনের(স্বর্গের) স্থপতি। সমগ্র দুনিয়ায় গীতার উদ্দেশ্যে বলা হয়ে থাকে, শ্রীকৃষ্ণ ভগবানবাচ। কিন্তু শ্রীকৃষ্ণ তো বলতে পারেনা যে মন্মনাভব, মামেকম্ স্মরণ করো তবেই বিকর্ম ভষ্মীভূত হবে। আর কোনো উপায়ও নেই। গঙ্গা তো পতিত-পাবনী নয়। সে কি বলবে নাকি যে মামেকম্ স্মরণ করো ! না তা বলবে না। এ তো একমাত্র বাবাই বসে বুঝিয়ে থাকেন। বাবা আত্মাদের সঙ্গে কথা বলেন। বাবাই হলেন সকলের সদগতি দাতা। ওঁনার মন্দিরও আছে। দ্বাপর থেকে সমস্ত স্মারক-চিহ্ন নির্মাণ শুরু হয়ে থাকে। সোমনাথের মন্দির রয়েছে, কিন্তু সে কি করে গেছে -- তা কেউ জানে না। ওরা তো শিব-শঙ্করকে মিলিয়ে দেয়। এখন কোথায় শিব হলেন পরমধাম-নিবাসী আর কোথায় শংকর হলেন সুক্ষ্মলোক-নিবাসী। কিছুই বোঝেনা। বাবা বলেন - যত বেদ-শাস্ত্রাদি পড়ুক, জপ-তপ করুক, আমার সাথে কিন্তু মিলিত হতে পারে না। অবশ্যই আমি ভাবনার ভাড়া দিয়ে থাকি। কিন্তু ওরা তো অখন্ড জ্যোতি ব্রহ্মকেই পরমাত্মা মনে করে নেয়। ব্রহ্মের সাক্ষাৎকার হতে পারে কিন্তু তা থেকে কিছুই পাওয়া যাবে না। কাউকে হনুমানের, কাউকে গণেশের সাক্ষাৎকার করিয়ে থাকি, সে তো আমি অল্প সময়ের জন্য মনোকামনা পূর্ণ করে থাকি। অল্প সময়ের জন্য খুশি তো থাকে। কিন্তু তবুও সকলকে তমোপ্রধান হতেই হবে। চাইলে সারাদিন গিয়ে গঙ্গায় বসে থাকুক তবুও সকলকে তমোপ্রধান তো হতেই হবে।

বাবা বলেন বাচ্চারা পবিত্র হও তবেই ২১ জন্মের জন্য পবিত্র দুনিয়ার মালিক হয়ে যাবে। আর কোনো সৎসঙ্গ নেই যেখানে এত প্রাপ্তি হয়। বাবাই এসে রাজযোগ শিখিয়ে থাকেন, তাহলে কতখানি শ্রীমৎ অনুসারে চলা উচিত? পড়ার প্রতি ধ্যান দিতে হবে। বাবা শ্রেষ্ঠর থেকেও শ্রেষ্ঠ মত দিয়ে থাকেন। শ্রীমতে ভারতকে শ্রেষ্ঠ বানাতে হবে। তোমাদের ড্রামার রহস্যকে ভালোভাবে বুঝতে হবে আর পুরুষার্থ করতে হবে। পুরুষার্থ করে এরকম সুযোগ্য হয়ে উঠতে হবে। বাচ্চারা, তোমাদের নেশা থাকা উচিত যে আমরা বাবার সাথে স্বর্গ স্থাপন করতে এসেছি। আমরা ওখানকার বাসিন্দা। এই শরীরে আমরা নিমিত্ত মাত্র, অল্পসময়ের জন্য। বাবাও অল্পসময়ের জন্য এসেছেন, এই শরীর-বোধ (অভিমান) ভেঙে যাওয়া উচিত । নিজের বাবা এবং উত্তরাধিকারকে স্মরণ করো একেই সেকেন্ডে জীবনমুক্তি বলা হয়ে থাকে। বাবা বলেন, আমি এসেছি সকলকে ফিরিয়ে নিয়ে যেতে। এখন তোমরা নিজেকে আত্মা মনে করে ভোরবেলায় উঠে বাবাকে স্মরণ করো। ওঁনার সঙ্গে কথা বলো। তোমরা জানো আমাদের ৮৪ জন্ম সম্পূর্ণ হয়েছে। এখন আমরা ঈশ্বরীয় সন্তান হয়েছি। তারপর দৈবী সন্তান, আবার ক্ষত্রিয় সন্তান হয়ে যাবো। বাবা আমাদের বিশ্বের মালিক করে দেন। বসে বসে বাবার মহিমা করো। বাবা তুমি তো চমৎকার করে দিয়েছো। প্রতি কল্পে এসে আমাদের পড়াও। তোমার জ্ঞান বড় বিস্ময়ের। স্বর্গ কত বিস্ময়ের। ও'টা হল লৌকিক বিস্ময় (সপ্ত আশ্চর্য), এ হলো বাবার স্থাপন করা বিস্ময়। বাবা এসেছেন শ্রীকৃষ্ণপুরী স্থাপন করতে। এই লক্ষ্মী-নারায়ণ প্রালব্ধ কোথা থেকে পেয়েছে? বাবার থেকে। জগদম্বা বা জগৎ-পিতার সঙ্গে বাচ্চারাও থাকবে। উনি হলেন ব্রাহ্মণ, জগদম্বা তো হলেন ব্রাহ্মণী। তিনি হলেন কামধেনু। সকলের মনোকামনা পূর্ণ করে দেন। এই জগদম্বাই পুনরায় স্বর্গের মহারানী হন। কত আশ্চর্য রহস্যময়। এই বাবা আপন স্থিতি পাকা করার জন্য বিভিন্ন রকমের যুক্তি বলতে থাকেন। রাত জাগো, বাবাকে স্মরণ করো তাহলে যেমন মতি তেমনই গতি হয়ে যাবে। যদি পুরুষার্থ পুরোপুরি হয় তখন স্মরণও টিকে থাকবে। পাশ উইথ অনার হতে হবে। ৮ জনেরই স্কলারশিপ প্রাপ্ত হয়। সকলেই বলে - আমরা লক্ষীনারায়ণ-কে বরণ করবো, তাহলে পাশ করে দেখাতে হবে। নিজেকে দেখতে হবে যে আমার মধ্যে কোনো বাঁদরের মতো স্বভাব নেই তো? তা বের করে দিতে থাকো। দেখো, সারা দিনে কাউকে দুঃখ দিইনি তো? বাবা হলেন সকলকে সুখ প্রদানকারী। বাচ্চাদেরকেও এরকমই হতে হবে। বোল এবং কর্মের দ্বারা কাউকে দুঃখ দেওয়া উচিত নয়। সত্যিকারের পথ বলে দিতে হবে। ও'টা হলো লৌকিক বাবার উত্তরাধিকার। এ হলো অসীম জগতের বাবার উত্তরাধিকার, সে তো যে পাবে সে-ই বলবে। যারা এই ধর্মের হবে তাদের তৎক্ষণাৎ টাচিং হবে।

বাবা বলেন, পুনরায় দৈবী ধর্ম স্থাপন করতে, আমি ব্রহ্মার শরীরে আসি। বাচ্চারা, তোমাদের বুদ্ধিতে রয়েছে যে আমরা এখন ব্রাহ্মণ হয়েছি এরপর দেবতা হতে হবে। প্রথমে সূক্ষ্মলোকে গিয়ে তারপর শান্তিধামে যাবে। সেখান থেকে পুনরায় নতুন দুনিয়ায়, গর্ভ-মহলে আসবে। এখানে গর্ভ-জেলে আসে। একে বলে মিথ্যা মায়া মিথ্যা কায়া.... বাবা বলেন ধর্মের কত গ্লানি করেছে, শিব জয়ন্তী পালন করে কিন্তু শিব কখন এসেছেন, কার মধ্যে প্রবেশ করেছেন, তা কেউ জানে না। অবশ্যই কোনো শরীরে এসে, নরককে স্বর্গে পরিণত করেছিলেন, তাই না ! বাবা বাচ্চাদের অত্যন্ত ভালোভাবে বুঝিয়ে থাকেন আর রায় দেন - নিজের চার্ট তৈরি করো। সারাদিনে কতখানি সময় বাবাকে স্মরণ করেছো। ভোর বেলায় উঠে বাবাকে, উত্তরাধিকারকে স্মরণ করো। আমরা অসীম জগতের বাবার সাথে এসেছি গুপ্তবেশে ভারতকে স্বর্গে পরিণত করতে। এখন আমাদের ফিরে যেতে হবে। যাওয়ার পূর্বে নিজের রাজধানী অবশ্যই স্থাপন করতে হবে। এখন তোমরা রয়েছো সঙ্গমে। বাকি সমগ্র দুনিয়াই রয়েছে কলিযুগে। তোমরা হলে সঙ্গমযুগীয় ব্রাহ্মণ। বাবা বাচ্চাদের জন্য সওগাত (উপহার) নিয়ে আসেন - মুক্তি ও জীবনমুক্তির। সত্যযুগে ভারত জীবনমুক্ত ছিল, বাকি সব আত্মারা মুক্তিধামে ছিল। বাবা হাতে করে স্বর্গ নিয়ে এসেছেন, অবশ্যই সেইজন্য উপযুক্তও স্বয়ংই করবেন। আচ্ছা!

মিষ্টি মিষ্টি হারানিধি বাচ্চাদের প্রতি মাতা পিতা বাপ-দাদার স্মরণের স্নেহ-সুমন আর সুপ্রভাত। আত্মাদের পিতা তাঁর আত্মারূপী বাচ্চাদেরকে জানাচ্ছেন নমস্কার।

*ধারণার জন্যে মুখ্য সারঃ-*

১ ) সদা এই নেশায় থাকতে হবে যে আমরা বাবার সাথে স্বর্গের স্থাপনায় নিমিত্ত হয়েছি। বাবা আমাদের বিশ্বের মালিক বানাচ্ছেন।

২ ) বাবার সমান সুখ প্রদানকারী হতে হবে। কখনো কাউকে দুঃখী করা উচিত নয়। সকলকে সত্যিকারের রাস্তা বলে দিতে হবে। নিজের উন্নতির জন্য নিজের চার্ট রাখতে হবে


বরদানঃ-নিমিত্ত আর নম্রচিত্তের বিশেষত্বের দ্বারা সেবায় দ্রুত আর প্রথম স্থানাধিকারী সফলতা-মূর্তি ভব

সেবায় এগিয়ে যাওয়ার সময় যদি নিমিত এবং নম্র চিত্তের বিশেষত্ব স্মৃতিতে থাকে, তাহলেই সফলতার স্বরূপ হয়ে উঠবে। যেমন সেবার জন্য ছোটাছুটি করার বিষয়ে হুঁশিয়ার তেমনি এই দুই বিশেষত্বতেও হুশিয়ার হও। এর দ্বারাই সেবায় দ্রুত এবং প্রথমে (ফাস্ট ও ফার্স্ট) যাবে। ব্রাহ্মণ জীবনের মর্যাদার গণ্ডির মধ্যে থেকে, নিজেকে রুহানি সেবাধারী মনে করে সেবা করো তাহলেই সফলতা-মূর্তি হয়ে যাবে। পরিশ্রম করতে হবে না।

*স্লোগানঃ-যিনি বুদ্ধির দ্বারা সর্বদা জ্ঞানরত্ন ধারণ করেন তিনিই হলেন সত্যিকারের হোলিহংস।


30-01-2023 HINDI MURLI

                   30-01-2023 HINDI MURLI

“मीठे बच्चे - तुम ईश्वरीय सन्तान हो, तुम्हारा यह अमूल्य जीवन है, तुम्हारा ईश्वरीय कुल बहुत ही श्रेष्ठ है। स्वयं भगवान ने तुम्हें एडाप्ट किया है, इसी नशे में रहो''

प्रश्नः-     शरीर का भान टूट जाए - उसके लिए किस अभ्यास की आवश्यकता है?

उत्तर:-   चलते फिरते अभ्यास करो कि इस शरीर में हम थोड़े टाइम के लिए निमित्त मात्र हैं। जैसे बाप थोड़े समय के लिए शरीर में आये हैं ऐसे हम आत्मा ने भी श्रीमत पर भारत को स्वर्ग बनाने के लिए यह शरीर धारण किया है। बाप और वर्सा याद रहे तो शरीर का भान टूट जायेगा, इसको ही कहा जाता है सेकण्ड में जीवनमुक्ति। 2- अमृतवेले उठ बाप से मीठी-मीठी बातें करो तो शरीर का भान खत्म होता जायेगा।

गीत:-    ओम् नमो शिवाए...


ओम् शान्ति। भगवान होता ही है एक जो बाप भी है, बच्चों को समझाया गया है - आत्मा का रूप कोई इतना बड़ा लिंग नहीं है। आत्मा तो बहुत छोटी स्टार मिसल भ्रकुटी के बीच में है। कोई इतना बड़ा ज्योर्तिलिंगम् नहीं है, जैसे मन्दिरों में रखा हुआ है। नहीं। जैसे आत्मा वैसे परमात्मा बाप है। आत्मा का रूप मनुष्य जैसा नहीं है। आत्मा तो मनुष्य तन का आधार लेने वाली है। आत्मा ही सब कुछ करती है। संस्कार सब आत्मा में हैं। आत्मा स्टार है। आत्मा ही अच्छे वा बुरे संस्कारों अनुसार जन्म लेती है। तो इन बातों को अच्छी रीति समझना है। मन्दिरों में लिंग रखा हुआ है इसलिए समझाने के लिए हम भी शिवलिंग दिखाते हैं। इसका नाम शिव है, बिगर नाम के कोई चीज़ होती नहीं। कुछ न कुछ आकार है। बाप है परमधाम में रहने वाला। परमात्मा बाप कहते हैं जैसे आत्मा शरीर में आती है वैसे मुझे भी आना पड़ता है, नर्क को स्वर्ग बनाने। बाप की महिमा सबसे न्यारी है। अभी तुम बच्चे जानते हो, तुम आत्मायें आई हो यहाँ पार्ट बजाने। यह बेहद का अनादि अविनाशी ड्रामा है, इनका कभी विनाश नहीं होता। यह फिरता ही रहता है। बाप रचता भी एक है, रचना भी एक है। यह बेहद सृष्टि का चक्र है। 4 युग हैं। दूसरा है कल्प का संगमयुग, जिसमें ही बाप आकर पतित दुनिया को पावन बनाते हैं। यह चक्र फिरता रहता है। तुम बच्चों को अब स्मृति आई है कि हम सब आत्मायें परमधाम में रहने वाली हैं। इस कर्मक्षेत्र पर पार्ट बजाने आई हैं। इस बेहद के ड्रामा को रिपीट होना है। बाप है बेहद का मालिक। उस बाप की अपरमअपार महिमा है। ऐसी महिमा और कोई की नहीं है। वह मनुष्य सृष्टि का बीज-रूप है। सबका फादर है। बाप कहते हैं मैं पराई रावण की दुनिया में आता हूँ। एक तरफ है आसुरी गुणों वाली सम्प्रदाय। दूसरी तरफ है दैवीगुणों वाली सम्प्रदाय, इनको कंसपुरी भी कहते हैं। कंस असुर को कहा जाता है। श्रीकृष्ण को देवता कहा जाता है। अब बाप आये हैं देवता बनाने और सबको वापिस ले जाने, और कोई की ताकत नहीं। बाप ही बैठ बच्चों को शिक्षा दे दैवी गुण धारण कराते हैं। यह बाप की ही फ़र्जअदाई है। बाप कहते हैं जब सभी तमोप्रधान हो जाते हैं, मुझे भूल जाते हैं, न सिर्फ भूल जाते हैं परन्तु मुझे पत्थर ठिक्कर में ठोक देते हैं, इतनी ग्लानी कर देते हैं तब तो मैं आता हूँ। मेरे जैसी ग्लानी किसकी नहीं करते, तब तो मैं आकर तुम्हारा लिबरेटर बनता हूँ। सबको मच्छरों सदृश्य ले जाऊंगा। और कोई ऐसे कह न सके कि मनमनाभव, मुझ अपने परमपिता परमात्मा को याद करो तो तुम्हारे विकर्म विनाश होंगे। श्रीकृष्ण तो कह न सके। परमात्मा की महिमा तो बच्चे जानते हैं। वह ज्ञान का सागर, सुख का सागर है। फिर सेकण्ड नम्बर में है ब्रह्मा, विष्णु, शंकर। ब्रह्मा द्वारा स्थापना कौन करेगा? क्या श्रीकृष्ण? परमपिता परमात्मा शिव बैठ समझाते हैं कि पहले-पहले हमको चाहिए ब्राह्मण। तो ब्रह्मा द्वारा ब्राह्मण मुख वंशावली रचता हूँ। वह हैं कुख वंशावली। तुम अब संगम में ब्रह्मा की सन्तान हो। बाप आकर शूद्र से ब्राह्मण बनाते हैं। अभी तुम हो ईश्वरीय कुल के। ईश्वर हुआ निराकार, ब्रह्मा हुआ साकार। बाप पहले-पहले ब्राह्मण फिर देवता बनाते हैं। देवता के बाद क्षत्रिय...यह चक्र फिरता रहता है। फिर इनसे और धर्म निकले हैं। मूल है भारत, यह भारत अविनाशी खण्ड है, जहाँ बाप आकर स्वर्ग बनाते हैं। वह बाप भी है, टीचर भी है, तुम्हारा सतगुरू भी है। उनको फिर सर्वव्यापी कैसे कह सकते। वह तो तुम्हारा बाप है। इस दुनिया में सिवाए तुम ब्राह्मणों के कोई त्रिकालदर्शी हो नहीं सकता। तुम बच्चे समझते हो परमपिता परमात्मा के साथ हम परमधाम के रहने वाले हैं। फिर नम्बरवार कर्मक्षेत्र पर आते हैं। फिर पिछाड़ी में हम ही जाते हैं। 84 जन्म पूरे लेने हैं।

बाप समझाते हैं - तुमने कितने जन्म लिए और कैसे वर्णो में आये। यह चक्र चलता रहता है। अभी तुम हो ईश्वरीय सम्प्रदाय, यह तुम्हारा अमूल्य जीवन है जबकि तुम ईश्वरीय सन्तान बने हो। ब्रह्मा द्वारा बाप आकर एडाप्ट करते हैं। बाप है स्वर्ग का रचयिता तो खुद ही आकर स्वर्ग का मालिक भी बनाते हैं। अब सारे विश्व में शान्ति स्थापन करना - यह बाप का ही काम है। बाप कहते हैं मेरा पार्ट है, मैं तुमको फिर से राजयोग सिखलाता हूँ, जिससे तुम एवरहेल्दी बनेंगे। जैसे देवता बने थे, फिर अब रिपीट होता है। यह सैपलिंग लग रहा है। बाप बागवान है, इन द्वारा कलम लगा रहे हैं। बाप सम्मुख बैठ समझाते हैं - मेरे सिकीलधे बच्चे, बहुत समय से बिछुड़े हुए बच्चे, याद है ना - मैंने तुमको स्वर्ग में भेजा था। फिर तुम 84 का चक्र लगाकर अब आकर मिले हो। अब अपने को आत्मा समझ मुझ बाप को याद करो। तुमको वापिस जरूर ले जाना है। तुम चाहो न चाहो ले जरूर जाना है। पहले आदि सनातन दैवी राज्य चला फिर आसुरी राज्य चला। दैवी राज्य के बाद पवित्रता तो चली गई फिर सिंगल ताज हो गया, अब तो प्रजा का प्रजा पर राज्य है फिर दैवी राज्य की स्थापना हो रही है। आसुरी राज्य के विनाश के लिए इस रूद्र यज्ञ से यह विनाश ज्वाला प्रज्वलित हुई है। तुम पतित सृष्टि पर थोड़ेही राज्य करेंगे। अभी है संगम। सतयुग में तो ऐसे नहीं कहेंगे। अभी तुम बच्चे पुरुषार्थ कर रहे हो। कराने वाला कौन है? श्रीमत देने वाला समर्थ, श्रेष्ठ ते श्रेष्ठ है ही एक बाप। वही ब्रह्मा द्वारा स्थापना करा रहे हैं। बाप कहते हैं मैं भारत का मोस्ट ओबीडियन्ट सर्वेन्ट हूँ। भारत को स्वर्ग बनाता हूँ। वहाँ यथा राजा रानी तथा प्रजा सब सुखी रहते हैं। नैचुरल ब्युटी रहती है। लक्ष्मी-नारायण को देखो कितने सुन्दर हैं। हेविनली गॉड फादर है हेविन स्थापन करने वाला। सारी दुनिया में गीता के लिए कहते हैं श्रीकृष्ण भगवानुवाच। परन्तु श्रीकृष्ण तो कह न सके मनमनाभव, मामेकम् याद करो तो विकर्म भस्म हों। और कोई उपाय भी नहीं है। गंगा तो पतित-पावनी है नहीं। वह थोड़ेही कहेगी कि मामेकम् याद करो। यह तो एक बाप ही बैठ समझाते हैं। बाप आत्माओं से बात करते हैं। बाप ही सबका सद्गति दाता है। उनके मन्दिर भी हैं। द्वापर से सब यादगार बनना शुरू होते हैं। सोमनाथ का मन्दिर है, परन्तु वह क्या करके गये हैं - यह कोई नहीं जानते। वह शिव शंकर को मिला देते हैं। अब कहाँ शिव परमधाम के निवासी और कहाँ शंकर सूक्ष्मवतन के वासी। कुछ भी समझते नहीं। बाप कहते हैं कितने भी वेद शास्त्र आदि कोई पढ़े, जप तप करे परन्तु मेरे से मिल नहीं सकते। भल मैं भावना का भाड़ा सबको देता हूँ, परन्तु वह तो अखण्ड ज्योति ब्रह्म को ही परमात्मा समझ लेते हैं। ब्रह्म का साक्षात्कार हो परन्तु उससे कुछ भी हांसिल नहीं होगा। कोई को हनूमान का, कोई को गणेश का साक्षात्कार कराता हूँ, वह तो मैं अल्पकाल के लिए मनोकामना पूर्ण करता हूँ। अल्पकाल लिए खुशी तो रहती है। परन्तु फिर भी सबको तमोप्रधान तो बनना है। चाहे सारा दिन गंगा में जाकर बैठ जाएं तो भी तमोप्रधान तो सबको बनना ही है।

बाप कहते हैं बच्चे पवित्र बनो तो पवित्र दुनिया का 21 जन्म के लिए मालिक बनेंगे। और कोई सतसंग नहीं जहाँ इतनी प्राप्ति हो। बाप ही आकर राजयोग सिखलाते हैं तो कितना श्रीमत पर चलना चाहिए। पढ़ाई पर ध्यान देना चाहिए। बाप श्रेष्ठ ते श्रेष्ठ मत देते हैं। श्रीमत से भारत को स्वर्ग बनाना है। तुम्हें ड्रामा के राज़ को अच्छी तरह से समझना है और पुरुषार्थ करना है। पुरुषार्थ कर ऐसा लायक बनना है। तुम बच्चों को नशा होना चाहिए कि हम बाप के साथ स्वर्ग की स्थापना करने आये हैं। हम वहाँ के रहवासी हैं। इस शरीर में हम निमित्त मात्र हैं थोड़े टाइम के लिए। बाबा भी थोड़े टाइम के लिए आये हैं, इस शरीर का भान टूट जाना चाहिए। अपने बाप और वर्से को याद करो, इसको ही सेकण्ड में जीवनमुक्ति कहा जाता है। बाप कहते हैं मैं आया हूँ सबको वापिस ले जाने। अब तुम अपने को आत्मा समझ सवेरे उठकर बाबा को याद करो। उनसे बातें करो। तुम जानते हो हमारे 84 जन्म पूरे हुए। अब हम ईश्वरीय सन्तान बने हैं। फिर दैवी सन्तान, फिर क्षत्रिय सन्तान बनेंगे। बाबा हमको विश्व का मालिक बनाते हैं। बाबा की बैठ महिमा करो। बाबा आपने तो कमाल की है। कल्प-कल्प आकर हमको पढ़ाते हो। बाबा आपका ज्ञान बड़ा वन्डरफुल है। स्वर्ग कितना वन्डरफुल है। वह हैं जिस्मानी वन्डर्स, यह है रूहानी बाप का स्थापन किया हुआ वन्डर। बाप आये हैं श्रीकृष्णपुरी स्थापन करने। इन लक्ष्मी-नारायण ने यह प्रालब्ध कहाँ से पाई? बाप द्वारा। जगत अम्बा और जगत पिता के साथ बच्चे भी होंगे। वह हैं ब्राह्मण, जगत अम्बा तो ब्राह्मणी थी। वह है कामधेनु। सबकी मनोकामनायें पूर्ण कर देती है। यह जगत अम्बा ही फिर स्वर्ग की महारानी बनती है। कितना वन्डरफुल राज़ है। यह बाप अपनी अवस्था को जमाने के लिए भिन्न-भिन्न युक्तियां बताते रहते हैं। रात को जागो। बाबा को याद करो तो अन्त मती सो गति हो जायेगी। अगर पूरा पुरुषार्थ होगा तो याद ठहरेगी। पास विद आनर हो जाना है। 8 को ही स्कालरशिप मिलती है। सब कहते हैं - हम लक्ष्मी-नारायण को वरें, तो पास होकर दिखाना है। अपने को देखना है कि मेरे में कोई बन्दरपना तो नहीं है? उसको निकालते जाओ। देखो, सारे दिन में किसको दु:ख तो नहीं दिया? बाप है सबको सुख देने वाला। बच्चों को भी ऐसा बनना है। वाचा, कर्मणा से कोई को भी दु:ख नहीं देना है। सच्चा-सच्चा रास्ता बताना है। वह है हद के बाप का वर्सा। यह है बेहद के बाप का वर्सा, सो तो जिसको मिलता होगा वही बतायेंगे। जो अपने धर्म के होंगे उन्हों को झट टच होगा।

बाप कहते हैं फिर से दैवी धर्म स्थापन करने मैं ब्रह्मा के तन में आता हूँ। तुम बच्चों की बुद्धि में है कि अभी हम ब्राह्मण हैं फिर देवता बनना है। पहले सूक्ष्मवतन में जाकर फिर शान्तिधाम में जायेंगे। वहाँ से फिर नई दुनिया में, गर्भ महल में आयेंगे। यहाँ गर्भजेल में आते हैं। इनको कहते हैं झूठी माया, झूठी काया... बाप कहते हैं कितनी धर्म ग्लानी की है, शिव जयन्ती मनाते हैं परन्तु शिव कब आया, किसमें प्रवेश किया, यह कोई को पता नहीं है। जरूर कोई शरीर में आकर नर्क को स्वर्ग बनाया होगा ना। बाप बच्चों को बहुत अच्छी रीति समझाते हैं और राय देते हैं अपना चार्ट बनाओ। सारे दिन में कितना समय बाप को याद किया! सवेरे उठकर बाप को, वर्से को याद करो। हम बेहद के बाप के साथ आये हैं। गुप्तवेष में भारत को स्वर्ग बनाने। अब हमको वापिस जाना है। जाने से पहले अपनी राजधानी जरूर स्थापन करनी है। अब तुम हो संगम पर। बाकी सारी दुनिया है कलियुग में। तुम संगमयुगी ब्राह्मण हो। बाप बच्चों के लिए सौगात ले आते हैं - मुक्ति और जीवनमुक्ति की। सतयुग में भारत जीवनमुक्त था, बाकी सब आत्मायें मुक्तिधाम में थी। बाप हथेली पर बहिश्त ले आते हैं तो जरूर उसके लिए लायक भी खुद ही बनायेंगे। अच्छा!

मीठे मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात पिता बापदादा का यादप्यार और गुडमार्निग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) सदा इस नशे में रहना है कि हम बाप के साथ स्वर्ग की स्थापना के निमित्त हैं। बाप हमें विश्व का मालिक बनाते हैं।

2) बाप समान सुख देने वाला बनना है। कभी किसी को दु:खी नहीं करना है। सबको सच्चा रास्ता बताना है। अपनी उन्नति के लिए अपना चार्ट रखना है।

वरदान:- निमित्त और नम्रचित की विशेषता द्वारा सेवा में फास्ट और फर्स्ट नम्बर लेने वाले सफलतामूर्त भव

सेवा में आगे बढ़ते हुए यदि निमित्त और नम्रचित की विशेषता स्मृति में रहती है तो सफलता स्वरूप बन जायेंगे। जैसे सेवाओं की भाग-दौड़ में होशियार हो ऐसे इन दो विशेषताओं में भी होशियार बनो, इससे सेवा में फास्ट और फर्स्ट हो जायेंगे। ब्राह्मण जीवन की मर्यादाओं की लकीर के अन्दर रहकर, स्वयं को रूहानी सेवाधारी समझकर सेवा करो तो सफलतामूर्त बन जायेंगे। मेहनत नहीं करनी पड़ेगी।

स्लोगन:- जो बुद्धि द्वारा सदा ज्ञान रत्नों को धारण करते हैं वही सच्चे होलीहंस हैं।

Saturday, January 28, 2023

29.01.2023 BANGLA MURLI

                       29.01.2023 BANGLA MURLI



"নম্বর ওয়ান হওয়ার জন্য গুণমূর্ত হয়ে গুণের দান করে মহাদানী হও"

আজ অসীম জগতের মাতা-পিতা চতুর্দিকের বিশেষ বাচ্চাদের দেখছিলেন। কি বিশেষত্ব দেখেছিলেন? চিরন্তন জ্ঞানী, অটল স্বরাজ্য অধিকারী, অখন্ড নির্বিঘ্ন, অখন্ড যোগী, অখন্ড মহাদানী এমন বিশেষ আত্মা কোটি কোটির মধ্যে কেউ কেউ হয়েছে। জ্ঞানী, যোগী, মহাদানী সবাই হয়েছে কিন্তু অখন্ড কেউ কেউ হয়েছে। যারা নিরন্তর, অটল আর অখন্ড তারাই বিজয়মালার বিজয়ী দানা। সঙ্গমযুগে সব বাচ্চাকে বাপদাদা'অটল-অখন্ড ভব'-র বরদান দিয়েছেন, কিন্তু বরদানকে জীবনে ধারণ করার ক্ষেত্রে তোমরা নম্বর অনুক্রমে হয়ে গেছ। নম্বর ওয়ান হওয়ার জন্য সবচাইতে সহজ বিধি হলো অখন্ড মহাদানী হও। অখন্ড মহাদানী অর্থাৎ নিরন্তর সহজ সেবাধারী, কারণ যা সহজ সেটাই নিরন্তর হতে পারে। সুতরাং অখন্ড সেবাধারী অর্থাৎ অখন্ড মহাদানী। দাতার বাচ্চা তোমরা, সমুদয় ভাণ্ডারে সম্পন্ন শ্রেষ্ঠ আত্মা। সম্পন্ন হওয়ার নির্দশন অখন্ড মহাদানী হওয়া। এক সেকেন্ডও দান দেওয়া ব্যতীত থাকতে পারে না। দ্বাপর থেকে অনেক ভক্ত আত্মাও দানী হয়েছে কিন্তু তারা যত বড় দানীই হোক না কেন শাশ্বত ভান্ডারের দানী হয়নি। বিনাশী ঐশ্বর্য কিংবা বিনাশী বস্তুর দানী হয়। তোমরা শ্রেষ্ঠ আত্মারা এখন সঙ্গমে শাশ্বত এবং অখন্ড মহাদানী হও। নিজেকে নিজে জিজ্ঞাসা করো অখন্ড মহাদানী হয়েছি? নাকি সময় অনুসারে দানী হয়েছ? নাকি চান্স অনুসারে দানী হয়েছ?

অখন্ড মহাদানী সদা তিন প্রকারে দান করতে বিজি থাকে। প্রথমতঃ, মন্সা দ্বারা শক্তি দেওয়ার দান, দ্বিতীয়তঃ, বাণী দ্বারা জ্ঞানের দান, তৃতীয়তঃ, কর্ম দ্বারা গুণের দান। এই তিন প্রকারের দান যে দিতে পারে সে সহজভাবে মহাদানী হতে পারে। রেজাল্টে দেখা গেছে তোমাদের মেজরিটি বাণী দ্বারা জ্ঞান দান করো। মন্সা দ্বারা শক্তির দান যথাশক্তি করো আর কর্ম দ্বারা গুণ দান যারা করো তারা সংখ্যায় অনেক কম। বর্তমান সময়ে অজ্ঞানী আত্মা হোক বা ব্রাহ্মণ আত্মা উভয়ের গুণ দানের প্রয়োজন আছে। বর্তমান সময়ে এই বিধি নিজের জন্য এবং ব্রাহ্মণ পরিবারের জন্য প্রবলভাবে তীব্র করে তোলো।

এই দিব্য গুণ সর্বাপেক্ষা শ্রেষ্ঠ প্রভু-প্রসাদ। এই প্রসাদ খুব করে বিতরণ করো। যেমন, কারও সঙ্গে যখন দেখা-সাক্ষাৎ হয় তখন স্নেহের নিদর্শন হিসেবে একে অপরকে স্থূল টোলি খাওয়াও তো না, ঠিক সেভাবেই একে অপরকে এই গুণের টোলি খাওয়াও। এই বিধিতে সঙ্গমযুগের যে লক্ষ্য "ফরিস্তা, সেই দেবতা" সেটা সহজে সকলের মধ্যে প্রত্যক্ষভাবে দেখা যাবে। এই প্র্যাক্টিস নিরন্তর স্মৃতিতে বজায় রাখ, আমি দাতার বাচ্চা অখন্ড মহাদানী আত্মা। যে কোনো আত্মা তা' সে অজ্ঞানী হোক বা ব্রাহ্মণ হোক, তোমাদের কিন্তু দিতে হবে। ব্রাহ্মণ আত্মাদের তো প্রথম থেকেই জ্ঞান আছে, কিন্তু দু' প্রকারে দাতা হতে পারো।

১) যে আত্মার যে শক্তির আবশ্যকতা আছে সেই আত্মাকে মন্সা দ্বারা অর্থাৎ শুদ্ধ বৃত্তি, ভাইব্রেশন দ্বারা শক্তির দান অর্থাৎ সহযোগ দাও।

২) কর্ম দ্বারা জীবনে সদা নিজে গুণমূর্ত হয়ে, প্রত্যক্ষ স্যাম্পল হয়ে সহজভাবে গুণ ধারণে অন্যদের সহযোগ দাও। একেই বলে, গুণ দান। দানের অর্থই হলো সহযোগ দেওয়া। আজকাল ব্রাহ্মণ আত্মারাও শোনার পরিবর্তে প্রত্যক্ষ প্রমান দেখতে চায়। যে কোনো কাউকে যদি শক্তি ধারণ করার বা গুণ ধারণ করার শিক্ষা দিতে চাও তাহলে কেউ হৃদয় দিয়ে ভাবে, কেউ বলে এমন ধারণামূর্ত কে হয়েছে? সুতরাং সবাই দেখতে চায় কিন্তু শুনতে চায় না। তোমরা পরস্পর এভাবে বলো তো না যে - কে হয়েছে, সবাইকে দেখে নিয়েছি...। যখন কোনো পরিস্থিতি আসে তোমরা বলো - ঠিক আছে, এখনো পর্যন্ত কেউ তৈরি হয়নি, সব চলবে। কিন্তু এই বোল অসাবধানতার, যথার্থ নয়। যথার্থ কী? ফলো ব্রহ্মা বাবা। যেভাবে ব্রহ্মা বাবা নিজেকে নিজে সদা এক্সাম্পল বানিয়েছেন, সদা নিদর্শন হিসেবে এই লক্ষ্যকে উপস্থাপিত করেছেন ― যে নিজে থেকে এগিয়ে এসে দায়িত্ব পালন করে সে অর্জুন অর্থাৎ যে নিজেকে নিমিত্ত প্রত্যক্ষ প্রমান বানায় সেই অর্জুন অর্থাৎ সর্বাগ্রগণ্য নম্বরের হয়। যদি ফলো ফাদার করতে হয় তাহলে অন্যকে দেখে তৈরি হলে নম্বর ওয়ান হতে পারবে না। নম্বরক্রমে হয়ে যাবে।

নম্বর ওয়ান আত্মার লক্ষণ হলো সব ধরনের শ্রেষ্ঠ কার্যে আমাকে নিমিত্ত হয়ে অন্যদের সিম্পল করার জন্য স্যাম্পল হতে হবে। অন্যকে দেখা, হতে পারে তা' বড়কে দেখা বা ছোটকে অথবা যারা তোমার সমান তাদের দেখা কিন্তু অন্যকে দেখে তৈরি হওয়া মানে এটা – প্রথমে এ' এ' হবে তখন আমি হবো, সুতরাং নম্বর ওয়ান সে হয়ে গেল তো না যে হবে! তাহলে তো আপনা থেকে তুমি নিজেই নম্বরক্রমে এসে গেলে। অতএব, অখন্ড মহাদানী আত্মা সদা প্রতিটা সেকেন্ড তিন মহাদানের মধ্যে থেকে কোনো না কোনো দান দেওয়ায় নিজেকে বিজি রাখে। যেমন সময় সেই অনুযায়ী সেবাতে সদা নিয়োজিত থাকে। ব্যর্থ দেখা, শোনা বা করার কোনো ফুরসতই তাদের নেই। তোমরা মহাদানী হয়েছ? এখন এটা আন্ডারলাইন করো। যদি মাঝে মাঝেই দাতাভাব খন্ডিত হয় তাহলে খন্ডন হওয়াকে সম্পূর্ণ বলা যায় না। বর্তমান সময়ে নিজেদের মধ্যে বিশেষ কর্ম দ্বারা গুণদাতা হওয়ার আবশ্যকতা আছে। প্রত্যেকে সঙ্কল্প করো, আমাকে সদা গুণমূর্ত হয়ে সবাইকে গুণমূর্ত হওয়ার বিশেষ কর্তব্য করতেই হবে। সুতরাং নিজের এবং অন্য সকলের দুর্বলতা সমাপ্ত করার এই বিধিতে প্রত্যেকে নিজেকে নিমিত্ত উত্তম নম্বর মনে করে অগ্রচালিত হও। জ্ঞান তো অনেক আছে, এখন সমস্ত গুণ ইমার্জ করো, সর্বগুণ সম্পন্ন হওয়ার আর অন্যদের সর্বগুণসম্পন্ন করানোর এক্সাম্পল হও। আচ্ছা!

অখন্ড সকল যোগী তু আত্মাকে, সদা গুণমূর্ত সকল আত্মাকে, প্রতিটা সঙ্কল্প প্রতিটা সেকেন্ড মহাদানী অথবা মহাসহযোগী সকল বিশেষ আত্মাকে, যারা সদা নিজে শ্রেষ্ঠত্বের স্যাম্পল এবং সহজ সিম্পল এক্সাম্পল হয়ে অন্যদের প্রেরণা দেয়, সদা নিজেকে নিমিত্ত নম্বর ওয়ান মনে করে প্রত্যক্ষ প্রমান দেয়, বাবা সমান সেই সকল আত্মাকে বাপদাদার স্মরণ-স্নেহ আর নমস্কার।

দাদী জানকীর সাথে সাক্ষাৎকার ― (অস্ট্রেলিয়া, সিঙ্গাপুর প্রভৃতি পরিভ্রমণের সমাচার শুনিয়েছেন এবং সকলের তরফে স্মরণ জানিয়েছেন ) সকলের স্মরণ পৌঁছে গেছে। চতুর্দিকে বাচ্চারা সদা বাবার সামনে আছে তার প্রত্যক্ষ প্রমান হলো যখনই স্মরণ করে তখনই বাবার সমীপ আর সাথের অনুভব করে। হৃদয় থেকে বলে বাবা আর দিলারাম হাজির। সেইজন্যই বলা হয় 'হুজুর হাজির, হাজিরা হুজুর' (সদাই উপস্থিত)। তোমরা যেমনই হও, যেখানেই থাকো তিনি কিন্তু সবখানেই প্রত্যেকের কাছে হাজির হয়ে যান; সেইজন্যই হাজিরা হুজুর হয়ে আছেন। স্নেহের এই বিধি লোকে জানতে পারে না। এটা ব্রাহ্মণ আত্মারাই জানে। অনুভাবী এই অনুভবকে জানে। তুমি বিশেষ আত্মা তো বটেই, কম্বাইন্ড তো না। আলাদা হতেই পারো না। লোকে বলে, যেদিকে তাকাই সেদিকে শুধুই তুমি আর তুমি, তোমরা বলো যা কিছু করি, যেখানে যাই বাবা সাথেই আছেন অর্থাৎ শুধু তুমি আর তুমি আছ। যেভাবে কর্তব্য তোমাদের সাথে আছে সেভাবে সব কর্তব্য করানোর মালিকও সদা সাথে আছেন। সেইজন্য গাওয়া হয়েছে করণকরাবনহার। তাহলে কম্বাইন্ড হয়ে গেলে তো না ― করণহার আর করাবনহার। সুতরাং তোমাদের সবার স্থিতি কী? কম্বাইন্ড, তাই না। করণকরাবনহার, করণহার-এর সাথে আছেনই, করাবনহার আলাদা নেই। একেই কম্বাইন্ড স্থিতি বলা হয়ে থাকে। সবাই তোমরা ভালোভাবেই নিজের নিজের পার্ট প্লে করছ। অনেক আত্মার সামনে তোমরা স্যাম্পল, সিম্পল বানানোর। এ'রকম লাগে তো না। কঠিনকে সহজ বানানো সেটাই ফলো ফাদার করা। এরকমই তো, তাই না। পার্ট প্লে ভালো করেছ তো না। যেখানেই থাক, বিশেষ পার্টধারী বিশেষভাবে পার্ট প্লে না করে থাকতে পারে না। এটা ড্রামায় লিপিবদ্ধ আছে। আচ্ছা। পরিক্রমা করা খুব ভালো। পরিক্রমণ করেছ তারপরে সুইট হোমে এসে গেছ। সেবার পরিক্রমা অনেক আত্মাদের জন্য বিশেষ উৎসাহ-উদ্দীপনার পরিক্রমণ। সব ঠিক আছে তো না? শুধুই ভালো আর ভালো। ড্রামার ভবিতব্য অবশ্যই টানে। এমনকি, তুমি হয়তো এখানে থাকতে চাও কিন্তু ড্রামায় নেই তাহলে কী করবে? ভাবলেও যেতে হবে কারণ সেবার ভবিতব্য, সুতরাং সেবার ভবিতব্য নিজের কার্য করায়। আসা আর যাওয়া এটাই তো বিধি। আচ্ছা। সংগঠন ভালো।

অব্যক্ত বাপদাদার পার্সোনাল সাক্ষাৎকার : -

১) পরমাত্ম-ভালোবাসা অনুভব করার জন্য দুঃখের তরঙ্গ থেকে বিচ্ছিন্ন হও

বাপদাদা সঙ্গমে অনেক রত্নভাণ্ডার দিয়েছেন, সেই সব রত্নভাণ্ডারের মধ্যে থেকে শ্রেষ্ঠ থেকেও শ্রেষ্ঠ রত্নভাণ্ডার হলো সদা খুশির ভান্ডার। তো এই খুশির ভান্ডার সদা সাথে থাকে? যে পরিস্থিতিই আসুক কিন্তু খুশি যেতে পারে না। যখন পরিস্থিতি দুঃখের তরঙ্গ নিয়ে আসে তখনও খুশি থাকো, নাকি অল্পস্বল্প তরঙ্গ এসে যায়? কেননা, সঙ্গমে রয়েছ তো না। সুতরাং একদিকে দুঃখধাম, অন্যদিকে সুখধাম। তাইতো দুঃখের তরঙ্গের অনেক পরিস্থিতি সামনে আসবে কিন্তু নিজের ভিতরে সেই দুঃখের তরঙ্গ যেন দুঃখী না করে। যেমন, গরমের সময় গরম তো হবে তাই না, কিন্তু নিজেকে রক্ষা করা সেটা নিজের উপরে। সুতরাং দুঃখের বিষয় সামনে আসবে কিন্তু হৃদয়ে যেন তার প্রভাব না পড়ে। সেইজন্য বলা হয়ে থাকে স্বতন্ত্র হয়েও প্রভুর প্রিয়। সুতরাং দুঃখের তরঙ্গ থেকে যখন স্বতন্ত্র থাকবে তখনই প্রভুর প্রিয় হবে। যত স্বতন্ত্রতা ততই প্রিয়। নিজে নিজেকে দেখ, কতটা স্বতন্ত্র হয়েছ? যত স্বতন্ত্র হতে থাকবে ততই সহজভাবে পরমাত্ম-ভালোবাসা

অনুভব করবে। অতএব, প্রতিদিন চেক করো কতটা পৃথক থেকেছ, কতটা প্রিয় থেকেছ। কারণ এই ভালোবাসা পরমাত্ম-ভালোবাসা যা আর কোনও যুগে প্রাপ্ত হতে পারে না। যতটা প্রাপ্ত করতে চাও ততটা এখনই করতে হবে। এখন নয় তো কখনও হতে পারে না। তাছাড়া, এই পরমাত্ম-ভালোবাসা প্রাপ্তির সময় কত অল্প! সুতরাং অল্প সময়ে অনেক অনুভব করতে হবে। তাহলে করছ তো? দুনিয়ার লোকে খুশির জন্য কত সময়, সম্পত্তি খরচ করে আর তোমাদের তো সহজভাবে অবিনাশী খুশির ভান্ডার প্রাপ্ত হয়েছে।কিছু খরচ করেছ কি? খুশির সামনে খরচ করার বস্তু কী বা আছে যা দেবে? সুতরাং খুশির গীত গাইতে থাকো ― যা পাওয়ার ছিল তা'পেয়ে গেছি। পেয়ে গেছ তো না? তাইতো তোমরা যখন কোনো বস্তু পাও তখন খুশিতে নাচতে থাকো। অন্যদের সাথেও এই খুশি ভাগ করে নাও। যত বিলিয়ে দিতে থাকো ততই বেড়ে যায়, কারণ দুনিয়াতে তো দুঃখ সবসময়ের আর তোমাদের কাছে খুশিই সবসময়ের। সুতরাং দুঃখীকে খুশি দেওয়া, এটা সবচাইতে বড় থেকেও বড় পুণ্য। তো সবাই তোমরা নির্বিঘ্ন হয়ে সামনে উড়ছ নাকি ছোট বিঘ্ন তোমাদের থামিয়ে দেয়? বিঘ্নের কাজই হলো আসা আর তোমাদের কাজ হলো বিজয় প্রাপ্ত করা। যখন বিঘ্ন নিজের কার্য ভালো করে করছে তো তোমরা মাস্টার সর্বশক্তিমান নিজেদের বিজয়-কার্যে সদা সফল থাকো। সদা এটা স্মরণে রাখো যে, আমরা বিঘ্ন বিনাশক আত্মা। বিঘ্ন-বিনাশকের যে স্মরণিক আছে প্র্যাকটিক্যালি তার অনুভব করছ তো না। আচ্ছা।

২) অচল স্থিতি বানানোর জন্য মাস্টার সর্বশক্তিমানের টাইটেল স্মৃতিতে রাখো

নিজেকে সদা সর্ব ভাণ্ডারে পরিপূর্ণ অর্থাৎ সম্পন্ন আত্মা অনুভব করো?

কারণ যে সম্পন্ন হয় তার নিদর্শন ― সে অনড় হবে, অস্থিরতায় আসবে না। যত খালি হয় ততই অস্থিরতা। সুতরাং যে কোনো চঞ্চলতা তা' সঙ্কল্প দ্বারা হোক কিংবা বাণী দ্বারা, অথবা সম্বন্ধ-সম্পর্ক দ্বারা, কোনও প্রকার চঞ্চলতা যদি হয় তাহলে এটাই প্রমান হয় যে খাজানায় সম্পন্ন নয়। সঙ্কল্পেও, স্বপ্নেও অনড়। কারণ যেমন-যেমন মাস্টার সর্বশক্তিমান স্বরূপের স্মৃতি ইমার্জ হবে এই অস্থিরতা ততই মর্জ হতে থাকবে। সুতরাং মাস্টার সর্বশক্তিমানের স্মৃতি প্রত্যক্ষ রূপে ইমার্জ হতে হবে। যেমন, শরীরের অক্যুপেশন ইমার্জ থাকে, মর্জ হয় না, তেমনই ব্রাহ্মণ জীবনের এই অক্যুপেশন যেন ইমার্জ রূপে থাকে। অতএব, চেক করো, ইমার্জ থাকে নাকি মর্জ থাকে? যদি ইমার্জ থাকে তাহলে তার নির্দশন হবে সব কর্মে সেই নেশা থাকবে এবং অন্যদেরও অনুভব হবে যে, এ' শক্তিশালী আত্মা। সুতরাং বলা হয় চঞ্চলতার ঊর্ধ্বে অটল স্থিতি। অচলঘর তোমাদের স্মরণিক। সুতরাং নিজের অক্যুপেশন সদা স্মরণে রাখো, আমি মাস্টার সর্বশক্তিমান, কারণ আজকাল সব আত্মা অতি দুর্বল, সেইজন্য দুর্বল আত্মাদের শক্তি চাই। কে দেবে শক্তি? যে নিজে মাস্টার সর্বশক্তিমান হবে। কোনও আত্মার সাথে যদি দেখা-সাক্ষাৎ হয় তাহলে সে নিজের কথা কী বলবে? দুর্বলতার কথাই বলে তো না? যা করতে চায় তা' করতে পারে না তো তার প্রমান হলো সে দুর্বল আর তোমরা যে সঙ্কল্প করো তা' কর্মে নিয়ে আসতে পারো। সুতরাং মাস্টার সর্বশক্তিমানের লক্ষণ হলো সঙ্কল্প আর কর্ম দুইই সমান হবে। এমন নয় যে সঙ্কল্প খুব শ্রেষ্ঠ হবে আর সেই শ্রেষ্ঠ সঙ্কল্প অনুযায়ী কর্ম করতে পারলে না, একে মাস্টার সর্বশক্তিমান বলা হবে না। সুতরাং চেক করো, যে শ্রেষ্ঠ সঙ্কল্প উৎপন্ন হয় তা' কর্ম পর্যন্ত আসে নাকি আসতে পারে না? মাস্টার সর্বশক্তিমানের লক্ষণ হলো - যখন যে শক্তি প্রয়োজন হবে সেই সময় সেই শক্তি যেন কার্যে আসে। তো এরকম হয় নাকি আহ্বান করো, কিছুক্ষণ পরে আসে? যখন কোনো পরিস্থিতি পুরো হয়ে যায়, আর তারপরে স্মৃতিতে আসে এভাবে নয়, এভাবে করা উচিত ছিল, তো তাকে বলা হয়ে থাকে প্রয়োজনের সময় কাজে আসেনি। যেভাবে, স্থূল কর্মেন্দ্রিয় অর্ডারে চলতে পারে, হাতকে যখন চাও, যেখানে চাও সেখানে চালনা করতে পারো, ঠিক সেভাবেই এই সূক্ষ্ম শক্তি এতটা কন্ট্রোলে হোক যাতে যে সময় যে শক্তি চাও কাজে লাগাতে পারো। সুতরাং এরকম কন্ট্রোলিং পাওয়ার আছে তোমাদের? এমন তো ভাবো না যে, এটা করতে চাইনি কিন্তু তবুও হয়ে গেছে। তাহলে নিজের কন্ট্রোলিং পাওয়ার চেক করতে করতে নিরন্তর শক্তিশালী হও। সবাই তোমরা উড়তি কলার নাকি কেউ উত্তরণ কলার কেউ উড়তি কলার? নাকি কখনো উড়তি, কখনো উত্তরণ, কখনো চলায়মান কলা হয়ে যায়? বদল হয় নাকি একরসে এগিয়ে যেতে থাকো? কোনো বিঘ্ন যদি আসে তবে কত সময়ে বিজয়ী হও? টাইম লাগে? কেননা, তোমরা তো নলেজফুল, তাই না। তো বিঘ্নেরও নলেজ আছে তোমাদের। যখন নলেজের শক্তি তোমরা প্রয়োগ করবে বিঘ্ন আঘাত করতে পারবে না বরং হার মানবে। একেই বলে, মাস্টার সর্বশক্তিমান। সুতরাং অমৃতবেলা থেকে এই অক্যুপেশন ইমার্জ করো আর তারপরে সারাদিন চেক করো। আচ্ছা।

29.01.2023 HINDI MURLI

                                                            29.01.2023 HINDI MURLI

रिवाइज: 02-12-93 मधुबन

नम्बरवन बनने के लिए गुण मूर्त बन गुणों का दान करने वाले महादानी बनो


आज बेहद के मात-पिता चारों ओर के विशेष बच्चों को देख रहे थे। क्या विशेषता देखी? कौन से बच्चे अखुट ज्ञानी, अटल स्वराज्य अधिकारी, अखण्ड निर्विघ्न, अखण्ड योगी, अखण्ड महादानी हैं ऐसे विशेष आत्मायें कोटों में कोई बने हुए हैं। ज्ञानी, योगी, महादानी सभी बने हैं लेकिन अखण्ड कोई-कोई बने हैं। जो अखुट, अटल और अखण्ड हैं वही विजय माला के विजयी मणके हैं। बापदादा ने संगमयुग पर सभी बच्चों को ‘अटल-अखण्ड भव' का वरदान दिया है लेकिन वरदान को जीवन में सदा धारण करने में नम्बरवार बन गये हैं। नम्बरवन बनने के लिये सबसे सहज विधि है अखण्ड महादानी बनो। अखण्ड महादानी अर्थात् निरन्तर सहज सेवाधारी क्योंकि सहज ही निरन्तर हो सकता है। तो अखण्ड सेवाधारी अर्थात् अखण्ड महादानी। दाता के बच्चे हो, सर्व खज़ानों से सम्पन्न श्रेष्ठ आत्मायें हो। सम्पन्न की निशानी है अखण्ड महादानी। एक सेकेण्ड भी दान देने के बिना रह नहीं सकते। द्वापर से दानी आत्मायें अनेक भक्त भी बने हैं लेकिन कितने भी बड़े दानी हों, अखुट ख़ज़ाने के दानी नहीं बने हैं। विनाशी ख़ज़ाने वा वस्तु के दानी बनते हैं। आप श्रेष्ठ आत्मायें अब संगम पर अखुट और अखण्ड महादानी बनते हो। अपने आपसे पूछो कि अखण्ड महादानी हो? वा समय प्रमाण दानी हो? वा चांस प्रमाण दानी हो?


अखण्ड महादानी सदा तीन प्रकार से दान करने में बिज़ी रहते हैं। पहला मनसा द्वारा शक्तियां देने का दान, दूसरा वाणी द्वारा ज्ञान का दान, तीसरा कर्म द्वारा गुणों का दान। इन तीनों प्रकार के दान देने वाले सहज महादानी बन सकते हैं। रिजल्ट में देखा वाणी द्वारा ज्ञान दान मैजारिटी करते रहते हो। मनसा द्वारा शक्तियों का दान यथा शक्ति करते हो और कर्म द्वारा गुण दान ये बहुत कम करने वाले हैं और वर्तमान समय चाहे अज्ञानी आत्मायें हैं, चाहे ब्राह्मण आत्मायें हैं दोनों को आवश्यकता गुणदान की है। वर्तमान समय विशेष स्वयं में वा ब्राह्मण परिवार में इस विधि को तीव्र बनाओ।


ये दिव्य गुण सबसे श्रेष्ठ प्रभु प्रसाद है। इस प्रसाद को खूब बांटो। जैसे जब कोई से भी मिलते हो तो एक-दो में भी स्नेह की निशानी स्थूल टोली खिलाते हो ना, ऐसे एक-दो में ये गुणों की टोली खिलाओ। इस विधि से जो संगमयुग का लक्ष्य है - “फरिश्ता सो देवता'' यह सहज सर्व में प्रत्यक्ष दिखाई देगा। यह प्रैक्टिस निरन्तर स्मृति में रखो कि मैं दाता का बच्चा अखण्ड महादानी आत्मा हूँ। कोई भी आत्मा चाहे अज्ञानी हो, चाहे ब्राह्मण हो लेकिन देना है। ब्राह्मण आत्माओं को ज्ञान तो पहले ही है लेकिन दो प्रकार से दाता बन सकते हो।


1- जिस आत्मा को, जिस शक्ति की आवश्यकता है उस आत्मा को मन्सा द्वारा अर्थात् शुद्ध वृत्ति, वायब्रेशन्स द्वारा शक्तियों का दान अर्थात् सहयोग दो।


2- कर्म द्वारा सदा स्वयं जीवन में गुण मूर्त बन, प्रत्यक्ष सैम्पल बन औरों को सहज गुण धारण करने का सहयोग दो। इसको कहा जाता है गुण दान। दान का अर्थ है सहयोग देना। आजकल ब्राह्मण आत्मायें भी सुनने के बजाय प्रत्यक्ष प्रमाण देखना चाहती हैं। किसी को भी शक्ति धारण करने की वा गुण धारण करने की शिक्षा देना चाहते हो तो कोई दिल में सोचते, कोई कहते कि ऐसे धारणा मूर्त कौन बने हैं? तो देखना चाहते हैं लेकिन सुनना नहीं चाहते। ऐसे एक-दो में कहते हो ना - कौन बना है, सबको देख लिया...। जब कोई बात आती है तो कहते हैं कोई नहीं बना है, सब चलता है। लेकिन यह अलबेलेपन के बोल हैं, यथार्थ नहीं हैं। यथार्थ क्या है? फालो ब्रह्मा बाप। जैसे ब्रह्मा बाप ने स्वयं, सदा अपने को निमित्त एग्जाम्पल बनाया, सदा यह लक्ष्य लक्षण में लाया - जो ओटे सो अर्जुन अर्थात् जो स्वयं को निमित्त प्रत्यक्ष प्रमाण बनाता है वही अर्जुन अर्थात् अव्वल नम्बर का बनता है। अगर फालो फादर करना है तो दूसरे को देख बनने में नम्बरवन नहीं बन सकेंगे। नम्बरवार बन जायेंगे।


नम्बरवन आत्मा की निशानी है हर श्रेष्ठ कार्य में मुझे निमित्त बन औरों को सिम्पल करने के लिये सैम्पल बनना है। दूसरे को देखना, चाहे बड़ों को, चाहे छोटों को, चाहे समान वालों को लेकिन दूसरों को देख बनना कि पहले यह-यह बनें तो मैं बनूँ, तो नम्बरवन तो वह हो गया ना जो बनेगा। तो स्वयं स्वत: ही नम्बरवार में आ जाते हैं। तो अखण्ड महा-दानी आत्मा सदा अपने को हर सेकेण्ड तीनों ही महादान में से कोई न कोई दान करने में बिज़ी रखता है। जैसा समय वैसी सेवा में सदा लगा हुआ रहता है। उनको व्यर्थ देखने, सुनने वा करने की फुर्सत ही नहीं। तो महादानी बने हो? अभी अण्डरलाइन करो अखण्ड बने हैं। अगर बीच-बीच में दातापन में खण्डन पड़ता है तो खण्डित को सम्पूर्ण नहीं कहा जाता। वर्तमान समय आपस में विशेष कर्म द्वारा गुणदाता बनने की आवश्यकता है। हर एक संकल्प करो कि मुझे सदा गुण मूर्त बन सबको गुण मूर्त बनाने का विशेष कर्तव्य करना ही है। तो स्वयं की और सर्व की कमजोरियां समाप्त करने की इस विधि में हर एक अपने को निमित्त अव्वल नम्बर समझ आगे बढ़ते चलो। ज्ञान तो बहुत है, अभी गुणों को इमर्ज करो, सर्वगुण सम्पन्न बनने और बनाने का एग्जाम्पल बनो। अच्छा!


सर्व अखण्ड योगी तू आत्मायें, सर्व सदा गुण मूर्त आत्माओं को, सर्व हर संकल्प हर सेकेण्ड महादानी वा महासहयोगी विशेष आत्माओं को, सदा स्वयं को श्रेष्ठता में सैम्पल बन सर्व आत्माओं को सिम्पल सहज प्रेरणा देने वाले, सदा स्वयं को निमित्त नम्बरवन समझ प्रत्यक्ष प्रमाण देने वाले बाप समान आत्माओं को बापदादा का याद-प्यार और नमस्ते।


दादी जानकी से मुलाकात- (आस्ट्रेलिया, सिंगापुर आदि के चक्कर का समाचार सुनाया और सबकी याद दी) सबकी याद पहुँच गई। चारों ओर के बच्चे सदा बाप के सामने हैं इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है जब भी याद करते तो समीप और साथ का अनुभव करते हैं। बाबा कहा दिल से और दिलाराम हाज़िर। इसीलिये ही कहते हैं हज़ूर हाज़िर है, हाज़िरा हज़ूर है। जहाँ भी हैं, जो भी हैं लेकिन हर स्थान पर हरेक के पास हाज़िर हो जाते हैं इसीलिये हाज़िरा हज़ूर हो गया। इस स्नेह की विधि को लोग नहीं जान सकते। यह ब्राह्मण आत्मायें ही जानती हैं। अनुभवी इस अनुभव को जानते हैं। आप विशेष आत्मायें तो हैं ही कम्बाइण्ड ना। अलग हो ही नहीं सकते। लोग कहते हैं जिधर देखते हैं उधर तू ही तू है और आप कहते हो जो करते हैं, जहाँ जाते हैं बाप साथ ही है अर्थात् तू ही तू है। जैसे कर्तव्य साथ है तो हर कर्तव्य कराने वाला भी सदा साथ है इसलिये गाया हुआ है करनक-रावनहार। तो कम्बाइण्ड हो गया ना - करनहार और करावनहार। तो आप सबकी स्थिति क्या है? कम्बाइण्ड है ना। करनकरावनहार, करनहार के साथ है ही, करावनहार अलग नहीं है। इसको ही कम्बाइण्ड स्थिति कहा जाता है। सभी अपना-अपना अच्छा पार्ट बजा रहे हो। अनेक आत्माओं के आगे सैम्पल हो, सिम्पल करने के। ऐसे लगता है ना। मुश्किल को सहज बनाना यही फालो फादर है। ऐसे है ना। अच्छा पार्ट बजाया ना। जहाँ भी हैं, विशेष पार्टधारी विशेष पार्ट बजाने के सिवाए रह नहीं सकते। यह ड्रामा की नूँध है। अच्छा। चक्कर लगाना बहुत अच्छा है। चक्कर लगाया फिर स्वीट होम में आ गये। सेवा का चक्कर अनेक आत्माओं के प्रति विशेष उमंग-उत्साह का चक्कर है। सब ठीक है ना? अच्छा ही अच्छा है। ड्रामा की भावी खींचती ज़रूर है। आप रहना चाहो लेकिन ड्रामा में नहीं है तो क्या करेंगे। सोचते भी जाना पड़ेगा क्योंकि सेवा की भावी है तो सेवा की भावी अपना कार्य कराती है। आना और जाना यही तो विधि है। अच्छा। संगठन अच्छा है।


अव्यक्त बापदादा की पर्सनल मुलाकात


1) परमात्म प्यार का अनुभव करने के लिए दु:ख की लहर से न्यारे बनो


बापदादा ने संगम पर अनेक ख़ज़ाने दिये हैं उन सभी खज़ानों में से श्रेष्ठ से श्रेष्ठ ख़ज़ाना है सदा खुशी का ख़ज़ाना। तो यह खुशी का ख़ज़ाना सदा साथ रहता है? कैसी भी परिस्थिति आ जाये लेकिन खुशी नहीं जा सकती। जब परिस्थिति कोई दु:ख की लहर वाली आती है तो भी खुश रहते हो कि थोड़ी-थोड़ी लहर आ जाती है? क्योंकि संगम पर हो ना। तो एक तरफ है दु:खधाम, दूसरे तरफ है सुखधाम। तो दु:ख के लहर की कई बातें सामने आयेंगी लेकिन अपने अन्दर वो दु:ख की लहर दु:खी नहीं करे। जैसे गर्मी के मौसम में गर्मी तो होगी ना लेकिन स्वयं को बचाना वो अपने ऊपर है। तो दु:ख की बातें सुनने में आयेंगी लेकिन दिल में प्रभाव नहीं पड़े। इसलिये कहा जाता है न्यारा और प्रभु का प्यारा। तो दु:ख की लहर से न्यारा तब प्रभु का प्यारा बनेंगे। जितना न्यारा उतना प्यारा। अपने आपको देखो कि कितने न्यारे बने हैं? जितना न्यारा बनते जाते हो उतना ही सहज परमात्म प्यार का अनुभव करते हो। तो हर रोज़ चेक करो कि कितने न्यारे रहे, कितने प्यारे रहे। क्योंकि ये प्यार परमात्म प्यार है जो और कोई भी युग में प्राप्त हो नहीं सकता। जितना प्राप्त करना है उतना अभी करना है। अभी नहीं तो कभी भी नहीं हो सकता। और कितना थोड़ा सा समय यह परमात्म प्यार की प्राप्ति का है। तो थोड़े समय में बहुत अनुभव करना है। तो कर रहे हो? दुनिया वाले खुशी के लिये कितना समय, सम्पत्ति खर्च करते हैं और आपको सहज अविनाशी खुशी का ख़ज़ाना मिल गया। कुछ खर्चा किया क्या? खुशी के आगे खर्च करने की वस्तु है ही क्या जो देंगे। तो यही खुशी के गीत गाते रहो कि जो पाना था वो पा लिया। पा लिया ना? तो जब कोई चीज़ मिल जाती है तो खुशी में नाचते रहते हैं। दूसरों को भी यह खुशी बांटते जाओ। जितना बांटते जाते हो उतना बढ़ती जाती है क्योंकि बांटना माना बढ़ना। तो जो भी सम्बन्ध में आये वह अनुभव करे कि इनको कोई श्रेष्ठ प्राप्ति हुई है, जिसकी खुशी है क्योंकि दुनिया में तो हर समय का दु:ख है और आपके पास हर समय की खुशी है। तो दु:खी को खुशी देना, यह सबसे बड़े से बड़ा पुण्य है। तो सभी निर्विघ्न बन आगे उड़ रहे हो या छोटे-छोटे विघ्न रोकते हैं? विघ्नों का काम है आना और आपका काम है विजय प्राप्त करना। जब विघ्न अपना कार्य अच्छी तरह से कर रहे हैं तो आप मास्टर सर्वशक्तिमान् अपने विजय के कार्य में सदा सफल रहो। सदा यह याद रखो कि हम विघ्न-विनाशक आत्मायें हैं। विघ्न-विनाशक का जो यादगार है उसका प्रैक्टिकल में अनुभव कर रहे हो ना। अच्छा।


2) अचल स्थिति बनाने के लिए मास्टर सर्वशक्तिमान् का टाइटल स्मृति में रखो


स्वयं को सदा सर्व खज़ानों से भरपूर अर्थात् सम्पन्न आत्मा अनुभव करते हो? क्योंकि जो सम्पन्न होता है तो सम्पन्नता की निशानी है कि वो अचल होगा, हलचल में नहीं आयेगा। जितना खाली होता है उतनी हलचल होती है। तो किसी भी प्रकार की हलचल, चाहे संकल्प द्वारा, चाहे वाणी द्वारा, चाहे सम्बन्ध-सम्पर्क द्वारा, किसी भी प्रकार की हलचल अगर होती है तो सिद्ध है कि ख़ज़ाने से सम्पन्न नहीं हैं। संकल्प में भी, स्वप्न में भी अचल। क्योंकि जितना-जितना मास्टर सर्वशक्तिमान् स्वरूप की स्मृति इमर्ज होगी उतना ये हलचल मर्ज होती जायेगी। तो मास्टर सर्वशक्तिमान् की स्मृति प्रत्यक्ष रूप में इमर्ज हो। जैसे शरीर का आक्यूपेशन इमर्ज रहता है, मर्ज नहीं होता, ऐसे यह ब्राह्मण जीवन का आक्यूपेशन इमर्ज रूप में रहे। तो यह चेक करो इमर्ज रहता है या मर्ज रहता है? इमर्ज रहता है तो उसकी निशानी है हर कर्म में वह नशा होगा और दूसरों को भी अनुभव होगा कि यह शक्तिशाली आत्मा है। तो कहा जाता है हलचल से परे अचल। अचलघर आपका यादगार है। तो अपना आक्यूपेशन सदा याद रखो कि हम मास्टर सर्व-शक्तिमान् हैं क्योंकि आजकल सर्व आत्मायें अति कमजोर हैं तो कमजोर आत्माओं को शक्ति चाहिये। शक्ति कौन देगा? जो स्वयं मास्टर सर्वशक्तिमान् होगा। किसी भी आत्मा से मिलेंगे तो वो क्या अपनी बातें सुनायेंगे? कमजोरी की बातें सुनाते हैं ना? जो करना चाहते हैं वो कर नहीं सकते तो इसका प्रमाण है कि कमजोर हैं और आप जो संकल्प करते हो वो कर्म में ला सकते हो। तो मास्टर सर्वशक्तिमान् की निशानी है कि संकल्प और कर्म दोनों समान होगा। ऐसे नहीं कि संकल्प बहुत श्रेष्ठ हो और कर्म करने में वो श्रेष्ठ संकल्प नहीं कर सको, इसको मास्टर सर्वशक्तिमान् नहीं कहेंगे। तो चेक करो कि जो श्रेष्ठ संकल्प होते हैं वो कर्म तक आते हैं या नहीं आ सकते? मास्टर सर्वशक्तिमान् की निशानी है कि जो शक्ति जिस समय आवश्यक हो उस समय वो शक्ति कार्य में आये। तो ऐसे है या आह्वान करते हो, थोड़ा देरी से आती है? जब कोई बात पूरी हो जाती है, पीछे स्मृति में आये कि ऐसा नहीं, ऐसा करते, तो इसको कहा जाता है समय पर काम में नहीं आई। जैसे स्थूल कर्मेन्द्रियां ऑर्डर पर चल सकती हैं ना, हाथ को जब चाहो, जहाँ चाहो वहाँ चला सकते हो, ऐसे यह सूक्ष्म शक्तियां इतने कन्ट्रोल में हों जिस समय जो शक्ति चाहो काम में लगा सको। तो ऐसी कन्ट्रोलिंग पॉवर है? ऐसे तो नहीं सोचते कि चाहते तो नहीं थे लेकिन हो गया। तो सदा अपनी कन्ट्रोलिंग पॉवर को चेक करते हुए शक्तिशाली बनते चलो। सब उड़ती कला वाले हो कि कोई चढ़ती कला वाला, कोई उड़ती कला वाला? वा कभी उड़ती, कभी चढ़ती, कभी चलती कला हो जाती है? बदली होता है वा एकरस आगे बढ़ते रहते हो? कोई विघ्न आता है तो कितने समय में विजयी बनते हो? टाइम लगता है? क्योंकि नॉलेजफुल हो ना। तो विघ्नों की भी नॉलेज है। नॉलेज की शक्ति से विघ्न वार नहीं करेंगे लेकिन हार खा लेंगे। इसी को ही मास्टर सर्वशक्तिमान् कहा जाता है। तो अमृतवेले से इस आक्यूपेशन को इमर्ज करो और फिर सारा दिन चेक करो। अच्छा।


वरदान:- सहनशक्ति का कवच पहन, सम्पूर्ण स्टेज को वरने वाले विघ्न जीत भव

अपनी सम्पूर्ण स्टेज को वरने अर्थात् प्राप्त करने के लिए अलबेलेपन के नाज़ नखरों को छोड़ सहनशक्ति में मजबूत बनो। सहनशक्ति ही सर्व विघ्नों से बचने का कवच है। जो यह कवच नहीं पहनते वह नाजुक बन जाते हैं। फिर बाप की बातें बाप को ही सुनाते हैं, कभी बहुत उमंग-उत्साह में रहते, कभी दिलशिकस्त हो जाते। अब इस उतरने चढ़ने की सीढ़ी को छोड़ सदा उमंग-उत्साह में रहो तो सम्पूर्ण स्टेज समीप आ जायेगी।

स्लोगन:- याद और सेवा की शक्ति से अनेक आत्माओं पर रहम करना ही रहमदिल बनना है। 

 29.01.2023 HINDI MURLI

रिवाइज: 02-12-93 मधुबन

नम्बरवन बनने के लिए गुण मूर्त बन गुणों का दान करने वाले महादानी बनो


आज बेहद के मात-पिता चारों ओर के विशेष बच्चों को देख रहे थे। क्या विशेषता देखी? कौन से बच्चे अखुट ज्ञानी, अटल स्वराज्य अधिकारी, अखण्ड निर्विघ्न, अखण्ड योगी, अखण्ड महादानी हैं ऐसे विशेष आत्मायें कोटों में कोई बने हुए हैं। ज्ञानी, योगी, महादानी सभी बने हैं लेकिन अखण्ड कोई-कोई बने हैं। जो अखुट, अटल और अखण्ड हैं वही विजय माला के विजयी मणके हैं। बापदादा ने संगमयुग पर सभी बच्चों को ‘अटल-अखण्ड भव' का वरदान दिया है लेकिन वरदान को जीवन में सदा धारण करने में नम्बरवार बन गये हैं। नम्बरवन बनने के लिये सबसे सहज विधि है अखण्ड महादानी बनो। अखण्ड महादानी अर्थात् निरन्तर सहज सेवाधारी क्योंकि सहज ही निरन्तर हो सकता है। तो अखण्ड सेवाधारी अर्थात् अखण्ड महादानी। दाता के बच्चे हो, सर्व खज़ानों से सम्पन्न श्रेष्ठ आत्मायें हो। सम्पन्न की निशानी है अखण्ड महादानी। एक सेकेण्ड भी दान देने के बिना रह नहीं सकते। द्वापर से दानी आत्मायें अनेक भक्त भी बने हैं लेकिन कितने भी बड़े दानी हों, अखुट ख़ज़ाने के दानी नहीं बने हैं। विनाशी ख़ज़ाने वा वस्तु के दानी बनते हैं। आप श्रेष्ठ आत्मायें अब संगम पर अखुट और अखण्ड महादानी बनते हो। अपने आपसे पूछो कि अखण्ड महादानी हो? वा समय प्रमाण दानी हो? वा चांस प्रमाण दानी हो?


अखण्ड महादानी सदा तीन प्रकार से दान करने में बिज़ी रहते हैं। पहला मनसा द्वारा शक्तियां देने का दान, दूसरा वाणी द्वारा ज्ञान का दान, तीसरा कर्म द्वारा गुणों का दान। इन तीनों प्रकार के दान देने वाले सहज महादानी बन सकते हैं। रिजल्ट में देखा वाणी द्वारा ज्ञान दान मैजारिटी करते रहते हो। मनसा द्वारा शक्तियों का दान यथा शक्ति करते हो और कर्म द्वारा गुण दान ये बहुत कम करने वाले हैं और वर्तमान समय चाहे अज्ञानी आत्मायें हैं, चाहे ब्राह्मण आत्मायें हैं दोनों को आवश्यकता गुणदान की है। वर्तमान समय विशेष स्वयं में वा ब्राह्मण परिवार में इस विधि को तीव्र बनाओ।


ये दिव्य गुण सबसे श्रेष्ठ प्रभु प्रसाद है। इस प्रसाद को खूब बांटो। जैसे जब कोई से भी मिलते हो तो एक-दो में भी स्नेह की निशानी स्थूल टोली खिलाते हो ना, ऐसे एक-दो में ये गुणों की टोली खिलाओ। इस विधि से जो संगमयुग का लक्ष्य है - “फरिश्ता सो देवता'' यह सहज सर्व में प्रत्यक्ष दिखाई देगा। यह प्रैक्टिस निरन्तर स्मृति में रखो कि मैं दाता का बच्चा अखण्ड महादानी आत्मा हूँ। कोई भी आत्मा चाहे अज्ञानी हो, चाहे ब्राह्मण हो लेकिन देना है। ब्राह्मण आत्माओं को ज्ञान तो पहले ही है लेकिन दो प्रकार से दाता बन सकते हो।


1- जिस आत्मा को, जिस शक्ति की आवश्यकता है उस आत्मा को मन्सा द्वारा अर्थात् शुद्ध वृत्ति, वायब्रेशन्स द्वारा शक्तियों का दान अर्थात् सहयोग दो।


2- कर्म द्वारा सदा स्वयं जीवन में गुण मूर्त बन, प्रत्यक्ष सैम्पल बन औरों को सहज गुण धारण करने का सहयोग दो। इसको कहा जाता है गुण दान। दान का अर्थ है सहयोग देना। आजकल ब्राह्मण आत्मायें भी सुनने के बजाय प्रत्यक्ष प्रमाण देखना चाहती हैं। किसी को भी शक्ति धारण करने की वा गुण धारण करने की शिक्षा देना चाहते हो तो कोई दिल में सोचते, कोई कहते कि ऐसे धारणा मूर्त कौन बने हैं? तो देखना चाहते हैं लेकिन सुनना नहीं चाहते। ऐसे एक-दो में कहते हो ना - कौन बना है, सबको देख लिया...। जब कोई बात आती है तो कहते हैं कोई नहीं बना है, सब चलता है। लेकिन यह अलबेलेपन के बोल हैं, यथार्थ नहीं हैं। यथार्थ क्या है? फालो ब्रह्मा बाप। जैसे ब्रह्मा बाप ने स्वयं, सदा अपने को निमित्त एग्जाम्पल बनाया, सदा यह लक्ष्य लक्षण में लाया - जो ओटे सो अर्जुन अर्थात् जो स्वयं को निमित्त प्रत्यक्ष प्रमाण बनाता है वही अर्जुन अर्थात् अव्वल नम्बर का बनता है। अगर फालो फादर करना है तो दूसरे को देख बनने में नम्बरवन नहीं बन सकेंगे। नम्बरवार बन जायेंगे।


नम्बरवन आत्मा की निशानी है हर श्रेष्ठ कार्य में मुझे निमित्त बन औरों को सिम्पल करने के लिये सैम्पल बनना है। दूसरे को देखना, चाहे बड़ों को, चाहे छोटों को, चाहे समान वालों को लेकिन दूसरों को देख बनना कि पहले यह-यह बनें तो मैं बनूँ, तो नम्बरवन तो वह हो गया ना जो बनेगा। तो स्वयं स्वत: ही नम्बरवार में आ जाते हैं। तो अखण्ड महा-दानी आत्मा सदा अपने को हर सेकेण्ड तीनों ही महादान में से कोई न कोई दान करने में बिज़ी रखता है। जैसा समय वैसी सेवा में सदा लगा हुआ रहता है। उनको व्यर्थ देखने, सुनने वा करने की फुर्सत ही नहीं। तो महादानी बने हो? अभी अण्डरलाइन करो अखण्ड बने हैं। अगर बीच-बीच में दातापन में खण्डन पड़ता है तो खण्डित को सम्पूर्ण नहीं कहा जाता। वर्तमान समय आपस में विशेष कर्म द्वारा गुणदाता बनने की आवश्यकता है। हर एक संकल्प करो कि मुझे सदा गुण मूर्त बन सबको गुण मूर्त बनाने का विशेष कर्तव्य करना ही है। तो स्वयं की और सर्व की कमजोरियां समाप्त करने की इस विधि में हर एक अपने को निमित्त अव्वल नम्बर समझ आगे बढ़ते चलो। ज्ञान तो बहुत है, अभी गुणों को इमर्ज करो, सर्वगुण सम्पन्न बनने और बनाने का एग्जाम्पल बनो। अच्छा!


सर्व अखण्ड योगी तू आत्मायें, सर्व सदा गुण मूर्त आत्माओं को, सर्व हर संकल्प हर सेकेण्ड महादानी वा महासहयोगी विशेष आत्माओं को, सदा स्वयं को श्रेष्ठता में सैम्पल बन सर्व आत्माओं को सिम्पल सहज प्रेरणा देने वाले, सदा स्वयं को निमित्त नम्बरवन समझ प्रत्यक्ष प्रमाण देने वाले बाप समान आत्माओं को बापदादा का याद-प्यार और नमस्ते।


दादी जानकी से मुलाकात- (आस्ट्रेलिया, सिंगापुर आदि के चक्कर का समाचार सुनाया और सबकी याद दी) सबकी याद पहुँच गई। चारों ओर के बच्चे सदा बाप के सामने हैं इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है जब भी याद करते तो समीप और साथ का अनुभव करते हैं। बाबा कहा दिल से और दिलाराम हाज़िर। इसीलिये ही कहते हैं हज़ूर हाज़िर है, हाज़िरा हज़ूर है। जहाँ भी हैं, जो भी हैं लेकिन हर स्थान पर हरेक के पास हाज़िर हो जाते हैं इसीलिये हाज़िरा हज़ूर हो गया। इस स्नेह की विधि को लोग नहीं जान सकते। यह ब्राह्मण आत्मायें ही जानती हैं। अनुभवी इस अनुभव को जानते हैं। आप विशेष आत्मायें तो हैं ही कम्बाइण्ड ना। अलग हो ही नहीं सकते। लोग कहते हैं जिधर देखते हैं उधर तू ही तू है और आप कहते हो जो करते हैं, जहाँ जाते हैं बाप साथ ही है अर्थात् तू ही तू है। जैसे कर्तव्य साथ है तो हर कर्तव्य कराने वाला भी सदा साथ है इसलिये गाया हुआ है करनक-रावनहार। तो कम्बाइण्ड हो गया ना - करनहार और करावनहार। तो आप सबकी स्थिति क्या है? कम्बाइण्ड है ना। करनकरावनहार, करनहार के साथ है ही, करावनहार अलग नहीं है। इसको ही कम्बाइण्ड स्थिति कहा जाता है। सभी अपना-अपना अच्छा पार्ट बजा रहे हो। अनेक आत्माओं के आगे सैम्पल हो, सिम्पल करने के। ऐसे लगता है ना। मुश्किल को सहज बनाना यही फालो फादर है। ऐसे है ना। अच्छा पार्ट बजाया ना। जहाँ भी हैं, विशेष पार्टधारी विशेष पार्ट बजाने के सिवाए रह नहीं सकते। यह ड्रामा की नूँध है। अच्छा। चक्कर लगाना बहुत अच्छा है। चक्कर लगाया फिर स्वीट होम में आ गये। सेवा का चक्कर अनेक आत्माओं के प्रति विशेष उमंग-उत्साह का चक्कर है। सब ठीक है ना? अच्छा ही अच्छा है। ड्रामा की भावी खींचती ज़रूर है। आप रहना चाहो लेकिन ड्रामा में नहीं है तो क्या करेंगे। सोचते भी जाना पड़ेगा क्योंकि सेवा की भावी है तो सेवा की भावी अपना कार्य कराती है। आना और जाना यही तो विधि है। अच्छा। संगठन अच्छा है।


अव्यक्त बापदादा की पर्सनल मुलाकात


1) परमात्म प्यार का अनुभव करने के लिए दु:ख की लहर से न्यारे बनो


बापदादा ने संगम पर अनेक ख़ज़ाने दिये हैं उन सभी खज़ानों में से श्रेष्ठ से श्रेष्ठ ख़ज़ाना है सदा खुशी का ख़ज़ाना। तो यह खुशी का ख़ज़ाना सदा साथ रहता है? कैसी भी परिस्थिति आ जाये लेकिन खुशी नहीं जा सकती। जब परिस्थिति कोई दु:ख की लहर वाली आती है तो भी खुश रहते हो कि थोड़ी-थोड़ी लहर आ जाती है? क्योंकि संगम पर हो ना। तो एक तरफ है दु:खधाम, दूसरे तरफ है सुखधाम। तो दु:ख के लहर की कई बातें सामने आयेंगी लेकिन अपने अन्दर वो दु:ख की लहर दु:खी नहीं करे। जैसे गर्मी के मौसम में गर्मी तो होगी ना लेकिन स्वयं को बचाना वो अपने ऊपर है। तो दु:ख की बातें सुनने में आयेंगी लेकिन दिल में प्रभाव नहीं पड़े। इसलिये कहा जाता है न्यारा और प्रभु का प्यारा। तो दु:ख की लहर से न्यारा तब प्रभु का प्यारा बनेंगे। जितना न्यारा उतना प्यारा। अपने आपको देखो कि कितने न्यारे बने हैं? जितना न्यारा बनते जाते हो उतना ही सहज परमात्म प्यार का अनुभव करते हो। तो हर रोज़ चेक करो कि कितने न्यारे रहे, कितने प्यारे रहे। क्योंकि ये प्यार परमात्म प्यार है जो और कोई भी युग में प्राप्त हो नहीं सकता। जितना प्राप्त करना है उतना अभी करना है। अभी नहीं तो कभी भी नहीं हो सकता। और कितना थोड़ा सा समय यह परमात्म प्यार की प्राप्ति का है। तो थोड़े समय में बहुत अनुभव करना है। तो कर रहे हो? दुनिया वाले खुशी के लिये कितना समय, सम्पत्ति खर्च करते हैं और आपको सहज अविनाशी खुशी का ख़ज़ाना मिल गया। कुछ खर्चा किया क्या? खुशी के आगे खर्च करने की वस्तु है ही क्या जो देंगे। तो यही खुशी के गीत गाते रहो कि जो पाना था वो पा लिया। पा लिया ना? तो जब कोई चीज़ मिल जाती है तो खुशी में नाचते रहते हैं। दूसरों को भी यह खुशी बांटते जाओ। जितना बांटते जाते हो उतना बढ़ती जाती है क्योंकि बांटना माना बढ़ना। तो जो भी सम्बन्ध में आये वह अनुभव करे कि इनको कोई श्रेष्ठ प्राप्ति हुई है, जिसकी खुशी है क्योंकि दुनिया में तो हर समय का दु:ख है और आपके पास हर समय की खुशी है। तो दु:खी को खुशी देना, यह सबसे बड़े से बड़ा पुण्य है। तो सभी निर्विघ्न बन आगे उड़ रहे हो या छोटे-छोटे विघ्न रोकते हैं? विघ्नों का काम है आना और आपका काम है विजय प्राप्त करना। जब विघ्न अपना कार्य अच्छी तरह से कर रहे हैं तो आप मास्टर सर्वशक्तिमान् अपने विजय के कार्य में सदा सफल रहो। सदा यह याद रखो कि हम विघ्न-विनाशक आत्मायें हैं। विघ्न-विनाशक का जो यादगार है उसका प्रैक्टिकल में अनुभव कर रहे हो ना। अच्छा।


2) अचल स्थिति बनाने के लिए मास्टर सर्वशक्तिमान् का टाइटल स्मृति में रखो


स्वयं को सदा सर्व खज़ानों से भरपूर अर्थात् सम्पन्न आत्मा अनुभव करते हो? क्योंकि जो सम्पन्न होता है तो सम्पन्नता की निशानी है कि वो अचल होगा, हलचल में नहीं आयेगा। जितना खाली होता है उतनी हलचल होती है। तो किसी भी प्रकार की हलचल, चाहे संकल्प द्वारा, चाहे वाणी द्वारा, चाहे सम्बन्ध-सम्पर्क द्वारा, किसी भी प्रकार की हलचल अगर होती है तो सिद्ध है कि ख़ज़ाने से सम्पन्न नहीं हैं। संकल्प में भी, स्वप्न में भी अचल। क्योंकि जितना-जितना मास्टर सर्वशक्तिमान् स्वरूप की स्मृति इमर्ज होगी उतना ये हलचल मर्ज होती जायेगी। तो मास्टर सर्वशक्तिमान् की स्मृति प्रत्यक्ष रूप में इमर्ज हो। जैसे शरीर का आक्यूपेशन इमर्ज रहता है, मर्ज नहीं होता, ऐसे यह ब्राह्मण जीवन का आक्यूपेशन इमर्ज रूप में रहे। तो यह चेक करो इमर्ज रहता है या मर्ज रहता है? इमर्ज रहता है तो उसकी निशानी है हर कर्म में वह नशा होगा और दूसरों को भी अनुभव होगा कि यह शक्तिशाली आत्मा है। तो कहा जाता है हलचल से परे अचल। अचलघर आपका यादगार है। तो अपना आक्यूपेशन सदा याद रखो कि हम मास्टर सर्व-शक्तिमान् हैं क्योंकि आजकल सर्व आत्मायें अति कमजोर हैं तो कमजोर आत्माओं को शक्ति चाहिये। शक्ति कौन देगा? जो स्वयं मास्टर सर्वशक्तिमान् होगा। किसी भी आत्मा से मिलेंगे तो वो क्या अपनी बातें सुनायेंगे? कमजोरी की बातें सुनाते हैं ना? जो करना चाहते हैं वो कर नहीं सकते तो इसका प्रमाण है कि कमजोर हैं और आप जो संकल्प करते हो वो कर्म में ला सकते हो। तो मास्टर सर्वशक्तिमान् की निशानी है कि संकल्प और कर्म दोनों समान होगा। ऐसे नहीं कि संकल्प बहुत श्रेष्ठ हो और कर्म करने में वो श्रेष्ठ संकल्प नहीं कर सको, इसको मास्टर सर्वशक्तिमान् नहीं कहेंगे। तो चेक करो कि जो श्रेष्ठ संकल्प होते हैं वो कर्म तक आते हैं या नहीं आ सकते? मास्टर सर्वशक्तिमान् की निशानी है कि जो शक्ति जिस समय आवश्यक हो उस समय वो शक्ति कार्य में आये। तो ऐसे है या आह्वान करते हो, थोड़ा देरी से आती है? जब कोई बात पूरी हो जाती है, पीछे स्मृति में आये कि ऐसा नहीं, ऐसा करते, तो इसको कहा जाता है समय पर काम में नहीं आई। जैसे स्थूल कर्मेन्द्रियां ऑर्डर पर चल सकती हैं ना, हाथ को जब चाहो, जहाँ चाहो वहाँ चला सकते हो, ऐसे यह सूक्ष्म शक्तियां इतने कन्ट्रोल में हों जिस समय जो शक्ति चाहो काम में लगा सको। तो ऐसी कन्ट्रोलिंग पॉवर है? ऐसे तो नहीं सोचते कि चाहते तो नहीं थे लेकिन हो गया। तो सदा अपनी कन्ट्रोलिंग पॉवर को चेक करते हुए शक्तिशाली बनते चलो। सब उड़ती कला वाले हो कि कोई चढ़ती कला वाला, कोई उड़ती कला वाला? वा कभी उड़ती, कभी चढ़ती, कभी चलती कला हो जाती है? बदली होता है वा एकरस आगे बढ़ते रहते हो? कोई विघ्न आता है तो कितने समय में विजयी बनते हो? टाइम लगता है? क्योंकि नॉलेजफुल हो ना। तो विघ्नों की भी नॉलेज है। नॉलेज की शक्ति से विघ्न वार नहीं करेंगे लेकिन हार खा लेंगे। इसी को ही मास्टर सर्वशक्तिमान् कहा जाता है। तो अमृतवेले से इस आक्यूपेशन को इमर्ज करो और फिर सारा दिन चेक करो। अच्छा।


वरदान:- सहनशक्ति का कवच पहन, सम्पूर्ण स्टेज को वरने वाले विघ्न जीत भव

अपनी सम्पूर्ण स्टेज को वरने अर्थात् प्राप्त करने के लिए अलबेलेपन के नाज़ नखरों को छोड़ सहनशक्ति में मजबूत बनो। सहनशक्ति ही सर्व विघ्नों से बचने का कवच है। जो यह कवच नहीं पहनते वह नाजुक बन जाते हैं। फिर बाप की बातें बाप को ही सुनाते हैं, कभी बहुत उमंग-उत्साह में रहते, कभी दिलशिकस्त हो जाते। अब इस उतरने चढ़ने की सीढ़ी को छोड़ सदा उमंग-उत्साह में रहो तो सम्पूर्ण स्टेज समीप आ जायेगी।

स्लोगन:- याद और सेवा की शक्ति से अनेक आत्माओं पर रहम करना ही रहमदिल बनना है।

https://bkrajyogpathshala.blogspot.com/

01-04-2026 Bengali Murli

 মিষ্টি বাচ্চারা - বাচ্চারা, বাবা যা, বাবা ঠিক যেমন, তোমরা বাচ্চারাও তাঁকে নম্বর ক্রমানুসারেই চিনেছো, যদি সকলেই তাঁকে চিনে গেলে তবে তো অত্যন...